शनिवार, 21 जनवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 22 Jan 2017


👉 आज का सद्चिंतन 22 Jan 2017


👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 15) 22 Jan

🌹 त्रिविध भवबन्धन एवं उनसे मुक्ति 

🔴 अधिक कमाया जा सकता है, पर उसमें से निजी निर्वाह में सीमित व्यय करके शेष बचत को गिरों को उठाने, उठों को उछालने और सत्प्रवृत्तियों के संवर्द्धन में लगाया जाना चाहिये। राजा जनक जैसे उदाहरणों की कमी नहीं। मितव्ययी अनेक दुर्व्यसनों और अनाचारों से बचता है। ऐसी हविश उसे सताती नहीं जिसके लिये अनाचार पर उतारू होना पड़े। साधु-ब्राह्मणों की यही परम्परा रही है। सज्जनों की शालीनता भी उसी आधार पर फलती-फूलती रही है। जीवन साधना के उस प्रथम अवरोध ‘लोभ’ को नियन्त्रित कराने वाला दृष्टिकोण हर जीवन साधना के साधक को अपनाना ही चाहिये।              

🔵 मोह वस्तुओं से भी होता है और व्यक्तियों से भी। छोटे दायरे में आत्मीयता सीमाबद्ध करना ही मोह है। उसके रहते हृदय की विशालता चरितार्थ ही नहीं होती। अपना शरीर और परिवार ही सब कुछ दिखाई पड़ता है। उन्हीं के लिये मरने-खपने के कुचक्र में फँसे रहना पड़ता है। ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के दो आत्मवादी सिद्धान्त हैं। इनमें से एक को भी ‘मोहग्रस्त’ कार्यान्वित नहीं कर सकता। इसलिये अपने में सबको और सबमें अपने को देखने की दृष्टि विकसित करना जीवन साधना के लिये आवश्यक माना गया है। 

🔴 परिवार छोटे से छोटा रखा जाय। पूर्ववर्ती अभिभावकों, बड़ों और आश्रितों के ऋणों को चुकाने की ही व्यवस्था नहीं बन पाती तो नये अतिथियों को क्यों न्यौत बुलाया जाय? समय की विषमता को देखते हुए अनावश्यक बच्चे उत्पन्न कर परिवार का भार बढ़ाना परले सिरे की भूल है। समान विचारों का साथी-सहयोगी मिले तो विवाह करने में हर्ज नहीं, पर वह एक दूसरे की सहायता सेवा करते हुए प्रगतिपथ पर अग्रसर होने के लिये ही किया जाना चाहिये। जिन्हें सन्तान की बहुत ललक हो, वे निर्धनों के बच्चे पालने के लिये ले सकते हैं। परिवार को स्वावलम्बी और सुसंस्कारी बनाना पर्याप्त है। औलाद के लिये विपुल सम्पदा उत्तराधिकार में छोड़ मरने की भूल किसी को नहीं करनी चाहिये। मुफ्त का माल किसी को भी हजम नहीं होता। वह दुर्बुद्धि और दुर्गुण ही उत्पन्न करता है। सन्तान पर यह भार लदेगा तो उसका अपकार ही होगा।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 बोले हुए शब्द वापस नहीं आते

🔴 एक बार एक किसान ने अपने पडोसी को भला बुरा कह दिया, पर जब बाद में उसे अपनी गलती का एहसास हुआ तो वह एक संत के पास गया. उसने संत से अपने शब्द वापस लेने का उपाय पूछा।

🔵 संत ने किसान से कहा, तुम खूब सारे पंख इकठ्ठा कर लो, और उन्हें शहर  के बीचो-बीच जाकर रख दो किसान ने ऐसा ही किया और फिर संत के पास पहुंच गया।

🔴 तब संत ने कहा, अब जाओ और उन पंखों को इकठ्ठा कर के वापस ले आओ।

🔵 किसान वापस गया पर तब  तक सारे पंख हवा से इधर-उधर उड़ चुके थे. और किसान खाली हाथ संत के पास पहुंचा. तब संत ने उससे कहा कि ठीक ऐसा ही तुम्हारे द्वारा कहे गए शब्दों के साथ होता है, तुम आसानी से इन्हें अपने मुख से निकाल तो सकते हो पर चाह कर भी वापस नहीं ले सकते।

🔴 कुछ कड़वा बोलने से पहले ये याद रखें कि भला-बुरा कहने के बाद कुछ भी कर के अपने शब्द वापस नहीं लिए जा सकते. हाँ, आप उस व्यक्ति से जाकर क्षमा ज़रूर मांग सकते हैं, और मांगनी भी चाहिए, पर मानवीय स्वभाव कुछ ऐसा होता है की कुछ भी कर लीजिये इंसान कहीं ना कहीं दुखी हो ही जाता है।

🔵 मित्रों जब आप किसी को बुरा कहते हैं तो वह उसे कष्ट पहुंचाने के लिए होता है पर बाद में वो आप ही को अधिक कष्ट देता है. खुद को कष्ट देने से क्या लाभ, इससे अच्छा तो है की चुप रहा जाए।

👉 अपने चरित्र का निर्माण करो (अन्तिम भाग)

🔵 जीवन और अच्छे जीवन के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि वह अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए अपने आपकी खोज खबर रखता रहे। आत्म निरीक्षण करता रहे और फिर चतुर जर्राह की तरह जहाँ जहाँ आत्मोन्नति की बाधक शक्तियाँ और वृत्तियाँ काम कर रही हों। उनकी चीरफाड़ करता और उन्हें हटाता रहे। आत्म निरीक्षण और आत्म शुद्धि की वृत्ति को स्वभाव में बिना लाये कभी भी किसी व्यक्ति का चरित्र महान नहीं हुआ है। बल्कि चरित्र निर्माण के ये दोनों ही महान साधन हैं।

🔴 मानव स्वभावतः कमजोर नहीं है पर आस-पास का वातावरण उसे कमजोर बना देता है। सामाजिक परिस्थितियाँ-कायदे कानून मनुष्य को आगे बढ़ने से रोकते हैं और सामाजिक प्राणि होने के कारण मनुष्य समाज द्वारा परित्यक्त किये जाने के भय से आतंकित रहता है, इसलिए अन्दर गन्दगी बढ़ती रहती है। लेकिन जिसे अपने लक्ष्य का ज्ञान रहता है और अटूट श्रद्धा के साथ लक्ष्य पर पहुँचने की दृढ़ता को कायम रखता है उसे समाज के दुर्विधानों की बेड़ियां जकड़े नहीं रहती। वह इन्हें तोड़ता फोड़ता आगे बढ़ता है और स्वयं अपना ही उद्धार नहीं करता बल्कि समाज का भी पुनस्संस्कार कर डालता है। ऐसा व्यक्ति महान होता है।

🔵 ज्ञान को आचरण में बदल कर मनुष्य महान बनता है। इस महानता का सबसे बड़ा गुण है अभयदान । इसलिए जो चरित्रवान होते हैं वे निर्भीक होते हैं। वे आत्मा को अजर अमर मानते हैं और दुःख सुख को मानसिक विकार। जिन्हें आत्मा की प्राप्ति नहीं होती वे ही इन विकारों में फँसे रहते हैं इसलिए सम्पन्न होने पर भी सुखी नहीं रहते। लेकिन जिन्होंने विकारों के तत्व को समझ लिया है और जिन्हें आत्मा की पूर्णता का परिचय मिल गया है। ऐसे आत्माराम पुरुष सिर्फ अपने को ही नहीं तारते बल्कि वे संसार के तरण तारण हो जाते हैं।

🔴 चरित्र, मानव-आत्मा को पूर्ण विकसित करता है इसलिए आरंभ में भले ही किन्हीं कठिनाइयों का सामना करना पड़े परन्तु अन्त में वे कठिनाइयाँ ही जीवन को उज्ज्वल करने वाली दिखने लगती हैं। इन कठिनाइयों को पार कर मानव तपःपूत हो जाता है। आत्मा निखर उठती है। तब अभाव नाम के किसी भी तत्व का उसके लिए कोई अस्तित्व नहीं रह जाता। इसलिए चरित्र की ही उपासना करनी चाहिए और चरित्रवान बनने का ही संकल्प । इस अकेले को लिया तो सब कुछ पा लिया समझो।

🌹 समाप्त  
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
🌹 अखण्ड ज्योति 1948 सितम्बर पृष्ठ 3 

http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1948/September.3

👉 आत्मचिंतन के क्षण 22 Jan 2017

🔴 इतिहास अपनी पुनरावृत्ति कर रहा है। अपना परिवार एक ईश्वरीय महान् प्रयोजन की पूर्ति में सहायक बनने के लिए पुनः इकट्ठा हुआ है। अच्छा हो हम अपने को पहचानें और अतीत काल की सूखी स्मृतियों को फिर हरी कर लें। निश्चित रूप से हम एक अत्यन्त घनिष्ठ और निकटवर्ती आत्मीय परिवार के चिर आत्म्ीय सदस्य रहते चले आ रहे हैं।

🔵 ध्वसं एक आपत्ति धर्म है और सृजन सनातन प्रक्रिया। इसलिए ध्वंस को रूकना पड़ता है, थककर लेट जाना और सो जाना पड़ता है। तब सृजन को दुहरा काम करना पड़ता है। एक तो स्वाभाविक सृष्टि संचालन की रचनात्मक प्रक्रिया का संचालन और दूसरे ध्वंस के कारण हुई विशेष क्षति की विशेष पूर्ति का आयोजन।

🔴 जिसके भीतर जितनी ईश्वरीय प्रयोजनों में सहयोगी बनने की तड़फन है, वह उतना ही दिव्य आत्मा है। तड़फन पानी के स्रोतों की तरह है जो पहाड़ जैसी कठोरता को चीरकर बाहर निकल आती है। साधारण परिस्थिति के लोग भी उपयुग अवसर पर अपनी तड़फन क्रियान्वित करने का साहस कर बैठते हैं तब वह साहस ही ईश्वरीय अवतरण के रूप में उन्हें सूर्य-चंद्रमा की तरह चमका देता है। तड़फन का फूट पड़ना इसी का नाम अवतरण है।

🌹 *~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 31) 22 Jan

🌹 अखण्ड जप करें—अखण्ड यज्ञ नहीं

🔴 वस्तुतः तांत्रिक ‘मख’ रात्रि के सुनसान वातावरण में श्मशान, खण्डहर जैसे वीभत्स स्थानों में करने की विधि-व्यवस्था है। यज्ञ वैदिक होते हैं और ‘मख’ तांत्रिक। मख कृत्यों में अभक्ष और अस्पर्श्य जैसे पदार्थ भी होमे जाते हैं। उनका दृश्य कुरुचिपूर्ण होता है। इसलिए उन्हें अविज्ञात, एकान्त एवं निस्तब्ध वातावरण में सम्पन्न किया जाता है। निशाचरी कृत्य तमोगुणी प्रधान एवं अनैतिक होते हैं। उन्हें गुह्य ही रखा जाता है। प्रकट होने पर विरोध-विग्रह का ही डर रहता है। हिंसा-अहिंसा का भी उसमें ध्यान नहीं रखा जाता है। अतएव होलिका दहन, चिता प्रज्वलन जैसे मख-कृत्यों को छोड़कर रात्रि के समय देव-यज्ञ नहीं किये जाते। प्रचलन फैल जाने के कारण विवाह संस्कार ही इसका अपवाद है। यों उनमें भी गोधुलि बेला का मुहूर्त उत्तम माना गया है।

🔵 अखण्ड-जप रखना ही पर्याप्त है। अखण्ड यज्ञ का अत्युत्साह न दिखाया जाय। घृतदीप और अगरबत्ती जलाते रहने से हवन की संक्षिप्त प्रक्रिया पूरी होती रह सकती है। अखण्ड जप के साथ ही चौबीस घण्टे घृतदीप जलाने और धूपबत्ती प्रज्वलित करने की व्यवस्था बना दी जाय तो प्रकारान्तर से ही अखण्ड यज्ञ की विधि भी भाव दृष्टि से पूरी हो सकती है। यज्ञ दिन में ही किये जायें।

🔴 अखण्ड जप की एक पद्धति 24 घण्टा जप की है। दूसरी सूर्योदय से सूर्यास्त तक जप जारी रखने की भी है। उसे भी अखण्ड संज्ञा दी जानी चाहिए। सविता की उपस्थिति में वाचिक और व्यवस्थित जप ही यदि अभीष्ट हों तो 24 घण्टे के स्थान पर सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक भी सामूहिक जप किया जा सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 25) 22 Jan

🌹 उत्साह एवं सक्रियता चिरयौवन के मूल आधार

🔵 प्रगति की आकांक्षा किसे नहीं होती? प्रत्येक व्यक्ति अपनी स्थिति से असन्तुष्ट रहता है और उससे आगे बढ़कर उन्नत स्थिति को प्राप्त करना चाहता है। बहुत से इसके लिए प्रयास भी करते हैं और अनेकों सफल भी होते हैं। कारण संकल्प का अभाव, प्रयत्नों में प्रखरता की कमी और तत्परता का न होना। बहुत से व्यक्ति युवावस्था में बड़े जोश-खरोश के साथ अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करते हैं, किन्तु थोड़े से प्रयत्न करने के बाद ही निराश हो जाते हैं। बहुतों की स्थिति ऐसी होती है, प्रयत्न और संघर्ष करते-करते युवावस्था बीत जाती है और वे अपने आपको वृद्ध समझकर हार थककर बैठ जाते।

🔴 वृद्धावस्था क्या सचमुच जीवन की सन्ध्या बेला है? इस प्रश्न का उत्तर उनके लिए ‘‘हां’’ में ही होता है किन्तु वास्तव में ऐसा है नहीं। बहुत से व्यक्तियों ने जिसे वृद्धावस्था कहते हैं। इस उम्र तक सामान्य जीवन बिताया और उसके बाद उनमें प्रगति के लिए ऐसी उदात्त आकांक्षा उत्पन्न हुई कि उसके बाद अपने प्रखर प्रयत्नों से उन्नति के उच्च शिखर पर पहुंचे। संस्कृत के प्रसिद्ध विद्वान श्रीपाद दामोदर सातवलेकर 60 वर्ष की आयु तक एक पाठशाला में ड्रॉइंग पढ़ाते थे। रिटायर होने के बाद उन्होंने संस्कृत सीखी और संस्कृत भाषा के क्षेत्र में इतना काम किया कि देखने वाले दंग रह गये। वेदों का शुद्ध पाठ तैयार करने से लेकर भारतीय संस्कृति का प्रगतिशील स्वरूप प्रतिपादित करने तक के क्षेत्र में उन्होंने इतनी सफलता अर्जित की कि आज भी जहां संस्कृत के सम्बन्ध में कहीं कोई मतभेद उठता है तो उसके समाधान और निराकरण के लिए सातवलेकर के ग्रन्थों को ही आधार माना जाता है।

🔵 महात्मा गांधी ने 45 वर्ष की अवस्था तक सामान्य जीवन जिया और इसके बाद वे एक क्रान्तिकारी सन्त के स्वरूप में उभरकर सामने आये। दादा भाई नौरोजी ने 50 वर्ष की आयु में अपना राजनैतिक जीवन आरम्भ किया तथा 60 वर्ष की आयु में पहली बार बम्बई कौंशिल के सदस्य चुने गये। 61 वर्ष की अवस्था में वे कांग्रेस के सभापति बने। गोपालकृष्ण गोखले ने 40 वर्ष की आयु में ‘भारत सेवक समाज’ की स्थापना की थी। लोकमान्य तिलक ने यद्यपि 33 वर्ष की आयु में अपना राजनैतिक जीवन आरम्भ किया था किन्तु उनकी गतिविधियां 1905 में ही अधिक सक्रिय हुई तब उनकी आयु 50 वर्ष थी। उसी समय उन्होंने गरम दल की स्थापना की थी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आप अपने आपको पहचान लीजिये (भाग 3)

🔴 अच्छा हनुमान् जी की बात मालूम है आपको कि नहीं मालूम हनुमान् जी को रामचंद्र जी ने कहा कि हमारे साथ- साथ चलो हमारा कुछ काम करो हनुमान् जी को फायदा हुआ कि नुकसान हुआ। क्या हुआ रामचंद्र जी की सीता जी से क्या रिश्ता रामचंद्र जी से क्या रिश्ता और उनके साथ जाने में जहाँ नौकरी का सवाल नहीं और सारी जिंदगी भर जब वह सयाने हो गये थे बड़े हो गये थे ब्याह होने दिया न शादी होने दी न अच्छे कपड़े पहनने दिये और रामचंद्र जी उनको ले गये। नुकसान किया कि नफा किया। नुकसान किया। 

🔵 किसी से पूछा रीछ बंदरों से क्यों भाई कहाँ जा रहे हो वहाँ जा रहे हैं रामचंद्र जी के यहाँ जा रहे हैं क्यों। क्या बात है रामचंद्र जी के यहाँ रामचंद्र जी स्त्री धर्मपत्नी को चोरी हो गई है और उनको हम तलाश करेंगे रावण से लड़ेंगे। अरे मरेगा क्या बेवकूफ किसने पट्टी पढ़ा दी है मालूम यह पड़ता है कि नुकसान की बात बताई जा रही है लेकिन क्या वास्तव में नुकसान की बात थी नहीं नुकसान की बात नहीं थी अगर नुकसान की बात रही होती तो हनुमान् जी ने समुद्र को छलांग कैसे लिया और पहाड़ उखाड़कर के कैसे ले आये और रामचंद्र जी को और लक्ष्मण जी को कंधे पर रखकर कैसे फिरे। लंका जलाने में समर्थ कैसे हुए। 

🔴 नुकसान था नुकसान नहीं था हनुमान् जी बहुत बड़े हो गये नहीं तो बंदर होते बंदर देखे हैं न आपने मदारियों के यहाँ नाचते रहते हैं बंदर आ जाते हैं तो कहते हैं मारो बंदर को भगाओ बंदर को। बंदर रह जाते लेकिन दूर की बात उनको दिखाई पड़ी कि नई इसमें मेरा लाभ है रामचंद्र जी के कहने में। उन्होंने देखा रामचंद्र जी वजनदार आदमी हैं। समझदार आदमी है। विश्वामित्र जी के बारे मे यही सोचा गया कि विश्वामित्र समझदार आदमी हैं बेअकल नहीं है बेवकूफ नहीं है हमारे बच्चों को ले जा रहे हैं तो मारने के लिए नहीं ले जा रहे हैं किसी बड़े काम के लिए ले जा रहे हैं। इस तरीके से ले गये लेकिन उस समय उनको नुकसान मालूम पड़ा था। बहुतों को मालूम पड़ा होगा। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 79)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴 7—दहेज लोभ के लिए नहीं दक्षिणा के रूप में:- मांगलिक कार्यों में पूजा सामग्री के रूप में दक्षिणा का भी स्थान है। वर-पूजन के रूप में एक रुपया या ग्यारह रुपया, विशेष मांगलिक अवसरों पर दिया जा सकता है। अधिक से अधिक यह राशि 101 रु. हो सकती है।

🔵 विवाह में तीन ऐसे अवसर रह सकते हैं। पक्की, दरवाजे पर स्वागत, विदाई। इन तीन रस्मों में नकदी 300 रु. से अधिक न दी जानी चाहिए। यह विशुद्ध रूप से पूजा दक्षिणा मानी जाय, कोई लेन-देन ठहराव या लाभ, लोभ की दृष्टि से न गिने। इससे अधिक लेन-देन या ठहरौनी को अवांछनीय माना जाय। वर्तमान कानूनों के अनुसार वह एक अपराध तो है ही। उसमें जेलखाने जाने और कड़ा दंड भुगतने की व्यवस्था तो है ही। कानून के भय से नहीं, नैतिकता एवं मानवता के कर्तव्यों का ध्यान रखकर भी इस दहेज प्रथा को उन्मूलन करने के लिए प्राण-पण से प्रयत्न किया जाय जिसने हिन्दू जाति को आर्थिक दृष्टि से खोखला, नैतिक दृष्टि से बेईमान, मानसिक दृष्टि से चिन्तातुर एवं असहाय बना रखा है। इस सामाजिक पाप से कलंकित सवर्ण हिन्दुओं के मुख को धोने का प्रयत्न हमें विशेष भावनापूर्वक करना चाहिए।

🔴 लड़के के अभिभावक या लड़का धन या वस्तुओं की कोई मांग न करें।

🔵 8—वर पक्ष जेवर न चढ़ावें:- कीमती जेवर और कपड़े चढ़ाने की समस्या लड़के वालों के लिए उतनी ही विकट है जितनी लड़की वालों के लिए दहेज देने की। यह दोनों प्रथायें एक दूसरे के साथ घनिष्ठ रूप में जुड़ी हुई हैं। इसलिए दोनों को एक ही बार समाप्त करना होगा।

🔴 लड़की वाले यह आशा करते हैं कि लड़के की ओर से कीमती जेवर, कपड़े कन्या के लिए आवें। इसमें जो खर्च पड़ता है उसे लड़के वाला दहेज के रूप में वसूल करता है। लड़के की शिक्षा आदि में वह भी इतना खर्च कर चुका होता है कि इन दिखावे मात्र की बेकार चीजों में धन लुटाने के लिए उसके पास भी बचा नहीं होता। कन्या वालों को अपनी ही तरह लड़के वालों की भी कठिनाई समझनी चाहिए और उन्हें जेवर, कपड़े में धन खर्च करने की चिन्ता से मुक्त कर देना चाहिए।

🔵 विवाह में वर पक्ष की ओर से लड़की के लिए एक सोने की अंगूठी, पैरों के लिए चांदी के तोड़िए यह दो जेवर ही चढ़ाये जांय और एक सूती, एक रेशमी जोड़ी कपड़े हों। जो कुछ लड़की के लिए लाया गया है उसका दिखावा जरा भी न हो।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 30)

🌞 दिए गए कार्यक्रमों का प्राण-पण से निर्वाह

🔴 स्वतन्त्रता संग्राम की कई बार जेलयात्रा, २४ महापुरश्चरणों का व्रत धारण, इसके साथ ही मेहतरानी की सेवा-साधना यह तीन परीक्षाएँ, मुझे छोटी उम्र में ही पास करनी पड़ीं। आन्तरिक दुर्बलताएँ और संबद्ध परिजनों के दुहरे मोर्चे पर एक साथ लड़ा। उस आत्म-विजय का ही परिणाम है कि आत्मबल संग्रह से अधिक लाभ से लाभान्वित होने का अवसर मिला। उन घटनाक्रमों से हमारा आपा बलिष्ठ होता चला गया एवं वे सभी कार्यक्रम हमारे द्वारा बखूबी निभते चले गए, जिनका हमें संकल्प दिलाया गया था।  महापुरश्चरणों की शृंखला नियमित रूप से चलती रही। जिस दिन गुरुदेव के आदेश से उस साधना का शुभारम्भ किया था, उसी दिन घृत दीप की अखण्ड ज्योति भी स्थापित की। उसकी जिम्मेदारी हमारी धर्मपत्नी ने सँभाली, जिन्हें हम भी माता जी के नाम से पुकारते हैं। छोटे बच्चे की तरह उस पर हर घड़ी ध्यान रखे जाने की आवश्यकता पड़ती थी। अन्यथा वह बच्चे की तरह मचल सकता था, बुझ सकता था। वह अखण्ड दीपक इतने लम्बे समय से बिना किसी व्यवधान के अब तक नियमित जलता रहा है। इसके प्रकाश में बैठकर जब भी साधना करते हैं, तो मनःक्षेत्र में अनायास ही दिव्य भावनाएँ उठती रहती हैं। कभी किसी उलझन को सुलझाना अपनी सामान्य बुद्धि के लिए सम्भव नहीं होता, तो इस अखण्ड ज्योति की प्रकाश किरण अनायास ही उस उलझन को सुलझा देती है।

🔵 नित्य ६६ माला का जप, गायत्री माता के चित्र प्रतीक का धूप, नैवेद्य, अक्षत, पुष्प, जल से पूजन। जप के साथ-साथ प्रातःकाल के उदीयमान सविता का ध्यान। अंत में सूर्यार्घ्यदान। इतनी छोटी सी विधि व्यवस्था अपनाई गई। उसके साथ बीज-मंत्र का सम्पुट आदि का कोई तांत्रिक विधि-विधान जोड़ा नहीं गया, किंतु श्रद्धा अटूट रही। सामने विद्यमान गायत्री माता के चित्र के प्रति असीम श्रद्धा उमड़ती रही। लगता रहा कि वे साक्षात सामने बैठी हैं। कभी-कभी उनके आँचल में मुँह छिपाकर प्रेमाश्रु बहाने के लिए मन उमड़ता। ऐसा नहीं हुआ कि मन न लगा हो। कहीं अन्यत्र भागा हो। तन्मयता निरंतर प्रगाढ़ स्तर की बनी रही। समय पूरा हो जाता, तो अलग अलार्म बजता। अन्यथा उठने को जी ही नहीं करता। उपासना क्रम में कभी एक दिन भी विघ्न न आया।

🔴 यही बात अध्ययन के सम्बन्ध में रही। उसके लिए अतिरिक्त समय न निकालना पड़ा। काँग्रेस कार्यों के लिए प्रायः काफी-काफी दूर चलना पड़ा। जब परामर्श या कार्यक्रम का समय आता, तब पढ़ना बंद हो जाता, जहाँ चलना आरम्भ हुआ, वहीं पढ़ना भी आरम्भ हो गया। पुस्तक साइज के चालीस पन्ने प्रति घण्टे पढ़ने की स्पीड रही। कम से कम दो घण्टे नित्य पढ़ने के लिए मिल जाते। कभी-कभी ज्यादा भी। इस प्रकार दो घण्टे में ८० पृष्ठ। महीने में २४०० पृष्ठ। साल भर में २८००० पृष्ठ। साठ वर्ष की कुछ अवधि में साढ़े अट्ठारह लाख पृष्ठ हमने मात्र अपनी अभिरुचि के पढ़े हैं। लगभग तीन हजार पृष्ठ नित्य विहंगम रूप से पढ़ लेने की बात भी हमारे लिए स्नान भोजन की तरह आसान व सहज रही है। यह क्रम प्रायः ६० वर्ष से अधिक समय से चलता आ रहा है और इतने दिन में अनगिनत पृष्ठ उन पुस्तकों के पढ़ डाले जो हमारे लिए आवश्यक विषयों से सम्बन्धित थे। महापुरश्चरणों की समाप्ति के बाद समय अधिक मिलने लगा। तब हमने भारत के विभिन्न पुस्तकालयों में जाकर ग्रंथों-पाण्डुलिपियों का अध्ययन किया। वह हमारे लिए अमूल्य निधि बन गई। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 30)

🌞  हिमालय में प्रवेश

गर्जन-तर्जन करती भेरों घाटी

🔵 सोचता हूं कि सोरों आदि स्थानों में जहां मीलों की चौड़ाई गंगा की है वहां जलधारा धीमे-धीमे बहती रहती है वहां प्रवाह में न प्रचण्डता होती है और न तीव्रता। पर इस छोटी घाटी के तंग दायरे में होकर गुजरने के कारण जल धारा इतनी तीव्र गति से बही। मनुष्य का जीवन विभिन्न क्षेत्रों में बंटा रहता है बहु सुखी रहता है उसमें कुछ विशेषता पैदा नहीं हो पाती पर जब एक विशिष्ट लक्ष को ले कर कोई व्यक्ति उस सीमित क्षेत्र में ही अपनी सारी शक्तियों को केन्द्रित कर देता है तो उसके द्वारा आश्चर्य जनक उत्साह वर्धक परिणाम उत्पन्न होते देखे जाते हैं। मनुष्य यदि अपने कार्य क्षेत्र को बहुत फैलाने, अनेक और अधूरे काम करने की अपेक्षा अपने लिये एक विशेष कार्य क्षेत्र चुन ले तो क्या वह भी इस तंग घाटी में गुजरते समय उछलती गंगा की तरह आगे बढ़ सकता है? उन्नति नहीं कर सकता?

🔴 जलधारा के बीच पड़े हुए शिला खण्ड पानी से टकराने के लिए विवश कर रहे थे। इसी संघर्ष में गर्जन-तर्जन हो रहा था और छोटे रुई के गुब्बारों के बने पहाड़ की तरह ऊपर उठ रहे थे। सोचता हूं यदि कठिनाइयां जीवन में न हो तो व्यक्ति की विशेषताएं बिना प्रकट हुए ही रह जायं। टकराने से शक्ति उत्पन्न होने का सिद्धान्त एक सुनिश्चित तथ्य है। आराम का शौक-मौज का जीवन विलासी जीवन निर्जीवों से कुछ ही ऊंचा माना जा सकता है।

🔵 कष्ट सहिष्णुता, तितीक्षा, तपश्चर्या एवं प्रतिरोधों से बिना खिन्नता मन में लाये वीरोचित भाव से लिपटने का साहस यदि मनुष्य अपने भीतर एकत्रित करले तो उसकी कीर्ति भी उस आज के स्थान की भांति गर्जन-तर्जन करती हुई दिग्दिगंत में व्याप्त हो सकती है, उसका विशेषतायुक्त व्यक्तित्व छींटों के उड़ते हुए फुवार की तरह से ही दिखाई दें सकता है। गंगा डरती नहीं, न शिकायत करती है, वह तंगी में होकर गुजरती है, मार्ग रोकने वाले रोड़ों से घबराती नहीं वरन् उनसे टकराती हुई अपना रास्ता बनाती है। काश हमारी अन्तःचेतना भी ऐसे ही प्रबल वेग से परिपूर्ण हुई होती तो व्यक्तित्व के निखरने का कितना अमूल्य अवसर हाथ लगता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...