सोमवार, 16 जनवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 Jan 2017


👉 आज का सद्चिंतन 17 Jan 2017


👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 10) 17 Jan

🌹 त्रिविध प्रयोगों का संगम-समागम

🔴 तीसरा चरण है- आराधना इसे अभ्यर्थना, अर्चन भी कहते हैं। दूसरे शब्दों में इसी को पुण्य परमार्थ-लोकमंगल जन-कल्याण आदि भी कहते हैं। यह संसार विराट ब्रह्म का साकार स्वरूप है। इसमें निवास करने वाले प्राणियों और पदार्थों का, परिस्थितियों का सुनियोजन करने में संलग्न रहना आराधना है। सामाजिक प्राणी होने के नाते मनुष्य प्रकारान्तर से सभी का ऋणी है। इसकी भरपाई करने के लिये उसे परमार्थपरायण होना ही चाहिये।          

🔵 साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा के चार आधार सर्वतोमुखी प्रगति के लिये आवश्यक माने गये हैं। जीवन साधना में स्वाध्याय की, संयमशीलता की और लोकमंगल के लिये निरन्तर समयदान, अंशदान लगाते रहने की आवश्यकता पड़ती है। सेवा कार्यों के लिये समयदान, श्रमदान अनिवार्य रूप से आवश्यक हैं। इसके बिना पुण्य संचय की बात बनती ही नहीं। संयम तो अपने शरीर, मन और स्वभाव में स्वयं भी साधा जा सकता है, पर सेवाधर्म अपनाने के लिये समयदान के अतिरिक्त साधनदान की भी आवश्यकता पड़ती है। उपार्जित आजीविका का सारा भाग पेट परिवार के लिये ही खर्च नहीं करते रहना चाहिये, वरन् उसका एक महत्त्वपूर्ण अंश लोकमंगल के लिये भी नियमित और निश्चित रूप से निकालते रहना चाहिये।

🔴 उपासना, साधना और आराधना को; चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को परिष्कृत करने की प्रक्रिया को नित्य कार्य में नित्य नियम में सम्मिलित रखना चाहिये। उनमें से किसी एक को यदाकदा कर लेने से काम नहीं चलता। भोजन, श्रम और शयन-ये तीनों ही नित्य करने पड़ते हैं। इनमें से किसी को यदाकदा न्यूनाधिक मात्रा में मनमर्जी से कर लिया जाया करे, तो उस अस्तव्यस्तता के रहते न तो स्वास्थ्य ठीक रह सकता है और न व्यवस्थित उपक्रम चल सकता है। फिर किसी प्रयोजन में सफल हो सकना तो बन ही किस प्रकार पड़े?   

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मेरी कीमत क्या होगी?

🔵 दुनिया के कट्टर और खूँखार बादशाहों में तैमूरलंग का भी नाम आता है व्यक्तिगत महत्त्वाकाँक्षा, अहंकार और जवाहरात की तृष्णा से पीड़ित तैमूर ने एक बार विशाल भू-भाग को देखकर बगदाद में उसने एक लाख मरे हुए व्यक्तियों की खोपड़ियों का पहाड़ खड़ा कराया था। इसी बात से उसकी क्रूरता का पता चल जाता है।

🔴 एक समय की बात है। बहुत से गुलाम पकड़कर उसके सामने लाये गये। तुर्किस्तान का विख्यात कवि अहमदी भी दुर्भाग्य से पकड़ा गया। जब वह तैमूर के सामने उपस्थित हुआ, तो एक विद्रूप- सी हँसी हँसते हुए उसने दो गुलामों की ओर इशारा करते हुए पूछा- "सुना है कि कवि बड़े पारखी होते है, बता सकते हो इनकी कीमत क्या होगी?”

🔵 “इनमें से कोई भी 4 हजार अशर्फियों से कम कीमत का नहीं है।” अहमदी ने सरल किन्तु स्पष्ट उत्तर दिया।

🔴 ”मेरी कीमत क्या होगी?”तैमूर ने अभिमान से पूछा।

🔵 ”यही कोई 24 अशर्फी।” निश्चिंत भाव से अहमदी ने उत्तर दिया।

🔴 तैमूर क्रोध से आगबबूला हो गया। चिल्लाकर बोला-बदमाश! इतने में तो मेरी सदरी (उसके पहनने का वस्त्र) भी नहीं बन सकती, तू यह कैसे कह सकता है कि मेरा मूल्य कुल 24 अशर्फी है।”

🔵 अहमदी ने बिना किसी आवेश या उत्तेजना के उत्तर दिया-बस वह कीमत उसी सदरी की है, आपकी तो कुछ नहीं। जो मनुष्य पीड़ितों की सेवा नहीं कर सकता, बड़ा होकर छोटों की रक्षा नहीं कर सकता, असहायों की, अनाथों की जो सेवा नहीं कर सकता, मनुष्य से बढ़कर जिसे अहमियत प्यारी हो उस इनसान का मूल्य चार कौड़ी भी नहीं, उससे अच्छे तो यह गुलाम ही है, जो किसी के काम तो आते हैं।”

🌹 अखण्ड ज्योति मई 1988

👉 आत्मचिंतन के क्षण 17 Jan 2017

🔴 हमारे शरीर को नमस्कार करने वाली भीड़ को हमने लाखों की संख्या में इधर से उधर घूमते-फिरते देखा है, पर जिन्हें हमारे विचारों के प्रति श्रद्धा हो, ऐसे व्यक्ति बहुत थोड़े हैं। भीड़ को हम कौतूहल की दृष्टि से देखते हैं, पर आत्मीय केवल उन्हें ही समझते हैं, जो हमारे विचारों का मूल्यांकन करते हैं, उन्हें प्रेम करते और अपनाते हैं।

🔵 किसी भी संगठन का प्राण उसके आदर्शों में अटूट निष्ठा ही होती है। जब तक विचारों में एकता न होगी, आकाँक्षाओं और भावनाओं का प्रवाह एक दिशा में न होगा, तब तक संगठन में मजबूती असंभव है। आस्थावान् व्यक्ति ही युग निर्माण संगठन के रीढ़ हैं।

🔴 बुराइयाँ आज संसार में इसलिए बढ़ और फल-फूल रही हैं कि उनका अपने आचरण द्वाराप्रचार करने वाले सच्चे प्रचारक पूरी तरह मन, कर्म और वचन से बुराई करने और फैलाने वाले लोग बहुसंख्यक मौजूद हैं। अच्छाइयाँ आज इसलिए घट रही हैं, क्योंकि अच्छाइयों के प्रचारक आज निष्ठावान् नहीं बातूनी लोग ही दिखाई पड़ते हैं। फलस्वरूप बुराइयों की तरह अच्छाइयों का प्रसार नहीं हो पाता। वे पोथी के बैंगनों की तरह केवल कहने-सुनने भर की बातें रह जाती हैं।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 26) 17 Jan

🌹 अनुष्ठान के नियमोपनियम
🔴 पुरश्चरणों में तर्पण, मार्जन, न्यास, कवच, कीलक, अर्गल आदि के कितने ही विशिष्ट विधान हैं। अनुष्ठानों में इनमें से किसी की भी आवश्यकता नहीं है। जप, हवन के उपरांत ब्रह्मभोज ही पूर्णाहुति का अन्तिम चरण पूरा करने के लिए आवश्यक होता है। यह कार्य ब्राह्मणों या कन्याओं को भोजन कराने के साथ पूरा होता है। सच्चे ब्राह्मण ढूंढ़ पाना अति कठिन है। जो है वे परान्न खाने को तैयार नहीं होते। कन्याओं को मातृशक्ति का प्रतीक मानकर भाव-पवित्रता का संवर्धन करने के लिए भोजन कराया जा सकता है। पर उसमें भी यही व्यवधान आता है।

🔵 स्वाभिमानी अभिभावक इसके लिए तैयार नहीं होते। ढूंढ़ निकाली भी जायें तो दान की प्रतिक्रिया का अनुमान लगाने पर उसका परिणाम भी कुछ उत्साहवर्धक नहीं दीखता। इन परिस्थितियों में ब्रह्मभोज का सही स्वरूप ब्रह्मदान ही सकता है। ब्रह्मदान अर्थात् सद्ज्ञान का दान। यह युग निर्माण द्वारा पूरा हो सकता है। एक-एक आहुति पर एक नया पैसा ब्रह्मदान के लिए निकाला जाय। 240 आहुतियां 24 हजार के अनुष्ठान के लिए देनी है तो 240 पैसे का प्रसार साहित्य भी सत्पात्रों को वितरण करना चाहिए। इससे सद्ज्ञान का बीजारोपण अनेक अन्तःकरणों में होता है और उसका सत्परिणाम पढ़ने और पढ़ाने वाले दोनों को ही समान रूप से मिलता है।

🔴 अनुष्ठान में अधिक अनुशासन पालन करना पड़ता है। जप का समय, संख्या, दैनिक क्रम एक साथ बनाकर चलना पड़ता है। अनिवार्य कारण आ पड़े तो बात दूसरी है अन्यथा उपासना का निर्धारित क्रम आदि से अन्त तक एक रस ही चलते रहना चाहिए। उसमें उलट-पुलट अनिवार्य कारण होने पर ही करना चाहिए और वह भी न्यूनतम मात्रा में।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 20) 17 Jan

🌹 कठिनाइयों से डरिये मत, जूझिये

🔵 अमेरिका का हार्टफोर्ड कनेक्टिकल हॉल दर्शकों से खचाखच भरा था। 19 नवम्बर 1901 के दिन घूंसेबाज़ी का एक अनोखा मैच था। प्रसिद्ध अमेरिकी घूंसेबाज टेरी मेकगवर्न का एक नये प्रतिस्पर्धी के साथ मुकाबला था अब तक 6 खिलाड़ी उसे हराने के प्रयत्न में स्वयं ही मात खा चुके थे। टेरी के प्रशंसक आज पुनः उसकी विजय की आशा ही नहीं दृढ़ विश्वास लेकर आये थे। यह स्वाभाविक भी था—घूंसेबाज़ी में उसकी कुशलता और निपुणता देखते ही बनती थी। प्रतिस्पर्धी पर वह बड़ी फुर्ती एवं निर्ममता के साथ घूंसे चलता इसलिए ‘टेरिबल टेरी’ के नाम से वह जनता में विख्यात था। 1889 टेरी की उम्र जब केवल 19 वर्ष की थी तत्कालीन लाइटवेट चैम्पियन ‘पेडलरपामर’ को केवल 75 सेकेंडों में धराशायी कर दिया। उसके बाद 1900 में जॉर्ज डिक्सन को हराकर विश्व फेदरवेट चैम्पियन का पद भी हासिल कर लिया। तब से इस पद से हटाने के लिए प्रतिस्पर्धी निरन्तर प्रयत्नशील थे।

🔴 लम्बी प्रतिक्षा के बाद रिंग में मदमस्त हाथी के सामने खड़े एक दुबले पतले अनजान व्यक्ति कार्बेट को देख दर्शकों के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। कई सहृदय व्यक्ति कार्बेट के प्रति सहानुभूति दर्शाने लगे कि ‘क्यों बेकार में यह अभागा अपनी जान देने आ गया।’ ऐसे कितने ही उद्गार चारों ओर सुने जा सकते थे। इन सब बातों से अनभिज्ञ कार्बेट के चेहरे पर दृढ़ विश्वास झलक रहा था।

🔵 मैच शुरू हुआ। टेरी ने अपनी आदत के अनुसार प्रारम्भ में घूंसों की बौछार शुरू कर दी। उत्साह-उमंग और चुस्ती-स्फूर्ति से भरा हुआ कार्बेट टेरी का हर वार बचाये जा रहा था। एक ओर टेरी की अन्धाधुन्ध घूंसों की बौछार और दूसरी ओर कार्बेट की गजब की स्फूर्ति। स्थिति यह थी कि कोई नया दर्शक यही समझता कि कार्बेट चैम्पियन है और टेरी नौसिखिया। ऐसी स्थिति में टेरी जैसे मंजे खिलाड़ी का आत्मविश्वास डगमगा गया वह बौखला उठा। अब टेरी इस प्रयास में था कि किसी भी तरह कार्बेट को एक घूंसा लगाकर अपना खोया विश्वास पुनः प्राप्त कर ले। लेकिन यह सम्भव न हो सका इसी बीच पहला राउण्ड समाप्त हो गया। दूसरे राउण्ड के शुरू होते ही कार्बेट की दाहिनी मुट्ठी का जबर्दस्त घूंसा टेरी के जबड़े पर पड़ा। वह ऐसा गिरा कि फिर वह उठ नहीं सका। रेफरी की गिनती समाप्त हो गई।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 अध्यात्म एक प्रकार का समर (अमृतवाणी) भाग 9

जिह्वा ही नहीं, हर इंद्रिय का सदुपयोग करें

🔴 मित्रो! ये जिह्वा का संकेत है, जो हम बार- बार पानी पीने के नाम पर, पवित्रीकरण के नाम पर, आचमन करने के नाम पर आपको सिखाते हैं और कहते हैं कि जीभ को धोइए, जीभ को साफ कीजिए। जिह्वा को आप ठीक कर लें तो आपका मंत्र सफल हो जाएगा। तब राम नाम भी सफल हो अता है, गायत्री मंत्र भी सफल हो सकता है और जो भी आप चाहे सफल हो सकता है।

🔵 यह आत्मसंशोधन की प्रक्रिया है। जीभ का तो मैंने आपको एक उदाहरण दिया है। इसके लंबे में कहाँ तक जाऊँ कि आपको सारी की सारी इंद्रियों का वर्णन करूँ और उनके संशोधन की प्रक्रिया बताऊँ कि आप अमुक इंद्रिय का संशोधन कीजिए। आँखों का संशोधन कीजिए। आँखों में जो आपके शैतान बैठा रहता है, जो छाया के रूप में प्रत्येक लड़की को आपको वेश्या दिखाता है। स्कूल पाने कौन जाती है वेश्या। ये कौन बैठी है वेश्या! सड़क पर कौन जाती है? गंगाजी पर कौन नहा रही है? सब वेश्या। श्री साहब! दुनिया में कोई सती, साध्वी, बेटी, माँ, बहन कोई है?

🔴 नहीं साहब! दुनिया में कोई बहन नहीं होती, कोई बेटी नहीं होती। जितनी भी रेलगाड़ियों में चल रही हैं, जितनी भी गंगाजी में नहाती हैं जो स्कूल जा रही हैं, ये सब वेश्या हैं। नहीं बेटे, ये वेश्या कैसे हो सकती हैं। तेरी भी तो कन्या होगी? तेरी भी तो लड़की स्कूल जा रही होगी। वह भी फिर वेश्या है क्या? नहीं साहब! हमारी लड़की तो वेश्या नहीं है। बाकी सब वेश्या हैं। ये कैसे हो सकता हैं? बेटे, यह तेरे आँखों का राक्षस, आँखों का शैतान, आँखों का पशु और आँखों का पिशाच तेरे दिल दिमाग में छाया हुआ है। यही तुझे यह दृश्य दिखाता है। इसका संशोधन कर, फिर देख तुझे हर लड़की में, हर नारी में अपनी बेटी, अपनी बहन, और अपनी माँ की छवि दिखाई देगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Pravachaan/pravaachanpart4/aadhiyatamekprakarkasamar.3

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 74)

🌹 गीता के माध्यम से जन-जागरण

🔴 षोडश संस्कारों को शिक्षा— इसी एक महीने की अवधि में सोलह संस्कार कराने का विधान सीखने का अभ्यास भी प्रत्येक कथा वाचक को करा दिया जायगा, ताकि वह पुंसवन, नामकरण, अन्न प्राशन, मुण्डन, विद्यारम्भ, यज्ञोपवीत,  विवाह, वानप्रस्थ एवं जन्म दिन, पर्व-त्यौहार आदि का विधान जान कर उन शुभ कार्यों को भी विधिवत् करा सकें। कारण कि इन आयोजनों के द्वारा भी व्यक्ति-निर्माण, परिवार-निर्माण एवं समाज-निर्माण का महत्वपूर्ण कार्य हो सकता है। इन अवसरों पर जो प्रवचन किये जाते हैं, संस्कारों की प्रत्येक क्रिया का जो मर्म समझाया जाता है, उससे निश्चय ही उस भावनापूर्ण वातावरण में भाग लेने वालों पर विशेष प्रभाव पड़ सकता है। अपनी संस्कार पद्धति में प्रत्येक संस्कार के साथ सम्बन्धित समस्याओं का विवेचन तथा कर्तव्यों का उद्बोधन ऐसे अच्छे ढंग से सम्बन्धित कर दिया गया है कि यह षोडश संस्कार भी युग-निर्माण की आवश्यकता को प्रभावशाली ढंग से पूरा करने में सहायक हो सकते हैं। होली, दिवाली आदि पर्व-त्यौहारों को भी यदि अपनी पद्धति से मिला-जुला कर मनाया जा सके तो उससे भी नैतिक, सामाजिक एवं बौद्धिक क्रान्ति की आवश्यकता पूरी हो सकती है।

🔵 उपरोक्त शिक्षण भी इस एक महीने की गीता प्रवचन शिक्षा के साथ ही जोड़ दिया गया है। आशा यह की जानी चाहिए कि मनोयोग पूर्वक जो भी इस एक महीने की शिक्षा को प्राप्त करेगा, वह युग-निर्माण योजना का एक प्रभावशाली कार्यकर्त्ता बनकर निकलेगा और जन-नेतृत्व की आज की महती आवश्यकता को पूरा करने में बहुत हद तक योग देगा।

🔴 जिन्हें प्रचारक का कार्य करना नहीं है, अपने कार्य में व्यस्त हैं और बाहर जा सकने की सुविधा नहीं है वे स्वान्तः सुखाय भगवान के इस महान् ज्ञान की उपलब्धि के लिए भी मथुरा आ सकते हैं और गीता की चमत्कारी रचना के रहस्यों को समझते हुए यह जान सकते हैं कि इस महान ज्ञान द्वारा मनुष्य की वैयक्तिक एवं सामूहिक समस्याओं का हल किस प्रकार हो सकता है? इस पृथ्वी पर स्वर्ग का अवतरण करने के लिए गीता कैसी दिव्य विभूति सिद्ध हो सकती है?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 25)

🌞 मार्गदर्शक द्वारा भावी जीवन क्रम सम्बन्धी निर्देश

🔴  ‘‘जब तक तुम्हारे स्थूल शरीर की उपयोगिता रहेगी तभी तक वह काम करेगा। इसके उपरांत इसे छोड़कर सूक्ष्म शरीर में चला जाना होगा। तब साधनाएँ भिन्न होंगी, क्षमताएँ बढ़ी-चढ़ी होंगी। विशिष्ट व्यक्तियों से संपर्क रहेगा। बड़े काम इसी प्रकार हो सकेंगे।’’

🔵 गुरुदेव ने कहा-‘‘ उचित समय आने पर तुम्हारा परिचय देवात्मा हिमालय क्षेत्र से कराना होगा। गोमुख से पहले संत महापुरुष स्थूल शरीर समेत निवास करते हैं। इस क्षेत्र में भी कई प्रकार की कठिनाइयाँ हैं।  इनके बीच निर्वाह करने का अभ्यास करने के लिए, एक-एक साल वहाँ निवास करने का क्रम बना देने की योजनाएँ बनाई हैं। इसके अतिरिक्त हिमालय का हृदय जिसे अध्यात्म का ध्रुव केंद्र कहते हैं, उसमें चार-चार दिन ठहरना होगा, हम साथ रहेंगे। स्थूल शरीर जैसी स्थिति सूक्ष्म शरीर की बनाते रहेंगे। वहाँ कौन रहता है, किस स्थिति में रहता है, तुम्हें कैसे रहना होगा, यह भी तुम्हें विदित हो जाएगा। दोनों शरीरों का, दोनों क्षेत्रों का अनुभव क्रमशः बढ़ते रहने में तुम इस स्थिति में पहुँच जाओगे, जिसमें ऋषि अपने निर्धारित संकल्पों की पूर्ति में संलग्न रहते हैं। संक्षेप में यही है तुम्हें चार बार हिमालय बुलाने का उद्देश्य। इसके लिए जो अभ्यास करना पड़ेगा, जो परीक्षा उत्तीर्ण करनी पड़ेगी, यह उद्देश्य भी इस बुलावे का है। तुम्हारी यहाँ पुरश्चरण साधना में इस विशिष्ट प्रयोग से कोई विघ्न न पड़ेगा।

🔴 सूक्ष्म शरीरधारी उसी क्षेत्र में इन दिनों निवास करते हैं। पिछले हिम युग के बाद परिस्थितियाँ बदल गईं हैं। जहाँ धरती का स्वर्ग था, वहाँ का वातावरण अब देवताओं के उपयुक्त नहीं रहा, इसलिए वे अंतरिक्ष में रहते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/marg.2

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 25)


🌞  हिमालय में प्रवेश

मील का पत्थर

🔵 सोचता हूं मील का पत्थर अपने आप में कितना तुच्छ है। उसकी कीमत, योग्यता, सामर्थ्य, विद्या, बुद्धि सभी उपहासास्पद है। पर यह अपने एक निश्चित और नियत कर्त्तव्य को लेकर यथा स्थान जम गया है। हटने की सोचता तक नहीं। उसे एक छोटी सी बात मालूम है धरासूं इतने मील इतने फर्लांग है। बस, केवल इतने से ज्ञान को लेकर वह जन सेवा के पथ पर अड़ गया है उस पत्थर के टुकड़े की, नगण्य और तुच्छ की—यह निष्ठा अन्ततः कितनी उपयोगी सिद्ध हो रही है। मुझ जैसे अगणित पथिक उससे मार्ग दर्शन पाते हैं और अपनी परेशानी का समाधान करते हैं।

🔴 जब यह जरा सा पत्थर का टुकड़ा मार्ग दर्शन कर सकता है, जब मिट्टी का जरा सा एक दो पैसे मूल्य का दीपक प्रकाश देकर रात्रि के खतरों से दूसरों की जीवन रक्षा कर सकता है, तो क्या सेवाभावी मनुष्य को इसलिये चुप ही बैठना चाहिये कि उसकी विद्या कम है, बुद्धि कम, सामर्थ्य कम है, योग्यता कम है? कमी हर किसी में है। पर हममें से प्रत्येक अपने क्षेत्र में—अपने से कम जानकारी में, कम स्थिति के लोगों में बहुत कुछ कर सकता है। ‘अमुक योग्यता मिलती तो अमुक कार्य करता’ ऐसी शेखचिल्ली कल्पनाएं करते रहने की अपेक्षा क्या यह उचित नहीं कि अपनी जो योग्यता है उसी को लेकर अपने से पिछड़े हुए लोगों को आगे बढ़ाने का मार्ग दर्शन का काम कर दें। मील का पत्थर सिर्फ धतासूं और गंगोत्री का अन्तर मात्र जानता है, उतना ही बता सकता है पर उसकी उतनी सेवा भी क्या कम महत्व की है। उसके अभाव में उत्तरकाशी से भटवाड़ी तक परेशानी रही और कल गौमुख दर्शन का जो सौभाग्य मिलने वाला है उसकी सुखद कल्पना में उन पत्थरों का अभाव बुरी तरह खटक रहा है।

🔵 हममें से कितने ऐसे हैं जो मील के पत्थरों से अधिक जन सेवा कर सकते हैं। पर आत्मविश्वास, निष्ठा और जो कुछ है उसी को लेकर अपने उपयुक्त क्षेत्र में अड़ जाने की निष्ठा हो तभी तो हमारी उपयोगिता को सार्थकता होने का अवसर मिले।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 जीवन की सफलता

जीवन ऊर्जा का महासागर है। काल के किनारे पर अगणित अन्तहीन ऊर्जा की लहरें टकराती रहती हैं। इनकी न कोई शुरुआत है, और न कोई अन्त; बस मध्य है...