शुक्रवार, 23 मार्च 2018

👉 लालच का सातवां घड़ा

🔷 बात बहुत पुरानी है. भारत के उत्तरी हिस्से में एक धनी व्यापारी रहता था. कई वर्ष पहले उसकी पत्नी का देहांत हो गया था. उसका घर पहाड़ी पे स्थित होने के कारण वो रोज मैदानी भाग में बसे हुए शहर में नीचे जाता और चीज़ों का लेन-देन करता था. एक दिन वह अपना मन बहलाने के लिए कही और जाने की सोचा. पहाड़ों की वादियों और जंगलों का नजारा लेने के लिए निकल पड़ा. घूमते-घूमते दोपहर हो गई थी, वो थक के चूर हो गया था. अब उसे नींद भी आने लगी थी. आराम करने के लिए व्यापारी जगह तलाशने लगा, कि उसे एक छोटी सी गुफा दिखी. जिसमे बहुत अंधेरा था, लेकिन इसकी परवाह करे बिना वो गुफा के अंदर जाके सो गया. जब नींद खुली तो उसने पाया कि गुफा में कुछ है।

🔶 गुफा में कुछ और अंदर जाने पे उसे बहुत बड़ा एक मिट्टी का घड़ा दिखा. वहाँ आस-पास कुछ और भी घड़ें थे. जो कि गिनती में पूरे सात घड़ें थे. व्यापारी को आश्चर्य भी हो रहा था और डर भी लग रहा था. क्योकि कही से ना तो कोई आवाज़ आ रही थी और ना ही उन घड़ों के पास कोई था. बड़ी मुश्किल से डरते-डरते उसने एक घड़ें का ढक्कन खोला और चकित रह गया. उस घड़ें में सोने के सिक्के ही सिक्के थे. फिर एक-एक करके उसने पाँच घड़ों के ढक्कन खोलकर देखे. सभी में स्वर्ण भरा था. छठे घड़ें को खोलने पर उसे एक पुराना सा कागज का टुकड़ा मिला. जिसमे लिखा था – ”इस सोने के सिक्कों को ढूंढने वाले, सतर्क रहना! यह सारे घड़ें और स्वर्ण तुम्हारें है, लेकिन इस धन को एक श्राप है. इन्हें ले जानें वाला उस श्राप से कभी मुक्त भी नही होगा।

🔷 जिज्ञासा में बड़ी ताक़त होती है, पर लालच उससे भी ज़्यादा शक्तिवान होता है. इतने धन की प्राप्ति के बाद व्यापारी ने समय व्यर्थ नही किया. उसने एक बैलगाड़ी की व्यवस्था कि और सभी घड़ों को अपने निवास पे ले जाने लगा. घड़े बहुत भारी थे. एक बार में वो दो घड़ें ही ले जा सकता था. रात के सन्नाटे में उसने छः घड़ें अपने घर ले जाकर रख दिए. सातवें घड़ें को ले जाना उसके लिए आसान था, क्योकि इस बार बोझा काफी कम था।

🔶 घर पहुंच कर व्यापारी ने सोचा पूरे घड़ों के सिक्कों की गिनती कर ली जायें. बारी-बारी उसने छः घड़ों के सिक्कों की गिनती कर ली. सातवें घड़े को खोलने पे उसने पाया कि वो तो आधा ही भरा हुआ है. व्यापारी बहुत दुखी और हताश हुआ. श्राप वाली बात वो भूल चुका था. श्राप की बात कहने वाले उस कागज को उसने बेकार समझ कर कब का फेंक दिया था. व्यापारी के दिल और दिमाग में अब और अधिक लालच पनपनें लगा. उसने सोचा कैसे भी करके इस सातवें घड़ें को भी पूरे धन से भरना है. उसने अधिक से अधिक धन कमाने के लिए एडी-चोटी का पूरा ज़ोर लगा दिया. लेकिन सातवें घड़े में चाहें जितना भी धन डालो, वो हमेशा आधा का आधा ही रहता. सातवें घड़े को भरने के प्रयास में व्यापारी कुछ साल और जिया, फिर एक दिन उसकी मौत हो गई. लेकिन अपने धन का उसे कोई सुख नही मिला. क्योकि वो धन उसके लिए कभी भी पर्याप्त था ही नही।

🔷 क्या उस धनी व्यापारी को अपने जीवनयापन के लिए सच में इतने धन कि आवश्यकता थी. धन कमाना ग़लत नही है. लेकिन उसका सदुपयोग ना करके सिर्फ़ संचय करते रहना बहुत ग़लत है. संचय कि भावना से कमाया हुआ सारा धन ना तो खुद के काम आता है और ना ही किसी अच्छे प्रयोजन में लगता है. इससे तो लालच का दायरा बढ़ता है. जैसे इस कहानी में व्यापारी का लालच चरम सीमा तक पहुंच गया था।

👉 अपने आप का निर्माण

🔷 मित्रो ! आत्मा को, अपने आप का निर्माण कर लेना-नम्बर एक। अपने परिवार का निर्माण कर लेना-नम्बर दो। अपने समाज को प्रगतिशील बनाने के लिए, उन्नतिशील बनाने के लिए कुछ-न-कुछ योगदान देना-नम्बर तीन। तीन काम अगर आप कर पाएँगे, तो आपको समझना चाहिए कि आपने आत्मा की भूख को बुझाने के लिए और आत्मिक जीवन को समुन्नत बनाने के लिए कुछ कदम बढ़ाना शुरु कर दिया, अन्यथा यही कहा जाएगा कि आप शरीर के लिए मरे हैं और शरीर के लिए ही जिए हैं। शरीर ही आप का इष्टदेव है।

🔶 इन्द्रियों के सुख ही तो आपकी आकांक्षा है। वासना तृष्णा ही तो आपको सबसे प्यारे मालूम पड़ते है। शरीर ही सब कुछ नहीं है, शरीर की आकांक्षाएँ ही सब कुछ नहीं है, इन्द्रियाँ ही सब कुछ नहीं है, मन की लिप्सा और लालसा ही सब कुछ नहीं है। कहीं आत्मा भी आपके भीतर है और आत्मा अगर आपके भीतर है, तो आप ये भी विश्वास रखिये कि उसकी भूख और प्यास भी है। आत्मा के अनुदान भी असीम और असंख्य हैं, लेकिन उसके भूख और प्यास भी है। पौधों के द्वारा, पेड़ों के द्वारा हरियाली भी मिलती है, छाया भी मिलती है, पर उनकी अपनी जरूरतें भी तो हैं। आप जरूरत को क्यों भूल जाते हैं? खाद की जरूरत नहीं है? पानी की जरूरत नहीं है? उनकी रखवाली की जरूरत नहीं है? उनकी रखवाली न करेंगे, खाद-पानी नहीं देंगे, तो पेड़ों से और पौधों से क्या आशा करेंगे? इसी तरीके से जीवात्मा का पेड़ और वृक्ष भी अपनी खुराक माँगता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 24 March 2018


👉 मित्रता और उसका निर्वाह

🔷 मित्र को जाने दो। उसकी विदाई पर शोक प्रकट न करो और नहीं सुखद यात्रा को अपने आँसुओं से दुःखद बनाओ। जिसके कारण तुम उसे प्रेम करते थे, वे कुछ विशेष गुण ही थे, कारण दूसरों को तुलना में वह अधिक भाया और सुहाया था। उन गुणों को अधिक अच्छी तरह समझने का अवसर तो वियोग के उपरान्त ही लगेगा। पर्वतारोही की अपेक्षा हिमाच्छादित गिरिशृंखला का दर्शन लाभ वे अधिक अच्छी तरह ले सकते हैं जो किसी दूरवर्ती समतल क्षेत्र में खड़े होकर उस सौंदर्य को निहारते हैं। समीपवर्ती मित्र की अपेक्षा दूरवर्ती अधिक श्रेष्ठ है, क्योंकि एकरस और एकाँगी प्रेम करना केवल उसी से प्रभाव से सम्भव है। निकटवर्ती तो निरन्तर उतार-चढ़ाव उत्पन्न करता रहता है।

🔶 मैत्री मधुरता का उल्लास भरती है, रिक्तता की पूर्ति के लिए उसका उपयोग नहीं हो सकता। रिक्तता भरने के लिए जिनकी अपेक्षा की जाती है वे भोग्य उपकरण है। उनकी आवश्यकता हो सकती है, पर मैत्री नहीं निभ सकती। मित्रता का आनन्द बन सकती। गुणों का स्पर्श आवश्यक नहीं उसके चिन्तन से भी काम चल सकता है। मित्र की उपस्थिति की अपेक्षा मैत्री की उपस्थिति कितनी अधिक सरस होती है, इसे कोई प्रेमी ही जानता है।

🔷 ईश्वर से प्रेम करना इसीलिए संभव है कि वह हम से दूर एवं अप्रत्यक्ष है। यदि वह शरीरधारी की तरह हमारे साथ रहता है उसके साथ मैत्री नहीं हो पाती। उसकी अपेक्षा के अनुरूप हमारे आचरण और हमारी अपेक्षा के अनुरूप उसके आचरण बने रहना कठिन पड़ता, ऐसी दशा में किसी न किसी पक्ष का उभरता असन्तोष मैत्री के आनन्द में गांठें लगाता रहता। यह अच्छा ही है कि ईश्वर हमसे दूर है और उसके गुणों का चिन्तन करते हुए निर्वाध मैत्री सम्बन्ध बनाये रह सकना सम्भव हो सका।

🔶 मैत्री अदृश्य है और व्यवहार दृश्य। मैत्री गुणों पर निर्भर है और व्यवहार उपयोगिता पर। कौन हमारे लिए कितना उपयोगी हो सकता है ? कौन हमारी कितनी आवश्यकताएं पूर्ण कर सकता है, इस आधार पर जिससे भी मित्रता होगी वह उतनी ही उथली रहेगी और उतनी ही क्षणिक अस्थिर रहेगी। यदि किसी ने आजीवन मैत्री निबाहनी हो ता उसका एक ही उपाय है-मित्र की गुण परक विशेषताओं को ध्यान में रखें और सोंचे कि यह सद्गुण परमेश्वर के-परम ज्योति के वे स्फुल्लिंग है जो कभी भी बुझ नहीं सकते। जिनमें मलीनता नहीं आ सकती, उनमें न कभी शिथिलता आवेगी और न न्यूनता दृष्टिगोचर होगी।

🔷 न माता में, न स्त्री में, न सगे भाई में और न पुत्र में ऐसा विश्वास होता है कि जैसा स्वाभाविक मित्र में होता है।

🔶 मित्रता विशुद्ध आध्यात्मिक अनुभूति है जो किसी में उच्च गुणों की स्थापना के आधार पर उदय होती है। जिसे निकृष्ट समझा जायगा, उसकी कारणवश चापलूसी हो सकती है, पर श्रद्धाजन्य मैत्री का उदय नहीं हो सकता। श्रद्धा और मैत्री उत्कृष्टता के देवता की दो भुजाएं हैं। यदि हम किसी से मैत्री करने से पूर्व इस तत्व को समझ लें कि अमुक सद्गुणों के आधार पर व्यक्ति विशेष से प्रेम करना है तो समझना चाहिए कि कि उसके बदल जाने या दूर चले जाने से भी उस शाश्वत अमृत प्रवाह में कोई अन्तर नहीं आवेगा, जो यथार्थ मित्रता के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा रहता है।

🔷 इसलिए तत्वदर्शी कहते हैं कि जाने वालों को जाने दो। उन्हें रोको मत। क्योंकि इससे मित्रता के निर्वाह में कोई अन्तर आने वाला नहीं हैं।

✍🏻 पूज्य पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1975

👉 नारी को विकसित किया जाना आवश्यक है। (भाग 5)

🔷 शरीर के सुख साधन पैसे के बल पर खरीदे जा सकते हैं पर आत्मा को विकसित करने वाले सद्गुण धन के बदले में नहीं मिल सकते। परिजनों की भौतिक समृद्धि के सुखोपभोग के ऐशोआराम के साधन कोई धनी व्यक्ति आसानी से जुटा सकता है पर बालकों पर संस्कार डालने का काम धन खर्च करने मात्र से नहीं हो सकता। यदि इतने में ही परिवार की उन्नति हमने मान रखी हो तो बात दूसरी है पर यदि हमने विकसित व्यक्तित्व का मूल्याँकन किया हो और यह माना हो कि बात की बात में नष्ट हो जाने वाली दौलत की अपेक्षा व्यक्तित्व की प्रतिभा की महत्ता अधिक है तो निश्चय ही उसके लिए वे प्रयत्न करने होंगे जिनसे व्यक्तित्व विकसित होता है। ऐसे प्रयत्नों में सबसे प्रधान, सब में आवश्यक यह है कि नारी के मानसिक संस्थान को प्रबुद्ध किया जाए। इसके लिए उसे एकदम घुटाने वाली पराधीनता से गुण करना होगा। इन बंधनों में रहते, किताबी ज्ञान करा देने जैसे उपायों से न उसे आगे बढ़ाया जा सकता है और न ऊंचा उठाया जा सकता है।

🔶 भविष्य की चिन्ता प्रत्येक व्यक्ति को रहती है। आने वाले कल की निश्चिन्तता के लिये जो कुछ बन पड़ता है सुरक्षात्मक प्रयत्न करते हैं। बीमा व्यवसाय इसी आधार पर टिका हुआ है। हमारा बुढ़ापा शान्तिमय बीते इसके लिये कुछ बचा लेना, जमा कर लेना ही पर्याप्त न होगा वरन् जिन लोगों के साथ जीवन के अंतिम दिन काटने हैं उन्हें सज्जन और सौम्य बना लेना ही वह कार्य होगा जिससे भावी जीवन की शाँति के संबंध में निश्चिन्तता हो सके।

🔷 आज हमारे बच्चे उद्दंडता, अवज्ञा, आलस्य एवं विलासिता की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। यह स्थिति अभिभावकों से लेकर अध्यापकों तक को चिन्तित बनाये हुए है। राष्ट्र का भविष्य जिस भावी पीढ़ी के हाथ में है वह यदि सद्गुणी न हुई तो समाज में बुराइयाँ ही बढ़ेंगी। जिस भ्रष्टाचार का, अनैतिकता का, विलासिता का, स्वार्थता का आज चारों ओर बोलबाला है उसके कारण अवाँछनीय कार्यों की संख्या दिन-दिन बढ़ती जा रही है। यदि यह अभिवृद्धि न रुकी तो उन्नति की अनेक योजनाओं के होते हुए भी भविष्य अन्धकारमय ही रहेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति -दिसंबर 1960 पृष्ठ 28

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1960/December/v1.28

👉 The Spirituality & its Reality. (Part 2)

🔷 BHAGWAN asks, calls for an explanation from everybody and goes on saying only this, ‘‘I have offered you the human life, the most precious item of not only my treasure but of this world also. Give answer how you have expended the same? Give answer, O culprit! Give its answer to me. O accused! Just answer me.’’ BHAGWAN just goes on asking this question. BHAGWAN where on one hand goes on asking, ‘‘what did you give me?’’ we on the other keep demanding from him our dues asking him, ‘‘I have three daughters, where is my son as fourth child? I am earning 250 rupees per month, where is my promotion to 400 rupees per month? I have 80 BIGHA agricultural fields, while it should have been 100 BIGHAs.

🔶 Thus we keep complaining from BHAGWAN that he did not give so and so and in a way we continue to live with a list of have-nots.  Complaints begin to be generated from both the sides. BHAGWAN says, ‘‘you do not give this and that to me.’’ Here we say, ‘‘O BHAGWAN, you did not give me this and that.’’ This state of mind if allowed to be sustained makes in long run our circumstances complex and rigid leading us to live a spoiled life.

🔷 O man! Believe me, BHAGWAN is a particular stream of PARMATMA (a self-regulatory mechanism existing in the universe) and it comes in the form of some help or assistance from some quarter (internal or external). BHAGWAN rushing towards you for your help simply means thoughts of generosity, kindness occupying a seat in your mind and tendencies to help others and offer whatever is possessed to needy ones, occupying a seat in your mind.

📖 From Akhand Jyoti

👉 आत्मावलोकन का सरल उपाय—एकान्तवास (भाग 3)

🔷 यह गुफा प्रवेश है आपका। हमको ऐसा ही करना पड़ा है, जब कभी भी हमारा मन अस्त-व्यस्त हुआ है, तो गुरुदेव ने बुलाया और एक ऐसे स्थान पर रखा, जहाँ हमारे अलावा कोई नहीं था। इससे हमको अपने बारे में विचार करने का मौका मिलता है। आदमी आमतौर से तो दूसरों पर ही विचार करता रहता है। दुकान में क्या हुआ? बेटे का क्या हुआ? बेटी का क्या हुआ? भतीजी का क्या हुआ? दुनिया के जंजाल को तो आदमी बुनता रहता है; पर अपने बारे में कभी विचार नहीं करता। हमको उस एकान्त स्थान में रह कर करके कई बार हिमालय जाना पड़ा, तब हमें कई बार अपने आप में विचार करने का मौका मिला। गुरुदेव का आदेश था कि बाहर की बात पर मत विचार करना, सिर्फ अपनी बात विचार करना और कोई बात मत विचार करना। हमने भी वैसा ही किया। आपको भी ऐसा ही करना पड़ेगा। जब आप यहाँ आए हैं, सिर्फ अपने बारे में विचार करना चाहिए और सब बातों को भूल जाना चाहिए। खासतौर से आप घर की बातों को भूल ही जाएँ।

🔶 घर की बातों को आप जरा भी स्मरण न करें। घर में क्या हो रहा होगा? फायदा हो रहा होगा कि नुकसान हो रहा होगा, बेटी का ब्याह हो रहा होगा, बेटे का ब्याह हो रहा होगा, अमुक बात हो रही होगी, अमुक बीमार पड़ा होगा, इन बातों से आप क्या कर सकते हैं? या तो आप वहाँ जाइये, विवाह-शादी कीजिए; नहीं जा सकते, तो चिन्ता को छोड़िए। आप एकान्त में भी रह रहे हों और एकान्त के फायदे को भी खत्म कर रहे हों—यह सब मत कीजिए।

🔷 आप सबसे पहले अपने मन को अलग कर लीजिए और यह मानकर चलिए कि हम एक महीने के लिए कहीं अलग, विदेश चले गए हैं, बीमार हो गए हैं या कुछ और हो गए हैं। एक महीने अगर आप चिन्ता नहीं करेंगे, तो आपका मन उस दिशा में चलेगा, जहाँ आपको विचार करना चाहिए और आप अगर अपने मन को खाली नहीं करेंगे, जंजाल में ही बनाए रखेंगे, तो आप इस एकान्त साधना में, जिस उद्देश्य के लिए बुलाए गए हैं, आपके लिए पूरा कर सकना सम्भव नहीं होगा। फिर क्या करें? जैसा आपने सुना होगा कि इलाहाबाद में कल्प-साधना के शिविर चलते हैं और वह त्रिवेणी के तट पर माघ के महीने में महीने भर के होते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 70 )

👉 गुरु ही इष्ट है, इष्ट ही गुरु है

🔷 बंगाल में एक सन्त हुए अवधूत तारानाथ, इन्होंने ध्यान की अलग-अलग तकनीकों का विकास किया है। अवधूत तारानाथ महान् योगी होने के साथ उच्चकोटि के तंत्र साधक भी थे। उन्होंने तंत्र एवं योग के मिश्रण से ध्यान साधना पर गम्भीर अन्वेषण किए। उनका कहना था कि एक देवता के सैकड़ों- सहस्रों मंत्र होते हैं। कामना, कल्पना एवं संकल्प की दृष्टि से प्रत्येक मंत्र देवता के स्वरूप एक भिन्न आयाम को प्रकाशित-परिभाषित करता है। इनमें से साधक अपनी साधना के लिए जिस भी मंत्र का चयन करता है, उस मंत्र की प्रकृति के अनुरूप उसमें योग के ऐश्वर्य का विकास होता है।
  
🔶 ध्यान के सम्बन्ध में भी यही यथार्थ है। एक ही देवता के विविध ध्यान होते हैं। जो साधक की अलग-अलग भावनाओं एवं विचारों को मूर्त करते हैं। अवधूत तारानाथ सभी तरह की ध्यान प्रक्रिया में गुरु ध्यान को विशेष महत्ता देते थे। उनका कहना था कि गुरुदेव सर्वदेव, देवीमय हैं। उनके ध्यान से सभी का ध्यान हो जाता है। साधक के जीवन में सारे सुफल आ जाते हैं। उन्होंने स्वयं अपनी साधना इसी विधि से सम्पन्न की। उनका जन्म बंगाल के एक गाँव में हुआ था। जन्म के थोड़े दिनों में ही उनके माता-पिता का देहान्त हो गया। अनाथ बालक बेचारा असहाय की भाँति इधर-उधर भटकने लगा।
  
🔷 तभी उनकी भेंट माँ तारा के परम भक्त वामाखेपा से हुई। वामाखेपा की चेतना सदा माँ में लीन रहती थी। उनकी दृष्टि जब इस बालक पर पड़ी, तो उन्होंने इसे माँ की शरण में जाने की सलाह दी। पर इस अनाथ बालक को अपना सब कुछ इन्हीं में नजर आया। उन्होंने बड़े ही सरल भाव से कहा- बाबा, आपके लिए सब कुछ माँ हैं। पर मेरे लिए मेरे सब कुछ आप हैं। मैं आपकी ही शरण में आऊँगा। बालक की इन भोली बातों पर वामाखेपा हँस दिए। पर उस बालक ने वामाखेपा को अपना गुरुदेव एवं इष्ट सब कुछ मान लिया।
  
🔶 माँ तारा के मन्दिर से थोड़ी दूरी पर उसने अपनी साधना प्रारम्भ कर दी। गुरु का ध्यान, उनका चिन्तन एवं गुरु की सेवा। कर्म, विचार व भावनाओं का प्रवाह नित्य निरन्तर सद्गुरु की दिशा में बह चला। वृत्तियाँ गुरुदेव में तदाकार होने लगीं। एक कार्तिक पूर्णिमा की रात्रि को जब आकाश में पूर्णचन्द्र उदित था, अवधूत तारानाथ के अन्तर्गगन में भी पूर्णिमा का चन्द्र उदित हो गया। स्वयं वामाखेपा उसके अन्तराकाश में हँस रहे थे। उनकी परावाणी के स्वर अवधूत तारानाथ के कण-कण में समा रहे थे- बेटा! गुरु ही इष्ट है, इष्ट ही गुरु है। गुरु के ध्यान से सब कुछ मिल जाता है। यही सच है। सद्गुरु की यह कृपा अवधूत तारानाथ के जीवन में घनीभूत हो गयी। उन्हें अपनी गुरु-भक्ति से साधना जीवन का सार मिल गया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 112

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 23 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 23 March 2018

👉 यह भी नहीं रहने वाला 🙏🌹

एक साधु देश में यात्रा के लिए पैदल निकला हुआ था। एक बार रात हो जाने पर वह एक गाँव में आनंद नाम के व्यक्ति के दरवाजे पर रुका। आनंद ने साध...