गुरुवार, 18 जून 2020

👉 नालायक

देर रात अचानक ही उनकी तबियत बिगड़ गयी। आहट पाते ही नालायक उनके सामने था। माँ ड्राईवर बुलाने की बात हुई, पर उसने सोचा अब इतनी रात को इतना जल्दी ड्राईवर कहाँ आ पायेगा?? यह कहते हुये उसने सहज जिद और अपने मजबूत कंधो के सहारे बाऊजी को कार में बिठाया और तेज़ी से हॉस्पिटल की ओर भागा।

बाउजी दर्द से कराहने के साथ ही उसे डांट भी रहे थे "धीरे चला नालायक, एक काम जो इससे ठीक से हो जाए।"

नालायक बोला
"आप ज्यादा बातें ना करें बाउजी, बस तेज़ साँसें लेते रहिये, हम हॉस्पिटल पहुँचने वाले हैं।" अस्पताल पहुँचकर उन्हे डाक्टरों की निगरानी में सौंप,वो बाहर चहलकदमी करने लगा, बचपन से आज तक अपने लिये वो नालायक ही सुनते आया था। उसने भी कहीं न कहीं अपने मन में यह स्वीकार कर लिया था की उसका नाम ही शायद नालायक ही हैं।

तभी तो स्कूल के समय से ही घर के लगभग सब लोग कहते थे की नालायक फिर से फेल हो गया। नालायक को अपने यहाँ कोई चपरासी भी ना रखे। कोई बेवकूफ ही इस नालायक को अपनी बेटी देगा।

शादी होने के बाद भी वक्त बेवक्त सब कहते रहते हैं की इस बेचारी के भाग्य फूटें थे जो इस नालायक के पल्ले पड़ गयी। हाँ बस एक माँ ही हैं जिसने उसके असल नाम को अब तक जीवित रखा है, पर आज अगर उसके बाउजी को कुछ हो गया तो शायद वे भी..

इस ख़याल के आते ही उसकी आँखे छलक गयी और वो उनके लिये हॉस्पिटल में बने एक मंदिर में प्रार्थना में डूब गया। प्रार्थना में शक्ति थी या समस्या मामूली, डाक्टरों ने सुबह सुबह ही बाऊजी को घर जाने की अनुमति दे दी।

घर लौटकर उनके कमरे में छोड़ते हुये बाऊजी एक बार फिर चीखें, "छोड़ नालायक ! तुझे तो लगा होगा कि बूढ़ा अब लौटेगा ही नहीं।"

उदास वो उस कमरे से निकला, तो माँ से अब रहा नहीं गया, "इतना सब तो करता है, बावजूद इसके आपके लिये वो नालायक ही है ???

विवेक और विशाल दोनो अभी तक सोये हुए हैं उन्हें तो अंदाजा तक नही हैं की रात को क्या हुआ होगा .....बहुओं ने भी शायद उन्हें बताना उचित नही समझा होगा ।

यह बिना आवाज दिये आ गया और किसी को भी परेशान नही किया भगवान न करे कल को कुछ अनहोनी हो जाती तो ?????

और आप हैं की ????

उसे शर्मिंदा करने और डांटने का एक भी मौका नही छोड़ते।

कहते कहते माँ रोने लगी थी

इस बार बाऊजी ने आश्चर्य भरी नजरों से उनकी ओर देखा और फिर नज़रें नीची करली माँ रोते रोते बोल रही थी अरे, क्या कमी है हमारे बेटे में ?????

हाँ मानती हूँ पढाई में थोङा कमजोर था ....
तो क्या ????
क्या सभी होशियार ही होते हैं ??

वो अपना परिवार, हम दोनों को, घर-मकान, पुश्तैनी कारोबार, रिश्तेदार और रिश्तेदारी सब कुछ तो बखूबी सम्भाल रहा है जबकि बाकी दोनों जिन्हें आप लायक समझते हैं वो बेटे सिर्फ अपने बीबी और बच्चों के अलावा ज्यादा से ज्यादा अपने ससुराल का ध्यान रखते हैं ।

कभी पुछा आपसे की आपकी तबियत कैसी हैं ??????

और आप हैं की ....

बाऊजी बोले सरला तुम भी मेरी भावना नही समझ पाई ????

मेरे शब्द ही पकङे न ??

क्या तुझे भी यहीं लगता हैं की इतना सब के होने बाद भी इसे बेटा कह के नहीं बुला पाने का, गले से नहीं लगा पाने का दुःख तो मुझे नही हैं ?? क्या मेरा दिल पत्थर का हैं ??
हाँ सरला सच कहूँ दुःख तो मुझे भी होता ही है, पर उससे भी अधिक डर लगता है कि कहीं ये भी उनकी ही तरह लायक ना बन जाये।

इसलिए मैं इसे इसकी पूर्णताः का अहसास इसे अपने जीते जी तो कभी नही होने दूगाँ ....

माँ चौंक गई .....

ये क्या कह रहे हैं आप ???

हाँ सरला ...यहीं सच हैं

अब तुम चाहो तो इसे मेरा स्वार्थ ही कह लो। "कहते हुये उन्होंने रोते हुए नजरे नीची किये हुए अपने हाथ माँ की तरफ जोड़ दिये जिसे माँ ने झट से अपनी हथेलियों में भर लिया।

और कहा अरे ...अरे ये आप क्या कर रहे हैं
मुझे क्यो पाप का भागी बना रहे हैं ।
मेरी ही गलती हैं मैं आपको इतने वर्षों में भी पूरी तरह नही समझ पाई ......

और दूसरी ओर दरवाज़े पर वह नालायक खड़ा खङा यह सारी बातचीत सुन रहा था वो भी आंसुओं में तरबतर हो गया था।

उसके मन में आया की दौड़ कर अपने बाऊजी के गले से लग जाये पर ऐसा करते ही उसके बाऊजी झेंप जाते, यह सोच कर वो अपने कमरे की ओर दौड़ गया।

कमरे तक पहुँचा भी नही था की बाऊजी की आवाज कानों में पङी..

अरे नालायक .....वो दवाईयाँ कहा रख दी
गाड़ी में ही छोड़ दी क्या ??????

कितना भी समझा दो इससे एक काम भी ठीक से नही होता ....

नालायक झट पट आँसू पौछते हुये गाड़ी से दवाईयाँ निकाल कर बाऊजी के कमरे की तरफ दौङ गया।

👉 नारी सम्बन्धी अतिवाद को अब तो विराम दें (अंतिम भाग)

काम का अर्थ विनोद, उल्लास और आनन्द है। मैथुन को ही काम नहीं कहते। काम क्षेत्र की परिधि में वह भी एक बहुत ही छोटा और नगण्य सा माध्यम हो सकता है, पर वह कोई निरन्तर की वस्तु तो है नहीं। यदा- कदा ही उसकी उपयोगिता होती है। इसलिए मैथुन को एक कोने पर रखकर उपेक्षणीय मानकर भी काम लाभ किया जाता है। स्नेह, सद्भाव, विनोद, उल्लास की उच्च स्तरीय अभिव्यक्तियाँ जिस परिधि में आती हैं उसे आध्यात्मिक काम कह सकते हैं।
 
नर- नारी के बीच व्यापक सद्भाव सहयोग की, सम्पर्क की स्थिति में ही व्यक्ति और समाज का विकास सम्भव है। उससे हानि रत्ती भर भी नहीं। स्मरण रखा जाय पाप या व्यभिचार का सृजन सम्पर्क से नहीं दुर्बुद्धि से होता है। पुरुष डाक्टर नारी के प्रजनन अवयवों तक का आवश्यकतानुसार आपरेशन करते है। उसमें न पाप है, न अश्लील, न अनर्थ। रेलगाड़ी की भीड़ में नर- नारियों के शरीर चिपके रहते हैं। जहाँ पाप वृत्ति न हो वहाँ शरीर का स्पर्श दूषित कैसे होगा? हम अपनी युवा पुत्री के शिर और पीठ पर स्नेह का हाथ फिराते है तो पाप कहाँ लगता है। सान्निध्य पाप नहीं है। पाप तो एक अलग ही छूत की बीमारी है जो तस्वीरें देखकर भी चित्त को उद्विग्न कर सकने में समर्थ है। इलाज इस बीमारी का किया जाना चाहिए। हमारी कुत्सा का दण्ड बेचारी नारी को भुगतना पड़े, यह सरासर अन्याय है। इस अनीति को जब तक बरता जाता रहेगा, नारी की स्थिति दयनीय ही बनी रहेगी और इस पाप का फल व्यक्ति और समाज को असंख्य अभिशापों के रूप में बराबर भुगतना पड़ेगा।
 
भगवान वह शुभ दिन जल्दी ही लाये जब नर- नारी स्नेह सहयोग की तरह, मित्र और सखा की तरह एक दूसरे के पूरक बनकर सरल स्वाभाविक नागरिकता का आनन्द लेते हुए जीवनयापन कर सकने की मनःस्थिति प्राप्त कर लें। हम विकारों को रोके, सान्निध्य को नहीं। सान्निध्य रोककर विकारों पर नियन्त्रण पा सकना सम्भव नहीं है। इसलिए हमें उन स्रोतों को बन्द करना पड़ेगा, जो विकारों और व्यभिचार को भड़काने में उत्तरदायी हैं। अग्नि और सोम, प्राण और रयि, ऋण और धन विद्युत प्रवाहों का समन्वय इस सृष्टि के संचरण और उल्लास को अग्रगामी बनाता चला आ रहा है। नर- नारी का सौम्य सम्पर्क बढ़ाकर हमें खोना कुछ नहीं पाना अपार है।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 A Simple Sadhana of Gyana Yoga

Good name and fame, power, prosperity, high qualification, talents, reputed status, are regarded as measures of achievements in worldly life. These are all fruits of the tree of knowledge. You can’t earn worldly success or excel without knowledge – be that in the form of awareness, information, education, skilled training, sane experience, or inner Light. Dissemination of knowledge for the enlightened welfare of others is the highest kind of donation. Feeding a needy with few meals would serve only temporary help; the lasting help would be to give him the light, show the path that will lead to his self-dependence and respectful future.

A disease might be treated by a medicine prescribed by a doctor. But one can’t survive on medicine or tonics all the time for vigorous health. If you want to sustain good health, you will have to have and use the knowledge of preventive care and maintaining stamina etc. Only the spark of knowledge could uproot avarice, desperation, tension, apprehension, sorrow, and other mental weaknesses and psychological complaints, which make our lives burdensome.

All the prosperity and might of the world together cannot control these 10 complexities; rather they tend to augment the vices and worries in the absence of proper knowledge. True knowledge alone is the key to peace and happiness in this life and the life beyond. This alone enables evolution of an ordinary mortal being into great personalities. There is no better alms, no better gift then knowledge.

📖 Akhand Jyoti, May. 1944

👉 आत्म-निर्माण का पुण्य-पथ (भाग १)

आज साधना का अर्थ केवल भजन-पूजन समझा जाता है और किसी देवी देवता से कुछ सिद्धि वरदान प्राप्त करना या परलोक में स्वर्ग मुक्ति का अधिकारी बनना उसका उद्देश्य माना जाता है। साधना के अन्तर्गत यह बात भी आती है, पर उसका क्षेत्र इतना ही नहीं— इससे कहीं अधिक विस्तृत है। भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही क्षेत्रों की उन्नति एवं सुव्यवस्था का साधना से सीधा सम्बन्ध है। मनुष्य का शारीरिक पुरुषार्थ पशुओं के पुरुषार्थ से भी घटिया दर्जे का है। उसकी विशेषता तो बौद्धिक एवं आध्यात्मिक ही है। इसी बल के आधार पर वह सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी बन सका है। इसी के उत्कर्ष एवं पतन पर उसका वर्तमान एवं भविष्य निर्भर रहता है।

साधना से हमारे अन्तःप्रदेश का ऐसा शोधन, परिष्कार एवं अभिवर्धन होता है जिसके फलस्वरूप सर्वतोमुखी उन्नति का द्वार खुले और जो विघ्न बाधाएं प्रगति का मार्ग रोकते हैं उन्हें हटाया जा सके? पिछले पृष्ठों पर लौकिक समस्याओं के सुलझाने में साधना किस प्रकार सहायक होती है इस तथ्य पर कुछ प्रकाश डाला गया है।

स्वाध्याय और सत्संग, चिन्तन और मनन यह चारों उपाय अपनी अन्तःभूमि के निरीक्षण परीक्षण करने, त्रुटियों एवं दोषों को समझने तथा कुविचारों को त्याग कर सत्प्रवृत्तियां अपनाने के हैं। यह चार उपाय भी साधना के ही अंग हैं। जीवन समस्याओं को सुलझाने में सहायक सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय करना हर विचारशील धर्मप्रेमी व्यक्ति का एक दैनिक नित्य कर्म होना चाहिये। आज किन्हीं पौराणिक कथा ग्रन्थों या हजारों लाखों वर्ष पूर्व की स्थिति के अनुरूप मार्ग दर्शन करने वाले संस्कृत ग्रन्थों का बार-बार पढ़ना ही स्वाध्याय माना जाता है। यह मान्यता अस्वाभाविक है। आज हमें ऐसी पुस्तकों के स्वाध्याय की आवश्यकता है जो वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप जीवन के सर्वांगीण विकास में सहायक हो सकें। प्रत्येक युग में सामयिक ऋषि उत्पन्न होते हैं और वे देश काल पात्र के अनुरूप जन शिक्षण करते हैं। आज के युग में गांधी, विनोवा, दयानन्द, विवेकानन्द, रामकृष्ण, परमहंस, तुकाराम, कबीर आदि सन्तों का साहित्य जीवन निर्माण की दिशा में बहुत सहायक हो सकता है। आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण एवं आत्म-विकास का जो विवेचनात्मक सत्साहित्य मिल सके, हमें नित्य नियमित रूप से पढ़ते रहना चाहिए। स्वाध्याय की दैनिक आदत इतनी आवश्यक है कि उसकी उपेक्षा करने से आत्मिक प्रगति के मार्ग में प्रायः अवरोध ही पैदा हो जाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1961 पृष्ठ 9
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1961/August/v1.9