बुधवार, 20 जून 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 20 June 2018


👉 आज का सद्चिंतन 20 June 2018


👉 प्रगति सद्गुणों पर निर्भर है।

🔶 मानव जीवन की प्रगति उसके सद्गुणों पर निर्भर है। जिनके गुण कर्म स्वभाव का निर्माण एवं विकास ठीक प्रकार हुआ है वे सुसंयत व्यक्तित्व वाले सज्जन मनुष्य अनेकों बाधाओं और कठिनाइयों को पार करते हुए अपनी प्रगति का रास्ता ढूँढ़ लेते हैं। विपरीत परिस्थितियों एवं बुरे स्वभाव के व्यक्तियों को भी, प्रतिकूलताओं को भी सुसंस्कृत मनुष्य अपने प्रभाव एवं व्यवहार से बदल सकता है और उन्हें अनुकूलता में परिणत कर सकता है। इसके विपरीत जिसके स्वभाव में दोष दुर्गुण भरे पड़े होंगे वह अपने दूषित दृष्टिकोण के कारण अच्छी परिस्थितियों को भी दूषित कर देगा। संयोगवश उन्हें अनुकूलता द्वारा सुविधा प्राप्त भी हो तो दुर्गुणों के आगे वह देर तक ठहर न सकेगी। दूषित दृष्टिकोण जहाँ भी होगा वहाँ नारकीय वातावरण बना रहेगा। अनेकों विपत्तियाँ वहाँ से उलझती रहेंगी।

🔷 इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए हमें सद्गुणों की जननी आस्तिकता को धैर्य और विवेकपूर्वक अपनाने का प्रयत्न करना चाहिए। ईश्वर का भय मनुष्य को नेक रास्ते पर चलाते रहने में सबसे बड़ा नियंत्रण है। राजकीय कानून या सामाजिक दंड की दुस्साहसी लोग उपेक्षा करते रहते है। अपराधों और अपराधियों का बाहुल्य, पुलिस और जेल का भय भी इन्हें कम नहीं कर पाता। पर यदि किसी को ईश्वर पर पक्का विश्वास हो, अपने चारों ओर प्रत्येक प्राणी में कण-कण में ईश्वर को समाया हुआ देखे, तो उसके लिए किसी के साथ अनुचित व्यवहार कर सकना संभव नहीं हो सकता। कर्मफल की ईश्वरीय अविचल व्यवस्था पर जिसे आस्था होगी वह अपना भविष्य अन्धकारमय बनाने के लिए कुमार्ग पर बढ़ने का साहस कैसे कर सकेगा? दूसरों को ठगने या परेशान करने का अर्थ है ईश्वर को ठगना या परेशान करना। ऐसी भूल उससे नहीं हो सकती जिसके मन में ईश्वर का विश्वास, भय और कर्मफल की अनिवार्यता का निश्चय गहराई तक जमा हुआ है।

🔶 सच्चरित्रता को आस्तिकता का पर्यायवाची शब्द माना जा सकता है। ढोंग जैसी झूठी भक्ति, जिसमें साढ़े  तेईस घंटे पाप करते रहने और आधे घंटे पूजा-पत्री करके सारे पापों से छुटकारा मिलने की प्रवंचना सिखाई जाती है, उपहासास्पद हो सकती है। इसी प्रकार देव दर्शन से सकल मनोरथ सहज ही पूरे जो जाने की मान्यता भी धृष्टता कही जा सकती है पर सच्चे अध्यात्म का सच्ची आस्तिकता का महत्व किसी भी प्रकार कम नहीं होता। ईश्वर विश्वास का आस्तिकता का प्रतिफल एक ही होना चाहिए- सन्मार्ग का अवलम्बन और कुमार्ग का त्याग जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में धर्म और कर्तव्य का अनुशासन स्थापित करने के लिए ईश्वर विश्वास से बढ़कर और कोई प्रभावशाली माध्यम हो नहीं सकता।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1965 पृष्ठ 6
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/January/v1.6

👉 क्रोध हमारा आन्तरिक शत्रु है (भाग 1)

🔶 क्रोध प्राणहरः शत्रुः क्रोधऽमित्रमुखो रिपुः। क्रोधोऽसि महातीक्षणः सर्व क्रोधोऽर्षति॥
त्पते यतते चैव यच्च दानं प्रयच्छति। क्रोधेन सर्व हरति तस्मात क्रोधं विवजयेत्॥
(बाल्मीकि रामायण उत्तर. 71)

🔷 अर्थात् क्रोध प्राण हरण करने वाला शत्रु, क्रोध अमित्र - मुखधारी बैरी है, क्रोध महा तीक्ष्ण तलवार है, क्रोध सब प्रकार से गिराने वाला है, क्रोध तप, संयम, और दान सभी हरण कर लेता है। अतएव, क्रोध को छोड़ देना चाहिए।

🔶 क्रोध त्याग की महिमा बताते हुए श्री शुक्राचार्य जी अपनी कन्या देवयानी से कहते हैं- “देवयानी! जो नित्य दूसरों के द्वारा की हुई अपनी निन्दा को सह लेता है, तुम निश्चय जानो कि उसने सब को जीत लिया। जो बिगड़ते हुए घोड़ों के समान उभरे हुए क्रोध को जीत लेता है, उसी को साधु लोग जितेन्द्रिय कहते हैं, केवल घोड़ों की लगाम हाथ में रखने वाले को नहीं। देवयानी! जो पुरुष उभड़े हुए क्रोध का अक्रोध के द्वारा शान्त कर देता है, तुम निश्चय जानों, उसने सब जीत लिया। जो पुरुष उभरे हुए क्रोध को क्षमा के द्वारा शान्त कर देता है और सर्प के द्वारा पुरानी केंचुली छोड़ने के समान क्रोध का त्याग कर देता है, वास्तविक अर्थों में वहीं “पुरुष” कहलाता है। जो क्रोध को रोक लेता है, निन्दा को सह लेता है और दूसरों के द्वारा सताये जाने पर भी उनको बदले में नहीं सताता, वहीं परमात्मा की प्राप्ति का अधिकारी होता है। जो सौ वर्षों तक हर महीने बिना थके लगातार यज्ञ करता रहे और (जो कभी किसी पर क्रोध न करे- इन दोनों में क्रोध न करने वाला पुरुष ही श्रेष्ठ है।
(महाभारत आदिपर्व)

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मई 1950 पृष्ठ 15
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/May/v1.15

👉 Control and Refinement of Hormones – Part 2

🔶 Excessive secretion of this hormone also causes a variety of problems: the ‘engine’ –– source of energy of the body gets ‘over-charged’ and, as a result, different metabolic and biochemical reactions and physiological functions are accelerated untimely. This often gives rise to increase in pulse rate, professed perspiration, high blood pressure, excitation, hypersensitivity, mental restlessness and irritation etc.

🔷 The chemical processing of extraction of energy from the food constituents begins as soon as it reaches in the stomach.  Starch and sugar are converted into glucose. Part of this glucose goes in the blood stream and helps energize the body and maintain temperature. The remaining quantity of glucose is stored in the liver in the form of glycogen, making a stock for future energy-requirements.

🔶 In diabetic patients, the sugar level in the blood increases and the corresponding shortage of energy supplied by glucose gradually weakens the body.  This disorder in blood sugar arises due to the deficiency of insulin –– a hormone secreted by the pancreas. In healthy blood, the normal level of sugar is about one sixtieth ounce per liter.  This small amount is the fuel (source of energy) that keeps the cellular and muscular machinery warm and active.  Insulin along with another hormone adrenaline helps regulate this function.

Akhand Jyoti – June- 2003

👉 सादा जीवन उच्च विचार अन्योन्याश्रित (भाग 3)

🔶 अनावश्यक वैभव की भी ठीक ऐसी ही दुर्गति होती है। यह स्वयं तो हजार छेद बनाकर अपनी बिरादरी वालों से मिलने दौड़ता ही है, साथ ही जहाँ से भागता है वहाँ भी अनेकानेक रिसते घाव छोड़ जाता है, जो जन्म-जन्मान्तरों तक रिसते और कसकते हैं। इसलिए आदर्शों की बात सोचने वालों को सर्वप्रथम वैभव विसर्जन की तैयारी करने का परामर्श दिया जाता हैं। अन्यथा लिप्सा बनी रहने पर परमार्थ के नाम पर चित्र-विचित्र विडम्बनाएँ रचते रहने के अतिरिक्त और कुछ बन नहीं पड़ेगा। महानता और सम्पन्नता में एक प्रकार से शत्रुता है, जहाँ एक के पैर जमेंगे वहाँ दूसरे को पलायन करना पड़ेगा। तथ्य की यथार्थता एवं गम्भीरता को समझने वाले वाजिश्रवा जैसे सर्वमेध यज्ञ रचाते और अपने शरीर के कपड़े तक उतारकर परमार्थ प्रयोजन के लिए दान करते रहे हैं।

🔷 ऋषि परम्परा यही है। बुद्ध गाँधी को ही नहीं, प्रत्येक साधु और ब्राह्मण परम्परा अपनाने वालों को अपना प्रयास यही से आरम्भ करना पड़ा है। विसर्जन समर्पण बन पड़े तो ही यह आशा बँधती है कि महान के साथ एकत्व अद्वैत की स्थिति बन सके। जिस त्याग वैराग्य की शास्त्रकारों ने श्रेय मार्ग पर चलने वालों के निमित्त पग-पग पर आवश्यकता बताई है, उसमें यही रहस्य है कि जब तक तृष्णा से पिण्ड न छूटेगा तब तक श्रेष्ठता में न मन लगेगा और न तन जुटेगा। लगन कहीं लगी रहे तो फिर लकीर पीटने भर की विडम्बना ही शेष रह जाती है। उस झुनझुने से अपने आपको बहलाया फुसलाया भर जा सकता है।

🔶 परस्पर घोर मतभेद रखने वाले अध्यात्मवाद और साम्यवाद को इस केन्द्र पर सर्वथा एक मत देखा जा सकता है कि व्यक्ति को औसत नागरिक स्तर का निर्वाह क्रम अपनाने के लिए बाध्य किया जाय। अध्यात्म क्षेत्र में इसके लिए पुण्य परमार्थ का, त्याग वैराग्य का, स्वर्ग मुक्ति का दार्शनिक चक्रव्यूह रचा है। साम्यवाद ने झटके की नीति अपनाई है और आदमी की भलमनसाहत को अस्वीकार करते हुए गरदन दबोचकर जो पास पल्ले है उसे समाज की सम्पदा मानने के लिए बाधित किया है। तरीके अपने-अपने हैं। नींद की गोली खाकर मरा जाय या तलवार से गरदन कटे, मात्र तरीकों में ही भिन्नता है। आदर्शवाद की किसी भी धारा को यह स्वीकार नहीं कि मनुष्य विलासी, संग्रही, अपव्ययी बने, उद्धत विडम्बना रचे और मुफ्तखोरों के लिए उत्तराधिकार छोड़ मरे। हर दृष्टि से यह अनैतिक है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 समर्पण

🔷 एक तपस्वी किसी धर्मात्मा राजा के महल में पहुँचे। राजा गदगद हो गए और कहे, "आज मेरी इच्छा है कि आपको मुँह माँगा उपहार दूँ"। तपस्वी ने कहा, "आप ही अपने मन से सबसे अधिक प्रिय वस्तु दे दें, मैं क्या माँगूँ"।

🔶 राजा ने कहा, "अपने राज्य का समर्पण कर दूँ"। तपस्वी बोले, "वह तो प्रजाजनों का है। आप तो संरक्षक मात्र हैं"।

🔷 राजा ने बात मानी और दूसरी बात कही, "महल, सवारी आदि तो मेरे हैं, इन्हें ले लें"। तपस्वी हँस पड़े और कहा, "राजन् आप भूल जाते हैं। यह सब भी प्रजाजनों का है। आपको कार्य की सुविधा के लिए दिया गया है"।

🔶 अबकी बार राजा ने अपना शरीर दान देने का विचार व्यक्त किया। उसके उत्तर में तपस्वी ने कहा, "यह भी आपके बाल−बच्चों का है, इसे कैसे दे पाएँगे"।

🔷 राजा को असमंजस में देखकर तपस्वी ने कहा, "आप अपने मन का अहंकार दान कर दें। अहंकार ही सबसे बड़ा बंधन है"।

🔶 राजा दूसरे दिन से अनासक्त योगी की तरह रहने लगा। तपस्वी की इच्छा पूर्ण हो गई।

मंगलवार, 19 जून 2018

👉 ईश्वर भक्त लडकी जीनल

🔶 एक राजा बहुत दिनो से पुत्र की प्राप्ती के लिये आशा लगाये बैठा था,पर पुत्र नही हुआ। उसके सलाहकारों ने तांत्रिकों से सहयोग की बात बताई। सुझाव मिला कि किसी बच्ची की बलि दे दी जाये तो पुत्र प्राप्ति हो जायेगी। राजा ने राज्य में ये बात फैलाई कि जो अपनी बेटी देगा उसे बहुत सारे धन दिये जायेगे।

🔷 एक परिवार में कई बच्चें थे, गरीबी भी थी, एक ऐसी बच्ची भी था जो ईश्वर पर आस्था रखती थी जिसका नाम जीनल था तथा वो सन्तों के संग सत्संग में ज्यादा समय देती थी। परिवार को लगा कि इसे राजा को दे दिया जाये क्योंकि ये कुछ काम भी नही करती है, हमारे किसी काम की भी नही। इससे राजा प्रसन्न होकर बहुत सारा धन देगा। ऐसा ही किया गया जिनल को राजा को दे दिया गया।

🔶 राजा के तात्रिकों द्वारा जीनल की बलि की तैयारी हो गई, राजा को भी बुलाया गया, बच्चे से पुछा गया कि तुम्हारी आखरी इच्छा क्या है? क्योंकि अाज तुम्हारा जीवन का अन्तिम दिन है। जीनल ने कहा कि ठीक है मेरे लिये रेत मँगा दिया जाये, रेत अा गया। जीनल ने रेत से चार ढ़ेर बनाये, एक-एक करके तीन रेत के ढ़ेर को तोड़ दिया और चौथे के सामने हाथ जोड़कर बैठ गई और कहा कि अब जो करना है करे। ये सब देखकर तॉत्रिक डर गये बोले कि ये तुमने क्या किया है पहले बताओं।

🔷 राजा ने भी पुछा तो जीनल ने कहा कि पहली ढ़ेरी मेरे माता पिता की है, मेरी रक्षा करना उनका कर्तव्य था पर उन्होने पैसे के लिये मुझे बेच दिया। इसलिये मैने ये ढ़ेरी तोड़ी, दुसरा मेरे सगे-सम्बन्धियों का था, उन्होंने भी मेरे माता-पिता को नही समझाया तीसरा आपका है राजा क्योंकि राज्य के सभी इंसानों की रक्षा करना राजा का ही काम होता है पर राजा ही मेरी बलि देना चाह रहा है तो ये ढ़ेरी भी मैने तोड़ दी। अब सिर्फ मेरे सदगुरुदेव और ईश्वर पर मुझे भरोसा है इसलिये ये एक ढ़ेरी मैने छोड़ दी है।

🔶 राजा ने सोचा कि पता नही बच्ची की बलि से बाद भी पुत्र प्राप्त हो या न हो क्यों ना इस लडकी को ही अपनी पुत्री बना ले, इतनी समझदार और ईश्वर भक्त लडकी है। राजा ने उस बच्ची को अपनी बेटी बना ली और वो राजकुमारी बन गई और जीनल की ईश्वर भक्त के परिणाम राजा के वहा बच्चे का जन्म हुआ।

🔷 कहानी का भाव कि जो ईश्वर और सदगुरुदेव पर यकीन रखते है, उनका बाल भी बांका नही होता है, हर मुश्किल में एक का ही जो आसरा लेते है उनका कही से किसी प्रकार का कोई अहित नही होता है।

👉 आज का सद्चिंतन 19 June 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 June 2018


👉 सादा जीवन उच्च विचार अन्योन्याश्रित (भाग 2)

🔶 जन मनोविज्ञान को समझने वाले जानते है कि साथियों की तुलना में बहुत अधिक विलास वैभव एकत्रित करना, गरिमा अर्जित नहीं कर पाता, वरन् आक्रोश उत्पन्न करता है जिसकी चपेट में न जाने कितने आक्रमण सहने और कष्ट उठाने पड़ते हैं। इसलिए दूरदर्शिता सदा यही कहती रही है कि सम्पन्नता अॢजत करने के अनेक खतरे हैं, जबकि सादगी अपनाने पर महानता उभरती है और जन-जन का स्नेह सहयोग घसीट लाती है।

🔷 सादा जीवन उच्च विचार का सिद्धान्त ऐसा है जिसमें जीवन की सार्थकता, सफलता और जुड़ी हुई अति प्रसन्नता के समस्त सूत्रों का समावेश है। हलका-फुलका जीवन अर्थात् सादगी, मितव्ययता और बिना विलास वैभव का सीधा सादा निर्वाह। इसके लिए औसत भारतीय स्तर को मापदण्ड मानकर चलना होता है अन्यथा यह पता ही न चलेगा कि जिस वैभव का उपभोग चल रहा है वह आवश्यक है या अनावश्यक, उचित है या अनुचित। जिसकी अपनी तृष्णा आकाश चूमती हो उसके लिए यह अनुमान लगा सकना कठिन है कि औसत मनुष्य को किस स्तर का निर्वाह अपनाना पड़ता है। वे सदा धन कुबेरों के सपने देखते है और तस्करों, लोलुपों और निष्ठुरों के द्वारा अपनाये जाने जैसे विलास वैभव को स्वाभाविक मानते हैं।

🔶 इस राह पर चलते तो अनेकों हैं, जो चल नहीं पाते वे भी ललक वैसी ही सँजोये रहते हैं। परिणति स्पष्ट हैं, साधनों के रहते हुए भी उनका इच्छित रसास्वादन तो कदाचित ही कोई कर पाते हों। मधुमक्खियों के वैभव को कौन सहन करता है। छत्ता तोड़ने के लिए बहेलिये ही नहीं, गिद्ध और बन्दर तक घात लगाये रहते हैं। यह अपहरण चापलूसी के औजार से किया गया या गला मरोड़ने वाले नागपाश से, यह बात दूसरी है।

🔷 बढ़ा हुआ वैभव रुदन के अतिरिक्त और कुछ उत्पन्न नहीं कर सकता। उससे दुर्व्यसन और अहंकार समान रूप में बढ़ते हैं। यह दोनों ही ऐसे हैं जो शहतीर में लगे घुन की तरह उसे गुप-चुप खोखला करते और धराशायी करने तक अपने प्रयास में निरत रहते हैं। अधिक जोड़ने की, अधिक भोगने की ललक में मनुष्य कुकृत्य तो करते ही हैं, उसका खर्च भी सीधे रास्ते नहीं होता। या तो मनुष्य स्वयं उसे दुर्व्यसनों में उड़ाता है या फिर ईर्ष्यालुओं के आक्रमण का शिकार बनता है। पारा किसी को पचता नहीं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Control and Refinement of Hormones

🔶 At a superficial level, it appears that some chemical processing of the food intakes generates blood, and that the flow of blood is the source of heat and energy in the body.  However, deeper analysis has shown that there is a separate mechanism at the root of all functions inside the body, which gives rise to the formation of blood and maintenance of body-energy.  The auto-regulatory system of the neurons and the influence of the conscious and unconscious mind on it are also now regarded as a manifestation of some subtler processes.

🔷 The hormone secreting endocrine glands constitute this subtle system, which is now found to be the basic controller of all functions, qualities, abilities or disabilities of the bodily and mental functions. The thyroid gland secrets a hormone called thyroxin, which enters the blood stream and reaches different parts of the body. Deficiency of this hormone reduces the absorption rate of oxygen, which often results in disruption of metabolic functions, excessive fatigue, loss of memory and bluntness of mind.

🔶 Also, the skin and hair become dry, lips and eyelids become lose and appear as pulled downwards. The body fattens and its plumpness is such that pressing a finger makes a groove (depression) in the swollen part. One is unable to bear chill and feels tired because of the reduced level of this hormone.  Growth of the thyroid gland results in a swollen, protuberant throat and gives rise to the diseases like goiter. The reasons for abnormal shrinkage or growth of this gland are not fully understood. It may malfunction even if one’s diet is balanced and the daily routine is also maintained at a level, which is normally prescribed for a healthy person.

📖 Akhand Jyoti- June- 2003

👉 बुरे विचारों से दूर रहिए (अन्तिम भाग)

🔶 बुरे विचारों के निरोध का उपाय सबसे प्रथम उनको पहचानना ही है। जिनके विचारों को। हम बुरे विचार मानते ही नहीं, उन्हें हम अपने मनोमन्दिर में प्रवेश करने से क्योंकर रोक सकेंगे? यदि दूसरों के धनापहरण के विचार को हम उत्तम विचार मानते हैं तो उसे अपने मन में आने से रोकने की जगह भली प्रकार से उसका स्वागत करेंगे। जो विचार बुरे होते हैं। वे उनके प्रथम स्वरूप में ही बुरे नहीं लगेंगे, उनके परिणाम बुरे होते हैं। विचारवान व्यक्ति ही इस बात को जान सकता है कि अमुक विचार अन्त में दुखदायी होगा।
संसार के अत्याधिक मनुष्यों को यह समझाना ही कठिन है कि उनके विचार ही उनके सुख-दुख के कारण हैं।

🔷 मनुष्यमात्र में अपने आप पर विवेचना करने की शक्ति का अभाव होता है। हम सभी बहिर्मुखी हैं। हम अपने कष्टों का कारण दूसरों को मानने में सन्तोष पाते हैं। अपने दोषों को दूसरे में देखते हैं। जिस अवाँछनीय घटना की जड़ हमारे विचारों में ही है उसे हम दूसरे व्यक्तियों में देखते हैं। इस प्रकार की मानसिक प्रवृत्ति को दोषारोपण की प्रवृत्ति कहते हैं अथवा प्रोजेक्शन कहते है। वही मनुष्य बुरे विचारों के निरोध में समर्थ होता है, जो अपने आपके विषय में सदा चिन्तन करता है और जो परोक्ष रूप से भी यह जानता है कि मनुष्य का मन ही दुख और दुखों का कारण है। ऐसे ही मनुष्य में भले ओर बुरे विचारों के पहचानने की शक्ति उत्पन्न होती है।

🔶 किसी भी ऐसे विचार को बुरा विचार कहना चाहिये जो आत्मा को दुःख देता हो, उसको भ्रम में डालता हो। बीमारी के विचारों और असफलता के विचारों को सभी बुरा कहेंगे यह प्रत्यक्ष ही है कि इन विचारों से मन को दुख होता है और अनहोनी घटना होके रहती है। किन्तु इस बात को मानने के लिये कम लोग तैयार होंगे कि शत्रुता के विचार, दूसरों को क्षति पहुंचाने के विचार भी बुरे विचार है। ये विचार भी उसी प्रकार हमारी आत्मा का बल कम कर देते हैं जिस प्रकार कि असफलता और बीमारी के विचार आत्मा का बल कम कर देते हैं।

.... समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति मई 1950 पृष्ठ 14
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/May/v1.14

👉 ईश्वर उपासना

🔶 ईश्वर उपासना मानव जीवन की अत्यन्त महत्वपूर्ण आवश्यकता है। आत्मिक स्तर को सुविकसित, सुरक्षित एवं व्यवस्थित रखने के लिए हमारी मनोभूमि में ईश्वर के लिए समुचित स्थान रहना चाहिए और यह तभी संभव है जब उसका अधिक चिन्तन, मनन, अधिक सामीप्य, सान्निध्य प्राप्त करते रहा जाय। भोजन के बिना शरीर का काम नहीं चल सकता, साँस लिए बिना रक्ताभिषरण की प्रक्रिया बिगड़ जाती है। इसी प्रकार ईश्वर की उपेक्षा करने के उपरान्त आन्तरिक स्तर भी नीरस, चिन्ताग्रस्त, अनिश्चित, अनैतिक, अव्यवस्थित एवं आशंकित बना रहता है। यह हानि कुछ कम हानि नहीं है। दीखने वाली हानियों को लोग आसानी से समझ लेते हैं, पर इस जीवन के सारे आनन्द और उद्देश्य को ही नष्ट कर देने वाली हानि को हम न तो देख पाते हैं और न समझते ही हैं। यह कैसे दुर्भाग्य की बात है।

🔷 मानव जीवन की प्रगति और सुख-शान्ति आन्तरिक स्तर की उत्कृष्टता पर निर्भर रहते हैं। इस उत्कृष्टता की पुष्टि एवं अभिवृद्धि के लिए ही उपासना तंत्र का आविर्भाव हुआ हैं। भौतिक सुख- साधन, बाहुबल और बुद्धिबल के आधार पर कमाये जा सकते हैं पर गुण-कर्म-स्वभाव की उत्कृष्टता पर निर्धारित समस्त विभूतियाँ हमारे आन्तरिक स्तर पर ही निर्भर रहती हैं। इस स्तर के सुदृढ़ और समुन्नत बनाने में उपासना का भारी योग रहता है। इसलिए अत्यन्त आवश्यक कार्यों की भाँति ही उपासना को दैनिक कार्यक्रम में स्थान मिलना चाहिए। जिस प्रकार जीविका उपार्जन, आहार, विश्राम, सफाई, गृहस्थ पालन, विद्याध्ययन, मनोरंजन आदि का ध्यान रखा जाता है, वैसा ही ध्यान उपासना का भी रखा जाना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1965 पृष्ठ 5
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/January/v1.5

सोमवार, 18 जून 2018

👉 Concentration – an essential pre-requisite for spiritual unfoldment (Part 2)

🔷 The goal of a sadhak is to become more and more introspective. Therefore, closing the eyes, the mind should be fixed on the import of a mantra. The recitation of mantra should be done along with meditation. A japa done in this awakened manner helps in controlling the waywardness of mind and in making it introspective. The acrobats of a circus perform miraculous feats as a result of their concentration and practice. Siddha purushas with concentration of their spiritual and mental energies are able to become the masters of several siddhis.

🔶 The scattered sunrays cannot burn even a thread, but when the same rays are focused with the help of a convex lens, a spark of fire is produced, capable of burning anything. Similarly when five karmendriyas and five gyanendriyas are not attracted towards their objects of desire, the mind becomes stable. In meditation, when the external world of objects and the false ego-self are forgotten, it should be assumed that the mind is getting quietened. Thus regular sadhana of concentration will lead the sadhak to higher dimensions of consciousness beyond the ordinary mind, instinct with paranormal ranges of light, life and bliss.

🔷 There are several unique occult powers lying dormant in the deeper layers of our consciousness. If the gunpowder is scattered on the ground and is lit, it will burn like ordinary things and nothing special will happen. But if the same gunpowder is fired through the barrel of a gun it can even pierce through the hardest steel. In the same way, if our mind remains shallow and scattered, it will be ineffective in attaining anything worthwhile and we will lead a life without purpose.

📖 Akhand Jyoti Mar-2002

👉 बुरे विचारों से दूर रहिए (भाग 2)

🔷 हमें यहाँ ध्यान रखना चाहिये कि कोई भी भावना व्यक्ति विशेष से सम्बन्धित नहीं रहती। हम किसी समय एक विशेष व्यक्ति से डर रहे हों, संभव है वह व्यक्ति हमारा कुछ बुरा न कर सके वह किसी कारण से हमसे दूर हो जाये। किन्तु इस प्रकार व्यक्ति विशेष से दूर हो जाने पर हम अपनी दुर्भावना से मुक्त नहीं होते। यह भावना अपना एक दूसरा विषय खोज लेगी।

🔶 हमारे जीवन का सुख और दुःख हमारे विचारों पर ही निर्भर रहता है। आधुनिक मनोविज्ञान की खोजों से पता चलता है कि मनुष्य का न सिर्फ आन्तरिक जीवन वरन् उसके समस्त जीवन के व्यवहार तथा शारीरिक स्वास्थ्य भी मन की कृष्ट तथा अकृष्ट गतियों का परिणाम मात्र है। अशुभ विचारों का लाना ही अपने जीवन को दुखी बनाना है, तथा शुभ विचारों का लाना सुखी बनाना है।

🔷 अब प्रश्न यह आता है कि हम अशुभ विचारों को आने से कैसे रोकें जिससे कि उनसे पैदा किये दुखों से हम बच सकें? यह प्रश्न बड़े महत्व का है और संसार के समस्त मनस्वी लोगों ने इस प्रश्न पर गम्भीर विचार किया है। किन्तु इस विषय पर जितना ही विचार किया जाय श्रेयस्कर है। प्रत्येक मनुष्य को इस विषय पर विचार करना चाहिये। दूसरों के विचारों से हमें लाभ अवश्य होता है किन्तु जब तक हम दूसरों के विचारों का मनन नहीं करते, उनसे भली प्रकार लाभ नहीं उठा सकते। लेखक पहले इस विषय पर अपने विचारों का उल्लेख करेगा इस लेख का तात्पर्य यहाँ है कि प्रत्येक पाठक को इस विषय पर विचार करने को प्रस्तुत किया जाय, ताकि जीवन की सबसे महत्वपूर्ण समस्या को अपने आप सुलभ कर सकें।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मई 1950 पृष्ठ 14
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/May/v1.14

👉 सादा जीवन उच्च विचार अन्योन्याश्रित (भाग 1)

🔷 निर्वाह की दृष्टि से जीवन क्रम हलका-फुलका होना चाहिए। लिप्सा लालसाओं से लदी जिन्दगी बहुत भारी पड़ती है। महत्त्वाकांक्षी लोग न चैन से बैठते है न दूसरों को बैठने देते हैं। बड़प्पन का नशा विज्ञात नशों में सबसे बुरा है। कुबेर और इन्द्र बनने की ललक में रावण और हिरण्यकश्यपु जैसा वैभव बटोरने की रट लगाते-लगाते कितने चंगेज खाँ और सिकन्दर इस दुनिया से हाथ मलते उठ गये, फिर अपने जैसे मक्खी मच्छरों की क्या स्थिति, जिनके पास न कौशल है, न पराक्रम, न साधन। वितृष्णा इतना ही कर सकती है कि इस चन्द दिन तक जीने के लिए मिले हुए सुयोग का अपहरण कर ले। मृगतृष्णा में भटकने वाले दिवास्वप्न देखते और निराशा, खीज़, थकान भर पल्ले पड़ने से मूर्खता पर सिर धुनते हैं।

🔶 यदि विलास और वैभव ही सब कुछ रहे और अहंता के प्रदर्शन बिना चैन न पड़े तो एक बात और भी गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि इस प्रयास में उन सभी सम्भावनाओं को समाप्त करना होगा जो हर घड़ी प्रसन्नता बनाये रहती हैं। जिसके कारण चेहरे पर मुस्कान और अन्तराल में संतोष भरे उल्लास को छलकते देखा जाता है। मानवी गरिमा को अक्षुण्ण और सुविकसित बनाये रहने के लिए बहुत कुछ सोचना और बहुत कुछ करना होता है। इस हेतु जिन साधनों की आवश्यकता पड़ती है उन्हें पूरी तरह वह व्यामोह अजगर की तरह निगल जाता है, जिसमें दर्प के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं।

🔷 साथियों को नीचा दिखाकर अपनी गरिमा सिद्ध करने वाले ठाट-बाट तो बना लेते हैं, पर जिस लोक सम्मान की आशा से वह सब किया गया था, उसे मिलने की कोई आशा की किरण दीखती नहीं। उलटी ईर्ष्या भड़कती है। भूखों की मण्डली में बैठकर जब एक कोई रबड़ी चाटता है तो सौभाग्यशाली कहलाने का श्रेय कहाँ बटोर पाता है। उलटा आक्रोश बरसता है और निष्ठुरता का लांछन लगता है। लगे हाथों कहने वाले यह भी कहते है कि यह अनीति उपार्जन है, अन्यथा ईमानदार होने पर तो यह हमारे जैसा ही रहता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 आध्यात्मिकता की मुसकान

🔷 इस संसार में सब कुछ हँसने को लिए उपजाया गया है। जो बुरा और अशुभ है वह हमारी प्रखरता की चुनौती के रूप में है। परीक्षा के प्रश्न पत्रों के देखकर जो छात्र रोने लगे, उसे अध्ययनशील नहीं माना जा सकता। जिसने थोड़ी-सी आपत्ति-असफलता एवं प्रतिकूलता को देखकर रोना-धोना शुरू कर दिया, उसकी आध्यात्मिकता पर कौन विश्वास कर सकता है? प्रतिकूलता हमारा साहस बढ़ाने, धैर्य को मजबूत करने और सामर्थ्य को विकसित करने आती है। सरल जिन्दगी यदि संयत हो सके तो वह सबसे भद्दे ढंग की ही होगी क्योंकि वह जो सरलता पूर्वक दिन गुजारता रहता है उसमें न तो किसी प्रकार की विशेषता रह जाती है और न प्रतिभा। संघर्ष के बिना भी भला कहीं, इस दुनिया में किसी का जीना सम्भव हुआ है।

🔶 नई उपलब्धियों में हमें हँसना चाहिए, अब तक मिल चुका उससे सन्तोष व्यक्त करना चाहिए और भविष्य की शुभ सम्भावनाओं की कल्पना करके सदा प्रमुदित होते रहना चाहिए। रोना एक अभिशाप है जो केवल अविवेकी लोगों को शोभा देता है। जिसे आत्मा के स्वरूप का ज्ञान है और परमात्मा की महत्ता, कुशलता और विनोद को समझता है उसे हँसने मुस्कराने की परिस्थितियों के अतिरिक्त और कुछ इस जीवन में अनुभव ही क्या हो सकता है?
        
✍🏻 ~ महर्षि रमण
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1965 पृष्ठ 1

रविवार, 17 जून 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 June 2018


👉 आज का सद्चिंतन 18 June 2018

👉 कथनी और करनी

🔷 कसाई के पीछे घिसटती जा रही बकरी ने सामने से आ रहे संन्यासी को देखा तो उसकी उम्मीद बढ़ी.मौत आंखों में लिए वह फरियाद करने लगी—

🔶 ‘महाराज! मेरे छोटे-छोटे मेमने हैं. आप इस कसाई से मेरी प्राण-रक्षा करें, मैं जब तक जियूंगी,अपने बच्चों के हिस्से का दूध आपको पिलाती रहूंगी, बकरी की करुण पुकार का संन्यासी पर कोई असर न पड़ा. वह निर्लिप्त भाव से बोला— ‘मूर्ख, बकरी क्या तू नहीं जानती कि मैं एक संन्यासी हूं।

🔷 जीवन-मृत्यु, हर्ष-शोक, मोह-माया से परे. हर प्राणी को एक न एक दिन तो मरना ही है, समझ ले कि तेरी मौत इस कसाई के हाथों लिखी है. यदि यह पाप करेगा तो ईश्वर इसे भी दंडित करेगा…’

🔶 ‘मेरे बिना मेरे मेमने जीते-जी मर जाएंगे…’ बकरी रोने लगी. ‘नादान, रोने से अच्छा है कि तू परमात्मा का नाम ले. याद रख, मृत्यु नए जीवन का द्वार है. सांसारिक रिश्ते-नाते प्राणी के मोह का परिणाम हैं, मोह माया से उपजता है. माया विकारों की जननी है.विकार आत्मा को भरमाए रखते हैं…’

🔷 बकरी निराश हो गई. संन्यासी के पीछे आ रहे कुत्ते से रहा न गया, उसने पूछा—‘महाराज, क्या आप मोह-माया से पूरी तरह मुक्त हो चुके हैं?’

🔶 ‘बिलकुल, भरा-पूरा परिवार था मेरा. सुंदर.पत्नी, भाई-बहन, माता-पिता, चाचा-ताऊ, बेटा-बेटी. बेशुमार जमीन-जायदाद… मैं एक ही झटके में सब कुछ छोड़कर परमात्मा की शरण में चला आ आया. सांसारिक प्रलोभनों से बहुत ऊपर… जैसे कीचड़ में कमल…’ संन्यासी डींग मारने लगा।

🔷 ‘आप चाहें तो बकरी की प्राणरक्षा कर सकते हैं. कसाई आपकी बात नहीं टालेगा.’ ‘मौत तो निश्चित ही है, आज नहीं तो कल, हर प्राणी को मरना है.’

🔶 तभी सामने एक काला भुजंग नाग फन फैलाए दिखाई पड़ा. संन्यासी के पसीने छूटने लगे. उसने कुत्ते की ओर मदद के लिए देखा. कुत्ते की हंसी छूट गई.

🔷 ‘मृत्यु नए जीवन का द्वार है…उसको एक न एक दिन तो आना ही है…’ कुत्ते ने संन्यासी के वचन दोहरा दिए ‘मुझे बचाओ.’ अपना ही उपदेश भूलकर संन्यासी गिड़गिड़ाने लगा. मगर कुत्ते ने उसकी ओर ध्यान न दिया।

🔶 ‘आप अभी यमराज से बातें करें.जीना तो बकरी चाहती है. इससे पहले कि कसाई उसको लेकर दूर निकल जाए, मुझे अपना कर्तव्य पूरा करना है…’ कहते हुए वह छलांग लगाकर नाग के दूसरी ओर पहुंच गया. फिर दौड़ते हुए कसाई के पास पहुंचा और उसपर टूट पड़ा. आकस्मिक हमले से कसाई के औसान बिगड़ गए. वह इधर-उधर भागने लगा. बकरी की पकड़ ढीली हुई तो वह जंगल में गायब हो गई. कसाई से निपटने के बाद कुत्ते ने संन्यासी की ओर देखा. वह अभी भी ‘मौत’ के आगे कांप रहा था. कुत्ते का मन हुआ कि संन्यासी को उसके हाल पर छोड़कर आगे बढ़ जाए.

🔷 लेकिन मन नहीं माना. वह दौड़कर विषधर के पीछे पहुंचा और पूंछ पकड़कर झाड़ियों की ओर उछाल दिया, बोला— ‘महाराज, जहां तक मैं समझता हूं, मौत से वही ज्यादा डरते हैं, जो केवल अपने लिए जीते हैं.

🔶 धार्मिक प्रवचन उन्हें उनके पापबोध से कुछ पल के लिए बचा ले जाते हैं…जीने के लिए संघर्ष अपरिहार्य है, संघर्ष के लिए विवेक, लेकिन मन में यदि करुणा-ममता न हों तो ये दोनों भी आडंबर बन जाते हैं.’।।

👉 बुरे विचारों से दूर रहिए (भाग 1)

🔷 हमारा मन अभ्यास का दास है। जिस प्रकार का अभ्यास मन को कराया जाता है उसी प्रकार उसका अभ्यास सदा के लिए बन जाता है। जिस मनुष्य को पढ़ने-लिखने का अभ्यास रहता है, उसका मन रुचि के साथ ऐसे काम को करने लगता है। ऐसे व्यक्ति से बिना पढ़े-लिखे रहा ही नहीं जाता। जिस मनुष्य को दूसरों की निन्दा करने का अभ्यास है, जो दूसरों के अहित का सदा चिन्तन किया करता है, वह भी उन कर्मों को किये बिना रह नहीं सकता ऐसे कार्य उसकी एक प्रकार की नशा जैसे व्यसन हो जाते हैं, वह व्यक्ति अनायास ही दूसरों की निंदा और अकल्याण सोचने में लग जाता है। दूसरों की स्तुति सुनकर उसे बुखार जैसा आ जाता है।

🔶 जिस व्यक्ति का इस प्रकार का अभ्यास हो जाता है वह जब अपने आपके विष में अशुभ विचार लाता है तो उन विचारों का भी विरोध नहीं कर सकता। जिनको दूसरों की बुराई का चिन्तन भला लगता है, वह अपनी बुराई का भी चिन्तन करने लगता है फिर इस प्रकार के विचार उसके मन को नहीं छोड़ते। अब यदि वह चाहे कि अमुक अशुभ विचार को हम छोड़ दें तो भी अब वह उसे छोड़ने में असमर्थ होता है। वहीं मनुष्य अपने विचारों पर नियन्त्रण कर सकता है जिसकी आत्मा बलवान और विवेकी है। जिस साँप को हम दूसरों के काटने के लिये पाले हैं, वहीं साँप किसी असावधानी की अवस्था में अपने आपको काट सकता है। दूसरों को दुःख देने के विचार साँप के सदृश है। अतएव सबका सदा कल्याण सोचना, किसी का भी अहित न सोचना, बुरे विचारों के निराकरण का पहला उपाय है।

🔷 जिस व्यक्ति के प्रति हम बुरे विचार लाते हैं उससे हम घृणा करने लगते हैं। घृणा की वृत्ति उलट कर भय की वृत्ति बन जाती है। जो दूसरों की मानहानि का इच्छुक है उसके मन में अपने आप ही अपनी मान हानि का भय उत्पन्न हो जाता है। जो दूसरों की शारीरिक क्षति चाहता है, उसे अपने शरीर के विषय में अनेक रोगों की कल्पना अपने आप उठने लगती है। जो दूसरों की असफलता चाहता है वह अपनी सफलता के विषय में सन्देहात्मक हो जाता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मई 1950 पृष्ठ 13
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/May/v1.13

👉 नव युग निर्माण की जिम्मेदारी हमारी है।

🔶 हर एक आदमी यह कह रहा है कि अब सत् युग नहीं रहा, ईमानदारी विश्वास, सत्यता इस संसार से विदा ले गई। अब तो कलियुग आ गया है और बढ़ता चला जा रहा है। पर इस सतयुग के सम्बन्ध में किसी न विचार नहीं किया कि आखिर यह है क्या? सतयुग कोई ऐसी चीज तो है नहीं जो कि जन्म जन्मान्तर में किसी एक निश्चित समय पर ही आवेगा और फिर बहुत समय के लिए आँखों के सामने से गायब हो जायगा। सतयुग और कलियुग को तो हम अपने विचारों से स्वयं बना सकते हैं।

🔷 जिस समय इस जाग्रत जीवन का अधिकार समाप्त करके मनुष्य सूक्ष्म जीवन का अधिकार समाप्त करके मनुष्य सूक्ष्म जीवन में पहुँच जाता है, कामना, वासना, संस्कार आदि से किसी भी तरह का अपना सम्बन्ध नहीं रखता इस स्थूल शरीर में अवस्था भेद के अनुसार अपने जीवन की और अवस्था भेद की समता नहीं रखता अर्थात् आधार और आधे यों के सम्बन्धों को दूर कर देगा उसी समय इस संसार में सतयुग का पुनः उदय होगा। इस पृथ्वी पर रहने वाली मनुष्य जाति मन बुद्धि और शरीर को ही सब कुछ समझती और बतलाती है। इन्हीं के चक्कर में पड़ी वह अनेक प्रकार के खेल खेला करती है। परलोक की खोज खबर वह नहीं रखना चाहती। वहाँ की चर्चा को उसने भुला दिया है। आज फिर नये सिरे से हमें उसकी चर्चा जारी करनी होगी, सोई हुई शक्ति को फिर जगाना होगा अहंकार को दबा कर रखना होगा।

🔶 हम दिव्य लोक के जीव हैं, यह ज्ञान हमें फिर से पाना होना, यही सत्ययुग की स्थापना करेगा, इसीलिए हमें साधना और तपस्या करनी है। यदि इस प्रयत्न से एक बार भी हम लोग उस स्थान तक पहुँच गये तो पीड़ाओं तथा वेदनाओं से छुटकारा पाकर सिद्ध बनकर सत्य और आनन्द की लीला में प्रविष्ट होकर इस मृत्युलोक को ही स्वर्ग में बदल देंगे। सतयुग के लोग स्वर्ग लोग का पता लगा कर इस भूलोक को छोड़ कर वहाँ उस महत् लोक में पहुँचते थे। लेकिन हम लोग स्वर्ग लोक के अधिकारी बन कर इस पृथिवी को नहीं त्यागेंगे। हम इस मृत्युलोक में ही स्वर्ग की लीला का आनन्द लेंगे।

🔷 जब तक माया के फंदे से जीव नहीं छूटता है और भेद भाव के विचार मन में भरे रहते हैं तब तक उसे वास्तविक ज्ञान नहीं होता है माया के फन्दे से छूटकर और भेद भाव के विचारों को भावनाओं को निकालने पर ही उसे ज्ञान होता है, तब दिव्य दृष्टि से देखने लगता है। उसमें तथा ब्रह्म में किसी प्रकार का अन्तर नहीं रह जाता। वास्तव में समस्त ब्रह्माण्ड, यह संसार, हमारा शरीर सभी कुछ ब्रह्म मय है इसलिए इस तरह का ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर मृत्युलोक में विचरण करते हुए एक बार फिर से सतयुग की स्थापना करने का भार हम लोगों के ऊपर है जिसे कि पूरा करना है।

✍🏻 योगी अरविन्द
📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1955 पृष्ठ 50-51
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1955/April/v1.14

👉 संपदा को रोकें नहीं

🔶 परमात्मा के अनंत वैभव से विश्व में कभी किसी बात की नहीं। भगवान आपके हैं और उसके राजकुमार के नाते सृष्टि की हर वस्तु पर आपका समग्र अधिकार है। उसमें से जब जिस चीज की जितनी आवश्यकता हो उतनी लें और आवश्यकता निबटते ही अगली बात सोचें। संसार में सुखी और संपन्न रहने का यही तरीका है।

🔷 बादल अपने, नदी अपनी, पहाड़ अपने, वन उद्यान अपने। इनमें से जब जिसके साथ रहना हो, रहें। जिसका जितना उपयोग करना हो, करें। कोई रोक-टोक नहीं है। दुःखदायी तो संग्रह है। नदी को रोककर यदि अपनी बनाना चाहेंगे और किसी दूसरे को पास न आने देंगे, उपयोग न करने देंगे तो समस्या उत्पन्न होगी। एक जगह जमा किया हुआ पानी अमर्यादित होकर बाढ़ के रूप में उफनने लगेगा और आपके निजी खेत खलिहानों को ही डुबो देगा। बहती हुई हवा कितनी सुरभित है पर उसे आप अपने ही पेट में भरना चाहेंगे तो पेट फूलेगा, फटेगा। औचित्य इसी में है कि जितनी जगह फेफड़े में है, उतनी ही सांस लें और बाकी हवा दूसरों के लिए छोड़ दें। मिल-बांटकर खाने की यह नीति ही सुखकर है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 June 2018


👉 आज का सद्चिंतन 17 June 2018


शनिवार, 16 जून 2018

👉 हमारी महान् परम्परा

🔷 हमें जिस महान् परम्परा का उत्तराधिकार मिला है, वह ऐसा ही है, जिसमें तृष्णा-वासना की पूर्ति जैसा कुछ नहीं है। श्रम और झंझट बहुत है, फिर भी गम्भीरतापूर्वक देखने से यह प्रतीत होता है कि जो लोग सारी जिन्दगी धन तथा भोग के लिए पिसते-पिलते रहने के पश्चात जो पाते हैं, उससे हमारी उपलब्धियाँ किसी प्रकार कम नहीं। ठीक है, अमीरों जैसे ठाठ नहीं बन सके, पर जो कुछ मिल सका है, वह उतना बड़ा है कि उस पर पहाड़ों जैसी अमीरी न्यौछावर की जा सकती है। सामान्य बुद्धि इस उपलब्धि का मूल्याँकन नहीं कर पाती, पर जो थोड़ी गम्भीरता से समझ और देख सकता है, वह यह विश्वास करेगा ही कि अमीरी की तुलना में यह आध्यात्मिक उपलब्धियाँ भी कम महत्व की, कम मूल्य की नहीं हैं।

🔶 हमने जो पाया है, वही हम अपने उत्तराधिकारियों के लिए छोड़ जाना चाहते हैं। हमें भी इसी परम्परा के अनुसार कुछ मिला है। हर पुत्र को पिता की सम्पत्ति में हिस्सा मिलता है। जो हमारे निकटतम आत्मीय होंगे, उन्हें हमारी संयमित पूँजी का भी लाभ मिलना चाहिए, मिलेगा भी। गाँधी की संग्रहित पूँजी का बिनोवा, नेहरू, पटेल, राजेन्द्र प्रसाद आदि अनेकों ने भरपूर लाभ उठाया। यदि वे लोग गाँधी जी के संपर्क से दूर रहते और अपने दूसरे चतुर लोगों की तरह भौतिक कमाई में जुटे रहते तो वह सब कहाँ से पाते, जो उन लोगों ने पाया। हम गाँधी तो नहीं, पर इतने निरर्थक, दरिद्र एवं खाली हाथ भी नहीं हैं कि जिनके निकट संपर्क में आने वाले को कुछ न मिले। यह खुला रहस्य है कि लाखों व्यक्ति साधारण संपर्क का लाभ उठाकर अपनी स्थिति में जादुई मोड़ दे सकने में सफल हुए हैं और इस संपर्क की सराहना करते हैं। भविष्य में जिन पर हमें अपना उत्तराधिकार सौंपना है, उन्हें वर्तमान स्थिति में ही पड़ा रहना पड़े, ऐसा नहीं हो सकता। वे सहज ही ऐसा कुछ पा सकेंगे, जिसके लिए चिर-काल तक प्रसन्नता एवं सन्तोष अनुभव करते रह सकें।

🔷 आध्यात्मिक महानता की, सत्पात्रता की कसौटी के सम्बन्ध में हम इस तथ्य को अनेकों बार प्रस्तुत कर चुके हैं कि व्यक्ति के गुण, कर्म, स्वभाव का उत्कृष्ट होना ही उसकी आन्तरिक महानता का परिचायक है। इसी आधार पर संसार में, इसी आधार पर परलोक में और इसी आधार ईश्वर के समक्ष किसी का वजन एवं मूल्य बढ़ता है। अपने दैनिक-जीवन में हम कितने संयमी, सदाचारी, शाँत, मधुर, व्यवस्थित, परिश्रमी, पवित्र, संतुलित, शिष्ट कृतज्ञ एवं उदार हैं, इन सद्गुणों का दैनिक-जीवन में कितना अधिक प्रयोग करते हैं, यह देख, समझकर ही किसी को, उसकी आन्तरिक वस्तु-स्थिति को जाना जा सकता है। जिसका दैनिक-जीवन फूहड़पनों से भरा हुआ है वह कितना ही जप, ध्यान, पाठ, स्नान करता हो, आध्यात्मिक स्तर की कसौटी पर ठूँठ या छूँछ ही समझा जायगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1966 पृष्ठ 46-47
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/May/v2.24

👉 अपनी परिधि का विस्तार करें!

🔷 आत्मा का विकास परमात्म के समान विस्तृत होने में है। जो सीमित है, संकीर्ण है, वह क्षुद्र है। जिसने अपनी परिधि बढ़ा ली, वही महान है। हम क्षुद्र न रहें; महान बनें। असंतोष सीमित अधिकार से दूर नहीं होता। थोड़ा मिल जाय, तो अधिक पाने की इच्छा रहती है। सुरसा के मुख की तरह तृष्णा अधिक पाने के लिए मुँह फाड़ती चली जाती है। आग में घी डालने से वह बुझती कहाँ है? अधिक ही बढ़ती है। तृप्ति तब मिलेगी जब इस संसार में जो कुछ है, सब पा लिया जाय। वह हँसी नहीं, कल्पना नहीं। समग्र को पा सकना स्वल्प पाने की अपेक्षा सरल है।

🔶 मान्यता को विस्तृत कीजिए- यह सारा विश्व मेरा है। नीला विशाल आकाश मेरा। हीरे-मोतियों की तरह, झाड़–फानूसों की तरह जगमगाते हुए सितारे मेरे, सातों समुद्र मेरी सम्पदा, हिमालय मेरा- गंगा मेरी -पवन देवता मेरे, बादल मेरी सम्पत्ति - इस मान्यता में कोई बाधा नहीं, किसी की रोक नहीं। समुद्र में तैरिये, गंगा में नहाइये, पर्वत पर चढ़िये, पवन का आनन्द लूटिए, प्रकृति की सुषमा देख कर उल्लसित हूजिए। कोई बन्धन नहीं, कोई प्रतिरोध नहीं। सभी मनुष्य मेरे, सभी प्राणी मेरे की परिधि इतनी विस्तृत करनी चाहिए कि समस्त चेतन जगत उसमें समा जाय।

🔷 अपनी सीमित पीड़ा से कराहेंगे, तो कष्ट होगा और दुख, पर जब मानवता की व्यथा को अपनी व्यथा मान लेंगे और लोक पीड़ा की कसक अपने भीतर अनुभव करेंगे, तो मनुष्य नहीं, ऋषि,देवता और भगवान जैसी अपनी अन्तः स्थिति हो जायेगी। अपना कष्ट दूर करने को जैसा प्रयत्न किया जाता है, वैसी ही तत्परता विश्व- व्यवस्था के निवारण में जुट पड़ेगी। इस चेष्टा में लगे हुए व्यक्ति को ही तो महामानव और देवदूत कहते हैं। ईश्वर का अनुग्रह सिद्धियों का अनुदान ऐसी ही उदात्त आत्माओं के चरणों में लोटता है।
        
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1964 पृष्ठ 27

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 June 2018


👉 आज का सद्चिंतन 16 June 2018


👉 विवेकहीन बदले की भावना

🔷 एक दिन एक साँप एक बढ़ई की औजारों वाली बोरी में घुस गया। घुसते समय बोरी में रखी हुई बढ़ई की आरी उसके शरीर में चुभ गई और उसमें घाव हो गया , जिस से उसे दर्द होने लगा और वह विचलित हो उठा। गुस्से में उसने उस आरी को अपने दोनों जबड़ों में जोर से दबा दिया।

🔶 अब उसके मुख में भी घाव हो गया और खून निकलने लगा। अब इस दर्द से परेशान हो कर उस आरी को सबक सिखाने के लिए अपने पूरे शरीर को उस साँप ने उस आरी के ऊपर लपेट लिया और पूरी ताकत के साथ उसको जकड़ लिया। इस से उस साँप का सारा शरीर जगह जगह से कट गया और वह मर गया।

🔷 ठीक इसी प्रकार कई बार, हम तनिक सा आहत होने पर आवेश में आकर सामने वाले को सबक सिखाने के लिए, अपने आप को अत्यधिक नुकसान पहुंचा देतें हैं।

🔶 यहीं ज्ञान और शिक्षा, हमारे जीवन में हमारा मार्गदर्शन करते हैं, और हमारे विवेक को जागृत करते हैं।

🔷 यह जरूरी नहीं कि हमें हर बात की प्रतिक्रिया देनी है, हमें दूसरों की गल्तियों को नजरअंदाज करते हुए  अपने परम पथ पर अग्रसर होना है और यह नहीं कि दूसरे को उसकी गलती की सजा देने के लिए हम अपने लक्ष्य और पथ से विचलित हो जाएं।

🔶 इसलिए अपने विवेक को सकारात्मक कार्यों,विचारों में इस्तेमाल करें।

शुक्रवार, 15 जून 2018

👉 प्रतिभा

🔷 मित्रो ! भीष्म ने मृत्यु को धमकाया था कि जब तक सूर्य उत्तरायण न आए, तब तक इस ओर पैर न धरना। सावित्री ने यमराज के भैंसे की पूँछ पकड़कर उसे रोक लिया था और सत्यवान के प्राण वापस करने के लिए बाध्य किया था। अर्जुन ने पैना तीर चलाकर पाताल-गंगा की धार ऊपर निकाली थी और भीष्म की इच्छानुसार उनकी प्यास बुझाई थी। राणा सांगा के शरीर में अस्सी घाव लगे थे, फिर भी वे पीड़ा की परवाह न करते हुए अंतिम साँस रहने तक युद्ध में जूझते ही रहे थे। बड़े काम बड़े व्यक्तित्वों से ही बन पड़ते हैं। भारी वजन उठाने में हाथी जैसे सशक्त ही काम आते हैं, बकरों और गधों से उतना बन नहीं पड़ता; भले ही वे कल्पना करते, मन ललचाते या डींगे हाँकते रहें।  

🔶 प्रतिभा जिधर भी मुड़ती है, उधर ही बुलडोजरों की तरह मैदान सफा करती चलती है। सर्वविदित है कि यूरोप के विश्वविजयी पहलवान सैंडो किशोर अवस्था तक अनेक बीमारियों से घिरे, दुर्बल काया लिए फिरते थे, पर जब उन्होंने समर्थ तत्वावधान में स्वास्थ्य का नए सिरे से संचालन और बढ़ाना शुरु किया तो कुछ समय में विश्वविजयी स्तर के पहलवान बन गए। भारत के चंदगीराम पहलवान के बारे में अनेकों ने सुना है कि वह हिन्दकेसरी के नाम से प्रसिद्ध हुए थे। पहले वह अन्यमनस्क स्थिति में अध्यापकी से रोटी कमाने वाले क्षीणकाय व्यक्ति थे। उन्होंने अपने मनोबल से ही नई रीति-नीति अपनाई और खोई हुई सेहत नए सिरे से न केवल पाई वरन् इतनी बढ़ाई कि हिन्दकेसरी उपाधि से विभूषित हुए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 15 June 2018

👉 आज का सद्चिंतन 15 June 2018


👉 आत्मज्ञान की उपलब्धि ही सर्वश्रेष्ठ सिद्धि

🔷 अपने आपको जानना ही आत्मज्ञान प्राप्त करना है। अपने को शरीर मानना यह अविद्या है और आत्मज्ञान प्राप्त करना ही विद्या है। पहली मृत्यु है और दूसरी अमरता। एक अंधकार है, दूसरा प्रकाश, एक जन्म-मृत्यु है दूसरा मोक्ष। एक बंधन है तो दूसरा मुक्ति। नरक और स्वर्ग भी इन्हें ही कह सकते हैं। ये दोनों एक दूसरे से अत्यन्त विपरीत परिस्थितियाँ हैं, दोनों भिन्न-भिन्न दिशाओं को ले जाती हैं, इसलिए एक को ग्रहण करने के लिए दूसरे को त्यागना अनिवार्य हो जाता है।
  
🔶 ज्ञान और अज्ञान की समान परिस्थितियाँ इस विश्व में विद्यमान है। जिन्हें पदार्थों से प्रेम होता है, वे प्रेयार्थी अज्ञानी कहे जाते हैं। भले ही उन्हें सांसारिक ज्ञान अधिक हो पर ब्रह्मवेत्ता पुरुष उन्हें कभी विद्वान नहीं मानते और न ही उन्हें महत्त्व दिया जा सकता है क्योंकि भोग की इच्छा करने वाले व्यक्ति अंधेरे में चलते और अंधों की तरह ठोंकरें खाते हैं।
  
🔷 आत्म ज्ञान प्राप्त करना वस्तुत: ईश्वर की सबसे सुन्दर सेवा और उपासना है। हमारे पूर्वज कहते हैं परमात्मा बड़ा मंगल कारक है। यहाँ कष्ट और दु:ख की कोई बात ही नहीं है, पर लोग अज्ञान वश कष्ट भोगते और परमात्मा को दोषी ठहराते हैं।
  
🔶 आत्म तत्त्व का ज्ञान मनुष्य के लिए सभी दृष्टिïयों से उपयुक्त है। शास्त्रकार का कथन है कि तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषम अर्थात् आत्म ज्ञान के सुख से बढक़र और कोई सुख नहीं। कठोपनिषद् अध्याय दो की दूसरी बल्ली में आत्मा की विशदता और उससे प्राप्त होने वाले महान सुख का इस प्रकार वर्णन है। ‘जो समस्त जीवों का मूल, चेतन और सब प्रकार की कामनाओं को पूर्ण करता है, उस शरीरस्थ आत्मा का जो ज्ञान प्राप्त कर लेेते हैं, उन्हें ही नित्य और शाश्वत शांति उपलब्ध होती है।’
  
🔷 यद्यपि यह आत्मा जीव रूप से हृदय में ही अवस्थित है, तो भी वह अति सूक्ष्म है और सहज ही ज्ञान में नहीं आता। किन्तु जब कोई साहसी पुरुष अध्यात्म योग के द्वारा उसे जानने का प्रयत्न करता है, कठिनाइयों में प्रविष्ट होकर उसे ढूंढऩे का प्रयत्न करता है, तो वह आत्मा की विशेषताओं से प्रभावित भी होता है। और अंत में उसे प्राप्त कर सांसारिक दु:ख और कष्टों से छुटकारा पा जाता है।
  
🔶 आत्म तत्त्व निश्चय ही बहुत विशद है। बुद्धिमान व्यक्ति इस परम गोपनीय तत्त्व को प्राप्त कर अपनी मुक्ति के भागी तो बनते ही हैं, साथ ही हजारों औरों को आत्मकल्याण के मार्ग में अग्रसर करने में भी समर्थ होते हैं, किन्तु यह तत्त्व गोपनीय ही नहीं दु:साध्य भी है। मनुष्य की जिज्ञासा ही उसे अधिकारी नहीं बना देती, वरन् उस तत्त्व के अवगाहन की पात्रता भी होना आवश्यक है। अधिकारी व्यक्ति ही उसे प्राप्त कर सकते हैं, जो भय और मोह की स्थिति में डगमगा न सकें और जिनमें इतनी दृढ़ता, गंभीरता और कठिनाइयों के सहन करने की क्षमता हो कि वे साधना काल की ऊँची-नीची, टेड़ी-तिरछी परिस्थितियों में भी बढ़ते रह सकें, वस्तुत: वही उसके पात्र होते हैं। ऐसे आत्मबल सम्पन्न व्यक्तियों पर ही समाज के खोजी वर्चस् सम्पन्न व्यक्ति अगले दिनों और अधिक संख्या में पैदा हों, ऐसी नियति की इच्छा है। कोई कारण नहीं कि महाकाल की यह इच्छा पूरी न हो।
        
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 14 जून 2018

👉 शिखा और सूत्र

🔶 मित्रो ! पुलिस का सिपाही अपना सिम्बाल पहने रहता है, उसके कमर में एक पेटी बँधी रहती है और उसके ऊपर लगा रहता है एक पीतल का बिल्ला। उस पीतल के बिल्ले पर क्या लिखा रहता है? यू.पी.पी. लिखा रहता है। पहले अँग्रेजी में लिखा रहता था और अब हिन्दी में लिखा रहता है। उत्तर प्रदेश पुलिस- उ.प्र.पु.। मध्यप्रदेश में- म.प्र.पु. लिखा रहता है। पीतल का बिल्ला न हो किसी के पास तो समझ लीजिए कि वह सिपाही नहीं है और कमर में पेटी बँधी हुई न हो तो समझ लीजिए कि वह पुलिस का सिपाही नहीं है। सिपाही को कमर में पेटी बाँधनी चाहिए।

🔷 जब कभी किसी का फौज में कोर्टमार्शल होता है तो सबसे पहला यह काम किया जाता है कि उसकी पेटी उतार ली जाती है, उसका बिल्ला उतार लिया जाता है उसको क्रिमिनल मान लिया जाता है तथा उसको लाइन में खड़ा किया जाता है फिर उसका कोर्टमार्शल किया जाता है और यह कहा जाता है तुम हमारी इज्जत मत खराब करो। पेटी की इज्जत-राष्ट की इज्जत है। तुमने ऐसे खराब काम किए हैं, इसलिए सबसे पहले तुमको यह सजा दी जाएगी कि तुम्हारी पेटी और तुम्हारा बिल्ला हम जब्त कर लेते है। पुलिस में भी यही होता है और फौज में भी यही होता है।

🔶 हमारा बिल्ला जब्त किया या नहीं किया, हम पुलिस के सिपाही हैं कि नहीं, हम फौज के सिपाही हैं कि नहीं, हम हिन्दू धर्म के सिपाही हैं कि नहीं, हम हिन्दू धर्म के दीक्षित हैं कि नहीं, इसकी पहचान आपके शिखा और सूत्र (जनेऊ) से होती है। अगर आप हिन्दु धर्म में दीक्षित हैं तो लाइए वह निशान आपके कंधे पर 'यू.पी.पी. लिखा हुआ है कि नहीं और कमर में पेटी बँधी हुई हैं कि नहीं और अगर आपकी पेटी छीन ली किसी ने तो आपको यह कहना पड़ेगा कि पुलिस में से हमें बर्खास्त कर दिया गया-फौज में से बर्खास्त कर दिया गया और हमारा कोर्टमार्शल किया गया। अगर आप का बिल्ला छीन लिया गया, पेटी छीन ली गई हो तो फिर इसका मतलब यह होगा कि आपको हिन्दू धर्म में से बर्खास्त कर दिया गया। हिन्दू धर्म से कोई और धर्म होगा आपका।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 वांङमय-68-पृष्ठ 2.118

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 June 2018


👉 आज का सद्चिंतन 14 June 2018


👉 आत्म-मैत्री की स्थापना

🔷 आत्म-मैत्री का भाव स्थापित करने के लिये मनुष्य को पुनः शिक्षा की आवश्यकता होती है। पहले तो अपनी महानता का भाव छोड़ना पड़ता है। समाज में बड़े कहे जाने की इच्छा सरलता से नष्ट नहीं होती। बहुत से व्यक्ति बड़े ही विनीत और नम्र बनते हैं। वे अपने आपको सब की पदधूल कहते हैं। ऐसे व्यक्ति बड़े अभिमानी होते हैं और उनका नम्र बनने का दिखावा ढोंग मात्र होता है। दूसरे को इस प्रकार अपने वश में किया जाता है और उसके ऊपर अपना प्रभुत्व स्थापित किया जाता है। सच्चे मन से महत्वाकाँक्षा का त्याग वही करता है जो सब प्रकार की असाधारणता अपने जीवन से निकाल डालता है।

🔶 जो व्यक्ति अपने आपको सामान्य व्यक्ति मानने लगता है वह नैतिकता में नीचे दिखाई देने वाले व्यक्तियों के प्रति सहानुभूति का भाव रखता है। वह उनकी भूलों को क्षम्य समझता है। वह जब बाहरी जगत् में प्रकाशित अनेक भावों को क्षम्य मानने लगता है तो वह अपने दलित भावों को भी उदार दृष्टि से देखने लगता है। दूसरों के दोषों से घृणा का भाव हट जाने से अपने दोषों से भी घृणा का भाव हट जाता है। फिर उसके मन के भीतर के दलित भाव चेतना के समक्ष आने लगते हैं, और जैसे-जैसे उसका बाहरी जगत से साम्य स्थापित होता जाता है, उसके आन्तरिक मन से भी साम्य स्थापित हो जाता है। वह अपने भीतरी मन से मित्रता स्थापित करने में समर्थ होता है।

🔷 आंतरिक समता अथवा एकत्व और बाह्य समता एक दूसरे के सापेक्ष हैं, मनुष्य अपने आपको सुधार कर अपना समाज से सम्बन्ध सुधार सकता है और समाज से सम्बन्ध सुधारने से अपने आप से सम्बन्ध सुधार सकता है। वास्तव में वाह्य और आन्तरिक जगत एक ही पदार्थ के दो रूप हैं। मन और संसार एक दूसरे के सापेक्ष हैं। जैसा मनुष्य का मन होता है उसका संसार भी वैसा ही होता है।

🔶 हमारी नादानी ही हमें अपना तथा संसार का शत्रु बनाती है और विचार की कुशलता दोनों प्रकार की कहानियों का अन्त कर देती है।

📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1956 पृष्ठ 12
http://literature.awgp.org/hindi/akhandjyoti/1956/February/v1.12

👉 उपकार किस पर करे?

🔷 जंगल में शेर शेरनी शिकार के लिये दूर तक गये अपने बच्चों को अकेला छोडकर। देर तक नही लौटे तो बच्चे भूख से छटपटाने लगे उसी समय एक बकरी आई उसे दया आई और उन बच्चों को दूध पिलाया फिर बच्चे मस्ती करने लगे तभी शेर शेरनी आये बकरी को देख लाल पीले होकर हमला करता उससे पहले बच्चों ने कहा इसने हमें दूध पिलाकर बड़ा उपकार किया है नही तो हम मर जाते।

🔶 अब शेर खुश हुआ और कृतज्ञता के भाव से बोला हम तुम्हारा उपकार कभी नही भूलेंगे जाओ आजादी के साथ जंगल मे घूमो फिरो मौज करो। अब बकरी जंगल में निर्भयता के साथ रहने लगी यहाँ तक कि शेर के पीठ पर बैठकर भी कभी कभी पेडो के पत्ते खाती थी।

🔷 यह दृश्य चील ने देखा तो हैरानी से बकरी को पूछा तब उसे पता चला कि उपकार का कितना महत्व है। चील ने यह सोचकर कि एक प्रयोग मैं भी करता हूँ चूहों के छोटे छोटे बच्चे दलदल मे फंसे थे निकलने का प्रयास करते पर कोशिश बेकार।

🔶 चील ने उनको पकड पकड कर सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया बच्चे भीगे थे सर्दी से कांप रहे थे तब चील ने अपने पंखों में छुपाया, बच्चों को बेहद राहत मिली काफी समय बाद चील उडकर जाने लगी तो हैरान हो उठी चूहों के बच्चों ने उसके पंख कुतर डाले थे। चील ने यह घटना बकरी को सुनाई तुमने भी उपकार किया और मैंने भी फिर यह फल अलग क्यों?

🔷 बकरी हंसी फिर गंभीरता से कहा

🔶 उपकार भी शेर जैसो पर किया जाए चूहों पर नही। चूहों  (कायर) हमेशा उपकार को स्मरण नही रखेंगे वो तो भूलना बहादुरी समझते है और शेर(बहादुर )उपकार कभी नही भूलेंगे।

बुधवार, 13 जून 2018

👉 वेष-भूषा की मनोवैज्ञानिक कसौटी (अन्तिम भाग)

🔷 आज पाश्चात्य देशों में अमेरिका में सर्वाधिक भारतीय पोशाक-साड़ी का तो विशेष रूप से तेजी से आकर्षण और प्रचलन बढ़ रहा है दूसरी ओर अपने देश के नवयुवक और नवयुवतियां विदेशी और सिनेमा टाइप वेष-भूषा अपनाती चली जा रही हैं। यह न केवल अन्धानुकरण की मूढ़ता है वरन् अपनी बौद्धिक मानसिक एवं आत्मिक कमजोरी का ही परिचायक है।

🔶 यदि इसे रोका न गया और लोगों ने पैंट, कोट, शूट, बूट, हैट, स्कर्ट, चुस्त पतलून सलवार आदि भद्दे और भोंडे परिधान न छोड़े तो और देशों की तरह भारतीयों का चारित्र्यक पतन भी निश्चित ही है। श्री हेराल्ड लिखते हैं—कि सामाजिक विशेषताओं को इस सम्बन्ध में अभी विचार करना चाहिये अन्यथा वह दिन अधिक दूर नहीं जब पानी सिर से गुजर जायेगा।

🔷 भारतीय दर्शन में आत्म कल्याण के लिये बहुत उपाय हैं सैकड़ों योग साधनायें हैं वैसे ही लोक-कल्याण के लिए भी अनेक परम्परायें मान्यतायें और आचार-विचार प्रतिस्थापित किये गये हैं उन सबका उद्देश्य जीवन को सशक्त और संस्कारवान बनाना रहा है अब जो परम्परायें विकृत हो चुकी हैं उनमें वेष-भूषा भी कम चिन्ताजनक नहीं हमें अनुभव करके ही नहीं इस मनोवैज्ञानिक खोज से भी सीखना चाहिये कि अपनी वेष-भूषा ओछापन नहीं बड़प्पन का ही प्रतीक है। हां काले अंग्रेज और काली मैम बनना हो तब तो कुछ भी पहना और ओढ़ा जा सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 84

👉 व्यक्तित्व की स्थापना

🔶 महानता का भाव स्वयं एक आत्महीनता की ग्रन्थि का परिणाम है। जब किसी प्रकार के आचरण से मनुष्य को आत्मग्लानि हो जाती है तो वह उस वासना का दमन करता है, जो आत्मग्लानि का कारण बनती है। दमन होने के कारण मनुष्य में दो प्रकार का व्यक्तित्व स्थापित हो जाता है। एक तरफ वह चेतन मन में महान नैतिक व्यक्ति बन जाता है और दूसरी ओर उसके अचेतन मन में अवरोधित भावनाओं की प्रबलता हो जाती है। जितना ही अनैतिक वासना का दमन होता है वह और भी प्रबल होती है और जितना ही वह प्रबल होती है उतनी नैतिक भावना को प्रबल होना पड़ता है। इस तरह नैतिकता की असाधारण प्रबलता व्यक्ति के अचेतन मन में विरुद्ध भावना की प्रबलता दर्शाती है। जो प्राकृतिक वासना सामान्य रहती है और व्यक्ति के जीवन के विकास के लिये शक्ति प्रदान कर सकती है, वह दलित होने पर विशेष रूप से दुष्ट और हानिकारक बन जाता है। इस प्रकार महत्वाकाँक्षा रखने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपने आपको ही अपना शत्रु बना लेता है। यदि वह अकेला छूट जाये तो वह अपना समय आत्म-भर्त्सना में ही व्यतीत करेगा। वह किसी न किसी काम के लिये अपने आपको कोसता रहेगा।

🔷 पर इस प्रकार की मनोवृत्ति अधिक स्थायी नहीं होती। इसके स्थायी होने से विक्षिप्तता आ जाती है। अतएव वह अपनी आन्तरिक स्थिति को भूला देता है और अपने शत्रुओं को अपने से बाहर खोज निकालता है, अर्थात् उसके आत्म शत्रुता के भाव बाहरी किसी व्यक्ति के ऊपर आरोपित हो जाते हैं और वह अपने शत्रुओं को अपने भीतर न देखकर अपने बाहर देखने लगता है। इस तरह मनुष्य का मन अपने आपको भुलावा देता है।

🔶 जो व्यक्ति जितना ही अपने आप से घृणा करता है, वह अपने आपका शत्रु है। वह बाहर भी घृणा करने के लिये उपयुक्त पात्र लेता है और ठीक शत्रु की खोज कर लेता है। वह उन्हीं दोषों को उनमें पाता है जो स्वयं उसके अचेतन मन में वर्तमान हैं और जिनके कारण वह अपने आप से घृणा करता है। बहुत से लोग किसी व्यक्ति से घृणा नहीं करते वरन् उनके कुछ दोषों से घृणा करते हैं। यदि इन दोषों को देखा जाय तो वे वही निकलेंगे जो स्वयं उसके मन में हैं और जिनको नष्ट करने की वह असफल चेष्टा कर चुका है। जो व्यक्ति अपने आपको जीतने में असफल रहता है वह अपने से बाहर किसी व्यक्ति को अथवा उसकी बुराइयों को जीतने का प्रयत्न करता है। उसकी असाधारणता ही उसकी असफलता का प्रमाण है। जब मनुष्य अपने आप पर विजय प्राप्त कर लेता है तो उसके जीवन में सहज भाव आ जाता है। वह बाहर से साधारण व्यक्ति हो जाता है।

🔷 जब तक मनुष्य अपने आपका शत्रु बना हुआ है, वह चाहे जितना ही सब का मित्र बनने का प्रयत्न क्यों न करे अथवा अपने शत्रुओं को विनाश करने की चेष्टा क्यों न करे, शत्रुओं को पा ही लेगा। उसकी इच्छा के प्रतिकूल संसार में लोग उसके शत्रु बन जायेंगे। उसका सारा जीवन इन्हीं शत्रुओं से लड़ने में व्यतीत होगा। उसे बाहरी चिन्ताऐं सताती रहेंगी। जब मानसिक अन्तर्द्वन्द्व की स्थिति में बाहरी शत्रु नहीं भी रहता तो उसे काल्पनिक शत्रु अथवा उसके विचार से ही उसे भय होने लगता है। कोई भी अवाँछनीय विचार मन में घुस जाता है और फिर निकालने से नहीं निकलता। इतना ही नहीं जितना ही उसे निकालने का प्रयत्न किया जाता है वह और भी प्रबल हो जाता है। ये बाहरी शत्रु अथवा बाध्य-विचार आन्तरिक दलित भावनाओं के, जिन्हें व्यक्ति ने अपना शत्रु बना रखा है, प्रतीक मात्र हैं। इस प्रकार की स्थिति का अन्त करने के लिये आत्म मैत्री का भाव स्थापित करना आवश्यक है।

📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1956 पृष्ठ 11

👉 सजा बनी सीख

🔷 एक राजा था उसके जुल्म करने की भी कोई सीमा नहीं थी। अगर उसे किसी आदमी पर गुस्सा आ जाता तो उसे बड़ी अमानवीय सज़ा दिया कर था।

🔶 एक दिन उसे अपने महामंत्री अरुणेश पर गुस्सा आ गया तो उसने मंत्री को रात भर ठन्डे पानी में खड़े रहने की सज़ा दे दी। अरुणेश बहुत ही बुद्धिमान व्यक्ति था। वह सोचने लगा कि क्या तरीका हो सकता है कि राजा को सबक मिल सके और खुद वो इस सज़ा से भी बच जाये।

🔷 अचानक उसके दिमाग में एक युक्ति आ गयी और जब शाम के वक़्त राजा ने अरुणेश को सज़ा देने के लिए बुलाया तो अरुणेश चेहरे पर मुस्कान लिए राजा के पास पहुंचा तो राजा ने उसे ठन्डे पानी में जाने के लिए इशारा किया लेकिन उसने देखा कि महामंत्री के चेहरे पर बिलकुल भी शिकन या भय नहीं है जबकि वो तो ख़ुशी से झूम रहा है जैसे उसके लिए ये कोई अच्छा अवसर हो।

🔶 हैरान राजा ने उस से पूछ ही लिया कि तुम इतना प्रसन्न किस वजह से जबकि मेने तुम्हे ये सज़ा दी है क्या तुम्हे डर नहीं लग रहा इस पर महामंत्री ने राजा से कहा इसमें डरने वाली कौन सी बात है मेरे लिए तो ये एक तरह से बहुत अच्छा ही है क्योंकि राज वैद्य ने मुझे बताया है कि जल्दी गुस्सा हो जाने वाले व्यक्ति समय से पहले बुढ़ापा पा लेते है और ठन्डे पानी में खड़े रहना इसका सर्वोत्तम उपाय है  इसलिए मेरे लिए तो ये फायदेमंद ही होगा क्योंकि मैं भी तो बहुत अधिक गुस्सा करता हूँ।

🔷 राजा को चिंता हुई उसने सोचा बात तो इसकी भी वाजिब है क्योंकि मैं भी तो बहुत गुस्सा करता हूँ इसलिए उसने महामंत्री को जाने से रोक दिया और कहने लगा तुम नहीं जाओगे मैं आज की रात ये उपचार लूँगा क्योंकि राजा को बुढ़ापे का भय था।

🔶 थोडा समय बीता राजा को ठण्ड लगने लगी लेकिन जवानी के लालच में वो खड़ा रहा। लेकिन फिर थोड़ी देर बाद ही उसे ख्याल आया की ठन्डे पानी में खड़े रहकर भला कौन सी जवानी हासिल होती है जबकि व्यक्ति इसमें तो बीमार हो सकता है और अधिक देर तक खड़े रहने के बाद उसकी मौत भी हो सकती है। सहसा उसे अपनी भूल का अहसास हो गया कि मैं भी लोगो को ऐसी सज़ा देता हूँ तो उन्हें भी तो कितनी पीड़ा होती होगी। शायद इसी लिए अरुणेश ने मुझे शिक्षा देने के लिए ये कहा होगा।

🔷 राजा को अपनी गलती का अहसास हो गया और उसने महामंत्री को बुलाकर उससे क्षमा मांगी और भविष्य में ऐसे अजब गजब आदेश नहीं देने का वचन भी दिया।

http://awgpskj.blogspot.com/2016/08/blog-post_2.html

👉 आज का सद्चिंतन 13 June 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 June 2018

मंगलवार, 12 जून 2018

👉 अखण्ड-ज्योति परिवार

🔶 कष्ट पीड़ित, कामनाग्रस्त, ऋद्धि सिद्धि के आकाँक्षी, स्वर्ग मुक्ति के फेर में पड़े हुए, विरक्त , निराश व्यक्ति भी हमारे संपर्क में आते रहते हैं। ऐसे कितने ही लोगों से हमारे सम्बन्ध भी हैं, पर उनसे कुछ आशा हमें नहीं रहती। जो अपने निजी गोरखधन्धे में इतने अधिक उलझे हुए हैं कि ईश्वर, देवता, साधु, गुरु किसी का भी उपयोग अपने लाभ के लिए करने का ताना-बाना बुनते रहते हैं, वे बेचारे सचमुच दयनीय हैं। जो लेने के लिए निरन्तर लालायित हैं, उन गरीबों के पास देने के लिए है ही क्या? देगा वह—जिसका हृदय विशाल है, जिसमें उदारता और परमार्थ की भावना विद्यमान है। समाज, युग, देश, धर्म, संस्कृति के प्रति अपने उत्तरदायित्व की जिसमें कर्तव्य-बुद्धि जम गई होगी—वही लोक-कल्याण की बात सोच सकेगा और वही वैसा कुछ कर सकेगा। आज के व्यक्ति वादी, स्वार्थ परायण युग में ऐसे लोग चिराग लेकर ढूँढ़ने पड़ेंगे। पूजा उपासना के क्षेत्र में अनेक व्यक्ति अपने आपको अध्यात्म-वादी कहते मानते रहते हैं पर उनकी सीमा अपने आप तक ही सीमित है। इसलिए तत्वतः वे भी संकीर्ण व्यक्ति वादी ही कहे जा सकते हैं।

🔷 हमारी परम्परा पूजा उपासना की अवश्य है पर व्यक्ति बाद की नहीं। अध्यात्म को हमने सदा उदारता, सेवा और प्रस्ताव की कसौटी से कसा है और स्वार्थी को खोटा एवं परमार्थी को खरा कहा है। अखण्ड-ज्योति परिवार में दोनों ही प्रकार के खरे-खोटे लोग मौजूद हैं। अब इनमें से उन खरे लोगों की तलाश की जा रही है जो हमारे हाथ में लगी हुई मशाल को जलाये रखने में अपना हाथ लगा सकें, हमारे कंधे पर लदे हुए बोझ को हलका करने में अपना कंधा लगा सकें। ऐसे ही लोग हमारे प्रतिनिधि या उत्तराधिकारी होंगे। इस छाँट में जो लोग आ जावेंगे उनसे हम आशा लगाये रहेंगे कि मिशन का प्रकाश एवं प्रवाह आगे बढ़ाते रहने में उनका श्रम एवं स्नेह अनवरत रूप से मिलता रहेगा। हमारी आशा के केन्द्र यही लोग हो सकते हैं। और उन्हें ही हमारा सच्चा वात्सल्य भी मिल सकता है। बातों से नहीं काम से ही किसी की निष्ठा परखी जाती है और जो निष्ठावान् हैं उनको दूसरों का हृदय जीतने में सफलता मिलती है। हमारे लिए भी हमारे निष्ठावान् परिजन ही प्राणप्रिय हो सकते हैं।

🔶 लोक सेवा की कसौटी पर जो खरे उतर सकें, ऐसे ही लोगों को परमार्थी माना जा सकता है। आध्यात्मिक पात्रता इसी कसौटी पर परखी जाती है। हमारे उस देव ने अपनी अनन्त अनुकम्पा का प्रसाद हमें दिया है। अपनी तपश्चर्या और आध्यात्मिक पूँजी का भी एक बड़ा अंश हमें सौंपा है। अब समय आ गया जब कि हमें भी अपनी आध्यात्मिक कमाई का वितरण अपने पीछे वालों को वितरित करना होगा। पर यह क्रिया अधिकारी पात्रों में ही की जायगी, यह पात्रता हमें भी परखनी है और वह इसी कसौटी पर परख रहे हैं कि किस के मन में लोक सेवा करने की उदारता विद्यमान है। इसी गुण का परिचय देकर किसी समय हमने अपनी पात्रता सिद्ध की थी अब यही कसौटी उन लोगों के लिए काम आयेगी जो हमारी आध्यात्मिक पूँजी के लिए अपनी दावेदारी प्रस्तुत करना चाहेंगे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1964 पृष्ठ 50-51

👉 Concentration – an essential pre-requisite for spiritual unfoldment (Part 1)

🔶 The reflection cannot be seen clearly in disturbed and muddled surface of water. In the same way, so long as the mind is unstable, the inner self cannot be felt. Therefore, with the help of sadhana, one should try to steady the mind. Sadhana will purify the innerself and with increase in purity, concentration will also increase.

🔷 Therefore, patiently, one should engage the mind in sadhana and should try to make it quite gradually. Without controlling the mind, a sadhak cannot succeed in sadhana. Psychologists say that in a state of calm and quiet mind a great subtle energy field emerges from the deep recesses of the soul. It is very difficult for the ordinary people to get a feel of this energy field.

🔶 A disciplined mind helps in physical, mental and spiritual well-being. Among the various types of yogas, for example, karmayoga, bhaktiyoga, layayoga, hathayoga, ragayoga, tapayoga, etc., only japayoga is the simplest and most practical. Japa (recitation) of a mantra helps in achieving concentration.

📖 Akhand Jyoti Mar-2002

👉 वेष-भूषा की मनोवैज्ञानिक कसौटी (भाग 1)

🔶 एक दो नहीं संपूर्ण 6 वर्ष तक उसने पार्कों, थियेटरों, छविग्रहों और दूसरे-दूसरे सार्वजनिक स्थानों के चक्कर काटे। एक नहीं हजारों फोटोग्राफ लिये और जिस। जिस के फोटोग्राफ लिये उन-उन के व्यक्तिगत जीवन का परिचय और अध्ययन किया। सोचते होंगे होगा कोई व्यर्थ के कामों में समय गंवाने वाला फक्कड़, पर नहीं वह हैं लन्दन के एक प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक— श्रीनेक हेराल्ड जिन्होंने इतने वर्ष के अध्ययन से महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह निकाला कि वेष-भूषा का मनुष्य के चरित्र, स्वभाव, शील और सदाचार से गहनतम सम्बन्ध है।

🔷 पुरुषों की तरह की वेष-भूषा धारण करने वाली नवयुवतियों का मानसिक चित्रण और उनके व्यवहार की जानकारी देते हुए श्री हेराल्ड लिखते हैं—ऐसी युवतियों की चाल-ढाल, बोल-चाल, उठने-बैठने के तौर तरीकों में भी पुरुष के से लक्षण प्रकट होने लगते हैं। वे अपने आप को पुरुष सा अनुभव करती हैं जिससे उनके लज्जा आदि नारी सुलभ गुणों का ह्रास होने लगता है। स्त्री जब स्त्री न रह कर पुरुष बनने लगती है तब वह न केवल पारिवारिक उत्तरदायित्व निबाहने में असमर्थ हो जाती है वरन् उसके वैयक्तिक जीवन की शुद्धता भी धूमिल पड़ने लगती है। पाश्चात्य देशों में दाम्पत्य जीवन में उग्र होता हुआ अविश्वास उसी का एक दुष्परिणाम है।”

🔶 श्री हेराल्ड ने अपना विश्वास व्यक्त किया कि भारतीय आचार्यों ने वेष-भूषा के जो नियम और आचार बनायें वह केवल भौगोलिक अनुकूलता ही प्रदान नहीं करते वरन् स्त्री-पुरुषों की शारीरिक बनावट का दर्शक पर क्या प्रभाव पड़ता है उस सूक्ष्म विज्ञान को दृष्टि में रखकर भी बनाये गये हैं वेष-भूषा का मनोविज्ञान के साथ इतना बढ़िया सामंजस्य न तो विश्व के किसी देश में हुआ न किसी संस्कृति में, यह भारतीय आचार्यों की मानवीय प्रकृति के अत्यन्त सूक्ष्म अध्ययन का परिणाम था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 83

👉 कठिनाइयों का अन्त कैसे हो?

🔶 जो व्यक्ति अपने आपको जितना महान समझता है उसके शत्रु भी उतने ही अधिक होते हैं। महानता का भाव एक प्रकार का मानसिक रोग है। जो व्यक्ति अपने आपको महान समझता है वह अंतर्मन से असन्तुष्ट रहता है। उसके मन में भारी अन्तर्द्वन्द्व होता रहता है। वह बड़े-बड़े काम का आयोजन करता है। उसके सभी काम असामान्य होते हैं। वह संसार को ही गलत मार्ग पर चलते हुए देखता है और उसके सुधार करने की धुन में लग जाता है।

🔷 महानता के भाव से प्रेरित कोई व्यक्ति अपने प्रतिद्वन्द्वी पर भौतिक विजय प्राप्त करने की चेष्टा करता है और कोई नैतिक। नैतिक विजय में वह अपने शत्रु को मित्र बनाने में भी समर्थ न होता परन्तु संसार में उसको पद पर से गिराने में समर्थ होता है। इस प्रकार जितने लोगों को वह नैतिक दृष्टि से संसार में नीचा सिद्ध करने की चेष्टा करता है, वे सब उसके शत्रु बन जाते हैं। इन शत्रुओं की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जाती है परन्तु शत्रुओं की संख्या बढ़ती हुई देखकर उसे कोई आश्चर्य नहीं होता। वह समझता है कि उसके उच्चादर्श का समाज द्वारा विरोध होना स्वाभाविक ही है।

🔶 जब तक इन शत्रुओं से लड़ने को वह अपने आप में सामर्थ्य पाता है, वह कुछ न कुछ रचनात्मक काम में लगा रहता है। इस प्रकार वह संसार का कल्याण करने में समर्थ होता है। पर जब अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने की उसकी आशा निराशा में बदल जाती है तो वह विक्षिप्त अथवा निराश पापी मनोवृत्ति का हो जाता है।

📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1956 पृष्ठ 11

👉 गुरुगीता (भाग 128)

👉 सर्वसंकटहारिणी गुरूगीता की मंत्र साधना

🔶 विष्णु शंकर सामान्य गृहस्थ थे। उनकी जीवन यात्रा सामान्य जनों की भाँति साधारण चल रही थी। घर- परिवार की मामूली उलझनों के साथ सब कुछ ठीक था। थोड़े बहुत उतार- चढ़ाव तो आते थे, पर अभी तक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था जिसे अघटित कहा जा सके। पर दैव का कोप कहें या दुर्विपाक, एकाएक सब कुछ उलट- पुलट गया। समय का फेर जिन्दगी में होता है, ऐसा लगने लगा। ग्रहों की क्रूर दशा साफ नजर आने लगी। खेती, घर, काम- काज, रिश्तों का संसार, सब कहीं टुटन- दरारें नजर आने लगी। हानि, षडयन्त्र और अपमान से विष्णु शंकर का जीवन घिर गया। वह क्या करें, कैसे करे, कहाँ जाय कुछ भी नहीं सूझ रहा था।

🔷 यहाँ तक कि हमेशा शांत एवम् स्वस्थ रहने वाले विष्णु शंकर चिड़चिड़े ,अन्यमनस्क, उदासीन एवं अवसादग्रस्त रहने लगे। विपरीत परिस्थितियों का प्रचण्ड वेग उन्हें असहाय बनाने लगा। ऐसी असहायता में उन्हें यदा- कदा आत्महत्या के विचार घेर लेते। अकेले बैठेकर वह फुट- फुटकर रोते रहते। कभी- कभी शिवालय जाकर भगवान शिव की लिंगमूर्ति के सामने बिलख उठते, परंतु उपाय नदारत था। अब तो असहा आर्थिक हानि के कारण भुखे- मरने की नौबत आ पहुँची थी। परन्तु कोई उपाय न था।

🔶 पर उस दिन सोते समय उन्होंने सपने में देखा कि एक श्रेव्त केश दाढ़ी एवं देदीप्यमान चेहरे वाले ऋषि उन्हें सान्त्वना देते हुए कह रहे है -धैर्य रखो पुत्र! यह पुर्वजन्म के कर्मों के कारण आया दुर्विपाक है। इस जीवन में तुमने ऐसे कोई काम नहीं किए, जिसका तुम्हें इतना कठोर दण्ड मिलता। पर कर्म तो कर्म होते है, इस जीवन के हों या पिछले जीवन के, भोगने तो पड़ते ही है, धैर्य रखो और कठिन तप में अपने को प्रवृत करो। तुम्हारे कठोर तप के प्रभाव से यह अंधेरा छिन्न- भिन्न हो जाएगा, पर तप का आधार क्या हो? अंतस में यह अनुगूँज उठी। यह अनुगूँज देर तक रहती इसके पहले ही ऋषि ने कहा- गुरुगीता भगवान शिव की वाणी है। शिवमुख से उच्चारित होने के कारण यह परम मंत्र है। इसमें असीम ऊर्जा समायी है। इसे ही अपने तप का आधार बनाओ।

🔷 उस दिव्य स्वप्र में ही उन ऋषि ने उन्हें तप की प्रकिया समझा दी। चन्द्रायण व्रत, नियमित गायत्री जप और गुरुगीता जप और गुरुगीता का पाठ अनुष्ठान, उन ऋषि ने मस्तक पर हाथ रखा। उनके दिव्य स्पर्श से विष्णुशंकर के मन का अवसाद जाता रहा। निद्रा से जगकर उन्हें चैतन्यता लग रही थी। मन हल्का था और उनमें तप का उत्साह संचारित हो रहा था। अगले दिन गुरुवार था। गुरुवार- गुरुचेतना के स्मरण का पुनीत क्षण है। ऐसा समझते हुए उन्होंने इस पावन क्षण में जो पुष्य नक्षत्र से भी जुड़ा था। ऐसे गुरुपुष्य योग में विष्णु शंकर ने अपनी तप साधना आरम्भ कर दी।

🔶 हालांकि परिस्थितियों में अभी भी अपमान, षड़यंत्र ,हानि एवं कुचक्रों के प्रबल झंझावात उठ रहे थे। पर अब मन:स्थिति भिन्न थी, उसमें तप के लिए प्रबल उत्साह था और दैवी सहायता पर प्रबल विश्वास भी। इसी विश्वास की पूँजी के साथ तप की अंतर्धारा बह चली। दिवस, मास बीतने लगे। छ: महीने तक तो परिस्थितियों में किसी तरह का कोई परिवर्तन नहीं दिखाई दिया, परन्तु छह महीने बाद घने अँधेरे में प्रकाश की किरणें फुटने लगी। इतना हुआ कि भूखे मरने की नौबत समाप्त हुई। बाहर अपमान एवं व्यंग के अवसर कम होने लगे सघन अँधेरे में यह उजाले की वृष्टि बढ़ती गयी। गुरुगीता ने उन्हें आश्रय, आश्र्वासन एवं सुफल सभी कुछ दिया। अब वह अनुभव कर रहे थे कि गुरुगीता दुष्कर संकटों का सार्थक समाधान है, जो संकटों के पाश से पाश से मुक्त कर गुरुभक्ति ईश्वरनिष्ठा का वरदान देती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 193