मंगलवार, 17 अक्तूबर 2017

👉 रास्ते की बाधा....

🔴 बहुत पुराने समय की बात है एक राज्य के राजा ने अपने राज्य के मुख्य दरवार पर एक बड़ा सा पत्थर रखवा दिया इस पत्थर के रखवाने का मुख्य कारण था  राजा अपने राज्य के लोगों की परीक्षा लेना चाहता था राजा अपने राज्य के लोगों की सोच को परखना चाहता था। राजा उस पत्थर से कुछ दूरी पर छुपकर यह देखने लगा के आखिर इस पत्थर को कोई रास्ते से हटाएगा जा नहीं। बहुत सारे लोग वहां से गुजरे वो सभी उस पत्थर को हटाने की वजाय वो रास्ते में पत्थर रखने वाले को कोसते रहते और वहां से चले जाते। अब तक किसी ने भी उस पत्थर को हटाने का प्रयास तक नहीं किया था।

🔵 काफ़ी दिनों तक वो पत्थर वही पड़ा रहा अचानक एक दिन वहां से एक लकड़हारा गुजर रहा था उसके कंधे पर लकड़ियों की गठरी लदी हुई थी। रास्ते में पड़े पत्थर को देखते ही उसने लकड़ियों की गठरी को नीचे रख दिया उसने पत्थर को हटाने की कोशिश की परन्तु पत्थर तो काफ़ी भारा था उसने अपने पूरे ज़ोर से पत्थर को हटाने की कोशिश की परन्तु फिर भी उससे पत्थर हट नहीं रहा था। वो कुछ देर के लिए रुक गया परन्तु कुछ देर बाद उसने अपने पूरे जोश और ताकत के साथ उस पत्थर को एक किनारे पर खिसका दिया। जिस किनारे उसने पत्थर को खिसकाया था वहां पर एक छोटे से पत्थर के नीचे एक थैली रखी हुई थी जब उस लकड़हारे ने उस थैली को खोलकर देखा तो उसमें सोने के सिक्के थे और उसमें राजा का लिखा हुआ एक पत्र था उस पत्र में लिखा था “यह सभी सोने के सिक्के इस पत्थर को हटाने वाले को इनाम के रूप में हैं।

🔴 सोने के सिक्के पाकर वो लकडहारा बहुत ख़ुश था और वो ख़ुशी -ख़ुशी वहां से चला गया।

🔵 मित्रो इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है के हम में से ज्यादातर लोग जिन्दगी में आने वाली छोटी -छोटी बाधायों से घबरा जाते हैं और उन्हें दूर करने का प्रयास तक नहीं करते और उस परेशानी का दोष हम दूसरों पर निकालने लगते हैं जैसा के इस कहानी में हुआ दोस्तों मुश्किल कितनी भी बढ़ी क्यों ना हो हमें कभी हार नहीं माननी चाहिए देखना फिर यह बाधाएं कैसे दूर हो जाती हैं और हमारे मार्ग में आने वाली हर मुश्किल या बाधा हमें आगे बढ़ने का अवसर देती हैं।

👉 देवत्व विकसित करें, कालनेमि न बनें (भाग 5)

🔴 दूसरा वह जिसमें हम आपको संसार का नेता बनाना चाहते हैं। हमको भगवान ने नेता बनाकर भेजा है। चाणक्य को नेता बनाकर भेजा था। वह नालन्दा विश्वविद्यालय के डीन थे। अब्राहम लिंकन को, जार्ज वाशिंगटन को, गारफील्ड को नेता बनाकर भेजा था। विनोबा को नेता बनाकर भेजा था। हम भी आपमें से हर एक आदमी को नेता बनाना चाहते हैं, नेता बनाने की हमारी इच्छा है। आपकी इच्छाएँ क्या हैं, यह हमको मालूम हो या न हो तो आप लिखकर दे जाना। हमारा एक क्रम है। जब हम बैठते हैं तब देख लेते हैं। रात में हमारा क्रम पूजा-उपासना का रहता है। सबेरे से लेकर दोपहर तक हम अपना लेख लिखते हैं ताकि अखण्ड ज्योति बीस साल तक बराबर निकलती रहे। बीस साल के लिए लेख और जो पुस्तकें लिखनी हैं, वह हम सब लिखकर रख जाएँगे।
     
🔵 जब यह युगसन्धि समाप्त होगी और सन् २००० आएगा, उस वक्त तक आप यह अनुभव करेंगे कि गुरुजी जो लिखकर गए थे, उनकी लेखनी में कोई फर्क नहीं आया, उनके अक्षरों में कोई फर्क नहीं आया। उनकी पुस्तकों में, पत्रिकाओं में कोई फर्क नहीं आया। मिशन में कोई फर्क नहीं आया है और न ही आएगा। दोपहर बाद तो अब हमने मिलना भी शुरू कर दिया है। पाँच-पच्चीस आदमी को ऊपर बुला भी लेते हैं। यह हमारा दोपहर से शाम तक का क्रम है। इस तरीके से कभी आएँगे तो जब किसी को बहुत जरूरी काम हो तो मिल लेना। सांसारिक कठिनाइयाँ हों तो माताजी से कहिएगा। कोई आध्यात्मिक बात हो या कुछ ऊँचा उठना हो तो हमारे पास आवें। हम आपके बड़े कदम उठाने में मदद करेंगे। हमने इस दुनिया में बड़े कदम उठाए हैं और बड़े कदम उठाने के लिए आपसे भी कहते हैं। दो बातें हो गई है आप ध्यान रखना।

🔴 एक और बात मैं अपने सबूत में आपके बताता हूँ जो विश्व के एक बहुत बड़े भविष्यवक्ता ने सैकड़ों वर्ष पूर्व कही थी। संसार में ऐसे भविष्यवक्ता तो बहुत-से हैं जो हाथ देखकर यह बताते हैं कि तेरा विवाह कब हो आएगा, पैसा कब आएगा, कब क्या हो जाएगा? इसी तरह जन्मपत्री बनाने वाले बहुत-से लोग हैं, किन्तु दुनिया में एक ऐसा व्यक्ति भी हुआ है, जिसने सारे संसार की राजनीति के बारे में लिखा है। जिसमें से आठ सौ भविष्यवाणियाँ सही हो चुकी हैं। एक हजार वर्ष पहले हुआ था, वह था—नोस्ट्राडेमस। उसने ऐसी भविष्यवाणियाँ की थीं, जो एको-एक सौ फीसदी सही हो जाती थीं। ब्रिटेन का तब नामोनिशान नहीं था, जब नोस्ट्राडेमस पैदा हुआ था। स्काटलैण्ड था, आयरलैण्ड था, इंग्लैण्ड था, पर ब्रिटेन नहीं था, लेकिन उसमें लिखा था कि ब्रिटेन बनेगा, इतने दिनों तक राज्य करेगा और सन् १८४२ में इसका सिराजा बिखर जाएगा और अब जितना भी उसका राज्यमण्डल है सब खत्म हो जाएगा। वह सब एक-एक अक्षर सही हुआ।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 आस्तिक बनो (भाग 1)

🔴 परमात्मा सर्वत्र व्यापक है, इस सत्य को जानते तो अनेक लोग हैं पर उसे मानते नहीं। व्यवहार में नहीं लाते। जो परमात्मा को सर्वव्यापी, घट-घट वासी मानेगा, उसका जीवन उसी क्षण पूर्ण पवित्र, निष्पाप और कषाय-कल्मषों से रहित हो जायेगा। गीता में भगवान ने कहा है कि जो मेरी शरण में आता है, जो मुझे अनन्य भाव से भजता है वह तुरन्त ही पापों से छूट जाता है निःसंदेह बात ऐसी ही है। भगवान की शरण में जाने वाला, उस पर सच्चा विश्वास करने वाला, उस पर पूर्ण आस्था रखने वाला, एक प्रकार से जीवन मुक्त ही हो जाता है।

🔵 ईश्वर का विश्वास और सच्चा जीवन एक ही वस्तु के दो नाम हैं। जो भगवान का भक्त है, जिसने तब छोड़ कर प्रभु के चरणों में आत्म समर्पण कर गया है। जो परमात्मा की उपासना करता है उसे जगत-पिता की सर्व व्यापकता पर आस्था जरूर होनी चाहिए। यदि वह विश्वास दृढ़ हो जाय कि भगवान जर्रे-जर्रे में समाया हुआ है, हर जगह मौजूद है तो पाप कर्म करने का साहस ही नहीं हो सकता। ऐसा कौन सा चोर है जो सावधान खड़ी हुई सशस्त्र पुलिस के सामने चोरी करने का साहस करे, चोरी, व्यभिचार, ठगी, धूर्तता, दंभ, असत्य, हिंसा आदि के लिए आड़ की, पर्दे की, दुराव की जरूरत पड़ती है।

🔴 जहाँ मौका होता है इन बुरे कामों को पकड़ने वाला नहीं होता, वहीं इनका किया जाना संभव है। जहाँ धूर्तता की भली प्रकार समझने वालों देखने वाले और पकड़ने वाले लोगों की मजबूत ताकत सामने खड़ी होती है। वहाँ पाप कर्मों का हो सकना संभव नहीं। इसी प्रकार जो इस बात पर सच्चे मन से विश्वास करता है कि परमात्मा सब जगह मौजूद है वह किसी भी दुष्कर्म के करने का साहस नहीं कर सकता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- दिसम्बर 1945 पृष्ठ 3
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1945/December/v1.3

👉 आज का सद्चिंतन 16 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 Oct 2017


👉 जो जाग्रत है, वह नियम के बाहर है

🔴 बुद्ध के जीवन की बड़ी मीठी कथा है। जब उनका जन्म हुआ, तो ज्योतिषियों ने कहा कि यह व्यक्ति या तो सम्राट होगा या संन्यासी होगा। सब लक्षण सम्राट के थे। फिर बुद्ध तो भिक्षु हो गए, संन्यासी हो गए। और सम्राट साधारण नहीं, चक्रवर्ती सम्राट होगा, सारी पृथ्वी का सम्राट होगा।

🔵 बुद्ध एक नदी के पास से गुजर रहे हैं, निरंजना नदी के पास से गुजर रहे हैं। रेत पर उनके चिह्न बन गए, गीली रेत है, तट पर उनके पैर के चिह्न बन गए। एक ज्योतिषी काशी से लौट रहा था। अभी-अभी ज्योतिष पढ़ा है। यह सुंदर पैर रेत पर देख कर उसने गौर से नजर डाली। पैर से जो चिह्न बन गया है नीचे, वह खबर देता है कि चक्रवर्ती सम्राट का पैर है। ज्योतिषी बहुत चिंतित हो गया। चक्रवर्ती सम्राट का अगर यह पैर हो, तो यह साधारण सी नदी के रेत पर चक्रवर्ती चलने क्यों आया? और वह भी नंगे पैर चलेगा कि उसके पैर का चिह्न रेत पर बन जाए! बड़ी मुश्किल में पड़ गया। सारा ज्योतिष पहले ही कदम पर व्यर्थ होता मालूम पड़ा। अभी-अभी लौटा था निष्णात होकर ज्योतिष में। अपनी पोथी, अपना शास्त्र साथ लिए हुए था। सोचा, इसको नदी में डुबा कर अपने घर लौट जाऊं, क्योंकि अगर इस पैर का आदमी इस रेत पर भरी दुपहरी में चल रहा है नंगे पैर–और इतने स्पष्ट लक्षण तो कभी युगों में किसी आदमी के पैर में होते हैं कि वह चक्रवर्ती सम्राट हो–तो सब हो गया व्यर्थ। अब किसी को ज्योतिष के आधार पर कुछ कहना उचित नहीं है।

🔴 लेकिन इसके पहले कि वह अपने शास्त्र फेंके, उसने सोचा, जरा देख भी तो लूं, चल कर इन पैरों के सहारे, वह आदमी कहां है। उसकी शक्ल भी तो देख लूं। यह चक्रवर्ती है कौन, जो पैदल चल रहा है! तो उन पैरों के सहारे वह गया। एक वृक्ष की छाया में बुद्ध विश्राम कर रहे थे। और भी मुश्किल में पड़ गया, क्योंकि चेहरा भी चक्रवर्ती का था, माथे पर निशान भी चक्रवर्ती के थे। बुद्ध की आंखें बंद थीं, उनके दोनों हाथ उनकी पालथी में रखे थे; हाथ पर नजर डाली, हाथ भी चक्रवर्ती का था। यह देह, यह सब ढंग चक्रवर्तियों का, और आदमी भिखारी था, भिक्षा का पात्र रखे, वृक्ष के नीचे बैठा था, भरी दुपहरी में अकेला था।

🔵 हिला कर बुद्ध को उसने कहा कि महानुभाव, मेरी वर्षों की मेहनत व्यर्थ किए दे रहे हैं, सब शास्त्र नदी में फेंक दूं, या क्या करूं? मैं काशी से वर्षों से मेहनत करके, ज्योतिष को सीख करके लौट रहा हूं। और तुममें जैसे पूरे लक्षण प्रगट हुए हैं, ऐसे सिर्फ उदाहरण मिलते हैं ज्योतिष के शास्त्रों में। आदमी तो कभी-कभी हजारों-लाखों साल में ऐसा मिलता है। और पहले ही कदम पर तुमने मुझे मुश्किल में डाल दिया। तुम्हें होना चाहिए चक्रवर्ती सम्राट और तुम यह भिक्षापात्र रखे इस वृक्ष के नीचे क्या कर रहे हो?

🔴 तो बुद्ध ने कहा कि शास्त्रों को फेंकने की जरूरत नहीं है, तुझे ऐसा आदमी दुबारा जीवन में नहीं मिलेगा। जल्दी मत कर, तुझे जो लोग मिलेंगे, उन पर तेरा ज्योतिष काम करेगा। तू संयोग से, दुर्घटनावश ऐसे आदमी से मिल गया है, जो भाग्य की सीमा के बाहर हो गया है। लक्षण बिलकुल ठीक कहते हैं। जब मैं पैदा हुआ था, तब यही होने की संभावना थी। अगर मैं बंधा हुआ चलता प्रकृति के नियम से तो यही हो जाता। तू चिंता में मत पड़, तुझे बहुत बुद्ध-पुरुष नहीं मिलेंगे जो तेरे नियमों को तोड़ दें। और जो अबुद्ध है, वह नियम के भीतर है। और जो अजाग्रत है, वह प्रकृति के बने हुए नियम के भीतर है। जो जाग्रत है, वह नियम के बाहर है।