मंगलवार, 25 फ़रवरी 2020

I Will Use You, I Will Not Let You Sit Idle | Pt Shriram Sharma Acharya



Title

👉 बुद्धिमत्ता और मूर्खता की कसौटी

बुद्धिमत्ता की निशानी यह मानी जाती रही है कि उपार्जन बढ़ाया जाय—अपव्यय रोक जाय और संग्रहित बचत के वैभव से अपने वर्चस्व और आनन्द को बढ़ाया जाय। संसार के हर क्षेत्र में इसी कसौटी पर किसी को बुद्धिमान ठहराया जाता है।

मानव-जीवन की सफलता का लेखा-जोखा लेते हुए भी इसी कसौटी को अपनाया जाना चाहिए। जीवन-व्यवसाय में सद्भावनाओं की—सत्प्रवृत्तियों की पूँजी कितनी मात्रा में संचित की गई? सद्विचारों का, सद्गुणों का, सत्कर्मों का वैभव कितना कमाया गया? इस दृष्टि से अपनी उपलब्धियों को परखा, नापा जाना चाहिए। लगता हो कि व्यक्तित्व को समृद्ध बनाने वाली इन विभूतियों की संपन्नता बढ़ी है तो निश्चय ही बुद्धिमत्ता की एक परीक्षा में अपने को उत्तीर्ण हुआ समझा जाना चाहिए।

समय, श्रम, धन, वर्चस्व, चिन्तन मानव-जीवन की बहुमूल्य सम्पदाऐं हैं। इन्हें साहस और पुरुषार्थ पूर्वक सत्प्रयोजन में लगाने की तत्परता बुद्धिमत्ता की दूसरी कसौटी है। जिनने इन ईश्वर-प्रदत्त बहुमूल्य अनुदानों को पेट-प्रजनन में-विलास और अहंकार में खर्च कर डाला, समझना चाहिए वे बहुमूल्य रत्नों के बदले काँच-पत्थर खरीदने वाले उपहासास्पद मनःस्थिति के बाल-बुद्धि लोग हैं।

वस्तु का सही मूल्यांकन न कर सकने वाले और उपलब्धियों के सदुपयोग में प्रमाद बरतने वाले मूर्ख ही कहे जायेंगे। जीवन-क्षेत्र में हमारी सफलता-असफलता का लेखा-जोखा प्रस्तुत करते समय यह देखना चाहिए कि कहीं दूरदर्शिता के अभाव से हम सौभाग्य को दुर्भाग्य में तो नहीं बदल रहे हैं? जीवन बहुमूल्य सम्पदा है। यह अनुपम और अद्भुत सौभाग्य है। इस सुअवसर का समुचित लाभ उठाने के सम्बन्ध में हम दूरदर्शिता का परिचय दे, इसी में हमारी सच्ची बुद्धिमत्ता मानी जा सकती हैं।

अखण्ड ज्योति फरवरी 1974 पृष्ठ 1

👉 आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग (अन्तिम भाग)

अधिकाँश साधक कुछ सेवा के बाद ही शीघ्र ही ईश्वर प्राप्ति के लिये अधीर हो जाते हैं यह निष्काम सेवा या कर्मयोग का लक्षण नहीं, कर्मयोगी वे हैं जो नम्रता तथा आत्मभाव से मनुष्यों की सेवा करते हैं। वही वास्तव में अखिल विश्व के नायक बन जाते हैं। सब लोग उनकी बड़ाई तथा आदर करते हैं। जितना ही आत्मभाव से सेवा करने जायें आप उतनी ही विशेष शक्ति, पौरुष, तथा योग्यता प्राप्त करेंगे। आप इसका अभ्यास करके ही स्वयं अनुभव प्राप्त करें।

जब दूसरों की भलाई करने का भाग मनुष्य का एक अंग ही बन जाता है, तब रेचक मात्र ही किसी प्रकार की कामना नहीं रह जाया करती है। उनको दूसरों की सेवा तथा भलाई करने से ही अत्यन्त आनन्द का अनुभव हुआ करता है। दृढ़ निष्काम सेवा करने से एक विचित्र प्रकार की प्रसन्नता तथा आनन्द हुआ करता है। उनको निष्काम तथा निस्वार्थ कर्म करने से आन्तरिक आध्यात्मिक शक्ति और बल होता है।

आप दूसरों की सेवा करते समय बीज या निराशा, विरक्ति तथा उदासी के भावों को कभी मन में भी न लाया करें। सेवा में ही आनन्दित होकर सेवा किया करें। दूसरों के सेवा करने के लिए सदा प्रस्तुत रहा करें। सेवा करने के अवसर को ढूँढ़ा करें। एक भी अवसर न चूके। सेवा करने का अवसर स्वयं बना दिया करें।

कर्मयोग के अभ्यास में किया गया परिश्रम कभी निष्फल नहीं होता। यह असाध्य भी नहीं है इसमें अपराध तो होता ही नहीं उल्टे इसका थोड़ा भी अभ्यास करते रहने से जन्म-मरण रूप दुःख तथा उसकी सहयोगिनी बुराइयों के ही निवृत्ति होती है। निदान “आत्मज्ञान” की प्राप्ति कर्मयोग से होती है। यहाँ अनिश्चित कुछ भी नहीं है। कर्मयोग का यह आध्यात्म अंत में आत्मानन्द को परमगति तक पहुँचा देता है।

.... समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1950 पृष्ठ 8

👉 MISCELLANEOUS Quotation & Answer (Part 8)

Q.8. How is Gayatri relevant for humankind in the present times ?

Ans.  Each individual is born with certain characteristic traits and IQ., all of which can not be explained as genetic inheritance. For instance, genetics has no explanation for the rare birth of a saint, genius or an idiot in several generations of a family. It is also a fact that many of these exclusive personal traits change in course of growth of  the person from childhood to adulthood. Modern scientists generally ascribe these changes to social environment and education. The science of today is, however, unable to throw light on the reasons for presence or absence in an individual of characteristics like empathy, compassion, large-heartedness, tolerance, courage, equanimity and creativity. Nor has modern science succeeded in devising gadgets or courses for inculcating these virtues.

The spiritual masters in the East on the other hand, maintain that the Absolute Repository of all virtues, which we call as GOD, is that source from which it is possible to acquire positive traits by personal endeavour through specific Yogic exercises under the guidance of a Guru. This is the objective of all spiritual pursuits in the East.

Ever since the dawn of civilization in India, it has been emphasised that no amount of material progress in science and technology can bring about lasting happiness, peace and prosperity for humankind, unless the individual - the unit of family, society, nation and global population, is transformed by infusion of positive thinking. The so-called progress in the West is also responsible for two world wars, nuclear-proliferation, environmental pollution, disparity in living standards, conflicts, poverty and disease all-over the world.

Gayatri is a panacea for all problems - Personal, Family, Social, National or Global : The Gayatri Sadhana is a product of thousands of years of research. Following Gayatri Yoga any individual, irrespective of caste, class, colour, nationality, social status and religious  affiliation can acquire strength from the Indwelling Divinity for solving all problems of life.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 89

👉 समय का सदुपयोग

हम देखते हैं, बहुत से लोग, जिनके पास काम नहीं होता या कम होता है, वे लोग फालतू के काम करते रहते हैं। कोई ताश के पत्ते खेलता है, कोई गार्डन में व्यर्थ ही इधर उधर बैठा रहता है, कोई जुआ खेलता है, कोई सिगरेट बीड़ी पीता है, कोई शराब पीता है। बस यूँ ही अनुपयोगी/व्यर्थ के कार्य करता रहता है।

जब उससे पूछा जाता है कि आप क्या कर रहे हैं? तो वह उत्तर देता है, कुछ नहीं, बस यूं ही समय काट रहे हैं. तो संसार में बहुत सारे लोग ऐसे हैं जिनके पास करने के लिए कोई काम नहीं है। उनके पास समय तो है, पर काम नहीं है। अब उस समय को काटने के लिए वे इधर-उधर कुछ भी करते रहते हैं।

ऐसा करने से उनका समय तो कट जाता है, परंतु समय भी बहुत खतरनाक हथियार है, बहुत तेज धार वाला है। जब मनुष्य समय को काटता है तो समय भी मनुष्य का बहुत कुछ काटता है. उसकी संपत्ति नष्ट करता है, उसका स्वास्थ्य नष्ट करता है, उसकी आयु को नष्ट करता है, और भी बहुत सारी हानियां करने के बाद ही समय कटता है।

इसलिए समय का सदुपयोग करें। खाली न बैठें। कुछ काम ढूंढें। कुछ अपने लिए करें, कुछ परिवार के लिए करें, कुछ समाज के लिए करें, कुछ राष्ट्र के लिए करें, कुछ प्राणियों की रक्षा के लिए काम करें, रोगियों विकलांगों की सहायता करें, इत्यादि। यदि आप इस प्रकार का कोई उपयोगी काम ढूंढेंगे, तो बहुत से काम मिल जाएंगे। उन कामों को करके समय का सदुपयोग करें, व्यर्थ समय को ना काटें। अन्यथा काफी सारा समय काटने के बाद आपको पता चलेगा, कि आपने समय को नहीं काटा, बल्कि समय ही आपको काट गया।

👉 संकट के क्षण

संकट के क्षण बेशकीमती हैं। जीवन में इनका महत्त्व व मोल बहुत अधिक है। इतना अधिक कि इन्हें अतिमहत्त्वपूर्ण और अनमोल कहा जा सके। जब सब कुछ व्यवस्थित होता है और कहीं कोई संकट नहीं होता, तो जीवन चेतना सुप्त व मृतप्राय हो जाती है। जब कुछ बदल नहीं रहा होता है और पुराने की पकड़ मजबूत होती है तो लगभग असम्भव हो जाता है स्वयं को बदलना। लेकिन जब हर चीज अस्त-व्यस्त होती है, जीवन में कुछ भी स्थायी, निश्चित एवं सुरक्षित नहीं होता, कोई नहीं जानता कि अगले क्षण क्या होगा? ऐसे संकट के क्षणों में जीवन स्वतन्त्र होता है परिवर्तन के लिए, रूपान्तरण के लिए।
  
संकट के बिना जीवन लगभग जेल जैसा है। जिसमें बस परम्पराओं, रीतियों, युगों पुरानी सड़-गल चुकी व्यवस्थाओं को विवशताओं के साथ निभाया जाता है। इस जेल से भाग निकलना तकरीबन असम्भव होता है। लेकिन जैसे ही संकट आया कि सब बँधी-बँधायी व्यवस्थाएँ टूट जाती हैं, विवशताओं से मुक्ति मिलती है। तनिक महसूस करें भूचाल आया हो, हर व्यवस्था बिखर चुकी हो, किसी को पता ही न हो कि पहरेदार कहाँ हैं, जेलर कहाँ है? सारे नियम टूट चुके हों, ऐसे क्षणों में कैदी अगर जरा भी सजग हो तो ये संकट के क्षण उसके लिए मोक्ष के क्षण हो सकते हैं।
  
यही वजह है कि जीवन की कारा से, प्रकृति की अर्गलाओं से, माया के बन्धनों से मोक्ष पाने की चाहत रखने वालों के जीवन में संकटों की भरमार होती है। वे भगवान् से पल प्रतिपल, प्रत्येक क्षण, घड़ी, पक्ष, मास, अयन और वर्ष संकटों का वरदान माँगते हैं। भगवान् भी अपने इन प्यारे भक्तों को उदारतापूर्वक संकटों का अनुदान देते हैं। इसी कारण तपस्वी, योगी, ज्ञानी, भक्त आदि भगवान् के जितने भी प्रियजन हैं उनके जीवन में संकट कभी भी कम नहीं पड़ते। लेकिन वे अपने तप, योग, ज्ञान एवं भक्ति से संकट के प्रत्येक क्षण को मोक्ष के क्षण में बदलते हैं। प्रत्येक संकट उनके लिए ईश्वरीय प्रकाश का द्वार होता है। भगवान् के प्रति अविचल श्रद्धा हो, जीवन के प्रति सकारात्मक भाव हो तो संकट के इन क्षणों से अधिक सुखद आध्यात्मिक साधना का सुअवसर अन्य कुछ भी नहीं।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १९६

शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

👉 माथे का टीका

काफी समय पहले की बात है कि एक मन्दिर के बाहर बैठ कर एक भिखारी भीख माँगा करता था। (वह एक बहुत बड़े महात्मा जी का शिष्य था जो कि इक पूर्ण संत थे) उसकी उम्र कोई साठ को पार कर चुकी थी। आने जाने वाले लोग उसके आगे रक्खे हुए पात्र में कुछ न कुछ डाल जाते थे। लोग कुछ भी डाल दें, उसने कभी आँख खोल कर भी न देखा था कि किसने क्या डाला।

उसकी इसी आदत का फायदा उसके आस पास बैठे अन्य भिखारी तथा उनके बच्चे उठा लेते थे। वे उसके पात्र में से थोड़ी थोड़ी देर बाद हाथ साफ़ कर जाते थे।

कई उसे कहते भी थे कि, सोया रहेगा तो तेरा सब कुछ चोरी जाता रहेगा। वह भी इस कान से सुन कर उधर से निकाल देता था। किसी को क्या पता था कि वह प्रभु के प्यार में रंगा हुआ था। हर वक्त गुरु की याद उसे अपने में डुबाये रखती थी।

एक दिन ध्यान की अवस्था में ही उसे पता लगा कि उसकी अपनी उम्र नब्बे तक पहुंच जायेगी। यह जानकर वह बहुत उदास हो गया। जीवन इतनी कठिनाइयों से गुज़र रहा था पहले ही और ऊपर से इतनी लम्बी अपनी उम्र की जानकारी - वह सोच सोच कर परेशान रहने लग गया।

एक दिन उसे अपने गुरु की उम्र का ख्याल आया। उसे मालूम था कि गुरुदेव की उम्र पचास के आसपास थी। पर ध्यान में उसकी जानकारी में आया कि गुरुदेव तो बस दो बरस ही और रहेंगे।

गुरुदेव की पूरी उम्र की जानकारी के बाद वह और भी उदास हो गया। बार बार आँखों से बूंदे टपकने लग जाती थीं। पर उसके अपने बस में तो नही था न कुछ भी। कर भी क्या सकता था, सिवाए आंसू बहाने के।

एक दिन सुबह कोई पति पत्नी मन्दिर में आये। वे दोनों भी उसी गुरु के शिष्य थे जिसका शिष्य वह भिखारी था। वे तो नही जानते थे भिखारी को, पर भिखारी को मालूम था कि दोनों पति पत्नी भी उन्ही गुरु जी के शिष्य थे।

दोनों पति पत्नी लाइन में बैठे भिखारियों के पात्रों में कुछ न कुछ डालते हुए पास पहुंच गये। भिखारी ने दोनों हाथ जोड़ कर उन्हें ऐसे ही प्रणाम किया जैसे कोई घर में आये हुए अपने गुरु भाईओं को करता है।

भिखारी के प्रेम पूर्वक किये गये प्रणाम से वे दोनों प्रभावित हुए बिना न रह सके। भिखारी ने उन दोनों के भीतर बैठे हुए अपने गुरुदेव को प्रणाम किया था इस बात को वे जान न पाए।

उन्होंने यही समझा कि भिखारी ने उनसे कुछ अधिक की आस लगाई होगी जो इतने प्यार से नमस्कार किया है। पति ने भिखारी की तरफ देखा और बहुत प्यार से पुछा, कुछ कहना है या कुछ और अधिक चाहिए ?

भिखारी ने अपने पात्र में से एक सिक्का निकाला और उनकी तरफ बढ़ाते हुए बोला, जब गुरुदेव के दर्शन को जायो तो मेरी तरफ से ये सिक्का उनके चरणों में भेंट स्वरूप रख देना।

पति पत्नी ने एक दुसरे की तरफ देखा, उसकी श्रद्धा को देखा, पर एक सिक्का, वो भी गुरु के चरणों में! पति सोचने लगा क्या कहूँगा, कि एक सिक्का! कभी एक सिक्का गुरु को भेंट में तो शायद किसी ने नही दिया होगा, कभी नही देखा।

पति भिखारी की श्रद्धा को देखे तो कभी सिक्के को देखे। कुछ सोचते हुए पति बोला, आप इस सिक्के को अपने पास रक्खो, हम वैसे ही आपकी तरफ से उनके चरणों में रख देंगे।

नही आप इसी को रखना उनके चरणों में। भिखारी ने बहुत ही नम्रता पूर्वक और दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा। उसकी आँखों से झर झर आंसू भी निकलने लग गये।

भिखारी ने वहीं से एक कागज़ के टुकड़े को उठा कर सिक्का उसी में लपेट कर दे दिया। जब पति पत्नी चलने को तैयार हो गये तो भिखारी ने पुछा, वहाँ अब भंडारा कब होगा?भंडारा तो कल है, कल गुरुदेव का जन्म दिवस है न। भिखारी की आँखे चमक उठीं। लग रहा था कि वह भी पहुंचेगा, गुरुदेव के जन्म दिवस के अवसर पर।

दोनों पति पत्नी उसके दिए हुए सिक्के को लेकर चले गये। अगले दिन जन्म दिवस (गुरुदेव का) के उपलक्ष में आश्रम में भंडारा था। वह भिखारी भी सुबह सवेरे ही आश्रम पहुंच गया।

भंडारे के उपलक्ष में बहुत शिष्य आ रहे थे। पर भिखारी की हिम्मत न हो रही थी कि वह भी भीतर चला जाए। वह वहीं एक तरफ खड़ा हो गया कि शायद गेट पर खड़ा सेवादार उसे भी मौका दे भीतर जाने के लिए। पर सेवादार उसे बार बार वहाँ से चले जाने को कह रहा था।

दोपहर भी निकल गयी, पर उसे भीतर न जाने दिया गया। भिखारी वहाँ गेट से हट कर थोड़ी दूर जाकर एक पेड़ की छावं में खड़ा हो गया। वहीं गेट पर एक कार में से उतर कर दोनों पति पत्नी भीतर चले गये। एक तो भिखारी की हिम्मत न हुई कि उन्हें जा कर अपने सिक्के की याद दिलाते हुए कह दे कि मेरी भेंट भूल न जाना। और दूसरा वे दोनों शायद जल्दी में भी थे इस लिए जल्दी से भीतर चले गये। और भिखारी बेचारा, एक गरीबी, एक तंग हाली और फटे हुए कपड़े उसे बेबस किये हुए थे कि वह अंदर न जा सके।

दूसरी तरफ दोनों पति पत्नी गुरुदेव के सम्मुख हुए, बहुत भेंटे और उपहार थे उनके पास, गुरुदेव के चरणों में रखे। पत्नी ने कान में कुछ कहा तो पति को याद आ गया उस भिखारी की दी हुई भेंट। उसने कागज़ के टुकड़े में लिपटे हुए सिक्के को जेब में से बाहर निकाला, और अपना हाथ गुरु के चरणों की तरफ बढ़ाया ही था तो गुरुदेव आसन से उठ खड़े हुए, गुरुदेव ने अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाकर सिक्का अपने हाथ में ले लिया, उस भेंट को गुरुदेव ने अपने मस्तक से लगाया और पुछा, ये भेंट देने वाला कहाँ है, वो खुद क्यों नही आया ?

गुरुदेव ने अपनी आँखों को बंद कर लिया, थोड़ी ही देर में आँख खोली और कहा, वो बाहर ही बैठा है, जायो उसे भीतर ले आयो। पति बाहर गया, उसने इधर उधर देखा। उसे वहीं पेड़ की छांव में बैठा हुआ वह भिखारी नज़र आ गया।

पति भिखारी के पास गया और उसे बताया कि गुरुदेव ने उसकी भेंट को स्वीकार किया है और भीतर भी बुलाया है। भिखारी की आँखे चमक उठीं। वह उसी के साथ भीतर गया, गुरुदेव को प्रणाम किया और उसने गुरुदेव को अपनी भेंट स्वीकार करने के लिए धन्यवाद दिया।

गुरुदेव ने भी उसका हाल जाना और कहा प्रभु के घर से कुछ चाहिए तो कह दो आज मिल जायेगा। भिखारी ने दोनों हाथ जोड़े और बोला - एक भेंट और लाया हूँ आपके लिए, प्रभु के घर से यही चाहता हूँ कि वह भेंट भी स्वीकार हो जाये।

हाँ होगी, लायो कहाँ है? वह तो खाली हाथ था, उसके पास तो कुछ भी नजर न आ रहा था भेंट देने को, सभी हैरान होकर देखने लग गये कि क्या भेंट होगी!

हे गुरुदेव, मैंने तो भीख मांग कर ही गुज़ारा करना है, मैं तो इस समाज पर बोझ हूँ। इस समाज को मेरी तो कोई जरूरत ही नही है। पर हे मेरे गुरुदेव, समाज को आपकी सख्त जरूरत है, आप रहोगे, अनेकों को अपने घर वापिस ले जायोगे।

इसी लिए मेरे गुरुदेव, मैं अपनी बची हुई उम्र आपको भेंट स्वरूप दे रहा हूँ। कृपया इसे कबूल करें।" इतना कहते ही वह भिखारी गुरुदेव के चरणों पर झुका और फिर वापिस न उठा। कभी नही उठा।

वहाँ कोहराम मच गया कि ये क्या हो गया, कैसे हो गया? सभी प्रश्न वाचक नजरों से गुरुदेव की तरफ देखने लग गये। एक ने कहा,  हमने भी कई बार कईओं से कहा होगा कि भाई मेरी उम्र आपको लग जाए, पर हमारी तो कभी नही लगी। पर ये क्या, ये कैसे हो गया??

गुरुदेव ने कहा, इसकी बात सिर्फ इस लिए सुन ली गयी क्योंकि इसके माथे का टीका चमक रहा था। आपकी इस लिए नही सुनी गयी क्योंकि माथे पर लगे टीके में चमक न थी।

सभी ने उसके माथे की तरफ देखा, वहाँ तो कोई टीका न लगा था। गुरुदेव सबके मन की उलझन को समझ गये और बोले  टीका ऊपर नही, भीतर के माथे पर लगा होता है..!!

👉 प्रतिहिंसा का अन्त नहीं

👉 आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग (भाग ३)

कर्मयोगियों को सुशील, मनोहर मिलनसार प्रकृति का होना होगा। उसको पूर्ण रूप से, अनुकूलता, क्षमाशीलता, सहानुभूति करने वाला, विश्व प्रेम, दया के गुणों से युक्त रहना होगा। उनको दूसरों की चाल तथा आदतों के अनुकूल ही अपने को बनाना होगा। उनको अपने हृदय को ऐसा बनाना होगा कि सभी को अपने गले लगा सकें। उन्हें अपने मन को शाँत तथा समतुल्य रखना होगा। दूसरों को सुखी देखकर उनको प्रसन्न होना होगा। अपनी सब इन्द्रियों को अपने वश में करना होगा। अपना जीवन बहुत सादगी से व्यतीत करना होगा। उन्हें अनादर, अपकीर्ति, निन्दा, कलंक, लज्जित होना, कठोर वचन सुनना, शीत-उष्ण तथा रोगों के कष्ट को सहना होगा। उन्हें सहनशील होना होगा। उनको आप में, ईश्वर में, शास्त्रों में, अपने गुरु के वचन में पूरा विश्वास रखना होगा।

जो मनुष्य संसार की सेवा करता है वह अपनी ही सेवा करता है। जो मनुष्य दूसरों की मदद करता है वास्तव में वह अपनी ही मदद करता है। यह सदा ध्यान में रखने योग्य बात है। जब आप दूसरे व्यक्ति की सेवा करते हैं, जब आप अपने देश की सेवा करते हैं तब आप यह समझकर कि ईश्वर ने आपको सेवा द्वारा अपने को उन्नत तथा सुधारने का दुर्लभ अवसर दिया है। उस मनुष्य के आप कृतज्ञ हों जिसने आपको सेवा करने का अवसर दिया हो।

कर्मयोग ही मन को अन्तर्ज्योति तथा आत्मज्ञान की प्राप्ति का उपयुक्त पात्र बनाता है। वह हृदय को विशाल बनाकर सब प्रकार के बाधा विघ्नों को जो एकता प्राप्त करने में बाधक हुआ करते हैं, हटा देता है। कर्मयोग ही चित्त वृद्धि के लिये एक सफल साधन है।

निष्काम सेवा करने से आप अपने हृदय को पवित्र बना लेते हैं। अहंभाव, घृणा, ईर्ष्या, श्रेष्ठता का भाव और उसी प्रकार के और सब आसुरी सम्पत्ति के गुण नष्ट हो जाते हैं। नम्रता, शुद्ध प्रेम, सहानुभूति, क्षमा, दया की वृद्धि होती है। भेद-भाव मिट जाते हैं। स्वार्थपरता निर्मूल हो जाती है। आपका जीवन विस्तृत तथा उदार हो जायेगा। आप एकता का अनुभव करने लगेंगे। अन्त में आपको आत्मज्ञान प्राप्त हो जायेगा। आप सब में “एक” और “एक” में ही सबका अनुभव करने लगेंगे। आप अत्यधिक आनन्द का अनुभव करने लगेंगे। संसार कुछ भी नहीं है केवल ईश्वर की ही विभूति है। लोक सेवा ही ईश्वर की सेवा है। सेवा को ही पूजा कहते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1950 पृष्ठ 8

👉 MISCELLANEOUS Quotation & Answer (Part 7)

Q.7. Why is the Sadhak advised to keep the progress in Sadhana a secret?

Ans. The purpose of keeping Sadhana secret is only to avoid the possibility of confusion because of multiple interactions with people, so that after dispelling all doubts, one holds fast to it firmly and marches ahead on the chosen path. People try to criticise, find faults and suggest new methods and create doubts in the mind of the Sadhak, if he discusses the method of his Sadhana with several persons. Everyone who is consulted will suggest something new and the Sadhak’s mind will get confused and he will lose faith. He will then change frequently his method of Sadhana and on account of doubt get deprived of its benefits. It is therefore, essential to have full faith in one’s well settled method and it should be pursued with unflinching devotion, under the guidance of an accomplished Guru.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 87

👉 लक्ष्य

क्षण भंगुर लालसाओं और उनकी तृप्ति को लक्ष्य नहीं बनाया जा सकता। जो अभी हैं, अभी नहीं हैं। जिनके रंग-रूप पल-पल बदलते हैं। जिनके पूरी होने से मिलने वाली तृप्ति, नहीं पूरी होने से मिलने वाली अतृप्ति से गहरा अवसाद एवं विषाद देती है। ऐसी क्षण भंगुर माया मरीचिका भला जीवन का लक्ष्य कैसे हो सकती है। लक्ष्य को तो सदा शाश्वत्-सर्वकालिक एवं शान्तिदायक होना चाहिए।
  
महान सन्त गुरजिएफ अपने शिष्यों से कथा कहते थे- आकाश में उड़ने वाली चिड़िया को अपने से थोड़ी ही दूर एक चमकता हुआ श्वेत बादल दिखा। उसने सोचा- चलो मैं उड़कर उस बादल को छू लूँ। ऐसा सोचते हुए वह चिड़िया उस बादल को अपना लक्ष्य बनाकर अपनी पूरी क्षमता से उड़ चली। लेकिन हवाओं के साथ अठखेलियाँ करता वह बादल कभी पूर्व में जाता तो कभी पश्चिम में और कभी तो वहीं रुककर चक्कर खाते हुए चक्करों का चक्रव्यूह रचाने लगता। यही नहीं कभी वह छुपता तो कभी प्रकट हो जाता। अपनी बहुतेरी कोशिशों के बाद चिड़िया उस तक नहीं पहुँच सकी।
  
प्रयासों के इस दौर में उसने पाया कि जिस बादल के पीछे वह अपने जीवन को दाँव में लगाकर भाग रही थी, वह अचानक हवा के झोकों से छट गया है। अपने अथक प्रयत्न के परिणाम में उस चिड़िया ने देखा कि अरे! यहाँ तो कुछ भी नहीं है। इस सच को देखकर उस चिड़िया को अपनी भूल का अहसास हुआ। उसके जाग्रत् हो चुके अन्तर्विवेक ने कहा; यह तो बड़ी भूल हो गयी। यदि लक्ष्य बनाना हो तो क्षण भंगुर बादलों को नहीं बल्कि पर्वत की चोटियों को बनाना चाहिए, जो शाश्वत और अनन्त है।
  
गुरजिएफ की यह बोध कथा प्रायः हम सभी के जीवन में घटित होती है। हममें से अनेक क्षण भंगुर बादलों की ही तरह क्षण भंगुर लालसाओं को लक्ष्य बनाने के भ्रम में पड़े रहते हैं। यदि वे अन्तर्विवेक के प्रकाश में देखें तो निकट ही अनादि और अनन्त परमात्मा की पर्वतमालाएँ भी हैं। जिसे जीवन का लक्ष्य बनाने से सदा-सर्वदा कृतार्थता और धन्यता ही उपलब्ध होती है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १९५

शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2020

👉 स्वयं को पहचाने

एक बार स्वामी विवेकानंद के आश्रम में एक व्यक्ति आया जो देखने में बहुत दुखी लग रहा था। वह व्यक्ति आते ही स्वामी जी के चरणों में गिर पड़ा और बोला "महाराज! मैं अपने जीवन से बहुत दुखी हूं, मैं अपने दैनिक जीवन में बहुत मेहनत करता हूँ, काफी लगन से भी काम करता हूँ लेकिन कभी भी सफल नहीं हो पाया। भगवान ने मुझे ऐसा नसीब क्यों दिया है कि मैं पढ़ा-लिखा और मेहनती होते हुए भी कभी कामयाब नहीं हो पाया हूँ।"

स्वामी जी उस व्यक्ति की परेशानी को पल भर में ही समझ गए। उन दिनों स्वामी जी के पास एक छोटा-सा पालतू कुत्ता था, उन्होंने उस व्यक्ति से कहा ‘‘तुम कुछ दूर जरा मेरे कुत्ते को सैर करा लाओ फिर मैं तुम्हारे सवाल का जवाब दूँगा।’’

आदमी ने बड़े आश्चर्य से स्वामी जी की ओर देखा और फिर कुत्ते को लेकर कुछ दूर निकल पड़ा। काफी देर तक अच्छी-खासी सैर कराकर जब वह व्यक्ति वापस स्वामी जी के पास पहूँचा तो स्वामी जी ने देखा कि उस व्यक्ति का चेहरा अभी भी चमक रहा था, जबकि कुत्ता हांफ रहा था और बहुत थका हुआ लग रहा था।

स्वामी जी ने व्यक्ति से कहा कि  "यह कुत्ता इतना ज्यादा कैसे थक गया जबकि तुम तो अभी भी साफ-सुथरे और बिना थके दिख रहे हो|"

तो व्यक्ति ने कहा "मैं तो सीधा-साधा अपने रास्ते पर चल रहा था लेकिन यह कुत्ता गली के सारे कुत्तों के पीछे भाग रहा था और लड़कर फिर वापस मेरे पास आ जाता था। हम दोनों ने एक समान रास्ता तय किया है लेकिन फिर भी इस कुत्ते ने मेरे से कहीं ज्यादा दौड़ लगाई है इसलिए यह थक गया है।"

स्वामी जी ने मुस्करा कर कहा  "यही तुम्हारे सभी प्रश्रों का जवाब है, तुम्हारी मंजिल तुम्हारे आसपास ही है वह ज्यादा दूर नहीं है लेकिन तुम मंजिल पर जाने की बजाय दूसरे लोगों के पीछे भागते रहते हो और अपनी मंजिल से दूर होते चले जाते हो।"

यही बात लगभग हम सब पर लागू होती है। प्रायः अधिकांश लोग हमेशा दूसरों की गलतीयों की निंदा-चर्चा करने, दूसरों की सफलता से ईर्ष्या-द्वेष करने, और अपने अल्प ज्ञान को बढ़ाने का प्रयास करने के बजाय अहंकारग्रस्त हो कर दूसरों पर रौब झाड़ने में ही रह जाते हैं।

अंततः इसी सोच की वजह से हम अपना बहुमूल्य समय और क्षमता दोनों खो बैठते हैं, और जीवन एक संघर्ष मात्र बनकर रह जाता है।

दूसरों से होड़ मत कीजिये, और अपनी मंजिल खुद बनाइये।

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2020

👉 कर्ण की उदारता


👉 विरोध का सामना कैसे करें?

गंगा के तट पर एक संत अपने शिष्यों को शिक्षा दे रहे थे, तभी एक शिष्य ने पुछा, “ गुरू जी, यदि हम कुछ नया… कुछ अच्छा करना चाहते हैं पर समाज उसका विरोध करता है तो हमें क्या करना चाहिए?”

गुरु जी ने कुछ सोचा और बोले ,” इस प्रश्न का उत्तर मैं कल दूंगा।”

अगले दिन जब सभी शिष्य नदी के तट पर एकत्रित हुए तो गुरु जी बोले, “आज हम एक प्रयोग करेंगे… इन तीन मछली पकड़ने वाली डंडियों को देखो, ये एक ही लकड़ी से बनी हैं और बिलकुल एक समान हैं।”

उसके बाद गुरु जी ने उस शिष्य को आगे बुलाया जिसने कल प्रश्न किया था।गुरु जी ने निर्देश दिया - “ पुत्र, ये लो इस डंडी से मछली पकड़ो।” शिष्य ने डंडी से बंधे कांटे में आंटा लगाया और पानी में डाल दिया। फ़ौरन ही एक बड़ी मछली कांटे में आ फंसी…

गुरु जी बोले-” जल्दी…पूरी ताकत से बाहर की ओर खींचो।“ शिष्य ने ऐसा ही किया ,उधर मछली ने भी पूरी ताकत से भागने की कोशिश की…फलतः डंडी टूट गयी।
गुरु जी बोले- “कोई बात नहीं; ये दूसरी डंडी लो और पुनः प्रयास करो…।”

शिष्य ने फिर से मछली पकड़ने के लिए काँटा पानी में डाला।
इस बार जैसे ही मछली फंसी, गुरु जी बोले, “आराम से… एकदम हल्के हाथ से डंडी को खींचो।” शिष्य ने ऐसा ही किया, पर मछली ने इतनी जोर से झटका दिया कि डंडी हाथ से छूट गयी।

गुरु जी ने कहा, “ओह्हो, लगता है मछली बच निकली, चलो इस आखिरी डंडी से एक बार फिर से प्रयत्न करो।” शिष्य ने फिर वही किया। पर इस बार जैसे ही मछली फंसी गुरु जी बोले, “ सावधान! इस बार न अधिक जोर लगाओ न कम.. बस जितनी शक्ति से मछली खुद को अंदर की ओर खींचे उतनी ही शक्ति से तुम डंडी को बाहर की ओर खींचो.. कुछ ही देर में मछली थक जायेगी और तब तुम आसानी से उसे बाहर निकाल सकते हो”

शिष्य ने ऐसा ही किया और इस बार मछली पकड़ में आ गयी।
“क्या समझे आप लोग?” गुरु जी ने बोलना शुरू किया…” ये मछलियाँ उस समाज के समान हैं जो आपके कुछ करने पर आपका विरोध करता है। यदि आप इनके खिलाफ अधिक शक्ति का प्रयोग करेंगे तो आप टूट जायेंगे, यदि आप कम शक्ति का प्रयोग करेंगे तो भी वे आपको या आपकी योजनाओं को नष्ट कर देंगे… लेकिन यदि आप उतने ही बल का प्रयोग करेंगे जितने बल से वे आपका विरोध करते हैं तो धीरे-धीरे वे थक जाएंगे… हार मान लेंगे… और तब आप जीत जायेंगे… इसलिए कुछ उचित करने में जब ये समाज आपका विरोध करे तो समान बल प्रयोग का सिद्धांत अपनाइये और अपने लक्ष्य को प्राप्त कीजिये।”

👉 आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग (भाग २)

नम्र, दयालु, उपकारी और सहायक बनो। यही नहीं कि कभी-कभी यथावकाश इन गुणों का उपयोग किया जावे बल्कि सर्व काल में आपके सारे जीवन में इन्हीं गुणों का अभ्यास होना चाहिये। एक भी शब्द ऐसा मत कहो जिससे दूसरों को ठेस पहुँचे। बोलने से पहले भली प्रकार विचार करो और देख लो कि जो कुछ आप कहने लगे हो वह दूसरों के चित्त को दुखी तो नहीं करेगा-क्या वह बुद्धिसंगत मधुर सत्य तथा प्रिय तो है। पहले से ही ध्यानपूर्वक समझ लो कि आपके विचार शब्दों और कार्यों का क्या प्रभाव होगा। प्रारम्भ में आप कई बार भले ही असफल हो सकते हो परंतु यदि आप अभ्यास करते रहे तो अंतः में आप अवश्य सफल हो जाओगे।

आपको कोई काम निरुत्साह से, लापरवाही से, बेमन से नहीं करना चाहिए यदि मन की ऐसी वृत्ति रखोगे तो जल्दी उन्नति नहीं कर सकते। सम्पूर्ण चित्त, मन, बुद्धि आत्मा उस काम में लगा होना चाहिये। तभी आप उसे योग या ईश्वर पन कह सकते हो। कुछ मनुष्य हाथों से काम करते हैं और उनका मन कलकत्ते के बाजार में होता है, बुद्धि दफ्तर में होती है और आत्मा स्त्री या पुत्र में संलग्न रहती है। यह बुरी आदत है। आपको कोई भी काम हो उसे योग्य सन्तोषप्रद ढंग से करना चाहिये। आपका आदर्श यह होना चाहिये कि एक समय में एक ही काम अच्छे ढंग से किया जाये। यदि आपके गुरु मित्र आपसे तौलिया धोने को कहें तो आपको ना उन्हें बताए हुए ही उनके और कपड़ों को भी धो डालने चाहिए।

लगातार असफलता होने से आपको साहस नहीं छोड़ना चाहिए असफलता के द्वारा आपको अनुभव मिलता है। आपको वे कारण मालूम होंगे जिनसे असफलता हुई है और भविष्य में उनसे बचने के लिये सचेत रहोगे। आपको बड़ी-बड़ी होशियारी से उन कारणों से रक्षा करनी होगी। इन्हीं असफलताओं की कमजोरी में से आपको शक्ति मिलेगी। असफल होते हुए भी आपको अपने सिद्धान्त, लक्ष्य, निश्चय और साधन का दृढ़ मति होकर पालन और अनुसरण करना होगा। आप कहिये “कुछ भी हो मैं अवश्य पूरी सफलता प्राप्त करूंगा, मैं इसी जीवन में-नहीं नहीं, इसी क्षण आत्म साक्षात्कार करूंगा। कोई असफलता मेरे मार्ग में रुकावट नहीं डाल सकती।”

प्रयत्न और कोशिश आपकी ओर से होनी चाहिये भूखे मनुष्य हो आप ही खाना पड़ेगा। प्यासे को पानी पीना ही पड़ेगा। आध्यात्मिक सीढ़ी पर आपको हर एक कदम अपने अपने आप ही रखना होगा। इस बात को भली प्रकार स्मरण रखिये। साहसी बनो। यद्यपि बेरोजगार हो कुछ खाने को नहीं हो, तन पर वस्त्र भी न होवे तब भी सदा प्रसन्न रहो। आपका यथार्थ स्वभाव सच्चिदानन्द है। यह बाह्य नाशवान स्थूल शरीर तो माया का ही कार्य हैं मुस्कुराओ, सीटी बजाओ, हँसो कूदो और आनन्द में मग्न होकर नाचो।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1950 पृष्ठ 7

👉 MISCELLANEOUS Quotation & Answer (Part 6)

Q.6. I have been doing Gayatri Sadhana regularly. Nevertheless, at times, I feel depressed and dissatisfied with my progress. What is the remedy?

Ans. The feelings of occasional depression, dissatisfaction with progress and momentary loss of interest are not uncommon in course of Sadhana. In order to understand this paradoxical phenomenon, it is  necessary to understand three successively higher phases of spiritual evolution. These are known as :-

(1) The Mantra Diksha or Initiation
This is the initial Kindergarten stage - the ‘Bhuha’ stage of Dikcha, in which the ‘Acharya’ - a representative of Guru, introduces the novice to the concept of Gayatri disciplines through ‘Baikhari Vani’ (by speaking). Any contemplative, spiritually- wise, high-character, talented, person may assume the charge of an ‘Acharya’. Nevertheless, this is a great responsibility, since after establishing the spiritual relationship, sins and virtues of the disciple are shared by the Guru. Since the Guru, by definition, is sinless, his displeasure on any dereliction by the devotee is quite natural. Besides, it must also be very clearly understood, that merely admission to the school of Sadhana through Mantra Dikcha is not sufficient. The devotee must persistently endeavour to qualify for the higher stages of Diksha.

(2) Agni Diksha or Pran Diksha
This is the ‘Bhuwaha’ stage of Dikcha carried out extra-sensorially, through ‘Madhyama’ and pashyanti Vani (Telepathic and soul-to-soul communication). In this case the Guru undertakes refinement and development of the Sukchma Sharir - the conscious and supra-conscious levels of mind (‘Man’: ‘Budhi’, ‘Chitta’ and ‘Ahankar’) of the devotee.

When the devotee graduates to this next higher class of ‘Agni Dikcha’, the Guru extra-sensorally transmits a part of the spiritual charge (Pran) to the devotee, from his own spiritual battery accumulated after prolonged Tapascharya.

The ‘concepts’ planted and developed during the Mantra Dikcha are now translated into ‘action’ by this new acquisition of powerful energy (Pran). At this stage, there is a great turmoil in the inner-self of the devotee, which he/ she apparently feels as a fast growing dissatisfaction with his / her progress, uneasiness and momentary depression. These external symptoms are, in fact, an indication of the churning, taking place within deeper levels of the soul.  Hence, unless the devotee feels this turmoil, it is to be assumed that the activation by the Guru has become feeble, because of some shortcomings in the devotee’s Sadhana.
    
After Agni Dikcha, the devotee becomes more enlightened and is able to discern his / her personal faults, however trivial they are. The term Agni Dikcha owes its nomenclature to the process of ‘Incineration in the inner-self by the fire of discernment’. The phenomenon is parallel to the exercise of Tapascharya for the purification of physical body.

There are three clear signs of a person undergoing Agni Dikcha. (1) A strong inclination to perform ‘Tap’ for self-purification, (2) A feeling of discontentment with one’s progress and a desire for speedy innergrowth and  (3) realisation of many shortcomings in  one’s thoughts, behaviour and nature.

Here, it must be emphasised that ‘Only that Guru can give Dikcha, who has himself earned and conserved sufficient spiritual charge by performing Tapascharya’.

(3) Pran Dikcha (‘Swaha’ stage)
This is the highest level of Dikcha in course of which the transfer of spiritual energy takes place from the soul of the Guru to the soul of the devotee. This is the process through which the Guru hands over spiritual succession to the most deserving disciple. In other words, it means appointing the spiritual successor.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 84

👉 शून्यता

मन की उठती-गिरती लहरों में अपने को ढूँढ़ने की बहुत कोशिश की, लेकिन यह न मिला। विद्वानों द्वारा रचित शास्त्र पढ़े, ज्ञानियों की बातें सुनी, पर इससे भी कुछ न हुआ। बस चेतना बोझिल होती गयी, भावनाओं में भारीपन आ गया। अपने को हल्का करने के लिए यूँ ही घूमने निकला। पश्चिमोन्मुख सूरज थोड़ी देर पहले ही बादलों में छुप गया था। लेकिन रात का द्वार रोकने के लिए साँझ अभी तक ठहरी हुई थी। मैं अभी तक स्वयं की खोज कर रहा था। पर वहाँ तो एक शून्यता थी। और जहाँ शून्यता होती है, वहाँ कुछ भी नहीं होता।
  
थोड़ी ही दूर पर बैठी एक बुढ़िया प्याज छील रही थी। उसने एक बड़ी सी प्याज की गाँठ हाथ में ली और छीलने लगी। परतों पर परतें निकलती गयी। मोटी-खुरदरी परतें, फिर मुलायम-चिकनी परतें और फिर कुछ भी नहीं। प्याज छिलते-छिलते उस बुढ़िया के हाथ कुछ भी न बचा। अपनी इस स्थिति पर वह जोर से हँस दी। उसे देखकर लगा कि अपना मन भी तो कुछ ऐसा ही है। इसे उघाड़ते चलें- पहले स्थूल परतें, फिर सूक्ष्म परतें, फिर शून्य। विचार, वासनाएँ और अहंकार, फिर कुछ भी नहीं। बस शून्यता ही बची रहती है। इस शून्यता को जो उघाड़ते हैं, वही ध्यान में प्रवेश करते हैं।
  
यह ध्यान ही परिचय कराता है हमारा अपने आपसे। यह शून्य गहनता ही हमारा अपना स्वरूप है। फिर उसे आत्मा कहें या कुछ और। पर यह सच है कि विचार, वासना, अहंकार जहाँ नहीं है, वहीं वह है- ‘जो है’। पश्चिमी दुनिया के एक बड़े विचारक ने लिखा है कि जब भी मैं अपने में जाता, कोई मैं मुझे वहाँ नहीं मिलता। या तो किसी विचार से टकराव होता है या किसी वासना अथवा फिर किसी याद से। उनकी यह बात कुछ हद तक ठीक है। पर परतों से लौट आना तो भूल है। प्याज हाथ में लिया है तो पूरा ही छील लें। सारी परतें उघड़ जाने पर टकराने के लिए कुछ भी न बचेगा। बची रहेगी तो बस शून्यता। यही तो अपना परिचय है। सतह पर संसार के सब रंग हैं, परन्तु केन्द्र में शून्य नीरवता है। जहाँ स्वयं का ज्ञान, स्वयं की उपलब्धि होती है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १९४

बुधवार, 19 फ़रवरी 2020

👉 दोष तो अपने ही ढूँढ़ें


👉 तोड़ कर जोड़ो

भगवान बुद्ध एक बार निबिड़ वन को पार करते हुए कहीं जा रहे थे। रास्ते में उनकी भेंट अंगुलिमाल डाकू से हो गई। वह सदैव अनेक निर्दोषों का वध करके उनकी उंगलियों की माला अपने गले में धारण किया करता था। आज सामने आये हुए साधु को देखकर उसकी बाछें खिल उठीं।

“आज आप ही मेरे पहले शिकार होंगे” अँगुलिमाल ने बुद्ध से कहा और अपनी पैनी तलवार म्यान से बाहर निकाली। तथागत मुसकराये, उनने कहा—”वत्स, तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा। मैं कहीं भागने वाला नहीं हूँ। दो क्षण का विलम्ब सहन कर सको तो मेरी एक बात सुन लो।”

डाकू ठिठक गया, उसने कहा—”कहिए—क्या कहना है?”

तथागत ने कहा—”सामने वाले वृक्ष से एक पत्ता तोड़कर जमीन पर रख दो।” डाकू ने वैसा ही कर दिया। उन्होंने फिर कहा—”अब इसे पुनः पेड़ से जोड़ दो।” डाकू ने कहा—यह कैसे संभव है। तोड़ना सरल है पर उसे जोड़ा नहीं जा सकता।

बुद्ध ने गंभीर मुद्रा में कहा—वत्स, इस संसार में मार-काट तोड़-फोड़ उपद्रव और विनाश यह सभी सरल हैं। इन्हें कोई तुच्छ व्यक्ति भी कर सकता है फिर तुम इसमें अपनी क्या विशेषता सोचते हो और किस बात का अभिमान करते हो? बड़प्पन की बात निर्माण है—विनाश नहीं। तुम विनाश के तुच्छ आचरण को छोड़कर निर्माण का महान कार्यक्रम क्यों नहीं अपनाते?

अंगुलिमाल के अन्तःकरण में वे शब्द तीर की तरह घुसते गये। तलवार उसके हाथ से छूट पड़ी। कातर होकर उसने तथागत से पूछा—”इतनी देर तक पाप कर्म करने पर भी क्या मैं पुनः धर्मात्मा हो सकता हूँ?” वे बोले—”वत्स, मनुष्य अपने विचार और कार्यों को बदल कर कभी भी पाप से पुण्य की ओर मुड़ सकता है। धर्म का मार्ग किसी के लिए अवरुद्ध नहीं है। तुम अपना दृष्टिकोण बदलोगे तो सारा जीवन ही बदल जायगा।” विचार बदले तो मनुष्य बदला। अँगुलिमाल ने दस्यु कर्म छोड़कर प्रव्रज्या ले ली। वह भगवान बुद्ध के प्रख्यात शिष्यों में से एक हुआ।

👉 आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग (भाग १)

यदि आप जल्दी आध्यात्मिक उन्नति चाहते हैं तो इसके लिए सजगता, होशियारी रखना बहुत जरूरी है आध्यात्मिक मार्ग में थोड़ी-सी सफलता थोड़ी सी मन की गंभीरता, एकाग्रता, सिद्धियों के थोड़े से दर्शन, थोड़े से अन्तर्यामी ज्ञान की शक्ति से ही कभी संतुष्ट मत रहो। इससे ज्यादा ऊंची चढ़ाइयों पर चलना अभी बाकी है।

सदा सेवा करने को तैयार रहो। शुद्ध प्रेम, दया और नम्रता सहित सेवा करो। सेवा करते समय कभी मन में भी खीझने या कुढ़ने का भाव मत आने दो। सेवा करते हुए मुख पर खेद और ग्लानि के भाव मत आने दो। ऐसा करने से जिसकी सेवा करते हो वह आपकी सेवा स्वीकार नहीं करेगा। आप एक अवसर खो दोगे। सेवा के लिए अवसर ढूँढ़ते रहो। एक भी अवसर को मत जाने दो बल्कि अवसर खुद बनालो।

अपने जीवन को सेवामय बना दो सेवा के लिए अपने हृदय में चाव तथा उत्साह भर लो। दूसरों के लिये प्रसाद बन कर रहो। यदि ऐसा करना चाहते हो तो आपको अपने मन को निर्मल बनाना होगा। अपने आचरण को दिव्य तथा आदर्श बनाना होगा। सहानुभूति, प्रेम, उदारता, सहनशीलता और नम्रता बढ़ानी होगी। यदि दूसरों के विचार आपके विचारों से भिन्न हों तो उनसे लड़ाई झगड़ा न करो। अनेक प्रकार के मन होते हैं। विचारने की शैली अनेक प्रकार की हुआ करती है विचारने के भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण हुआ करते हैं। अतएव हर एक दृष्टिकोण निर्दोष है, लोगों के मत के अनुकूल बनो। उनके मत को भी ध्यान तथा सहानुभूति पूर्वक देखो और उसका आदर करो। अपने अहंकार चक्र के क्षुद्र केन्द्र से बाहर निकलो और अपनी दृष्टि को विस्तृत करो। अपना मत सर्वग्राही और उदार बना सब के मत के लिए स्थान रखो। तभी आपका जीवन विस्तृत और हृदय उदार होगा।

आपको धीरे-धीरे मधुर और नम्र होकर बातचीत करनी चाहिए। मितभाषी बनो। अवाँछनीय विचारों और सम्वेदनाओं को निकाल दो। अभिमान या चिड़चिड़ेपन को लेश मात्र भी बाकी नहीं रहने दो। अपने आपको बिल्कुल भुला दो। अपने व्यक्तित्व का भी अंश या भाव न रहने पावे। सेवा कार्य के लिए पूर्ण आत्मसमर्पण की आवश्यकता है यदि आप में उपरोक्त सद्गुण मौजूद हैं तो आप संसार के लिये पथ प्रदर्शक और अमूल्य प्रसाद रूप हो। आप एक अलौकिक सुगन्धित पुष्प हो जिसकी सुगन्ध देश भर में व्याप्त हो जायेगी। आपने बुद्धत्व की उच्चतम अवस्था को प्राप्त कर लिया।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1950 पृष्ठ 6

👉 MISCELLANEOUS Quotation & Answer (Part 5)

Q. 5. What are indications of progress in Sadhana?

Ans.  After prolonged and persistent ‘Sadhana’ with faith and dedication , the following characteristics appear in the devotee:-

1. Magnetism in personality; sparkling eyes; force in speech; a glowing countenance; gravity and stability in expression. These qualities deeply impress everyone coming in contact with the devotee. People interacting with a devotee of Gayatri behave in conformity with his / her wishes.
2. The devotee feels a new celestial energy operating from within.
3. The devotee progressively loses interest in improper
(sinful) activities. If, some wrong is inadvertently committed by him, he feels extremely repentant. He neither becomes elated on favourable happenings, nor loses equanimity while facing unfavourable circumstances.

4. If he curses someone on becoming deeply hurt, the adversary encounters great misfortune.
5. On the other hand,, his good wishes always result in the welfare of the concerned person.
6. He develops the faculty of thought reading. None can  hide his shortcomings, covert actions and motives from the penetrating gaze of a Gayatri devotee.
7. He can communicate telepathically with people living far away.
8. The environment around him is very quiet and serene. People find unusual peace, purity and serenity in his presence.

9. When at the zenith of his progress, he can paranormally transfer a part of the spiritual energy (collected by him in course of his Sadhana through ‘Tapascharya’), to any deserving individual, for which the latter need not make the required effort. This is called the process of ‘Shaktipat’ in yoga, which the Guru uses for grooming the best disciple as his successor.

10. While contemplating, during the waking hours or in course of meditation he may see emissions of multicoloured lights, other para-normal lights or hear celestial sounds or words.

These are some visible signs of progress in ‘Sadhana’ Besides, the devotee acquires many paranormal capabilities,   which are much beyond normal human experience, knowledge and resources.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 83

👉 भारतीयता

भारतीयता में भारत माता की लाडली सन्तान होने के भाव भरे हैं। इसमें भारत की मिट्टी की सोंधी सुगन्ध से अपनत्व का अहसास है। यही वह भावना है जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक हम सभी भारतवासी भाई-बहनों को स्नेह सम्बन्धों के धागों में पिरोती है। यह शब्द जब हृदय में अन्तर्दीप की तरह प्रज्वलित-प्रकाशित होता है तो पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र, केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, आसाम, बंगाल, बिहार, उत्तरप्रदेश, उत्तराखण्ड के शूरवीर साहसी सैनिक सीमाओं के प्रहरी बनकर दुश्मनों का दिल दहलाते हैं।

भारत भूमि के कण-कण में भारतीयता की ऊष्मा एवं ऊर्जा है। जो केरल के मेजर उन्नीकृष्णन को मुम्बई हमले में आतंकवादियों को परास्त करते हुए शहीद होने के लिए प्रेरित करती है। यही पंजाब के गगनदीप सिंह वेदी को दक्षिण भारत में आए सुनामी की खौफनाक लहरों में कडलूरवासियों का खेवैया बनने का साहस देती है। कुछ कुटिल कुबुद्धि वाले कुचक्री लोग प्रान्तीयता, क्षेत्रीयता, जातीयता, साम्प्रदायिकता की बातें करके भारतीयता की भावनाओं में दरार डालना चाहते हैं। उनके निजी स्वार्थ का कुत्सित कलुष ही इसका कारण है।

लेकिन इस प्रयास में उनकी पराजय सुनिश्चित है। क्योंकि हम सबकी पहली और अन्तिम पहचान भारतीयता है। फिर भले ही हममें से कोई किसी भी प्रान्त, क्षेत्र अथवा जाति का क्यों न हो? उसकी कोई भी भाषा और कोई भी धर्म क्यों न हो? परन्तु ये सब कभी हमारे भरतवंशी, भारतवासी और भारतीय होने में रुकावट नहीं बन सकते। भारत देश के किसी भी कोने के किसी भी व्यक्ति की श्रेष्ठता हमारी श्रेष्ठता है, उस पर हमें गर्वित होने का पूरा हक है। और इसी तरह भारत भूमि के किसी छोर के किसी भी इन्सान की कमजोरी-कमी हमारी अपनी कमजोरी व कमी है। इसे हटाने-मिटाने के लिए हर तरह से प्रयत्नशील होना हमारा निजी कर्त्तव्य है। स्वाधीन भारत के निवासियों की एक ही पहचान है- भारतीयता। और इस वर्ष के स्वाधीनता दिवस पर हममें से हर एक का एक ही संकल्प है- अपनी भारत भूमि एवं भारतीयता के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए सर्वदा तैयार रहना।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १९३

👉 You are the Architect of Your Destiny

If you depend upon others or look for someone’s help in the moments of difficulty, you must be living under some illusion. Otherwise, you would identify the root-cause of the problems you are facing and analyze your own vices and flaws that might have been responsible for those troubles. By overcoming those drawbacks and weaknesses, you would be best equipped to resolve or get rid of most of your problems on your own.

With the aspiration of being progressive and successful, you should also begin adopting virtuous tendencies and sharpening and enhancing your potentials. Your destiny is indeed written according to your intrinsic nature, inner qualities. Intense impressions of your tendencies, sentiments and thinking and conduct, account for shaping of your inner personality, which is attributed to be the architect of your future evolution. God’s system works according to – “you harvest what you have sown”.

If good qualities, abilities are not cultivated by you, and the seeds of virtues are left in a virgin (dormant) state within your self, and instead, negative tendencies, follies, untoward habits are allowed to accumulate and grow, God’s rule will formulate your destiny as full of sufferings; you will not have a good fate or hopes in future unless and until you refine yourself and inculcate the potentials of elevation. So it is in fact in your own hand to design your destiny.

If you awaken your self-confidence, set high ideals as your goal and sincerely endeavor to make yourself capable and deserving for that goal, God’s script will indeed destine you to have a bright and successful life accordingly. If you think wisely, know yourself and earnestly search for the illumined goal, you will certainly find the righteous path to achieve it at the right moment.

📖 Akhand Jyoti, April 1943

👉 मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है

जब तक आप दूसरों पर आश्रित रहते हैं या समझते हैं कि हमारे कष्टों को कोई और दूर करेगा, तब तक बहुत बड़े भ्रम में हैं। जो उलझनें आपके सामने हैं, उनका दु:खदायी रूप अपनी त्रुटियों के कारण है। उन त्रुटियों को दूर करके आप स्वयं ही अपनी उलझनें सुलझा सकते हैं।

संसार में सफलता प्राप्त करने की आकांक्षा के साथ ही अपनी योग्यता में वृद्धि करना भी आरंभ कीजिए। आपका भाग्य किस प्रकार लिखा जाए, इसका निर्णय करते समय विधाता आपकी आतंरिक योग्यताओं की परख करता रहता है। उन्नति करने वाले गुणों को यदि अधिक मात्रा में जमा कर लिया गया है, तो भाग्य में उन्नति का लेखा लिखा जाएगा और यदि उन्नायक गुणों को अविकसित पड़ा रहने दिया गया है, दुर्गुणों को, मूर्खताओं को अंदर भर कर रखा गया है, तो भाग्य की लिपि दूसरी होगी।

विधाता लिख देगा कि `इसे तब तक दु:ख-दुर्भाग्यों में ही पड़ा रहना होगा, जब तक कि योग्यताओं का संपादन न करे।’ अपने भाग्य को जैसा चाहें वैसा लिखाना, अपने हाथ की बात है। यदि आप आत्मनिर्भर हो जाएँ, जैसा होना चाहते हैं उसके अनुरूप अपनी योग्यताएँ बनाने में प्रवृत्त हो जाएँ, तो विधाता को विवश होकर अपनी मनमरजी का भाग्य लिखना पड़ेगा। जब आत्मविश्वास के साथ सुयोग्य मार्ग की तलाश करेंगे, तो वह किसी न किसी प्रकार मिल कर ही रहेगा।

📖 अखण्ड ज्योति -सितम्बर 1943

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2020

👉 असली पारसमणी

एक व्यक्ति एक संत के पास आया व उनसे याचना करने लगा कि वह निर्धन है। वे उसे कुछ धन आदि दे दें, ताकि वह जीविका चला सके। संत ने कहा–– हमारे पास तो वस्त्र के नाम पर यह लँगोटी व उत्तरीय है। लँगोटी तो आवश्यक है, पर उत्तरीय तुम ले जा सकते हो। इसके अलावा ओर कोई ऐसी निधि हमारे पास है नहीं। वह व्यक्ति बराबर गिड़गिड़ता ही रहा, तो वे बोले–– अच्छा, झोंपड़ी के पीछे एक पत्थर पड़ा होगा। कहते हैं, उससे लोहे को छूकर सोना बनाया जा सकता है। तुम उसे ले जाओ। प्रसन्नचित्त वह व्यक्ति भागा व उसे लेकर आया। खुशी से चिल्ला पड़ा–– महात्मन्ǃ यह तो पारसमणि है। आपने यह ऐसे ही फेंक दी।

संत बोले––हाँ बेटाǃ मैं जानता हूँ और यह भी कि यह नरक की खान भी है। मेरे पास प्रभुकृपा से आत्मसंतोष रूपी धन है, जो मुझे निरंतन आत्मज्ञान और अधिक ज्ञान प्राप्त करने को प्रेरित करता है। मेरे लिए इस क्षणिक उपयोग की वस्तु का क्या मूल्यॽ वह व्यक्ति एकटक देखता रह गया।

फेंक दी उसने भी पारसमणि। बोला–– भगवन्ǃ जो आत्मसंतोष आपको है व जो कृपा आप पर बरसी है। उससे मैं इस पत्थर के कारण वंचित नहीं होना चाहता। आप मुझे भी उस दिशा में बढ़ने की प्रेरणा दें, जो सीधे प्रभुप्राप्ति की ओर ले जाती है। संत ने उसे शिष्य के रूप में स्वीकार किया। वे दोनों मोक्षसुख पा गये।

विवेकवान् के समक्ष हर वैभव, हर संपदा तुच्छ है। वह सतत अपने चरमलक्ष्‍य परमपद की प्राप्ति की ओर बढ़ता रहता है।

👉 आत्म विश्वास का शास्त्र


👉 सुख-दुख में समभाव रखिए! (अन्तिम भाग)

यही बात बाह्यदृष्टि व अन्तर दृष्टि की है। बाह्य-दृष्टि बाहरी वस्तु पर दुख-सुख की कल्पना करती है, अंतर दृष्टि अपनी प्रवृत्तियों व भावनाओं की प्रधानता करती है। इसी दृष्टि-भेद के कारण भोगी को जिसमें आनन्द है योगी को उसमें नहीं। योगी को त्याग में आनंद है, भोगी के लिए वह कष्टप्रद है। उपर्युक्त विवेचन से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि हमें अपनी दृष्टि को सही बनाना जरूरी है। तभी हम इस द्वंद्व से अतीत होकर समभाव का आनन्द लूट सकेंगे। सभी प्राणियों से मानव में विचारशक्ति की बड़ी भारी विशेषता है। विचारों से हम सुखी होते हैं, विचारों से ही दुखी। विचारों की धारा बदल देने से ही दुःख-सुख की कल्पना बदल जाएगी। किसी जमाने में कोई बात बहुत अच्छी समझी जाती थी पर वही आज अच्छी ही समझी जाती और वर्तमान में भी एक ही वस्तु के विषय में, सबकी राय एक सी नहीं रहती। इसका प्रधान कारण विचार भेद ही है। विचार बदला कि सारा ढाँचा बदल गया।

अधिक गहराई में नहीं भी जा सकें तो दुख-सुख में समभाव रखने के लिए हमारे विचारों को बदलने का एक शब्द मंत्र भी है, जिससे सर्वसाधारण सहज में ही लाभ उठा सकता है। उस चमत्कारी शब्द मंत्र की एक कहानी मैंने विदुषी श्री आर्याबल्लभ जी की व्याख्या में सुनी थी। उसे यहाँ उपस्थित कर रहा हूँ :-

एक बड़े भारी सम्राट थे, जिन्हें प्रतिपल विविध परिस्थितियों का सामना करना पड़ता था। कभी मन दुख की अनुभूति में और कभी सुख की अनुभूति में हर्ष एवं शोक से चलायमान बना रहता था, सम्राट ने यह सोचकर कि इस भीषण द्वंद्व के निवारण का कोई उपाय मिल जाय तो अच्छा हो। उसने अपने विचारक सभासदों व मंत्रियों के सामने अपने विचार रखते हुए कहा कि इसके निवारण का कोई सरल उपाय बतलाइये। जिससे समय-समय पर हर्ष एवं विषाद से मन आँदोलित होता है, वह रुक जाय। यह रोग केवल सम्राट को ही नहीं, सभी को था, पर इसके निवारण का उपाय कोई भी नहीं बतला सकें, आखिर मंत्री को आदेश दिया गया कि तुम्हें इसका रास्ता निकालना ही पड़ेगा, अन्यथा दंडित किये जाओगे। सम्राट की आशा का पालन दुष्कर था अतः मंत्री ने छः महीने की मुद्दत ली ओर लगा इधर-उधर पर्यटन में, क्योंकि पहुँचे हुए सिद्ध पुरुष के बिना इसका उपाय मिलना संभव न था। अन्त में एक उच्च कोटि के योगी से भेंट हुई, जिन्होंने इसका उपाय बतलाते हुए कहा कि सम्राट को एक ऐसी अंगूठी बना के दो जिसके बीच में या चारों ओर यह मंत्र लिखा हो कि “यह भी चला जायगा”। सम्राट को कह देना कि जब भी उनका मन सुख एवं दुख से आन्दोलित हो। इस अंगूठी में लिखे हुए मंत्र पर मनन करे इससे सुख-दुख की क्षणिकता का ध्यान आने पर मन में हर्ष और शोक का द्वंद्व नहीं होगा। दुख आता और चला जाता है ओर सुख भी सदा नहीं रहता इस रहस्य के जानने से मन समभाव को पा लेता है।

.... समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1950 पृष्ठ 17

👉 MISCELLANEOUS Quotation & Answer (Part 4)

Q.4. Will one incur divine displeasure if there are some inadvertent errors during worship?

Ans. Absolutely not. The Creator is like our Mother. The Divine Mother has only love for her children. How can She punish unless the fault is deliberate? One may contemplate on God even while lying on bed (when one is sick) or without proper physical cleanliness or rituals. The benefits, however small, will definitely accrue. One should not have the least apprehension about harm or divine displeasure due to errors in worship. If any mistake is committed in the rituals of Tantrik Sadhana, the deities, who are mostly demoniac,  may get annoyed and harm an errant Sadhak. However,  Gayatri  is the Divine Shakti, the affectionate mother, full of forgiveness and compassion. She loves her child who lisps and cannot even speak properly. Gayatri is such a Kamdhenu.       

Even erroneous worship having righteous aims and objectives becomes fruitful, if it is faithfully done. It is said about Valmiki that he could not even utter Ram properly and by uttering ‘mara, mara’ attained godliness. In Rightist path of Sadhana, sentiments are more important than rituals. None has been harmed on account of any omission in the method of Gayatri worship. Still, if there is any apprehension, the guidance of a spiritual master in this path of Sadhana can be sought in the matter.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 82

👉 वैज्ञानिक अध्यात्म

वैज्ञानिक अध्यात्म में वैज्ञानिक जीवन दृष्टि एवं आध्यात्मिक जीवन मूल्यों का सुखद समन्वय है। वैज्ञानिक जीवन दृष्टि में पूर्वाग्रहों, मूढ़ताओं एवं भ्रामक मान्यताओं का कोई स्थान नहीं है। यहाँ तो तर्क संगत, औचित्यनिष्ठ, उद्देश्यपूर्ण व सत्यान्वेषी जिज्ञासु भाव ही सम्मानित होते हैं। इसमें रूढ़ियाँ नहीं प्रायोगिक प्रक्रियाओं के परिणाम ही प्रामाणिक माने जाते हैं। सूत्र वाक्य में कहें तो वैज्ञानिक जीवन दृष्टि में परम्पराओं की तुलना में विवेक को महत्त्व मिलता है। वेदों के ऋषिगण इसी का ‘सत्यमेव जयते’ के रूप में उद्घोष करते हैं।
  
वैज्ञानिक जीवन दृष्टि का यह सत्य-आध्यात्मिक जीवन मूल्यों की परिष्कृत संवेदना से मिलकर पूर्ण होता है। परिष्कृत संवेदना ही वह निर्मल स्रोत है, जिससे समस्त सद्गुण जन्मते और उपजते हैं। जहाँ परिष्कृत संवेदना का अभाव है, वहाँ सद्गुणों का भी सर्वथा अभाव होगा। कई बार भ्रान्तिवश सत्य एवं संवेदना को विरोधी मान लिया जाता है। जो इन्हें विरोधी समझते हैं, वही विज्ञान और अध्यात्म के विरोधी होने की बात कहते हैं। जबकि सत्य और संवेदना- विज्ञान और अध्यात्म की भाँति परस्पर विरोधी नहीं पूरक हैं। सत्य संवेदना को संकल्पनिष्ठ बनाता है और संवेदना सत्य को भाव निष्ठ-जीवन निष्ठ बनाती है।
  
वैज्ञानिक अध्यात्म के प्रयोगों की निरन्तरता जीवन को सत्यान्वेषी किन्तु संवेदनशील बनाए रखती है। इसके द्वारा मनुष्य में वैज्ञानिक प्रतिभा एवं सन्त की संवेदना का कुशल समायोजन व सन्तुलन बन पड़ता है। इसका विस्तार यदि समाज व्यापी होगा तो समाज धर्म विशेष, मत विशेष व पंथ विशेष के प्रति हठी एवं आग्रही नहीं होगा। यहाँ सम्पूर्ण विश्व के सभी मत एवं सभी पंथ की समस्त श्रेष्ठताएँ सहज ही सम्मानित होंगी। वैज्ञानिक अध्यात्म के प्रयोगों के सभी परिणाम समाज में आध्यात्मिक मानवतावाद की प्रतिष्ठा करेंगे। इसी सत्य का साक्षात्कार युगऋषि पं० श्रीराम शर्मा आचार्य ने युगक्रान्ति करने वाले प्रकाश दीप के रूप में अपनी चेतना के समाधि शिखरों पर आसीन होकर किया था। इससे ही प्रज्वलित अनगिन क्रान्ति दीप युग की भवितव्यता को उज्ज्वल स्वरूप देने वाले हैं।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १९२

👉 Henry Ford

When a young man asked Mr. Henry Ford for guidance to be as successful and  rich as him, the reply Mr. Henry Ford gave can provide inspiration to all those who are ambitious to acquire materialistic success. Ford said, “Maintain your honesty at any cost and strive in the profession with hard-work and strongly positive attitude”. Ford started his career as a simple automobile mechanic and reached the highest peak of success only through hard-work. He is considered the pioneer and founder of the entire automobile industry.

At the time of setting up his factory, he cherished a dream to produce a car so cheap that each of his employees can afford it. In the year 1930, each car that rolled out was costing 300 $ and the 70,000 cars that stood before the factory gate belonged to the people who worked inside the factory. Henry was believed to be the richest person in the world by the time of his death in the year 1937. He always championed peace and brotherhood. By establishing the Ford Foundation, he showed his generosity and compassion. This billion dollar institute is sincerely engrossed in acts of humanity and charity for the deprived.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Aacharya
📖 Badein Aadmi Nahi, Mahamanav Baniyein (Not a Big-Shot, Be Super-Human), Page 12

👉 "हैनरी फोर्ड

एक युवक ने जब हैनरी फोर्ड से कहा कि ""मैं भी हेनरी फोर्ड के समान संपन्न बनना चाहता हूँ। कृपया मेरा मार्गदर्शन कीजिए।" हैनरी फोर्ड ने जो उत्तर दिया वह हर भौतिक महत्त्वाकांक्षी को प्रेरणा दे सकता है। फोर्ड ने उत्तर दिया, 'किसी भी कीमत पर अपनी प्रामाणिकता बनाए रखो, मनोयोग एवं सतत् श्रम का अवलंबन लेकर व्यवसाय क्षेत्र में आगे बढ़ सकते हो। एक सामान्य से ओटोमोबाइल मैकेनिक के रूप में फोर्ड ने अपने जीवन क्रम का आरंभ किया तथा पुरुषार्थ के सहारे सफलता की चोटी पर जा पहुँचे। फोर्ड को ओटोमोबाइल उद्योग का संस्थापक माना जाता है।

मोटर कारखाना की स्थापना के समय उनकी इच्छा थी कि इतनी सस्ती कारों का निर्माण करें कि प्रत्येक कर्मचारी को उपलब्ध हो सके। सन् 1930 में फोर्ड कपंनी से निकलने वाली कार की कीमत मात्र 300 डालर थी। फोर्ड कपंनी के सामने हर समय 70,000 कारें खड़ी रहती थीं जो मात्र कंपनी में कार्य करने वाले कर्मचारियों की थीं, सन् 1937 में मृत्यु के समय हेनरी विश्व के सबसे संपन्न व्यक्ति माने गए। फोर्ड शांति के पक्षपाती थी। उन्होंने फोर्ड फाउंडेशन की स्थापना द्वारा अपने करुण हृदय का परिचय दिया। खरबों डालर की राशि से स्थापित यह संस्था मानवतावादी कार्यों में लगी है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 बड़े आदमी नहीं महामानव बनें, पृष्ठ 12

सोमवार, 17 फ़रवरी 2020

👉 आत्म-भाव का विस्तार

👉 साधु की संगति:-

एक चोर को कई दिनों तक चोरी करने का अवसर ही नहीं मिला. उसके खाने के लाले पड़ गए. मरता क्या न करता. मध्य रात्रि गांव के बाहर बनी एक साधु की कुटिया में ही घुस गया। वह जानता था कि साधु बड़े त्यागी हैं. अपने पास कुछ संचय करते तो नहीं रखते फिर भी खाने पीने को तो कुछ मिल ही जायेगा. आज का गुजारा हो जाएगा फिर आगे की सोची जाएगी।

चोर कुटिया में घुसा ही था कि संयोगवश साधु बाबा लघुशंका के निमित्त बाहर निकले. चोर से उनका सामना हो गया. साधु उसे देखकर पहचान गये क्योंकि पहले कई बार देखा था पर उन्हें यह नहीं पता था कि वह चोर है। उन्हें आश्चर्य हुआ कि यह आधी रात को यहाँ क्यों आया ! साधु ने बड़े प्रेम से पूछा- कहो बालक! आधी रात को कैसे कष्ट किया ? कुछ काम है क्या ? चोर बोला- महाराज! मैं दिन भर का भूखा हूं।

साधु बोले- ठीक है, आओ बैठो. मैंने शाम को धूनी में कुछ शकरकंद डाले थे. वे भुन गये होंगे, निकाल देता हूं. तुम्हारा पेट भर जायेगा. शाम को आये होते तो जो था हम दोनों मिलकर खा लेते। पेट का क्या है बेटा! अगर मन में संतोष हो तो जितना मिले उसमें ही मनुष्य खुश रह सकता है. यथा लाभ संतोष’ यही तो है. साधु ने दीपक जलाया, चोर को बैठने के लिए आसन दिया, पानी दिया और एक पत्ते पर भुने हुए शकरकंद रख दिए।

साधु बाबा ने चोर को अपने पास में बैठा कर उसे इस तरह प्रेम से खिलाया, जैसे कोई माँ भूख से बिलखते अपने बच्चे को खिलाती है. उनके व्यवहार से चोर निहाल हो गया।
सोचने लगा- एक मैं हूं और एक ये बाबा है. मैं चोरी करने आया और ये प्यार से खिला रहे हैं! मनुष्य ये भी हैं और मैं भी हूं. यह भी सच कहा है- आदमी-आदमी में अंतर, कोई हीरा कोई कंकर. मैं तो इनके सामने कंकर से भी बदतर हूं।

मनुष्य में बुरी के साथ भली वृत्तियाँ भी रहती हैं जो समय पाकर जाग उठती हैं. जैसे उचित खाद-पानी पाकर बीज पनप जाता है, वैसे ही संत का संग पाकर मनुष्य की सदवृत्तियाँ लहलहा उठती हैं. चोर के मन के सारे कुसंस्कार हवा हो गए। उसे संत के दर्शन, सान्निध्य और अमृत वर्षा सी दृष्टि का लाभ मिला. तुलसी दास जी ने कहा है-

एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध।
तुलसी संगत साध की, हरे कोटि अपराध।।

साधु की संगति पाकर आधे घंटे के संत समागम से चोर के कितने ही मलिन संस्कार नष्ट हो गये. साधु के सामने अपना अपराध कबूल करने को उसका मन उतावला हो उठा।
फिर उसे लगा कि ‘साधु बाबा को पता चलेगा कि मैं चोरी की नियत से आया था तो उनकी नजर में मेरी क्या इज्जत रह जायेगी! क्या सोचेंगे बाबा कि कैसा पतित प्राणी है, जो मुझ संत के यहाँ चोरी करने आया!

लेकिन फिर सोचा, ‘साधु मन में चाहे जो समझें, मैं तो इनके सामने अपना अपराध स्वीकार करके प्रायश्चित करूँगा. दयालु महापुरुष हैं, ये मेरा अपराध अवश्य क्षमा कर देंगे. संत के सामने प्रायश्चित करने से सारे पाप जलकर राख हो जाते हैं।

भोजन पूरा होने के बाद साधु ने कहा- बेटा ! अब इतनी रात में तुम कहाँ जाओगे. मेरे पास एक चटाई है. इसे ले लो और आराम से यहीं कहीं डालकर सो जाओ. सुबह चले जाना। नेकी की मार से चोर दबा जा रहा था. वह साधु के पैरों पर गिर पड़ा और फूट-फूट कर रोने लगा. साधु समझ न सके कि यह क्या हुआ! साधु ने उसे प्रेमपूर्वक उठाया, प्रेम से सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा- बेटा ! क्या हुआ?

रोते-रोते चोर का गला रूँध गया. उसने बड़ी कठिनाई से अपने को संभालकर कहा-महाराज ! मैं बड़ा अपराधी हूं. साधु बोले- भगवान सबके अपराध क्षमा करने वाले हैं. शरण में आने से बड़े-से-बड़ा अपराध क्षमा कर देते हैं. उन्हीं की शरण में जा।

चोर बोला-मैंने बड़ी चोरियां की हैं. आज भी मैं भूख से व्याकुल आपके यहां चोरी करने आया था पर आपके प्रेम ने मेरा जीवन ही पलट दिया. आज मैं कसम खाता हूँ कि आगे कभी चोरी नहीं करूँगा. मुझे अपना शिष्य बना लीजिए।

साधु के प्रेम के जादू ने चोर को साधु बना दिया. उसने अपना पूरा जीवन उन साधु के चरणों में सदा के समर्पित करके जीवन को परमात्मा को पाने के रास्ते लगा दिया। महापुरुषों की सीख है, सबसे आत्मवत व्यवहार करें क्योंकि सुखी जीवन के लिए निःस्वार्थ प्रेम ही असली खुराक है. संसार इसी की भूख से मर रहा है. अपने हृदय के आत्मिक प्रेम को हृदय में ही मत छिपा रखो।

प्रेम और स्नेह को उदारता से खर्च करो. जगत का बहुत-सा दुःख दूर हो जाएगा. भटके हुए व्यक्ति को अपनाकर ही मार्ग पर लाया जा सकता है, दुत्कार कर नहीं।

👉 सुख-दुख में समभाव रखिए! (भाग १)

सुख और दुख जीवन के दो विशिष्ट पहलू हैं, जिस पर भारतीय मुनियों ने बहुत गंभीर चिन्तन किया है। विश्व का कोई भी प्राणी दुख नहीं चाहता, पर वह मिलता अवश्य है। इसी तरह सभी प्राणी सूख चाहते हैं और निरन्तर उसे पाने के लिए प्रयत्नशील नजर आते हैं, फिर भी सच्चे सुख की अनुभूति विरले महापुरुषों के अतिरिक्त किसी को हो नहीं पाती, यह विश्व का सबसे महान आश्चर्य है। हमारे विचारक महापुरुषों ने इसी पर तल स्पर्शी गवेषणा की कि सुख एवं दुख हैं क्या बला? और उसकी प्राप्ति का, अनुभूति का, कारण क्या है? उन्होंने इसी एक प्रश्न पर जीवन को समर्पित कर दिया कि समस्त दुखों के विनाश एवं आनन्द की अनुभूति का मार्ग क्या है?

उनकी विचारधारा में साँसारिक लोग जिन्हें दुख या सुख समझते हैं, यह मिथ्या कल्पना जन्य प्रतीत हुआ और उससे आगे बढ़कर उन्होंने ऐसे ऐसे मार्ग खोज निकाले जिनके द्वारा इन दोनों से अतीत अवस्था का अनुभव किया जा सके।

साधारणतया मनुष्य दुख-सुख का कारण बाहरी वस्तुओं का संयोग एवं वियोग मानता है और इसी गलत धारण के कारण अनुकूल वस्तुओं व परिस्थितियों को उत्पन्न करने व जुटाने में एवं प्रतिकूल वस्तुओं को दूर करने में ही वह लगा रहता है। पर विचारकों ने यह देखा कि एक ही वस्तु की प्राप्ति से एक को सुख होता है और दूसरे को दुख। इतना ही नहीं परिस्थिति की भिन्नता हो तो एक ही वस्तु या बात एक समय में सुखकर प्रतीत होती हैं और अन्य समय में वही दुःखकर अनुभूत होती है इससे वस्तुओं का संयोग वियोग ही सुख-दुःख का प्रधान कारण नहीं कहा जा सकता और इसी के अनुसंधान में बाहरी दुखों एवं सुखों का समभाव रखने को महत्व दिया गया है।

भौतिक विचारधारा से आध्यात्मिक विचारधारा की भिन्नता यहाँ अत्यंत स्पष्ट हो जाती है। भौतिक दृष्टिवाला बाहरी निमित्तों पर जोर देगा। तब आध्यात्मिक दृष्टिवाला अपनी आत्मनिष्ठा की ओर बढ़ता चला जायगा। उसकी दृष्टि इतनी सतेज हो जायेगी कि बाहरी पर्दे के भीतर क्या है? उसे भली भाँति देख सके और ऐसा होने पर वह मूल वस्तु को पकड़ने का प्रयत्न करेगा। दृष्टाँत के लिए दो व्यक्ति एक स्थान पर पास-पास ही बैठे हुए हैं। अचानक कहीं से उनके मस्तक पर पत्थर आ गिरे। इससे भ्रान्ति में पड़कर एक तो पत्थर को दोषी मानकर उसे हाथ में लेकर उसे पछाड़ा कि उसके खंड-खंड हो गए। दूसरे ने पत्थर पर रोष न कर वह कहाँ से आया, किसने फेंका, क्यों फेंका इत्यादि पर गंभीरता से विचार करके और मुख्यतः दोष जिसका हो, ज्ञात कर उसके शोधन में प्रगति की, दोनों व्यक्तियों के यद्यपि पत्थर लगने की क्रिया एक सी हुई, पर दृष्टि की गहराई के भेद-भावों में व फल में रात-दिन का अन्तर हो गया।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1950 पृष्ठ 16

👉 MISCELLANEOUS Quotation & Answer (Part 3)

Q.3. What are the rules to be followed after taking Diksha?

Ans. After initiation, the devotee is expected to maintain  regularity in daily routine of worship (Upasana), a persistent endeavour for developing purity in thoughts words and deeds by studying scriptures and interacting with saintly persons (Sadhana) and by donating a part of one’s time and resources for welfare activities (Aradhana). Strict adherence to the routine of Upasana - Sadhana - Aradhana is essential. Nevertheless, if there are some momentary disruptions because of contingencies, one should not have any misgivings about divine displeasure, because God, like mother, is full of love, patience and forgiveness.

Though certain restrictions on diet (such as vegetarianism and abstention from hard drinks) are recommended for accelerating progress in Sadhana, these are not mandatory for the beginner. The devotee has free choice of time and period of Upasana to suit his / her routine.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 81

👉 वामन

वामन का मतलब होता है बौना, यानि कि छोटा। वामन वही नहीं होते जिनकी लम्बाई कम होती है। वामन वे भी होते हैं, जिनके व्यक्तित्व की ऊँचाई कम होती है। जिनके मन-अन्तःकरण छल-कपट से भरे होते हैं। जिनकी भावनाएँ दूषित-कलुषित होती हैं। ऐसे लोग भले कितने बुद्धिमान, तर्ककुशल व साधन सम्पन्न हों, भले ही उनके पास कितनी ही अलौकिक शक्तियाँ- सिद्धियाँ एवं ऋद्धियाँ-निधियाँ क्यों न हों? परन्तु अपने छल-कपट के कारण, भावों की अशुद्धि के कारण उन्हें सदा ही वामन कहा और समझा जाता है। इसके विपरीत शुद्ध अन्तःकरण, छल-प्रपंच से दूर, निष्कलुष हृदय वाले व्यक्ति अपने व्यक्तित्व से सदा विराट् होते हैं। तीनों लोकों में उनकी ख्याति होती है। स्वयं परमेश्वर भी उनकी सराहना करते हैं।
  
पुराणों में कथा है- जब स्वयं भगवान् अपने छल के कारण विराट् होने पर भी वामन कहे गये। इस रोचक कथा प्रसंग में वर्णन है कि स्वयं भगवान् विष्णु को परम धर्मात्मा बलि के पास याचक बनकर वामन के रूप में जाना पड़ा। धर्म परायण दैत्य राजा बलि ने भोग-विलास में डूबे रहने वाले स्वर्गाधिपति इन्द्र को पराजित कर देव व्यवस्था संभाल ली। स्वर्गाधिपति हो जाने के बाद भी बलि सदा तप एवं यज्ञ में निरत रहते थे। उनकी रुचि सुशासन, विष्णु भक्ति एवं तप-यज्ञ में थी न कि भोगों में। देवगणों ने इन्द्र के साथ मिलकर भगवान् विष्णु से प्रार्थना कि- कृपा कर उन्हें देवलोक वापस दिलाएँ। इस प्रार्थना पर भगवान् को भारी असमंजस हुआ, क्योंकि धर्मपरायण-परमभक्त बलि से युद्ध करना सम्भव नहीं था।
  
आखिर उन्हें वामन का रूप धरना पड़ा। पाँच वर्ष के तेजस्वी ब्राह्मण के रूप में उन्होंने महाराज बलि की यज्ञशाला में प्रवेश किया। महाराज बलि एक पल में ही अपने आराध्य को पहचान गए। उन्होंने भक्ति भरे मन से कहा आज्ञा करें भगवन्! उत्तर में वामन बने विष्णु ने तीन पग भूमि माँगी। बलि के हाँ कहते ही भगवान् वामन से विराट् हो गए। और उन्होंने दो पगों में स्वर्ग व धरती एवं तीसरे में स्वयं बलि को नाप लिया। देने वाले महाराज बलि अपना सर्वस्व देकर प्रसन्न थे। परन्तु भगवान् को अपने द्वारा किए छल पर क्षोभ था। उन्होंने बलि से कहा- वत्स इस अमिट दान के कारण तुम्हारी कीर्ति सदा अमर रहेगी। जबकि मेरे छल के कारण मुझ विराट को भी सदा याचक एवं वामन ही कहा जाएगा।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १९१