बुधवार, 30 मई 2018

👉 गुरुगीता (भाग 122)

👉 इस प्रकरण को आगे बढ़ाते हुए भगवान् भोलेनाथ कहते हैं-

🔷 ऐसा ही एक अनुभव भक्तिमती नारी गंगाबाई का है। गंगाबाई भगवान् के परम भक्त लाखाजी की बेटी थी। भक्त लाखाजी विशेष पढ़े तो नहीं थे, परन्तु गुरूगीता उन्हें कंठस्थ थी। भगवान् में उनका अगाध विश्वास था। इनकी दो सन्ताने थी- एक पुत्र, एक कन्या। पुत्र का नाम देवा और कन्या का नाम गंगाबाई था। पुत्र के विवाह के दो साल बाद उन्होंने कन्या का विवाह कर दिया। लाखाजी नियम से गुरूगीता के ११ पाठ एवं शिव सहस्त्रनाम का पाठ करते थे। उनके पुत्र एवं कन्या को भी गुरूगीता से प्रगाढ़ अनुराग हो गया था।

🔶 न मालूम प्रारब्ध के किस संयोग से कैसे दिन बदल जाते हैं? गंगाबाई के पति को सर्प ने काट लिया। सर्प के काटने से उसकी तत्क्षण मृत्यु हो गयी। पुत्री के जीवन की इस त्रासदी की खबर लाखाजी को लगी। उन्होंने यह बात अपनी पत्नी, पुत्र व पुत्रवधु को बतायी। सभी इस शोक समाचार को सुनकर व्याकुल हो गए। लाखाजी ने सभी को सम्भाला और पुत्री को सान्त्वना देने के लिए उसकी ससुराल पहुँचे। ससुराल पहुँचने पर उन्हें भारी अचरज हुआ। बात भी अचरज की थी। उन्होंने देखा कि उनकी भक्तिमती पुत्री बड़े शान्त एवं स्थिर भाव से अपने सास- श्वसुर को प्रबोध दे रही है। उसकी इन बातों से सास- ससुर शान्त चित्त हो रहे थे।

🔷 गंगाबाई की यह स्थिति देखकर लाखाजी ने पूछा -बेटी! तेरी ऐसी स्थिति देखकर मैं चकित हूँ। मैं तो यहाँ तरह- तरह के विचार करके आया था कि तुझे धीरज बंधाऊँगा। परन्तु तेरे ज्ञान ने तो मुझे चकित कर दिया है। तुझे यह ज्ञान आया कहाँ से?

🔶 गंगाबाई ने कहा- पिता जी यह सब आपकी दी हुई सीख का फल है। आप के सान्निध्य में मैंने गुरूगीता कंठस्थ कर ली थी। बचपन से ही गुरूगीता का पाठ, इसके विधिवत अनुष्ठान मेरा नियम बन गया था। इस साधना को मैंने कभी भी नहीं छोड़ा। इसी का प्रभाव है कि आपके जामाता की मृत्यु के तीन दिन पहले भगवान् ने मुझे स्वन्प में दर्शन देकर कहा- बेटी! तेरे पति की आयु पूरी हो चुकी है, यह मेरा भक्त हे। तेरे साथ उसका पूर्वजन्म का संयोग शेष था। इसी से उसने जन्म लिया था। अब इसे तीन दिन बाद साँप डसेगा। उस समय तू उसे गुरूगीता सुनाती रहना। ऐसा करने से इसका कल्याण होगा। मैं तुझे सच्चा वैराग्य और ज्ञान प्राप्त होगा।

🔷 पिताजी इतना कहकर भगवान् भोलेनाथ अन्तर्ध्यान हो गए। मैं जाग पड़ी, मानों उसी समय से मुझे ज्ञान का परम प्रकाश मिल गया। मैं सारे शोक- मोह छोड़कर पति के कल्याण में लग गयी। मैंने व्रत धारण किया और रातो जागकर पति को गुरूगीता एवं शिव सहस्त्रनाम सुनाती रही। तीसरे दिन जब पतिदेव सूर्य को अर्ध्य दे रहे थे, उसी समय अचानक एक कालसर्प ने आकर उनके पैर को डस लिया। देखते- देखते उनके प्राण पखेरू उड़ गए। मैंने देखा कर्पूरगौर भगवान् सदाशिव उनके सम्मुख विद्यमान हैं। इस दृश्य ने गुरूगीता पर मेरी आस्था बढ़ा दी। अब आप मेरी सहायता कीजिए कि भगवान् सदाशिव की भक्ति कर सकूँ। पुत्री के इस अनुभव को सुनकर पिता को रोमांच हो आया। सचमुच ही गुरूगीता से सच्चा ज्ञान सहज सम्भव है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 184