मंगलवार, 8 अक्तूबर 2019

पूजा-उपासना के लाभ | Pooja Upasna Ke Labh | Pt Shriram Sharma Acharya



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Sai Ka Panchhi Bole Re | साँई का पंछी बोले रे | Pragya Bhajan Sangeet



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👉 माँ

एक दिन अचानक मेरी पत्नी मुझसे बोली - "सुनो, अगर मैं तुम्हे किसी और के साथ डिनर और फ़िल्म के लिए बाहर जाने को कहूँ तो तुम क्या कहोगे"। मैं बोला - " मैं कहूँगा कि अब तुम मुझे प्यार नहीं करती"।

उसने कहा - "मैं तुमसे प्यार करती हूँ, लेकिन मुझे पता है कि यह औरत भी आपसे बहुत प्यार करती है और आप के साथ कुछ समय बिताना उनके लिए सपने जैसा होगा"।

वह अन्य औरत कोई और नहीं मेरी माँ थी। जो मुझ से अलग अकेली रहती थी। अपनी व्यस्तता के कारण मैं उन से मिलने कभी कभी ही जा पाता था। मैंने माँ को फ़ोन कर उन्हें अपने साथ रात के खानेे और एक फिल्म के लिए बाहर चलने के लिए कहा।

"तुम ठीक तो हो,ना। तुम दोनों के बीच कोई परेशानी तो नहीं" माँ ने पूछा। मेरी माँ थोडा शक्की मिजाज़ की औरत थी। उनके लिए मेरा इस किस्म का फ़ोन मेरी किसी परेशानी का संकेत था।

नहीं कोई परेशानी नहीं। बस मैंने सोचा था कि आप के साथ बाहर जाना एक सुखद अहसास होगा" मैंने जवाब दिया और कहा 'बस हम दोनों ही चलेंगे"। उन्होंने इस बारे में एक पल के लिए सोचा और फिर कहा, 'ठीक है।'

शुक्रवार की शाम को जब मैं उनके घर पर पहुंचा तो मैंने देखा है वह भी दरवाजे पर इंतजार कर रही थी। वो एक सुन्दर पोशाक पहने हुए थी और उनका चहेरा एक अलग सी ख़ुशी में चमक रहा था।

कार में माँ ने कहा " 'मैंने अपनी दोस्त को बताया कि मैं अपने बेटे के साथ बाहर खाना खाने के लिए जा रही हूँ। वे काफी प्रभावित थी"। हम लोग माँ की पसंद वाले एक रेस्तरां पहुचे जो बहुत सुरुचिपूर्ण तो नहीं मगर अच्छा और आरामदायक था। हम बैठ गए, और मैं मेनू देखने लगा। मेनू पढ़ते हुए मैंने आँख उठा कर देखा तो पाया कि वो मुझे ही देख रहीं थी और एक उदास सी मुस्कान उनके होठों पर थी।

'जब तुम छोटे थे तो ये मेनू मैं तुम्हारे लिए पढ़ती थी' उन्होंने कहा। 'माँ इस समय मैं इसे आपके लिए पढना चाहता हूँ,' मैंने जवाब दिया।

खाने के दौरान, हम में एक दुसरे के जीवन में घटी हाल की घटनाओं पर चर्चा होंने लगी। हम ने आपस में इतनी ज्यादा बात की, कि पिक्चर का समय कब निकल गया हमें पता ही नही चला।

बाद में वापस घर लौटते समय माँ ने कहा कि अगर अगली बार मैं उन्हें बिल का पेमेंट करने दूँ, तो वो मेरे साथ दोबारा डिनर के लिए आना चाहेंगी। मैंने कहा "माँ जब आप चाहो और बिल पेमेंट कौन करता है इस से क्या फ़र्क़ पड़ता है।

माँ ने कहा कि फ़र्क़ पड़ता है और अगली बार बिल वो ही पे करेंगी।

"घर पहुँचने पर पत्नी ने पूछा" - कैसा रहा।

"बहुत बढ़िया, जैसा सोचा था उससे कही ज्यादा बढ़िया" - मैंने जवाब दिया।

इस घटना के कुछ दिन बाद, मेरी माँ का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। यह इतना अचानक हुआ कि मैं उनके लिए कुछ नहीं कर पाया ।

माँ की मौत के कुछ समय बाद, मुझे एक लिफाफा मिला जिसमे उसी रेस्तरां की एडवांस पेमेंट की रसीद के साथ माँ का एक ख़त था जिसमे माँ ने लिखा था " मेरे बेटे मुझे पता नहीं कि मैं तुम्हारे साथ दोबारा डिनर पर जा पाऊँगी या नहीं इसलिए मैंने दो लोगो के खाने के अनुमानित बिल का एडवांस पेमेंट कर दिया है। अगर मैं नहीं जा पाऊँ तो तुम अपनी पत्नी के साथ भोजन करने जरूर जाना।

उस रात तुमने कहा था ना कि क्या फ़र्क़ पड़ता है। मुझ जैसी अकेली रहने वाली बूढी औरत को फ़र्क़ पड़ता है, तुम नहीं जानते उस रात तुम्हारे साथ बीता हर पल मेरे जीवन के सबसे बेहतरीन समय में एक था।

भगवान् तुम्हे सदा खुश रखे।
I love you".
तुम्हारी माँ

जीवन में कुछ भी आपके अपने परिवार से भी ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है।

अपने परिजनों को उनके हिस्से का समय दीजिए.. क्योंकि आपका साथ ही उनके जीवन में खुशियाँ का आधार है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prerak Prasang 8 Oct 2019


👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 8 Oct 2019


👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ७६)

👉 जीवनशैली आध्यात्मिक हो

यहाँ परम क्रान्तिवीर चन्द्रशेखर आजाद के बचपन चर्चा प्रासंगिक होगी। यूँ तो वह बचपन से साहसी थे। पर कुछ चीजें उन्हें डरा देती थी। इनमें से एक अँधेरा था और एक दर्द। दस- बारह साल की उम्र में उनके यहाँ एक महात्मा आये। यह महात्मा महावीर हनुमान जी के भक्त थे। हनुमान जी की पूजा करना और रामकथा कहना यही उनका काम था। चन्द्रशेखर के गाँव में भी उनकी रामकथा हो रही थी। रामकथा के मर्मिक अंश बालक चन्द्रशेखर को भावविह्वल कर देते थे। तो कुछ प्रसंगों को सुनकर वह रोमाँचित हो जाता। अपनी भावनाओं के उतार- चढ़ावों के बीच बालक चन्द्रशेखर ने सोचा कि ये महात्मा जी जरूर हमारी समस्या का समाधान कर सकते हैं।

और बस उसने अपनी समस्याएँ महात्मा जी को कह सुनायी। उसने कहा- स्वामी जी! मुझे अँधेरे से डर लगता है। महात्मा जी बोले- क्यों बेटा? तो उन्होंने कहा कि अँधेरे में भूत रहते हैं इसलिए। यह सुनकर महात्मा जी बोले- और भी किसी चीज से डरते हो। बालक ने कहा हाँ महाराज- मुझे मार खाने बहुत डर लगता है। उनकी यह सारी बातें सुनकर महात्मा जी ने उन्हें साँझ के समय झुरमुटे में बुलाया। और अपने पास बिठाकर बातें करते रहे। जब रात थोड़ी गाढ़ी हो चली तो वह उन्हें लेकर गाँव के बाहर श्मशान भूमि की ओर ले चले। जहाँ के भूतों के किस्से गाँव के लोग चटखारे लेकर सुनाते थे।

राह चलते हुए महात्मा जी ने उनसे कहा- जानते हो बेटा- भूत कौन होते हैं? बालक ने कहा नहीं महाराज। तो सुनो, वे स्वामी जी बोले- भूत वे होते हैं जिनकी अकाल मृत्यु होती है। जो जिन्दगी से डरकर आत्महत्या कर लेते हैं। जो आदमी अपनी जिन्दगी में डरपोक था वह पूरे जीवन कुछ ढंग का काम न कर सका। वह भला मरने के बाद तुम्हारा क्या बिगाड़ेगा? रही बात मार खाने से डरने की तो शरीर तो वैसे भी एक दिन मरेगा और मन- आत्मा मरने वाले नहीं है। इन बातों को करते हुए वे महात्मा गाँव के बाहर श्मशान भूमि में आ गये। श्मशान भूमि में कहीं कोई डर का कारण न था। इस अनुभव ने बालक चन्द्रशेखर को परम साहसी बना दिया। हाँ यह जरूर है कि महात्मा जी ने उन्हें रामभक्त हनुमान जी की भक्ति सिखायी। महात्मा जी की इस आध्यात्मिक चिकित्सा ने उन्हें इतना साहसी बना दिया कि अंग्रेज सरकार भी उनसे डरने लगती। उन महात्मा जी का यह भी कहना था कि यदि कोई विशिष्ट आध्यात्मिक प्रयोग करने हों तो किसी तपस्थली का चयन करना चाहिए, क्योंकि ये आध्यात्मिक चिकित्सा के केन्द्र होते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ १०५

👉 "बेईमानी से लाभ - बस एक भ्रम

बेईमानी की गरिमा स्वीकारने तथा आदर्श के रूप में अपनाने वाले वस्तुतः वस्तुस्थिति का बारीकी से विश्लेषण नहीं कर पाते। वे बुद्धि भ्रम से ग्रसित हैं। सच तो यह है, बेईमानी से धन कमाया ही नहीं जा सकता। इस आड़ में कमा भी लिया जाए तो वह स्थिर नहीं रह सकता। लोग जिन गुणों से कमाते हैं, वे दूसरे ही हैं । साहस, सूझ-बूझ, मधुर भाषण, व्यवस्था, व्यवहारकुशलता आदि वे गुण हैं जो उपार्जन का कारण बनते हैं।

बेईमानी से अनुपयुक्त रूप से अर्जित किए गए लाभ का परिणाम स्थिर नहीं और अंततः दुःखदायी ही सिद्ध होता है। ऐसे व्यक्ति यदि किसी प्रकार राजदंड से बच भी जाएँ तो भी उन्हें अपयश, अविश्वास, घृणा, असहयोग जैसे सामाजिक और आत्मप्रताड़ना तथा आत्मग्लानि जैसे आत्मिक कोप का भाजन अंततः बनना पड़ता है। बेईमानी से भी कमाई तभी होती है जब उस पर ईमानदारी का आवरण चढ़ा हो। किसी को ठगा तभी जा सकता है जब उसे अपनी प्रामाणिकता एवं विश्वसनीयता पर आश्वस्त कर दिया जाए। यदि किसी को यह संदेह हो जाए कि हमें ठगने का ताना बाना बुना जा रहा है तो वह उस जाल में नहीं फँसेगा तथा दूसरे को अपनी धूर्तता का लाभ नहीं मिल सकेगा।

वास्तवकिता प्रकट होने पर तो बेईमानी करने वाला न केवल उस समय के लिए वरन् सदा के लिए लोगों का अपने प्रति विश्वास खो बैठता है और लाभ कमाने के स्थान पर उल्टा घाटा उठाता है। रिश्वत लेते, मिलावट करते, धोखाधड़ी बरतते, सरकारी टैक्स हड़पते, काला बाजारी करते पकड़े जाने वाले सरकारी दंड पाते तथा समाज में अपनी प्रतिष्ठा गँवाते आए दिन देखे जाते हैं। उनकी असलियत प्रकट होते ही हर व्यक्ति घृणा करने लगता है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 बड़े आदमी नहीं महामानव बनें, पृष्ठ 14

👉 सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा

श्रद्धा अर्थात् श्रेष्ठता से असीम प्यार, अटूट अपनत्व। सजलता - तरलता इसकी विशेषता है। पानी पर कितने भी प्रहार कि ए जाएँ, वह कटता - टूटता नहीं है। पानी से टकराने वाला उसे तोड़ नहीं पाता, उसी में समा जाता है। श्रद्धा की यही विशेषता उसे अमोघ प्रभाव वाली बना देती है।
  
प्रज्ञा अर्थात् जानने, समझने, अनुभव करनें की उत्कृष्ठ क्षमता, दूरदर्शी विवेकशीलता। प्रखरता इसकी विशेषता है। प्रखरता की गति अबाध होती है। प्रखरता युक्त प्रज्ञा हजार अवरोधों - भ्रमों को चीरती हुई यथार्थ तक पहुँचने एवं बुद्धि के उत्कृष्ठतम नियोजन में सफ ल होती है।
  
सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा तीर्थ के सनातन मूल घटक हैं। जहाँ ऋषियों अवतारी सत्ताओं के प्रभाव से यह दोनों धाराऐं सघन सबल हो जाती हैं वहीं तीर्थ विकसित - प्रतिष्ठित हो जाते हैं। युगतीर्थ - गायत्री तीर्थ के भी यही मूल घटक हैं।
  
युगतीर्थ के संस्थापक वेदमूर्ति, तपोनिष्ठ, युगऋषि पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य एवं स्नेह सलिला वन्दनीया माता भगवती देवी शर्मा की वास्तविक पहचान उनके शरीर नहीं, उनके द्वारा प्रवाहित प्रखर प्रज्ञा एवं सजल श्रद्धा की सशक्त धाराएँ रही हैं। इसलिए उनके स्मृति चिन्हों के रूप में उनकी स्थूल काया की मूर्तियाँ नहीं, उनके सूक्ष्म तात्विक प्रतीकों के रूप में उन स्मृति चिन्हों को स्थापित किया गया है। वेजीवन भर दो शरीर एक प्राण रहे, इसलिये उनके शरीर का अन्तिम संस्कार एक ही स्थान पर, उनके तात्विक प्रतीकों के समीप संपन्न कर उसी स्थल को उनके संयुक्त समाधि स्थल का रूप दे दिया गया है। तीर्थ चेतना के इन प्रतीकों पर अपनी श्रद्धा समर्पित करके सत्प्रयोजनों के लिये उनसे शक्ति, अनुदान, आशीर्वाद सभी श्रद्धालु प्राप्त कर सकते हैं।

👉 जहाँ सुमति तहाँ सम्पत्ति

अपव्यय एवं अनावश्यक संग्रह से अनेक प्रकार की दुष्प्रवृत्तियाँ पनपती हैं? अपव्यय करने वाले मानो बदले में दुष्प्रवृत्तियाँ खरीदते है और उनसे अपना तथा दूसरों का असीम अहित करते है।

बुद्धिमानी की सही परख यही है कि जो भी कमाया जाय, उसका अनावश्यक संचय अथवा अपव्यय न हो। जो उपार्जन को सदाशयता में नहीं नियोजित करता वह घर में दुष्प्रवृत्तियाँ आमंत्रित करता है। लक्ष्मी उसी घर में बसती है, फलती है जहाँ उसका सदुपयोग हो। आड़म्बर युक्त प्रदर्शन, फैशन परस्ती, विवाहों में अनावश्यक खर्च, जुआ जैसे दुर्व्यसन ऐसे ही घरों में पनपते हैं, जहाँ उपार्जन के उपयोग पर ध्यान नहीं दिया जाता, उपभोग पर नियंत्रण नहीं होता। भगवान की लानत किसी को बदले में लेनी हो तो धन को स्वयं अपने ऊपर अनाप-शनाप खर्च कर अथवा दूसरों पर अनावश्यक रूप से लुटाकर सहज ही आमंत्रित कर सकता है।

ऐसे उदाहरण आज के भौतिकता प्रधान समाज में चारों ओर देखने को मिलते हैं। परिवारों में कलह तथा सामाजिक अपराधों की वृद्धि का एक प्रमुख कारण अपव्यय की प्रवृत्ति भी है।

समुद्र संचय नहीं करता, मेघ बनकर बरस जाता है तो बदले में नदियाँ दूना जल लेकर लौटती हैं। यदि वह भी कृपण हो संचय करने लगता तो नदियाँ सूख जाती, अकाल छा जाता और यदि अत्यधिक उदार हो धनघोर बरसने लगता तो अतिवृष्टि की बिभीषिका आ जाती। अत: समन्वित नीति ही ठीक है।

एक सेठ बहुत धनी था। उसके कई लड़के भी थे। परिवार बढ़ा पर साथ ही सबमें मनोमालिन्य, द्वेष एवं कलह रहने लगा। एक रात को लक्ष्मीजी ने सपना दिया कि मैं अब तुम्हारे घर से जा रही हूँ। पर चाहो तो चलते समय का एक वरदान मांग लो। सेठ ने कहा- ''भगवती आप प्रसन्न हैं तो मेरे घर का कलह दूर कर दें, फिर आप भले ही चली जाँय।"

लक्ष्मीजी ने कहा- 'मेरे जाने का कारण ही गृह कलह था। जिन घरों में परस्पर द्वेष रहता है, मैं वहाँ नहीं रहती। अब जब कि तुमने कलह दूर करने का वरदान मांग लिया और सब लोग शांतिपूर्वक रहोगे तब तो मुझे भी यहीं ठहरना पड़ेगा। सुमति वाले घरों को छोड़कर मैं कभी बाहर नहीं जाती।"

📖 प्रज्ञा पुराण भाग १ से

👉 चल पुस्तकालयों की अनिवार्य आवश्यकता-

इन दिनों की लोक रुचि घटिया मनोरंजन साहित्य पढ़ने भर की है इस कारण स्वाध्याय से चिन्तन को मिलने वाला पौष्टिक तत्व तो नहीं, उल्टे मनोभूमि में निकृष्टता बढ़ती जाती है। जहाँ तहाँ पुस्तकालय भी है, पर वह साहित्य अलमारियों में ही बन्द सड़ता रहता है। युग निर्माण साहित्य का सृजन मनो संस्थानों में व्याप्त कुविचारों के परिमार्जन के टानिक के रूप में गढ़ा गया है, पर उसकी उपयोगिता तब है जब यह साहित्य जन जन तक पहुँचे। चल पुस्तकालय अथवा ज्ञान रथ इस आवश्यकता को पूरा करेंगे।

ज्ञान रथ प्रत्येक शाखा के पास हो। उतरे साइकिल या रिक्शे के पहियों से एक धकेल सस्ते में बना ली जाये। उसे आकर्षक बनाने के लिये सजाया भी जा सकता है। इसी में युग निर्माण साहित्य तथा पत्रिकाओं की जिल्द बँधी पुरानी प्रतियाँ रहे। इन्हें लेकर गली गली मुहल्ले मुहल्ले जाया जाये तथा लोगों को आग्रह पूर्वक पढ़ने को यह साहित्य दिया जाए। एक कापी में उनके नाम नोट रहे। अगले सप्ताह उनसे वापिस लेने और नई पुस्तकें देने का क्रम बना रहे। विक्रयार्थ साहित्य भी रखा जा सकता है। सहायक आजीविका के रूप में या किसी बेकार व्यक्ति को थोड़ा वेतन देकर भी धकेले चलाई जा सकती है। इससे हुई छोटी आय से उस व्यक्ति का काम चल जायेगा। लोगों को इस साहित्य की उपयोगिता भी समझाई जा सके। तो यह धकेल सोने में सुगन्ध की कहावत चरितार्थ कर सकती है।

तीर्थ यात्रा धर्म प्रचार फेरी-

युग निर्माण परिवार के लिए ऐसी तीर्थ यात्राओं का प्रचलन करना चाहिए, जिसमें परिजन टोलियाँ बनाकर समीपवर्ती गाँवों में जाया करे, रास्ते में आदर्श वाक्य लेखन करे, दिन में जनसंपर्क और रात्रि को विचार गोष्ठी या छोटे से यज्ञायोजन के लिये आमंत्रण देना। भजन कीर्तन तथा प्रभात फेरियों का क्रम रखा जा सकता है। और सायंकाल जाकर रात्रि में विचार गोष्ठी दूसरे दिन एक छोटा सा आयोजन भी सम्पन्न किया जा सकता है। यात्रा टोलियाँ अवकाश के दिनों का तो इस पुण्य प्रयोजन में उपयोग करे ही। पीले वस्त्र, नियत झोला तथा अपने मिशन की परिचय सामग्री लेकर चला जाये तो अपना उद्देश्य अधिक सार्थक होगा ।

यह कार्य सदस्यों के ज्ञान घट की संचित राशि, उदारमना व्यक्तियों के सहयोग और चंदे से संग्रहित पूँजी-किसी भी प्रकार से सम्पन्न किये जा सकते हैं, पर इनकी उपयोगिता और उपादेयता को असंदिग्ध मानकर यह कार्य क्रम प्रत्येक शाखा को सम्पन्न करने ही चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई १९७७ पृष्ठ ५६


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1977/July/v1.56