गुरुवार, 26 अप्रैल 2018

👉 संयम का महत्व

🔷 एक देवरानी और जेठानी में किसी बात पर जोरदार बहस हुई और दोनो में बात इतनी बढ़ गई कि दोनों ने एक दूसरे का मुँह तक न देखने की कसम खा ली और अपने-अपने कमरे में जा कर दरवाजा बंद कर लिया।

🔶 परंतु थोड़ी देर बाद जेठानी के कमरे के दरवाजे पर खट-खट हुई। जेठानी तनिक ऊँची आवाज में बोली कौन है, बाहर से आवाज आई दीदी मैं ! जेठानी ने जोर से दरवाजा खोला और बोली अभी तो बड़ी कसमें खा कर गई थी। अब यहाँ क्यों आई हो ?

🔷 देवरानी ने कहा दीदी सोच कर तो वही गई थी, परंतु माँ की कही एक बात याद आ गई कि जब कभी किसी से कुछ कहा सुनी हो जाए तो उसकी अच्छाइयों को याद करो और मैंने भी वही किया और मुझे आपका दिया हुआ प्यार ही प्यार याद आया और मैं आपके लिए चाय ले कर आ गई।

🔶 बस फिर क्या था दोनों रोते रोते, एक दूसरे के गले लग गईं और साथ बैठ कर चाय पीने लगीं। जीवन मे  क्रोध को क्रोध से नहीं जीता जा सकता, बोध से जीता जा सकता है। अग्नि अग्नि से नहीं बुझती जल से बुझती है।

🔷 समझदार व्यक्ति बड़ी से बड़ी बिगड़ती स्थितियों को दो शब्द प्रेम के बोलकर संभाल लेते हैं। हर स्थिति में संयम और बड़ा दिल रखना ही श्रेष्ठ है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 April 2018


👉 आज का सद्चिंतन 27 April 2018


👉 हमारी अतृप्ति और असंतोष का कारण

👉 मनोनिग्रह-सफलता की कुँजी

🔷 एक विचारक का कथन है-“जो मनुष्य अधिकतम संतोष और सुख पाना चाहता है, उसको अपने मन और इन्द्रियों को वश में करना अत्यन्त आवश्यक है। यदि हम अपने आपको तृष्णा और वासना में बहायें, तो हमारे असंतोष की सीमा न रहेगी।”

🔶 अनेक प्रलोभन तेजी से हमें वश में कर लेते हैं, हम अपनी आमदनी को भूल कर उनके वशीभूत हो जाते हैं। बाद में रोते चिल्लाते हैं। जिह्वा के आनन्द, मनोरंजन आमोद प्रमोद के मजे हमें अपने वश में रखते हैं। हम सिनेमा का भड़कीला विज्ञापन देखते ही मन को हाथ से खो बैठते हैं और चाहे दिन भर भूखे रहें, अनाप-शनाप व्यय कर डालते हैं। इन सभी में हमें मनोनिग्रह की नितान्त आवश्यकता है। मन पर संयम रखिये। वासनाओं को नियंत्रण में बाँध लीजिये, पॉकेट में पैसा न रखिये। आप देखेंगे कि आप इन्द्रियों को वश में रख सकेंगे।

🔷 आर्थिक दृष्टि से मनोनिग्रह और संयम का मूल्य लाख रुपये से भी अधिक है। जो मनुष्य अपना स्वामी है और इन्द्रियों को इच्छानुसार चलाता है, वासना से नहीं हारता, वह सदैव सुखी रहता है।

🔶 प्रलोभन एक तेज आँधी के समान है जो मजबूत चरित्र को भी यदि वह सतर्क न रहे, गिराने की शक्ति रखती है। जो व्यक्ति सदैव जागरुक रहता है, वह ही संसार के नाना प्रलोभनों आकर्षणों, मिथ्या दंभ, दिखावा, टीपटाप से मुक्त रह सकता है। यदि एक बार आप प्रलोभन और वासना के शिकार हुए तो वर्षों उसका प्रायश्चित करने में लग जायेंगे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1950 पृष्ठ 9


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/January/v1.9

👉 आत्मचिंतन के क्षण 27 April 2018

🔷 कहते हैं कि शनिश्चर और राहू की दशा सबसे खराब होती है और जब वे आती हैं तो बर्बाद कर देती हैं। इस कथन में कितनी सचाई है यह कहना कठिन है, पर यह नितान्त सत्य है कि आलस्य को शनिश्चर और प्रमाद को-समय की बर्बादी को-राहू माना जाय तो इनकी छाया पड़ने मात्र से मनुष्य की बर्बादी का पूरा-पूरा सरंजाम बन जाता है।

🔶 दुःख और कठिनाइयेां में ही सच्चे हृदय से परमात्मा की याद आती है। सुख-सुविधाओं में तो भोग और तृप्ति की ही भावना बनी रहती है। इसलिए उचित यही है कि विपत्तियों का सच्चे हृदय से स्वागत करें। परमात्मा से माँगने लायक एक ही वरदान है कि वह कष्ट दे, मुसीबतें दें, ताकि मनुष्य अपने लक्ष्य के प्रति सावधान व सजग बना रहे।

🔷 निराशा वह मानवीय दुर्गुण है, जो बुद्धि को भ्रमित कर देती है। मानसिक शक्तियों को लुंज-पुंज कर देती है। ऐसा व्यक्ति आधे मन से डरा-डरा सा कार्य करेगा। ऐसी अवस्था में सफलता प्राप्त कर सकना संभव ही कहाँ होगा? जहाँ आशा नहीं वहाँ प्रयत्न नहीं। बिना प्रयत्न के ध्येय की प्राप्ति न आज तक कोई कर सका है, न आगे संभव है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Yajna – The Root of Vedic Culture (Part 1)

🔷 Gayatri and Yajna constitute the foundation of the Vedic Indian Culture. While Gayatri imparts wisdom and pure intelligence, Yajna inspires corresponding creativity and actions.

🔶 In talking of the Vedic age the images of the great saints performing agnihotra-Yajnas instantly flashes in our memory. In those days, apart from the saints, the rich and the poor, the kings and citizens also had an equally deep faith and respect for Yajna and they used to sincerely participate in and lend wholehearted support for different kinds of Yajnas. The saints used to spend at least one-third of their lives in conducting Yajnas.

🔷 It was a common belief and an observed fact in the Vedic Indian society that Yajna was essential for the refinement of human life from a sudra (i.e. a person living a life driven by animal instincts) to a Brahmin (i.e. a wise, knowledgeable, charitable person), and ultimately to a divine, great personality. Yajnas played an essential role in the all-round progress, prosperity and happiness in the Vedic age. This was indeed natural, as the philosophy and science of Yajna and the different modes of performing agni-Yajna were discovered and developed by the rishis based on their deep understanding and in-depth research of the human self, the intricacies of the social system and the mysteries of Nature.

📖 From Akhand Jyoti Jan 2001

👉 कर्मफल व्यवस्था का एक सुनिश्चित स्वचालित तंत्र (भाग 2)

🔷 चोरी करते ही हाथों में लकवा मार जाय। कुमार्ग पर चलने वालों के पैर लड़खड़ा जाते। झूठ बोलने वाले की जीभ ठप्प हो जाती। कुदृष्टि डालने वालों को दिखना बन्द हो जाता। व्यभिचारी नपुंसक हो जाते तो फिर धर्मशास्त्रों की, उपदेशकों की, पुलिस कचहरी की कोई आवश्यकता न पड़ती। कुकृत्य करने की किसी की हिम्मत ही न पड़ती। अच्छे कर्मों के सत्परिणाम हाथों हाथ मिलते तो हर आदमी इसी को लाभदायक व्यवसाय समझकर अपने मन से ही किया करता। पर इसे भगवान की मसखरी ही समझना चाहिए कि विलम्ब से प्रतिफल मिलने के कारण लोग अधीर हो उठते हैं और विश्वास ही गँवा बैठते हैं। उससे उत्पन्न होने वाले असन्तुलन को सम्भालने के लिए संतों और सुधारकों को आना पड़ता है और बात बेकाबू होती है तो उसके लिए भगवान को आना पड़ता है। मनुष्य की अपनी दूरदर्शिता की परीक्षा का तो यही केन्द्र है।

🔶 बीजों में कुछ ऐसे होते हैं जो एक सप्ताह के भीतर हरियाली दे जाते हैं और तीन महीने उनकी फसल भी कट जाती है। पर कुछ ऐसे हैं जो बहुत देर लगाते हैं। ताड़ का बीज बोने पर एक वर्ष में अंकुर फोड़ता है हर वर्ष कुछ इंच बढ़ता है और पाँच सौ वर्ष की आयु तक जीता है जबकि मक्का पकने में थोड़े ही दिन लगते हैं। स्कूल में दाखिल होने के उपरान्त स्नातक बनने और अफसर पद पर नियुक्त होने में चौदह वर्ष प्रतीक्षा करनी पड़ती है। होता यह भी है कि मजूर दिन भर मेहनत करने के बाद शाम को अपनी मजूरी के पैसे ले जाता है।

🔷 असंयम बरतने वालो का स्वास्थ्य खराब तो होता है पर उसमें देर लगती है। देखा यह भी गया है कि नशा पीते ही मदहोशी चढ़ दौड़ती है। उपरोक्त उदाहरणों में यह प्रकट है कि कभी-कभी तो परिणाम जल्दी मिलता है पर कभी उसमें देर हो जाती है। कुछ देर तो हालत में लगती है, आज का जमाया हुआ दूध कल दही बनता है। कर्मफल के सम्बन्ध में भी यह देर सबेर का चक्र चलता है। पर परिणाम होना सुनिश्चित है। भाग्य का कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं वह पिछले किये हुए कर्मों का ही प्रतिफल है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1985 पृष्ठ 32
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1985/January/v1.32

👉 गुरुगीता (भाग 96)

👉 सद्गुरू की कृपा से ही मिलती है मुक्ति

🔷 गुरूगीता में योगसाधना के गहन रहस्य उजागर होते हैं। इसमें जो कुछ भी है, वह सभी तरह के बुद्धि कौशल से परे है। गुरूगीता के महामंत्रों में निहित रहस्य बुद्धि से नहीं, बोध से अनुभव होता है। इसके मंत्रोंक्षरों की सच्चाई के तर्क से नहीं, साधना से ही जाना जा सकता है। जो लोग गुरूगीता को बुद्धि और तर्क से जानने की कोशिश करते हैं, वे अपने ही जाल में उलझ कर रह जाते हैं। गुरूगीता के सम्बन्ध में उनकी बौद्धिक तत्परता उन्हें भ्रमों के सिवा और कुछ नहीं दे पाती। तर्कों से उन्हें केवल बहस का खोखलापन मिलता है। इसके विपरीत जो साधना करते हैं, वे अपनी साधना से प्राप्त अन्तर्दृष्टि के सहारे सब कुछ जान लेते हैं।

🔶 गुरूगीता की रहस्य कथा में अन्तर्दृष्टि के रहस्यों की श्रृंखला स्पष्ट होती रही है। इसकी प्रत्येक कड़ी ने साधकों एवं शिष्यों की अन्तर्दृष्टि में हर बार नये आयाम जोड़े हैं। पिछले क्रम में माँ पार्वती ने भगवान् सदाशिव से अनूठी जिज्ञासा जतायी है। उन्होंने पूछा है कि हे महादेव! पिण्ड क्या है? पद किसे कहते हैं? हे भोलेनाथ रूप क्या है और रूपातीत क्या है? माँ की यह सभी जिज्ञासाएँ जीवात्मा के अस्तित्व के अतिगूढ़ प्रश्न हैं और इनका उत्तर केवल साधना की समाधि से शिवमुख से सुनकर ही जाना जा सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 144

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 April 2018


👉 आज का सद्चिंतन 26 April 2018


👉 आध्यात्म पथ के पथिकों! अपरिग्रही बनो!!

🔶 मन से हर एक को सदैव अपरिग्रही होना चाहिए। आदर्श यही सामने रहना चाहिए कि सच्ची जरूरतें पूरी करने के लिए ही कमायें, जोड़ने जमा करने या ऐश उड़ाने के लिए नहीं। यदि गरीब आदमी लखपती बनने के मनसूबे बाँधता है तो वह परिग्रही है। धन वैभव के बारे में यही आदर्श निश्चित किया होना चाहिए कि सच्ची जरूरतों की पूर्ति के लिए कमायेंगे, उतनी ही इच्छा करेंगे, उससे अधिक संग्रह न करेंगे। धन को जीवन का उद्देश्य नहीं वरन् एक साधन बनाना चाहिए।

🔷 “आत्मोन्नति और परमार्थ” जीवनोद्देश्य तो यही होना चाहिए। जीवन धारण करने योग्य पैसा कमाने के अतिरिक्त शेष समय इन्हीं कार्यों में लगाना चाहिए। पैसे की आज जो सर्वभक्षी तृष्णा हर एक के मन में दावानल की तरह धधक रही है यह सर्वथा त्याज्य है। सादगी और अपरिग्रह में सच्चा आनन्द है। मनुष्य उतना ही आनन्दित रह सकता है जितना अपरिग्रही होगा। परिग्रही के सिर पर तो अशान्ति और अनीति सवार रहती है। इसी मर्म को समझते हुए योग शास्त्र के आचार्यों ने आध्यात्म पथ के पथिक को अपरिग्रही बनने का आदेश किया है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1944 पृष्ठ 1

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1944/February/v1

👉 संकल्पवान

🔶 गुरजिएफ ने कहा कि सामान्य व्यक्ति वादा नहीं कर सकता, संकल्प नहीं कर सकता, क्योंकि यह सब तो साधकों के गुण हैं, शिष्यत्व के लक्षण हैं।

🔷 गुरजिएफ के पास लोग आते और कहते— अब मैं व्रत लूँगा। उसके शिष्य औस्पेन्सकी ने लिखा है कि वह जोर से हँसता और कहता 'इससे पहले कि तुम कोई प्रतिज्ञा लो, दो बार फिर सोच लो। क्या तुम्हें पूरा आश्वासन है कि जिसने वादा किया है, वह अगले क्षण भी बना रहेगा? तुम कल से सुबह तीन बजे उठने का निर्णय कर लेते हो और तीन बजे तुम्हारे भीतर कोई कहता है, झंझट मत लो। बाहर इतनी सर्दी पड़ रही है। और ऐसी जल्दी भी क्या है? मैं यह कल भी कर सकता हूँ और तुम फिर सो जाते हो। दूसरे दिन सारे पछतावे के बावजूद यही स्थिति फिर से दुहराई जाती है। क्योंकि जिसने प्रतिज्ञा की, वह सुबह तीन बजे वहाँ होता ही नहीं, उसकी जगह कोई दूसरा ही आ बैठता है। अनुशासन का मतलब है, भीड़ की इस अराजक अव्यवस्था को समाप्त कर केन्द्रीयकरण की लयबद्धता उत्पन्न करना और तभी जानने की क्षमता आती है।

🔶 संकल्पवान ही आत्मतत्त्व को जान पाते हैं। गुरुदेव का समूचा जीवन इसी संकल्प का पर्याय था। उनके समूचे जीवन में, अन्तर्चेतना में अविराम लयबद्धता थी; तभी उनके गुरु ने उन्हें जो अनुशासन दिया, वह बड़ी प्रसन्नतापूर्वक पालन करते रहे। अनुशासन से मिलता-जुलता अंग्रेजी का शब्द है- डिसिप्लिन। यह डिसिप्लिन शब्द बड़ा सुन्दर है। यह उसी जड़, उसी उद्ïगम से आया है, जहाँ से डिसाइपल शब्द आया है। इससे यही प्रकट होता है कि अनुशासन शिष्य का सहज धर्म है। केन्द्रस्थ, लयबद्ध, संकल्पवान व्यक्ति ही गुरु के दिए गए अनुशासन को स्वीकार, शिरोधार्य कर सकता है। ऐसे ही व्यक्ति के अन्दर विकसित होती है, जानने की क्षमता।

📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान से

👉 Revolution

🔶 It is an established truth that whoever listened to and heeded the call of the “Budham, Dhamman, Sangham saranam gachchhami” to protest against the then prevalent malpractices. Thousands and thousands forsook everything and followed him. He ushered in a reform through intellectual revolution. A similar miracle was wrought by Gandhiji. One and a half thousand years of slavery and suppression had left the populace emaciated, and it lacked the courage and wherewithal to take on the mighty British Empire.

🔷 A small number of satyagrahis were simply no match. But the widespread and deep resentment coalesced into the great freedom struggle. Circumstances started turning favourable, and India became independent. The present age is witnessing a spiritual-intellectual revolution. The divisive  human consciousness bound to be transformed into the unitive cosmic consciousness. Indian culture is on the threshold of becoming world culture. The emergence of a New Era is imminent.

📖 From Akhand Jyoti

👉 कर्मफल व्यवस्था का एक सुनिश्चित स्वचालित तंत्र (भाग 1)

🔶 हमारे कर्म ही समयानुसार भले बुरे परिणामों के रूप में सामने आते रहते हैं। सृष्टा ने ऐसी स्वसंचालित प्रक्रिया बनाई है कि अपने कृत्यों का परिणाम स्वयं भुगत लेने का चक्र सुव्यवस्थित रूप से चलता रहता है। यह उचित ही हुआ। अन्यथा हर व्यक्ति के द्वारा चौबीस घण्टे में जो भले बुरे कृत्य होते रहते हैं वे जन्म भर में इतने अधिक इकट्ठे हो जाते हैं कि इन फाइलों को पढ़ना और दण्ड पुरस्कार की व्यवस्था करना एक न्यायाधीश के लिए सम्भव न होता। इतने मनुष्य के लिए इतने न्यायाधीश नियुक्त करने में भगवान की कितनी परेशानी पड़ती।

🔷 झंझट से बचने और व्यवस्था को सुचारु रखने के लिए भगवान ने मनुष्य के भीतर ऐसा स्वसंचालित तन्त्र फिट कर दिया है जो कर्मों का लेखा जोखा रखता और उसके दण्ड पुरस्कार की व्यवस्था करता है। यह है मनुष्य का अचेतन मन जिसे धर्म ग्रंथों की भाषा में चित्र गुप्त भी कहा गया है। पौराणिक गाथाओं के अनुसार प्रत्येक मनुष्य के कर्मफल का बहीखाता उन्हीं के पास है और प्रतिफल का निपटारा यथावत् वे ही करते रहते हैं। फोटोग्राफी के फिल्म की तरह वे दृश्यों का अंकन करते रहते हैं। टेप रिकार्डर की तरह उनकी मशीन पर जो घटित होता रहता है उसका अंकन चलता रहता है और समय आने पर उसकी प्रतिक्रिया यथा समय सामने आ खड़ी होती है।

🔶 शास्त्रों ने अनेक स्थानों पर इस बात का उल्लेख किया है कि मनुष्य अपने कर्मों को स्वयं ही भोगता रहता है। साधारणतया यही देखने में भी आता है। सत्कर्म करने वाले ऊँचे उठते, प्रतिष्ठा पाते और सुखी रहते हैं। कुकर्मी उनकी बुरी परिणति भुगतते रहते हैं। इसमें कई बार देर लग जाती है और मनुष्य अधीर होकर कर्मफल पर अविश्वास व्यक्त करने लगता है और निर्भय होकर उच्छृंखलता पर उतारू हो जाता है।

🔷 सत्कर्म करने वाले जैसे सत्परिणामों की आशा करते थे वैसा न मिलने पर वे भी निराश होते और अविश्वासी बनते देखे गये हैं। इसे सृष्टि व्यवस्था का एक रहस्य कह सकते हैं। कर्मों का परिणाम यथावत् होने की बात निश्चित होते हुए भी उसमें विलम्ब लग जाता है। इस विलम्ब का समाधान बनाने के लिए इतने शास्त्रों की रचना हुई है। धर्मों उपदेशकों को समय-समय पर इसके लिए भारी श्रम करते रहना पड़ा है। मनुष्य की विवेक बुद्धि एवं श्रद्धा निष्ठा की परीक्षा इसी पर होती रही है। अन्यथा यदि हाथों हाथ कर्मफल मिला होता तो समझने समझाने की इतनी जरूरत न पड़ती।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1985 पृष्ठ 32
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1985/January/v1.32

👉 गुरुगीता (भाग 95)

👉 सद्गुरु को तत्त्व से जान लेने का मर्म

🔶 जीव को पिण्ड मिलने और इसमें आबद्ध होने का कारण उसकी वासनाएँ, चाहतें और इच्छाएँ हैं। वासनाएँ जब तक हैं, जीव का पिण्ड से छुटकारा नहीं है। इतना ही नहीं, वह इन वासनाओं से लिपटे रहने के कारण स्वयं को ही पिण्ड समझने लगता है। ग्रामीण अंचल में एक बड़ा प्रचलित मुहावरा है- पिण्ड छुड़ाना। किसी जंजाल या विपत्ति से पीछा छूटने पर कहते हैं कि चलो पिण्ड छूटा। भले ही इस कहावत पर किसी ने गहराई से विचार न किया हो, परन्तु सच यही है कि पिण्ड छूटना बड़े महत्त्व की बात है; परन्तु योगीजन जानते हैं कि पिण्ड से मुक्त होना वासनाओं से मुक्त होने के बाद ही सम्भव है और वासनाएँ कुण्डलिनी शक्ति के जागरण व ऊर्ध्वगमन के बाद ही छूट पाती हैं। सो वासनाओं और इससे पैदा होने वाले कर्म बीजों व इसके परिणामों को जिसने जान लिया, समझो उसने पिण्ड के तत्त्व को जान लिया।
    
🔷 माता जगदम्बा प्रभु से अगला सवाल करती हैं-प्रभु पद किसे कहते हैं? यह पद शब्द भी यौगिक शब्दावली की एक गहरी विशेषता है। योग में जीवात्मा को पद कहा गया है। इसका एक नाम हंस भी है। इस हंस का ज्ञान सामान्य जनों को नहीं होता; क्योंकि वासनाओं से चंचल प्राणों में यह अनुभूति नहीं हो पाती। जब वासनाओं का वेग थमता है, तब प्राण स्थिर होते हैं। और प्राणों की इस स्थिरता में हंस का अनुभव होता है। यह अनुभव जीवात्मा का है। जीवात्मा का मतलब है आत्मचेतना का वह स्वरूप जिसने प्रकृति बन्धनों के कारण जीव भाव को स्वीकार कर लिया है। जीव भाव से मुक्त होने पर ही योग साधना में आत्मतत्त्व की अनुभूति होती है।
    
🔶 इसी क्रम में माँ की अगली जिज्ञासा है कि प्रभु रूप क्या है? रूप का मतलब है—आत्मरूप का। यह आत्मरूप है—आत्मज्योति रूप नीलबिन्दु। इसका अनुभव साधक को आत्मज्योति का अनुभव देता है। इस अनुभूति के साथ ही साधक को अपने आत्मरूप का ज्ञान व भान हो जाता है। सभी जप, योग एवं तप का सुफल यही है। जिसकी यह स्थिति नहीं है समझो उसे अभी अध्यात्म की कक्षा में प्रवेश नहीं मिला। योग साधना में रूप दर्शन एवं रूप मुक्ति यही दो क्रम हैं। इन्हें पूरा कर लेने पर रूपातीत अनुभूति का क्रम होता है। यह अध्यात्म विद्या की उच्च कक्षा है। इसमें प्रवेश साधक को जन्मों की साधना के बाद मिलता है।
    
🔷 इस उच्च कक्षा के बारे में जगन्माता भवानी अगली जिज्ञासा करती हैं—प्रभु रूपातीत क्या है? रूपातीत है ब्राह्मीचेतना। सभी रूप इसी से उदय होते हैं और इसी में विलीन हो जाते हैं। यह अनुभूति विरल है। जन्म-जन्मान्तर की साधना के बाद ही साधक इसकी प्राप्ति का अधिकारी हो पाता है। इसे पाने पर न शोक रह जाता है और न मोह। माया से परे अगम-अगोचर प्रभु की अनुभूति अति असाधारण अनुभव है। इस अनुभव में साधना की सार्थकता है। यहीं जीव शिव बनता है। इस शिवत्व की प्राप्ति में उसकी गुरुसेवा की सफलता है। उसके सद्गुरु के वरदान का सुफल है। जिसको यह मिल गया समझो उसे सब मिल गया।
    
🔶 हालाँकि यह तत्त्व बोध होता है क्रमवार ही। सबसे पहले पिण्ड बोध करना होता है। किन वासनाओं के प्रतिफल से यह देह मिली है। किन कर्मबीजों के कारण वर्तमान परिस्थितियाँ हैं। इसे अपनी साधना की गहराई में अनुभव करना होता है। इसके बाद आता है प्राणों की गति का क्रम। प्राणों की गति का ऊर्ध्व व स्थिर होना जीवात्मा के साक्षात्कार का कारण बनता है। इसके बाद ही हो पाता है आत्मज्योति के दर्शन का क्रम और बाद में ब्र्राह्मी चेतना से सायुज्य की स्थिति बनती है। यह सायुज्यता मिलने पर साधक को अपने सद्गुरु के निराकार निरञ्जन तत्त्व का  साक्षात्कार होता है। माँ  की इन जिज्ञासाओं में भगवान् सदाशिव के उत्तर अत्यन्त मर्मस्पर्शी हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 143

👉 अपना अपना भाग्‍य

एक राजा के तीन पुत्रियाँ थीं और तीनों बडी ही समझदार थी। वे तीनो राजमहल मे बडे आराम से रहती थी। एक दिन राजा अपनी तीनों पुत्रियों सहित भोज...