बुधवार, 12 अप्रैल 2017

👉 आज का सद्चिंतन 13 April 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 April 2017


👉 Awaken Your Indwelling Divinity

🔴 All sub-human life forms are born with specific instincts and usually live within its confines right till the end. The Creator has endowed only the human species with the faculty of freewill, based in the shadowy ego-self. Man has mostly used this freewill for exploitation of other life-forms and disturbance of the harmonies of Nature, instead of nurturing them, ignoring the nudgings of his soul, which is latent within him and is a spark of the Supreme Soul. All the potentialities and all the light of the individual soul are just reflections of the Supreme Soul.

🔵 All the divine powers exist within the Supreme Soul. When Agni Dev gets awakened hunger is felt, Varun Dev generates thirst for water. To each divine power, a direction and a task are well assigned. To ensure that these divine powers do not work at cross-purposes a proper control and balance is maintained by the Supreme Soul which has merged Itself into the creation in the form of individualized souls in the evolutionary process of consciousness.

🔴 It is thus that the fascinating, extraordinary human life came into existence in the universe. From then on till date man has been like a living laboratory, exercising his freewill for ill or good. Whenever he commits mistakes he gets punished, and when he performs good deeds he is rewarded and given greater responsibilities. Misdeeds result in sorrow, good deeds like benevolence and righteousness result in happiness. This is the principle of ‘Karma’ – ‘As you sow so shall you reap.’

🌹 ~Pandit Shriram Sharma Acharya

👉 क्रोध को कैसे जीता जाय? (अन्तिम भाग)

🔴 ‘क्रोध’ की उत्पत्ति संकीर्ण हृदय में होती है। जिसके विचार इतने संकुचित हैं कि वह अपने दृष्टिकोण को छोड़ कर दूसरों के विचारों के प्रति आदर नहीं रखता, वह पग-पग पर क्रोध करता चलता है। इसी तरह रूढ़िवादिता भी क्रोध की जड़ है। किसी धर्म के प्रति किसी रीति या परम्परा के प्रति आस्था रखना बुरी बात नहीं है, पर किसी अपने से भिन्न विचारों के प्रति, घृणा करना बुरी बात है। बहुत से वृद्ध, नौजवानों से इसीलिए क्रोधित हो जाते हैं कि नये ढंग से कपड़े पहनते हैं, पुराने रीति-रिवाजों को नहीं मानते। यह ठीक है कि बहुत सी बातें आधुनिक जीवन प्रणाली में बुरी भी हैं, पर हमें यह न भूल जाना चाहिए कि समय बदला करता है, जिस संस्कृति के आप पक्षपाती हैं, किसी समय में वह भी इसी तरह नयी रही होगी। मनुष्य को हमेशा प्रगतिशील होना चाहिए। परिवर्तनों और नवीन व्यवस्थाओं से घृणा या क्रोध करके कोई लाभ नहीं होता है। समय बदलता ही है, इस पर ध्यान रखने से क्रोध नहीं आ सकता।

🔵 क्रोध पर विजय प्राप्त करने का सबसे उत्तम उपाय है, अपने में न्याय की प्रवृत्ति का पैदा कर लेना। मनुष्य के अनेक कार्य उनमें से किसी की हानि या अपकार या अपराध कर डालने वाले काम उसके खुद के द्वारा नहीं होते। कभी-2 परिस्थितियाँ ऐसी आ जाती हैं कि मनुष्य ऐसे काम करने को मजबूर हो जाता है। ऐसे कामों में आत्म-हत्या, चोरी, व्यभिचार, डाका और कत्ल जैसे जघन्य अपराध भी शामिल हैं। यद्यपि यह ठीक है कि कुछ ऐसे मनुष्य भी हैं जो जान बूझ कर ऐसे अपराध करते हैं परन्तु उनकी संख्या अधिक नहीं है। अधिकतर मनुष्य ऐसे गुरु अपराध भावावेश या परिस्थितियों के कारण कर डालते हैं। अब मनोवैज्ञानिक खोजों के आधार पर यह बात सिद्ध भी हो गई है। 

🔴 इसलिए जेलखानों में अपराधियों की मानसिक स्थिति को समझना और उनका सुधार करना राज्य का एक कर्त्तव्य बन गया है। इसी सत्य का पालन हम अपने व्यक्तिगत जीवन में कर सकते हैं यदि किसी मित्र, सम्बन्धी या पास पड़ोसी ने अपमान या अपकार भी कर डाला हो, तो हमें उसके प्रति न्याय करना चाहिए और वह न्याय कैसे हो? यदि हम अपने को अपराधी की परिस्थितियों में रख दें और सोचें कि उन अमुक परिस्थितियों में हम क्या करते? तो यह समझ में आ जायगा कि हमारा भी काम शायद वैसा ही होता जैसा कि अपराधी कर चुका है। बस यह विचार आते ही अपराधी के प्रति क्रोध न आकर इसमें सहानुभूति पैदा हो जाती है और क्षमा भाव जाग्रत हो उठता है।

🌹 अखण्ड ज्योति- जून 1949 पृष्ठ 10

👉 आत्मचिंतन के क्षण 13 April

🔴 बुद्धिमान उन्हें कहते हैं जो उचित और अनुचित का सही निर्णय कर सकें। ऐसी प्रखर बुद्धि को मेधा, प्रज्ञा एवं विवेक कहते हैं। जिन्हें यह प्राप्त है, वे सच्चे अर्थों में कहे जाने वाले बुद्धिमान भगवान तक सरलता पूर्वक पहुँच जाते हैं। अन्यथा वासना युक्त मन की तरह अन्धानुकरण करने वाली, बहुमत को ही सब कुछ मानने वाली बुद्धि ही एक खाई खन्दक है। ऐसे लोग बुद्धिमान कहलाते हुए भी वस्तुतः होते मूर्ख ही हैं।

🔵 कुमार्ग पर चलकर तुरन्त लाभ उठाने वालों की ही संसार में भरमार है। बस, वे ही सब कुछ दीखते हैं। वे ही गवाह हैं, जिनके आधार पर बुद्धि फैसला करती है। अपनी भ्रमग्रस्त बुद्धि झूठे गवाहों की उपस्थिति में वैसा ही निर्णय भी लेती है अन्धी भेड़ें एक के पीछे एक चलती हैं और खड्डे में गिरती जाती हैं। यही स्थिति अपनी बुद्धि की भी है। स्वतन्त्र बुद्धि से विवेक पूर्ण निर्णय लेने वाले और जो उचित है, उसी को अपनाने वाले इस दुनिया में कम ही हैं, जिन्हें आत्मा और परमात्मा दो की गवाहियाँ ही पर्याप्त होती हैं।

🔴 कामनाग्रस्त मन और भ्रमग्रस्त बुद्धि जिन्हें मिली है, वे इन्हीं दो जाल-जंजालों में उलझे-फँसे रहकर चिड़िया, मछली, हिरन की तरह अपनी दुर्गति कराते रहते हैं। वैसी ही दुर्गति मलीन मन और दुर्बुद्धिग्रस्तों की होती है। इन दोनों को भगवान के बारे में सही सोचने का अवसर तक नहीं मिलता, फिर उसकी उपलब्धि कैसे हो? वे पूजा-पत्री, उपहार, मनुहार के खेल-खिलवाड़ करके भगवान को बहकाने-फुसलाने का प्रयत्न करते रहते हैं और उस विडम्बना को करते रहने पर भी खाली हाथ रहते हैं।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 6)

🌹 समय का सदुपयोग करिये, यह अमूल्य है

🔴 मनुष्य जीवन में रुपये-पैसों से भी अधिक महत्त्व समय का है। धन का अपव्यय निर्धन बनाता है किन्तु जिन्होंने समय का सदुपयोग करना नहीं सीखा और उसे आलस्य तथा प्रमाद में गंवाते रहे उनके सामने आर्थिक विषमता के अतिरिक्त नैतिक तथा सामाजिक बुराइयां और कठिनाइयां खड़ी हो जाती हैं। समय का उपयोग धन के उपयोग से कहीं अधिक विचारणीय है, क्योंकि उस पर मनुष्य की सुख-सुविधा के सभी पहलू अवलम्बित हैं। इसलिये हमें अर्थ-अनुशासन के साथ-साथ नियमित जीवन जीने का प्रशिक्षण भी प्राप्त करना चाहिए।

🔵 जो समय व्यर्थ में ही खो दिया गया, उसमें यदि कमाया जाता तो अर्थ प्राप्ति होती। स्वाध्याय या सत्संग में लगाते तो विचार और सन्मार्ग की प्रेरणा मिलती। कुछ न करते केवल नियमित दिनचर्या में ही लगे रहते तो इस क्रियाशीलता के कारण अपना स्वास्थ्य तो भला-चंगा रहता। समय के अपव्यय से मनुष्य की शक्ति और सामर्थ्य ही घटती है। कहना न होगा कि नष्ट किया हुआ वक्त मनुष्य को भी नष्ट कर डालता है।

🔴 संसार का काल-चक्र भी कभी अनियमित नहीं होता, लोक और दिक्पाल, पृथ्वी और सूर्य, चन्द्र और अन्य ग्रह वक्त की गति से गतिमान् हैं। वक्त की अनियमितता होने से सृष्टि का कोई काम चलता नहीं। धरती में यही नियम लागू है। लोग समय का अनुशासन न रखें तो रेल, डाक, कल-कारखाने, कृषि, कमाई आदि सभी ठप्प पड़ जायें और उत्पादन व्यवस्था में गतिरोध के साथ सामान्य जीवन पर भी उसका कुप्रभाव पड़े। एक तरह से सारी सामाजिक व्यवस्था उथल-पुथल हो जाय और मनुष्य को एक मिनट भी सुविधापूर्वक जीना मुश्किल हो जाय। जिस तरह अभी लोग भली प्रकार सारे क्रिया कलाप कर रहे हैं वैसे कदापि नहीं हो सकते। अतः हमको भी अपनी दिनचर्या को अपने जीवन कार्यों की आवश्यकता विभक्त करके उसी के अनुसार कार्य करना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 34)

🌹 बड़े प्रयोजन के लिये प्रतिभावानों की आवश्यकता

🔵 वर्षा आती है तो हरीतिमा अनायास ही सर्वत्र उभर पड़ती है। वसंत आता है तो हर पेड़-पौधे पर फूलों की शोभा निखरती है। समझना चाहिये कि नवसृजन की इस पुण्यवेला में तनिक-सी गरमी पाते ही मलाई दूध के ऊपर आकर तैरने लगेगी। नवयुग का चमत्कार अरुणोदय की तरह यह दृष्टिकोण उभारेगा कि लोग अपने निर्वाह के प्रति स्वल्प संतोषी दृष्टिकोण अपनाएँगे और युगधर्म की बहुमुखी आवश्यकताएँ पूरी करने के लिये इस प्रकार जुट पड़ेंगे, मानों इसी एक काम के लिये उनका सृजन-अवतरण हुुआ हो। अप्रत्याशित को निर्झर की तरह जमीन फोड़कर उभर पडऩा उसी को कहा जाएगा जो अगले दिनों होने जा रहा है।

🔴 समय अपनी गति से चलता और बदलता है, पर जब कभी आकस्मिक परिवर्तन दीख पड़े तो समझना चाहिये कि संध्याकाल जैसा परिवर्तन-पर्व निकट है। उसमें बहुत कुछ बदलना है, पर बदलाव की प्रथम किरण जहाँ से दृष्टिगोचर होगी, उसे प्रखर प्रतिभाओं का अभिनव उद्भव कहा जा सकेगा। भगवान् मनुष्य के रूप में परिवर्तित होंगे और उनकी निजी गतिविधियों का परिवर्तन विश्वपरिवर्तन की भूमिका बनकर और व्यापक बनता चला जाएगा।                       

🔵 योजना, प्रेरणा, दक्षता, व्यवस्था और समर्थता तो भगवान् की काम करेगी, किंतु श्रेय वे लोग प्राप्त करेंगे, जिनकी अंतरात्मा में युग के अनुरूप श्रद्धा और लगन जग पाई है। मुरगा जगकर अपने जागने की सूचना देता है, पर उसकी बाँग को सुनकर असंख्यों को ब्रह्ममुहूर्त की सूचना मिलती है और वे भी अरुणोदयवेला का लाभ लेने के लिए कार्यक्षेत्र में कदम उठाते हुए अगले दिनों दृष्टिगोचर होंगे।   

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रेतात्माओं का किया गया दीक्षा संस्कार

🔴 पहले मैं पुनर्जन्म में तो विश्वास करता था पर प्रेत योनि (भूत, पिशाच आदि) पर मेरा जरा भी विश्वास नहीं था। एक दिन प्रसिद्ध लेखक बी.डी. ऋषि की पुस्तक ‘परलोकवाद’ मेरे हाथ लगी। 
       
🔵 उसे पढ़कर कई तरह की जिज्ञासाओं ने मुझे घेर लिया-परलोक में हमारी ही तरह लोग कैसे रहते हैं? क्या करते हैं? उन्हें भूख-प्यास लगती है या नहीं? आदि, आदि।
  
🔴 १९७२ में पूर्व रेलवे जमालपुर (मुंगेर) वर्कशॉप में नौकरी के रूप में गुरुदेव का आशीर्वाद मुझे हाथों-हाथ मिल चुका था। एक दिन वर्कशाप में ही भोजन के समय विभाग के वरीय अभियंता श्री राम नरेश मिश्र ने भूत-प्रेत आदि की बातें छेड़ दीं। मैंने हल्की अरुचि के स्वर में कहा-मैं इन बातों पर विश्वास नहीं करता। मिश्रा जी ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया-तुम मानो या न मानो, मेरे जीवन में तो यह घटित हुआ है। आज मैं तुम लोगों को अपने जीवन में घटी वह सच्ची घटना सुनाता हूँ।
    
🔵 उनकी इस बात पर सबके कान खड़े हो गए। मिश्रा जी ने आप बीती सुनाते हुए कहा-‘‘आज से बीस साल पहले की बात है। मेरी शादी हो गई थी। उसके कुछ ही दिनों बाद मेरी भेंट एक प्रेतात्मा से हो गई, और यह मुलाकात धीरे-धीरे सघन सम्पर्क में बदल गई।
  
🔴 वह रोज रात में आकर मुझसे भेंट करती और तरह-तरह की बातें भी करती थी। कभी पैरों में लाल रंग लगा देती तो कभी कुछ और तो कभी कुछ और तरह के क्रिया कलाप होने लगते।’’
  
🔵 मिश्र जी रेलवे के अच्छे पद पर कार्यरत थे। मुझसे उम्र में भी बड़े थे, इसलिए मैं उन्हें भैया जी कहा करता था। वे एक गंभीर प्रकृति के व्यक्ति थे। इसलिए उनकी बातों को हल्केपन से लेना मेरे लिए संभव नहीं था।
  
🔴 कई घटनाएँ उन्होंने इतने जीवन्त रूप में सामने रखीं कि भूत-प्रेत के अस्तित्व को लेकर मेरी जिज्ञासा दोहरी हो गई थी। उनकी बताई ढेर सारी बातों में मुझे सबसे अधिक आश्चर्य इस बात पर हुआ कि वह थी तो एक मुस्लिम परिवार की प्रेतात्मा लेकिन अपना नाम शांति बताती थी।
  
🔵 दूसरे दिन जब मिश्रा जी आए, तो घबराए हुए थे। सीधे सेक्शन में आकर मेरे पास बैठ गए और कहा-विजय जी, वह २० साल बाद आज रात में फिर से आ गई। मैं तो तबाह हो जाऊँगा। अब मैं एक बाल बच्चेदार आदमी हो गया हूँ।
         
🔴 उनकी बातें सुनकर मैं भी डर-सा गया। आश्चर्य से पूछा-भैया, कौन आ गई, आप किस तबाही की बात कर रहे हैं। मिश्रा जी ने कहा-वही प्रेतात्मा जो अपना नाम शांति बताती है। कल मैंने तुम लोगों से उसकी चर्चा की थी, शायद इसलिए फिर आ गए। समझ में नहीं आता है अब मैं क्या करूँ!       
  
🔵 मैंने उन्हें ढाढस बँधाते हुए कहा-चिन्ता की कोई बात नहीं। आप अपने यहाँ गायत्री हवन करा लीजिए, सब ठीक हो जायगा। गायत्री चालीसा में लिखा है- ‘‘भूत पिसाच सबै भय खावें, यम के दूत निकट नहिं आवें।’’ मेरी बातों से वे कुछ हद तक आश्वस्त हो गए।
  
🔴 तीसरे दिन जब मिश्र जी वर्कशॉप आए तो उन्होंने और भी आश्चर्य भरी बात सुनाई। कहा-शांति फिर आई थी। उसने मुझसे कहा है- मैं विजय बाबू को अच्छी तरह से जानती हूँ।
  
🔵 मैं तो यह सुनकर बिल्कुल ही घबरा उठा कि एक प्रेतात्मा मुझे कैसे जानती है। मैंने मिश्र जी को कहा-अगर वह फिर आ जाए तो उससे पूछें कि मुझे किस तरह से जानती है।
  
🔴 अब शांति प्रतिदिन मिश्र जी के पास आने लगी थी। अगले दिन मिश्र जी ने मुझे अकेले मैं ले जाकर कहा- वो तो कहती है कि विजय जी हमारे गुरु भाई हैं।
  
🔵 यह सुनकर मुझे थोड़ा साहस तो मिला पर सोच-सोचकर पागल हुआ जा रहा था कि मैं इस प्रेतात्मा का गुरुभाई कैसे हो गया। इसका मतलब तो यह है कि कभी इस जीवात्मा ने परम पूज्य गुरुदेव से दीक्षा ली है। एक मुसलमान औरत की दीक्षा! आखिर यह कब और कैसे संभव हुआ?
 
🔴 मैंने हँसते हुए कहा कि वे शांति बहिन से इन सवालों का जवाब माँगकर आएँ। अब तक शांति नामक उस प्रेतात्मा से मेरा भय समाप्त हो गया था। अगले दिन मिश्र जी ने एक रहस्य का उद्घाटन किया- शांति तुम्हारे ही गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य की शिष्या है।                   
  
🔵 मैंने चकित होकर पूछा- यह कैसे संभव हुआ। मिश्र जी बोले मैंने तुम्हारे कहने के मुताबिक उससे पूछा था कि तुम उसके गुरुभाई कैसे हो? तो जवाब में उसने कहा-सन् १९७० ई. में टाटानगर में १००८ कुण्डीय यज्ञ हो रहा था। उसी समय मैं कई अन्य आत्माओं के साथ भटकती हुई वहाँ पहुँच गई थी। इतने बड़े यज्ञ का आयोजन देखकर हम सभी परम पूज्य गुरुदेव से प्रभावित हो गईं।
  
🔴 फिर कुछ रुककर शांति ने कहना शुरू किया- हम सभी ने आचार्यश्री से समवेत प्रार्थना करते हुए कहा कि हे ऋषिवर!  इन मानवों का तो आप उद्धार कर रहे हैं, पर हम प्रेतात्माओं का उद्धार कौन क रेगा? हमारे पास न तो स्थूल शरीर है और न टिककर रहने का कोई स्थान। दिन-रात इधर से उधर बेमतलब भटकते रहना ही हमारी नियति है। आप तो अवतारी चेतना हैं। कृपाकर हम लोगों का भी उद्धार करें। तब परम पूज्य गुरुदेव ने यज्ञ-पंडाल वाले मैदान से अलग हटकर टाटा के ही दूसरे बड़े मैदान में हम सभी को पंक्तिबद्ध कर दीक्षा संस्कार कराया और सबका नामकरण भी कर दिया। मेरा नाम गुरुवर ने शांति रखा था।

🔵 यह सब सुनकर शांति के बारे में जानने की जिज्ञासा बढ़ती गई। हमने मिश्रजी के द्वारा ही शांति से जानकारी ली कि ये सभी सूक्ष्म जगत में क्या करते हैं? शांति बहिन का कहना था- हम सब सूक्ष्म जगत में उनके अनुशासन में काम करते हैं, बस।

🔴 मिश्र जी ने जब फिर जानना चाहा कि इस समय पूज्य गुरुदेव हिमालय प्रवास में कहाँ हैं और क्या कर रहे हैं, तो शांति ने कहा- एक सीमा के बाद हम सबको कुछ भी बताने की मनाही है, इसलिए मैं इससे अधिक और कुछ नहीं बता सकती। अब मुझे प्रेतात्माओं के अस्तित्व पर पूरा विश्वास हो चुका था। मैं यह भी जान चुका था कि परम पूज्य गुरुदेव की पराशक्ति से परिचालित ये सूक्ष्म शरीरधारी शिष्यगण सूक्ष्म जगत में भी युग परिवर्तन के लिए अदृश्य रूप में कार्यरत रहते हैं।

🔵 इस घटना के लगभग एक वर्ष बाद तक परम पूज्य गुरुदेव की प्रेतात्मा शिष्या शांति मेरे भी सम्पर्क में विधेयात्मक रूप में रही। फिर एक दिन ऐसा भी आया कि वह उस इलाके से हमेशा के लिए चली गई। बहुत याद करने पर भी उसका आना नहीं हुआ।

🔴 सन् १९७३ ई. में परम पूज्य गुरुदेव शान्तिकुञ्ज पधार चुके थे। शान्तिकुञ्ज के वशिष्ठ और विश्वामित्र नामक भवन में ‘प्राण प्रत्यावर्तन शिविर’ आयोजित किया गया था। इस शिविर में शिष्यों से उच्चस्तरीय योग साधनाएँ कराई जाती थीं। सौभाग्य से मुझे भी इसमें भाग लेने का अवसर मिला था।

🔵 इसी शिविर के दौरान एक दिन शांति का ध्यान आया और मैं गुरुदेव से भेंट के समय पूछ बैठा- गुरुदेव, शांति बहिन का क्या .....? वाक्य पूरा भी नहीं हुआ था कि गुरुदेव ने तपाक से कहा- ‘‘बेटा, उसका चोला बदल गया.....चोला बदल गया। ’’

🔴 पूज्य गुरुदेव की उस समय की मुद्रा देखकर आगे कुछ पूछने का साहस नहीं हुआ। साक्षात् शिव की तरह भूत- प्रेतों का भार वहन करने वाले महाकाल के अवतार को श्रद्धापूर्वक नमन करके मैं वापस लौट पड़ा।                   
  
🌹 विजय कुमार शर्मा जमालपुर- मुंगेर (बिहार)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/diksha.1

👉 बुद्ध और विनायक

🔵 भिक्षु विनायक को वाचलता की लत पड़ गई थी। जोर- जोर से चिल्लाकर जनपथ पर लोगों को जमा कर लेता और धर्म की लम्बी- चौड़ी बातें करता।

🔴 तथागत के समाचार मिला तो उन्होंने विनायक को बुलाया और स्नेह भरे शब्दों में पूछा- 'भिक्षु यदि कोई ग्बाला सड़क पर निकलने वाली गायें गिनता रहे तो क्या उनका मालिक बन जायेगा?, विनायक ने सहज भाव से कहा- ' नहीं भन्ते! ऐसा कैसे हो सकता है। गौओं के स्वामी ग्वाले को तो उनकी सम्भाल और सेवा में लगा रहना पड़ता है। ' तथागत गम्भीर हो गये। उनने कहा- 'तो तात! धर्म को जिह्वा से नहीं जीवन से व्यक्त करो और जनता की सेवा साधना में संलग्न रहकर उसे प्रेमी बनाओ। ' इस तरह सत्कर्म को पाठ तक नहीं, कर्तव्य में भी उतार लिया जाय, तो जीवन में सच्चे अर्थो में समग्रता आ जाती है।

प्रज्ञा पुराण भाग 1 पृष्ठ 26

👉 यह भी नहीं रहने वाला 🙏🌹

एक साधु देश में यात्रा के लिए पैदल निकला हुआ था। एक बार रात हो जाने पर वह एक गाँव में आनंद नाम के व्यक्ति के दरवाजे पर रुका। आनंद ने साध...