शनिवार, 2 दिसंबर 2017

👉 विद्या से विनय-

🔷 महर्षि आरुणि के पुत्र श्वेतकेतु ने गुरुकुल में रहकर लगन के साथ विद्याध्ययन किया। साथ ही गुरु-सेवा से उनके कृपा पात्र भी बन गये। यद्यपि गुरु को अपने सभी शिष्य प्रिय थे तथापि अपने सेवा बल से श्वेतकेतु ने विशेषता प्राप्त करली थी। गुरु सेवा की कृपा से जहाँ उन्होंने शीघ्र ही चारों वेदों का अखण्ड ज्ञान प्राप्त कर लिया था। वहाँ गुरु की प्रशंसा और प्रियता के कारण उनमें कुछ अहंकार भी आ गया था। अपने पाण्डित्य के अभिमान में गुरु के सिवाय अन्य किसी का आदर करना ही भूल गये।

🔶 निदान श्वेतकेतु जब गुरु का आशीर्वाद और चारों वेदों का सम्पूर्ण ज्ञान लेकर घर आये तो अहंकारवश पिता को भी प्रणाम नहीं किया। उनके पिता महर्षि आरुणि को इसका बड़ा दुःख हुआ। दुःख इसलिये नहीं कि वे पुत्र के प्रणाम के भूखे थे और श्वेतुकेतु ने उन्हें प्रणाम नहीं किया। वरन् दुःख इसलिये हुआ कि पुत्र एक लम्बी अवधि के बाद जहाँ ज्ञानी वहाँ अभिमानी भी होकर आया है।
 
🔷 महर्षि आरुणि पुत्र की इस वृत्ति से चिन्तित हो उठे। क्योंकि वे जानते थे कि जिस विद्या के साथ विनय नहीं रहती वह न तो फलीभूत होती है और न आगे विकसित! उन्होंने पुत्र के हित में उसका यह विकार दूर करने के मन्तव्य से व्यंगपूर्वक कहा— “ऋषिवर ! आपने ऐसी कौन ज्ञान की गूढ़ पुस्तक पढ़ ली है जो गुरुजनों का आदर तक करना भूल गये। मानता हूँ आप बहुत बड़े विद्वान हो गये। चारों वेदों का ज्ञान आपने प्राप्त कर लिया है। किन्तु इसके साथ यह भी जानते होंगे कि विद्या का सच्चा स्वरूप विनय है। जब आप वही न सीख पाये विद्वान कैसे?

🔶 पिता की बात सुन कर श्वेतकेतु ने अपनी भूल अनुभव की और लज्जित होकर पिता के चरणों में गिर गये। महर्षि आरुणि ने श्वेतकेतु को उठाकर छाती से लगा लिया और कहा—”अभिमान तुम्हें नहीं, अपने पुत्र की विद्वता पर अभिमान तो मुझे होना चाहिये था।”
 

👉 आज का सद्चिंतन 2 Dec 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 Dec 2017

👉 The Angels on Earth

🔶 There are people who are not attracted by worldly vices and have dedicated their lives for social uplift. Such people are really the angles on this Earth. Ancient India had an abundance of such angels. A long time ago, there ruled an Indian king called Bindujaat. One day he decided that all the monks in his empire be distributed gold coins for their livelihood. He assigned this task to his trusted councilor Gritsmud. For several days Gritsmud roamed around the kingdom but could not distribute a single coin. At last he came back to the king and returned all the gold coins.

🔷 Surprised, the King asked, "Couldn't you find a single needy monk in the entire kingdom, who would accept my help?" Gritsmud drew a deep breath and said, "O great King I have indeed failed to implement your orders. There is no shortage of monks who have dedicated their entire lives for missions of social uplift, but they have reduced their own personal needs to such an extent that they do not need our help. If you really wish to spend this wealth on monks, you have to invest it to their missions, since none of them is ready to accept it for their personal use."

📖 From Pragya Puran

👉 आत्मचिंतन के क्षण 2 Dec 2017

🔶 युग निर्माण का महान् कार्य आज की प्रचण्ड आवश्यकता है। जिस खंडहर स्थिति में हमारे शरीर, मन और समाज के भग्नावशेष पड़े हैं, उन्हें उसी दशा में पड़े रहने देने की उपेक्षा जिन्हें संतोष दे सकती हैं उन्हें जीवित मृत ही कहना पड़ेगा। आज बेशक ऐसे ही लोगों की संख्या अधिक है, जिन्हें अपने काम से काम, अपने मतलब से मतलब रखने की नीति पसंद है, पर ऐसे लोगों का बीज नष्ट नहीं हुआ है जो परमार्थ की महत्ता समझते हैं और लोकहित के लिए यदि उन्हें कुछ प्रयत्न या त्याग करना पड़े तो उसके लिए भी इंकार न करेंगे।     

🔷 अखण्ड ज्योति का प्रत्येक सदस्य अब एक धार्मिक पत्रिका का पाठक मात्र न रहेगा, वरन् वह एक लोकशिक्षक के रूप में अपना उत्तरदायित्व अनुभव करें। युग निर्माण के लिए आवश्यक प्रकाश अखण्ड ज्योति प्रस्तुत करेगी, वह एक बिजलीघर के रूप में रहेगी और हममें से प्रत्येक एक बल्ब के रूप में प्रकाशित होकर अपने क्षेत्र में प्रकाश फैलाएँ। अज्ञान ही मानव जाति का सबसे बड़ा शत्रु है, इसी अंधकार में नाना प्रकार के पाप पनपते हैं। 

🔶 अखण्ड ज्योति के प्रत्येक पाठक को प्रातःकाल का समय ईश्वर चिन्तन के लिए और सायंकाल का समय आत्म-निरीक्षण के लिए नियत करना चाहिए। असुविधा और परिस्थितियों के कारण इसमें कुछ व्यतिरेक होना क्षम्य भी कहा जा सकता है, पर शैय्या पर नींद खुलने से लेकर जमीन पर पैर रखने के बीच का जो थोड़ा सा समय रहता है वह अनिवार्य रूप से हममें से हर एक को ईश्वर चिंतन में लगाना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 बड़प्पन की सही कसौटी

🔷 वैभव के आधार पर बड़प्पन आँकने की प्रथा इस संसार में है। जिनके पास जितनी संपदा, शिक्षा एवं चतुरता है, उसी अनुपात से उसके बड़प्पन का मूल्य आँका जाता है। बलिष्ठता और प्रतिभा भी उसी वर्ग में आती है, जो दूसरों पर अपनी छाप छोड़ती है तथा धाक जमाती है। लोग उग्रता, आतंकवाद, दुष्टता और हानि पहुंचाने की शाक्ति को देखते हुए भी डरते हैं, मान देते हैं।  

🔶 बड़प्पन के मूल्यांकन की यह सभी कसौटियाँ ओछी तथा खोटी हैं। इनके सहारे हम किसी व्यक्ति का सही मूल्यांकन नहीं कर सकते। कसौटी ही खोटी हो, तो सोने और पीतल का अन्तर कैसे जाना जाय?

🔷 व्यक्तित्व की वास्तविक ऊँचाई उसकी सुसंस्कारिता के आधार पर आँकी जानी चाहिए। देखा जाना चाहिए कि किसने अपने आप में गुण, कर्म, स्वभाव के क्षेत्र में कितनी उत्कृष्टता अपनाई है और निजी चरित्र तथा दूसरों के साथ सद्व्यवहार में किस सीमा तक अपनी विशिष्टता अपनाई है।

🔶 जो अपने को जितना संयत, सज्जन और अनुशासित बना सका, वह उतना ही महान् है। धर्म- चिह्नो या प्रचलनों से कोई धर्मात्मा नहीं बनता। जिसने आदर्शांे के प्रति अपनी निष्ठा जिस सीमा तक परिपक्व की है, वस्तुतः उसी का बड़प्पन सफल और सराहनीय है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्वामी विवेकानंद के जीवन का एक प्रेरक प्रसंग शिष्टाचार

🔶 स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है कि– विश्व में अधिकांश लोग इसलिए असफल हो जाते हैं, क्योंकि उनमें समय पर साहस का संचार नही हो पाता और वे भयभीत हो उठते हैं।

🔷 स्वामीजी की कही सभी बातें हमें उनके जीवन काल की घटनाओं में सजीव दिखाई देती हैं। उपरोक्त लिखे वाक्य को शिकागो की एक घटना ने सजीव कर दिया, किस तरह विपरीत परिस्थिति में भी उन्होने भारत को गौरवान्वित किया। हमें बहुत गर्व होता है कि हम इस देश के निवासी हैं जहाँ विवेकानंद जी जैसे महान संतो का मार्ग- दशर्न मिला। आज मैं आपके साथ शिकागो धर्म सम्मेलन से सम्बन्धित एक छोटा सा वृत्तान्त बता रही हूँ जो भारतीय संस्कृति में समाहित शिष्टाचार की ओर इंगित करता है|

🔶 1893 में शिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन चल रहा था। स्वामी विवेकानंद भी उसमें बोलने के लिए गये हुए थे।11सितंबर को स्वामी जी का व्याखान होना था। मंच पर ब्लैक बोर्ड पर लिखा हुआ था- हिन्दू धर्म – मुर्दा धर्म। कोई साधारण व्यक्ति इसे देखकर क्रोधित हो सकता था, पर स्वामी जी भला ऐसा कैसे कर सकते थे| वह बोलने के लिये खङे हुए और उन्होने सबसे पहले (अमरीकावासी बहिनों और भाईयों) शब्दों के साथ श्रोताओं को संबोधित किया। स्वामीजी के शब्द ने जादू कर दिया, पूरी सभा ने करतल ध्वनि से उनका स्वागत किया।

🔷 इस हर्ष का कारण था, स्त्रियों को पहला स्थान देना। स्वामी जी ने सारी वसुधा को अपना कुटुबं मानकर सबका स्वागत किया था। भारतीय संस्कृति में निहित शिष्टाचार का यह तरीका किसी को न सूझा था। इस बात का अच्छा प्रभाव पङा। श्रोता मंत्र मुग्ध उनको सुनते रहे, निर्धारित 5 मिनट कब बीत गया पता ही न चला। अध्यक्ष कार्डिनल गिबन्स ने और आगे बोलने का अनुरोध किया। स्वामीजी 20 मिनट से भी अधिक देर तक बोलते रहे|

🔶 स्वामीजी की धूम सारे अमेरिका में मच गई। देखते ही देखते हजारों लोग उनके शिष्य बन गए। और तो और, सम्मेलन में कभी शोर मचता तो यह कहकर श्रोताओं को शान्त कराया जाता कि यदि आप चुप रहेंगे तो स्वामी विवेकानंद जी का व्याख्यान सुनने का अवसर दिया जायेगा। सुनते ही सारी जनता शान्त हो कर बैठ जाती।

🔷 अपने व्याख्यान से स्वामीजी ने यह सिद्ध कर दिया कि हिन्दू धर्म भी श्रेष्ठ है, जिसमें सभी धर्मो को अपने अंदर समाहित करने की क्षमता है। भारतीय संस्कृति, किसी की अवमानना या निंदा नही करती। इस तरह स्वामी विवेकानन्द जी ने सात समंदर पार भारतीय संस्कृति की ध्वजा फहराई।

👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...