शुक्रवार, 30 जून 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 21)

🌹  अपने आपको समाज का एक अभिन्न अंग मानेंगे और सबके हित में अपना हित समझेंगे।

🔴 इसलिए अपनी सद्गति एवं समाज की प्रगति का मार्ग समझकर, व्यक्तिगत सुख- स्वार्थ की अंधी दौड़ बंद करके व्यापक हितों की साधना प्रारंभ करनी चाहिए। अपनी श्रेयानुभूति को क्रमशः सुखों, स्वार्थों से हटाकर व्यापक हितों की ओर मोड़ना ही हमारे लिए श्रेयस्कर है।
  
🔵 भगवान ने मनुष्य को इतनी सारी सुविधाएँ, विशेषताएँ, इसलिए नहीं दी हैं कि वह उनसे स्वयं ही मौज- मजा करे और अपनी काम- वासनाओं की आग को भड़काने और उसे बुझाने के गोरखधंधे में लगा रहे। यदि मौज- मजा करने के लिए ही ईश्वर ने मनुष्य को इतनी सुविधाएँ दी होतीं और अन्य प्राणियों को अकारण इससे वंचित रखा होता तो निश्चय ही वह पक्षपाती ठहरता। अन्य जीवों के साथ अनुदारता और मनुष्य के साथ उदारता बरतने का अन्याय भला वह परमात्मा क्यों करेगा, जो निष्पक्ष, जगत पिता, समदर्शी और न्यायकारी के नाम से प्रसिद्ध है।
 
🔴 युग निर्माण सत्संकल्प में इस अत्यंत आवश्यक कर्तव्य की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है कि मनुष्य का जीवन स्वार्थ के लिए नहीं, परमार्थ के लिए है। शास्त्रों में अपनी कमाई को आप ही खा जाने वाले को चोर माना गया है।

🔵 जो मिला है उसे बाँटकर खाना चाहिए। मनुष्य को जो कुछ अन्य प्राणियों के अतिरिक्त मिला हुआ है वह उसका अपना निज का उपार्जन नहीं, वरन् सृष्टि के आदि से लेकर अब तक के श्रेष्ठ सत्पुरुषों के श्रम एवं त्याग का फल है। यदि ऐसा न हुआ होता तो मनुष्य भी एक दुर्बल वन्य पशु की तरह रीछ- वानरों की तरह अपने दिन काट रहा होता। इस त्याग और उपकार की पुण्य प्रक्रिया का नाम ही धर्म, संस्कृति एवं मानवता है। उसी के आधार पर, प्रगति पथ पर इतना आगे बढ़ जाना संभव हुआ।

🔴 यदि इस पुण्य प्रक्रिया को तोड़ दिया जाए, मनुष्य केवल अपने मतलब की बात सोचने और उसी में लग रहने की नीति अपनाने लगे, तो निश्चय ही मानवीय संस्कृति नष्ट हो जाएगी और ईश्वरीय आदेश के उल्लंघन के फलस्वरूप जो विकृति उत्पन्न होगी, उससे समस्त विश्व को भारी त्रास सहन करना पड़ेगा। परमार्थ की आधारशिला के रूप में जो परमार्थ मानव जाति की अंतरात्मा बना चला आ रहा है, उसे नष्ट- भ्रष्ट कर डालना, स्वार्थी बनकर जीना निश्चय ही सबसे बड़ी मूर्खता है। इस मूर्खता को अपनाकर हम सर्वतोमुखी आपत्तियों को ही निमंत्रण देते हैं और उलझनों के दलदल में आज की तरह ही दिन- दिन गहरे धँसते चले जाते हैं।
  
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.32

http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Sankalpaa/apane.2

👉 कायाकल्प का मर्म और दर्शन (भाग 9)

🔴 आप जागरूक रहिए। आप उदार तो रहें; लेकिन भलमनसाहत को उस सीमा तक मत ले जाएँ, कि आपकी जागरूकता ही चली जाए। दुनिया में बहुत अच्छे आदमी हैं; लेकिन बुरे आदमी भी कम नहीं हैं। बुरे आदमियों के प्रति आपको जागरूक रहना चाहिए, कोई आप पर हमला न कर दे, कोई आपकी भलमनसाहत का अनुचित फायदा न उठा ले—इस दृष्टि से आपके जागरूक रहने की भी जरूरत है और उदार रहने के लिए? दूसरों की सेवा करने के लिए मैं आपसे कब मना करता हूँ? दूसरों की सहायता करने के लिए मैं आपसे कब मना करता हूँ? लेकिन मैं यह कहता हूँ कि आप ऐसा मत कीजिए कि आपकी सद्भावना और उदारता का लोग अनुचित लाभ उठा जाएँ और आपको उल्लू बनाते फिरें। ऐसा मत कीजिए। जागरूक भी रहिए और उदार भी बनिए। दोनों का समन्वय कीजिए।

🔵 आप सज्जन भी रहिए और शूरवीर भी रहिए। नहीं, हम तो सज्जन रहेंगे। सज्जन रहेंगे, तो क्या कायर बनेंगे?  सज्जन का मतलब क्या यह होता है कि कोई आदमी आपकी बहिन-बेटी से छेड़खानी करे और आपके प्रति बुरा सलूक करे तब भी आप सब कुछ देखते-सहते रहें? यही सोचते रहेंगे कि हमें क्या करना है, भगवान की मर्जी है, ऐसा ही हमारे भाग्य में लिखा है, तब आप ऐसा ही करेंगे। नहीं, सज्जन तो बनिए; लेकिन उसके साथ में अपनी शूरवीरता को गँवाइए मत। सज्जन इसीलिए हारते रहे हैं कि उन्होंने शूरवीरता गँवा दी। सज्जन हो गये, तो कायर हो गये। सज्जनता का अर्थ कायरता नहीं होता। सज्जनता के साथ में शूरता की भी प्रमुखता रहनी चाहिए। आप समग्र जीवन जिएँ। सज्जन भी बनें और शूरवीर भी बनें, उदार भी बनें और जागरूक भी बनें, नम्र भी बनें और सम्मान भी दें। इसी तरीके से जीवन में दोनों को मिला करके जियेंगे, तो बहुत अच्छा रहेगा।

🔴 आप जा ही रहे हैं तो एक और नया दृष्टिकोण बना करके जाइए कि हमारे आप सघन मित्र और सहयोगी हैं। आप गुरु-चेले की बात मत कीजिए। गुरु-चेला उसे कहते हैं, जो दिया करता है और लिया करता है। आप ऐसा मत कीजिए। आप हमारे सहयोगी और मित्र बन जाइए। मित्र मुझे बहुत पसन्द रहे हैं। मित्रों को मैं बहुत प्यार करता हूँ। क्यों? क्योंकि मित्र कीमत चुकाकर कीमत उतार देते हैं और भिखारी, गुरु-चेले? ये ऐसे ही हैं, चावल दे दिये, माला पहना दी, बस प्रसन्न हो गये। आप ऐसा मत कीजिए। आप मित्र बन जाइए हमारे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्मचिंतन के क्षण 30 June

🔴 आध्यात्मिक साधना की सफलता के लिए सबसे पहला एवं अनिवार्य कदम “इन्द्रिय निग्रह” है। यों ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच मानी जाती हैं, पर उनमें से दो ही प्रधान हैं पहली- स्वादेन्द्रिय और दूसरी कामेन्द्रिय। इनमें से स्वादेन्द्रिय प्रधान है। उसके वश में आने से कामेन्द्रिय भी वश में आ जाती है। रसना को जिसने जीता, वह विषय वासना पर भी अंकुश रख सकेगा। चटोरा आदमी ब्रह्मचर्य से नहीं रह सकता, उसे सभी इन्द्रियाँ परेशान करती हैं, विशेष रूप से काम वासना तो काबू में आता ही नहीं। इसलिए इन्द्रिय-निग्रह की तपश्चर्या संयम, साधना, स्वाद को, जिव्हा को वश में करके आरंभ की जाती है। चटोरेपन की वेदी पर न केवल आरोग्य और दीर्घ जीवन बलि चढ़ जाता है, वरन् आत्मसंयम की साधना भी मात्र मखौल बनकर रह जाती है।

🔵 संयमी और सदाचारी ही प्राणवान, शक्तिवान, स्वस्थ एवं संस्कारी बनते तथा भौतिक और आध्यात्मिक आनन्द की उपलब्धि कर सकते हैं। ओजस्वी, तेजस्वी एवं मनस्वी होने का अर्थ है मन, वचन तथा कर्म से सभी इन्द्रियों पर नियंत्रण रखना। ब्रह्मचर्य इसे ही कहा जाता है। इसका पालन न तो कठिन है न असंभव। आवश्यकता मात्र ऊर्ध्वरेता बनने और ऊंचा उठने की आकाँक्षा की है। इस संबंध में महात्मा गाँधी का कहना है कि आत्म संयम की साधना करने वाले को सर्वप्रथम अपनी रसना को वश में रखना अनिवार्य है। इसके लिए स्वाद नियंत्रण परमावश्यक है।
                                              
🔴 अपनी वासनाओं पर काबू रखना, उन्हें कुमार्ग पर न जाने देना मनुष्य के शौर्य, पराक्रम एवं पुरुषार्थ का प्रधान चिन्ह है। मनः क्षेत्र में कुहराम मचाने वाली उत्तेजनाएँ, आवेश, असंतुलन एवं विकार इन्द्रियों के असंयम के ही परिणाम होते हैं। जब तक स्वाद या चटोरेपन के वशीभूत हो स्वादेन्द्रिय पेट पर अत्याचार करती रहेंगी, तब तक इन विकारों से छुटकारा पाना संभव नहीं।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 30 June 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 June 2017


👉 जीवन लक्षः-

🔵 एक नौजवान को सड़क पर चलते समय एक रुपए का सिक्का गिरा हुआ मिला। चूंकि उसे पता नहीं था कि वो सिक्का किसका है, इसलिए उसने उसे रख लिया।  सिक्का मिलने से लड़का इतना खुश हुआ कि जब भी वो सड़क पर चलता, नीचे देखता जाता कि शायद कोई सिक्का पड़ा हुआ मिल जाए।

🔴 उसकी आयु धीरे-धीरे बढ़ती चली गई, लेकिन नीचे सड़क पर देखते हुए चलने की उसकी आदत नहीं छूटी। वृद्धावस्था आने पर एक दिन उसने वो सारे सिक्के निकाले जो उसे जीवन भर सड़कों पर पड़े हुए मिले थे। पूरी राशि पचास रुपए के लगभग थी। जब उसने यह बात अपने बच्चों को बताई तो उसकी बेटी ने कहा:-

🔵 "आपने अपना पूरा जीवन नीचे देखने में बिता दिया और केवल पचास रुपए ही कमाए। लेकिन इस दौरान आपने हजारों खूबसूरत सूर्योदय और सूर्यास्त, सैकड़ों आकर्षक इंद्रधनुष, मनमोहक पेड़-पौधे, सुंदर नीला आकाश और पास से गुजरते लोगों की मुस्कानें गंवा दीं। आपने वाकई जीवन को उसकी संपूर्ण सुंदरता में अनुभव नहीं किया।

🔴 हममें से कितने लोग ऐसी ही स्थिति में हैं। हो सकता है कि हम सड़क पर पड़े हुए पैसे न ढूंढते फिरते हों, लेकिन क्या यह सच नहीं है कि हम धन कमाने और संपत्ति एकत्रित करने में इतने व्यस्त हो गए हैं कि जीवन के अन्य पहलुओं की उपेक्षा कर रहे हैं? इससे न केवल हम प्रकृति की सुंदरता और दूसरों के साथ अपने रिश्तों की मिठास से वंचित रह जाते हैं, बल्कि स्वयं को उपलब्ध सबसे बड़े खजाने-अपनी आध्यात्मिक संपत्ति को भी खो बैठते हैं।

🔵 आजीविका कमाने में कुछ गलत नहीं है। लेकिन जब पैसा कमाना हमारे लिए इतना अधिक महत्वपूर्ण हो जाए कि हमारे स्वास्थ्य, हमारे परिवार और हमारी आध्यात्मिक तरक्की की उपेक्षा होने लगे, तो हमारा जीवन असंतुलित हो जाता है। हमें अपने सांसारिक उत्तरदायित्वों का निर्वाह करने के साथ-साथ अपनी आध्यात्मिक प्रगति की ओर भी ध्यान देना चाहिए। हमें शायद लगता है कि आध्यात्मिक मार्ग पर चलने का मतलब है सारा समय ध्यानाभ्यास करते रहना, लेकिन सच तो यह है कि हमें उस क्षेत्र में भी असंतुलित नहीं हो जाना चाहिए।

🔴 अपनी प्राथमिकताएं तय करते समय हमें रोजाना कुछ समय आध्यात्मिक क्रिया को, कुछ समय निष्काम सेवा को, कुछ समय अपने परिवार को और कुछ समय अपनी नौकरी या व्यवसाय को देना चाहिए। ऐसा करने से हम देखेंगे कि हम इन सभी क्षेत्रों में उत्तम प्रदर्शन करेंगे और एक संतुष्टिपूर्ण जीवन जीते हुए अपने सभी लक्ष्यों को प्राप्त कर लेंगे। समय-समय पर यह देखना चाहिए कि हम अपना लक्ष्य प्राप्त करने में सफल हो भी रहे हैं अथवा नहीं। हो सकता है कि हमें पता चले कि हम अपने करियर या अपने जीवन के आर्थिक पहलुओं की ओर इतना ज्यादा ध्यान दे रहे हैं कि परिवार, व्यक्तिगत विकास और आध्यात्मिक प्रगति की उपेक्षा हो रही है।

🌹 पं श्रीराम आचार्य

👉 उदारता और संकीर्णता :-

🔴 राजा सत्यनारायण की दो अलग अलग वाटिका मे एक विशेष वृक्ष था और राजा स्वयं अपने हाथो से उन वृक्षों को जल देने जाते थे और उन्हे सींचते व हमेशा हराभरा बनाये रखते थे!

🔵 एक बार उन्हे अचानक लम्बी अवधी के लिये राज्य से बहुत दुर जाना पड़ा जाते जाते उन्होंने उन वृक्षों की जिम्मेदारी अपनी दो सन्तानों को दी और उन्हे कहा की तुम दोनो का एक ही कार्य है की तुम्हे इन वृक्षों को अपनी जान से ज्यादा सम्भालकर रखना है और याद रखना की इनकी हरियाली समाप्त न हो पाये अन्यथा कहर ढा जायेगा सारा राज्य समाप्त सा होकर रह जायेगा !

🔴 एक वर्ष के बाद राजा पुनः अपने राज्य मे लोटे तो उन्होंने देखा की एक वृक्ष तो हराभरा है और दूसरा खड़ा तो है पर पुरी तरह से सूखा हुआ था!

🔵 राजा ने तत्काल दोनो संतानों को बुलाया और कहा क्यों रे तुमने इन्हे पानी नही दिया तो एक संतान ने कहा हॆ आदरणीय पिताश्री पानी तो हम दोनो ने ही दिया पर इसने वृक्ष की जड़ को समाप्त कर दिया हालाँकि इसने कोई कमी न रखी परन्तु ये जड़ को न बचा पाया और वृक्ष भीतर ही भीतर समाप्त होता चला गया और मैने इसे बहुत समझाया की जड़ को बचा नही तो पुरा वृक्ष समाप्त हो जायेगा परन्तु इसने मेरी एक न सुनी और अब पश्चाताप कर रहा है पर अब बहुत देर हो चुकी है...!

🔴 पर जाते समय मैने कहा था की वृक्ष को खुशहाल रखना है और फल प्राप्त करना है तो जड़ का विशेष ध्यान रखना...!

🔵 हाँ पिताश्री , और आपके कथनानुसार और आपकी कृपा से मैने जड़ को बचा लिया इसलिये ये वृक्ष हराभरा है !

🌹👉 सारांश

🔴 ये सारी सृष्टि और मनुष्य की सारी जिन्दगी एक वृक्ष की तरह ही तो है और "राम" इस सॄष्टि के मूलतत्व है और जिस जिस ने संकीर्णता और विकारों की ज्वाला से  "मूल" को बचा लिया उसके जीवन का वृक्ष कभी नही सूखा और जिसने संकीर्णता की चादर ओढ़ ली एकदिन उसका समूल विनाश हो गया !

🔵 यहाँ दो चादर है एक उदारता की दूसरी संकीर्णता की जिसने उदारता की चादर ओढ़ ली एकदिन उसके लिये सारा जगत "राममय" हो गया वो हर जीव मे , सारी सृष्टि मे , कणकण मे अपने "आराध्य" को देखता है और उसके मानव जीवन का लक्ष्य हराभरा हो जाता है !

🔴 उदारता ही जीवन है और संकीर्णता ही मृत्यु और उदारतापूर्वक अपने आराध्य के मार्ग पे चलते रहना और एक दिन उस अवस्था को पाने का प्रयास करना की हमें हर जीव और कण कण मे अपने आराध्य दिखने लगे जैसे की भक्त प्रहलाद को सर्वत्र नारायण ही दिखाई देते थे और ये उज्जवल अवस्था संकीर्णता से नही उदारता से प्राप्त की जा सकती है इसलिये जिन्दगी मे उदारवादिता के साथ आगे बढ़ना संकीर्णता से नही क्योंकि संकीर्ण एक दिन अशांति के गहरे अन्धकार मे लुप्त हो जाते है।