सोमवार, 16 जनवरी 2017

👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 10) 17 Jan

🌹 त्रिविध प्रयोगों का संगम-समागम

🔴 तीसरा चरण है- आराधना इसे अभ्यर्थना, अर्चन भी कहते हैं। दूसरे शब्दों में इसी को पुण्य परमार्थ-लोकमंगल जन-कल्याण आदि भी कहते हैं। यह संसार विराट ब्रह्म का साकार स्वरूप है। इसमें निवास करने वाले प्राणियों और पदार्थों का, परिस्थितियों का सुनियोजन करने में संलग्न रहना आराधना है। सामाजिक प्राणी होने के नाते मनुष्य प्रकारान्तर से सभी का ऋणी है। इसकी भरपाई करने के लिये उसे परमार्थपरायण होना ही चाहिये।          

🔵 साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा के चार आधार सर्वतोमुखी प्रगति के लिये आवश्यक माने गये हैं। जीवन साधना में स्वाध्याय की, संयमशीलता की और लोकमंगल के लिये निरन्तर समयदान, अंशदान लगाते रहने की आवश्यकता पड़ती है। सेवा कार्यों के लिये समयदान, श्रमदान अनिवार्य रूप से आवश्यक हैं। इसके बिना पुण्य संचय की बात बनती ही नहीं। संयम तो अपने शरीर, मन और स्वभाव में स्वयं भी साधा जा सकता है, पर सेवाधर्म अपनाने के लिये समयदान के अतिरिक्त साधनदान की भी आवश्यकता पड़ती है। उपार्जित आजीविका का सारा भाग पेट परिवार के लिये ही खर्च नहीं करते रहना चाहिये, वरन् उसका एक महत्त्वपूर्ण अंश लोकमंगल के लिये भी नियमित और निश्चित रूप से निकालते रहना चाहिये।

🔴 उपासना, साधना और आराधना को; चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को परिष्कृत करने की प्रक्रिया को नित्य कार्य में नित्य नियम में सम्मिलित रखना चाहिये। उनमें से किसी एक को यदाकदा कर लेने से काम नहीं चलता। भोजन, श्रम और शयन-ये तीनों ही नित्य करने पड़ते हैं। इनमें से किसी को यदाकदा न्यूनाधिक मात्रा में मनमर्जी से कर लिया जाया करे, तो उस अस्तव्यस्तता के रहते न तो स्वास्थ्य ठीक रह सकता है और न व्यवस्थित उपक्रम चल सकता है। फिर किसी प्रयोजन में सफल हो सकना तो बन ही किस प्रकार पड़े?   

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

👉 मौनं सर्वार्थ साधनम (भाग 1)

🔵 मौन साधना की अध्यात्म-दर्शन में बड़ी महत्ता बतायी गयी है। कहा गया है “मौनं सर्वार्थ साधनम्।” मौन रहने से सभी कार्य पूर्ण होते हैं। मह...