सोमवार, 17 दिसंबर 2018

👉 माँ का तोहफा

एक दंपत्ती दिवाली की खरीदारी करने को हड़बड़ी में था! पति ने पत्नी से कहा- जल्दी करो मेरे पास" टाईम" नहीं है... कह कर रूम से बाहर निकल गया सूरज तभी बाहर लॉन मे बैठी "माँ" पर नजर पड़ी, कुछ सोचते हुए वापिस रूम में आया।....शालू तुमने माँ से भी पूछा कि उनको दिवाली पर क्या चाहिए....

शालिनी बोली नहीं पूछी। अब उनको इस उम्र मे क्या चाहिए होगी यार, दो वक्त की रोटी और दो जोड़ी कपड़े इसमे पूछने वाली क्या बात है..... वो बात नहीं है शालू... "माँ पहली बार दिवाली पर हमारे घर में रुकी हुई है" वरना तो हर बार गाँव में ही रहती है तो... औपचारिकता के लिए ही पूछ लेती.........

अरे इतना ही माँ पर प्यार उमड़ रहा है तो खुद क्यूँ नही पूछ लेते झल्लाकर चीखी थी शालू, और कंधे पर हेंड बैग लटकाते हुए तेजी से बाहर निकल गयी...... सूरज माँ के पास जाकर बोला माँ हम लोग दिवाली के खरीदारी के लिए बाजार जा रहे हैं आपको कुछ चाहिए तो..

माँ बीच में ही बोल पड़ी मुझे कुछ नही चाहिए बेटा.... सोच लो माँ अगर कुछ चाहिये तो बता दीजिए.....

सूरज के बहुत जोर देने पर माँ बोली ठीक है तुम रुको मै लिख कर देती हूँ,  तुम्हें और बहू को बहुत खरीदारी करनी है कहीं भूल ना जाओ कहकर, सूरज की माँ अपने कमरे में चली गई, कुछ देर बाद बाहर आई और लिस्ट सूरज को थमा दी।..       
      
सूरज ड्राइविंग सीट पर बैठते हुए बोला, देखा शालू माँ को भी कुछ चाहिए था पर बोल नही रही थी मेरे जिद्द करने पर लिस्ट बना कर दी है,, "इंसान जब तक जिंदा रहता है, रोटी और कपड़े के अलावा भी बहुत कुछ चाहिये होता है"

अच्छा बाबा ठीक है पर पहले मैं अपनी जरूरत की सारी सामान लूँगी बाद में आप अपनी माँ का लिस्ट देखते रहना कह कर कार से बाहर निकल गयी....

पूरी खरीदारी करने के बाद शालिनी बोली अब मैं बहुत थक गयी हूँ, मैं कार में AC चालू करके बैठती हूँ आप माँ जी का सामान देख लो। अरे शालू तुम भी रुको फिर साथ चलते हैं मुझे भी जल्दी है,.....

देखता हूँ माँ इस दिवाली क्या मंगायी है... कहकर माँ की लिखी पर्ची जेब से निकलता है। बाप रे इतनी लंबी लिस्ट  पता नही क्या क्या मंगायी होगी जरूर अपने गाँव वाले छोटे बेटे के परिवार के लिए बहुत सारे सामान मंगायी होगी,....... और बनो "श्रवण कुमार" कहते हुए गुस्से से सुरज की ओर देखने लगी।

पर ये क्या  सूरज की आंखों में आंसू........ और लिस्ट पकड़े हुए हाथ सूखे पत्ते की तरह हिल रहा था... पूरा शरीर काँप रहा था, शालिनी बहुत घबरा गयी क्या हुआ ऐसा क्या मांग ली है तुम्हारी माँ ने कह कर सूरज की हाथ से पर्ची झपट ली....

हैरान थी शालिनी भी इतनी बड़ी पर्ची में बस चंद शब्द ही लिखे थे..... पर्ची में लिखा था....     

"बेटा सूरज मुझे दिवाली पर तो क्या किसी भी अवसर पर कुछ नहीं चाहिए फिर भी तुम जिद्द कर रहे हो तो, और तुम्हारे "शहर की किसी दुकान में अगर मिल जाए तो फुर्सत के कुछ " पल " मेरे लिए लेते आना.... ढलती साँझ हुई अब मैं, सूरज  मुझे गहराते अँधियारे से डर लगने लगा है, बहुत डर लगता है पल पल मेरी तरफ बढ़ रही मौत को देखकर.. जानती हूँ टाला नही जा सकता शाश्वत सत्‍य है,...... पर अकेले पन से बहुत घबराहट होती है सूरज ...... तो जब तक तुम्हारे घर पर हूँ कुछ पल बैठा कर मेरे पास कुछ देर के लिए ही सही बाँट लिया कर मेरा बुढ़ापा का अकेलापन... बिन दीप जलाए ही रौशन हो जाएगी मेरी जीवन की साँझ.. कितने साल हो गए बेटा तूझे स्पर्श नही की एक फिर से आ मेरी गोद में सर रख और मै ममता भरी हथेली से सहलाऊँ तेरे सर को एक बार फिर से इतराए मेरा हृदय मेरे अपनों को करीब बहुत करीब पा कर...और मुस्कुरा कर मिलूं मौत के गले क्या पता अगले दिवाली तक रहूँ ना रहूँ....

पर्ची की आख़री लाइन पढ़ते पढ़ते शालिनी फफक, फफक कर रो पड़ी...

ऐसी ही होती है माँ...

अपने घर के उन विशाल हृदय वाले लोगों,  जिनको आप बूढ़े और बुढ़िया की श्रेणी में रखते है वो आपके जीवन के कल्पतरु है! उनका यथोचित सम्मान और आदर और सेवा-सुश्रुषा और देखभाल करें।

यकीन मानिए आपके भी बूढ़े होने के दिन नजदीक ही है...उसकी  तैयारी आज से कर ले! इसमें कोई शक नही आपके अच्छे-बुरे कृत्य देर-सवेर आप ही के पास लौट कर आने हैं!!

👉 Character and Wealth

The integrity is a great asset in itself. Great men possess the only wealth in the form of their character with its support they continue to proceed on their path of progress. Value of character is far greater than the value of monetary funds. Author of the Mahabharata also wrote:

“Vrittam Yatnen Sanrakshet Vittameti ch Yaati ch.
Akshino Vittatah Kshino Vrittatastu Hato Hatah”

“One should protect the character with great efforts, as money is transient, comes and goes, loser of money is not inferior, but the person, whose character is destroyed, he himself is entirely destroyed."

Those who lost character in the greed for money or those who earned money but lost character, have actually acquired wealth through sin only. A man of loose character is nowhere respected in spite of his wealth, on the other hand, a man of good moral character is respected everywhere even if financially poor.

People show superfluous respect to the rich for fulfilling their selfish motive. Once the purpose is served, or the hope of any gain vanishes, the selfish will move away from the rich if the rich is weak by character.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Aacharya
📖 Badein Aadmi Nahi, Mahamanav Banein
    (Not a Big-Shot Be Super-human), Page 42

👉 कौन क्या कहता है?

लोग क्या कहते हैं? इसके आधार पर किसी कार्य की भलाई-बुराई का निर्णय नहीं किया जा सकता। क्योंकि कई बार लोग अच्छे कार्यों की बुराई करते हैं और बुरों की भलाई। कारण भले बुरे की वास्तविक पहिचान हर किसी को नहीं होती। हम जो काम करें, उसके लिए यह न देखें कि कौन क्या कहता है? वरन् यह सोचें कि हमारी आत्मा इसके लिये क्या कहती है। यदि आत्मा गवाही दे कि हम जो कार्य कर रहे हैं उत्तम है और हमारी बुद्धि निस्वार्थ है, तो बिना किसी की परवाह किये हुए हमें अपने कार्य में प्रवृत्त रहना चाहिए।

यदि शुभ मार्ग में बाधाएं आती हों और लोग विरोध करते हों तो घबराये मत और न ऐसा सोचिए कि हमारे साथ कोई नहीं, हम अकेले हैं। शुभ कार्य करने वाला कभी अकेला नहीं है। अदृश्य लोक में महान पुरुषों की प्रबल शक्तियाँ विचरण करती रहती हैं, वे हमें उत्तम पथ दिखती हैं, तथा हमारी सहायता के लिए दौड़ पड़ती हैं और इतना साहस भर देती हैं कि एक बड़ी सेना का बल उसके सामने तुच्छ है। चोर घर के लोगों के खाँस देने से ही डर कर भाग जाता है, किन्तु धर्मात्मा मनुष्य मृत्यु के सामने भी छाती खोल कर अड़ा रहता है। सत्यनिष्ठ की पीठ पर परमेश्वर है। धर्मात्मा मनुष्य किसी भी प्रकार न तो अकेला है और न निर्बल। क्योंकि अनन्त शक्ति का भण्डार तो उसके हृदय में भरा पड़ा है।

हम किसी की परवाह क्यों करें? यदि हम सत्य और धर्म के मार्ग पर आरुढ़ हैं, यदि हमारा आत्मा पवित्र है, तो हमें निर्भयतापूर्वक अपने पथ पर आगे बढ़ते जाना चाहिए और इस बात की ओर कुछ चिन्ता न करनी चाहिए कि कौन क्या कहता है।

📖 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1941 पृष्ठ 23

👉 आज का सद्चिंतन 18 Dec 2018



👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 Dec 2018



👉 चरित्र और धन

सच्चरित्रता अपने में एक महान संपदा है। महापुरुषों के पास सबसे बड़ी पूँजी उनके चरित्र की ही होती है, जिसके सहारे वे निरंतर अपने प्रगति पथ पर बढ़ते जाते हैं। चरित्र की महत्ता धन संपदा से कहीं अधिक बढ़कर है। महाभारतकार ने भी लिखा है-

'वृत्तं यत्नेन संरक्षेत् वित्तमेति च याति च।
अक्षीणो वित्ततः क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः।।

'चरित्र की यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए धन तो आता-जाता रहता है, धन से हीन व्यक्ति हीन नहीं होता, किंतु चरित्र नष्ट हो जाने पर पूर्णतया नष्ट हो जाता है।’

जिसने धन के लोभ में चरित्र खोया अथवा चरित्र खोकर धन कमाया उसने मानो अनर्थ कमाया है। चरित्रहीन व्यक्ति का संसार में कहीं भी आदर नहीं होता, भले ही वह कितना ही धनी-मानी बन गया हो, इसके विपरीत चरित्रवान् व्यक्ति अभावग्रस्त स्थिति में भी सर्वत्र सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है।

धनी का आदर तो लोग स्वार्थ वश करते हैं। स्वार्थ निकल जाने पर अथवा आशा न रहने पर स्वार्थी व्यक्ति तक उस धनवान् का आदर करना छोड़ देते हैं जिसके पीछे चरित्र का बल नहीं।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 बड़े आदमी नहीं महामानव बनें, पृष्ठ 42

👉 आत्मचिंतन के क्षण 18 Dec 2018

प्रलोभन एक तेज आँधी के समान है, जो मजबूत चरित्र को भी, यदि वह सतर्क न रहे, गिराने की शक्ति रखता है। जो व्यक्ति सदैव जागरूक रहता है, वह ही संसार के नाना प्रलोभनों, आकर्षणों, मिथ्या दम्भ, दिखावा, टीपटाप से मुक्त रह सकता है। यदि एक बार आप प्रलोभन और वासना के शिकार हुए तो वर्षों उसके प्रायश्चित करने में लग जावेंगे।

धर्म के लिए, धर्म के कारण कभी कोई झगड़ा नहीं होता। झगड़ों का कारण है-साम्प्रदायिकता। साम्प्रदायिकता का अर्थ है-संकीर्णता, अनुदारता, स्वार्थपरता, अहंकारिता। यह दूषित मनोवृत्ति जिस क्षेत्र में प्रविष्ट हो जाती है, वहीं समाज में भारी विद्वेष, घृणा, शोषण, उत्पीड़न, क्रूरता तथा अनाचार का बोलबाला कर देती है। द्वेष और ईर्ष्या की जननी मानवता की शत्रु इस राक्षसी का परित्याग करना ही उचित है।

जुआ का व्यसन हर तरह से हानिकारक और पतनकारी है। जो हारता है, वह तो तरह-तरह की आपत्तियों में फँस जाता ही है, पर जो जीतता है वह भी उसे मुफ्त का माल समझकर तरह-तरह की दुर्व्यसनों और खराब कामों में खर्च कर देता है। इससे उसकी आदत बिगड़ती है और बाद में अपनी कमाई को भी हानिकारक व्यसनों में खर्च करने लग जाता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्मोत्कर्ष के चार अनिवार्य चरण (भाग 2)

रोटी, साग, चावल, दाल का आहार मिला-जुला कर करते हैं। ऐसा नहीं होता कि कुछ समय दाल ही पीते रहे-कुछ शाक खाकर रहे, फिर चावल खाया करे और बहुत दिन बाद केवल रोटी पर ही निर्भर रहे। स्कूली पढ़ाई में भाषा, गणित, भूगोल, इतिहास की पढ़ाई साथ चलती है, ऐसा नहीं होता कि एक वर्ष भाषा दूसरे वर्ष गणित तीसरे वर्ष भूगोल और चौथे वर्ष केवल इतिहास ही पढ़ाया जाय। धोती, कुर्ता, टोपी, जूता चारों ही पहन कर घर से निकला जाता है। ऐसा नहीं होता कि कुछ वर्ष मात्र जूता पहन कर रहे और पीछे जब धोती पहनना आरम्भ करें तो उतना ही पर्याप्त समझें तथा जूता, कुर्ता, टोपी को उपेक्षित कर दें। लिखने में कागज, कलम, स्याही और उँगलियों का समन्वित प्रयोग होता है। एक बार में एक ही वस्तु का प्रयोग करने से लेखन कार्य सम्भव न हो सकेगा। शरीर में पाँच तत्त्व मिलकर काम करते हैं और चेतन को पाँचों प्राण मिल कर गति देते हैं।

एक तत्त्व पर या एक प्राण पर निर्भर रहा जाय तो जीवन का कोई स्वरूप ही न बन सकेगा। भोजनालय में आग, पानी, खाद्य पदार्थ एवं बर्तन उपकरणों के चारों ही साधन चाहिए। इसके बिना रसोई पक सकना कैसे सम्भव होगा? आत्म-उत्कर्ष के लिए (1) अपनी अवांछनीयताओं को ढूँढ़ निकालना-(2) कुसंस्कारों के प्रति प्रबल संघर्ष करके उन्हें परास्त करना (3) जो सत्प्रवृत्तियाँ अभी स्वभाव में सम्मिलित नहीं हो पाई हैं उन्हें प्रयत्न पूर्वक सीखने का- अपनाने का प्रयत्न करना (4) उपलब्धियों का प्रकाश दीपक की तरह सुविस्तृत क्षेत्र में वितरित करना, यह चार कार्य समन्वित रूप से सम्पन्न करते चलने की आवश्यकता पड़ती है। इन्हीं चारों को तत्त्ववेत्ताओं ने आत्म-चिन्तन आत्म-सुधार आत्म-निर्माण और आत्म-विकास के नाम से निरूपित किया है।

इन चारों प्रयोजनों को दो भागो में बाँट कर दो-दो के युग्म बनते हैं। एक को मनन दूसरे को चिन्तन कहते हैं। मनन से आत्म-समीक्षा का और अवांछनीयताओं का परिशोधन आता है। चिन्तन से आत्म निर्माण और आत्म-विकास की प्रक्रिया जुड़ती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी पृष्ठ 7
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1977/January/v1.7

👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग १)

महत्त्व निर्माण का ही है। उपलब्धियाँ मात्र उसी पर निर्भर हैं। इतना होते हुए भी पहले से ही जड़ जमाकर बैठी हुई अवांछनीयता निरस्त करने पर सृ...