शनिवार, 28 सितंबर 2019

👉 मन की आवाज

एक बुढ़िया बड़ी सी गठरी लिए चली जा रही थी। चलते-चलते वह थक गई थी। तभी उसने देखा कि एक घुड़सवार चला आ रहा है। उसे देख बुढ़िया ने आवाज दी, ‘अरे बेटा, एक बात तो सुन।’ घुड़सवार रुक गया। उसने पूछा, ‘क्या बात है माई ?’ बुढ़िया ने कहा, ‘बेटा, मुझे उस सामने वाले गांव में जाना है। बहुत थक गई हूं। यह गठरी उठाई नहीं  जाती। तू भी शायद उधर ही जा रहा है। यह गठरी घोड़े पर रख ले। मुझे चलने में आसानी हो जाएगी।’

उस व्यक्ति ने कहा, ‘माई तू पैदल है। मैं घोड़े पर हूं। गांव अभी बहुत दूर है।.पता नहीं तू कब तक वहां पहुंचेगी। मैं तो थोड़ी ही देर में पहुंच जाऊंगा। वहां पहुंचकर क्या तेरी प्रतीक्षा करता रहूंगा?’ यह कहकर वह चल पड़ा। कुछ ही दूर जाने के बाद उसने अपने आप से कहा, ‘तू भी कितना मूर्ख है। वह वृद्धा है, ठीक से चल भी नहीं सकती। क्या पता उसे ठीक से दिखाई भी देता हो या नहीं। तुझे गठरी दे रही थी। संभव है उस गठरी में कोई कीमती सामान हो। तू उसे लेकर भाग जाता तो कौन पूछता। चल वापस, गठरी ले ले।

वह घूमकर वापस आ गया और बुढ़िया से बोला, ‘माई, ला अपनी गठरी। मैं ले चलता हूं। गांव में रुककर तेरी राह देखूंगा।’

बुढ़िया ने कहा, ‘न बेटा, अब तू जा, मुझे गठरी नहीं देनी।’ घुड़सवार ने कहा, ‘अभी तो तू कह रही थी कि ले चल। अब ले चलने को तैयार हुआ तो गठरी दे नहीं रही। ऐसा क्यों? यह उलटी बात तुझे किसने समझाई है?’

बुढ़िया मुस्कराकर बोली, ‘उसी ने समझाई है जिसने तुझे यह समझाया कि माई की गठरी ले ले। जो तेरे भीतर बैठा है वही मेरे भीतर भी बैठा है। तुझे उसने कहा कि गठरी ले और भाग जा। मुझे उसने समझाया कि गठरी न दे, नहीं तो वह भाग जाएगा। तूने भी अपने मन की आवाज सुनी और मैंने भी सुनी।

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ७१)

👉 संयम है प्राण- ऊर्जा का संरक्षण, सदाचार ऊर्ध्वगमन

संयम- सदाचार के प्रयोग चिकित्सा की आध्यात्मिक प्रक्रिया के आधार हैं। इन्हीं के बलबूते आध्यात्मिक चिकित्सा के संरजाम जुटते और अपना परिणाम प्रस्तुत करते हैं। हालाँकि चिकित्सा की अन्य विधियाँ इन प्रयोगों के बारे में मौन हैं। लेकिन अगर इन्हें ध्यान से परखा जाय तो इनमें भी किसी न किसी स्तर पर यह सच्चाई झलकती है। रोगी का रोग निदान करने के बाद प्रायः सभी चिकित्सक खानपान के तौर- तरीके और जीवनशैली के बारे में निर्देश देते हैं। इन निर्देशों में प्रकारान्तर से संयम- सदाचार ही अन्तर्निहित रहता है। तनिक सोचें तो सही- कौन ऐसा चिकित्सक होगा जो अपने गम्भीर रोगी को तला- भुना खाना, मिर्च- मसालेदार गरिष्ठ चीजों के उपयोग की इजाजत देगा। यही क्यों रोगियों के साथ राग- रंग एवं विलासिता के विषय भोग भी वर्जित कर दिये जाते हैं।

चिकित्सा की कोई भी पद्धति रोगियों के जीवनक्रम का जिस तरह से निर्धारण करती है, प्रकारान्तर से वह उन्हें संयम- सदाचार की सिखावन ही है। इस सिखावन की उपेक्षा करके कोई गम्भीर रोग केवल औषधियों के सहारे ठीक नहीं होता है। इसमें इतना जरूर है कि इन चिकित्सकों एवं रोगियों की यह आस्था रोग निवारण तक ही किसी तरह टिक पाती है। रोग के लक्षण गायब होते ही फिर वे भोग- विलास में संलग्न होकर नये रोगों को आमंत्रित करने में जुट जाते हैं। जबकि आध्यात्मिक चिकित्सा की जीवन दृष्टि एवं जीवनशैली संयम- सदाचार के प्रयोगों पर ही टिकी है। आध्यात्मिक चिकित्सकों ने इन प्रयोगों को बड़ी गहनता से किया है। इसकी विशेषताओं एवं सूक्ष्मताओं को जाना है और इसके निष्कर्ष प्रस्तुत किये हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ९९

👉 आत्मचिंतन के क्षण 28 Sep 2019

★ मन और अन्त:करण की एकता में, दोनों के मिलन में ही सुख है। इसी को योगिक शब्दावली में आत्मा और परमात्मा का मिलन कह सकते हैं। इस मिलन का ही दूसरा नाम "योग' है। आत्मा और परमात्मा के मिलन से दोनों के योग से एक ऐसे आनन्द का अविर्भाव होता है, जिसकी तुलना संसार के अन्य किसी भी सुख से नहीं की जा सकती। इसी सुख को परमानन्द, जीवनमुक्ति, ब्रह्म-निर्वाह, आत्मोपलब्धि, प्रभु-दर्शन आदि नामों से पुकारा जाता है।
 
□  प्रेम ही सम्पूर्ण सुखों का आधार है। आज प्रत्येक व्यक्ति सुखी जीवन के लिए तरह-तरह के साधन जुटाता है सुख के लिये हरचन्द प्रयत्न भी करता है किन्तु फिर भी अधिकांश लिग दु:खी एवं क्लान्त दिखाई देते हैं। इसका एकमात्र कारण है वे प्रेम को छोड़कर अन्यत्र सुख की खोज करते हैं जो बालू में तेल निकालने जैसा प्रयत्न है। सुख भोगने के लिए प्रेम को जीवन में उतारना होगा । इसी की साधना करनी होगी।
 
◆ दूसरों की बुराइयाँ ढूंढ़ने में हमारी दृष्टि अलग तरीके से और अपनी बात आने पर और तरीके से काम करती है। यदि यह दोष हटा दिया जाय और दूसरों की भाँति अपनी बुराई भी देखने लग जायें, दूसरों को सुधारने की चिन्ता करने की भाँति यदि अपने को सुधारने की भी चिन्ता करने लगें तो इतना बडा काम हो सकता है जितना सारी दुनियाँ को सुधार लेने पर ही हो सकना संभव है।

◇ चरित्र ही जीवन की आधार शिला है। मनुष्य संसार में जो कुछ सफलता, सौभाग्य, सुख प्राप्त करता है उसके मूल में उसके चरित्र की उच्चता ही रहती है। निर्बल चरित्र वाले अथवा चरित्रहीन व्यक्ति का जीवन निस्सार और महत्त्वशून्य है। चाहे वह सांसारिक दृष्टि से थोडा या अधिक धन प्राप्त करके आराम का जीवन व्यतीत करता हो पर अन्य लोगों की दृष्टि से वह कभी प्रतिष्ठा या सम्मान का पात्र नहीं हो सकता।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पुनर्गठन का स्वरूप-

निर्णय किया गया है कि जो नियमित रूप से इस विचारधारा के संपर्क में रहने के लिए आतुर रहते हैं, समय पर यह आहार न मिलने से बेचैनी अनुभव करते हैं और तलाश के लिए हाथ पैर पीटते हैं, उन सबको परिजन सदस्य मानेंगे। नये नामांकन उन्हीं के होंगे और उन्हीं के व्यक्तिगत परिचय सुरक्षित रजिस्टर में नोट किये जावेंगे। इन परिचयों के आधार पर उनकी स्थिति समझना एवं विचारों का आवश्यक आदान प्रदान भी सम्भव हो सकेगा।

कर्मठ कार्यकर्ताओं की श्रेणी इससे ऊँची है। उन्हें व्रतधारी कह सकते हैं। न्यूनतम एक घण्टा समय और दस पैसा प्रतिदिन ज्ञान यज्ञ के लिए जो लगाते हैं उनकी श्रद्धा ने कर्मक्षेत्र में प्रवेश पा लिया ऐसा माना जा सकता है।

संक्षेप में भविष्य के युग निर्माण परिवार में तीन प्रकार के परिजन होंगे-
१- सहयोगी समर्थक स्नेही परिचित (2) पत्रिकाओं के सदस्य नियमित पाठक एवं सुनने वाले (3) अंशदान प्रस्तुत करके मिशन की सक्रिय सहायता करने वाले। इन तीनों में से सहयोगी श्रेणी का नामांकन स्थानीय शाखाओं में ही नोट रहेगा। इनका पंजीकरण हमारे लिए सम्भवं नहीं। इनकी संख्या तो लाखों की संख्या पार करके करोड़ों तक पहुँचेगी।
शान्तिकुञ्ज एवं गायत्री तपोभूमि में (1) पत्रिकाओं के नियमित सदस्यों, पाठकों का तथा (2) अंशदान करने वाले व्रतधारी कर्मनिष्ठों का ही रिकार्ड रहेगा। इन दोनों को मिलाकर स्थानीय संगठन की इकाइयाँ बना दी जायेगी। परिवार का पुनर्गठन इसी आधार पर होगा। विभिन्न प्रकार के आदान प्रदानों की शृंखला इसी परिवार के बीच चलेगी। मिशन के भविष्य का उत्तरदायित्व इन्हीं प्राणवान परिजनों के कन्धे पर डाला जायेगा। इस हस्तान्तरण के उपरान्त ही हम अपनी निकटवर्ती विदाई के लिए शान्तिपूर्वक महाप्रयाण कर सकेंगे।

पुनर्गठन की योजना यह है कि जहाँ श्री अखण्ड ज्योति, युग निर्माण, महिला जागृति आदि मिशन की पत्रिकाओं के न्यूनतम 10 सदस्य हैं, वहाँ उनका एक युग निर्माण परिवार गठित कर दिया जाय। इसी दृष्टि से पत्रिकाओं के सदस्यों का सर्वेक्षण प्रारम्भ भी कर दिया गया है। संख्या को महत्व न देकर हमें स्तर की गरिमा स्वीकार करनी होगी। अस्तु विचार है कि जो मिशन का स्वरूप ठीक तरह समझते हैं और सही दिशा में कदम बढ़ाने के लिए सहमत हैं, उन्हें ही साथ लेकर चला जाय।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई १९७७ पृष्ठ ५३

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1977/July/v1.53