सोमवार, 18 अप्रैल 2016

घास की रोटियां और कीचड़ का पानी पीने को मजबूर हैं बुंदेलखंड के किसान।


बालिका वधु की एक्ट्रेस प्रत्यूषा बनर्जी की मौत के दुःख ने सारे देश को झकझोर कर रख दिया. टेलीविज़न पर भी स्टार्स और न्यूज़ एंकरों ने प्रत्युषा को लेकर जम कर बहस की. फेसबुक और ट्विटर पर हर दूसरा यूज़र प्रत्यूषा को श्रंद्धाजलि देने में लग गया. ऐसा लगा जैसे सारे देश में बस प्रत्यूषा ही एकलौता मुद्दा है, जिससे सब आहत हैं. ऐसा नहीं कि प्रत्युषा की मौत का दुःख लाज़मी नहीं था या उससे हमें दुःख नहीं. पर क्या आप जानते हैं कि हर रोज कितने किसान गरीबी की मार झेल कर मौत को गले लगाते हैं या बीती रात कितने लोग बगैर खाये सो गए थे? शायद नहीं. इससे हमें क्या फर्क पड़ता है? वो लोग थोड़ी न कोई सेलेब्स हैं, जिनकी मौत का दुःख करके हम भी फेसबुक के ट्रेंड कर रहे ऑप्शन से लोगों की नज़रों में आ पाएंगे. अब कुछ लोग कह सकते हैं कि मीडिया जो दिखाता है हम वही देखते हैं. पर मीडिया को ये अधिकार दिया किसने? हमनें. जो TRP बढ़ाने के लिए हर वो खबर दिखाने पर आमादा है, जो उनकी जेब भरने में सहायक हो. इस सब के बीच में धरातल और सतही ख़बरें बेशक ही छूट क्यों न जाएं.


यह हालत है खुद को विकासशील कहने वाले भारत की, जहां के बुंदेलखंड में बीते 6 सालों में 3223 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. जबकि 62 लाख से ज़्यादा लोग पलायन कर अपने पीछे छप्पर और मिट्टी वाले कच्चे मकान छोड़ गए हैं.


यहां सूखे का आलम यह है कि लोग भूख मिटाने के लिए घास से बनी रोटियां और कीचड़ से पानी निकाल कर पीने को मजबूर हैं.


देश तरक्की कर रहा है, हम सबको दिखाई दे रहा है. हमारी GDP भी आज विश्व सूचकांक पर अपनी स्थिति दर्ज करा रही है. रोज नई योजनाएं बनाई जा रही हैं, रोज नए वादे किये जा रहे हैं. पर असल में हमारे देश की क्या स्थिति है, ये हम खुद नहीं जानते.

जवान पिता बूढ़े हो जाते हैं..

 
हर साल सर के बाल कम हो जाते हैं

बचे बालों में और भी चांदी पाते  हैं 

चेहरे पे झुर्रियां बढ़ जाती हैं

रीसेंट पासपोर्ट साइज़ फोटो में कितना अलग नज़र आते हैं

"कहाँ पहले जैसी बात" कहते जाते हैं

देखते ही देखते, जवान पिताजी बूढ़े हो जाते हैं.....


सुबह की सैर में चक्कर खा जाते हैं

मौहल्ले को पता पर हमसे छुपाते हैं 

प्रतिदिन अपनी खुराक घटाते हैं 

तबियत ठीक है, फ़ोन पे बताते हैं

ढीली पतलून को टाइट करवाते हैं

देखते ही देखते, जवान पिताजी बूढ़े हो जाते हैं....


किसी का देहांत सुन घबराते हैं

और परहेजो की संख्यां बढ़ाते हैं 

हमारे मोटापे पे, हिदायतों के ढेर लगाते हैं

तंदुरुस्ती हज़ार नियामत, हर दफे  बताते हैं

"रोज की वर्जिश" के फायदे गिनाते हैं

देखते ही देखते जवान पिताजी बूढ़े हो जाते हैं....


हर साल शौक से बैंक जाते हैं

अपने जिन्दा होने का सबूत दे कितना हर्षाते है 

जरा सी बड़ी पेंशन पर फूले नहीं समाते हैं

एक नई  "मियादी जमा" करके आते हैं

अपने लिए नहीं, हमारे लिए ही बचाते हैं 

देखते ही देखते जवान पिताजी बूढ़े हो जाते हैं....

चीज़े रख कर अब अक्सर भूल जाते हैं

उन्हें  ढूँढने में सारा घर सर पे उठाते हैं

और मां को पहले की ही तरह हड़काते हैं

पर उससे अलग भी नहीं रह पाते हैं

एक ही किस्से को कितनी बार दोहराते हैं

देखते ही देखते जवान पिताजी बूढ़े हो जाते हैं....


चश्मे से भी अब
ठीक से नहीं देख पाते हैं

ब्लड प्रेशर की दवा लेने में
आनाकानी मचाते हैं

एलोपैथी के साइड इफ़ेक्ट बताते हैं

योग और आयुर्वेद की ही रट लगाते हैं

अपने ऑपरेशन को और आगे टलवाते हैं

देखते ही देखते जवान पिताजी बूढ़े हो जाते हैं....


उड़द की दाल अब नहीं पचा पाते हैं

लौकी, तुरई और धुली मूंग ही अधिकतर खाते हैं

दांतों में अटके खाने को  तिल्ली से खुजलाते हैं

पर डेंटिस्ट के पास कभी नहीं जाते  हैं

काम चल तो रहा है की ही धुन लगाते हैं

देखते ही देखते जवान पिताजी बूढ़े हो जाते हैं....


हर त्यौहार पर हमारे आने की बाट जोहते जाते हैं
अपने पुराने घर को नई दुल्हन सा चमकाते हैं
हमारी पसंदीदा चीजों के ढेर लगाते हैं

हर  छोटे-बड़ी  फरमाईश पूरी करने  के लिए
फ़ौरन ही बाजार दौडे चले जाते हैं

पोते-पोतियों से मिल कितने आंसू टपकाते हैं
देखते ही देखते जवान पिताजी बूढ़े हो जाते हैं....

हर पिता को समर्पितं ..... सादर 🙏 🙏

👉 आत्मचिंतन के क्षण 15 Dec 2018

प्रतिभा किसी पर आसमान से नहीं बरसती, वह अंदर से ही जागती है। उसे जगाने के लिए केवल मनुष्य होना पर्याप्त है। वह अन्य कोई प्रतिबन्ध नहीं...