शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 35)

🌹 सभ्य समाज की स्वस्थ रचना

🔵 49. कंजूसी और विलासिता छूटे— धन का अनावश्यक संग्रह करने और देश के मध्यम स्तर से अधिक ऊंचा रहन-सहन बनाने को निरुत्साहित किया जाना चाहिए। इससे व्यक्तियों में अनेक दोष उत्पन्न होते हैं और सामाजिक स्तर गिरता है। लोग कमावें तो सही पर उसका न्यूनतम उपयोग अपने लिए करके शेष को समाज के लिए लौटा दें। समाज में जब कि अनेक दीन-दुःखी, अभावग्रस्त और पिछड़े हुए व्यक्ति भरे पड़े हैं, अनेकों समस्याएं समाज को परेशान कर रही हैं, इन सब की उपेक्षा करके अपने लिए अनावश्यक संग्रह करते जाना मानवीय आदर्श के प्रतिकूल है।

🔴 सन्तान को सुशिक्षित और सुयोग्य बनाने के लिए प्रयत्न करना उचित है पर उनको बैठे-ठाले, ब्याज भाड़े की कमाई पर निकम्मी जिन्दगी काटने की व्यवस्था सोचना भारी भूल है। इससे सन्तान का अहित होता है। कई व्यक्ति संतान न होने पर अपने धन को लोकहित के कामों में न लगा कर झूठी सन्तान ढूंढ़ते हैं, दूसरों के बच्चों को गोद रख कर बहकावा खड़ा करते हैं और उसी को जमा की हुई पूंजी देते हैं। ऐसी संकीर्णता जब तक बनी रहेगी समाज कभी पनपेगा नहीं।

🔵 कमाई को लोकहित में लगाने का गर्व और गौरव अनुभव कर सकने की प्रवृत्ति को जगाया जाना आवश्यक है। लोग उदार और दानी बनेंगे तो ही सत्प्रवृत्तियों का उत्पन्न होना और बढ़ाना सम्भव होगा। कंजूसी को घृणित पाप और विलासिता को पाषाण हृदयों के योग्य निष्ठुरता माना जाय, ऐसा लोक शिक्षण करना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

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👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 44)

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