गुरुवार, 29 सितंबर 2016

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 43)

🔵 सभी प्रवृत्तियों में संन्यास की प्रवृत्ति सर्वश्रेष्ठ है। स्वयं को सभी बंधनों से मुक्त करके तुम उन सबकी- सहायता करते हो जो तुम्हें जानते हैं या जो तुम्हारे- जीवन में आयेंगे। आत्म- साक्षात्कार के द्वारा संन्यासी सभी कर्तव्यों को पूर्ण कर लेता है। उसके आत्मत्याग से दूसरे भी  मुक्त हो जाते हैं। अपने हृदय और कर्मों में संन्यासी बनो। किसी व्यक्ति या वस्तु पर निर्भर न रहो। दूसरों को उनकी स्वतंत्रता दो तथा तुम स्वयं भी मुक्त रहो। अपनी असुविधाओं के कारण निराश न होओ क्योंकि वही असुविधायें यदि आध्यात्मिक दिशा की ओर मोड़ दी जाएँ तो सुविधाओं में परिवर्तित हो जायेंगी।

🔴 अपनी भावनाओं का अध्यात्मीकरण करो। और जब तुम्हारे स्वभाव में कोई दुर्भावना या स्नायविक- उत्तेजना न रहेगी तब तुम अपने आधार पर खड़े हो सकोगे तथा अनेकों के लिए ज्योति और सहायक होओगे, भले ही तुमने उन लोगों को देखा भी न हो। सिंह के समान बनो, तब सभी दुर्बलताएँ तुमसे दूर हो जायेंगी। ईश्वर बनने की इच्छा करो तब तुम्हारी देहात्मबुद्धि दू रहो जायेगी। तुम शुद्धात्मा हो जाओगे। प्रकृति के भव्य दृश्यों पर्वतों, विशाल समुद्रों तथा चमकते सूर्य से शिक्षा ग्रहण करो। शक्तिशाली व्यक्तित्व से एकत्व बोध करो।

🔵 वत्स! -स्वयं का निर्माण करना एक लम्बी तथा कष्टप्रद प्रक्रिया है। तुम उन्नत हो सको इसके पूर्व यह आवश्यक है कि तुम स्वयं के प्रति अत्यन्त निष्कपट बनो। अपने प्रति छूट या दया के सभी पर्दों को लगातार दु:ख तथा अपने क्षुद्र अंह की सीमा के अनुभव द्वारा चीर डालना होगा। ईश्वर के साथ अज्ञान तथा तुम्हारी आत्मा के साथ छद्म नहीं हो सकता। सूक्ष्म तथा सर्वश्रेष्ठ अवश्य प्रगट होगा। अत: दुःख के प्रत्येक वाहक के प्रति कृतज्ञ रहो जो कि एक साथ तुम्हें और तुम्हारी दुर्बलता को तुम्हारे सामने प्रगट कर देता है। कहो, दुःख तुम धन्य हो!

🔴 अल्पविद्या ने तुम्हें बुद्धिमान, अहंवादी बना दिया है। महत् विद्या तुम्हें आध्यात्मिक बना देगी। स्मरण रखो मन आत्मा नहीं है। अनुभवों मन को कुचल डालने दो, जैसा कि वह करेगा। यह उसे शुद्ध करेगा यही मुख्य बात है। क्रमश: आत्मा का सूर्य अज्ञान के काले बादलों को भेद देगा और तब लक्ष्य तुम्हारे सामने स्पष्ट हो जायेगा। तुम उसकी ज्योति में मिल जाओगे।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 30 Sep 2016


🔴 अंतःकरण में पापकर्म के संकल्प का उदय होते ही आत्मा में एक बेचैनी पैदा होने लगती है। उसका विवेक बार-बार धिक्कारता और भर्त्सना करता है। मनुष्य सुख-चैन की नींद खो देता है। उसकी अंतरात्मा बार-बार पुकार करती है कि तेरा यह संकल्प, यह विचार, यह भावना उचित नहीं, इनकी पूर्ति तेरे लिए अकल्याणकर परिस्थितियाँ पैदा करेंगी, पाप कर्म के लिए मनुष्य का यह आदि अंतर्द्वन्द्व कितना दुःखद, कष्टकर तथा मानसिक क्षय करने वाला होता है, इसको तो कोई भुक्त भोगी ही बतला सकता है।

🔵 भलाई के कार्यों में कुछ कमी है तो उतनी कि उसके परिपाक में कुछ समय लगता है। शुभ कर्म का फल समय के गर्भ में जब तक पक नहीं जाता, तब तक उसकी धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। कम स्वादिष्ट, कम उपयोगी फलों के वृक्ष एक वर्ष में ही काफी बड़े हो जाते हैं, किन्तु स्वादिष्ट आम धीरे-धीरे बढ़ता है, काफी समय के बाद फूलता और फल देता है। शुभ कर्मों के फल भी विलम्ब से प्राप्त होते हैं, किन्तु उनसे प्राप्त होने वाले आनंद में आम के फल की तरह कोई संदेह नहीं होता।

🔴 किसी भी विशिष्ट व्यक्ति, वस्तु अथवा स्थान का देखना अथवा दिव्यता का दर्शन करना तभी सार्थक होता है, जब उसके गुणों अथवा विशेषताओं को सूक्ष्मता से देखें, उनकी महत्ता को समझें, हृदयंगम करें और जीवन विकास के लिए उनसे प्रेरणा एवं शिक्षा ग्रहण करें अन्यथा उथला एवं दृग दर्शन कौतूहल तृप्ति के अतिरिक्त अधिक लाभ न कर सकेगा।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पारिवारिक कलह और मनमुटाव कारण तथा निवारण (भाग ७)

पिता के प्रति पुत्र के तीन कर्त्तव्य हैं - 1-स्नेह, 2-सम्मान तथा आज्ञा पालन। जिस युवक ने पिता का, प्रत्येक बुजुर्ग का आदर करना सीखा है, ...