मंगलवार, 8 अक्तूबर 2019

👉 जहाँ सुमति तहाँ सम्पत्ति

अपव्यय एवं अनावश्यक संग्रह से अनेक प्रकार की दुष्प्रवृत्तियाँ पनपती हैं? अपव्यय करने वाले मानो बदले में दुष्प्रवृत्तियाँ खरीदते है और उनसे अपना तथा दूसरों का असीम अहित करते है।

बुद्धिमानी की सही परख यही है कि जो भी कमाया जाय, उसका अनावश्यक संचय अथवा अपव्यय न हो। जो उपार्जन को सदाशयता में नहीं नियोजित करता वह घर में दुष्प्रवृत्तियाँ आमंत्रित करता है। लक्ष्मी उसी घर में बसती है, फलती है जहाँ उसका सदुपयोग हो। आड़म्बर युक्त प्रदर्शन, फैशन परस्ती, विवाहों में अनावश्यक खर्च, जुआ जैसे दुर्व्यसन ऐसे ही घरों में पनपते हैं, जहाँ उपार्जन के उपयोग पर ध्यान नहीं दिया जाता, उपभोग पर नियंत्रण नहीं होता। भगवान की लानत किसी को बदले में लेनी हो तो धन को स्वयं अपने ऊपर अनाप-शनाप खर्च कर अथवा दूसरों पर अनावश्यक रूप से लुटाकर सहज ही आमंत्रित कर सकता है।

ऐसे उदाहरण आज के भौतिकता प्रधान समाज में चारों ओर देखने को मिलते हैं। परिवारों में कलह तथा सामाजिक अपराधों की वृद्धि का एक प्रमुख कारण अपव्यय की प्रवृत्ति भी है।

समुद्र संचय नहीं करता, मेघ बनकर बरस जाता है तो बदले में नदियाँ दूना जल लेकर लौटती हैं। यदि वह भी कृपण हो संचय करने लगता तो नदियाँ सूख जाती, अकाल छा जाता और यदि अत्यधिक उदार हो धनघोर बरसने लगता तो अतिवृष्टि की बिभीषिका आ जाती। अत: समन्वित नीति ही ठीक है।

एक सेठ बहुत धनी था। उसके कई लड़के भी थे। परिवार बढ़ा पर साथ ही सबमें मनोमालिन्य, द्वेष एवं कलह रहने लगा। एक रात को लक्ष्मीजी ने सपना दिया कि मैं अब तुम्हारे घर से जा रही हूँ। पर चाहो तो चलते समय का एक वरदान मांग लो। सेठ ने कहा- ''भगवती आप प्रसन्न हैं तो मेरे घर का कलह दूर कर दें, फिर आप भले ही चली जाँय।"

लक्ष्मीजी ने कहा- 'मेरे जाने का कारण ही गृह कलह था। जिन घरों में परस्पर द्वेष रहता है, मैं वहाँ नहीं रहती। अब जब कि तुमने कलह दूर करने का वरदान मांग लिया और सब लोग शांतिपूर्वक रहोगे तब तो मुझे भी यहीं ठहरना पड़ेगा। सुमति वाले घरों को छोड़कर मैं कभी बाहर नहीं जाती।"

📖 प्रज्ञा पुराण भाग १ से

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