शुक्रवार, 7 सितंबर 2018

👉 आज का सद्चिंतन 7 September 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 September 2018


👉 भक्ति में भावना की प्रधानता

🔶 चैतन्य महाप्रभु जब जगन्नाथ पुरी से दक्षिण की यात्रा पर जा रहे थे तो उन्होंने एक सरोवर के किनारे कोई ब्राह्मण गीता पाठ करता हुआ देखा वह संस्कृत नहीं जानता था और श्लोक अशुद्ध बोलता था। चैतन्य महाप्रभु वहाँ ठहर गये कि उसकी अशुद्धि के लिये टोके। पर देखा कि भक्ति में विह्वल होने से उसकी आँखों से अश्रु बह रहे हैं।
चैतन्य महाप्रभु ने आश्चर्य से पूछा-आप संस्कृत तो जानते नहीं, फिर श्लोकों का अर्थ क्या समझ में आता होगा और बिना अर्थ जाने आप इतने भाव विभोर कैसे हो पाते है। उस व्यक्ति ने उत्तर दिया आपको यह कथन सर्वथा सत्य है।

🔷 कि मैं न तो संस्कृत जानता हूँ और न श्लोकों का अर्थ समझता हूँ। फिर भी जब मैं पाठ करता हूँ तो लगता है मानों कुरुक्षेत्र में खड़े हुये भगवान अमृतमय वाणी बोल रहे हैं और मैं उस वाणी को दुहरा रहा है। इस भावना से मेरा आत्म आनन्द विभोर हो जाता है।

🔶 चैतन्य महाप्रभु उस भक्त के चरणों पर गिर पड़े और उनने कहा तुम हजार विद्वानों से बढ़कर हो, तुम्हारा गीता पाठ धन्य है।

🔷 भक्ति में भावना ही प्रधान हैं, कर्मकाण्ड तो उसका कलेवर मात्र हैं। जिसकी भावना श्रेष्ठ है उसका कर्मकाण्ड अशुद्ध होने पर भी वह ईश्वर को प्राप्त कर सकता है। केवल भावना हीन व्यक्ति शुद्ध कर्मकाण्ड होने पर भी कोई बड़ी सफलता प्राप्त नहीं कर सकता।

📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1961

👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 5)

👉 नीतिरहित भौतिकवाद से उपजी दुर्गति  
    
🔶 ऊँचा महल खड़ा करने के लिए किसी दूसरी जगह गड्ढे बनाने पड़ते हैं। मिट्टी, पत्थर, चूना आदि जमीन को खोदकर ही निकाला जाता है। एक जगह टीला बनता है तो दूसरी जगह खाई बनती है। संसार में दरिद्रों, अशिक्षितों, दु:खियों, पिछड़ों की विपुल संख्या देखते हुए विचार उठता है कि उत्पादित सम्पदा यदि सभी में बँट गई होती तो सभी लोग लगभग एक ही तरह का - समान स्तर का जीवन जी रहे होते। अभाव कृत्रिम है। वह मात्र एक ही कारण उत्पन्न हुआ है कि कुछ लोगों ने अधिक बटोरने की विज्ञान एवं प्रत्यक्षवाद की विनिर्मित मान्यता के अनुरूप यह उचित समझा है कि नीति, धर्म, कर्तव्य सदाशयता, शालीनता, समता, परमार्थ परायणता जैसे उन अनुबन्धों को मानने से इंकार कर दिया जाए जो पिछली पीढ़ियों में आस्तिकता और धार्मिकता के आधार पर आवश्यक माने जाते थे।

🔷 अब उन्हें प्रत्यक्षवाद ने अमान्य ठहरा दिया, तो सामर्थ्यवानों को कोई किस आधार पर मर्यादा में रहने के लिए समझाए? किस तर्क के आधार पर शालीनता और समता की नीति अपनाने के लिए बाधित करे। पशुओं को जब नीतिवान परोपकारी बनाने के लिए बाधित नहीं किया जा सका, तो बन्दर की औलाद बताए गए मनुष्य को यह किस आधार पर समझाया जा सके कि उसे उपार्जन तो करना चाहिए पर उसको उपभोग में ही समाप्त नहीं कर देना चाहिए। सदुपयोग की उन परम्पराओं को भी अपनाना चाहिए जो न्याय, औचित्य, सद्भाव एवं बाँटकर खाने की नीति अपनाने की बात कहती है। यदि वह अध्यात्मवादी प्रचलन जीवित रहा होता तो प्रस्तुत भौतिकवादी प्रगति के आधार पर बढ़ते हुए साधनों का लाभ सभी को मिला होता। सभी सुखी एवं समुन्नत पाए जाते। न कोई अनीति बरतता और न किसी को उसे सहने के लिए विवश होना पड़ता ।
      
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 7

👉 Awakening of Supernormal Faculties Through Sadhana (Part 2)

🔶 Many deities are worshipped and it is believed that they grant suitable boons to their devotee. The underlying truth is that while moving along the path of sadhana, an intrinsic faith has to be developed and the wayward propensities and perversities of the lower self have to be identified, curbed, refined and transformed into divine virtues. Natural adoption of virtuous life is a visible sign of divine grace. Once it is accomplished, an aspirant can smoothly move ahead in the direction of the ultimate goal of human endeavour - self-realisation.

🔷 The field of sadhana is one's own inner being. Buried herein is a treasure-trove of immense spiritual wealth. Futile then is the need of seeking it in the outer world. In fact, the intrinsic virtues have been described as devi-devata (deities) by the seers. They have devised external rituals for the awakening of specific virtues within and in the process unearthing the hidden treasure. In order to acquire physical strength one makes use of various appliances of the gymnasium. There is no strength in these appliances; strength is embedded in the muscles.

🔶 The equipments are helpful only in activating the latent strength in the muscles. The same is true about the external rituals of atma sadhana (sadhana of the soul). One can learn a lot by keenly observing the mental state and the physical activities of a wrestler who does his regular practice each day with enthusiasm. Not only does he do the physical exercises but also takes nutritious food, observes continence, massages his body, adheres to a healthy daily routine and above all keeps himself free from worry. If all other aspects are neglected and only the physical exercises are given importance, his aim of becoming a wrestler will remain a fantasy. Similarly, the rituals of upasana (worship) have their own significance, but they alone do not lead to the achievement of the desired aim.

📖 Akhand Jyoti, May June 2003

👉 आध्यात्मिक लाभ ही सर्वोपरि लाभ है (भाग 4)

🔶 वासनापूर्ण निकृष्ट जीवन त्याग कर शुद्ध सात्विक जीवन यापन करने की प्रेरणा देने वाला अध्यात्मवाद ही है। वह मनुष्य को तम से ज्योति और मृत्यु से अमृत की ओर ले जाने वाला है। बाह्य वस्तुओं के सुख की भाँति अध्यात्मवाद का आन्तरिक सुख अस्थिर नहीं होता। वह चिरन्तन स्थिर एकरस होता है। संसार की अशुद्धताएँ, इन्द्रिय भोग की लिप्सा और वस्तुवाद की असारता अध्यात्मवादी को प्रभावित नहीं कर पातीं। वह अन्तर बाहर एक जैसा तृप्त सन्तुष्ट तथा महान रहा करता है।

🔷 आत्मा में अखण्ड विश्वास रख कर जीवन यापन करने वाला आध्यात्मिक ही कहा जायेगा। आत्मा है यह मान लेना ही आत्मा में विश्वास करना नहीं है। आत्मा में विश्वास करने का आशय है इस अनुभूति से प्रतिक्षण ओत-प्रोत रहना कि ‘संसार में व्याप्त परमात्मा के अंश आत्मा द्वारा हमारा निर्माण किया गया है। हम यह पच भौतिक शरीर ही नहीं हैं बल्कि आत्मरूप में वही कुछ हैं जो परमात्मा है’। ऐसी अनुभूति होने से ही हम अपने को ठीक से पहचान सकेंगे और सत्य, प्रेम, सहानुभूति, दया, क्षमा आदि ईश्वरीय गुणों का आदर कर सकेंगे। जिस समय हममें इन गुणों के ठीक-ठीक मूल्याँकन तथा इनको अपने अन्दर विकसित करने की चाह जाग उठेगी हम अध्यात्म पथ पर अग्रसर हो चलेंगे।

🔶 अध्यात्म सदाचरण और सदाचरण अध्यात्म के प्रेरक मित्र हैं। सदाचरण अध्यात्मवाद का सक्रिय रूप है और अध्यात्मवाद सदाचरण की घोषणा है। सदाचारी आध्यात्मिक तथा आध्यात्मिक व्यक्ति का सदाचारी होना अवश्यम्भावी है।

🔷 भौतिक लोभ लिप्सा को त्याग कर निर्विकार अध्यात्म पथ को अवलम्बन करने से मनुष्य स्वभावतः आन्तरिक संतोष, प्रेम, आनन्द एवं आत्मीयता की दैवी संप्रदाएं प्राप्त कर लिया करता है। अक्षय दैवी सम्पदा पा जाने पर मनुष्य पूर्ण काम हो जाता है और तब फिर उसे और कुछ चाहने की अभिलाषा नहीं रह जाती। अध्यात्म जन्य दैवी सम्पदाओं में संसार के सारे भौतिक तथा अभौतिक सुख निहित हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1967 जनवरी पृष्ठ 3
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1967/January/v1.3

👉 आत्मदेव को साधें

🔶 परोक्ष देवता अगणित हैं और उनकी साधना उपासना के हमात्म्य तथा विधा भी बहुतेरे; किन्तु इतने पर भी यह निश्चित नहीं कि वे अभीष्ट अनुग्रह करेंगे ही- इच्छित वरदान देंगे ही। यह भी हो सकता है कि निराशा हाथ लगे। मान्यता को अघात पहुँचे और परिश्रम निरर्थक चला जाय।

🔷 इस बुद्धिवादी युग में देव मान्यता के सम्बन्ध में सन्देह भी प्रकट किया जाता है। यहाँ तक कि अविश्वास एवं उपहास भरी चर्चायें भी होती हैं। ऐसी दशा में हमें सार्वजनीन  ऐसे देवता का आश्रय लेना चाहिए,जो साम्प्रदायिक अन्धविश्वासों से ऊपर उठा एवं सर्वमान्य हो। साथ ही जिसके अनुग्रह और वरदान के सम्बन्ध में भी अँगुली न उठे।

🔶 ऐसे देवता एक और हैं और वह हैं- आत्मदेव। अपना सुसंस्कृत आपा एवं परिष्कृत व्यक्तित्व। इसका आश्रय रहने पर कोई न अभावग्रस्त रह सकता है और न निराशतिरस्कृत॥
अन्य सभी देवताओं को प्रसन्न करने के लिए कष्टसाध्य साधनायें करनी पड़ती हैं। आत्मदेव की सत्ता सबके भीतर समान रूप से रहते हूए भी उसे उत्कृष्ट बनाने के लिए निरन्तर अभ्यास की आवश्यकता होती है। अपने चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को ऊँचे स्तर का बनाने के लिए आत्म विकास का आश्रय लेना पड़ता है। यही है सुनिश्चित फलदायिनी आत्मदेव की साधना।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य