रविवार, 3 दिसंबर 2017

👉 युगनिर्माण योजना और उसके भावी कार्यक्रम (भाग 1)

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ—
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।
देवियो! भाइयो!!

🔶 युगनिर्माण योजना का प्रारम्भ इस उद्देश्य से हुआ कि मनुष्य की भावनात्मक स्थिति में परिवर्तन किया जाए और उसे ऊँचा उठाया जाए। संसार में जितनी भी समस्याएँ हैं, उन सारी समस्याओं का एकमात्र उपाय यह है कि मनुष्यों का भावनात्मक स्तर ऊँचा हो तो जो समस्याएँ आज हमको दिखाई पड़ती हैं, उनमें से एक का भी अस्तित्व न रहे। जितनी भी कठिनाइयाँ मनुष्य के सामने हैं, वे उसकी स्वयं की पैदा की हुई हैं, वास्तविक नहीं। सृष्टि में जितने भी जीव रहते हैं, सारे के सारे अपने जीवन की सुविधाओं को आसानी से प्राप्त कर लेते हैं। कीड़े-मकोड़ों से लेकर जलचर, नभचर और थलचर तक के सामने कोई ऐसी समस्या नहीं है, जिसके कारण से वह दुःखी रहते हों।
               
🔷 मनुष्यों के सम्पर्क में जो आ गये हैं, उन प्राणियों के दुःखी होने के कारण हैं। उनको मनुष्यों ने पाल रखा है, वे दुःखी भी हो सकते हैं, काटे भी जा सकते हैं, घायल भी हो सकते हैं, लेकिन जो प्रकृति की गोद में रहते हैं, उनके सामने कोई समस्या नहीं है, जीवनयापन करने के सम्बन्ध में फिर मनुष्य के सामने इतनी समस्याएँ क्यों? मनुष्य तो बुद्धिमान प्राणी है, प्रगतिशील प्राणी है, उन्नत प्राणी है, उसके सामने तो सुख-सुविधाओं के अम्बार होने चाहिए।
   
🔶 लेकिन हम देखते हैं कि दूसरे प्राणियों की तुलना में मनुष्य बहुत दुःखी है। उसका एकमात्र कारण यह है कि उसकी विचारणाएँ, उसकी भावनाएँ, उसके दृष्टिकोण निम्न स्तर के होते चले गये। अगर यह स्तर उनका ऊँचा उठा रहा होता तो अभावग्रस्त स्थितियों में भी मनुष्य ने शान्ति का जीवन जिया होता। कहा जाता है कि सम्पदाएँ मनुष्य के पास होंगी, सुख-सुविधाएँ मनुष्य के पास होंगी तो वह समुन्नत होगा, सुखी रहेगा और आनन्द से रहेगा, लेकिन बात सही नहीं है। गरीब लोगों के पास जिनके पास साधन और सामान नहीं होते, सम्पत्ति नहीं होती, वह भी बड़ी सुख और सुविधा का जीवन जीते हैं और उनकी वृद्धि का कोई मार्ग रुका नहीं रहता। ऋषियों का जीवन इसी प्रकार का था। उनके सामने ज्यादा अभावी दुनिया में कोई भी नहीं है।

🔷 पहनने के नाम पर एक लँगोटी, इस्तेमाल करने के नाम पर एक कमण्डलु, फूस की झोंपड़ी, जमीन पर सोना, फूस की बिछावन, घास-पात और कन्द-मूल खा करके गुजारा कर लेना। इतना सब होते हुए भी ऋषियों ने बताया कि अभावग्रस्तता में भी सुखी जीवन बन सकता है, सुख और शान्ति का स्त्रोत बन सकता है। इन परिस्थितियों में भी विद्या अध्ययन में कोई रुकावट पैदा नहीं हुई। मगर सही बात यह है कि जिन-जिन लोगों के पास विशेष सुविधाएँ थीं, उन लोगों की अपेक्षा उन लोगों ने ज्यादा सुखी और समुन्नत जीवन जिया। ये बात उन्होंने साबित करने के लिए की थी कि वक्त-बेवक्त सुविधाएँ न हो, साधन मनुष्य के पास न हों तो भी वह आदमी सुखी जीवन जी सकता है, समुन्नत जीवन जी सकता है और दूसरों के लिए बड़ा उपयोगी सिद्ध हो सकता है। फर्क केवल एक ही है कि भावनात्मक स्तर ऊँचा उठा हुआ हो।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 आत्मचिंतन के क्षण 3 Dec 2018

🔶 हर वक्त शंकित रहने वाले, प्रत्येक काम में कोई नुक्स निकालने वाले, हर किसी की आलोचना करने वाले, छिद्रान्वेषी व्यक्ति अपनी आन्तरिक दुर्बलता का परिचय देते हैं। भय और शंका जिनके मन में जम जाते हैं वे हर वक्त डरते रहते हैं, असफलता, गन्दगी और आशंका ही हर तरफ उन्हें दिखाई देती है। वे अपने लिये कोई काम चुन नहीं पाते। जो करते हैं उसमें सन्तुष्ट नहीं रहते, अपने काम को तुच्छ, निन्दनीय, हानिकारक मानते हैं और उसे छोड़ने की बात बार-बार कहते रहते हैं। छोड़ भी नहीं पाते। क्योंकि नया कदम उठाने लायक साहस उनमें नहीं होता। पुराने को ठीक तरह कर नहीं पाते। कर तो तभी पावें जब उसकी श्रेष्ठता और सफलता पर उन्हें विश्वास हो!

🔷 ओछे आदमी का एक चिन्ह यह है कि वह अपने बारे में ही सदा सोचता रहता है। अपना लाभ, अपनी हानि, अपनी भूल, अपना भविष्य, अपनी कठिनाई, अपना न्याय, अपना स्वास्थ्य, अपनी प्रतिष्ठा, अपना दुर्भाग्य, अपना स्वर्ग, अपनी मुक्ति आदि बातें ही उसके चिन्तन का मुख्य विषय होती हैं। दूसरों से जब भी बात करेगा अपना रोना रोवेगा, अपनी शेखी मारेगा। वह यह भूल जाता है कि दूसरों को तुम्हारे रोने गाने सुनने की न तो फुरसत है और न उसमें कोई दिलचस्पी। हर आदमी अपनी जिम्मेदारियों से लदा हुआ है, उसे दूसरे की सहानुभूति या सहायता चाहिए। यह जानते हुए भी जो लोग अपनी राम कहानी ऐसे लोगों को सुनाते हैं जो उसको हल नहीं कर सकते तो ऐसा सुनाना एक प्रकार से उनका समय नष्ट करना ही है। ऐसे सिर खाऊ लोगों को भला कौन पसन्द करेगा?

🔶 आलस, गन्दगी और अव्यवस्था भी ऐसे दुर्गुण हैं जो यह साबित करते हैं कि यह व्यक्ति अपने आप से लापरवाह है। जो अपने समय की, सामान की, शरीर की, वस्त्रों की, कार्यक्रमों की व्यवस्था नहीं कर सकता या नहीं करना चाहता, उसे जीवट का, जोरदार, सावधान या चैतन्य नहीं कहा जा सकता। ढीले-पोले, अस्त-व्यस्त स्वभाव के लोग वस्तुतः इसी लायक हैं कि उन्हें दूसरे आदमी हल्की निगाह से देखें। अपना चलना, उठना, बैठना, कपड़े पहनना, हजामत, बातचीत सभी में एक व्यवस्था, तेजी तथा सावधानी हो, तभी किसी की आँखों में हम सतर्क, सावधान एवं प्रगतिशील जँच सकते हैं।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 शांति और सौन्दर्य अपने ही अन्दर निहित

🔷 उनसे प्यार करो, जिन्हें लोग पतित, गर्हित और हेय समझते हैं। जिन्हें केवल निन्दा और भर्त्सना ही मिलती है। जो अपने ऊपर लदे हुए पिछड़ेपन के कारण न किसी के मित्र बन पाते हैं और न जिन्हें कोई प्यार करता है। प्यार करने योग्य वही लोग हैं, जिन्हें स्नेह- सद्भाव देकर तुम अपने को गौरवान्वित करोगे। मांगो मत, चाहो मत, देकर ही अपने को गौरवान्वित अनुभव करो। 

🔶 उन्हें देखने के लिए मत दौड़ो, जिनकी त्वचा चमकीली और गठन में सुन्दरता भरी है। ऐसा तो तितलियाँ और भौंरे भी कर सकते हैं। तुम उन्हें निहारो जो दरिद्रता और रुग्णता की चक्की में पिसकर कुरूप लगने लगे हैं। अभावों के कारण जिनकी अस्थियाँ उभर रही हैं और आँखों की चमक छिन गयी है। निराश दिलों में आशा का संचार करके तुम अपने को धन्य अनुभव करोगे।

🔷 कोलाहल और क्रंदन के साथ जुड़ी हुई विपन्नताओं को देखकर न डरो और न भागो। वरन् वह करो, जिससे अशान्ति को निरस्त और शान्ति को प्रशस्त कर सको। शांति पाने के लिए न एकान्त ढूँढ़ो और न उद्यानों में भटको। वह तो तुम्हारे अन्दर है और तब प्रकट होती है जब तुम कोई ऐसा काम करते हो, जिससे अनीतियों और भ्रांतियों का  निराकरण हो सके। सत्प्रयत्नों के साथ ही शांति जुड़ी हुई है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 3 Dec 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 3 Dec 2017


👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग १)

महत्त्व निर्माण का ही है। उपलब्धियाँ मात्र उसी पर निर्भर हैं। इतना होते हुए भी पहले से ही जड़ जमाकर बैठी हुई अवांछनीयता निरस्त करने पर सृ...