बुधवार, 12 अप्रैल 2017

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 34)

🌹 बड़े प्रयोजन के लिये प्रतिभावानों की आवश्यकता

🔵 वर्षा आती है तो हरीतिमा अनायास ही सर्वत्र उभर पड़ती है। वसंत आता है तो हर पेड़-पौधे पर फूलों की शोभा निखरती है। समझना चाहिये कि नवसृजन की इस पुण्यवेला में तनिक-सी गरमी पाते ही मलाई दूध के ऊपर आकर तैरने लगेगी। नवयुग का चमत्कार अरुणोदय की तरह यह दृष्टिकोण उभारेगा कि लोग अपने निर्वाह के प्रति स्वल्प संतोषी दृष्टिकोण अपनाएँगे और युगधर्म की बहुमुखी आवश्यकताएँ पूरी करने के लिये इस प्रकार जुट पड़ेंगे, मानों इसी एक काम के लिये उनका सृजन-अवतरण हुुआ हो। अप्रत्याशित को निर्झर की तरह जमीन फोड़कर उभर पडऩा उसी को कहा जाएगा जो अगले दिनों होने जा रहा है।

🔴 समय अपनी गति से चलता और बदलता है, पर जब कभी आकस्मिक परिवर्तन दीख पड़े तो समझना चाहिये कि संध्याकाल जैसा परिवर्तन-पर्व निकट है। उसमें बहुत कुछ बदलना है, पर बदलाव की प्रथम किरण जहाँ से दृष्टिगोचर होगी, उसे प्रखर प्रतिभाओं का अभिनव उद्भव कहा जा सकेगा। भगवान् मनुष्य के रूप में परिवर्तित होंगे और उनकी निजी गतिविधियों का परिवर्तन विश्वपरिवर्तन की भूमिका बनकर और व्यापक बनता चला जाएगा।                       

🔵 योजना, प्रेरणा, दक्षता, व्यवस्था और समर्थता तो भगवान् की काम करेगी, किंतु श्रेय वे लोग प्राप्त करेंगे, जिनकी अंतरात्मा में युग के अनुरूप श्रद्धा और लगन जग पाई है। मुरगा जगकर अपने जागने की सूचना देता है, पर उसकी बाँग को सुनकर असंख्यों को ब्रह्ममुहूर्त की सूचना मिलती है और वे भी अरुणोदयवेला का लाभ लेने के लिए कार्यक्षेत्र में कदम उठाते हुए अगले दिनों दृष्टिगोचर होंगे।   

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हीरों से भरा खेत

🔶 हफीज अफ्रीका का एक किसान था। वह अपनी जिंदगी से खुश और संतुष्ट था। हफीज खुश इसलिए था कि वह संतुष्ट था। वह संतुष्ट इसलिए था क्योंकि वह ...