गुरुवार, 19 मई 2016

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 55) :-- 👉 समग्र जीवन का सम्मान करना सीखें

🔵 इसी के साथ तुम्हें मानवीय हृदय में झाँकने की कला सीखनी होगी। हमेशा मानव हृदय से उफनती भाव संवेदनाओं की गंगोत्री में स्नान करने की कोशिश करो। तभी तुम जान पाओगे कि यह जगत् कैसा है और जीवन के रूप कितने विविध हैं। इसे जानने के लिए निष्पक्षता और तटस्थता अपनाओ। बुद्धि को साक्षी बने रहने दो। तभी तुम समझ पाओगे कि न कोई तुम्हारा शत्रु है और न कोई मित्र। सभी समान रूप से तुम्हारे शिक्षक हैं। तुम्हारा शत्रु, तुम्हारे लिए एक रहस्यमय प्रश्र की भाँति है, जिसे तुम्हें हल करना है। एक अनबूझ पहेली की भाँति है, जिसे बूझना है। भले ही इसे हल करने में, बूझने में युगों का समय लग जाये। क्योंकि मानव को समझना तो है ही। तुम्हारा मित्र तुम्हारा ही अंग बन जाता है, तुम्हारे ही विस्तार का एक अंश हो जाता है, जिसे समझना कठिन होता है।’
   
🔴 बड़ी मार्मिक बातें उजागर हुई हैं इस सूत्र में। अगर सार रूप में इस सूत्र को एक पंक्ति में परिभाषित करें तो यही कहना होगा कि जो साधना की डगर पर चलना चाहते हैं वे समग्र जीवन का सम्मान करना सीखें। इसके प्रत्येक हिस्से में महत्त्वपूर्ण संदेश है। हाँ, उसमें भी जिसे हम दुःख कहकर परिभाषित करते हैं और रो- पीटकर पूरे संसार को अपने सिर पर उठा लेते हैं। दरअरसल यदि सच्चाई जाने- परखें तो पता यही चलेगा कि जीवन में दुःख नहीं है। जीवन को देखने के ढंग में दुःख है। यह देखने का ढंग लेकर जो जहाँ भी जायेगा, वही दुःखी होता रहेगा। फिर चाहे वह जगह स्वर्ग ही क्यों न हो।
  
🔵 यही वजह है कि चमड़ा भिगोते जूता गाँठते हुए रैदास परम आनन्दित हो सकते हैं। चरखा कातते हुए कबीर इतने आनन्द विभोर होते हैं कि उनके जीवन में संगीत और काव्य फूटता है। और फिर मिट्टी के बर्तन बनाते- पकाते गोरा कुम्हार, उनके तो आनन्द की कोई सीमा ही नहीं। तो यह आनन्द और इसका स्रोत इनकी परिस्थिति में नहीं, इनकी मनःस्थिति में है। इनके दृष्टिकोण में है, जो कहीं भी आनन्द की सृष्टि करने में सक्षम है। इनके स्वर्गीय दृष्टिकोण में स्वर्ग के निर्माण की क्षमता है और ऐसा केवल इसलिए है, क्योंकि ये समग्र जीवन का सम्मान करना जानते हैं। जीवन का प्रत्येक अंश इनके लिए मूल्यवान् है। फिर भले ही वह कंटकाकीर्ण हो या सुकोमल पुष्पों से सजा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/time

👉 क्षुद्र हम, क्षुद्रतम हमारी इच्छाएँ (भाग 7)


👉 समुद्र में पहुँचे भगवान्
🔴 इस बार भगवान् वहाँ से भागकर समुद्र में जा पहुँचे। और कहा कि देखें अब यहाँ मनुष्य कहाँ से आ जायेंगे? द्वारिका के पास बेट द्वारिका नाम की एक जगह है, बस भगवान् वहाँ जा पहुँचे। वह चारों ओर से समुद्र से घिरा हुआ पड़ा था। चारों ओर समुद्र था और बीच में एक टापू था। बस, भगवान् जी वहाँ बैठ गये और वहीं रहने लगे। उन्होंने कहा कि देखें अब हमारे पास मनुष्य कहाँ से आ जायेगा? अब वह हमको खामख्वाह तंग नहीं करेगा। एक बार उनका मन आया कि अपने घर चलना चाहिए लक्ष्मी जी के पास, पर यह अपना वीक प्वाइंट था, क्योंकि लक्ष्मी जी से यह कह करके आये थे कि हम मनुष्यों के पास रहेंगे। और लक्ष्मी जी ने कह दिया था कि आपको वहाँ नहीं जाना चाहिए। मनुष्य बड़े निकम्मे हो गये हैं और अपने ही धंधे में फँस गये हैं। वे अपने जीवन के लक्ष्य को भूल गये हैं। वे आपकी बात सुनेंगे नहीं। एक बार उन्होंने फिर सोचा कि चलो लक्ष्मी जी के पास चलें, मनुष्यों को छोड़ दें। फिर उन्होंने कहा कि भाई! यह तो बड़े शर्म की बात है और उनके सामने नाक नीची करने से क्या फायदा? यहीं रहना चाहिए। भगवान् जी बेट द्वारिका में रहने लगे।

👉 पशोपेश में भगवान्
🔵 मित्रो! लोगों को जब यह पता चला कि भगवान् जी द्वारिका में निवास करते हैं, तो उन्होंने नावें बना लीं, बोट बना लिए और भाग- भागकर वहीं जा पहुँचे। भगवान् ने कहा- ‘‘अब क्या करना चाहिए? पहाड़ पर वे छोड़ने वाले नहीं, जमीन पर वे छोड़ने वाले नहीं। समुद्र में भागकर आये तो भी इनसे पिण्ड नहीं छूटा। अब क्या करना चाहिए।’’ भगवान् जी बहुत दुःखी हो रहे थे, परेशान हो रहे थे और उनकी आँखों से बहुत आँसू आ रहे थे। उन्होंने कहा- ‘‘भाइयो! घर जाते हैं तो ठिकाना नहीं और इनके पास रहते हैं, तो ठिकाना नहीं। अब क्या करना चाहिए? अपनी कोई जगह बनानी चाहिए, जहाँ हम पृथ्वी पर भी बने रहें और लक्ष्मी जी के सामने बेइज्जती भी न हो। हम जमीन पर भी बने रहें और जो अच्छे मनुष्य हमको पाना चाहें, तो आसानी से पा भी सकें। ऐसी जगह भी न चुनी जाय कि कोई अच्छा मनुष्य चाहता हो कि हमको भगवान् मिल जायँ और हम उसे मिल न सकें। ऐसी जगह कहाँ तलाश करें।’’

👉 विवेक का हो जागरण, तो हो कल्याण
🔴 इससे पूर्व के अंक में आप पढ़ चुके हैं कि साहस और विवेक, पात्रता संवर्धन तथा आत्म चिन्तन, जिसने इन चार पर गंभीरता पूर्वक ध्यान दिया, उसका जीवन बदलता चला गया। जिसने इनकी उपेक्षा की, वह पिछड़ता चला गया। हम गहराई तक प्रवेश करें और ढूँढ़ें अनन्त शक्ति एवं शान्ति के स्रोत को। इस सम्बन्ध में परम पूज्य गुरुदेव ने एक रोचक कथानक सुनाया है जिसका आधा हिस्सा आप पढ़ चुके हैं। भगवान् ज्ञान बाँटने धरती पर आए पर मनोकामनाओं की लिस्ट लिए आदमी उनसे आशीर्वाद माँगने लगा। घबराए वे पहाड़ पर पहुँचे, मनुष्य वहाँ भी चला गया। क्षुद्र मनुष्य समुद्र में भी पहुँच गया, जब उसे पता चला कि अब भगवान् का डेरा वहाँ है। असमंजस में पड़े भगवान् को अब एक ही सहारा था। इस कथानक का व इस व्याख्यान का भी, अब उत्तरार्द्ध आगे पढ़ें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/guru3/shudrahumshurdtamhum.2

👉 गायत्री उपासना सम्बन्धी शंकाएँ एवं उनका समाधान (भाग 2)


🔵 हर धर्म का एक प्रतीक बीज मन्त्र होता है। इस्लाम में कलमा, ईसाई में वपतिस्मा, जैन धर्म में नमोंकार मन्त्र आदि का प्रचलन है। भारतीय धर्म का आस्था केन्द्र- गायत्री को माना गया है। इसे इसके अर्थ की विशिष्टता- सन्निहित प्रेरणा के कारण विश्व आचार संहिता का प्राण तक माना जा सकता है। वेदों की सार्वभौम शिक्षा लगभग सभी धर्म सम्प्रदायों में भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकट हुई है।

🔴 गायत्री रूपी बीज के तने, पल्लव ही वेद शास्त्रों के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं। इसी कारण उसे ‘वेदमाता’ कहा गया है। वेदमाता अर्थात् सद्ज्ञान की गंगोत्री। इसे देवमाता कहा गया है- अर्थात् जनमानस में देवत्व का अभिवर्धन करने वाली। विश्वमाता भी इसे कहते हैं अर्थात् “वसुधैव कुटुम्बकम्” के तत्व दर्शन तथा नीति-निर्धारण का पोषण करने वाली। ये विशेषण इसकी प्रमुखता के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।

🔵 एक अन्य चर्चा इस उपासना के सम्बन्ध में की जाती है कि गायत्री मन्त्र गुप्त है। इसका उच्चारण निषिद्ध है। यह प्रचार वर्ण के नाम पर स्वयं को ब्राह्मण कहने वाले धर्म मंच के दिग्गजों ने अधिक किया है। विशेषकर दक्षिण भारत में यह भ्रान्ति तो सर्वाधिक है। वस्तुतः गुप्त तो मात्र दुरभि सन्धियों को रखा जाता है। श्रेष्ठ निर्धारणों को खुले में कहने में कोई हर्ज नहीं।

🔴 गायत्री में सदाशयता की रचनात्मक स्थापनाएँ हैं। उन्हें जानने-समझने का सबको समान अधिकार है ऐसे पवित्र प्रेरणायुक्त उपदेश को उच्चारणपूर्वक कहने-सुनने में भला क्या हानि हो सकती है? पर्दे के पीछे व्यभिचार, अनाचार जैसे कुकर्म ही किये जाते हैं। षड्यन्त्रों में काना-फूसी होती है। किसी को पता न चलने देने की बात वहीं सोची जाती है जहाँ कोई कुचक्र रचा गया हो। सद्ज्ञान का तो उच्च स्वर से उच्चारण होना चाहिए। कीर्तन-आरती जैसे धर्म कृत्यों में वैसा होता भी है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति जून 1983 पृष्ठ 46
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1983/June.46

👉 आस्था

यात्रियों से खचाखच भरी एक बस अपने गंतव्य की ओर जा रही थी। अचानक मौसम बहुत खराब हो गया।तेज आंधी और बारिश से चारों ओर अँधेरा सा छा गया। ड्...