शुक्रवार, 17 मई 2019

Gayatri Anushthan Karane Ke Uddeshya गायत्री अनुष्ठान करने के उद्देश्य |...



Title

👉 जीवन साधना के त्रिविध पंचशील (भाग 5)

(४) पारिवारिक पंचशीलों में श्रमशीलता, मितव्ययिता, सुव्यवस्था, शालीन शिष्टता और उदार सहकारिता की गणना की गयी है। इन पाँच गुणों को हर सदस्य के स्वभाव में कैसे सम्मिलित किया जाय। इसके लिए उपदेश देने से काम नहीं चलता, ऐसे व्यावहारिक कार्यक्रम बनाने पड़ते हैं, जिन्हें करते रहने से वे सिद्धान्त व्यवहार में उतरें।

(५) उत्तराधिकार का लालच किसी के मस्तिष्क में नहीं जमने देना चाहिए, वरन् हर सदस्य के मन मे यह सिद्धान्त जमना चाहिए कि परिवार की संयुक्त सम्पदा में उसका भरण- पोषण, शिक्षण एवं स्वावलम्बन सम्भव हुआ है। इस ऋण को चुकाने में ही ईमानदारी है। बड़ों की सेवा और छोटों की सहायता के रूप में यह ऋण हर वयस्क स्वावलम्बी को चुकाना चाहिए। कमाऊ होते ही आमदनी जेब में रखना और पत्नी को लेकर मनमाना खर्च करने के लिए अलग हो जाना प्रत्यक्ष बेईमानी है। उत्तराधिकार का कानून मात्र कमाने में असमर्थों के लिए लागू होना चाहिए, न कि स्वावलम्बियों की मुफ्त की कमाई लूट लेने के लिए। अध्यात्मवाद और साम्यवाद दोनों ही इस मत के हैं कि पूर्वजों की छोड़ी कमाई को असमर्थ आश्रित ही तब तक उपयोग करें जब तक कि वे स्वावलम्बी नहीं बन जाते।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन अनीति नहीं बरते


👉 प्रेरणादायक प्रसंग बुद्धि की परीक्षा


👉 विक्रमादित्य राज्य त्याग में सुख क्यो

राजा विक्रमादित्य के राज्य में एक सदाचारी, सन्तोषी ब्राह्मण रहता था। वह निर्धन था। स्त्री की प्रेरणा से धन प्राप्ति के निमित्ति घर से निकला तो जंगल में एक महात्मा से भेंट हुई उन्होने उसे चिंतित देख आश्वासन दिया और विक्रमादित्य को प्रत्र लिखा कि तुम्हारी इच्छा पूर्ति का अब समय आ गया है। अपना राज्य इस ब्राह्मण को देकर यहाँ चले आओ।

वह पत्र विक्रमादित्य ने पढ़ा तो उन्हें बडी प्रसन्नता हुई और ब्राह्मण को राज्य साँपने की तैयारी की। ब्राह्मण ने राजा को राज्य- त्याग के लिए इतना उत्सुक और अत्यन्त आनन्दविभोर देखा तो सोचने लगा कि जब राजा ही राज्य सुख को लात मारकर योगी के पास जाने में विशेष आनन्द अनुभव कर रहे है तो योगी के पास अवश्य ही कोई राज्य से भी बड़ा सुख है। अत: उसने राजा से कहा कि -- '' महाराज। मै अभी महात्माजी के पास पुन : जा रहा हूँ,लौटकर राज्य लूँगा। '' यह कह कर योगी के पास पहुँचकर बोला कि '' भगवन्। राजा तो राज्य- त्याग कर आपके पास आने के लिए नितान्त उतावला और हर्ष विभोर हो गया। इससे जान पड़ता है कि आपके पास राज्य से भी बड़ी कोई वस्तु है, मुझे वही दीजिए। ''

महात्मा ने प्रसन्नचित्त हो ब्राह्मण देवता को आत्मविद्या सिखाई और उसे वह वैभव दे दिया जो उसे मोक्ष दिला गया। उस सुख की तुलना में सारे सांसारिक सुख नगण्य है।

जो आत्मावलम्बी बहुरंगीय दुनिया के सुख- आकर्षणों को ठुकराता है, अन्तत : वही इस श्रेय का भागी बनता है। जो क्षणिक सुख लाभ के मोह में उन्हीं में लिप्त हो जाते हैं थे अन्तत : त्रास ही पाते हैं, भले ही उन्हें उसमें तात्कालिक दृष्टि से सुख मिलता हो। उनकी उपमा तो उस बालक से ही दी जा सकती है जो खिलौनों से खेलकर सामयिक आनन्द पाने में ही रुचि लेता है। आयु की दृष्टि से बड़े  होने पर भी ऐसे मन्द बुद्धि बालकों का अनुपात जन समुदाय में अधिक ही होता है।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग 1

👉 How to Stay Happy?

Why is it that some people are happy while some others are not? - This question has been eluding even the psychologists of the modern day. According to a recent survey, it has been found that people of Finland are the happiest people in the world. Countries like Denmark, Iceland, Switzerland and Norway are among the Top-5, while India’s position is 133rd in the list of 155 countries. In this survey, every year about 1000 people from each country are asked a few questions and based on their responses, the results are declared on World Happiness Day (20th March).

Being happy is a state of mind. It is not necessary to be rich to be happy. Practically every survey ever done has shown that those who are happy stay in families. Such people get along very well with their friends and family. According to Daniel Gilbert, the Happiness Expert at Harvard University, we are happy when we are with our family. If we have friends, then it is even better. In some way or the other, everything that contributes to our happiness comes through either family or friends. The biggest factor for one’s happiness and fulfillment in life is, basically, love. A scientific study has shown that having someone to rely on helps a person’s nervous system relax, helps his brain stay healthier for a longer time, and reduces both emotional as well as physical pain.

A long-time researcher on this topic, George Vaillant says – ‘What influences life the most is the quality of our relationships with others’. It is these precious relationships that bind us together and hence influence our happiness to a large extent.
It is also evident that material prosperity has made man hollow from within. In fact, man spends his entire life earning money and realizes at the end that the desire for money is never-ending and the joys of life cannot be bought with money. So, to whatever extent possible, we should spend our time in lovingly strengthening our social life and thus making it prosperous.

To be continued...
📖 From Akhand Jyoti

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 18)

PRARABDHA KARMAS
(Karmas done with strong emotional involvement):

It is obvious that this process is not unilateral. Divine justice makes souls of both the sinner and the sinned interact in complementary environment. This complex process at time takes several cycles of life and death. We know that in this world, too, it requires a long time and consideration of numerous factors before two individuals become life partners as husband and wife. (The popular saying that “Marriages are made in heaven” indirectly refers to the coincidence of samsakars of the bride and the groom. The pain of separation in a divorce, too, is a consequence of sinful karmas of past lives.)

We may further try to understand the course of divine justice by an analogy in a natural phenomenon. A shrub in Africa called Venus grows to a height of about three meters. Out of its branches spread out thin threadlike offshoots. These keep on growing and swaying in the air till they meet another shrub and they become mutually intertwined. Sometimes these shrubs meet each other barely after a growth of a few centimeters, whereas the others succeed in doing so after growing for a few meters. This is the way the fruits of karmas ripen for interaction over different spans of time.

The punishment for the exclusively physical sins is physical and is given without much delay. (Consumption of poison results in immediate death.) Mental chastisement, on the other hand, is neither instantaneous nor is it unilateral. For instance, if, because of his cruel nature, someone commits a murder and is caught red-handed, the state awards a death sentence. On the contrary, if the killer commits the offence secretly, the inner conscience does not punish him immediately. It would wait for an environment for creating in his psyche an aversion for violence, by making the sinner feel the same degree of pain, which was felt by his victim. That is why, at times, morally vile persons are found rejoicing and righteous ones suffering in life. The enforcer of Divine Law takes time in preparing an appropriate environment for dispensing just rewards and punishments.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 31

👉 आत्मचिंतन के क्षण 17 May 2019

■ अपने ऊपर आपत्ति व संकट को आया देखकर धैर्य खोना कायरता है। जब संसार के कोई दूसरे लोग दुःख में धैर्य रख सकते हैं, हँसते-खेलते हुए आपत्तियों को पार कर सकते हैं, तो हम ही क्येां उन्हें देखकर रोने-चिल्लाने लगें, जबकि परम पिता परमात्मा ने हमें भी साहस, आशा और धैर्य के साथ बुद्धि एवं विवेक का सम्बल उनकी तरह दे रखा है। अंतर केवल यह है कि जहाँ संसार के सिंह पुरुष अंधकार आते ही अपने गुणों के प्रदीप प्रज्वलित कर लेते हैं, वहाँ कायर पुरुष घबराकर उनको प्रदीप्त करना ही भूल जाते हैं।

◆ खेद का विषय है कि आज लोग संयम की महत्ता को भूलते जा रहे हैं। अधिकांश लोगों की धारणा बन गई है कि संयम अथवा ब्रह्मचर्य जैसे आदर्शों की शिक्षा मात्र कहने-सुनने की बातें हैं। कहना न होगा कि यह एक भयानक धारणा है। किसी बुराई को, किन्हीं विवशताओं के वश करते रहने पर भी जब तक वह बुराई ही मानी जाती है तब तक देर-सबेर सुधार की आशा की जा सकती है, किन्तु जब किसी विकृति अथवा दुर्बलता को स्वाभाविक मान लिया जाता है तब उसके सुधार की आशा धूमिल हो जाती है और दुबुर्द्धि के कारण लोग उसके कुफलगामी बनते हैं।

★ भलाई, शराफत, मृदुता का एक बार किया हुआ सद्व्यवहार वह धन है जो रात-दिन बढ़ता है। यदि दैनिक व्यवहार में आप यह नियम बना लें कि हम जिन लोगों के संपर्क में आयेंगे, उनमें से छोटे-बड़े सबके साथ सद्भावनायुक्त व्यवहार करेंगे, मधुर भाषण करेंगे, कटुता और आलोचना से बचते रहेंगे तो स्मरण रखिए आपके मित्र और हितैषियों की संख्या में उत्तरोत्तर अभिवृद्धि होगी।

👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...