मंगलवार, 20 मार्च 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 20 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 20 March 2018

👉 उपासना में आत्मशोधन की अनिवार्यता

🔶 उपासना का अर्थ है- पास बैठना। भगवान को अपने पास बिठाना या स्वयं भगवान के पास बैठना। दोनों ही स्थितियों में इसकी पात्रता आवश्यक है। राजा को अपने घर बुलाकर उसे देर तक पास बिठाये रहना या स्वयं राज महल में जाकर उनके समीप रहना एवं देर तक वार्तालाप करना, यह हर किसी के लिए सम्भव नहीं। इसके लिए पात्रता चाहिए। दीन-हीन, मलीन या रोग ग्रसित व्यक्तियों को यह सुविधा नहीं मिल सकती। उसके लिए पूर्व तैयारी करनी पड़ती है। श्रीमद् भागवत् में भगवान की समीपता प्राप्त करने के लिए चार तैयारियाँ करने की बात लिखी हैं।

🔷 (1) सात्विक सीमित आहार। जिससे पेट तनकर भारा रखने के कारण आलस्य प्रमाद न सताये। दूसरे अन्न के अनुरूप मन बने और भगवान में रुचिपूर्वक लग सके। अभक्ष्य, अनीति उपार्जित धान्य खाने से मन उद्विग्न एवं चंचल बनता है और भगवत् प्रसंग से हटकर बार बार दूर भागता है।

🔶 (2) वाक् संयम। कटु वचन, मिथ्या भाषण, असत्य मखौल जैसे भ्रष्ट वचन न बोलकर वाणी को इस योग्य बना लेना जिससे किया हुआ नाम स्मरण सार्थक हो सके।

🔷 (3) इन्द्रिय निग्रह- चटोरापन, कामुकता, मनोरंजक दृश्य देखने की चंचलता, संगीत आदि आकर्षणों की ओर दौड़ पड़ना जैसे चित्त को चंचल बनाने वाले उपक्रमों से दूर रहना। उन आकर्षणों के लिए उमंगें उठती हों तो उन्हें रोकना।

🔶 (4) स्वाध्याय और सत्संग का सुयोग बनाते रहना जिससे भगवद् भक्ति में श्रद्धा विश्वास बढ़े। जमे हुए संचित कुसंस्कारों के उन्मूलन का क्रम चलता रहे। उनके आधार पर ही लोभ मोह का दुष्परिणाम विदित होते हैं। उच्चस्तरीय चिन्तन मनन से ही मन की भ्रष्टता का निराकरण होता है।

🔷 माता पिता के निकट जाना या उनकी गोदी में बैठना किसी बच्चे के लिए कठिन नहीं होना चाहिए। यह सरल है और स्वाभाविक भी। भगवान के साथ मनुष्य का घनिष्टतम सम्बन्ध है। आत्मा परमात्मा से ही उत्पन्न हुई है। उसके साथ सम्बन्ध बनाये रहने से कोई मनुहार करने या अनुदान देने की आवश्यकता नहीं है। अनुनय विनय तो परायों से करनी पड़ती है। भेंट पूजा तो उनकी जेब में डालनी पड़ती है जिनसे कोई अनुचित प्रयोजन सिद्ध करना है।

🔶 बालक की जितनी उत्कण्ठा अभिभावकों की गोदी में चढ़ने की होती है उसकी तुलना में माता-पिता भी कम उत्सुक आतुर नहीं होते। पर इस प्रयोजन की पूर्ति में एक ही व्यवधान अड़ जाता है- बालक का शरीर गन्दगी से सना होना। मल मूत्र से बच्चे ने अपना शरीर गन्दा कर लिया हो और गोदी में चढ़ने का आग्रह कर रहा हो तो माता मन को कठोर करके उसे रोकती है, पहले स्नान कराती, पोछती और सुखाती है। उसके उपरान्त ही छाती से लगाकर दुलार करती और दूध पिलाती है। उसे अपना शरीर गन्दा और दुर्गन्धित होने का भय जो रहता है। विलम्ब का व्यवधान उसी कारण अड़ता है। यह विलम्ब बच्चे के हित में भी है और माता के हित में भी।

🔷 भगवद् भक्त कहलाने के लिए साधक को इस योग्य बनाना पड़ता है जिससे पास बिठाने वाले की भी निन्दा न हो। जिन अधम और अनाचारियों को भगवत् अनुग्रह प्राप्त हुआ है उन सभी को अपने दुर्गुणों का परिशोधन करना पड़ता है। इसके बिना अब तक किसी को भी उपासना का आनन्द नहीं मिला। परिशोधन भक्त की अनिवार्य कसौटी है। उसका श्रेय चाहे भक्त स्वयं ले ले या भगवान को दे दे। पर है इस प्रक्रिया की हर हालत में अनिवार्यता। मनुष्य एक ओर तो अनाचाररत रहे और दूसरी और उथले कर्मकाण्डों के बल पर ईश्वरीय अनुकम्पा का आनन्द लेना चाहे तो उसे अब तक की परम्परा और शास्त्र मर्यादा के सर्वथा प्रतिकूल ही समझना चाहिए। श्रीमद् भागवत् में इसी तथ्य को उपासना प्रेमियों के सम्मुख उद्घाटित किया है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1985 पृष्ठ 26

👉 गीता के ये नौ सूत्र याद रखें, जीवन में कभी असफलता नहीं मिलेगी

👉 सूत्र नं० 8

🔶 श्लोक-
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वत्र्मानुवर्तन्ते मनुष्या पार्थ सर्वश:।।


अर्थ-
🔷 हे अर्जुन। जो मनुष्य मुझे जिस प्रकार भजता है यानी जिस इच्छा से मेरा स्मरण करता है, उसी के अनुरूप मैं उसे फल प्रदान करता हूं। सभी लोग सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।

सूत्र-
🔶 इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण बता रहे हैं कि संसार में जो मनुष्य जैसा व्यवहार दूसरों के प्रति करता है, दूसरे भी उसी प्रकार का व्यवहार उसके साथ करते हैं। उदाहरण के तौर पर जो लोग भगवान का स्मरण मोक्ष प्राप्ति के लिए करते हैं, उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। जो किसी अन्य इच्छा से प्रभु का स्मरण करते हैं, उनकी वह इच्छाएं भी प्रभु कृपा से पूर्ण हो जाती है। कंस ने सदैव भगवान को मृत्यु के रूप में स्मरण किया। इसलिए भगवान ने उसे मृत्यु प्रदान की। हमें परमात्मा को वैसे ही याद करना चाहिए जिस रुप में हम उसे पाना चाहते हैं।

👉 नारी को विकसित किया जाना आवश्यक है। (भाग 2)

🔶 धन की आवश्यकता परिवार के लिये होती है। मनुष्य जितना कमाता है उसका अपने लिये तो एक बहुत स्वल्प भाग ही काम में लाता है, शेष तो परिवार के प्रयोजनों में ही खर्च होता है। मरने के बाद भी मनुष्य अपने उपार्जन को अपने परिवार के लिये ही छोड़ जाता है। जिस परिवार के प्रति मनुष्यता की ममता धन के ही समान नहीं, वरन् उससे भी अधिक है, उसकी संतुलित उन्नति के लिए समुचित ध्यान न दिया जाए तो यह दुर्भाग्यपूर्ण बात ही होगी।

🔷 जेवर, कपड़ा भोजन, सवारी, जायदाद आदि के साधन लोग अपने परिजनों के लिये जुटाते हैं। उनकी बीमारी, शादी आदि के अवसरों पर भी मनमाना खर्च करते हैं, पर यह ध्यान नहीं देते कि इनकी योग्यता, शक्ति, सामर्थ्य, प्रतिभा एवं व्यक्तित्व को विकसित करने के लिये भी कुछ किया जाना चाहिये। बहुत हुआ तो स्कूल कॉलेजों की शिक्षा का प्रबंध कर दिया। इससे नौकरी तो मिल सकती है पर वे सद्गुण नहीं आते जो जीवन के वास्तविक विकास के लिए आवश्यक हैं। इन्हीं सद्गुणों को विकसित करने का प्रयत्न परिवार के प्रति सच्ची सेवा एवं ममता कही जा सकती है।

🔶 प्राचीन काल में यह देश नग-रत्नों की खान था। घर-घर में महापुरुष पैदा होते थे। उनके विचार और कार्य इतने उच्च कोटि के थे कि संसार भर में वे देव श्रेणी में गिने जाते थे। यहाँ के तैंतीस करोड़ निवासी, तैंतीस कोटि देवताओं के नाम से विख्यात थे। भारतीय समाज के इतने सुविकसित और सुसंस्कृत होने की महत्ता को सारे संसार ने स्वीकार किया था और इसी आधार पर भारत को जगद्गुरु एवं चक्रवर्ती शासक का सम्मान प्रदान किया था। ऐसे सद्गुणी कभी गरीब रह ही नहीं सकते। लक्ष्मी उनका पीछा छोड़ ही नहीं सकती यह देश स्वर्ण सम्पदाओं का स्वामी था। यहाँ के लोग सोने को पहनते ही न थे वरन् उसके भवन तक बनाते थे। बल और पुरुषार्थ में उनका कोई सानी न था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति -दिसंबर 1960 पृष्ठ 26

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1960/December/v1.26

👉 Saint Gyaneshwar Felt Buffalo's Suffering

🔷 The orthodox Pundits used to criticize Saint Gyaneshwar's liberal thoughts. Once, a man crossed their street tormenting a buffalo with a whip. Everyone was astonished to see that the marks of the whip were appearing on the saint's back. "God is everywhere", said saint Gyaneshwar, "and I have experienced the pain the buffalo felt."

🔶 But, the Pundits said, "If God is in the buffalo too, make him chant the Vedic mantras." And a miracle happened! When commanded by the saint, the buffalo stared chanting the Vedic mantras. Seeing this, the Pundits realized their mistake and apologized for their bad behavior.

📖 From Akhand Jyoti

👉 प्रायश्चित क्यों? कैसे? (अन्तिम भाग)

🔷 आप इस प्रायश्चित की तैयारी कीजिए। आपने क्या-क्या नुकसान पहुँचाया, उसका मूल्यांकन कीजिए। आपने कितने लोगों का समय खराब किया, दिल दुखाया, कितने आदमियों को आर्थिक हानि पहुँचाई, कितने आदमियों का चाल-चलन खराब किया, इन सारी बातों को एक कागज पर नोट कर लीजिए और आप उसी के समान लाभ ब्याज समेत दे सकते हो, तो क्या कहना? आपने जो कर्जा लिया है, उसे ब्याज समेत चुकाइए। नुकसान पहुँचाया है, उसे ब्याज समेत चुकाइए और अगर ब्याज समेत नहीं भी चुका सकते, तो कम-से उतना तो फायदा कीजिए, उतनी तो सेवाएँ कीजिए, उतना तो पुण्य कीजिए, जितना कि आपने पाप कमाया है।

🔶 पाप और पुण्य को बराबर कर देना है। यदि ज्यादा हो सके तो, फिर ज्यादा कर दीजिए। फिर वह ब्याज चुकाने वाली ईमानदारी में शामिल हो जाएगा। ऐसा करने से आपके पुण्य का पलड़ा भारी हो जाएगा और अगले जन्म में काम आएगा। फिलहाल इतना न कर सके, तो आपको किसी-न रूप से यहाँ इस शिविर में आ करके यह विचार करना चाहिए कि हमने पिछले दिनों जो गलतियाँ की हैं और आज तक जो करते रहे हैं, इसका इस समय तो हम प्रायश्चित करते हैं दण्ड भुगतते हैं, थोड़ा-सा अपने आपको कठिनाई में डालते हैं, कसम खाते हैं भविष्य में ऐसा न करने की यह तो करना ही करना चाहिए, लेकिन मूल बात है नुकसान का खामियाजा चुकाना।

🔷 खामियाजा अगर चुका देंगे, तब आपके पाप दूर हो जाएँगे और आपकी उपासना के मार्ग में, आत्मिक उन्नति के मार्ग में पग-पग पर जो रुकावटेंं आती हैं, उनके आने का सिलसिला बन्द हो जाएगा। रुकावटें आप पार कर लेंगे, तो उन्नति आपकी कोई कठिन नहीं है। भगवान बनना आपके लिए कठिन नहीं है, शर्त एक ही है कि आपने अपने पिछले पाप और गुनाहों की, जो खाई इकट्ठी कर ली है, पर्वत इकट्ठे कर लिए हैं, उसको पाटें, लेबिल एक-सा करें और फिर आप रास्ता चलते चले जाएँ। यह करना बहुत आवश्यक है। इस शिविर में आप यह बात विशेष रूप से ध्यान में रखें।

.... हमारी बात समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 67)

👉 श्री सद्गुरुः शरणं मम

🔷 गुरुगीता के इन महामन्त्रों के सार को अपनी चौपाई में बाँधते हुए गोस्वामी तुलसी दास जी मानस में कहते हैं-

गुरु बिनु भवनिधि तरइ न कोई।
जो  बिरंचि  संकर  सम     होई॥
  
🔶 यानि कि ब्रह्मा एवं शिव की भाँति समर्थ होने पर भी श्री गुरुदेव का आश्रय पाए बिना इस भवसागर को कोई पार नहीं कर सकता है। शिष्यों को-साधकों को यह सत्य भली भाँति आत्मसात् कर लेना चाहिए कि अध्यात्म तत्त्व गुरुगम्य है। श्री गुरु के बिना तप तो किया जा सकता है, सिद्धियाँ तो पायी जा सकती हैं, चमत्कार तो दिखाए जा सकते हैं, पर अध्यात्म के सत्य को गुरु के आशीष के बिना नहीं पाया जा सकता। गुरुकृपा के बिना आत्मतत्त्व का ज्ञान नितान्त असम्भव है।
  
🔷 इस सच्चाई को उजागर करने वाला एक बहुत ही प्रेरक प्रसंग है। टी.वी. कापालि शास्त्री दक्षिण भारत के बहुत ही उद्भट विद्वान् थे। वेदों के महापण्डित के रूप में उनकी ख्याति थी। वेदविद्या के साथ तन्त्र के महासाधक के रूप में सभी उनको जानते थे। सिद्धियाँ उनकी चेरी थीं और चमत्कार उनके अनुचर। अनेकों भक्तों का जमघट उन्हें घेरे रहता था, जिनमें से कुछ सच्चे जिज्ञासु भी थे। इन सच्चे जिज्ञासु शिष्यों में एक एम.पी. पण्डित थे। जिन्होंने बाद के दिनों में प्रख्यात मनीषी के रूप में महती ख्याति अर्जित की।
  
🔶 तप, विद्या एवं सिद्धियों के धनी कापालि शास्त्री के पास सब कुछ था सिवा अध्यात्म तत्त्व के गूढ़ रहस्यों के। यह अभाव उन्हें हमेशा सालता। एक दिन उन्होंने बड़े कातर भाव से तन्त्र महाविद्या की अधिष्ठात्री माता जगदम्बा से प्रार्थना की, माँ मुझे राह दिखा। वरदायिनी माता अपनी इस तपस्वी सन्तान पर कृपालु हुईं और उन्होंने कहा, सद्गुरु की शरण में जा। वही तेरा कल्याण करेंगे। माँ कौन हैं मेरे सद्गुरु? इस प्रश्न के उत्तर में माँ  की परा वाणी गूँजी- पाण्डिचेरी में तप कर रहे महायोगी श्रीअरविन्द तेरे सद्गुरु हैं।
  
🔷 माँ जगदम्बा का आदेश पाकर टी.वी. कापालि शास्त्री अपने सुयोग्य शिष्य एम.पी. पण्डित के साथ श्री  अरविन्द आश्रम पहुँच गए। महान् विद्वान्, परम तपस्वी, अनगिनत अलौकिक सिद्धियों से सम्पन्न इस महासाधक को देखकर आश्रमवासी चकित थे। वह स्वयं जब महर्षि के सम्मुख पहुँचे, तो महर्षि मुस्कराए और बोले, शास्त्री मेरे पास क्यों आए हो? कापालि शास्त्री ने विनम्रतापूर्वक कहा, हे प्रभु तप, विद्या आदि की जो क्षुद्रताएँ मेरे पास हैं, वही अज्ञान सम्पदा आपके चरणों में अर्पित करने आया हूँ। यह कहते हुए उन्होंने अपना हृदय श्री अरविन्द के चरणों में उड़ेल दिया। शास्त्री जी के साथ एम. पी. पण्डित ने भी उनका अनुसरण किया। वेद और तन्त्र मार्ग की सारी साधनाओं को कर चुके कापालि शास्त्री अब एक ही साधना में जुट गए और वह साधना थी ‘श्री सद्गुरु शरणं’। इस साधना ने उन्हें आध्यात्मिक जीवन की परम पूर्णता दी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 107