शनिवार, 8 अप्रैल 2017

👉 आज का सद्चिंतन 9 April 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 9 April 2017


👉 तुम मेरा काम करो हम तुम्हारा काम करेंगे

🔴 मेरी पत्नी को प्रायः पेट में दर्द बना रहता था। उस समय मैं बिहार में सरकारी नौकरी कर रहा था। घटना सन् १९९० की है। एक दिन अचानक पत्नी के पेट में दर्द उठा, दर्द इतना असहनीय था कि घर के सभी लोग परेशान हो उठे। मैं उस समय ऑफिस में था। मेरा नाती घबराया हुआ मेरे पास आया और मुझसे बताया कि नानी की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई है। आप जल्दी चलिए। मैं तुरन्त भागकर घर पहुँचा। पत्नी को लाकर अस्पताल में भर्ती करवा दिया। अस्पताल में दवा इलाज बराबर चलता रहा, लेकिन कोई राहत नहीं मिल रही थी। तीन दिन के बाद मैंने डॉक्टर से पत्नी को डिस्चार्ज करने की पेशकश की।

🔵 चूँकि सन् १९९० के श्रद्धांजलि समारोह में मुझे हरिद्वार जाना था। रिजर्वेशन पहले से ही करवा रखा था। इस वजह से मैं बहुत परेशान था कि पत्नी का इलाज कराऊँ या हरिद्वार जाऊँ। पशोपेश की स्थिति में दिन बीतते रहे और अन्ततः वह दिन भी आ पहुँचा, जिस दिन मेरी ट्रेन जालियाँवाला बाग से हरिद्वार के लिए थी। मैं बहुत सोच में पड़ गया था कि क्या करूँ। तभी याद आया, गुरुदेव माता जी के आश्वासन तुम्हारे घर- परिवार के कुशलक्षेम का हम ध्यान रखेंगे, तुम मेरा काम करो, हम तुम्हारा काम करेंगे। मैं जिनकी शरण में हूँ वे सर्वसमर्थ हैं इस बात का संज्ञान था फिर भी असमंजस की स्थिति ऐसी थी कि कुछ निर्णय नहीं कर पा रहा था।

🔴 अन्ततः निर्णय भवितव्य पर छोड़कर मैं वंदनीया माता जी का ध्यान करने बैठ गया। द्रौपदी, ग्राह- गजराज, ध्रुव- प्रह्लाद, सुदामा जैसे अनेकों उदाहरण चलचित्र की भाँति मस्तिष्क में उभरते रहे। ध्यान से उठा, तो हमारी बुद्धि निश्चयात्मक हो चुकी थी। मैंने अपनी पत्नी से बड़े विश्वास भरे शब्दों में कहा कि अब तुम्हारा सब रोग सामान्य हो जायेगा। मैं माताजी से तुम्हारे लिये प्रार्थना करूँगा। उन्होंने सहर्ष स्वीकृति प्रदान की। मैंने तुरन्त सामान उठाया तथा स्टेशन की ओर चल दिया।

🔵 दूसरे दिन हरिद्वार पहुँचकर जब माताजी से मिला तो पत्नी के बारे में सारी बातें बताई। माताजी ने पत्नी का नाम तथा रोग के बारे में लिखकर देने को कहा और बोलीं सब ठीक हो जाएगा। इसके बाद मैं श्रद्धांजलि समारोह के कार्यक्रमों में इस तरह तन- मन से रम गया कि घर परिवार का फिर ध्यान ही नहीं आया। कार्यक्रम समाप्त हुआ तो मैं घर वापस आने पर पत्नी से दर्द के बारे में पूछा तो वह बोली कि आपके जाने के बाद से न जाने दर्द कहाँ चला गया। आज लगभग २१ वर्ष बीत गए लेकिन अब तक वह बिल्कुल ठीक है, दर्द की कोई शिकायत नहीं है। इस घटना से मैं इस तरह प्रभावित हुआ कि मिशन के प्रति समर्पित हो गया तथा पूज्यवर की अपेक्षाओं के अनुरूप आत्म निर्माण और लोक कल्याण के कार्यों में निरंतर लगा रहता हूँ। आज भी इसी सेवा में समर्पित हूँ।                   
  
🌹 बालेश्वर प्रसाद, पूर्वी सिंहभूम (झारखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Wonderful/tum

👉 ज्योतिष पुरुषार्थ का प्रबल शत्रु

🔵 नेपोलियन बोनापार्ट की प्रेमिका जेसोफाइन ने एक बार उसे एक पत्र लिखा-मैं देखती हूँ, जो फ्रांस एक दिन पुरुषार्थ के ढाँचे में पूरी तरह ढल चुका था, जिसे आपने पराक्रम का पाठ पढा़या था, आज उसी फ्रांस की नसें आपके देववाद के आश्रय के कारण शिथिल पडती जा रही है। मनुष्य अपनी भुजाओं, अपने शस्त्र पर भरोसा न करे और यह सोचे कि घडी, शकुन, देवता उसकी सहायता कर जायेंगे। मैं समझती इससे बड़कर मानवीय शक्ति का और कोई दूसरा अपमान नहीं ही सकता।

🔴 ऐसा पत्र लिखने का खास कारण था। एक समय था, जब नेपोलियन ज्योतिष पर बिल्कुल भी विश्वास नही करता था। उसके सेनापति चाहते थे कि नेपोलियन ज्योतिषियों से पूछकर कोई कदम बढा़या करे, किंतु नेपोलियन ने उनको डाँटकर कहा-ईश्वर यदि सहायक हो सकता है तो वह पराक्रमी और पुरुषार्थियों के लिए है। भाग्यवाद का आश्रय लेने वालों को पिसने और असफलता का मुँह देखने के अतिरिक्त हाथ कुछ नहीं लगता।

🔵 जब तक नेपोलियन अपने सिद्धांत पर दृढ़ रहा, तब तक वह अकेला ही दुश्मनों के छक्के छुड़ाता रहा, पर दुर्भाग्य, एक दिन वह स्वयं भी देववाद पर विश्वास करने लगा। वह पत्र उसी संदर्भ में लिखा गया था। नेपोलियन की यही ढील अंतत उसके पराजय का कारण बनी।

🔴 भारतीय तत्वदर्शन की अनेक शाखाओं में ज्योतिष का भी विधान है, पर वह विशुद्ध गणित के रूप है और उसका विकास होना चाहिए, किंतु उसके फलितार्थ सामूहिक रूप से सारी पृथ्वी और मानव जाति के जीवन को प्रभावित करते हैं। व्यक्तिगत जीवन में स्थान-स्थान पर ज्योतिष और भाग्यवाद के पुँछल्ले असफलता और पतन के ही कारण हो सकते है। नेपोलियन बोनापार्ट की तरह हमारे देश भारतवर्ष के साथ भी ऐसा ही हुआ। फलित के चक्कर में पड़कर सारे देश के पराक्रम की नसे ढीली पड गई और हमें सर्वत्र पराजय का मुँह देखना पडा। सोमनाथ का मंदिर लुटा तब ज्योतिषियों के अनुसार मुहूर्त नहीं था। यदि सैनिक उस पाखंड को न मानते तो भारत देश की यह दुर्गति न होती। आज भी ज्योतिष के चक्कर में पड़कर हमारी सफलता के सोमनाथ लुटते रहते है और हम अपनी उन्नति के लिये भाग्य का मुख ताकते खडे रहते हैं।

🔵 आज हमारे देश को अब्राहम लिंकन जैसे औंधे भाग्य को अपने पुरुषार्थ और पराक्रम से सीधा करने वाले होनहारों की आवश्यकता है। उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका में गृह-युद्ध शुरू हो गया था। लगता था दोनों राज्य अलग-अलग होकर ही रहेंगे। तभी अब्राहम लिंकन ने अपना एक ऐतिहासिक निर्णय दिया कि दोनों प्रदेशों की एकता सैनिक शक्ति के द्वारा अक्षुण्ण रखी जायेगी। उसने युद्ध की सारी तैयारी कर भी ली।

🔴 उसी समय उनका एक मित्र आया। उसने कहा-महोदय! अपने निर्णय पर अमल करने से पूर्व आप ज्योतिषियों से भी राय ले लें, मैं तीन ज्योतिषियों को लेकर आया हूँ। वे पास के कमरे मैं ही आपकी प्रतीक्षा कर रहे है।

🔵 लिंकन ने सोचा ज्योतिषी कभी एक राय के नही होते इसी से सिद्ध है कि वे अंतिम सत्य नही। लिंकन ने अपने सैनिक बुलाए और कहा-इस बगल के कमरे में राष्ट्र के तीन शत्रु बैठे हैं, दरवाजा बंद कर ताला लगा दो जब तक हम विजयी होकर नहीं लौटते ताला न खोला जाए। ज्योतिषवाद के भ्रम में पड़कर लिंकन अपने पराक्रम ओर पुरुषार्थ के पथ से विचलित हो जाते तो अमेरिका एकता के युद्ध का और ही दृश्य होता। हमारे जीवन में जो पग-पग पर असफलताएँ दिखाई दे रही हैं, वह हमारे भाग्यवाद के कारण ही है, यदि हम हीन भाव को भगा दें तो जीवन संग्राम में हम भी लिंकन के समान ही सर्वत्र सफलता अर्जित कर सकते है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 127, 128

👉 जप में ध्यान द्वारा प्राणप्रतिष्ठा (अन्तिम भाग)

🌹 उपरोक्त ध्यान गायत्री उपासना की प्रथम भूमिका में आवश्यक है। भजन के साथ भाव की मात्रा भी पर्याप्त होनी चाहिए। इस ध्यान को कल्पना न समझा जाए, वरन् साधक अपने को वस्तुतः उसी स्थिति में अनुभव करे और माता के प्रति अनन्य प्रेमभाव के साथ तन्मयता अनुभव करे। इस अनुभूति की प्रकटता में अलौकिक आनंद का रसास्वादन होता है और मन निरंतर इसी में लगे रहने की इच्छा करता है। इस प्रकार मन को वश में करने और एक ही लक्ष्य में लगें रहने की एक बड़ी आवश्यकता सहज ही पूरी हो जाती है।

🔴 साधना की दूसरी भूमिका तब प्रारंभ होती है, जब मन की भाग-दौड़ बंद हो जाती है और चित्त जप के साथ ध्यान में संलग्न रहने लगता है। इस स्थिति को प्राप्त कर लेते पर चित्त को एक सीमित केंद्र पर एकाग्र करने की और कदम बढ़ाना पड़ता है। उपर्युक्त ध्यान के स्थान पर दूसरी भूमिका में साधक सूर्यमंडल के प्रकाश में गायत्री माता के सुँदर मुख की झाँकी करता है। उसे समस्त विश्व में केवल मात्र एक पीतवर्ण सूर्य ही दीखता है और उसके मध्य में गायत्री माता का मुख हँसता-मुखमंडल को ध्यानावस्था में देखता है। उसे माता के अधरों से, नेत्रों से, कपोलों की रेखाओं से एक अत्यंत मधुर स्नेह, वात्सल्य, आश्वासन, साँत्वना एवं आत्मीयता की झाँकी होती रहती है। वह उस झाँकी होती रहती है। वह उस झाँकी को आनंदविभोर होकर देखता रहता है और सुधि-बुधि भुलाकर भुलाकर चंद्र-चकोर की भाँति उसी में तन्मय होता है।

🔵 इस दूसरी भूमिका की सीमा सीमित हो गई। पहली भूमिका में माता-पुत्र दोनों का क्रीड़ा विनोद काफी विस्तृत था। मन को भागने-दौड़ने के लिए उस ध्यान में बहुत बड़ा क्षेत्र पड़ा था। दूसरी भूमिका में वह संकुचित हो गया। सूर्यमंडल के मध्य माता की भावपूर्ण मुखाकृति पहले ध्यान की अपेक्षा काफी सीमित है। मन को एकाग्र करने की परिधि को आत्मिक विकास के साथ-साथ क्रमशः सीमित ही करते जाना होता है।

🔴 इस दूसरी भूमिका की सीमा सीमित हो गई। पहली भूमिका में माता-पुत्र दोनों का क्रीड़ा विनोद काफी विस्तृत था। मन को भागने-दौड़ने के लिए उस ध्यान में बहुत बड़ा क्षेत्र पड़ा था। दूसरी भूमिका में वह संकुचित हो गया। सूर्यमंडल के मध्य माता की भावपूर्ण मुखाकृति पहले ध्यान की अपेक्षा काफी सीमित है। मन को एकाग्र करने की परिधि को आत्मिक विकास के साथ-साथ क्रमशः सीमित ही करते जाना होता है।

🌹 -अखण्ड ज्योति – मई 2005 पृष्ठ 20

👉 विनाश नहीं सृजन होने जा रहा है

🔴 वैज्ञानिक, राजनेता, भविष्यवक्ता, अन्वेषक अपने-अपने तर्क और तथ्य आगे रखकर यह प्रमाणित करने का प्रयत्न कर रहे हैं कि महाविनाश में अब उँगलियों पर गिनने जितने समय को देर है किसी सीमा तक उठे हुए कदम अब वापस नहीं लौटेंगे। इन प्रवक्ताओं के कथन अनुमान, विश्लेषण पर कोई आक्षेप न करते हुए हमें यह पूरी हिम्मत के साथ कहने ही छूट मिली है कि आतंक के समय रहते शान्त होने की भविष्यवाणी करें और जन साधारण से कहें कि विकसित होने की अपेक्षा सृजन की बात सोचें। दुनिया यह नहीं रहेगी जो आज है। उसकी मान्यताएं, भावनाएं, विचारणाएं। आकांक्षाएं ही नहीं, गतिविधियाँ भी इस तरह बदलेंगी कि सब कुछ नया-नया प्रतीत होने लगे।

🔵 आज से पाँच सौ वर्ष पुराना कोई मनुष्य कहीं जीवित हो और आकर अबकी भौतिक प्रगति के दृश्य देखे तो उसे आश्चर्यचकित होकर रह जाना पड़ेगा और कहना पड़ेगा कि यह उसके जानने वाली दुनिया नहीं रही। यह तो भूतो की बस्ती जैसी बन गई है। सचमुच पिछले दिनों बुद्धिवाद और भौतिकवाद की सम्मिलित संरचना हुई भी ऐसी ही है जिसे असाधारण अद्भुत, अनुपम और आश्चर्यजनक परिवर्तन कहा जा सके।

🔴 ठीक इसी के समतुल्य दूसरा परिवर्तन होने जा रहा है। उसके लिए पाँच सौ वर्ष प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी। इस नये परिवर्तन के लिए एक शताब्दी पर्याप्त है। आज की चकाचौंध जैसी परिस्थितियाँ और आसुरी मायाचार जैसी समस्याएँ अब इन दिनों भयावह लगती है और उनके चलते प्रवाह को देखकर लगता है कि सूर्य अस्त हो चला और निविड़ निशा से भरा अंधकार अति समीप आ पहुँचा पर ऐसा होगा नहीं। यह ग्रहण की युति है। बदली की छाया है, जिसे हटा देने वाले प्रचंड आधार विद्यमान भी हैं और गतिशील भी। लंका काण्ड की नृशंसता के उपरान्त रामराज्य का सतयुग वापस आया था। वैसी ही पुनरावृत्ति की हम अपेक्षा कर सकते हैं।

🔴 विनाश की सोचते और चेष्टा करते हुए मनुष्य का बुद्धि संसार थक जायेगा और वैभव के साधन स्रोत सूख जायेंगे। उन्हें नये सिरे से नई बातें सोचनी पड़ेगी कि प्रवाह की इस दिशा को उलट दिया जाय और उपलब्ध साधनों को सृजन के लिए लगाया जाय। ऊपर से पड़ने वाले दबाव ऐसी ही उलट फेर संभव करेंगे। उनने उलटे को उलट कर सीधा करने का निश्चय कर लिया है।

🌹 पूज्य पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
🌹 अखण्ड ज्योति, अगस्त 1986 पृष्ठ 19-20

👉 आत्मचिंतन के क्षण 9 April

🔴 भगवान् के द्वार निजी प्रयोजनों के लिए अनेकों खटखटाते पाये जाते हैं, पर अबकी बार भगवान् ने अपना प्रयोजन पूरा करने के लिए साथी-सहयोगियों को पुकारा है। जो इसके लिए साहस जुटायेंगे वे लोक-परलोक की, सिद्धियों, विभूतियों से अलंकृत होकर रहेंगे। शान्तिकुंज के संचालकों से यही सम्पन्न किया और अपने को अति सामान्य होते हुए भी अत्यन्त महान् कहलाने का श्रेय पाया है। जाग्रत् आत्माओं से भी इन दिनों ऐसा अनुकरण करने की अपेक्षा की जा रही है।

🔵 कोरी वाणी ने कब किसका कल्याण किया है? संवेदनशील की एक ही पहचान है कि वह जो भी कहता है—आचरण से। यदि ऐसा नहीं है तो समझना चाहिए कि बुद्धि ने पुष्पित वाणी का नया जामा पहन लिया है, जो हमेशा से अप्रमाणित रहा है और रहेगा। वैभव की दीवारों और शान-शौकत की पहरेदारी में गरीबों की बिलखती आवाजें नहीं घुसा करती हैं।

🔴 भक्त वही है, जिसके लिए जन-जन का दर्द उसका अपना दर्द हो। अन्यथा वह विभक्त है—भगवान् से सर्वथा अलग-थलग। बड़े वे हैं, जिनका मन सर्वसामान्य की समस्याओं से व्याकुल रहता है। जिनकी बुद्धि इन समस्याओं के नित नये प्रभावकारी समाधान खोजती है। जिनके शरीर ने ‘अहर्निश सेवामहे’ का व्रत ले लिया है। झूठे बड़प्पन और सच्ची महानता में से एक ही चुना जा सकता है—दोनों एक साथ नहीं।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 2)

🌹 समय का सदुपयोग करें

🔴 हर बुद्धिमान् व्यक्ति ने बुद्धिमत्ता का सबसे बड़ा परिचय यही दिया है कि उसने जीवन के क्षणों को व्यर्थ बर्बाद नहीं होने दिया। अपनी समझ के अनुसार जो अच्छे से अच्छा उपयोग हो सकता था, उसी में उसने समय को लगाया। उसका यही कार्यक्रम अन्ततः उसे इस स्थिति तक पहुंचा सका, जिस पर उसकी आत्मा सन्तोष का अनुभव करे।

🔵 प्रतिदिन एक घण्टा समय यदि मनुष्य नित्य लगाया करे तो उतने छोटे समय से भी वह कुछ ही दिनों में बड़े महत्वपूर्ण कार्य पूरे कर सकता है। एक घण्टे में चालीस पृष्ठ पढ़ने से महीने में बारह सौ पृष्ठ और साल में करीब पन्द्रह हजार पृष्ठ पढ़े जा सकते हैं यह क्रम दस वर्ष जारी रहे तो डेढ़ लाख पृष्ठ पढ़े जा सकते हैं। इतने पृष्ठों में कई सौ ग्रन्थ हो सकते हैं। यदि वे एक ही किसी विषय के हों तो वह व्यक्ति उस विषय का विशेषज्ञ बन सकता है। एक घण्टा प्रतिदिन कोई व्यक्ति विदेशी भाषायें सीखने में लगावें तो वह मनुष्य निःसन्देह तीस वर्ष में इस संसार की सब भाषाओं का ज्ञाता बन सकता है। एक घण्टा प्रतिदिन व्यायाम में कोई व्यक्ति लगाया करे तो अपनी आयु को पन्द्रह वर्ष बढ़ा सकता है।

🔴 संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के प्रख्यात गणित के आचार्य चार्ल्स फास्ट ने प्रति दिन एक घन्टा गणित सीखने का नियम बनाया था और उस नियम पर अन्त तक डटे रह कर ही इतनी प्रवीणता प्राप्त की।

🔵 संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के प्रख्यात गणित के आचार्य चार्ल्स फास्ट ने प्रति दिन एक घन्टा गणित सीखने का नियम बनाया था और उस नियम पर अन्त तक डटे रह कर ही इतनी प्रवीणता प्राप्त की।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 31)

🌹 युग परिवर्तन प्रतिभा ही करेगी
🔵 पृथ्वी का उत्तर ध्रुव निखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त पदार्थ-संपदा में से अपने लिये आवश्यक तत्त्व खींचता रहता है। वही धरती की विविध आवश्यकताएँ पूरी करता है। जो निरर्थक अंश बचा रहता है, वह पदार्थ ध्रुव-मार्ग से कचरे की तरह बाहर फेंक दिया जाता है। यही क्रम मनुष्य-शरीर का है। वह अपनी रुचि और प्रकृति के अनुरूप चेतन तत्त्व आकाश में से खींचता और छोड़ता रहता है। उसी पूँजी से अपना काम चलाता है। क्या ग्रहण करना और क्या बहिष्कृत करना है, यह मनुष्य के मानसिक चुंबकत्व पर निर्भर है। यदि अपना मानस उच्चस्तरीय बन चुका है तो उसका आकर्षण विश्वब्रह्माण्ड से अपने स्तर के सहकारी तत्त्व खींचता और भण्डार करता रहेगा, पर पूँजी अपने मनोबल के अनुरूप ही जमा होती रहती है।                     

🔴 वैसे मनुष्य को जन्मजात रूप से विभूतियों का वैभव प्रचुर मात्रा में मिला है, पर वह प्रसुप्ति की तिजोरी में बंद रहता है; ताकि आवश्यकता अनुभव होने पर ही उसे प्रयत्नपूर्वक उभारा और काम में लाया जा सके। सभी जानते हैं कि भूगर्भ में विभिन्न स्तर के रासायनिक द्रव्य भरे पड़े हैं। यह भी किसी से छिपा नहीं है कि आकाश से निरंतर धरती पर प्राणतत्त्व की वर्षा होती रहती है। वनस्पतियों और प्राणियों का गुजारा इन्हीं उभयपक्षीय अनुदानों के सहारे चलता है। मानवीय व्यक्तित्व के संबंध में भी यही बात है। वह इच्छित प्रगति के लिये अपने वर्चस्व का कितना ही महत्त्वपूर्ण अंश उभार सकता है और अपने बलबूते वांछित दिशा में अग्रगमन कर सकता है। उर्वरता भूमि में होती है, पर उसके प्रकट होने के लिये ऊपर से जल बरसना भी आवश्यक है अन्यथा उर्वरता हरीतिमा का रूप धारण न कर सकेगी।

🔵 मनुष्य को अपने में सन्निहित विशेषताओं को भी ऊर्ध्वगामी बनाना चाहिये और साथ ही अदृश्य जगत् के विपुल वैभव का अंश भी अपनी आकर्षण-शक्ति से खींचकर अधिकाधिक सुसम्पन्न बनना चाहिये। अपने गुण, कर्म, स्वभाव को प्रखर-परिष्कृत बनाना और ईश्वर-सान्निध्य स्थापित करके व्यापक शक्ति के लिये कुछ उपयुक्त से खींच बुलाना, ये दोनों ही क्रियायें अपने ढंग से नियमित रूप से चलती रहें तो समझना चाहिये कि प्रगति का सुव्यवस्थित सरंजाम जुटने की समुचित व्यवस्था बन गई। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए चिंतन, चरित्र और स्वभाव को गुण, कर्म और भाव-संवेदना को दिनों-दिन अधिक उत्कृष्ट बनाते चलने की आवश्यकता को ध्यान रखने पर जोर दिया गया है; साथ ही आवश्यक यह भी है कि इस विराट् विश्व की कामधेनु की अनुकूलता प्राप्त करके अमृत भरे पयपान का लाभ उठाते रहा जाए।

🔴 प्राण अपना है, प्रतिभा भी अपनी है, पर वह अनगढ़ स्थिति में झाड़-झंखाड़ों से भरी रहती है। उसे सुरम्य उद्यान में बदलने के लिये कुशल माली जैसे अनुभव और सतर्कता भरा प्रयत्न चाहिये। जो उसे कर पाते हैं, वे ही देखते हैं कि ‘ईश्वर अंश जीव अविनाशी’ का प्रतिपादन सोलहों आना सच है। उसमें किसी प्रकार की अत्युक्ति नहीं है। घाटे में वे रहते हैं, जो अपनी उपेक्षा आप करते हैं। जो अपनी अवमानना अवहेलना करेगा, वह दूसरों से भी तिरस्कृत होगा और स्वयं भी घाटे में रहेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

!! भारतीय स्वाधीनता संग्राम के महान क्रांतिकारी मंगल पांडे को उनके बलिदान दिवस पर अखिल विश्व गायत्री परिवार का कोटि कोटि नमन !!


👉 यह भी नहीं रहने वाला 🙏🌹

एक साधु देश में यात्रा के लिए पैदल निकला हुआ था। एक बार रात हो जाने पर वह एक गाँव में आनंद नाम के व्यक्ति के दरवाजे पर रुका। आनंद ने साध...