शुक्रवार, 2 मार्च 2018

👉 बुजुर्गों की दूरदृष्टि

🔶 एक बहुत बड़ा विशाल पेड़ था। उस पर बहुत से हंस रहते थे। उनमें एक बहुत सयाना हंस था। वह बुद्धिमान और बहुत दूरदर्शी था। सब उसका आदर करते 'ताऊ' कहकर बुलाते थे। एक दिन उसने एक नन्ही-सी बेल को पेड़ के तने पर बहुत नीचे लिपटते पाया। ताऊ ने दूसरे हंसों को बुलाकर कहा, "देखो, इस बेल को नष्ट कर दो। एक दिन यह बेल हम सबको मौत के मुँह में ले जाएगी।".

🔷 एक युवा हंस हँसते हुए बोला, "ताऊ, यह छोटी-सी बेल हमें कैसे मौत के मुँह में ले जाएगी?"

🔶 सयाने हंस ने समझाया, "आज यह तुम्हें छोटी-सी लग रही हैं। धीरे-धीरे यह पेड़ के सारे तने को लपेटा मारकर ऊपर तक आएगी। फिर बेल का तना मोटा होने लगेगा और पेड़ से चिपक जाएगा, तब नीचे सेऊपर तक पेड़ पर चढ़ने के लिए सीढ़ी बन जाएगी। कोई भी शिकारी सीढ़ी के सहारे चढ़कर हम तक पहुंच जाएगा और हम मारे जाएँगे।"

🔷 दूसरे हंस को यक़ीन न आया, "एक छोटी सी बेल कैसे सीढ़ी बन जाएगी?"

🔶 तीसरा हंस बोला, "ताऊ, तू तो एक छोटी-सी बेल को खींच कर ज्यादा ही लम्बा कर रहा है।" किसी ने कहा, "यह ताऊ अपनी अक्ल का रोब डालने के लिए अर्थहीन कहानी गढ़ रहा है।"

🔷 इस प्रकार किसी भी हंस ने ताऊ की बात को गंभीरता से नहीं लिया। इतनी दूर तक देख पाने की उनमें अक्ल कहां थी! समय बीतता रहा। बेल लिपटते-लिपटते ऊपर शाखों तक पहुंच गई। बेल कातना मोटा होना शुरु हुआ और सचमुच ही पेड़ के तने पर सीढ़ी बन गई जिस पर आसानी से चढ़ा जा सकता था।

🔶 सबको ताऊ की बात की सच्चाई नजर आने लगी पर अब कुछ नहीं किया जा सकता था क्योंकि बेल इतनी मजबूत हो गई थी कि उसे नष्ट करना हंसों के बस की बात नहीं थी। एक दिन जब सब हंस दाना चुगने बाहर गए हुए थे तब एक बहेलिआ उधर आ निकला।

🔷 पेड़ पर बनी सीढ़ी को देखते ही उसने पेड़ पर चढकर जाल बिछाया और चला गया। साँझ को सारे हंस लौट आए पेड़ पर उतरे तो बहेलिए के जाल में बुरी तरह फंस गए। जब वे जाल में फंस गए और फड़फड़ाने लगे तब उन्हें ताऊ की बुद्धिमानी और दूरदर्शिता का पता लगा। सब ताऊ की बात न मानने के लिए लज्जित थे और अपने आपको कोस रहे थे। ताऊ सबसे रुष्ट था और चुप बैठा था।

🔶 एक हंस ने हिम्मत करके कहा, "ताऊ, हम मूर्ख हैं लेकिन अब हमसे मुँह मत फेरो।'

🔷 दूसरा हंस बोला, "इस संकट से निकालने की तरकीब तू ही हमें बता सकता हैं। आगे हम तेरी कोई बात नहीं टालेंगे।"

🔶 सभी हंसों ने हामी भरी तब ताऊ ने उन्हें बताया, "मेरी बात ध्यान से सुनो। सुबह जब बहेलिया आएगा, तब मुर्दा होने का नाटक करना। बहेलिया तुम्हें मुर्दा समझकर जाल से निकाल कर जमीन पर रखता जाएगा। वहां भी मरे समान पड़े रहना जैसे ही वह अन्तिम हंस को नीचे रखेगा, मैं सीटी बजाऊंगा। मेरी सीटी सुनते ही सब उड़ जाना।"

🔷 सुबह बहेलिया आया। हंसो ने वैसा ही किया, जैसा ताऊ ने समझाया था। सचमुच बहेलिया हंसों को मुर्दा समझकर जमीन पर पटकता गया। सीटी की आवाज के साथ ही सारे हंस उड़ गए। बहेलिया अवाक् होकर देखता रह गया।

🔶 बुजुर्गों की सोच दूरदृष्टि और अनुभव वाली होती है उनके कहे का अनुसरण हमको भविष्य की समस्याओं से सुरक्षित रखता है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 03 March 2018

👉 आज का सद्चिंतन 03 March 2018

👉 जीवन में सेवा का महत्त्व

🔷 प्राणी मात्र की सेवा करना मनुष्य का परम कर्त्तव्य है। इसे ही विराट ब्रह्म की आराधना कहते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है- ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्व भूत हिते रता:। जो सब जीवों का हित-चिंतन करते हैं, मुझे प्राप्त होते हैं। अत: साधक के लिए तो यह और भी आवश्यक हो जाता है कि वह लोक-आराधक बनें, सेवा भावी बनें।
  
🔶 विभिन्न दुर्गुणों का त्याग करने पर ही सेवा व्रत का पालन किया जा सकता है। स्वार्थ को छोड़े बिना सेवा का कार्य नहीं हो सकता। जिन्हें अपने इन्द्रिय सुखों की चिंता रहती है, वे व्यक्ति सेवा कार्य में कभी भी सफल नहीं हो सकते। सेवा व्रती का हृदय करुणा और दया से ओत-प्रोत होता है। वह विषयों के प्रति आसक्त नहीं रहता। वह सब भोगों से निवृत्त रहता है। त्याग के कारण उसमें गुण-ग्राहकता बढ़ती जाती है।
  
🔷 दु:खियों की सेवा, निर्बल की रक्षा और रोगियों की सहायता सेवा का मुख्य लक्ष्य है। सेवा व्रती साधक किसी की हानि नहीं करता, किसी का निरादर नहीं करता। वह निरभिमानी, विनयी और त्यागी होता है। उसका अंत:करण पवित्र होने से मन की चंचलता भी नष्टï हो जाती है।
  
🔶 सेवा व्रती का शरीर स्वच्छ रहना आवश्यक है। उसे अपने स्वास्थ्य का भी ध्यान करना चाहिए। अपवित्र और  रोगी मनुष्य की प्रवृत्ति कभी स्वच्छ नहीं रहती। उनमें क्रोध, ईर्ष्या आदि की उत्पत्ति हो जाती है। इससे विभिन्न वासनाएँ भडक़ उठती हैं। फिर मनुष्य अपनी इन्द्रियाँ पर नियंत्रण नहीं रख पाता। जब असंयम का अधिकार बढ़ता है, तब दुष्कर्मों की वृद्धि होती है। सुख की कामना से की गई सेवा भोग में परिवर्तित हो जाती है तब साधक में अहंकार जाग्रत होता है। सत्य का लोप हो जाता है, पाप-वृत्तियाँ अपना पंजा कठोर करती हुई उसे बुरी तरह जकड़ लेती है।
  
🔷 स्थूल शरीर की इच्छाएँ मनुष्य के धर्म का अपहरण कर लेती हैं, उस समय अन्याय और दुराचार का बोलबाला होता है। यदि अपने मन पर नियंत्रण नहीं हो तो सेवा कुसेवा बन जायेगी और जीवन की सुख-शांति का लोप हो जायेगा। मन शुद्ध हो तो अपने-पराये में भेद नहीं रहता। जब वस्तुओं का लोभ नष्ट हो जाता है, तब सत् को अपनाना और शुद्ध संकल्पों में लीन रहना साधक के अभ्यास में आ जाता है। उसमें कर्त्तव्य परायणता का उदय होता है और विषमता मिट जाती है। भेदभाव दूर होकर परम तत्व के अस्तित्व का बोध होता है।
  
🔶 अहं का शोधन होने पर मान-अपमान की चिंता नहीं रहती, असत्य से मोह मिट जाता है। अनित्य वस्तुओं के प्रति विरक्ति उत्पन्न हो जाती है और राग-द्वेष, तेरा-मेरा का झंझट समाप्त हो जाता है। जीवन में निर्विकल्पता का आविर्भाव हो जाता है। सेवा द्वारा सुखों के उपभोग की आसक्ति समाप्त हो जाती है, अत: सब प्राणियों में  परमात्मा को स्थित मानते हुए जो तुम्हारी सेवा चाहे, उसी की  सेवा करो। सच्ची सेवा वह है जो संसार के आसक्ति पूर्ण संबंधों को समाप्त कर देती है। इसलिए किसी को अपना मान कर सेवा न करो, बल्कि सेवा को
कर्त्तव्य मानकर सभी की सेवा करो। परमात्मा के अंश भूत होने के नाते सब प्राणियों को अपना समझना ही सद्बुद्धि है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सद्विचारों द्वारा जीवन लक्ष्य की प्राप्ति (भाग 2)

🔷 अज्ञान, आसक्ति, अहंकार वासना एवं संकीर्णता के बंधनों से छुटकारा पाने को ही मुक्ति कहते हैं। आत्मा-परमात्मा का अंश होने के कारण स्वभावतः युक्त है, उसे यह कुप्रवृत्तियाँ ही अपने बंधन में बाँधकर मायाबद्ध जीव बना लेती है। इन बंधनों से छुटकारा मिलते ही आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है और जीवन मुक्ति का अनिर्वचनीय उपलब्ध करने लगता है।

🔶 अपनी भूल आप समझ में नहीं आती, यदि समझ में आ जाय तो उसे तुरन्त सुधार लें। रोगी यह नहीं समझता कि मैं कुपथ्य कर रहा हूँ यदि उसे ऐसा पता होता तो कुपथ्य करके प्राणों को संकट में क्यों डालता? यों तो कहने सुनने को हर एक भूल करने वाला और कुमवृध करने वाला यह जानता है कि जो कर रहे हैं वह ठीक नहीं पर ऐसा केवल बाहरी रूप से ही सोचा जाता है, यदि अन्तःकरण के गहन अन्तराल को सच्चे हृदय से या कुपंथ की बुराई मालूम हो जाय तो उसे छोड़ते हुए देर न लगे। बात माया बन्धन के बारे में है।

🔷 स्वार्थ, वासना के निकृष्ट सुख में लोग वैसे ही अनुभव करते रहते हैं जैसे कुत्ता सूखी हड्डी चबा कर मसूड़े छिलने से निकलने वाले ही रक्त को ही चाटता है और रक्तपान का अनुभव करता है। यदि मानव मन को अनुभूति अंतःकरण के गहरे अन्तराल में होना कि माया बन्धन के कटघरे में जो सुख है क्रमवश सुख लगता है वस्तुतः वह भारी घाटे विपत्ति का कारण है तो उसे अपने बन्धनों को तोड़ने में निश्चय ही तत्परता हो जाएगी।

🔶 इस अनुभूति के लिए ही आध्यात्मवाद समस्त शिक्षा और साधना है। इस श्रेय मार्ग पर चलने वाला सत् का महत्व समझ जाता वह सद्विचारों को अपनाता है, जिससे सुदूर और सत्कार्यों में उसकी प्रवृत्ति होती है और धीरे-धीरे वह सत्पुरुष बनता हुआ सन्मार्ग चलता हुआ जीवन लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है।

📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1950 पृष्ठ 15-16
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/March/v1.15

👉 अचिन्त्य चिन्तन से मनोबल न गँवाएँ (भाग 2)

🔶 मन का, आत्मा का, जो निरूपण किया जाता है, उसे एक शब्द में विचारणा का स्तर ही कहना चाहिए। मान्यताएँ, भावनाएँ, आस्थाएँ इसी क्षेत्र की गहरी परतें हैं। कल्पना, विवेचना, धारणा इसी क्षेत्र में काम करती हैं। सम्मान, आदत, स्वभाव की खिचड़ी इसी चूल्हे पर पकती है। लगने को यह भी लगता है कि विचार बिन बुलाये आते हैं और अनचाहे ही चढ़ दौड़ते हैं, पर वास्तविकता ऐसी नहीं है। हम कोई दिशा-धारा निर्धारित करते हैं और उस सरिता में तदनुरूप लहरें उठने लगती हैं।

🔷 भीतरी हेरफेर का, बाह्य क्रिया कलापों और परिस्थितियों में परिवर्तन होना सुनिश्चित है। मनःस्थिति के अनुरूप परिस्थिति के बदल जाने की बात को सभी विज्ञजन एक स्वर से स्वीकार करते हैं। अस्तु, परिस्थितियों को बदलने के निमित्त मनःस्थिति को बदलना प्राथमिक उपचार की तरह माना गया है। विचारों में मूढ़ता भरी रहने पर, भ्रान्तियों और विकृतियों के अम्बार लगे रहते पर यह सम्भव नहीं कि किसी को गई गुजरी स्थिति में पड़े रहने से छुटकारा मिल सके। जिसका भाग्य बदलता है, उसके विचार बदलते हैं। विचार बदलने का मतलब है अवांछनीयताओं की खोज-कुरेद और जो भी अनुपयुक्त है, उसे बुहार फेंकने का साहस भरा निश्चय।

🔶 यहाँ एक तथ्य और भी स्मरण रखने योग्य है कि मात्र कुविचारों का समापन ही सब कुछ नहीं है। एक कदम उठाने, दूसरा बढ़ाने के उपक्रम के साथ ही यात्रा आरम्भ होती है। छोड़ने पर खाली होने वाले स्थान को रिक्त नहीं रखा जा सकता, उस स्थान पर नई स्थापना भी तो होनी चाहिए। अनौचित्य के अनुकूलन के साथ ही औचित्य का संस्थापन भी आवश्यक है। ऑपरेशन से मवाद निकालने के उपरान्त घाव भरने के लिए तत्काल मरहम पट्टी भी तो करनी पड़ती है। कुविचारों की विकृत आदतों का निराकरण तब हो सकता है, जब उस स्थान पर सत्प्रवृत्तियों को प्रतिष्ठित कर दिया जाय, अन्यथा घोंसला खाली पड़ा रहने पर चमगादड़ न सही अबाबील रहने लगेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Amrit Chintan 3 March

🔷 Enchanting mantra is a vocal ritual, but this is one dimension of spiritual growth, other important dimensions are of self-development and self-rectification. Rituals are good but behind that are actuals, which should be cultivated in life. Rituals only show results when these dimensions are also taken care-of for a blissful life.

🔶 All dimensions of development and progress are the vision of “Yug Nirman Yojna.” (Transformation of the Era) We are inspired by the almighty for that. Who so ever will share this project will be properly gifted by the almighty. They will be blessed and feel so is mentioned in the scripture of “Kalki-Puran”. 

🔷 To develop deep impression on the mind of family members and to develop moral codes life of great men of the history must be discussed in event and story forms. This solves the most of the negative reactions of daily happenings in life. 

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 18)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔷साथियो! हमको मालूम पड़ा कि शायद आप खिले हुए फूल हैं, तो हम भी रामकृष्ण परमहंस के तरीके से आपके पास आए हैं, जिस तरीके से वे विवेकानंद के पीछे लगे थे और शिवाजी के पीछे जिस तरीके से रामदास लगे थे। हम भी आपके पीछे उसी तरीके से लगे रहे हैं, जिस तरीके से चाणक्य चंद्रगुप्त के पीछे लगे रहे थे। अगर गलती हो गई हो, तो माफ करना, क्योंकि हमने समझा यही है। आप यह मत सोचना कि गुरुजी जो अपना पुण्य हिमालय पर से लेकर के आए हैं, वह हमको मालदार बनाने के लिए और संपत्ति देने के लिए हमारे पीछे लगे हुए हैं। हमको औलाद वाला बनाने के लिए, बेटा-बेटी देने के लिए पीछे लगे हुए हैं। हम इसके लिए नहीं लगे हुए हैं।

🔶 मित्रो! हमारे गुरु ने और हमारे पिता ने हमको लक्ष्मी नहीं दी है, औलाद नहीं दी है, लेकिन जो चीजें हमको दी हैं, वे लक्ष्मी जी से लाख गुनी और करोड़ गुनी ज्यादा हैं। हमारी निगाह में भी और हमारी उम्मीदों में भी यही चीज जमी हुई है कि आपको कोई चीज हम दें, तो कम-से-कम ऐसी चीज दें, जिससे कि आप भी जन्म-जन्मांतरों तक याद करते रहें कि हमको कोई चीज मिली थी और कोई चीज हमको दी गई थी। अगर आपके पास जिंदादिली हो और आपके पास रखने की चीजें हों, तब। रखने की चीजें न होंगी, तब फिर बड़ा मुश्किल है। फिर स्वाति की बूँदें बरसती चली जाएँगी और वो अभागी सीप है जिसने अपना मुँह नहीं खोला। मुँह बंद करके पड़ी रही। फिर उसके लिए ये संभव नहीं है, मुमकिन नहीं है कि स्वाति की बूँदें बरसती चली जाएँ और उसके अंदर मोती पैदा हो जाए। ऐसी स्थिति में मोती पैदा नहीं हो सकते।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 54)

👉 सद्गुरु की कठोरता में भी प्रेम छिपा है
🔷 गुरुगीता में सद्गुरु महिमा के गीत हैं। इनका गायन करने वाले शिष्यों की चेतना पवित्र-प्रखर एवं प्रकाशित होती है। ये गीत कितने भी गाये जायें, इनका रस समाप्त नहीं होता है और न ही इनका प्रभाव क्षमता पा सकता है। युगों-युगों से इस सत्य को सभी शिष्यों ने अनुभव किया है और कुछ बड़भागी शिष्य इस सच्चाई को अपनी साधना सम्पदा मानकर जी रहे हैं। हाँ, यह सच है कि धन-मान, यश-कीर्ति सब कुछ होने पर भी जिस शिष्य के होठों पर गुरु महिमा के गीत नहीं हैं, वह अभागा है, कंगाल है, समस्त आश्रयों के होने के बावजूद निराश्रित है। जबकि इसके विपरीत जिस शिष्य के पास न तो धन है और न मान है, न यश है, न कीर्ति है, वह यदि गुरु महिमा के गीतों को गाने की कला को जानता है, तो परम सौभाग्यशाली है।
    
🔶 पिछले मंत्रों में यह बताया गया है कि सद्गुरु चेतना सब भाँति अपूर्व है, नित्य है, स्वयं प्रकाशित और निरामय है। इसमें सभी विकारों का अभाव है। यह परमाकाश रूप अचल व अक्षय आनन्द का स्रोत है। वेद आदि शास्त्रों एवं सभी प्रभावों से भी यही सिद्ध होता है। गुरुदेव की आत्मचेतना, तपश्चेतना का सदा-सदा स्मरण करना चाहिए; शिष्य के लिए इससे श्रेष्ठ अन्य कोई साधन नहीं है।
  
🔷 गुरु महिमा के इन गीतों को एक नये स्वर में पिरोते हुए भगवान् भोलेनाथ आदिमाता जगदम्बा से कहते हैं-
  
अखण्डमण्डलाकारं, व्याप्तं येन चराचरम्। तत्पदं  दर्शितं  येन,  तस्मै  श्री गुरवे नमः॥ ६७॥
सर्वश्रुतिशिरोरत्नविराजितपदाम्बुजः। वेदान्ताम्बुजसूर्यो, यस्तस्मै  श्री  गुरवेनमः॥ ६८॥
यस्य  स्मरणमात्रेण,  ज्ञानमुत्पद्यते स्वयम्। य  एव  सर्वसंप्राप्तिस्तस्मै  श्री  गुरवे नमः॥ ६९॥
चैतन्यं शाश्वतं शान्तं व्योमातीतं निरञ्जनम्।     नादबिन्दुकलातीतं  तस्मै  श्री  गुरवे  नमः॥ ७०॥                                

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 89

👉 उद्देश्य पूर्ति में सहायक बनें

🔷 आपत्तिग्रस्त व्यक्तियों की सहायता करना भी धर्म है। फिर जिसने कोई कुटुंब बनाया हो उस कुलपति का उत्तरदायित्व तो और भी अधिक है। गायत्री परिवार के परिजनों की भौतिक एवं आत्मिक कठिनाइयों के समाधान में हम अपनी तुच्छ सामर्थ्य का पूरा-पूरा उपयोग करते रहे। कहने वालों का कहना है कि इससे लाखों व्यक्तियों को असाधारण लाभ पहुँचा होगा। पहुँचा होगा—पर हमें उससे कुछ अधिक संतोष नहीं हुआ। हम चाहते थे कि वह माला जपने वाले लोग—हमारे शरीर से नहीं विचारों से प्रेम करें, स्वाध्यायशील बनें, मनन चिंतन करें, अपने भावनात्मक स्तर को ऊँचा उठावें और उत्कृष्ट मानव निर्माण करके भारतीय समाज को देव समाज के रूप में परिणत करने के हमारे उद्देश्य को पूरा करें। पर वैसा न हो सका। अधिकांश लोग चमत्कारवादी निकले। वे न तो आत्म निर्माण पर विश्वास कर सके और न लोक निर्माण में।

🔶 आध्यात्मिक व्यक्तियों का जो उत्तरदायित्व होता है उसे अनुभव न कर सके। हम हर परिजन से बार-बार, हर बार अपना प्रयोजन कहते रहे, पर उसे बहुत कम लोगों ने सुना, समझा। मंत्र का जादू देखने के लिए वे लालायित रहे, हम उनमें से काम के आदमी देखते रहे। इस खींचतान को बहुत दिन देख लिया तो हमें निराशा भी उपजी और झल्लाहट भी हुई। मनोकामना पूर्ण करने का जंजाल अपने या गायत्री माता के गले बाँधना हमारा उद्देश्य कदापि न था। उपासना की वैज्ञानिक विधि व्यवस्था अपनाकर आत्मोन्नति के पथ पर क्रमबद्ध रूप से आगे बढ़ते चले जाना यही हमें अपने स्वजन परिजनों से आशा थी, पर वे उस कठिन दीखने वाले काम को झंझट समझकर कतराते रहे। ऐसे लोगों से हमारा क्या प्रयोजन पूरा होता?

🔷 बहुत दिन विचार करने के बाद यह सोचा कि जो अपने मूल मन्तव्य को सुनने-समझने तक के लिए तैयार नहीं हैं, केवल मन्त्र शक्ति का चमत्कार बिना उसका उचित मुख्य चुकाये देखने को आतुर हैं, इन पर शक्ति का अपव्यय न करके इस विशाल संसार में से उन लोगों को ढूँढ़ा जाय जो विचार, भावना, आदर्श और उद्देश्य का मूल्य महत्व समझते हों, अखण्ड ज्योति में व्यक्त हमारे विचारों के प्रति अभिरुचि एवं आस्था रखते हों। इस कसौटी पर 40 हजार व्यक्ति खरे उतरे। उन्होंने शरीर के प्रति आदर अभिवादन व्यक्त करने की अपेक्षा हमारे विचारों की शक्ति, उपयोगिता एवं आवश्यकता को समझा। 24 लाख की तुलना में 40 हजार की संख्या बहुत छोटी है। फिर भी यह सन्तोष किया गया कि जो आज हमारे विचारों के प्रति आस्था रखता है, आगे चलकर वह हमारी बताई हुई कार्य पद्धति को अपना लेगा। बहुत करके ऐसा हुआ भी है। अखण्ड-ज्योति की प्रखर प्रेरणा ने करोड़ों नहीं तो लाखों मनुष्यों की जीवन दिशा में आशाजनक मोड़ दिया है, इससे इन्कार नहीं किया जा सकता।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1966 पृष्ठ 39
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/October/v1.39