रविवार, 17 दिसंबर 2017

👉 बूढ़ा पिता


🔷 किसी गाँव में एक बूढ़ा व्यक्ति अपने बेटे और बहु के साथ रहता था। परिवार सुखी संपन्न था किसी तरह की कोई परेशानी नहीं थी । बूढ़ा बाप जो किसी समय अच्छा खासा नौजवान था आज बुढ़ापे से हार गया था, चलते समय लड़खड़ाता था लाठी की जरुरत पड़ने लगी, चेहरा झुर्रियों से भर चूका था बस अपना जीवन किसी तरह व्यतीत कर रहा था।

🔶 घर में एक चीज़ अच्छी थी कि शाम को खाना खाते समय पूरा परिवार एक साथ टेबल पर बैठ कर खाना खाता था। एक दिन ऐसे ही शाम को जब सारे लोग खाना खाने बैठे। बेटा ऑफिस से आया था भूख ज्यादा थी सो जल्दी से खाना खाने बैठ गया और साथ में बहु और एक बेटा भी खाने लगे। बूढ़े हाथ जैसे ही थाली उठाने को हुए थाली हाथ से छिटक गयी थोड़ी दाल टेबल पे गिर गयी। बहु बेटे ने घृणा द्रष्टि से पिता की ओर देखा और फिर से अपना खाने में लग गए।

🔷 बूढ़े पिता ने जैसे ही अपने हिलते हाथों से खाना खाना शुरू किया तो खाना कभी कपड़ों पे गिरता कभी जमीन पर। बहु चिढ़ते हुए कहा – हे राम कितनी गन्दी तरह से खाते हैं मन करता है इनकी थाली किसी अलग कोने में लगवा देते हैं, बेटे ने भी ऐसे सिर हिलाया जैसे पत्नी की बात से सहमत हो। बेटा यह सब मासूमियत से देख रहा था।

🔶 अगले दिन पिता की थाली उस टेबल से हटाकर एक कोने में लगवा दी गयी। पिता की डबडबाती आँखे सब कुछ देखते हुए भी कुछ बोल नहीं पा रहीं थी। बूढ़ा पिता रोज की तरह खाना खाने लगा, खाना कभी इधर गिरता कभी उधर । छोटा बच्चा अपना खाना छोड़कर लगातार अपने दादा की तरफ देख रहा था। माँ ने पूछा क्या हुआ बेटे तुम दादा जी की तरफ क्या देख रहे हो और खाना क्यों नहीं खा रहे। बच्चा बड़ी मासूमियत से बोला – माँ मैं सीख रहा हूँ कि वृद्धों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, जब मैं बड़ा हो जाऊँगा और आप लोग बूढ़े हो जाओगे तो मैं भी आपको इसी तरह कोने में खाना खिलाया करूँगा।

🔷 बच्चे के मुँह से ऐसा सुनते ही बेटे और बहु दोनों काँप उठे शायद बच्चे की बात उनके मन में बैठ गयी थी क्युकी बच्चा ने मासूमियत के साथ एक बहुत बढ़ा सबक दोनों लोगो को दिया था।
बेटे ने जल्दी से आगे बढ़कर पिता को उठाया और वापस टेबल पे खाने के लिए बिठाया और बहु भी भाग कर पानी का गिलास लेकर आई कि पिताजी को कोई तकलीफ ना हो।

🔶 तो मित्रों, माँ बाप इस दुनियाँ की सबसे बड़ी पूँजी हैं आप समाज में कितनी भी इज्जत कमा लें या कितना भी धन इकट्ठा कर लें लेकिन माँ बाप से बड़ा धन इस दुनिया में कोई नहीं है यही इस कहानी की शिक्षा है और मैं आशा करता हूँ मेरा इस कहानी को लिखना जरूर सार्थक होगा।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 18 Dec 2017


👉 धर्म

🔷 अब धर्म भी एक शौकीनों की चीज बनता चला जाता है। घर में तरह के सुसज्जा साध और जी बहलाने वाले उपकरण रहते हैं, उसी तरह धर्म को भी घर के एक कोने में स्थान देने की आवश्यकता समझी जाती है। शौकीनी सुसज्जा में विभिन्न स्तर की वस्तुयें इकट्ठी करना पड़ती हैं, सभ्यता ने धर्म को भी एक ऐसा ही उपकरण समझना आरंभ किया है और कितने ही लोग अपने कई तरह के शोकों में एक शौक धर्म चर्चा का भी सम्मिलित कर लेते हैं।

🔶 यह स्थिति धर्म जैसे जीवन तत्व का उपहास करना है। स्नान घर सजाकर रखने मात्र से स्वच्छता की आवश्यकता पूरी नहीं होती। रसोई घर में आवश्यक वस्तुयें जमा कर देने भर से क्या भूख बुझ सकती है। पलंग भर बिछा रहे तो क्या बिना सोये नींद पूरी हो जायेगी?

🔷 दूसरों की दृष्टी में धर्मात्मा बनकर अपनी आंतरिक अधार्मिकता को छिपाने के लिए आवरण ओढ़ना किस काम का? यदि धर्म के प्रति सचमुच आस्था हो तो उसे न केवल दृष्टिकोण में वरन् क्रिया कलाप में भी समाविष्ट करना चाहिए। अन्यथा यह कम बुरा है कि हम अपना अधार्मिकता को उसी रूप में खुला रहने दें और धार्मिक बनने का दंभ न करें। इससे अधर्म के साथ दंभ को जोड़ने की दुहरी तो न बढ़ेगी।

✍🏻 रविन्द्र नाथ टैगोर
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 11
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1973/January/v1.11

👉 World-Admixture Of Happiness & Misery

🔶 This world has been created with, Sat & Tam, good & bad and auspicious & inauspicious elements. Nobody is either wholly good or wholly bad. Good & bad tendencies arise & subside from time to time. Desirable & undesirable occasions come & go like sun & shade. The sign of wisdom is to think as to which of them should be remembered & which forgotten. If we go on remembering sorrows, scercities, failures and evils done by others, this will pervade with hellish miseries.

🔷 Dejection, disappointment & dissatisfaction will occupy our mind every moment. But if we change our viewpoint & remember loving events, successes, prosperous people & good done by others, it will appear that there may be some scarcity now, but compared to it, pleasant circumstances are more in number. More favourable circumstances are available than unfavorable ones.

🔶 Necessity for comforts is felt to make life happy & peaceful. An effort should be made to get them. It should also not be forgotten that whatever is available should be put to the best use. If we learn the proper use of available means & use everything frugally, make the best use of them. then whatever is available can increase our happiness manifold.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 उच्चस्तरीय अध्यात्म साधना के तीन चरण (भाग 1)

🔶 उच्च स्तरीय साधना के भव पक्ष के तीन चरण है। (1) भजन, (2) मनन, (3) चिंतन। इन तीनों को मिला देने से ही एक समय साधन प्रक्रिया का निर्माण होता है। अन्न, जल और वायु के तीनों अग मिलकर पूर्ण आहार बनता है। इनमें से एक भी कम पड़ जाय तो जीवन यात्रा न चल सकेगी। इसी प्रकार आत्मिक जीवन के लिए भजन, मनन और चिंतन का सूक्ष्म आहार प्रस्तुत करना पड़ता है। अंतःकरण की स्वस्थता, प्रखरता, परिपुष्टता एवं प्रगति इन तीन आधारों पर ही निर्भर है। गायत्री महामंत्र के तीन चरणों की सूक्ष्म प्रेरणा भी इसी त्रिवेणी को कहा जा सकता है।
                  
🔷 सर्वोच्च साधन स्तर अद्वैत स्थिति का है। इसमें प्रवेश किये बिना न तो मनोलय होता है और न ईश्वर प्राप्ति। जब तक ईश्वर से भिन्न अपनी अलग सत्ता बनी रहेगी जब तक अपना विलय परमेश्वर में न होगा तब तक अपूर्णता का प्रथमता का अंत न होगा। लययोग ही समाधि की-मुक्ति की-परम स्थिति तक पहुँचा सकता है।
    
🔶 उच्च स्तरीय ‘भजन’ के लिए शरीर को शिथिल और मन को उदासीन करना पड़ता है। ताकि न शरीर की माँस पेशियों पर कोई तनाव रहे और न मस्तिष्क में कोई आकर्षण उत्तेजना पैदा करे। यह स्थिति कुछ ही दिन के अभ्यास से उपलब्ध हो जाती है। किस  आराम कुर्सी, कोमल बिस्तर या दीवार, पेड़ आदि का सहारा लेकर शरीर को निद्रित एवं मृतक स्थिति जैसा शिथिल कर देना चाहिए। इसे शवासन एवं जैसा शिथिलीकरण मुद्रा कहते हैं। शारीरिक दृष्टि से यह पूर्ण विश्राम है। मानसिक दृष्टि से इसे ध्यान भूमिका कहा जाता है। उत्तेजित तनी हुई नाड़ियाँ एवं माँस पेशियाँ होने पर कभी किसी का ध्यान लग ही नहीं सकता। इसलिए पद्मासन, बद्धपद्मासन जैसे तनाव उत्पन्न करने वाले आसन और किसी प्रयोजन के लिए उपयोगी भले ही हों-ध्यान के लिए बाधक होते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 3
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य 

👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग १)

महत्त्व निर्माण का ही है। उपलब्धियाँ मात्र उसी पर निर्भर हैं। इतना होते हुए भी पहले से ही जड़ जमाकर बैठी हुई अवांछनीयता निरस्त करने पर सृ...