शनिवार, 3 मार्च 2018

👉 चरित्रहीन कौन?

🔷 संन्यास लेने के बाद गौतम बुद्ध ने अनेक क्षेत्रों की यात्रा की... एक बार वह एक गांव में गए। वहां एक स्त्री उनके पास आई और बोली- आप तो कोई "राजकुमार" लगते हैं। ...क्या मैं जान सकती हूं कि इस युवावस्था में गेरुआ वस्त्र पहनने का क्या कारण है? बुद्ध ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया कि...

🔶 "तीन प्रश्नों" के हल ढूंढने के लिए उन्होंने संन्यास लिया..

🔷 बुद्ध ने कहा.. हमारा यह शरीर जो युवा व आकर्षक है, पर जल्दी ही यह "वृद्ध" होगा, फिर "बीमार" और ....अंत में "मृत्यु" के मुंह में चला जाएगा। मुझे 'वृद्धावस्था', 'बीमारी' व 'मृत्यु' के कारण का ज्ञान प्राप्त करना है .....

🔶 बुद्ध के विचारो से प्रभावित होकर उस स्त्री ने उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया.... शीघ्र ही यह बात पूरे गांव में फैल गई। गांव वासी बुद्ध के पास आए व आग्रह किया कि वे इस स्त्री के घर भोजन करने न जाएं....!!!

🔷 क्योंकि वह "चरित्रहीन" है.....

🔶 बुद्ध ने गांव के मुखिया से पूछा? .....क्या आप भी मानते हैं कि वह स्त्री चरित्रहीन है...?

🔷 मुखिया ने कहा कि मैं शपथ लेकर कहता हूं कि वह बुरे चरित्र वाली स्त्री है....। आप उसके घर न जाएं। बुद्ध ने मुखिया का दायां हाथ पकड़ा... और उसे ताली बजाने को कहा... मुखिया ने कहा...मैं एक हाथ से ताली नहीं बजा सकता...

🔶 "क्योंकि मेरा दूसरा हाथ आपने पकड़ा हुआ है"... बुद्ध बोले...इसी प्रकार यह स्वयं चरित्रहीन कैसे हो सकती है...????

🔷 ... जब तक इस गांव के "पुरुष चरित्रहीन" न हों...!!!! अगर गांव के सभी पुरुष अच्छे होते तो यह औरत ऐसी न होती इसलिए इसके चरित्र के लिए यहां के पुरुष जिम्मेदार हैं....

🔶 यह सुनकर सभी "लज्जित" हो गए.....

🔷 ....लेकिन आजकल हमारे समाज के पुरूष "लज्जित" नही "गौर्वान्वित" महसूस करते है.....

🔶 ... क्योकि यही हमारे "पुरूष प्रधान" समाज की रीति एवं नीति है..॥

🔷 स्त्री तब तक 'चरित्रहीन' नहीं हो सकती....जब तक पुरुष चरित्रहीन न हो "......
गौतम बुद्ध

🔶 सकारात्मक सोचो
सकारात्मक सोच से ही अपना और अपने घर समाज देश का विकास होगा।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 04 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 04 March 2018


👉 विचार एक मजबूत ताकत

🔷 शुभ सात्विक और आशापूर्ण विचार एक वस्तु है। यह एक ऐसा किला है, जिसमें मनुष्य हर प्रकार के आवेगों और आघातों से सुरक्षित रह सकता है। लेकिन मनुष्य को उत्तम विचार ही रखने और अपनी आदत में डालने अभ्यास निरंतर करना चाहिए। विचार फालतू बात नहीं है। यह एक मजबूत ताकत है। इसका स्पष्ट स्वरूप है। उसमें जीवन है। यह स्वयं ही हमारा मानसिक जीवन है। यह सत्य है। विचार ही मनुष्य का आदिरूप है। पानी में लकड़ी, पत्थर, गोली आदि फेंकने से जैसा आघात होता है, जैसा रूप बनता है, जो प्रभाव होता है, वैसा ही तथा उससे भी अधिक तेज आघात विचारों को फेंकने से होता है।

🔶 मनुष्य के सृजनात्मक विचारों में नव-रचना करने की अदभुद शक्ति है। मनुष्य के जिस रंग, रूप, गुण, कर्म, संस्कार के विचार होते हैं, उसी दिशा में उसकी तीव्र उन्नति होती जाती है। जिसका मन सदा उत्साहपूर्ण रहता है और मन में बड़ा अधिकारी, लेखक, वक्ता, नेता आदि होने की इच्छा होती है, जिसका मन सदैव शून्य में, अपने मानसिक राज्य में बड़ी-बड़ी वस्तुओं की रचना किया करता है, वास्तव में एक दिन वह बड़ा हो जाता है। यही अनुभव की हुई बात है। जितने लोगों ने उन्नति की है या संसार में अमर नाम कमाया है, उन सभी ने विचारों की ही मुख्यता प्रत्येक कार्य में बताई है।
  
🔷 संकल्प में पूरी सच्चाई होनी चाहिए। रचना करने की शक्ति उन्हीं विचारों में होती है, जिनमें सच्चा विश्वास, दृढ़ श्रद्धा होती है। इस विश्व में सब कुछ आपको अपने आत्म विश्वास के अनुसार ही प्राप्त होगा। हमारे मिलने-जुलने से भी हमारे विचारों का बड़ा कार्य होता है, जो लोग प्रसन्नचित्त स्वभाव के होते हैं वे मन में सदा आनन्द के रस में ही डूबे रहते हैं। विपत्ति या कठिनाई आने पर भी वे शुभ विचारों में लीन रहते हैं। उनसे मिलने वाले दुखी और निराश व्यक्ति भी प्रसन्न हो जाता है। प्रसन्न विचारों वाले व्यक्ति जहां जाते हैं, सर्वत्र आनन्द ही आनन्द की वर्षा करते हैं।  इसके विपरीत ऐसे लोग भी हैं, जिनका चेहरे में क्रोध, चिंता, उत्तेजना, जलन से रहता है, उनका चेहरा बदसूरत दीखता है।

🔶 उनके इर्द-गिर्द उदासी का वातावरण छाया रहता है। उनके पास कोई जाना नहीं चाहता और न ही बात करना पसंद करता है। संसार में ऐसे ही मनुष्यों की आवश्यकता है, जिनका हृदय पवित्र प्रेम से पूर्ण हों और आनन्द के स्रोत हों। जिससे संसार में प्रेम, आनन्द और सुख का साम्राज्य हो। परमात्मा का भण्डार मनुष्य अंदर होते हुए भी वह प्रेम, आनन्द और सुख की भीख बाहर दूसरों से मांगता फिरता है। ईश्वर के राज्य में सब वस्तुएं उसी की हैं। फिर सीधे ईश्वर से ही क्यों नहीं मांगते? उस पर विश्वास क्यों नहीं करते? कारण यह है कि बचपन से ही तुम्हें इस बात की शिक्षा नहीं दी गई और संसार की देखा-देखी मनुष्य भी ऐसा ही करने लगे। सुख बाहर नहीं है। आपके मन की शांत और संतुलित स्थिति में है। इसी को शांत करने से, आनन्दमय मन:स्थिति उत्पन्न होती है। केवल ईश्वर पर पूर्ण विश्वास और उच्च भविष्य में विश्वास की आवश्यकता है।
  
🔷 एक धर्म में वर्णन है कि यदि तू मेरे नाम पर मांगे तो मैं अवश्य दूंगा। आगे कहा गया है कि यदि तू मांगता है तो विश्वास कर तू पाएगा। फिर तू अवश्य पा जाएगा। दुख यह है कि हम इन बातों को पढ़ कर भी अपना सुख बाहर ही ढूढ़ते रहते हैं। हमें चाहिए कि हम अपने अंदर छिपे हुए आनन्द के भण्डार पर विश्वास करें।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अपनी वासनाएं काबू में रखिए (भाग 1)

🔷 किसी समय एक चोर ने न्यायाधीश के समक्ष अपनी चोरी की सफाई देते हुए इस भाँति कहा हुजूर मैंने चोरी तो अवश्य की है, परन्तु सच्चा अपराधी मैं नहीं हूँ। मेरे पड़ोसी ने अपना सोने का चमकदार कंठा दिखाकर मेरे मन को मोहित कर लिया और मुझे उसको चुरा लेने के लिए लाचार किया। अतएव सच्चा अपराधी वही है और सजा उसी को होनी चाहिए। अपराधी की ये बाते सुनकर जज साहब को उसकी युक्ति पर हँसी आ गई उन्होंने अपराधी को एकान्त वास की सजा देकर कहा कि अब तुम्हारा मन लुभाने के लिए तुम्हारे सामने कोई मनुष्य न आवेगा।

🔶 यदि सच पूछा जाये तो नैतिक संसार में मनुष्य प्रतिदिन इसी प्रकार की युक्तियों का उपयोग करता रहता है। अमुक मनुष्य मेरे कार्य में बाधा डालता है, अमुख ने मुझसे ऐसी बात कहीं जिससे मुझे क्रोध आ गया, चार आदमियों में बैठते हैं तो लाचार होकर ऐसा काम करना ही पड़ता है-, इत्यादि बातें अपने दोषों को दूसरों के सिर मढ़ने के प्रयत्न नहीं तो क्या हैं?

🔷 कितना अच्छा हो यदि मनुष्य कोई अपराध करने के साथ ही उसे स्वीकार करने में आना-कानी न करे। नैतिक उन्नति की सबसे पहली सीढ़ी यही है कि मनुष्य अपने अपराधों को समझने लगें। हजारों मनुष्य तो बुरे कार्यों को करते रहते और उन बेचारों को रंच मात्र भी खबर नहीं कि ये कार्य वास्तव में बुरे हैं। जिस समय चोर चोरी को सचमुच बुरा समझने लगे उसी समय से जान लो कि अब वह रास्ते पर आ रहा है। परन्तु केवल दिखाऊ मन की इच्छा से अथवा किसी की हाँ में हाँ मिलाने के अभिप्राय से बुरे कार्य बुरा कह देने से कोई नहीं ।

🔶 इससे तो उलटी हानि है। कुकार्य से घृणा होने की बात तो दूर रही, ऐसा करने से तो उसने अपने आपको ही ठगा कहना चाहिए। प्रवंचना अथवा मायाजाल इसी का नाम है परन्तु देखा जाता है कि लोक में मनुष्यों ने इसे ही सभ्यता और शिष्टाचार मान रखा है। ऐसे लौकिक व्यवहार की अवहेलना करने से समाज भले ही असंतुष्ट हो जाए, परन्तु उन्नति की इच्छा रखने वाले मनुष्य को इसमें आगा-पीछा न करना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 महात्मा जेम्स ऐलन
📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1950 पृष्ठ 9


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/April/v1.9

👉 अचिन्त्य चिन्तन से मनोबल न गँवाएँ (भाग 3)

🔷 दुष्प्रवृत्तियाँ, अवांछनीय आदतें, कुविचारणाएँ बहुत समय तक अभ्यास में सन्निहित रहने पर स्वाभाविक प्रतीत होने लगती हैं, निर्दोष लगती हैं और कभी-कभी तो उचित एवं आवश्यक दीखने लगती हैं। उनके प्रति पक्षपात बनता है और मोह जुड़ता देखा गया है। ऐसी दशा में उन्हें ढूँढ़ निकालना और यह समझ सकना तक कठिन पड़ता है कि उनसे कुछ हानियाँ भी हैं या नहीं। इसका निश्चय श्रेष्ठ, सज्जनों और दुष्ट, दुर्जनों की सद्गति एवं दुर्गति का पर्यवेक्षण करते हुए किया जा सकता है।

🔶 जो दुष्प्रवृत्तियों को अपनाते रहे, हेय जनों जैसी मनःस्थिति में संतुष्ट रहे, अचिन्त्य चिन्तन में निरत रहे, उन्हें ठोकरें खाते और ठोकरें मारते हुए ही दिन काटने पड़े हैं, पर जिनने प्रगति की बात सोची और वरिष्ठता के लिए आकाँक्षा जगाई, उन्हें साथ ही वह निर्णय भी करना पड़ा है कि व्यक्तित्व का स्तर उठाने वाली विचार प्रक्रिया को अपनाने, स्वभाव का अंग बनाने में कोई कोर कसर न रहने दी जायेगी।

🔷 इस सन्दर्भ में सर्वप्रथम उन आदतों से जूझना चाहिए जो एक प्रकार से अपंग स्थिति में डाले रखने के लिए उत्तरदायी हैं। पक्षाघात पीड़ितों, अपंगों, अशक्तों की तरह हीनता के विचार भी ऐसे हैं, जिनके रहते किसी का भी पिछड़ेपन से पिण्ड छूटना असम्भव है। लो ब्लड प्रेशर के मरीज ऐसे पड़े रहते हैं, जैसे लंघन करने वाले ने चारपाई पकड़ ली हो और करवट बदलना तक कठिन हो रहा हो। आलसियों की, अकर्मण्यों की गणना ऐसे ही लोगों में होती है। वे समर्थ होते हुए भी असमर्थ बनते हैं, निरोग होते हुए भी रोगियों की चारपाई में जा लेटते हैं।

🔶 आरामतलबी, काहिली, कामचोरी, हरामखोरी ऐसी ही मानसिक व्यथा हैं, जिसके कारण बहुत कुछ कर सकने में समर्थ व्यक्ति भी अपंग-असमर्थों की तरह दिन गुजारता है। ढेरों समय खाली होने पर भी महिलाओं की तरह उसे जैसे-तैसे काटता है, जबकि उन क्षणों का किन्हीं उपयोगी कामों में नियोजन करने के उपरान्त कुछ ही समय में अतिरिक्त योग्यता का धनी बना जा सकता था, सक्षमों, सुयोग्यों, प्रतिभावानों और सुसम्पन्नों की पंक्ति में खड़ा हुआ जा सकता था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Power of Words


Words have far greater power
Than this world will ever know,
For they can heal the broken-hearted
And cause the small and weak to grow.

They give hope to the tired and discouraged,
When said with a warm, loving smile,
And they can strengthen the step of the weary
As they travel that last rugged mile.

Yes, words can lift up the spirits
Of those who are bowed with despair,
For words can fill them with courage,
Because they show them how much you care.

Gentle words spoken at just the right time
Can soften a cold, hardened heart,
And in the dark times of doubt and of fear,
Strength, joy and peace they impart.

So think carefully about each word that you speak,
And how somebody may be affected,
For words can also kill and destroy,
If by love they have not been perfected.

So speak only words that encourage
And cause others in God's love to grow?
Yes, speak only words of hope and of life
So the power of God's love will show.

- Anonymous

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 19)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔷 एक बार अमृत की वर्षा हुई। सारे मरे हुए आदमी जिंदा हो गए। केवल एक आदमी जिंदा नहीं हुआ। लोगों ने पूछा, क्या वजह है? वह आदमी क्यों नहीं जिंदा हुआ? जानने पर यह मालूम हुआ कि वह आदमी अपना मुँह जमीन में गाड़े हुए था और पीठ ऊपर किए हुआ था। लोगों ने कहा, अच्छा, तो यह वजह है कि जो मुरदे मुँह खोले हुए थे, नाक ऊपर किए हुए पड़े थे। उनमें से अमृत की बूँदें किसी की नाक में पड़ गईं, किसी के मुँह में पड़ गईं और वे सब जिंदा हो गए। लेकिन जिसने अपना मुँह पलट कर के रखा था, जमीन में गाड़कर रखा था, उसकी नाक में भी अमृत की बूँदें नहीं जा सकीं और मुँह में भी नहीं जा सकीं।

🔶 इसलिए वह जिंदा नहीं हो सका। बेशक वो आदमी जिंदा नहीं हो सकते, चाहे उनका गुरु कोई भी क्यों न हो। गुरुजी! आप अपने गुरुजी के दर्शन करा दीजिए। हम दर्शन क्यों करा दें? हमारे गुरुजी का दर्शन करके तेरा कोई फायदा नहीं हो सकता। कैसे नहीं होगा? बेटे! वो जिंदगी कहाँ है़ वो सीप कहाँ है, जहाँ कि अमृत की बूँदें पड़ा करती हैं और जिंदगी पैदा हो जाती है।

🔷 मित्रो! हमारे पास अपनी विशेषताएँ होनी चाहिए। अपनी विशेषताएँ नहीं होंगी तो बाहर के आदमी, दूसरे आदमी कोई सहायता नहीं कर सकते। आज तक बाहर वाले आदमियों ने किसी की सहायता नहीं की है। केवल अपना हृदय और अपना मन आगे बढ़ा है, तब दूसरों ने सहायता की है। आदिकाल से यही सिद्धांत था और आगे भी यही रहेगा। इसलिए हम आपको विदा करते वक्त उन लोगों के पास भेजना चाहेंगे, जिनके अंदर विशेषता मालूम पड़ती है और चमक मालूम पड़ती है।

🔶 आप उन सब नौजवानों को निमंत्रण देने जाना, आमंत्रण देने जाना, जिनके घर में बंदूकें हैं, भाले हैं। उनसे कहना कि गाँव जल रहे हैं, गाँव में डकैतियाँ हो रही हैं और चूँकि आपके पास बंदूकें हैं, भाला है, इसलिए आप चलिए। चूँकि आपके पास जवानी है, इसलिए आप चलिए। चूँकि आपके पास जवानी है, इसलिए आप चलिए। चूँकि आपके पास अमुक चीजें हैं, इसलिए आप चलिए। जिन लोगों को आप साधन-संपन्न देखें, उन लोगों को आप निमंत्रण देना। जिनके पास बाल्टी है, उनको आप निमंत्रण देना। जिनके पास रस्सी है, उनको आप निमंत्रण देना। उनसे कहना कि बाल्टी खींचिए। गाँव जल रहा है, उसकी आग को बुझाइए। उनको निमंत्रण देने के लिए हम आपको भेजते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 55)

👉 सद्गुरु की कठोरता में भी प्रेम छिपा है

🔷 अखण्ड वलयाकार चेतना के रूप में जो इस सम्पूर्ण चर-अचर जगत् में व्याप्त हैं, ब्रह्म तत्त्व व आत्म तत्त्व के रूप में यही चेतना उनके श्री चरणों की कृपा से दर्शित होती है। उन श्री सद्गुरु को नमन है॥ ६७॥ वैदिक ऋचाओं एवं उपनिषद् की श्रुतियों के सभी महावाक्य रत्न उनके श्री चरणों में विराजित हैं। उन गुरुदेव की चेतना से सूर्य का प्रकाश पाकर ही वेदान्त का कमल खिलता है, ऐसे सद्गुरु को नमन है॥ ६८॥ जिनके स्मरण करने भर से अपने आप ही ज्ञान उत्पन्न होता है, जो अपने में सभी आध्यात्मिक सम्पदा की प्राप्ति है, उन कृपालु सद्गुरु को नमन है॥ ६९॥ जो परम चैतन्य, शाश्वत, शान्त और आकाश से भी अतीत और माया से परे हैं, वे नाद, बिन्दु एवं कला से भी परे हैं, ऐसे सद्गुरु को नमन है॥ ७०॥
  
🔶 गुरु महिमा के महामंत्रमय स्तोत्र होने के साथ तत्त्वचिंतक को भी प्रकाशित करते हैं। निराकार-माया से परे परमेश्वर ही माया को वशवर्ती करके शिष्य के कल्याण के लिए सद्गुरु की काया धारण करते हैं। वे देहधारी होने पर भी देहातीत हैं। उन्हें जान लेने पर सब कुछ जान लिया जाता है। जो उनकी शरण में गया, उसे सब कुछ स्वयं ही मिल जाता है। उनमें भक्ति, ज्ञान, कर्म, योग, ध्यान आदि सभी सत्य सम्पूर्ण रूप से प्रकाशित है। जिन्होंने भी यह बात अपने अन्तःकरण में धारण कर ली, वे अध्यात्मवेत्ता हो गये।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 90

👉 यह भी नहीं रहने वाला 🙏🌹

एक साधु देश में यात्रा के लिए पैदल निकला हुआ था। एक बार रात हो जाने पर वह एक गाँव में आनंद नाम के व्यक्ति के दरवाजे पर रुका। आनंद ने साध...