शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 22) 3 Dec

🌹 दुष्टता से निपटें तो किस तरह?

🔵  चिकित्सक वही बुद्धिमान माना जाता है जो रोग को मारे किन्तु रोगी को बचा ले। रोग और रोगी को साथ-साथ ही मार डालने का काम तो कोई गंवार ही कर सकता है। किन्तु मनुष्य जीवन असामान्य है, उसमें सृष्टा की सर्वोत्तम कलाकृति का नियोजन हुआ है। हो सकता है कि उसमें कुछ दोष-दुर्गुण किसी कारण घुस पड़ें, पर वह जन्मजात रूप से वैसा नहीं है। प्रकृतितः वह वैसा नहीं है। सृष्टा ने अपनी अनेक विशेषतायें भी दी हैं, ऐसी दशा में किसी को भी पूर्णतया हेय या दुष्ट नहीं माना जा सकता। मनुष्य को दुष्टता के ढांचे में ढालने का कुकृत्य हेय-दर्शन द्वारा ही होता है।

🔴  कुकृत्यों के लिए मूलतः कुविचार ही उत्तरदायी हैं और वे किसी के भी अन्तराल से नहीं निकलते, दूत की तरह बाहर से लगते हैं। संक्रामक रोगों की तरह उनका आक्रमण होता है—इस विपर्यय की यदि समय रहते रोकथाम हो सके तो मनुष्य की मौलिक श्रेष्ठता अक्षुण्ण ही बनी रह सकती है अथवा यदि वह मलेरिया की तरह चढ़ ही दौड़े तो उसे कड़वी कुनैन पिलाने भर से काम चल सकता है। इस अधिक उपयोगी और कारगर प्रक्रिया के रहते उस घृणा का उपयोग क्यों किया जाय जो शीतल जल की तरह विद्वेष को घटाने के काम नहीं आती वरन् ईंधन डालने की तरह आग को और बढ़ाती है।

🔵  कई बार मनुष्य इतना विद्वेषी नहीं होता जितना कि वह घृणा का तिरस्कार सहकर उद्धत हो उठता है और अपेक्षाकृत अधिक बड़ा प्रतिशोध लेने की चेष्टा करता है, जो एक तक ही सीमित न रहकर अनेकों को अपनी चपेट में लेता है। संसार में पहले से ही विद्वेष की कमी नहीं, उसे और अधिक भड़काने की अपेक्षा यह अधिक उपयुक्त है कि रोग को ही मरने दिया जाय। रोगी तो अच्छा होने पर उससे भी अधिक अच्छा सिद्ध हो सकता है जितना कि पिछले दिनों बुरा रह चुका है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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