शनिवार, 28 सितंबर 2019

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ७१)

👉 संयम है प्राण- ऊर्जा का संरक्षण, सदाचार ऊर्ध्वगमन

संयम- सदाचार के प्रयोग चिकित्सा की आध्यात्मिक प्रक्रिया के आधार हैं। इन्हीं के बलबूते आध्यात्मिक चिकित्सा के संरजाम जुटते और अपना परिणाम प्रस्तुत करते हैं। हालाँकि चिकित्सा की अन्य विधियाँ इन प्रयोगों के बारे में मौन हैं। लेकिन अगर इन्हें ध्यान से परखा जाय तो इनमें भी किसी न किसी स्तर पर यह सच्चाई झलकती है। रोगी का रोग निदान करने के बाद प्रायः सभी चिकित्सक खानपान के तौर- तरीके और जीवनशैली के बारे में निर्देश देते हैं। इन निर्देशों में प्रकारान्तर से संयम- सदाचार ही अन्तर्निहित रहता है। तनिक सोचें तो सही- कौन ऐसा चिकित्सक होगा जो अपने गम्भीर रोगी को तला- भुना खाना, मिर्च- मसालेदार गरिष्ठ चीजों के उपयोग की इजाजत देगा। यही क्यों रोगियों के साथ राग- रंग एवं विलासिता के विषय भोग भी वर्जित कर दिये जाते हैं।

चिकित्सा की कोई भी पद्धति रोगियों के जीवनक्रम का जिस तरह से निर्धारण करती है, प्रकारान्तर से वह उन्हें संयम- सदाचार की सिखावन ही है। इस सिखावन की उपेक्षा करके कोई गम्भीर रोग केवल औषधियों के सहारे ठीक नहीं होता है। इसमें इतना जरूर है कि इन चिकित्सकों एवं रोगियों की यह आस्था रोग निवारण तक ही किसी तरह टिक पाती है। रोग के लक्षण गायब होते ही फिर वे भोग- विलास में संलग्न होकर नये रोगों को आमंत्रित करने में जुट जाते हैं। जबकि आध्यात्मिक चिकित्सा की जीवन दृष्टि एवं जीवनशैली संयम- सदाचार के प्रयोगों पर ही टिकी है। आध्यात्मिक चिकित्सकों ने इन प्रयोगों को बड़ी गहनता से किया है। इसकी विशेषताओं एवं सूक्ष्मताओं को जाना है और इसके निष्कर्ष प्रस्तुत किये हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ९९

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