बुधवार, 30 मई 2018

👉 बाधाएं हमें मजबूत बनाती हैं।

🔷 किसी गाँव में एक धर्मपरायण किसान रहा करता था। उसकी फसल अक्सर खराब हो जाया करती थी। कभी बाढ़ आ जाया करती थी तो कभी सूखे की वजह से उसकी फसल बर्बाद हो जाया करती । कभी गर्मी बेहद होती तो कभी ठण्ड इतनी होती कि वो बेचारा कभी भी अपनी फसल को पूरी तरह प्राप्त नहीं कर पाया।

🔶 एक दिन किसान दुखी होकर मंदिर में जा पहुंचा और भगवान की मूर्ती के आगे खड़ा हो कर कहने लगा भगवान बेशक आप परमात्मा है लेकिन फिर भी लगता है आपको खेती बाड़ी की जरा भी जानकारी नहीं है। कृपया करके एक बार बस मेरे अनुसार मौसम को होने दीजिये फिर देखिये मैं कैसे अपने अन्न के भंडार को भरता हूँ। इस पर आकाशवाणी हुई कि ” तथास्तु वत्स जैसे तुम चाहोगे आज के बाद वेसा ही मौसम हो जाया करेगा और ये साल मैंने तुमको दिया।” किसान बड़ा ख़ुशी ख़ुशी घर आया । और उसने गेहूं की फसल बो दी।

🔷 क्या होता है कि उस बरस भगवान ने कुछ भी अपने अनुसार नहीं किया और किसान जब चाहता धूप खिल जाया करती और जब वो चाहता तो बारिश हो जाती लेकिन किसान ने कभी भी तूफान को और अंधड़ को नहीं आने दिया। बड़ी अच्छी फसल हुई। पौधे बड़े लहलहा रहे थे। समय के साथ साथ फसल भी बढ़ी और किसान की ख़ुशी भी।

🔶 आखिर फसल काटने का समय आ गया किसान बड़ी ख़ुशी से खेतों की और गया और फसल को काटने के लिए जैसे ही खेत में घुसा बड़ा हैरान हुआ और उसकी ख़ुशी भी काफूर हो गयी क्योंकि उसने देखा कि गेंहू की बालियों में एक भी बीज नहीं था। उसका दिल धक् से रह गया। किसान दुखी होकर परमात्मा से कहने लगा ” हे भगवन ये क्या?”

🔷 तब आकाशवाणी हुए कि ” ये तो होना ही था वत्स तुमने जरा भी तूफ़ान, आंधी, ओलो को नहीं आने दिया जबकि यही वो मुश्किलें है जो किसी बीज को शक्ति देता है और वो तमाम मुश्किलों के बीच भी अपना संघर्ष जारी रखते हुए बढ़ता है और अपने जैसे हजारों बीजो को पैदा करता है जबकि तुमने ये मुश्किले ही नहीं आने दी तो कैसे बढ़ता ये बताओ तुम ?”  भगवान ने कहा बिना किसी चुनौतियों के बढ़ते हुए ये पौधे अंदर से खोखले रह गये। यही होना था।

🔶 यह सुनकर किसान को अपनी गलती का अहसास हुआ।

🔷 दोस्तों, जब तक हमारी ज़िंदगी में बाधाएं नहीं आती, परेशानियाँ नहीं आती हैं तब तक हमें भी अपनी ताकत का अंदाजा नहीं होता है। बाधाएं हमें मजबूत बनाती हैं जिससे हम अपनी ज़िंदगी में कुछ नया और बड़ा कार्य करें।

🔶 बस बाधाओं और मुश्किलों से कभी भी घबराना नहीं चाहिए और उनका सामना करते हुए आगे बढ़ता रहना चाहिए।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 31 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन 31 May 2018

👉 शत्रु बनाने का परीक्षित मार्ग (भाग 2)

🔷 दीपक लेकर ढूँढ़ने पर भी सम्भवतः अभी तक कोई भी व्यक्ति प्राप्य नहीं हो सकता जो सर्वांग पूर्ण हो। जिसमें कोई कमी न हो। ऐसा व्यक्ति अभी तक उत्पन्न ही नहीं हुआ वह तो भविष्य में कभी होना है। तब तक किसी को गलत बनाना, काट छाँट करना कहाँ तक उचित है? डाक्टर जौन्सन कहा करते थे “श्रीमान! स्वयं परमात्मा भी, आदमी के अन्तिम दिन से पूर्व उसके सम्बन्ध में कोई निर्णय नहीं देता। फिर हम और आप ही किसी को गलत कैसे कह दें?” हमारे हृदय में भी वही भाव होने चाहिये कि अपने परिचितों, प्रियजनों, मित्रों तथा अन्य लोगों की नग्नता और बुराइयों को व्यर्थ में ही न देखते फिरें। गोस्वामी तुलसीदास के शब्दों में हमारा स्वभाव कपास के समान निर्मल होना चाहिए:—

साधु चरित शुभ सरिस कपासू। सरस विसद गुनमय फल जासू॥
जो सहि दुख पर छिद्र दुरावा। बन्दनीय जेहि जग जसु पावा॥

🔶 स्वयं कष्ट सहन करले किन्तु दूसरों के दोष छिपावे यह सज्जनों का गुण माना गया है। मुस्लिम धर्म ग्रन्थ की एक कथा है कि हजरत नूह एक दिन शराब पीकर उन्मत्त हो गये। उनके वस्त्र अस्त व्यस्त हो गये और अन्ततः वे नंगे हो गये। उनके पुत्र शाम और जैपेथ उलटे पैरों उन तक गये और उन्हें एक कपड़े से ढक दिया। उन्होंने अपने प्रिय पिता का नंगापन नहीं देखा। हमारे हृदय में भी यही भाव होना चाहिये कि अपने प्रियजनों की नग्नता अर्थात् उनकी बुराइयाँ व्यर्थ में ही न देखते फिरा करें।

🔷 कष्ट सह कर भी दूसरों के दोष छिपाने और उनकी आलोचना न करने का महत्व बहुत पहले ही जान लिया गया था। ईसा मसीह से भी 2200 वर्ष पूर्व मिश्र के प्राचीन राजा अख्तुई ने कहा था “दूसरों की भूल मत पकड़ और यदि नजर पड़ ही जाय तो कह मत” क्राइस्ट ने भी यही कहा था कि “यदि तू चाहता है कि तेरे दोषों पर विचार न किया जाय, तो तू भी दूसरों के दोषों पर विचार न कर”।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति, अप्रैल 1955 पृष्ठ 24

👉 पाप कर्मों से बचते रहो

🔷 ‘मैं भूखा हूँ, इसलिए चोरी करूंगा’ ऐसा मत विचारो। क्योंकि इससे तुम्हारी भूख घटेगी नहीं, बढ़ ही जायगी। कीचड़ खाकर किसने दुर्भिक्ष को काटा है? पाप कर्म तो तुम्हें और भी अधिक कंगाल बना देंगे। आग से आग की उत्पत्ति होती है और पाप से पाप की, इसलिए बुद्धिमानी इसी में है कि भूख के मूल कारण पाप से ही दूर रहा जाय। ओस चाटने से तृप्ति नहीं हो सकती और न अधर्म का धन संतोष करा सकता है। तुम्हारा पेट चोरी से नहीं परिश्रम से भरेगा। किसी की तिजोरी को मत झाँको, अपनी भुजाओं को देखो, उनमें पेट के भर देने की भरपूर क्षमता है।

🔶 पाप कर्मों से दूर रहो जैसे साँप से दूर रहते हो। यदि तुमने पाप का भूत पाल लिया, तो यह बड़ा दुख देगा। जहाँ जाओगे वहीं छाया की तरह घेरे फिरेगा और हर घड़ी नारकीय यातनाओं से झुलसाता रहेगा। यदि तुम्हें अपने आप से प्रेम है तो देखो, पाप कर्मों की ओर मत झुकना। आपत्तियों को सहना, पर कर्तव्य धर्म से विचलित मत होना। वे मूर्ख हैं, जो पाप को पसंद करते हैं और दुख भोगते हैं, तुम्हारे लिए दूसरा मार्ग मौजूद है, वह यह कि आधे पेट खाना पर पाप कर्मों के पास न जाना।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड-ज्योति अक्टूबर 1941 पृष्ठ 1

👉 Soul - An Eternal Entity

🔷 “Oh Lord! Some people say soul exists, some say this body itself is the soul; while others say that soul does not exist after death. Please tell me – what is the truth? This is my third boon you have promised to grant me”.

🔶 Like Nachiketa, any human being, who has deeply involved himself in Tapa-Sadhana, Yoga or long-term meditation and contemplation practices but has not yet realized his immortal self-identity, remains in this inquisitive state. Does the soul exist or not? It is a question of paramount importance. Those who are not able to solve this riddle go on groping in dark for a convincing answer but for those who have realized their true – self, life becomes a boon and bliss.

🔷 In this regard, the concepts of Hindu philosophy are very clear. Leaving aside a few thinkers like Maharishi Charak, who identified the sense of soul consciousness with the physical body, most of the Indian seers have considered the soul as an eternal entity independent of the body. Complex methods of yoga have been discovered with the help of which it is possible to take the soul out of the body when a person is alive and make it consciously enter the dead body of another person. The following are few instances of such phenomena.

🔶 During a scriptural debate with Bhagvati Bharati, wife of Mandan Misra, Adi Shankaracharya became answerless on a question that required knowledge of sex. The latter requested for some time to be able to give a convincing reply. Coincidentally, during the same time, the king of Mahishmatinagar died. Shankaracharya made his soul enter the king’s dead body. This process is called Parkaya Pravesh. Daily he used to take out the soul from his body, leaving his dead body lying in the jungle and his soul entering the body of king. During the night when Shankaracharya used to reenter his own body, king’s body became dead. The use of two bodies by a single soul amply proves a separate existence of the soul.

🔷 In 1939, an army commandant L.P. Farrel of the Western Command saw with his own eyes near Assam-Burma border a yogi who came out from his old body and entered the dead body of a young man who then became alive. This incident has been published in the May, 1970 issue of Akhand Jyoti (Hindi edition) on pages 29-30.

🔶 Normally, it is believed that life is based on the process of respiration. But saint Haridas took samadhi for one month in the presence of Maharaja Ranjit Singh and several British officers and established that the relation of the body is related to the soul in the same way as the machine is run by the electrical power. Without the soul the body becomes dead.

🔷 These are a few of the hundreds of recorded testimonies of soul’s immortality.

📖 From Akhand Jyoti  Feb- 2002

👉 भारतीय संस्कृति के विनाश का संकट (भाग 2)

🔷 भारतीय संस्कृति के लिए एक सबसे बड़ा खतरा है, वह है—पाश्चात्य संस्कृति का प्रचार अभियान। इसकी शुरूआत तभी से हो गई थी जब से अंग्रेज यहां पर आए थे। अपने शासन काल में उन्होंने सभी प्रकार अपनी संस्कृति के प्रसार की नींव मजबूत कर ली। ईसाई मिशनरियों के द्वारा प्रचार और स्कूल कालेजों में शिक्षा के माध्यम से ईसाइयत का प्रसार भारत में शुरू किया और यह आज के स्वतन्त्र भारत में बढ़ा ही है कम नहीं हुआ है।

🔶 संस्कृति के इस प्रचार अभियान के कारण प्रतिवर्ष लाखों भारतीय ईसाई बन रहे हैं। स्वदेशी रहन-सहन, भाषा, भाव, विचारों का परित्याग करके वे अपने सांस्कृतिक गौरव को भुला रहे हैं। उधर विदेशी लोग अपनी संस्कृति के प्रसार के लिए करोड़ों रुपया पानी की तरह बहा रहे हैं। जन सेवा के लिए चलाए जाने वाले समस्त ईसाई चर्च, स्कूल, अस्पताल सेवा संस्थायें आदि मूल रूप में ईसाइयत के प्रचार संस्थान हैं। ये लोग भारतीयों की आस्थाओं को नष्ट करके, बहका-फुसलाकर, नौकरी, विवाह, शिक्षा तथा अन्य वस्तुओं का लोभ देकर उन्हें अपनी संस्कृति में रंग रहे हैं। आसाम, बम्बई, महाराष्ट्र, बिहार, उड़ीसा, केरल, मद्रास के आदिवासी क्षेत्रों में ईसाई मिशनरी पूरे जोर-शोर के साथ अपना काम कर रहे हैं। इस सम्बन्ध में जांच, पड़ताल करने पर बड़े सनसनी पूर्ण तथ्य मिलते हैं।

🔷 ईसाई स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली बहुत सी पुस्तकों में हमारी संस्कृति के आदर्श नायक राम और कृष्ण के सम्बन्ध में घृणित विचार मिलते हैं। एक पुस्तक के अनुसार वह (श्रीकृष्ण) चोर था, उसने निरपराध धोबी का वध किया। ऐसे देवताओं की पूजा करना मूर्खता है।’’ इस तरह भगवान राम के बारे में—‘‘राम बड़ा पापी था उसने रावण का वध किया।’’ फिर इस तरह हिन्दू-संस्कृति के आधारों के प्रति आस्था नष्ट करके वे ईसा के प्रति भक्ति जगाते हैं। उसे मानव का कल्याणकारी बताकर लोगों को उसकी पूजा करने, ईसाई बनने का कूटनीतिक प्रयत्न इन ईसाई मिशनरियों द्वारा हमारे देश में कम नहीं चल रहा। इससे हमारी संस्कृति की नींव ही खोखली होती जा रही है। भारतीय समाज का एक बहुत बड़ा भाग आज ईसाई बनकर अपनी प्रेरणा और जीवन पद्धति का आधार पश्चिम को मान कर चलता है। ये लोग भारत में इस तरह रहते हैं मानो ये विदेशी हों। कैसी विडम्बना है?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 17

👉 गुरुगीता (भाग 122)

👉 इस प्रकरण को आगे बढ़ाते हुए भगवान् भोलेनाथ कहते हैं-

🔷 ऐसा ही एक अनुभव भक्तिमती नारी गंगाबाई का है। गंगाबाई भगवान् के परम भक्त लाखाजी की बेटी थी। भक्त लाखाजी विशेष पढ़े तो नहीं थे, परन्तु गुरूगीता उन्हें कंठस्थ थी। भगवान् में उनका अगाध विश्वास था। इनकी दो सन्ताने थी- एक पुत्र, एक कन्या। पुत्र का नाम देवा और कन्या का नाम गंगाबाई था। पुत्र के विवाह के दो साल बाद उन्होंने कन्या का विवाह कर दिया। लाखाजी नियम से गुरूगीता के ११ पाठ एवं शिव सहस्त्रनाम का पाठ करते थे। उनके पुत्र एवं कन्या को भी गुरूगीता से प्रगाढ़ अनुराग हो गया था।

🔶 न मालूम प्रारब्ध के किस संयोग से कैसे दिन बदल जाते हैं? गंगाबाई के पति को सर्प ने काट लिया। सर्प के काटने से उसकी तत्क्षण मृत्यु हो गयी। पुत्री के जीवन की इस त्रासदी की खबर लाखाजी को लगी। उन्होंने यह बात अपनी पत्नी, पुत्र व पुत्रवधु को बतायी। सभी इस शोक समाचार को सुनकर व्याकुल हो गए। लाखाजी ने सभी को सम्भाला और पुत्री को सान्त्वना देने के लिए उसकी ससुराल पहुँचे। ससुराल पहुँचने पर उन्हें भारी अचरज हुआ। बात भी अचरज की थी। उन्होंने देखा कि उनकी भक्तिमती पुत्री बड़े शान्त एवं स्थिर भाव से अपने सास- श्वसुर को प्रबोध दे रही है। उसकी इन बातों से सास- ससुर शान्त चित्त हो रहे थे।

🔷 गंगाबाई की यह स्थिति देखकर लाखाजी ने पूछा -बेटी! तेरी ऐसी स्थिति देखकर मैं चकित हूँ। मैं तो यहाँ तरह- तरह के विचार करके आया था कि तुझे धीरज बंधाऊँगा। परन्तु तेरे ज्ञान ने तो मुझे चकित कर दिया है। तुझे यह ज्ञान आया कहाँ से?

🔶 गंगाबाई ने कहा- पिता जी यह सब आपकी दी हुई सीख का फल है। आप के सान्निध्य में मैंने गुरूगीता कंठस्थ कर ली थी। बचपन से ही गुरूगीता का पाठ, इसके विधिवत अनुष्ठान मेरा नियम बन गया था। इस साधना को मैंने कभी भी नहीं छोड़ा। इसी का प्रभाव है कि आपके जामाता की मृत्यु के तीन दिन पहले भगवान् ने मुझे स्वन्प में दर्शन देकर कहा- बेटी! तेरे पति की आयु पूरी हो चुकी है, यह मेरा भक्त हे। तेरे साथ उसका पूर्वजन्म का संयोग शेष था। इसी से उसने जन्म लिया था। अब इसे तीन दिन बाद साँप डसेगा। उस समय तू उसे गुरूगीता सुनाती रहना। ऐसा करने से इसका कल्याण होगा। मैं तुझे सच्चा वैराग्य और ज्ञान प्राप्त होगा।

🔷 पिताजी इतना कहकर भगवान् भोलेनाथ अन्तर्ध्यान हो गए। मैं जाग पड़ी, मानों उसी समय से मुझे ज्ञान का परम प्रकाश मिल गया। मैं सारे शोक- मोह छोड़कर पति के कल्याण में लग गयी। मैंने व्रत धारण किया और रातो जागकर पति को गुरूगीता एवं शिव सहस्त्रनाम सुनाती रही। तीसरे दिन जब पतिदेव सूर्य को अर्ध्य दे रहे थे, उसी समय अचानक एक कालसर्प ने आकर उनके पैर को डस लिया। देखते- देखते उनके प्राण पखेरू उड़ गए। मैंने देखा कर्पूरगौर भगवान् सदाशिव उनके सम्मुख विद्यमान हैं। इस दृश्य ने गुरूगीता पर मेरी आस्था बढ़ा दी। अब आप मेरी सहायता कीजिए कि भगवान् सदाशिव की भक्ति कर सकूँ। पुत्री के इस अनुभव को सुनकर पिता को रोमांच हो आया। सचमुच ही गुरूगीता से सच्चा ज्ञान सहज सम्भव है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 184