शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

👉 शिकंजी का स्वाद

🔴  एक कालेज का छात्र था जिसका नाम था रवि। वह बहुत चुपचाप सा रहता था। किसी से ज्यादा बात नहीं करता था इसलिए उसका कोई दोस्त भी नहीं था। वह हमेशा कुछ परेशान सा रहता था। पर लोग उस पर ज्यादा ध्यान नहीं देते थे।

🔵  एक दिन वह क्लास में पढ़ रहा था। उसे गुमसुम बैठे देख कर अध्यापक मोहदय उसके पास आये और क्लास के बाद मिलने को कहा। क्लास खत्म होते ही रवि अध्यापक मोहदय के कमरे में पहुंचा।
🔴  रवि मैं देखता हूँ कि तुम अक्सर बड़े गुमसुम और शांत बैठे रहते हो, ना किसी से बात करते हो और ना ही किसी चीज में रूचि दिखाते हो! इसका क्या कारण है ?” अध्यापक मोहदय ने पुछा।🔵  रवि बोला, मेरा भूतकाल का जीवन बहुत ही खराब रहा है, मेरी जिन्दगी में कुछ बड़ी ही दुखदायी घटनाएं हुई हैं, मैं उन्ही के बारे में सोच कर परेशान रहता हूँ…..🔴  अध्यापक मोहदय ने ध्यान से रवि की बातें सुनी और उसे रविवार को घर पे बुलाया। रवि नियत समय पर अध्यापक मोहदय के घर पहुँच गया।🔵  रवि क्या तुम शिकंजी पीना पसंद करोगे? अध्यापक ने पुछा। जी।  रवि ने कहा।🔴  अध्यापक मोहदय ने शिकंजी बनाते वक्त जानबूझ कर नमक अधिक डाल दिया और चीनी की मात्रा  कम ही रखी।🔵  शिकंजी का एक घूँट पीते ही रवि ने अजीब सा मुंह बना लिया।🔴  अध्यापक मोहदय ने पुछा,  क्या हुआ, तुम्हे ये पसंद नहीं आया क्या?🔵  जी, वो इसमे नमक थोड़ा अधिक पड़ गया है…. रवि अपनी बात कह ही रहा था की अध्यापक मोहदय ने उसे बीच में ही रोकते हुए कहा, ओफ़-ओ, कोई बात नहीं मैं इसे फेंक देता हूँ, अब ये किसी काम की नहीं…🔴  ऐसा कह कर अध्यापक मोहदय गिलास उठा ही रहे थे कि रवि ने उन्हें रोकते हुए कहा, नमक थोड़ा सा अधिक हो गया है तो क्या, हम इसमें थोड़ी और चीनी मिला दें तो ये बिलकुल ठीक हो जाएगा।🔵  बिलकुल ठीक रवि यही तो मैं तुमसे सुनना चाहता था….अब इस स्थिति की तुम अपनी जिन्दगी से तुलना करो, शिकंजी में नमक का ज्यादा होना जिन्दगी में हमारे साथ हुए बुरे अनुभव की तरह है…. और अब इस बात को समझो, शिकंजी का स्वाद ठीक करने के लिए हम उसमे में से नमक नहीं निकाल सकते, इसी तरह हम अपने साथ हो चुकी दुखद घटनाओं को अपने जीवन से अलग नहीं कर सकते, पर जिस तरह हम चीनी डाल कर शिकंजी का स्वाद ठीक कर सकते हैं उसी तरह पुरानी कड़वाहट मिटाने के लिए जिन्दगी में भी अच्छे अनुभवों की मिठास घोलनी पड़ती है।🔴  यदि तुम अपने भूत का ही रोना रोते रहोगे तो ना तुम्हारा वर्तमान सही होगा और ना ही भविष्य उज्जवल हो पायेगा। अध्यापक मोहदय ने अपनी बात पूरी की।🔵  रवि को अब अपनी गलती का एहसास हो चुका था, उसने मन ही मन एक बार फिर अपने जीवन को सही दिशा देने का प्रण लिया।

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 3 Dec 2016


👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 3 Dec 2016


👉 मैं क्या हूँ? What Am I? (भाग 47)

🌞  चौथा अध्याय
🌹  एकता अनुभव करने का अभ्यास

🔴  अपने शारीरिक और मानसिक वस्त्रों के विस्तार की भावना दृढ़ होते ही संसार तुम्हारा और तुम संसार के हो जाओगे। कोई वस्तु विरानी न मालूम पड़ेगी। यह सब मेरा है या मेरा कुछ भी नहीं, इन दोनों वाक्यों में तब तुम्हें कुछ भी अन्तर मालूम न पड़ेगा। वस्त्रों से ऊपर आत्मा को देखो- यह नित्य, अखण्ड, अजर, अमर, अपरिवर्तनशील और एकरस है। वह जड़, अविकसित, नीच प्राणियों, तारागणों, ग्रहों, समस्त ब्रह्माण्डों को प्रसन्नता और आत्मीयता की दृष्टि से देखता है। विराना, घृणा करने योग्य, सताने के लायक या छाती से चिपका रखने के लायक कोई पदार्थ वह नहीं देखता।

🔵  अपने घर और पक्षियों के घोंसले के महत्त्व में उसे तनिक भी अन्तर नहीं दीखता। ऐसी उच्च कक्षा का प्राप्त हो जाना केवल आध्यात्मिक उन्नति और ईश्वर के लिए ही नहीं वरन् संसारिक लाभ के लिए भी आवश्यक है। इस ऊँचे टीले पर खड़ा होकर आदमी संसार का सच्चा स्वरूप देख सकता है और यह जान सकता है कि किस स्थिति में, किससे क्या बर्ताव करना चाहिए? उसे सद्गुणों का पुञ्ज, उचित क्रिया, कुशलता और सदाचार सीखने नहीं पड़ते, वरन् केवल यही चीजें उसके पास शेष रह जाती हैं और वे बुरे स्वभाव न जाने कहाँ विलीन हो जाते हैं, जो जीवन को दुःखमय बनाये रहते हैं।

🔴  यहाँ पहुँचा हुआ स्थित-प्रज्ञ देखता है कि सब अविनाशी आत्माएँ यद्यपि इस समय स्वतंत्र, तेज स्वरूप और गतिवान प्रतीत होती हैं, तथापि उनकी मूल सत्ता एक ही है, विभिन्न घटों में एक ही आकाश भरा हुआ है और अनेक जलपात्रों में एक ही सूर्य का प्रतिबिम्ब झलक रहा है। यद्यपि बालक का शरीर पृथक् है, परन्तु उसका सारा भाग माता-पिता के अंश का ही बना है। आत्मा सत्य है, पर उसकी सत्यता परमेश्वर है। विशुद्ध और मुक्त आत्मा परमात्मा है, अन्त में आकर यहाँ एकता है। वहीं वह स्थिति है, जिस पर खड़े होकर जीव कहता है- 'सोऽहमस्मि' अर्थात् वह परमात्मा मैं हूँ और उसे अनुभूति हो जाती है कि संसार के सम्पूर्ण स्वरूपों के नीचे एक जीवन, एक बल, एक सत्ता, एक असलियत छिपी हुई है।

🌹 अगले अंक में समाप्त
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/mai_kya_hun/part4

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 3 Dec 2016

🔴  उन्नति एवं विकास के लिए स्पर्धा तथा प्रतियोगिता की भावना एक प्रेरक तत्त्व है, किन्तु तब, जब उसमें ईर्ष्या अथवा द्वेष का दोष न आने दिया जाये और जीवन मंच पर अभिनेता की भावना रखी जाये। जलन के वशीभूत होकर दूसरों की टांग खींचने के लिए उनके दोष देखना अथवा निन्दा करना छोड़कर अपने से आगे बढ़े हुओं के उन गुणों की खोज करना और उन्हें अपने में विकसित करने का प्रयत्न करना चाहिए, जिनके बल पर अगला व्यक्ति आगे बढ़ा है।

🔵 रोध, अनुरोध एवं प्रतिरोध जैसे हेय शब्द कर्मवीरों के कोश में नहीं, निकम्मों की जीभ पर ही चढ़े होते हैं।  यदि ऐसा होता तो सिकन्दर विश्व विजयी न होता, सीजर रोम साम्राज्य स्थापित न कर पाता, चाणक्य का ध्येय सफल न होता और एक लँगोटीबंद महात्मा गाँधी भारत में ब्रिटिश हुकूमत का तख्ता न उलट देता। ज्ञान के पिपासु फाह्यान एवं ह्वान्सांग का पथ सिन्धु अवश्य रोक लेता और बौद्ध भिक्षुओं को हिमालय आगे न बढ़ने देता, किन्तु अभियानशील को भला कौन कहाँ रोक पाया है।

🔴  जो अकर्मण्य, आलसी हैं वे अपने से पूछें कि बेकार पड़े खाते रहने से उन्हें कोई सुख है? क्या उनकी आत्मा उन्हें अपनी अकर्मण्यता के लिए नहीं धिक्कारती? क्या कभी उन्हें यह विचार नहीं आता-इस बात की ग्लानि नहीं होती कि जब संसार में और लोग परिश्रम कर रहे हैं-पसीना बहा रहे हैं, तब उनका निठल्ले पड़े रहना मूर्खतापूर्ण बेहयाई ही है और बेहयाई की जिन्दगी बिताना मनुष्यता नहीं।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 22) 3 Dec

🌹 दुष्टता से निपटें तो किस तरह?

🔵  चिकित्सक वही बुद्धिमान माना जाता है जो रोग को मारे किन्तु रोगी को बचा ले। रोग और रोगी को साथ-साथ ही मार डालने का काम तो कोई गंवार ही कर सकता है। किन्तु मनुष्य जीवन असामान्य है, उसमें सृष्टा की सर्वोत्तम कलाकृति का नियोजन हुआ है। हो सकता है कि उसमें कुछ दोष-दुर्गुण किसी कारण घुस पड़ें, पर वह जन्मजात रूप से वैसा नहीं है। प्रकृतितः वह वैसा नहीं है। सृष्टा ने अपनी अनेक विशेषतायें भी दी हैं, ऐसी दशा में किसी को भी पूर्णतया हेय या दुष्ट नहीं माना जा सकता। मनुष्य को दुष्टता के ढांचे में ढालने का कुकृत्य हेय-दर्शन द्वारा ही होता है।

🔴  कुकृत्यों के लिए मूलतः कुविचार ही उत्तरदायी हैं और वे किसी के भी अन्तराल से नहीं निकलते, दूत की तरह बाहर से लगते हैं। संक्रामक रोगों की तरह उनका आक्रमण होता है—इस विपर्यय की यदि समय रहते रोकथाम हो सके तो मनुष्य की मौलिक श्रेष्ठता अक्षुण्ण ही बनी रह सकती है अथवा यदि वह मलेरिया की तरह चढ़ ही दौड़े तो उसे कड़वी कुनैन पिलाने भर से काम चल सकता है। इस अधिक उपयोगी और कारगर प्रक्रिया के रहते उस घृणा का उपयोग क्यों किया जाय जो शीतल जल की तरह विद्वेष को घटाने के काम नहीं आती वरन् ईंधन डालने की तरह आग को और बढ़ाती है।

🔵  कई बार मनुष्य इतना विद्वेषी नहीं होता जितना कि वह घृणा का तिरस्कार सहकर उद्धत हो उठता है और अपेक्षाकृत अधिक बड़ा प्रतिशोध लेने की चेष्टा करता है, जो एक तक ही सीमित न रहकर अनेकों को अपनी चपेट में लेता है। संसार में पहले से ही विद्वेष की कमी नहीं, उसे और अधिक भड़काने की अपेक्षा यह अधिक उपयुक्त है कि रोग को ही मरने दिया जाय। रोगी तो अच्छा होने पर उससे भी अधिक अच्छा सिद्ध हो सकता है जितना कि पिछले दिनों बुरा रह चुका है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 *गृहस्थ-योग (भाग 22) 3 Dec*

🌹  *गृहस्थ योग से परम पद*

🔵  अब दूसरी ओर चलिये किसी आदमी द्वारा भूल से, मजबूरी से, या गैर जानकारी से कोई अनुचित बात हो जाती है और जानकारी होने पर पता चलता है तो उस अनुचित बात के लिये भी क्षमा कर दिया जाता है। अदालतें भी अपराधी की नीयत पर मुख्यतया ध्यान रखती है। यदि अपराधी की नीयत बुरी न साबित हो तो अपराधी को कठोर दंड का भागी नहीं बनना पड़ता।

🔴  जीवन के हर एक काम की अच्छाई, बुराई कर्ता की भावना के अनुरूप होती है जीवन भले ही सादा हो पर यदि विचार उच्च हैं तो जीवन भी उच्च ही माना जायेगा। रुपये-पैसे या काम के बड़े आडम्बर से पुण्यफल का विशेष सम्बन्ध नहीं है। एक अमीर आदमी रुपये के बल से बड़े-बड़े ब्रह्मभोज, पाठ-पूजा, तीर्थ-यात्रा, कथा-पुराण, मन्दिर-मठ, कुआं-बावड़ी, सदावर्त, यज्ञ-हवन आदि की व्यवस्था आसानी से कर सकता है।

🔵  दस लाख रुपया अनुचित रीति से कमा कर दस हजार रुपया इस प्रकार के कार्यों में लगाकर धर्मात्मा बनता है। दूसरी ओर एक गरीब आदमी जो ईमानदारी की मेहनत मजदूरी करता है, वह थोड़े से पैसे कमाता है जिससे कुटुम्ब का भरण-पोषण कठिनाई से हो पाता है बचता कुछ नहीं, ऐसी दशा में वह बेचारा भला ब्रह्मभोज, तीर्थ-यात्रा, यज्ञ अनुष्ठान आदि की व्यवस्था किस प्रकार कर पावेगा? यदि वह नहीं कर पाता है तो क्या वह धर्महीन ही रह जायेगा? क्या दुनिया की भौतिक चीजों की भांति ही पुण्यफल भी रुपयों से ही खरीदा जाता है?

🌹  क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 35)

🌹 सभ्य समाज की स्वस्थ रचना

🔵 49. कंजूसी और विलासिता छूटे— धन का अनावश्यक संग्रह करने और देश के मध्यम स्तर से अधिक ऊंचा रहन-सहन बनाने को निरुत्साहित किया जाना चाहिए। इससे व्यक्तियों में अनेक दोष उत्पन्न होते हैं और सामाजिक स्तर गिरता है। लोग कमावें तो सही पर उसका न्यूनतम उपयोग अपने लिए करके शेष को समाज के लिए लौटा दें। समाज में जब कि अनेक दीन-दुःखी, अभावग्रस्त और पिछड़े हुए व्यक्ति भरे पड़े हैं, अनेकों समस्याएं समाज को परेशान कर रही हैं, इन सब की उपेक्षा करके अपने लिए अनावश्यक संग्रह करते जाना मानवीय आदर्श के प्रतिकूल है।

🔴 सन्तान को सुशिक्षित और सुयोग्य बनाने के लिए प्रयत्न करना उचित है पर उनको बैठे-ठाले, ब्याज भाड़े की कमाई पर निकम्मी जिन्दगी काटने की व्यवस्था सोचना भारी भूल है। इससे सन्तान का अहित होता है। कई व्यक्ति संतान न होने पर अपने धन को लोकहित के कामों में न लगा कर झूठी सन्तान ढूंढ़ते हैं, दूसरों के बच्चों को गोद रख कर बहकावा खड़ा करते हैं और उसी को जमा की हुई पूंजी देते हैं। ऐसी संकीर्णता जब तक बनी रहेगी समाज कभी पनपेगा नहीं।

🔵 कमाई को लोकहित में लगाने का गर्व और गौरव अनुभव कर सकने की प्रवृत्ति को जगाया जाना आवश्यक है। लोग उदार और दानी बनेंगे तो ही सत्प्रवृत्तियों का उत्पन्न होना और बढ़ाना सम्भव होगा। कंजूसी को घृणित पाप और विलासिता को पाषाण हृदयों के योग्य निष्ठुरता माना जाय, ऐसा लोक शिक्षण करना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

प्रभु से प्रार्थना (Kavita)

प्रभु जीवन ज्योति जगादे! घट घट बासी! सभी घटों में, निर्मल गंगाजल हो। हे बलशाही! तन तन में, प्रतिभापित तेरा बल हो।। अहे सच्चिदानन्द! बह...