शनिवार, 18 नवंबर 2017

👉 Possible in the mist of Impossible

🔶 The life is filled so much with uncertainty, doubt and obstructions that it appears almost impossible to overcome these roadblocks. Every moment, a person has to wage a Mahabharat-like war within himself.

🔷 In Srimad Bhagwadgita, Kurukshetra (the battlefield of Mahabharat) has been called Dharmakshetra (the field of righteousness), because it is here that the battle for the victory of the divine over the devil, light over darkness and love over hate has to be accomplished. In the war of Mahabharat, the army of Yadavas – Sri Krishna’s clan lost in sensual indulgence and hence instruments of evil - was with the Kauravas (symbol of evil). Krishna (The Divine Incarnate) alone, that too weaponless, was with Pandavas (chosen instruments of the Divine). Life too is like that. All the powers of the physical world (rhetorically the mighty army of Yadavas) are allies of Adharma. A sadhak has to choose between the Divine and his mighty army.

🔶 It is not that Krishna was the charioteer of Arjun alone; He is eternally sitting in the heart of everyone of us and controlling our chariots of life. However, when we as sadhaks face the legions of devilish tendencies of greed, selfishness, cunningness, etc in our surroundings and evil traditions in the society, our nervousness is but natural. Arjun, too, was initially nervous and unsure of victory but he did win, once he unconditionally offered himself to serve as an instrument of the Divine Charioteer – in response to the Divine Teacher’s assurance – Ma ekam sharanam vrij.-----. Similarly, when a sadhak puts aside all ego-based self-effort and surrenders to the Divine alone and trusts His sole guidance with all his soul, mind and body, he is sure to overcome all the obstacles of the path and reach the ultimate goal. It is such sadhaks who can make possible all the impossible –looking tasks.

👉 आत्मचिंतन के क्षण 18 Nov 2017

🔶 अपने सुधार के बिना परिस्थितियाँ नहीं सुधर सकतीं। अपना दृष्टिकोण बदले बिना जीवन की गतिविधियाँ नहीं बदली जा सकतीं। इस तथ्य को मनुष्य जितना जल्दी समझ ले उतना ही अच्छा है। हम दूसरों को सुधारना चाहते हैं, पर इसके लिए समर्थ वही हो सकता है, जो पहले सुधार के प्रयोग को अपने ऊपर आजमाकर अपनी योग्यता की परीक्षा दे। दूसरे लोग अपना कहना न मानें यह हो सकता है; पर हम अपनी बात स्वयं ही न माने इसका क्या कारण है? अपनी मान्यताओं को यदि हम स्वयं ही कार्यरूप में परिणत न करें, तो फिर सभी स्त्री-बच्चों से, मित्र-पड़ोसियों से या सारे संसार से यह आशा कैसे करेंगे कि वे अपनी बुरी आदतों को छोड़कर उस उत्तम मार्ग पर चलने लगें, जिसकी कि आप शिक्षा देते हैं।         

🔷 हम भारतीय संस्कृति को मेज पर खड़ा करके यह कहना चाहते हैं कि यह वह संस्कृति है, जिसने दुनिया का कायाकल्प कर दिया। आज भी यह पूरी तरह से मार्गदर्शन देने में सक्षम है। मनीषी इसने ही पैदा किए। यदि मनीषी जाग जाएँ, तो देश, समाज, संस्कृति व सारे विश्व का कल्याण होगा। भगवान् करे मनीषी जगे, जागे, जगाए व जमाना बदले-हमारा यह संकल्प है।   

🔶 भगवान् के द्वार निजी प्रयोजनों के लिए अनेकों खटखटाते पाये जाते हैं; पर अब की बार भगवान् ने अपना प्रयोजन पूरा करने के लिए साथी-सहयोगियों को पुकारा है। जो इसके लिए साहस जुटायेंगे, वे लोक और परलोक की, सिद्धियों, विभूतियों से अलंकृत होकर रहेंगे। शांतिकुंज के संचालकों ने यही सम्पन्न किया और अपने को अति सामान्य होते हुए भी अत्यन्त महान् कहलाने का श्रेय पाया है। जाग्रत आत्माओं से भी इन दिनों ऐसा अनुकरण करने की अपेक्षा की जा रही है।      

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 यूपी के एक आईपीएस अफसर ने सरकारी स्कूल को बना दिया कॉन्वेंट

गोरखपुर के पिपरौली ब्लॉक के जीतपुर प्राथमिक व पूर्व माध्यमिक विद्यालय को देखकर सरकारी और कॉन्वेंट स्कूल में अंतर करना मुश्किल है। स्कूल में छात्र-छात्राओं के पढ़ने के लिए बेहतरीन क्लासरूम, बेंच, चारों ओर हरियाली और साफ-सुथरे टॉइलट। कक्षा 8 तक के इस विद्यालय की सूरत बदली है, गोरखपुर के आईजी मोहित अग्रवाल ने।

आईजी मोहित अग्रवाल ने इस विद्यालय को जून-2017 में गोद लिया था। महज 4 महीने में न सिर्फ स्कूल की इमारत का कायाकल्प हुआ है बल्कि पढ़ाई-लिखाई का पूरा सिस्टम ही बदल गया है। कॉन्वेंट स्कूलों की तरह छात्र-छात्राओं को यलो, ग्रीन, रेड व ब्लू हाउसों में बांटा गया है। हर महीने टेस्ट लिया जाता है।

🔷 बदला माहौल तो बढ़ गए बच्चे
स्कूल को आईजी के गोद लेने के पहले कक्षा एक से पांच तक के बच्चों की संख्या 275 थी। वर्तमान में बच्चों की कुल संख्या 304 है। वहीं कक्षा छह से आठ तक बच्चों की पहले संख्या पहले 120 थी। जो कि वर्तमान में बढ़कर 174 हो गयी है। आईजी मोहित अग्रवाल कहते हैं कि इस स्कूल को पूरी तरह से 'हैपी स्कूल' बनाना है। छात्र-छात्राओं को खुद की सुरक्षा के लिए सेल्फ डिफेंस का कोर्स भी करवाया जाएगा।

🔶 शनिवार को नो बैग डे
स्कूल में हर शनिवार को नो बैग डे होता है। इस दिन खेल-कूद, निबंध, वाद-विवाद और नैतिक शिक्षा की प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाती हैं, ताकि विद्यार्थियों के व्यक्तित्व का भी विकास हो।

🔷 हफ्ते में दो दिन पढ़ाते भी हैं आईजी
आईजी मोहित अग्रवाल खुद मंगलवार और शुक्रवार को एक-एक घंटे बच्चों को पढ़ाते हैं। इसके लिए वह बाकायदा नोट्स भी बनाते हैं, ताकि बच्चों को विषय ठीक से समझाया जा सके और उन्हें रटना न पड़े। छात्र-छात्राओं का हर महीने टेस्ट लिया जाता है। आईजी स्वयं इन बच्चों का पेपर सेट करते हैं। अटेंडेंस व नंबर के आधार पर हर महीने अव्वल आने वाले छात्र-छात्राओं को 'स्टार ऑफ द मंथ' चुना जाता है। दो माह लगातार अव्वल आने वाले बच्चे को 'सुपरस्टार ऑफ द मंथ' का तमगा दिया जाता है।

🔶 मेधावियों को इंटर तक फ्री शिक्षा
इस स्कूल से कक्षा आठ पास कर निकलने वाले टॉप पांच बच्चों को कॉन्वेंट स्कूल में इंटरमीडिएट तक मुफ्त शिक्षा दिलवाई जाएगी। इसके लिये शहर के एलएफस स्कूल (लिटिल फ्लावर स्कूल) ने हाथ बढ़ाया है। स्कूल का प्रबंधन टॉप पांच बच्चों की इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई की जिम्मेदारी लेगा। 
 
 

👉 दोष-दृष्टि को सुधारना ही चाहिए (भाग 2)

🔶 देखिये और जरा ध्यान से देखिये कि आपके अन्दर ‘दोष-दर्शन’ करने की दुर्बलता, तो नहीं घर पर बैठी है। क्योंकि ‘दोष-दर्शन’ का दृष्टिकोण भी जीवन को कुछ-कुछ ऐसा ही बना देता है। दोष-दर्शन और संतोष, दोष-दर्शन और प्रसन्नता, दोष-दर्शन तथा सामंजस्य का नैसर्गिक विरोध है। दोष-दृष्टि मनुष्य के हृदय पर उसके मानस पर एक ऐसा आवरण है, जो न हो बाहर की प्रसन्न- किरणों को भीतर प्रतिबिम्बित होने देता है और न भीतर का उल्लास बाहर ही प्रकट होने देता है। इसे मनुष्य एवं आनन्द के बीच एक लौह दीवार ही समझना चाहिये। लीजिये दोषदर्शी व्यक्तियों की दशा से अपना मिलान कर लीजिये और यदि अपने में दोष पायें तो तुरन्त सुधार कर डालिये, जिससे, अगले दिनों में आप भी उस प्रकार प्रसन्न रह सकें, जिस प्रकार लोग रहते हैं और उन्हें रहना ही चाहिये।

🔷 दोष-दर्शन से दूषित व्यक्ति जब किसी व्यक्ति के संपर्क में आता है, तब अपने मनोभाव के अनुसार उसके अन्दर बुराइयाँ ढूँढ़ने लगता है और हठात् कोई न कोई बुराई निकाल ही लेता है। फिर चाहे वह व्यक्ति कितना ही अच्छा क्यों न हो। उदाहरण के लिये किसी विद्वान महात्मा को ही ले लीजिये। लोग उसे बुलाते, आदर सत्कार करते और उसके व्याख्यान से लाभ उठाते हैं। महात्मा जी का व्याख्यान सुन कर सारे लोग पुलकित, प्रसन्न व लाभान्वित होते हैं।

🔶 उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते और अपने उतने समय को बड़ा सार्थक मानते। अनेक दिनों, सप्ताहों तथा मासों तक उस सुखद घटना का स्मरण करते और ऐसे संयोग की पुनरावृत्ति चाहने लगते। अधिकाँश लोग उस व्याख्यान का लाभ उठा कर अपना ज्ञान बढ़ाते, कोई गुण ग्रहण करते और किसी दुर्गुण से मुक्ति पाते हैं। वह उनके लिए एक ऐसा सुखद संयोग होता है जो गहराई तक अपनी छाप छोड़ जाता है, ऐसे ही सुव्यक्ति गुणाग्राही कहे जाते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, मई 1968, पृष्ठ 22

👉 आज का सद्चिंतन 18 Nov 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 Nov 2017


👉 दूसरों के दुख को समझो

🔷 “तुम्हारे पाँव के नीचे दबी चींटी का वही हाल होता है, जो यदि तुम हाथी के नीचे दब जाओ तो तुम्हारा हो। दूसरे के दुख को अपने दुख से तुलना किये बिना, हम उसकी प्रकृत अवस्था का ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते।”

🔶 किसी बादशाह को भयंकर रोग था। कई यूनानी हकीमों ने मिल कर यह राय ठहराई कि एक खास तरह के आदमी के खून के सिवाय इस बीमारी का और इलाज नहीं है। बादशाह ने इस तरह के आदमी की तलाश करने का हुक्म दिया। लोगों ने एक किसान के लड़के में वह सब गुण मौजूद पाये। बादशाह ने उस लड़के के माँ-बाप को बुलवाया और उन्हें बहुत सा इनाम देकर राजी कर लिया। काजी ने यह फैसला किया कि बादशाह को बीमारी से आराम करने के लिए एक रिआया का खून बहाना न्याय संगत है।

🔷 जब जल्लाद ने उसे मारने की तैयारी की, तब वह बालक आकाश की ओर देख कर हँसा। बादशाह ने उस बालक से पूछा, “इस अवस्था में ऐसी क्या बात हुई, जिससे तुझे खुशी हुई? “उसने जवाब दिया “बालक माँ-बाप के प्रेम पर निर्भर रहते हैं, मुकदमों का समावंश काजी करता है। मेरे माता-पिता की मति थोथे साँसारिक लोभ से भ्रष्ट हो गई है कि मेरा खून बहाने पर राजी हो गये हैं। काजी ने मुझे प्राण दण्ड की सजा दे दी है और बादशाह, अपनी स्वास्थ्य-रक्षा के लिये, मेरी मृत्यु पर राजी हो गये हैं। ऐसी दशा में, अब ईश्वर के सिवाय किसकी शरण जाऊं?

🔶 “बादशाह इस बात को सुनकर बहुत ही दुखी हुये और आंखों में आंसू भर कर बोला, “निर्दोष मनुष्य का खून बहाने की अपेक्षा मेरा ही मर जाना अच्छा है।” बादशाह ने उस बालक के सिर और आंखें चूम कर गले से लगाया और उसको बहुत सा इनाम देकर छोड़ दिया।

🔷 लोग कहते हैं, कि बादशाह उसी सप्ताह रोग मुक्त हो गया।

🔶 “अगर तुम्हें अपने पैर के नीचे दबी हुई चींटी की अवस्था का ज्ञान हो, तो तुमको समझना चाहिए कि चींटी की वैसी हालत है जैसी हाथी के पैर के नीचे दबने पर तुम्हारी हो।”

🔷 तात्पर्य यह है कि हमें सब जीवों को अपने समान समझना चाहिये। दूसरों को कष्ट न पहुँचाते समय इस बात का ख्याल रखना चाहिये, कि यदि हमें कोई ऐसा ही कष्ट दे तो हमें कैसा दुख होगा।

🌹 अखण्ड ज्योति मई 1951

गुरुवार, 16 नवंबर 2017

👉 पाप का प्रलोभनः-

🔷 एक ब्राह्मण देवता दरिद्रता के कारण बहुत दुखी होकर राजा के यहाँ धन याचना करने के लिए चल दिये। कई दिन की यात्रा पार करके वे राजधानी पहुँचे और राजमहल में प्रवेश करने की चेष्टा करने लगे।

🔶 उस नगर का राजा बहुत चतुर था। वह दृढ़ निश्चयी और सच्चे ब्राह्मणों को ही दान दिया करता था। सुपात्र कुपात्र की परीक्षा के लिए राजमहल के चारों दरवाजों पर उसने समुचित व्यवस्था कर रखी थी।

🔷 ब्राह्मण देवता ने महल के पहले दरवाजे में प्रवेश किया ही था कि एक वेश्या निकल कर सामने आई। उसने राज महल में प्रवेश करने का कारण ब्राह्मण से पूछा। देवता जी ने उत्तर दिया, धन याचना के लिए राजा के पास जाना चाहते हैं। वेश्या ने कहा इस दरवाजे से आप तब अन्दर जा सकते हैं जब मुझसे रमण कर लें। अन्यथा दूसरे दरवाजे से जाइए। ब्राह्मण को वेश्या की शर्त स्वीकार न हुई, अधर्माचरण करने की अपेक्षा दूसरे द्वार से जाना उन्हें पसंद आया। यहाँ से वे लौट आये और दूसरे दरवाजे पर जाकर प्रवेश करने लगें।

🔶 दो ही कदम भीतर पड़े होंगे कि एक प्रहरी सामने आया। उसने कहा इस दरवाजे से घुसने वालो को पहले माँसाहार करना पड़ता हैं चलिए माँस भोजन तैयार है उसे खाकर आप प्रसन्नतापूर्वक भीतर जा सकते हैं। ब्राह्मण ने माँसाहार करना उचित न समझा, और वहाँ से लौट कर तीसरे दरवाजे में होकर जाने का निश्चय किया।

🔷 तीसरे दरवाजे में जैसे ही वह ब्राह्मण घुसने लगा वैसे ही मद्य की बोतल और प्याली लेकर पहरेदार सामने आया और कहा लीजिए मद्य पीजिए, और भीतर जाइए, इस दरवाजे से आने वालों को मद्यपान करना ही पड़ता है। ब्राह्मण ने मद्यपान नहीं किया और उलटे पाँव चौथे दरवाजे की ओर चल दिया।

🔶 चौथे दरवाजे पर पहुँच कर ब्राह्मण ने देखा कि वहाँ जुआ हो रहा है। जो लोग जुआ खेलते हैं वे ही भीतर घुस पाते हैं। जुआ खेलना भी धर्म विरुद्ध है। ब्राह्मण बड़े सोच विचार में पड़ा, अब किस तरह भीतर प्रवेश हो, चारों दरवाजों पर धर्म विरोधी शर्तें हैं। पैसे की मुझे बहुत जरूरत है। एक ओर धर्म दूसरी ओर धन दोनों का घमासान युद्ध उसके मस्तिष्क में होने लगा।

🔷 ब्राह्मण जरा सा फिसला, उसने सोचा जुआ छोटा पाप है, इसको थोड़ा सा कर लें तो तनिक सा पाप होगा। मेरे पास मार्ग व्यय से बचा हुआ एक रुपया है, क्यों न इस रुपये से जुआ खेल लूँ और भीतर प्रवेश पाने का अधिकारी हो जाऊँ।

🔶 विचारों को विश्वास रूप में बदलते देर न लगी। ब्राह्मण जुआ खेलने लगा। एक रुपये के दो हुए, दो के चार, चार के आठ, जीत पर जीत होने लगी। ब्राह्मण राजा के पास जाना भूल गया और दत्त चित्त होकर जुआ खेलने लगा। जीत पर जीत होने लगी। शाम तक हजारों रुपयों का ढेर जमा हो गया। जुआ बन्द हुआ। ब्राह्मण ने रुपयों की गठरी बाँध ली।

🔷 दिन भर से खाया कुछ न था। भूख जोर से लग रही थी। पास में कोई भोजन की दुकान न थी। ब्राह्मण ने सोचा रात का समय है कौन देखता है चलकर दूसरे दरवाजे पर माँस भोजन मिलता है वही क्यों न खा लिया जाए। स्वादिष्ट भोजन मिलता है और पैसा भी खर्च नहीं होता, दुहरा लाभ है। जरा सा पाप करने में कुछ हर्ज नहीं। ब्राह्मण के पैर तेजी से उधर बढ़ने लगे। भोजन तैयार था, माँस मिश्रित स्वादिष्ट भोजन को खाकर देवता जी संतुष्ट हो गये।

🔶 अस्वाभाविक भोजन को पचाने के लिये अस्वाभाविक पाचक पदार्थों की जरूरत पड़ती है। गरिष्ठ, तामसी, विकृत भोजन करने वाले अकसर पान, बीड़ी, चूरन, चटनी की शरण लिया करते हैं। देवता जी के पेट में जाकर माँस अपना करतब दिखाने लगा। अब उन्हें मद्यपान की आवश्यकता प्रतीत हुई। आगे के दरवाजे की ओर चले और मद्य की कई प्यालियाँ चढ़ाई।

🔷 धन का, माँस का, मद्य का, तिहरा नशा उन पर चढ़ रहा था। काँचन के बाद कुच का, सुरा के बाद सुन्दरी का, ध्यान आना स्वाभाविक है। देवता जी पहले दरवाजे पर पहुँचे और वेश्या के यहाँ जा विराजे। वेश्या ने उन्हें संतुष्ट किया और पुरस्कार स्वरूप जुए में जीता हुआ सारा धन ले लिया।

🔶 एक पूरा दिन चारों द्वारों पर व्यतीत करके दूसरे दिन प्रातःकाल ब्राह्मण महोदय उठे। वेश्या ने उन्हें घृणा के साथ देखा और शीघ्र घर से निकाल देने के लिए अपने नौकरों को आदेश दिया। उन्हें घसीटकर घर से बाहर कर दिया गया। राजा को सारी सूचना पहुँच चुकी थी। आज वे फिर चारों दरवाजों पर गये और शर्तें पूरी करने के लिए कहने लगे पर किसी ने उन्हें भीतर न घुसने दिया। सब जगह से उन्हें दुत्कार दिया गया। ब्राह्मण दोनों ओर से भ्रष्ट होकर सिर धुन धुन कर पछताने लगे।

🔷 हम लोग उपरोक्त ब्राह्मण के पतन की निन्दा करेंगे क्योंकि वह “जरा सा” पाप करने में विशेष हानि न समझने की भूल कर बैठा था। हमें विचार करना चाहिए कि कही ऐसी ही गलतियाँ हम भी तो नहीं कर रहे है। किसी पाप को छोटा समझकर उसमें एक बार फँस जाने से फिर छुटकारा पाना कठिन होता है। एक कदम नीचे की ओर गिरने से फिर पतन का प्रवाह तीव्र होता जाता है और अन्त में बड़े से बड़े पापों के करने में भी हिचक नहीं होती। इसलिए आरम्भ से ही सावधानी रखनी चाहिए। छोटे पापों से भी वैसे ही बचना चाहिए जैसे अग्नि की छोटी चिंगारी से सावधान रहते है।

🔶 "सम्राटों के सम्राट परमात्मा के दरबार में पहुँचकर अनन्त रूपी धन की याचना करने के लिए जीव रूपी ब्राह्मण जाता है। प्रवेश द्वार काम, क्रोध लोभ, मोह के चार पहरेदार बैठे हुए हैं। वे जीव को तरह-तरह से बहकाते हैं और अपनी ओर आकर्षित करते हैं। यदि जीव उनमें फँस गया तो पूर्व पुण्यों रूपी गाँठ की कमाई भी उसी तरह दे बैठता है जैसे कि ब्राह्मण अपने घर का एक रुपया भी दे बैठा था। जीवन इन्हीं पाप जंजालों में व्यतीत हो जाता है और अन्त में वेश्या रूपी ममता के द्वार से दुत्कारा जाकर रोता पीटता इस संसार से विदा होता है।*

🔷 देखना कही आप भी उस ब्राह्मण की नकल तो नहीं कर रहे हैं।

🌹 अखण्ड ज्योति Feb 1944

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 Nov 2017

👉 आज का सद्चिंतन 17 Nov 2017


👉 दोष-दृष्टि को सुधारना ही चाहिए (भाग 1)

🔶 क्या कभी अपने यह सोचा कि आप पग-पग पर खिन्न, असंतुष्ट, उद्विग्न अथवा उत्तेजित क्यों रहते हैं? क्यों आपको समाज, संसार मनुष्यों, मित्रों, वस्तुओं, परिस्थितियों यहाँ तक अपने से भी शिकायत रहती है? आप सब कुछ करते, बरतते और भोगते हुए भी वह मजा, आनन्द और प्रसन्नता नहीं पाते, जो मिलनी चाहिये और संसार के अन्य असंख्यों लोग पा रहे हैं। आप विचारक, आलोचक, शिक्षित, और सभ्य भी हैं, किन्तु आपकी यह विशेषता भी आपको प्रसन्न नहीं कर पाती। स्त्री-बच्चे, घर, मकान सब कुछ आपको उपलब्ध है। फिर भी आप अपने अन्दर एक अभाव और एक असंतोष अनुभव ही करते रहते हैं। घर, बाहर, मेले-ठेले, सफर, यात्रा, सभा-समितियों, भाषणों, वक्तव्यों- किसी में भी कुछ मजा ही नहीं आता। हर समय एक नाराजी, नापसन्दी एवं नकारात्मक ध्वनि परेशान ही रखती है। संसार की किसी भी बात, वस्तु और व्यक्ति से आपका तादात्म्य ही स्थापित हो पाता है।

🔷 साथ ही आप पूर्ण स्वस्थ हैं। मस्तिष्क का कोई विकार आपमें नहीं है। आपका अन्तःकरण भी सामान्य दशा में है और आस-पास में ऐसी कोई घटना भी नहीं घटी है, जिससे आपकी अभिरुचिता एवं प्रसादत्व विक्षत हो गया हो। ऐसा भी नहीं हुआ कि विगत दिनों में ही किसी ऐसे अप्रिय संयोग से सामंजस्य स्थापित करना है, जिसकी अनुभूति आज भी आपको विषाण बनाये हुए हैं।

🔶 वास्तव में बात बड़ी ही विचित्र और अबूझ-सी मालूम होती है। जब प्रत्यक्ष में इस स्थायी अप्रियता का कोई कारण नहीं दिख पड़ा, फिर ऐसा कौन-सा चोर, कौन-सा ठग आपके पीछे अप्रत्यक्ष रूप से लगा हुआ है, जो हर बात के आनन्द से आपको वंचित किए हुये आपके जन्म-सिद्ध अधिकार प्रसन्नता का अपहरण कर लिया करता है। इसको खोजिये, गिरफ्तार करिये और अपने पास से मार भगाइये। जीवन में सदा दुःखी और खिन्नावस्था में रहने का पाप न केवल वर्तमान ही बल्कि आगामी शत-शत जीवनों तक को प्रभावित कर डालता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, मई 1968, पृष्ठ 22
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1968/May/v1.22


http://literature.awgp.org

👉 आत्मोन्नति के चार आधार (अन्तिम भाग)

🔶 चौथा कार्य सेवा का है। मनुष्य समाज का ऋणी है, क्योंकि वह सामाजिक प्राणी है। भगवान् ने उसको इसीलिए जन्म दिया है कि वह उसके इस विश्व-उद्यान की सेवा करे। उसकी जीवात्मा का विकास और जीवन का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए सेवा से बड़ा तप और सेवा से बड़ा पुण्य कुछ भी नहीं हो सकता। हमको सेवा करने के लिए समय निकालते रहना चाहिए। सारे का सारा समय अपने लिए ही न खर्च की दें, वरन् देश, धर्म, समाज और संस्कृति की सेवा करने के लिए भी कुछ लगाएँ। हमारा धर्म होना चाहिए कि हम अपनी शक्तियों का एक अंश दुखियारों के लिए और पीड़ितों के लिए, पतितों के लिए लगाएँ। हमारे लिए सबसे बड़ी सेवा का कार्य क्या हो सकता है? ज्ञानयज्ञ से बड़ा काई और दूसरा पुण्य नहीं हो सकता। इसको ब्रह्मदान भी कहा गया है।
           
🔷 यह सर्वोत्तम धर्म है, क्योंकि ज्ञानयज्ञ से हम मनुष्यों को दिशा दे सकते हैं, जिससे वे बुराइयों से बच सकें और उन्नति के मार्ग पर ऊँचे उठ सकें। ज्ञान, विचारणा, भावना—यही तो है शक्ति का अंश ।। इसलिए ब्राह्मण और साधु हमेशा से ज्ञानयज्ञ को ही सर्वोत्तम सेवा मान करके उसमें संलग्न रहे हैं और यह प्रयत्न करते रहे हैं कि हम स्वयं अच्छे बनें और अपनी अच्छाई दूसरों पर बिखेरें। इसके लिए हमको अंशदान करना चाहिए। सेवा के लिए हमको एक घण्टा समय और दस पैसे नित्य का जो न्यूनतम कार्यक्रम दिया गया था ज्ञानयज्ञ-विचारक्रान्ति के लिए, उस पर हमको मुस्तैदी से अमल करता चाहिए। कोई भी आदमी हममें से ऐसा न हो जो कि सेवा के लिए एक घण्टा समय और दस पैसे जैसी न्यूनतम शर्त को पूरा न करता हो। इससे ज्यादा ही हम करें, ज्यादा ही उत्साह दिखाएँ।
 
🔶 हम केवल भौतिक जीवन ही न जिएँ। आध्यात्मिक जीवन भी जिएँ। हमारी क्षमताओं का उपयोग, हमारे समय का उपयोग पेट पालने तक ही सीमित न रहे, बल्कि लोकमंगल और लोकहित के लिए भी खर्च हो। इस तरीके से हम चार आधार जीवन में अपनाए रहकर के आत्मिक उन्नति के मार्ग पर चल सकते हैं। अपना परिष्कार और परिवर्तन कर सकते हैं। यदि हमने अपना परिष्कार और परिवर्तन किया तो समाज का परिवर्तन और समाज का परिष्कार स्वाभाविक और सरल हो जायेगा। युग का परिवर्तन व्यक्ति परिवर्तन और समाज के परिवर्तन के साथ जुड़ा हुआ है। अपनी छोटी-सी प्रयोगशाला में हम इसी का प्रयोग करते हैं और अपनी प्रयोगशाला में सम्मिलित रहने वाले, अपने परिवार में शामिल रहने वाले हर व्यक्ति से प्रार्थना करते हैं कि आपको आत्मिक उन्नति के लिए अभी बताए गए इन चार आधारों को मजबूती के साथ ग्रहण करता चाहिए और अपने दैनिक जीवन में समन्वित रखना चाहिए। साधना, स्वाध्याय, संयम, और सेवा दैनिक जीवन में न्यूनतम मात्रा में भले ही हों, पर सम्मिलित अवश्य और अनिवार्य रूप से रहने चाहिए।

🌹 आज की बात समाप्त।
🌹 ॐ शान्ति।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 आत्मचिंतन के क्षण 17 Nov 2017

🔶 सद्विचार तब तक मधुर कल्पना भर बने रहते हैं, जब तक उन्हें कार्य रूप में परिणित नहीं किया जाता। विचारों और कार्यों का समन्वय ही संस्कार बनता है। सामर्थ्य संस्कारों में ही होती है। उन्हीं के सहारे व्यक्तित्व बनता है और वे ही भविष्य निर्धारण की प्रमुख भूमिका निभाते हैं। संस्कार अर्थात् चिन्तन और चरित्र का अभ्यस्त ढर्रा। जहाँ तक सुसंस्कारिता की उपलब्धि का सम्बन्ध है, वह सत्प्रवृत्तियों के सम्बन्ध में निःस्वार्थ भाव से निरत हुए बिना और किसी प्रकार सम्भव ही नहीं हो सकती।

🔷 प्रगति का अर्थ है- ऊर्ध्वगमन, उत्कर्ष, अभ्युदय। यह विभूतियाँ अन्तः क्षेत्र की हैं। दृष्टिकोण और लक्ष्य ऊँचा रहने पर इच्छा और आकांक्षा का स्तर ऊँचा उठता है। आत्म गौरव का ध्यान रहता है। अपना मूल्य गिरने न पाये यह सतर्कता जिसमें जितनी पाई जाती है, वह उतना ही प्रगतिशील है।

🔶 आप जीवन के प्रति अपनी धारणा बदल डालिए। विश्वास तथा ज्ञान में ही अपना जीवन भवन निर्माण कीजिए। यदि वर्तमान आपत्तिग्रस्त है, तो उसका यह अर्थ नहीं है कि भविष्य भी अन्धकारमय है। आपका भविष्य उज्ज्वल है। विचारपूर्वक देखिए कि जो कुछ आपके पास है, उसका सबसे अच्छा उपयोग कर रहे हैं अथवा नहीं? क्योंकि यदि प्रस्तुत साधनों का दुरुपयोग करते हैं, तो चाहे वह कितनी ही तुच्छ और सारहीन क्यों न हो, आप उसके भी अधिकारी न रहेंगे। वह भी आपसे दूर भाग जायेंगे या छीन लिए जावेंगे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Serve Man as God

🔶 The only way of getting our divine nature manifested is by helping others to do the same. If there is inequality in nature, still there must be equal chance for all – or if greater for some and for some less  - the weaker should be given more chance than the strong. In other words, a Brahmana is not so much in need of education as a Chandala. If the son of a Brahmana needs one teacher, that of a Chandala needs ten. For greater help must be given to him whom nature has not endowed with an acute intellect from birth. It is a madman who carries coals to Newcastle. The poor, the downtrodden, the ignorant - let these be your god.

🔷 This is the gist of all worship - to be pure and to do good to others. He who sees Siva in the poor, in the weak, and in the diseased, really worships Siva; and if he sees Siva only in the image, his worship is but preliminary.

🔶 The life of Buddha shows that even a man who has no metaphysics, belongs to no sect, and does not go to any church, or temple, and is a confessed materialist, even he can attain to the highest. …. He was the only man who was ever ready to give up his life for animals, to stop a sacrifice. He once said to a king: ‘If the sacrifice of a lamb helps you to go to heaven, sacrificing a man will help you better; so sacrifice me.’ The king was astonished.

🔷 ‘The good live for others alone. The wise man should sacrifice himself for others.’ I can secure my own good only by doing your good. There is no other way, none whatsoever.

🔶 Go from village to village; do good to humanity and to the world at large. Go to hell yourself to buy salvation for others… ‘When death is so certain, it is better to die for a good cause.’

🔷 Throughout the history of the world, you find great men make great sacrifices and the mass of mankind enjoy the benefit. If you want to give up everything for your own salvation, it is nothing. Do you want to forgo even your own salvation for the good of the world? You are God, think of that.

✍🏻 Swami Vivekananda

👉 आत्मोन्नति के चार आधार (भाग 7)

🔶 तीसरी बात जो आत्मिक उन्नति के लिए आवश्यक है, उसका नाम है संयम। संयम का अर्थ है— रोकथाम। अगर हम रोकथाम करें तो जो हमारी शक्तियों का घोर अपव्यय होता रहता है, उसको बचा सकते हैं। हम अपनी अधिकांश शारीरिक और मानसिक शक्तियों को अपव्यय में नष्ट कर देते हैं, कुमार्ग पर नष्ट कर देते हैं। यदि उनको रोका जा सका होता और उपयोगी मार्ग पर लगाया गया होता तो निश्चित रूप से उन शक्तियों के चमत्कार हमको देखने को मिल सकते थे, जो हमारे पास थीं। पर हम बर्बादी से कुछ बचा नहीं सके। चार तरह के संयम-निग्रह रूप में बताये गये हैं— इन्द्रिय-निग्रह, मनोनिग्रह, संयम-निग्रह, अर्थ-निग्रह। इन्द्रिय-निग्रह में जिव्हा और कामेन्द्रिय का संयम प्रमुख है। ये इन्द्रियाँ हमारी कितनी सारी शक्तियों को नष्ट करती हैं और स्वास्थ्य को किस बुरी तरीके से खोखला करती हैं, यह सभी जानते हैं।
           
🔷 इन्द्रिय-निग्रह का महत्त्व बताने की जरूरत नहीं है। शारीरिक दृष्टि से जिनको समर्थ बनना हो, नीरोग और दीर्घजीवी बनना हो, उनको इन्द्रिय-निग्रह का महत्त्व समझना और अपने आपको संयम का अभ्यासी बनाना चाहिए। दूसरा संयम मनोनिग्रह है। मन में कितने सारे विचार उठते हैं, लेकिन वे असंगत, असंयमित, बुराइयों एवं मनोविकारों से भरे होते हैं। इनसे हमारा मस्तिष्क विकृत होता है और बुरी तरह की आदतें पड़ती हैं। मनःशक्तियाँ निग्रहीत करके किसी कार्य में लगाई गई होतीं तो हम वैज्ञानिक बन गए होते, साहित्यकार बन गए होते। जिस भी कार्य में हमने मन लगाया होता, सफलता की उच्च श्रेणी तक जा पहुँचे होते, पर अस्त-व्यस्त मन होने के कारण से कोई सफलता सम्भव न हो सकी। मनोनिग्रह करके एकाग्रता की शक्ति और एक दिशा में चलने की सामर्थ्य प्राप्त कर सकें, तो उससे हमारी सफलताओं का द्वार खुल सकता है।
 
🔶 तीसरा है— समय का निग्रह। हम समय को आलस्य और प्रमाद में पड़े-पड़े बर्बाद करते रहते हैं। कोई योजनाबद्ध कार्य नहीं करते, जब जो आया मनमर्जी से काम कर लिया, मन नहीं हुआ तो नहीं किया। इस तरीके से अस्त-व्यस्तता में हमारा जीवन नष्ट हो जाता है, जबकि समय का थोड़ा-थोड़ा भी उपयोग करते तो न जाने कितना लाभ उठा सकते थे। चौथा निग्रह-अर्थ-निग्रह भी ऐसा ही महत्त्वपूर्ण है। पैसे को विलासिता से लेकर न जाने किस-किस काम में, व्यसनों में, अनाचारों में हम खर्च करते हैं। अगर उसको फिजूलखर्ची से हम बचा सके होते और उस धन को हमने किसी उपयोगी काम में लगाया होता तो भौतिक और आत्मिक उन्नति की दिशा में हम कहीं आगे बढ़ गए होते। अर्थ-निग्रह, इन्द्रिय-निग्रह, मनोनिग्रह, समय-निग्रह— इन चारों निग्रहों को हम करें तो संयमशील हो सकते हैं। हमको संयम बरतना चाहिए, अस्वाद व्रत का, ब्रह्मचर्य का अभ्यास करना चाहिए। ऐसे-ऐसे असंख्य संयम हैं, जिनको अपनाने से हम तपस्वी बनते हैं और अपनी शक्ति का बहुत बड़ा भाग बचा करके अच्छे काम में लगाते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 आचरण की टोकरी:-

(सत्संग सॆ मन की मैल की धुलाई)
  
🔶 एक युवक प्रतिदिन संत का सत्संग सुनता था। एक दिन जब सत्संग समाप्त हो गए, तो वह संत के पास गया और बोला:-

🔷 ‘महाराज! मैं काफी दिनों से आपके सत्संग सुन रहा हूं, किंतु यहां से जाने के बाद मैं अपने गृहस्थ जीवन में वैसा सदाचरण नहीं कर पाता, जैसा यहां से सुनकर जाता हूं। इससे सत्संग के महत्व पर शंका भी होने लगती है। बताइए, मैं क्या करूं?’

🔶 संत ने युवक को बांस की एक टोकरी देते हुए उसमें पानी भरकर लाने के लिए कहा। युवक टोकरी में जल भरने में असफल रहा।

🔷 संत ने यह कार्य निरंतर जारी रखने के लिए कहा। युवक प्रतििदन टोकरी में जल भरने का प्रयास करता, किंतु सफल नहीं हो पाता। कुछ दिनों बाद संत ने उससेे पूछा, ‘इतने दिनों से टोकरी में लगातार जल डालने से क्या टोकरी में कोई फर्क नजर आया ?’

🔶 युवक बोला. ‘एक फर्क जरूर नजर आया है। पहले टोकरी के साथ मिट्टी जमा होती थी, अब वह साफ दिखाई देती है। कोई गंदगी नहीं दिखाई देती और इसके छेद पहले जितने बड़े नहीं रह गए, वे बहुत छोटे हो गए हैं।’

🔶 तब संत ने उसे समझाया, ‘यदि इसी तरह उसे पानी में निरंतर डालते रहोगे, तो कुछ ही दिनों में ये छेद फूलकर बंद हो जाएंगे और टोकरी में पानी भर पाओगे।

🔷 इसी प्रकार जो लगातर सत्संग जाते हैं, उनका मन एक दिन अवश्य निर्मल हो जाता है, अवगुणों के छिद्र भरने लगते हैं और गुणों का जल भरने लगता है।’ युवक ने संत से अपनी समस्या का समाधान पा लिया।

🔶 निरंतर सत्संग से दुर्जन भी सज्जन हो जाते हैं। क्योंकि महापुरुषों की पवित्र वाणी उनके मानसिक विकारों को दूर कर उनमें सदविचारों का आलोक प्रसारित कर देती है।

👉 आज का सद्चिंतन 16 Nov 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 Nov 2017


बुधवार, 15 नवंबर 2017

👉 आत्मोन्नति के चार आधार (भाग 6)

🔶 इनका मुकाबला करने के लिए क्या करना चाहिए? श्रेष्ठता के मार्ग पर अगर हमको चलना है, आत्मोत्कर्ष करना है, तो हमारे पास ऐसी शक्ति भी होनी चाहिए जो पतन की ओर घसीट ले जाने वाली इन सत्ताओं का मुकाबला कर सके। इसके लिए एक तरीका है कि हम श्रेष्ठ मनुष्यों के साथ में सम्पर्क और सान्निध्य बनाए रखें, उनके सत्संग को कायम रखें। यह सत्संग कैसे हो सकता है? यह सत्संग केवल पुस्तकों के माध्यम से सम्भव है, क्योंकि विचारशील व्यक्ति हर समय बातचीत करने के लिए मिल नहीं सकते। इनमें से बहुत तो ऐसे होते हैं, जो स्वर्गवासी हो चुके हैं और जो जीवित हैं, वे हमसे इतनी दूर रहते हैं कि उनके पास जाकर के हम उनसे बातचीत करना चाहे तो वह भी कठिन है।
          
🔷 हम जा नहीं सकते और उनके पास जाएँ भी तो क्या उनके लिए भी कठिन है, क्योंकि प्रत्येक महापुरुष समय की कीमत को समझता और व्यस्त रहता है। ऐसी हालत में हम लगातार सत्संग कैसे कर पाएँगे? कभी साल-दो साल में एक-आध घण्टे का सत्संग कर लिया तो क्या उससे हमारा उद्देश्य पूरा हो जाएगा? इसलिए अच्छा तरीका यही है कि हम अपने जीवन में नियमित रूप से जैसे अपने कुटुम्बी और मित्रों से बात करते हैं, श्रेष्ठ महामानवों से, युग के मनीषियों से बातचीत करने के लिए समय निकालें। समय निकालने की इस प्रक्रिया का नाम है—स्वाध्याय।
 
🔶 स्वाध्याय को आध्यात्मिक विकास के लिए अत्यधिक आवश्यक माना गया है। स्वाध्याय के बारे में ब्राह्मण-ग्रन्थों में कहा गया है—जिस दिन विचारशील आदमी स्वाध्याय नहीं करता उस दिन उसकी संज्ञा चाण्डाल जैसी हो जाती है। स्वाध्याय का महत्त्व भजन से किसी भी प्रकार से कम नहीं है। भजन का उद्देश्य भी यही है कि हमारे विचारों का परिष्कार हो और हम श्रेष्ठ व्यक्तित्व की ओर आगे बढ़े। स्वाध्याय हमारे लिए आवश्यक है।

🔷 स्वाध्याय से हम महापुरुषों को अपना मित्र बना सकते हैं और जब भी जरूरत पड़ती है, तब उनसे खुले मन से शरीर को स्वच्छ रखने के लिए स्नान करना आवश्यक है, कपड़े धोना आवश्यक है, उसी प्रकार से स्वाध्याय के द्वारा, श्रेष्ठ विचारों के द्वारा अपने मन के ऊपर जमने वाले कषाय-कल्मषों को, मलीनता को धोना आवश्यक है। स्वाध्याय से हमको प्रेरणा मिलती है, दिशाएँ मिलती हैं, मार्गदर्शन मिलता हैं, श्रेष्ठ पुरुष हमारे सान्निध्य में आते हैं और हमको अपने मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित-प्रोत्साहित करते हैं, मार्गदर्शन करते हैं। ये सारी की सारी आवश्यकताएँ स्वाध्याय और भजन के बराबर ही मूल्य और महत्त्व समझा जाना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 साधनहीन का साधन

🔷 श्रावस्ती नगरी में एक बार भारी अकाल पड़ा। सर्वत्र हाहाकार मच गया। लोग भूखों मरने लगे। भगवान बुद्ध उधर से निकले तो वहाँ की स्थिति देख कर उन्हें बहुत दुःख हुआ। उनने वहाँ के धनीमानी नागरिकों की एक सभा बुलाई कि भूखे मरने वाले लोगों को सुखी प्रदेश तक पहुँचाने के लिए मार्ग में खाने को कुछ अन्न की सहायता की जाय ताकि वे अन्यत्र जाकर अपनी प्राण रक्षा कर सकें।

🔶 सब श्रीमंत चुप थे। वे अपनी कोठी और तिजोरी खाली नहीं करना चाहते थे। चारों ओर सन्नाटा था, एक एक करके सब लोग खिसकने लगे। कोई सहयोग देने को तैयार न था। इस सन्नाटे को चीरती हुई एक लड़की खड़ी हुई उसने कहा- ‘मैं सब भूखों को भोजन देने का जिम्मा अपने ऊपर लेती हूँ।’ उसकी बात सुनकर सब लोग अवाक् रह गये। जिस जिम्मेदारी को बड़े-बड़े लक्षाधीश अपने कंधे पर उठाने को तैयार नहीं, उसे यह लड़की कहाँ से पूरा करेगी? लड़की ने कहा मैं कल से घर-घर जाकर भीख मागूँगी और उससे जो मिलेगा उसे ही भूखों को बाटूँगी।

🔷 उसने वैसा ही किया उसे प्रचुर अन्न मिलने लगा और उससे अगणित दुर्भिक्ष पीड़ित लोगों की प्राण रक्षा हुई।

🔶 अपने पास साधन न होने पर भी मनोबल के आधार पर मनस्वी लोग जन सहयोग के आधार पर प्रचुर साधन जुटा सकते है और उससे संसार का भला कर सकते हैं।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 ज्ञान

🔷 संसार में प्रत्येक व्यक्ति ज्ञानी है, प्रत्येक व्यक्ति ज्ञान चाहता है, प्रत्येक व्यक्ति अपने को ज्ञानी समझता है, इसीलिये ज्ञान को नहीं प्राप्त कर पाता है। क्योंकि ज्ञानी को ज्ञान की क्या आवश्यकता है, ज्ञान की आवश्यकता तो अज्ञानी को होती है, जो व्यक्ति अपने को अज्ञानी समझता है उसे ही ज्ञान की प्राप्ति हो पाती है।

🔶 संसार में प्रत्येक व्यक्ति भक्त है, प्रत्येक व्यक्ति भक्ति चाहता है, प्रत्येक व्यक्ति अपने को भक्त समझता है, इसीलिये भक्ति को प्राप्त नहीं कर पाता है। क्योंकि भक्त को भक्ति की क्या आवश्यकता है, भक्ति की आवश्यकता तो अभक्त को होती है, जो व्यक्ति अपने को अभक्त समझता है उसे ही भक्ति प्राप्त हो पाती है।

🔷 बिना ज्ञान के भक्ति नहीं हो सकती है, बिना भक्ति के ज्ञान नहीं हो सकता है, ज्ञान से भक्ति प्राप्त हो या भक्ति से ज्ञान प्राप्त हो एक ही बात है। ज्ञान और भक्ति दोनों ही एक दूसरे के बिना अधूरे हैं, जब तक दोनों बराबर मात्रा में स्वयं के अन्दर प्रकट नहीं हो जाते तब तक कोई भी व्यक्ति कर्म के बंधन से मुक्त नहीं हो सकता है। जब तक व्यक्ति कर्म बंधन से मुक्त नहीं होता है तब तक भगवान का दर्शन प्राप्त नहीं हो सकता है।

🔶 भक्ति के पास आँखे नहीं होती है और ज्ञान के पास पैर नहीं होते हैं, भगवत पथ पर भक्ति ज्ञान की आँखो की सहायता से देख पाती है और ज्ञान भक्ति के पैरों की सहायता से चल पाता है। जब तक ज्ञान और भक्ति साथ-साथ नहीं चलते हैं तब तक भगवत पथ की दूरी तय नहीं हो सकती है।

🔷 ज्ञानी व्यक्ति को कभी ज्ञान को श्रेष्ठ नहीं समझना चाहिये और भक्त को कभी भक्ति को श्रेष्ठ नहीं समझना चाहिये, प्रत्येक व्यक्ति में ज्ञान और भक्ति दोनों ही सम्पूर्ण मात्रा में होते हैं। किसी व्यक्ति में ज्ञान अधिक प्रकट होता है तो किसी व्यक्ति में भक्ति अधिक प्रकट होती है, मिलकर दोनों का आदान-प्रदान करना चाहिये।

🔶 अधिकतर पुरुषों में ज्ञान की अधिकता प्रकट रहती है और अधिकतर स्त्रीयों में भक्ति की अधिकता प्रकट रहती है, जिस प्रकार स्त्री और पुरुष एक दूसरे के बिना अधूरे हैं उसी प्रकार ज्ञान और भक्ति एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। इसीलिये भक्त की संगति मिले तो स्वयं को अभक्त समझते हुए भक्तों की संगति करनी चाहिये और यदि ज्ञानी की संगति मिले तो स्वयं को अज्ञानी समझते हुए ज्ञानीयों की संगति करनी चाहिये।

🔷 भक्त और ज्ञानी दोनों को किसी से भी बहस नहीं करनी चाहिये, यदि कोई कुछ भी पूछे तो उसे ज्ञानी समझते हुए और स्वयं को अज्ञानी समझते हुए जबाब दे देना चाहिए। जबाब देने के बाद यह विचार भी नहीं करना चाहिये कि मैने क्या जबाब दिया है, क्योंकि विचार करने से उसके परिणाम का विचार मन में उत्पन्न हो जाता है, फल का विचार ही तो बंधन का कारण होता है।

🔶 सामने वाला तो बहस करेगा लेकिन उससे विचलित नहीं होना चाहिये बल्कि अपनी समझ के अनुसार शान्त चित्त से जबाब देना चाहिये। जब ऎसा महसूस होने लगे कि सामने वाला व्यक्ति बात को समझ नहीं रहा है तो उससे विनम्रता पूर्वक क्षमा माँगते हुए, मैं तो अज्ञानी हूँ ऎसा कहकर उससे अपना पीछा छुड़ा लेना चाहिये।

👉 पिशाच प्रेमी या पागल (अन्तिम भाग)

🔶 प्रेम का अर्थ है त्याग और सेवा। सच्चा प्रेमी अपने सुखों की तनिक भी इच्छा नहीं करता वरन् जिस पर प्रेम करता है उसके सुख पर अपने को उत्सर्ग कर देता है। लेने का उसे ध्यान भी नहीं आता, देना ही एकमात्र उसका कर्तव्य हो जाता है। जिसके हृदय में प्रेम की ज्योति जलेगी वह गोरे चमड़े पर फिसल कर अपने चमारपन का परिचय न देगा और न व्यभिचार की कुदृष्टि रखकर अपनी आत्मा को पाप पंक में घसीटेगा। वह किसी स्त्री के रूप, रंग, चमक, दमक, हाव, भाव या स्वर कंठ पर मुग्ध नहीं होगा, वरन् किसी देवी में उज्ज्वल कर्तव्य का दर्शन करेगा तो उसके चरणों पर झुककर प्रणाम करेगा। स्त्रियों से प्रेम करने वाले के कमरे में अभिनेत्रियों के अधनंग चित्र नहीं होंगे वरन् सीता और सावित्री की प्रतिमायें विराजेंगीं। प्रेमी कमर लचकाकर गलियों में छैल चिकनियाँ बना हुआ न फिरेगा, वह माँ बहिनों को सती साध्वी बनाने के लिए उनमें धर्म प्रेरणा करेगा।

🔷 उसकी जिह्वा पर आशिक-माशकों के गन्दे अफसाने न होंगे वरन् राम-भरत के प्रेम की चर्चा करता हुआ गदगद हो जायेगा। प्रेमी का दिल तो बेकाबू हो सकता है पर दिमाग मुट्ठी में रहेगा, वह दूसरों के सुख के लिए आत्मत्याग करने में अपने को बेकाबू करेगा, किन्तु किसी को पतन के मार्ग पर घसीटने का स्मरण आते ही उसकी आत्मा काँप जायगी। इस दिशा में उसका एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता। अपने प्रेमपात्र को बदनामी, पतन, दुख, भ्रम और नरक में घसीटने वाला व्यक्ति किसी भी प्रकार प्रेमी नहीं कहा सकता, वह तो नरक का कीड़ा है जो अपनी विषय ज्वाला में जलाने के लिए दूसरे पक्ष को घसीटता है।

🔶 स्मरण रखिए प्रेम का लक्षण त्याग है। जब आप अपने सुख को दूसरों के ऊपर निछावर करते हैं तब आप प्रेमी हैं। जब आप अपने सुख के लिए दूसरे को पतन के मार्ग में खींचते हैं तब आप पिशाच हैं। जब आप दूसरों के सुधार के लिए स्वयं कष्ट सहते हैं, बुराइयाँ ओढ़ते हैं, तप करते हैं तब आप प्रेमी हैं। जब दूसरों के कुकर्म को यों ही अनियंत्रित गति से बढ़ने देते हैं, न तो उनको रोकते हैं, न विरोध करते हैं तब आप पागल बन जाते हैं। क्योंकि भविष्य की हानि-लाभ न सोचकर केवल आज पर ही ध्यान देने वाला पागल कहा जाता है। सन्निपात ग्रस्त को मिठाई खिलाकर उसकी बीमारी बढ़ा देने वाला पागल ही कहा जायगा। प्रेमी का धर्म है त्याग और सेवा। त्यागी और सेवक ही प्रेमी कहला सकता है। जो भोगेच्छा में जलता फिरता है वह पिशाच है और जो सुधार के लिए किसी को कष्ट देना नहीं चाहता एवं सेवा के लिए उद्यत नहीं होता वह पागल है।

🔷 प्रेमियों को अपना अन्तःकरण टटोलकर निर्णय करना चाहिए कि वे पिशाच हैं? प्रेमी हैं? या पागल हैं?

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, मई1942, पृष्ठ 12
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1942/May/v1.12


http://literature.awgp.org

👉 आज का सद्चिंतन 15 Nov 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 15 Nov 2017


👉 प्रभु की प्राप्ति कैसे होती है..?

🔷 एक बेटी ने एक संत से आग्रह किया कि वो घर आकर उसके बीमार पिता से मिलें, प्रार्थना करें...। बेटी ने ये भी बताया कि उसके बुजुर्ग पिता पलंग से उठ भी नहीं सकते...!!

🔶 एक दिन इष्ट देव ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिये तथा कहा -- "राजन् मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हैं। बोलो तुम्हारी कोई इछा हॆ?"

🔷 प्रजा को चाहने वाला राजा बोला -- "भगवन् मेरे पास आपका दिया सब कुछ हैं और आपकी कृपा से राज्य मे सब प्रकार सुख-शान्ति है। फिर भी मेरी एक ही ईच्छा हैं कि जैसे आपने मुझे दर्शन देकर धन्य किया, वैसे ही मेरी सारी प्रजा को भी कृपा कर दर्शन दीजिये।"

🔶 "यह तो सम्भव नहीं है" -- ऐसा कहते हुए भगवान ने राजा को समझाया। परन्तु प्रजा को चाहने वाला राजा भगवान् से जिद्द् करने लगा। आखिर भगवान को अपने साधक के सामने झुकना पडा ओर वे बोले -- "ठीक है, कल अपनी सारी प्रजा को उस पहाड़ी के पास ले आना और मैं पहाडी के ऊपर से सभी को दर्शन दूँगा।"

🔷 ये सुन कर राजा अत्यन्त प्रसन्न हुअा और भगवान को धन्यवाद दिया। अगले दिन सारे नगर मे ढिंढोरा पिटवा दिया कि कल सभी पहाड़ के नीचे मेरे साथ पहुँचे, वहाँ भगवान् आप सबको दर्शन देगें। दूसरे दिन राजा अपने समस्त प्रजा और स्वजनों को साथ लेकर पहाडी की ओर चलने लगा।

🔶 चलते-चलते रास्ते मे एक स्थान पर तांबे कि सिक्कों का पहाड देखा। प्रजा में से कुछ एक लोग उस ओर भागने लगे। तभी ज्ञानी राजा ने सबको सर्तक किया कि कोई उस ओर ध्यान न दे, क्योकि तुम सब भगवान से मिलने जा रहे हो, इन तांबे के सिक्कों के पीछे अपने भाग्य को लात मत मारो। परन्तु लोभ-लालच मे वशीभूत प्रजा के कुछ एक लोग तो तांबे की सिक्कों वाली पहाड़ी की ओर भाग ही गयी और सिक्कों कि गठरी बनाकर अपने घर कि ओर चलने लगे। वे मन ही मन सोच रहे थे, पहले ये सिक्कों को समेट ले, भगवान से तो फिर कभी मिल ही लेगे।

🔶 राजा खिन्न मन से आगे बढे। कुछ दूर चलने पर चांदी कि सिक्कों का चमचमाता पहाड़ दिखाई दिया। इस वार भी बचे हुये प्रजा में से कुछ लोग, उस ओर भागने लगे ओर चांदी के सिक्कों को गठरी बनाकर अपनी घर की ओर चलने लगे। उनके मन मे विचार चल रहा था कि ऐसा मौका बार-बार नहीं मिलता है। चांदी के इतने सारे सिक्के फिर मिले न मिले, भगवान तो फिर कभी मिल ही जायेगें. इसी प्रकार कुछ दूर और चलने पर सोने के सिक्कों का पहाड़ नजर आया। अब तो प्रजा जनो में बचे हुये सारे लोग तथा राजा के स्वजन भी उस ओर भागने लगे।

🔷 वे भी दूसरों की तरह सिक्कों कि गठरीयां लाद-लाद कर अपने-अपने घरों की ओर चल दिये। अब केवल राजा ओर रानी ही शेष रह गये थे। राजा रानी से कहने लगे- "देखो कितने लोभी ये लोग। भगवान से मिलने का महत्व ही नहीं जानते हैं। भगवान के सामने सारी दुनियां की दौलत क्या चीज हैं..?"

🔶 सही बात है-- रानी ने राजा कि बात का समर्थन किया और वह आगे बढने लगे कुछ दुर चलने पर राजा ओर रानी ने देखा कि सप्तरंगि आभा बिखरता हीरों का पहाड़ हैं। अब तो रानी से भी रहा नहीं गया, हीरों के आर्कषण से वह भी दौड पड़ी और हीरों कि गठरी बनाने लगी। फिर भी उसका मन नहीं भरा तो साड़ी के पल्लू मेँ भी बांधने लगी। वजन के कारण रानी के वस्त्र देह से अलग हो गये, परंतु हीरों का तृष्णा अभी भी नहीं मिटी। यह देख राजा को अत्यन्त ही ग्लानि ओर विरक्ति हुई। बड़े दुःखद मन से राजा अकेले ही आगे बढते गये।

🔷 वहाँ सचमुच भगवान खड़े उसका इन्तजार कर रहे थे। राजा को देखते ही भगवान मुसकुराये ओर पुछा - "कहाँ है तुम्हारी प्रजा और तुम्हारे प्रियजन। मैं तो कब से उनसे मिलने के लिये बेकरारी से उनका इन्तजार कर रहा हूॅ।" राजा ने शर्म और आत्म-ग्लानि से अपना सर झुका दिया।

🔶 तब भगवान ने राजा को समझाया --
"राजन, जो लोग अपने जीवन में भौतिक सांसारिक प्राप्ति को मुझसे अधिक मानते हैं, उन्हें कदाचित मेरी प्राप्ति नहीं होती और वह मेरे स्नेह तथा कृपा से भी वंचित रह जाते हैं..!!"

🔷 जो जीव अपनी मन, बुद्धि और आत्मा से भगवान की शरण में जाते हैं, और सर्व लौकिक सम्बधों को छोडके प्रभु को ही अपना मानते हैं वो ही भगवान के प्रिय बनते हैं।

मंगलवार, 14 नवंबर 2017

👉 आत्मोन्नति के चार आधार (भाग 5)

🔶 इसके लिए हमको नित्य ही आत्म-निरीक्षण करना चाहिए। अपनी गलतियों पर गौर करना चाहिए। उनको सुधारने के लिए कमर कसनी चाहिए और अपने आपका निर्माण करने के लिए आगे बढ़ना और जो अपने आपका निर्माण करने के लिए आगे बढ़ना और जो कमियाँ हमारे स्वभाव के अन्दर हैं, उन्हें दूर करने के लिए जुटे रहना चाहिए। आत्म-विकास इसका एक हिस्सा है। हमको अपनी संकीर्णता में सीमित नहीं रहना चाहिए। अपने अहं को और अपनी स्वार्थपरता को, अपने हितों को व्यापक दृष्टि से बाँट देना चाहिए।
         
🔷 दूसरों के दुःख हमारे दुःख हों, दूसरों के सुखों में हम सुखी रहें, इस तरह की वृत्तियों का हम विकास कर सकें तो कहा जाएगा कि हमने जीवन-साधना करने के लिए जितना प्रयास किया, उतनी सफलता पाई। साधना से सिद्धि की बात में सन्देह की गुंजाइश नहीं है। अन्य किसी बात में सन्देह की गुंजाइश भी है, देवी-देवताओं की उपासना करने पर हमको फल मिले न मिले, कह नहीं सकते, लेकिन जीवन की साधना करने का परिणाम निश्चित रूप से भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही जीवनों में लाभ के रूप में देखा जा सकता है। यह साधना के बारे में निवेदन किया गया।
 
🔶 दूसरा है— स्वाध्याय। मन की मलीनता को धोने के लिए स्वाध्याय अति आवश्यक है। दृष्टिकोण और विचार प्रायः वही जमे रहते हैं हमारे मस्तिष्क में, जो कि बहुत दिनों से पारिवारिक और अपने मित्रों के सान्निध्य में हमने सीखे और जाने। अब हमको श्रेष्ठ पुरुषों का सत्संग करना चाहिए। चारों ओर हम जिस वातावरण से घिरे हुए हैं, वह हमको नीचे की ओर गिराता है। पानी का स्वभाव नीचे गिरने की तरफ होता है। हमारा स्वाभाविक स्वभाव ही ऐसा होता है, जो नीचे स्तर के कामों की तरफ, निकृष्ट उद्देश्य के लिए आसानी से लुढ़क जाता है।

🔷 चारों तरफ का वातावरण जिसमें हमारे कुटुम्बी भी शामिल हैं, मित्र भी शामिल हैं, घरवाले भी शामिल हैं, हमेशा इस बात के लिए दबाव डालते हैं, कि हमको किसी भी प्रकार से किसी भी कीमत पर भौतिक सफलताएँ पा लेनी चाहिए। चाहे उसके लिए नीति बरतनी पड़े अथवा अनीति का आश्रय लेना पड़े ।। हर जगह से यही शिक्षण हमको मिलता है। सारे वातावरण में इसी तरह की हवा फैली हुई है और यही गन्दगी हमें प्रभावित करती हैं। हमारी गिरावट के लिए काफी वातावरण विद्यमान है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 क्या-क्या प्राप्त करना शेष??

🔷 अभी हमारे लिए क्या-क्या प्राप्त करना शेष रहा है, जानते हो? देखो :-

🔶 प्रथम तो प्रेम- क्योंकि अभी तक हमने केवल द्वेष और आत्मसंतोष की ही साधना की है।

🔷 ज्ञान? क्योंकि अभी तक हम केवल स्खलन अवलोकन और विचारशक्ति को ही प्राप्त कर सके हैं।

🔶 आनन्द? क्योंकि अभी तक हम केवल दुःख सुख तथा उदासीनता को ही प्राप्त कर सके हैं।

🔷 शक्ति? क्योंकि अभी तक निर्बलता, प्रयत्न और विजय पराजय तक ही हम पहुँच सके हैं।

🔶 जीवन? अर्थात् प्राण। अभी तक मानव केवल जन्म, मृत्यु और वृद्धि ही देख सका है।

🔷 अद्वैत? क्योंकि अभी तक मानवजाति को युद्ध और स्वार्थ साधन करने की विद्या ही आती है।

🌹 एक शब्द में कहें तो अभी हमें भगवान को प्राप्त करना है। हमें अपने को उसके दिव्य स्वरूप को प्रतिमा बनाकर आत्मा का पुनर्निर्माण करना है।

👉 मूर्खता के लक्षण


🌹 मूर्खता के लक्षण छोड़ेंगे तब सद्गुण धारण कर सकेंगे. आगे ऐसे कई मुर्ख के लक्षण बताए गए थे, और भी कुछ लक्षण यहाँ बताए है, श्री समर्थ रामदास स्वामी कहते है कि “इस लक्षणों को जो एकाग्र होकर सुनेगा-पढ़ेगा उसमें से मूर्खता के अवगुण दूर होंगे तथा उसको चातुर्य के लक्षण प्राप्त होगे.”

🔷 १] संसार दुःख के लिए जो ईश्वर को गाली देता है तथा जो अपने मित्रों के दोष-त्रुटी बताता रहेता है वह मुर्ख है।

🔶 २] जो एकत्रित समूह [सभा] का रसभंग हो ऐसा वाणी-वर्तन करता है तथा क्षण में अच्छा क्षण में बुरा बनता है, वह मुर्ख है।

🔷 ३] जो अपने पुराने सेवको की छुट्टी कर देता है, जिसकी सभा निर्नायक होती है, वह मुर्ख है।

🔶 ४] जो अनीति से रुपये एकत्र करता है, धर्म नीति-न्याय को त्याग देता है तथा अपने सहयोगियों को दुःख हो ऐसे बर्तन करता है, वह मुर्ख है।

🔷 ५] घर में सुन्दर स्त्री हो तो भी जो हमेशा परस्त्री के घर जाता है, सब का उच्छिष्ट स्वीकारता है, वह मुर्ख है।

🔶 ६] दुसरे के धन की अभिलाषा करने वाला तथा हरामी लोगों से लेनदेन का व्यवहार करने वाला मुर्ख है।

🔷 ७] आये हुए अतिथि को जो सताता है, कुग्राम में जो रहेता है तथा जो हमेशा चिन्ता करता रहेता है वह मुर्ख है।

🔶 ८] दो लोगों के संभाषण में जो दखल करता है वह मुर्ख है।

🔷 ९] उल्टी करके पानी बिगाड़ता है, पैर से पैर खंजोता है, हीन कुल के लोगों की जो सेवा करता है वह मुर्ख है।

🔶 १०] परस्त्री से जघड़ता है, मूक प्राणी को मारता रहेता है तथा मूर्खो के साथ रहेता है वह मुर्ख है।

🔷 ११] जो झगडा केवल देखता है, छुड़ाने की कोशिश नहीं करता वह मुर्ख है।

🔶 १२] अमीर होते जो पुराने सम्बन्ध-पहचान भूल जाता है तथा देव-ब्राह्मण पर भी सत्ता चलाता है वह मुर्ख है।

🔷 13] अपना काम हो तब तक नम्र रहता है लेकिन परोपकार मात्र ना करता हो वह मुर्ख है।

🔶 १४] जो ना तो पढ़ता है, ना दूसरे को पढ़ने देता है, पुस्तक बंद करके रखता है वह मुर्ख है।

🔷 १५] ऐसे मुर्ख लक्षण संकेत रूप में थोड़े से बताए है, जो बुद्धिमान एकाग्र होकर समझ के उसे मानता है उसे चातुर्य समज में आता है।

👉 पिशाच प्रेमी या पागल (भाग 2)

🔶 देखते हैं कि अबोध किशोर बालकों को लालच या बहकावे में डालकर उन्हें अपनी लिप्सा का साधन बनाने वाले मुहब्बत का दम भरते हैं। उन लड़कों को अपने ही जैसा पतित जीवन बिताने की शिक्षा देने वाले एवं उनका शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य नष्ट कर देने वाले यह कुकर्मी अपने कार्य में प्रेम की गन्ध ढूँढ़ते फिरते हैं!

🔷 देखते हैं कि रूप रंग की चटक-मटक पर लोभित होकर स्त्री-पुरुष इन्द्रिय-प्रेरणा से व्याकुल होते हैं, और एक दूसरे को पाने के लिए बेचैन रहते हैं, पत्र व्यवहार चलता है, गुप्त संदेश दौड़ते हैं, और न जाने क्या क्या होता है, प्रेम रस चखने में उनकी बड़ी व्याकुलता होती है और सोचते हैं कि हमारे यह कार्य प्रेम के परिणाम है।

🔶 देखते हैं कि बालकों को अमर्यादित भोजन करके उन्हें बीमार बनाने वाली माता बेटे के फोड़े को सड़ने देकर हड्डी गल जाने तक डॉक्टर के पास न ले जाने वाला पिता, भाई के अन्याय में सहायता करने वाला भाई, मित्र को पाप पंक में पड़ने से न रोकने वाला मित्र, बीमार को मनचाहा भोजन देने वाला अविवेकी परिचारक समझता है कि मैं प्रेमी हूँ, मैं दूसरे पक्ष के साथ प्रेम का व्यवहार कर रहा हूँ।

🔷 देखते हैं कि साँप को छोड़ देने वाले, चोर को सजा कराने का विरोध कराने वाले, अत्याचारी को क्षमा करने वाले, पाजी की हरकतें चुपचाप सह लेने वाले समझते हैं कि हमने बड़ी दया की है, पुण्य कमा रहे हैं, प्रेम का प्रदर्शन कर रहे हैं।

🔶 इन सब दृश्यों को जब हम देखेंगे तो अनुभव करेंगे कि ईश्वर का वेष बनाकर शैतान आ बैठा है, धर्म की आड़ में पाप बोल रहा है, गाय का चमड़ा ओढ़ कर भेड़िया विचरण कर रहा है। इन्द्रिय लिप्सा, व्यभिचार, पतन प्रोत्साहन, अन्याय वर्धन को यदि प्रेम कहा जायगा तो हम नहीं समझते तो पाप नाम की कौन सी चिड़िया इस दुनिया में शेष रहेगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, मई1942, पृष्ठ 11
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1942/May/v1.11

http://literature.awgp.org

👉 आज का सद्चिंतन 14 Nov 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 Nov 2017


👉 विश्वास की परिभाषा:-

🔷 एक बेटी ने एक संत से आग्रह किया कि वो घर आकर उसके बीमार पिता से मिलें, प्रार्थना करें...। बेटी ने ये भी बताया कि उसके बुजुर्ग पिता पलंग से उठ भी नहीं सकते...!!

🔶 जब संत घर आए तो पिता पलंग पर दो तकियों पर सिर रखकर लेटे हुए थे। एक खाली कुर्सी पलंग के साथ पड़ी थी। संत ने सोचा कि शायद मेरे आने की वजह से ये कुर्सी यहां पहले से ही रख दी गई है।

🔷 संत... "मुझे लगता है कि आप मेरी ही उम्मीद कर रहे थे... !"

🔶 पिता... नहीं, आप कौन हैं... ?

🔷 संत ने अपना परिचय दिया। और फिर कहा... "मुझे ये खाली कुर्सी देखकर लगा कि आप को मेरे आने का आभास था।"

🔶 पिता... ओह ये बात... । खाली कुर्सी। आप...! आपको अगर बुरा न लगे तो कृपया कमरे का दरवाज़ा बंद करेंगे... !

🔷 संत को ये सुनकर थोड़ी हैरत हुई, फिर भी दरवाज़ा बंद कर दिया... ।

🔶 पिता.."दरअसल इस खाली कुर्सी का राज़ मैंने किसी को नहीं बताया। अपनी बेटी को भी नहीं। पूरी ज़िंदगी, मैं ये जान नहीं सका कि प्रार्थना कैसे की जाती है। मंदिर जाता था, पुजारी जी के श्लोक सुनता। वो सिर के ऊपर से गुज़र जाते। कुछ पल्ले नहीं पड़ता था। मैंने फिर प्रार्थना की कोशिश करना छोड़ दिया...!"

🔷 "लेकिन चार साल पहले मेरा एक दोस्त मिला। उसने मुझे बताया कि प्रार्थना कुछ नहीं, भगवान से सीधे संवाद का माध्यम होती है। उसी ने सलाह दी कि एक खाली कुर्सी अपने सामने रखो। फिर विश्वास करो कि वहां भगवान खुद ही विराजमान हैं। अब भगवान से ठीक वैसे ही बात करना शुरू करो, जैसे कि अभी तुम मुझसे कर रहे हो। मैंने ऐसा करके देखा। मुझे बहुत अच्छा लगा। फिर तो मैं रोज़ दो-दो घंटे ऐसा करके देखने लगा। लेकिन ये ध्यान रखता कि मेरी बेटी कभी मुझे ऐसा करते न देख ले। अगर वो देख लेती तो उसका ही नर्वस ब्रेकडाउन हो जाता या वो फिर मुझे साइकाइट्रिस्ट के पास ले जाती... !"

🔶 ये सब सुनकर संत ने बुजुर्ग के लिए प्रार्थना की। सिर पर हाथ रखा और भगवान से बात करने के क्रम को जारी रखने के लिए कहा... ।

🔷 संत को उसी दिन दो दिन के लिए शहर से बाहर जाना था...इसलिए विदा लेकर चले गए...।

🔶 दो दिन बाद बेटी का संत को फोन आया कि उसके पिता की उसी दिन कुछ घंटे बाद मृत्यु हो गई थी, जिस दिन वो आप से मिले थे...।

🔷 संत ने पूछा कि उन्हें प्राण छोड़ते वक्त कोई तकलीफ़ तो नहीं हुई... ?

🔶 बेटी ने जवाब दिया... नहीं! मैं जब घर से काम पर जा रही थी तो उन्होंने मुझे बुलाया...मेरा माथा प्यार से चूमा...ये सब करते हुए उनके चेहरे पर ऐसी शांति थी, जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी। जब मैं वापस आई तो वो हमेशा के लिए आंखें मूंद चुके थे... लेकिन मैंने एक अजीब सी चीज़ भी देखी...वो ऐसी मुद्रा में थे जैसे कि खाली कुर्सी पर किसी की गोद में अपना सिर झुकाया हो। संत जी, वो क्या था... ।

🔷 ये सुनकर संत की आंखों से आंसू बह निकले... बड़ी मुश्किल से बोल पाए... - काश, मैं भी जब दुनिया से जाऊं तो ऐसे ही जाऊं।

सोमवार, 13 नवंबर 2017

👉 आत्मोन्नति के चार आधार (भाग 4)

🔶 साधना—साधना का अर्थ है कि अपने गुण, कर्म, स्वभाव को साध लेना। वस्तुतः मनुष्य चौरासी लाख योनियों को घूमते-घूमते उन सारे के सारे प्राणियों के कुसंस्कार अपने भीतर जमा करके ले आया है, जो मनुष्य जीवन के लिए आवश्यक नहीं हैं, बल्कि हानिकारक है। तो भी वे स्वभाव के अंग बन गए हैं और हम मनुष्य होते हुए भी पशु-संस्कारों से प्रेरित रहते हैं और पशु-प्रवृत्तियों को बहुधा अपने जीवन में कार्यान्वित करते रहते है। इस अनगढ़पन को ठीक कर लेना, सुगढ़पन का अपने भीतर से विकास कर लेना ,, सुगढ़पन का अपने भीतर से विकास कर लेना, कुसंस्कारों को जो पिछली योनियों के कारण हमारे भीतर जमे हुए हैं, उनको निरस्त कर देना और अपना स्वभाव इस तरह का बना लेना जिसको हम मानवोचित कह सकें—साधना है।
         
🔷 साधना के लिए हमको वही क्रियाकलाप अपनाने पड़ते हैं, जो कि कुसंस्कारी घोड़े व बैल को सुधारने के लिए उसके मालिकों को करने पड़ते हैं—हल में चलने के लिए और गाड़ी में चलने के लिए। कुसंस्कारों को दूर करने के लिए हमको लगभग उसी तरह के प्रयत्न करने पड़ते हैं जैसे कि सरकस के पशुओं को पालते हुए उन्हें इस लायक बनाते हैं कि वे सरकस में तमाशा दिखा सकें ।। इसी तरह के प्रयत्न हमको अपने गुण, कर्म, स्वभाव के विकास के, परिष्कार के लिए करने पड़ते हैं।
 
🔶 कच्ची धातुओं को जिस तरीके से आग में तपा करके उनको शुद्ध-परिष्कृत बनाया जाता है, जेवर-आभूषण बनाए जाते हैं, उसी तरीके से हमारा कच्चा जीवन, कुसंस्कारी जीवन को ढाल करके ऐसा सभ्य और ऐसा सुसंस्कृत बनाया जाए कि हम ढली हुई धातु के आभूषण के तरीके से, औजार-हथियार के तरीके से दिखाई पड़े। जंगली झाड़ियों को काटकर के माली लोग अच्छे-अच्छे झाड़ और खूबसूरत पार्क बना देते हैं। हमको भी अपने झाड़-झंखाड़ जैसे जीवन को परिष्कृत करके, काट-छाँट करके, समुन्नत करके इस लायक बनाना चाहिए कि जिसको कहा जा सके कि वह सभ्य और सुसंस्कृत जीवन है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 Prepare Yourself to Receive God's Grace

🔶 Someone had left two tubs out in the open. One was facing up, the other was facing down. Rains came and filled the tub with its face up. The other one, facing down remained totally empty. The empty tub was furious. He cursed the other tub as well as the rain. The rain told him, "Don't be upset. I am not prejudiced. I provide water everywhere. The fault is entirely yours. If you turn your face up, I will fill you with water as well."  

🔷 The tub got the point and accepted his mistake. Telling this story to his disciples a monk said, "Just like rains, God's grace is showering down everywhere. We must prepare ourselves to receive it by performing Upasana. Worship is not begging for alms, it is about preparing oneself to receive the grace of God.

📖 From Pragya Puran

👉 आत्मचिंतन के क्षण 13 Nov 2017

🔶 अच्छे वस्त्रों का आदर होता है, अपनी अवस्था और हैसियत के अनुसार साफ -सुन्दर कपड़े पहनने उचित और न्याय संगत हैं। इनसे आपका व्यक्तित्व निखर उठता है, गुप्त शक्तियाँ जाग्रत हो उठती हैं, मनुष्य अपने आपको दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है, पहला प्रभाव अच्छे कपड़ों का ही पड़ता है। अज्ञात स्थान में, जहाँ कोई नहीं जानता कि आप क्या है, आपके वस्त्र ही आपके सहायक होते हैं। सफर में अच्छे कपड़े पहनने की सलाह इसी लिए दी जाती है। वेशभूषा और वस्त्र आपके चरित्र की विषय सूची की भाँति हैं।

🔷 स्वर्ग एक उपलब्धि मानी गई है। जिसे प्राप्त करने की इच्छा प्रायः हर मनुष्य को रहती है। कई लोग उसे संसार से अलग भी मानते हैं और विश्वास करते हैं कि मरने के बाद वहाँ पहुँचा जाता है या पहुँचा जा सकता है। इस मान्यता के अनुसार लोग स्वर्ग प्राप्त करने के लिए जप, तप, पूजा,पाठ, पुण्य, परमार्थ और साधना, उपासना भी करते हैं। वैसे इस पृथ्वी से अलग अन्यान्तर लोक में स्वर्ग जैसे किसी स्थान का अस्तित्व है अथवा नहीं, यह विवाद का विषय है। पर उसे प्राप्त करने की इच्छा मनुष्य के आगे बढ़ने की आकांक्षा का द्योतक है, जिसे अनुचित नहीं कहा जा सकता।

🔶 हमारे भोगों, उपलब्धियों और प्रवृत्तियों के एकमात्र सूत्र संचालक हमारे स्वयं के कर्म ही हैं। तब फिर देवताओं और विधाता को प्रसन्न करने की चिन्ता करते रहना कहाँ की बुद्धिमत्ता है? हमारा साध्य और असाध्य तो कर्म ही है। वही वन्दनीय-अभिवन्दनीय है, वही वरण और आचरण के योग्य है। दैवी विधान भी उससे भिन्न और उसके विरुद्ध कुछ कभी नहीं करता। कर्म ही सर्वोपरि है। परिस्थितियों और मनःस्थितियों का वही निर्माता है। उसी की साधना से अभीष्ट की उलपब्धि सम्भव है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

रविवार, 12 नवंबर 2017

👉 चार विद्वान ब्राह्मण

🔷 बहुत पुरानी बात है। चार विद्वान ब्राह्मण मित्र थे। एक दिन चारों ने संपूर्ण देश का भ्रमण कर हर प्रकार का ज्ञान अर्जित करने का निश्चय किया। चारों ब्राह्मणों ने चार दिशाएं पकड़ीं और अलग-अलग स्थानों पर रहकर अनेक प्रकार की विद्याएं सीखीं। पांच वर्ष बाद चारों अपने गृहनगर लौटे और एक जंगल में मिलने की बात तय की। चूंकि चारों परस्पर एक-दूसरे को अपनी गूढ़ विद्याओं व सिद्धियों को बताना चाहते थे, अत: इसके लिए जंगल से उपयुक्त अन्य कोई स्थान नहीं हो सकता था।

🔶 जब चारों जंगल में एक स्थान पर एकत्रित हुए तो वहां उन्हें शेर के शरीर की एक हड्डी पड़ी हुई मिली। एक ब्राह्मण ने कहा, ‘मैं अपनी विद्या से इस एक हड्डी से शेर का पूरा अस्थि पंजर बना सकता हूं।’ उसने ऐसा कर भी दिखाया। तब दूसरे ब्राह्मण ने कहा, ‘मैं इसे त्वचा, मांस और रक्त प्रदान कर सकता हूं।’ फिर उसने यह कर दिया। अब उन लोगों के समक्ष एक शेर पड़ा था, जो प्राणविहीन था।

🔷 अब तीसरा ब्राह्मण बोला, ‘मैं इसमें अपनी सिद्धि के चमत्कार से प्राण डाल सकता हूं।’ चौथे ब्राह्मण ने उसे यह कहते हुए रोका, ‘यह मूर्खता होगी। हमें तुम पर विश्वास है, किंतु यह करके न दिखाओ।’ किंतु तीसरे ब्राह्मण का तर्क था कि ऐसी सिद्धि का क्या लाभ जिसे क्रियान्वित न किया जाए। उसका हठ देखकर चौथा ब्राह्मण तत्काल पास के पेड़ पर चढ़कर बैठ गया। तीसरे ब्राह्मण के मंत्र पढ़ते ही शेर जीवित हो गया। प्राणों के संचार से शेर को आहार की आवश्यकता महसूस हुई और उसने सामने मौजूद तीनों ब्राह्मणों को मारकर खा लिया। चौथे ब्राह्मण ने समझदारी से अपने प्राण बचा लिए।

🔶 किसी भी कार्य को करने से पहले उसके परिणामों पर भली-भांति विचार कर लेना चाहिए, अन्यथा विपरीत स्थिति का सामना करना पड़ सकता है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 Nov 2017


👉 आज का सद्चिंतन 13 Nov 2017


👉 पिशाच प्रेमी या पागल (भाग 1)

🔶 देखते हैं कि आजकल गली कूचों में प्रेम की आँधी सी आई हुई है। मुहब्बत के तूफान उड़ रहे हैं। सिनेमाबाज, मनचले, शौकीन फिल्म अभिनेत्रियों से प्रेम करते हैं, उनकी तस्वीरों को आँखों में छिपाये फिरते हैं। सूरत मन में बसी हुई है, उनके हाव-भाव और भाव-भंगी का ऐसा स्मरण करते रहते हैं मानो ये ही इनकी उपास्य देवता हैं। “प्रेम का घर हो प्रेम की छत हो” के गीत उनकी जबान पर गुनगुनाते रहते हैं, उन्हीं की प्रतिध्वनि उनके कानों में गूँजती रहती है।

🔷 देखते हैं कि गलियों में कमर लचकाकर चलने वाले छैल चिकनियाँ पराई बहिन-बेटियों पर कुदृष्टि डालते हैं। उन्हें बहकाकर पाप पंक में घसीटने का प्रयत्न करते हैं, मौका लगे तो उनका धन, धर्म ले भागते हैं। कलेजा थामे फिरते हैं, कोई नयन बाण से बिधा हुआ बनता है, किसी को इश्क का ज्वर है, किसी को मुहब्बत मर्ज। बुलबुल के तराने, सैयाद कफस, शमा, परवाना, कातिल, शमशीर दिल, छुरी और न जाने क्या-क्या उन्हें याद आता है। वेश्याओं के उपासक, दुराचारिणी स्त्रियों के गुलाम, यह रंगीले मनचले इधर से उधर मटर-गश्ती करते हैं और अपने को प्रेमी बताते हैं।

🔶 देखते हैं कि घासलेटी कथाकार, आशिक माशूकी के अफसाने कहने वाले, लैला मजनू के नवीन संस्करण तैयार करते हैं। भोगेच्छा को अनियंत्रित रूप से भड़काने के लिए प्रेम को बन्धन रहित बताते हैं। “काबू में जिसका दिल न हो-वह गरीब क्या करे?” का नारा इसलिए लगाया जाता है कि इनकी शोहदाई को छूट मिल जाय, दुनिया इन्हें निर्दोष समझे। चार मनचले मिले कि गन्दी-गन्दी चर्चा चली, खूबसूरत औरतों की चर्चा, अपने कुकर्मों का बढ़ा-चढ़ा वर्णन, इन्द्रिय सुख की अनर्गल कल्पनाएं करने वाले अपने को प्रेमी मानते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, मई1942, पृष्ठ 11
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1942/May/v1.11


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👉 आत्मोन्नति के चार आधार (भाग 3)

🔶 अब हम चारों चीजों के ऊपर प्रकाश डालते हैं। पहली है— उपासना प्लस साधना। उपासना और साधना— इन दोनों को मिलाकर पूरी चीज बनती है। उपासना का अर्थ है भगवान् पर विश्वास, भगवान् की समीपता। उपासना माने भगवान् के पास बैठना, नजदीक बैठना। इसका मतलब यह हुआ कि उसकी विशेषताएँ हम अपने जीवन में धारण करें। जैसे आग के पास हम बैठते हैं, तो आग की गर्मी से हमारे कपड़े गरम हो जाते हैं, हाथ गरम हो जाते हैं, शरीर गरम हो जाता है। पास बैठने का यही लाभ होना चाहिए। बर्फ के पास बैठते हैं, ठण्डक में बैठते हैं तो हमारे हाथ ठण्डे हो जाते हैं, कपड़े ठण्डे हो जाते हैं।
        
🔷 पानी में बर्फ डालते हैं तो पानी ठण्डा हो जाता है। ठण्डक के नजदीक जाने से हमें ठण्डक मिलनी चाहिए। गर्मी की समीपता से गर्मी मिलनी चाहिए। सुगन्धित चीजों से सुगन्ध मिलनी चाहिए। चन्दन के समीप उगने वाले पौधे सुगन्धित हो जाते हैं, उसकी समीपता की वजह से। यही समीपता वास्तविक है। उपासना का अर्थ यह है कि भगवान का भजन करें, नाम लें, जप करें, ध्यान करें, पर साथ-साथ हम इस बात के लिए भी कोशिश करें कि हम भगवान के नजदीक आते जाएँ। भगवान हमारे में समाविष्ट होता जाए और हम भगवान में समाविष्ट होते जाएँ अर्थात् दोनों एक हो जाएँ।

🔶 एक होने से मतलब यह है कि हम दोनों की इच्छाएँ, दोनों की गतिविधियाँ, दोनों की क्रिया-पद्धति, दोनों के दृष्टिकोण एक जैसे रहें। हमको ईश्वर जैसा बनने का प्रयत्न करना चाहिए। ईश्वर जैसे बनें, न कि ईश्वर पर हुक्म चलाएँ, आपको किसी भी हालत में हमारी माँगे पूरी करनी चाहिए। उपासना का तात्पर्य अपनी मनोभूमि को इस लायक बनाना कि हम भगवान् के आज्ञानुवर्ती बन सकें। उनके संकेतों के इशारे पर अपनी विचारणा और क्रिया-पद्धति को ढाल सकें। उपासना-भजन इसीलिए किया जाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 आज का सद्चिंतन 12 Nov 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 Nov 2017


👉 आन्तरिक निकटता चाहिए

🔶 दूसरों की तरह हमारे भी दो शरीर हैं, एक हाड़-मांस का, दूसरा विचारणा एवं भावना का। हाड़-मांस से परिचय रखने वाले करोड़ों हैं। लाखों ऐसे भी हैं जिन्हें किसी प्रयोजन के लिए हमारे साथ कभी सम्पर्क करना पड़ा है। अपनी उपार्जित तपश्चर्या को हम निरन्तर एक सहृदय व्यक्ति की तरह बाँटते रहते हैं। विभिन्न प्रकार की कठिनाइयों एवं उलझनों में उलझे हुए व्यक्ति किसी दलदल में से निकलने के लिए हमारी सहायता प्राप्त करने आते रहते हैं।

🔷 अपनी सामर्थ्य के अनुसार उनका भार हलका करने में कोई कंजूसी नहीं करते। इस संदर्भ में अनेक व्यक्ति हमारे साथ संपर्क बनाते और प्रयोजन पूरा होने पर उसे समाप्त कर देते हैं। कितने ही व्यक्ति साहित्य से प्रभावित होकर पूछताछ एवं शंका समाधान करने के लिए, कितने ही आध्यात्मिक साधनाओं के गूढ़ रहस्य जानने के लिए, कई अन्यान्य प्रयोजनों से आते हैं। इनकी सामयिक सेवा कर देने से हमारा कर्त्तव्य पूरा हो जाता है। उनके बारे में न हम अधिक सोचते हैं और न उनकी कोई शिकायत या चिंता करते हैं।

🔶 हमारे मन में भावनाएँ उनके लिए उफनती हैं जिनकी पहुँच हमारे अंतःकरण एवं भावना स्तर तक है। भावना शरीर ही वास्तविक शरीर होता है। हम शरीर से जो कुछ हैं, भावना की दृष्टि से कहीं अधिक हंै। हम शरीर से किसी  की जो भलाई कर सकते हैं उसकी अपेक्षा अपनी भावनाओं, विचारणाओं का अनुदान देकर कहीं अधिक लाभ पहुँचाते हैं। पर अनुदान ग्रहण वे ही कर पाते हैं जो भावनात्मक दृष्टि से हमारे समीप हैं।

🔷 जिन्हें हमारे विचारों से प्रेम है, जिन्हें हमारी विचारणा, भावना एवं अंतःप्रेरणा का स्पर्श करने में अभिरुचि है उन्हीं के बारे में यह कहना चाहिए कि वे तत्त्वतः हमारे निकटवर्ती एवं स्वजन संबंधी हैं। उन्हीं के बारे में हमें कुछ विशेष सोचना है, उन्हीं के लिए हमें कुछ विशेष करना है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, जुलाई 1966, पृष्ठ 42
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/July/v1.42
 

शनिवार, 11 नवंबर 2017

👉 आत्मोन्नति के चार आधार (भाग 2)

🔶 मनुष्य के सामने असंख्य समस्याएँ है और उन असंख्य समस्याओं का समाधान केवल इस बात पर टिका हुआ है कि हमारी आन्तरिक स्थिति सही बना दी जाए। दृष्टिकोण हमारा गलत होता है, जो हमारे क्रियाकलाप गलत होता है और गलत क्रियाकलाप के परिणामस्वरूप जो प्रतिक्रियाएँ होती हैं, जो परिणाम सामने आते हैं, वे भयंकर दुःखदाई होते है। कष्टकारक परिस्थितियों के निवारण करने के लिए आवश्यक है कि मनुष्य का चिन्तन और शिक्षण बदल दिया जाए, परिष्कृत कर दिया जाए। यही हैं हमारे प्रयास, जिसके लिए हम अपनी समस्त शक्ति के साथ लगे हुए हैं।
        
🔷 मनुष्य के आन्तरिक उत्थान, आन्तरिक उत्कर्ष, आत्मिक विकास के लिए करना चाहिए और कैसे करना चाहिए? इसका समाधान करने के लिए हमको चार बातें तलाश करनी पड़ती हैं। इन्हीं चार चीजों के आधार पर हमारी आत्मिक उन्नति टिकी हुई है और वे चार आधार हैं—साधना, स्वाध्याय, संयम, और सेवा। ये चारों ऐसे हैं जिनमें से एक को भी आत्मोत्कर्ष के लिए छोड़ा नहीं जा सकता। इनमें से एक भी ऐसा नहीं है, जिसके बिना हमारे जीवन का उत्थान हो सके। चारों आपस में अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए हैं, जिस तरीके से कई तरह की चौकड़ियाँ आपस में जुड़ी हैं। मसलन बीज—एक, जमीन—दो, खाद—तीन, पानी—चार। चारों जब तक नहीं मिलेंगे, कृषि नहीं हो सकती। उसका बढ़ना सम्भव नहीं है। व्यापार के लिए अकेली पूँजी से काम नहीं चल सकता। इसके लिए पूँजी—एक, अनुभव—दो, वस्तुओं की माँग—तीन, ग्राहक—चार।

🔶 इन चारों को आप ढूँढ़ लेंगे तो व्यापार चलेगा और उसमें सफलता मिलेगी। मकान बनना हो तो उसके लिए ईंट, चूना, लोहा, लकड़ी इन चारों चीजों की जरूरत है। चारों में से एक भी चीज अगर कम पड़ेगी तो हमारी इमारत नहीं बन सकती। सफलता प्राप्त करने के लिए मनुष्य का कौशल आवश्यक है, साधन आवश्यक है, सहयोग आवश्यक है और अवसर आवश्यक है। इन चारों चीजों में से एक भी कम पड़ेगी तो समझदार आदमी भी सफलता नहीं प्राप्त कर सकेगा, सफलता रुकी रह जाएगी। जीवन-निर्वाह के लिए भोजन, विश्राम, मल-विसर्जन और श्रम-उपार्जन, चारों की आवश्यकता होती है। ये चारों क्रियाएँ होंगी तभी हम जिन्दा रहेंगे। यदि इनमें से एक भी चीज कम पड़ जाएगी तो आदमी का जीवित रहना मुश्किल पड़ जाएगा। ठीक इसी प्रकार से आत्मिक जीवन का विकास करने के लिए, आत्मोत्कर्ष के लिए चारों का होना आवश्यक है, अन्यथा व्यक्ति-निर्माण का उद्देश्य पूरा न हो सकेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 देने से ही मिलेगा

🔶 किसी को कुछ दीजिए या उसका किसी प्रकार का उपकार कीजिए तो बदले में उस व्यक्ति से किसी प्रकार की आशा न कीजिए। आपको जो कुछ देना हो दे दीजिए। वह हजार गुणा अधिक होकर आपके पास लौट आवेगा। परन्तु आपको उसके लौटने या न लौटने की चिन्ता ही न करनी चाहिए। अपने में देने की शक्ति रखिए, देते रहिए। देकर ही फल प्राप्त कर सकेंगे। यह बात सीख लीजिए कि सारा जीवन दे रहा है। प्रकृति देने के लिए आप को बाध्य करेगी। इसलिए प्रसन्नतापूर्वक दीजिए। आज हो या कल, आपको किसी न किसी दिन त्याग करना पड़ेगा ही।

🔷 जीवन में आप संचय करने के लिए आते हैं परन्तु प्रकृति आपका गला दबाकर मुट्ठी खुलवा लेती है। जो कुछ आपने ग्रहण किया है वह देना ही पड़ेगा, चाहे आपकी इच्छा हो या न हो। जैसे ही आपके मुँह से निकला कि ‘नहीं, मैं न दूँगा।’ उसी क्षण जोर का धक्का आता है। आप घायल हो जाते हैं। संसार में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जो जीवन की लम्बी दौड़ में प्रत्येक वस्तु देने, परित्याग करने के लिए बाध्य न हो। इस नियम के प्रतिकूल आचरण करने के लिए जो जितना ही प्रयत्न करता है वह अपने आपको उतना ही दुखी अनुभव करता है।

🔶 हमारी शोचनीय अवस्था का कारण यह है कि परित्याग करने का साहस हम नहीं करते इसी से हम दुखी हैं। ईंधन चला गया उसके बदले में हमें गर्मी मिलती है। सूर्य भगवान समुद्र से जल ग्रहण किया करते हैं उसे वर्षा के रूप में लौटाने के लिए आप ग्रहण करने और देने के यन्त्र हैं। आप ग्रहण करते हैं देने के लिए। इसलिए बदले में कुछ माँगिए नहीं। आप जितना भी देंगे, उतना ही लौटकर आपके पास आवेगा।

✍🏻 स्वामी विवेकानन्द
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1964 पृष्ठ 1

👉 आज का सद्चिंतन 11 Nov 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 Nov 2017


👉 Possible in the mist of Impossible

🔶 The life is filled so much with uncertainty, doubt and obstructions that it appears almost impossible to overcome these roadblocks. E...