गुरुवार, 19 अक्तूबर 2017

👉 देवत्व विकसित करें, कालनेमि न बनें (भाग 7)

🔴 कुछ नई स्कीम है, जो आज गुरुपूर्णिमा के दिन कहना है और वह यह है कि प्रज्ञा विद्यालय तो चलेगा यहीं, क्योंकि केन्द्र तो यही है, लेकिन जगह-जगह प्रज्ञा पाठशालाओं की स्थापना हमें करनी है। इसके लिए आप सब जितने भी आदमी हैं, उनको एक काम सौंपते हैं। एक महीने की प्रज्ञा पाठशालाएँ तो यहीं होंगी, पर पन्द्रह दिन की पाठशाला क्षेत्रों में शक्तिपीठों पर चलेंगी। यहाँ बड़े साइज का प्रमाण-पत्र उत्तीर्ण होने पर दिया जाता है, पर वहाँ छोटे साइज का दिया जाएगा। परीक्षा ली जाएगी और वहाँ भी हम नेता बनाएँगे। आपको हम हिन्दुस्तान का ही नहीं, सारे विश्व का नेता बनाने वाले हैं। हिन्दुस्तान में हमने दस-दस गाँवों के खण्ड काटे हैं और उन्हें एक-एक व्यक्ति के सुपुर्द किया है और कहा कि आप अपने यहाँ प्रज्ञा पाठशालाएँ चलाएँ। पिछले साल आप लोगों ने हमारे कहने पर किसी ने यज्ञ किए, किसी ने शक्तिपीठ बनाए, किसी ने क्या किया, हजारों काम बताए और लोगों ने किए हैं। इस वर्ष अब आप सब लोग यह विचार लेकर जाएँ कि या तो हम प्रज्ञा पाठशाला चलवाएँगे। इस कार्य में कोई रुकावट नहीं आवेगी।
      
🔵 आज गुरुपूर्णिमा के दिन से आप लोग एक काम यह करना कि हमेशा यह अनुभव करना कि आप देवता हैं। रीछ-बन्दर का लिवास पहने बैठे हैं। कोई कुर्ता पहने बैठा है, कोई धोती पहने बैठा है, कोई चश्मा लगाए बैठा है, तो कोई कुछ किए बैठा है, पर आप हैं वास्तव में देवता, जो किसी खास काम के लिए, खास उद्देश्य के लिए, किसी खास निमन्त्रण पर आप काम करने के लिए आए हैं। यह हुई बात नम्बर एक। दो, जो आपको मुश्किल जान पड़ती है कि संसार में से बुराइयाँ कैसे दूर होंगी और बुराईयों की वृद्धि कैसे दूर होंगी और अच्छाइयों की वृद्धि कैसे होगी? इस सम्बन्ध में नोस्ट्राडेमस की राजनीतिक भविष्यवाणी तो हमने बता दी है और अब अपनी स्वयं की भविष्यवाणी बताते हैं कि हमने आपके बैरियों को दुश्मनों को मार दिया है।

🔴 वे मरे हुए रखे हैं और आपके लिए श्रेय जीवित हैं, सौभाग्य जीवित है। आपके लिए मुकुट जीवित है, बड़प्पन जीवित है, आप उस बड़प्पन को उठा लेना। आज आपसे तीसरी बात यह कहनी थी कि नालन्दा विश्वविद्यालय बनाने का हमने संकल्प लिया था कि एक लाख कार्यकर्ता हम देश को, समाज को, विश्व को देंगे। इस काम में आप लोग हमारी मदद कीजिए, और पन्द्रह-पन्द्रह दिन के लिए अपने यहाँ प्रज्ञा पाठशाला चलाने के लिए कोशिश कीजिए। हम वहाँ पढ़ाने के लिए तो नहीं आएँगे, पर अपनी शक्ति देंगे, अपनी बुद्धि देंगे, अपनी भावना देंगे, अपना प्राण देंगे, अपना जीवट देंगे—सब चीज देंगे, इसलिए जब आदमी जाएगा तो कुछ का कुछ होकर जाएगा।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

बुधवार, 18 अक्तूबर 2017

👉 देवत्व विकसित करें, कालनेमि न बनें (भाग 6)

🔴 यह तो नमूने के लिए बता रहा हूँ। उसकी ऐसी भविष्यवाणियाँ कवितामय पुस्तक में लिपिबद्ध हैं, जिसे फ्रान्स के राष्ट्रपति मितरॉ सिरहाने रखकर सोया करते हैं। उस कवितामय पुस्तक पर हजारों आदमियों ने टिप्पणियाँ की हैं। उसी में से एक आप अखण्ड-ज्योति अगले अंक में पढ़ेंगे, जो उसने हिन्दुस्तान के बारे में की है। उसकी भविष्यवाणी है कि हिन्दुस्तान का अध्यात्म और पाश्चात्य का तत्व-विज्ञान यह दोनों आपस में मिल जाएँगे, पाश्चात्य भौतिक विज्ञान और अध्यात्म मिल जाएँगे, रूस और हिन्दुस्तान मिल जाएँगे, चीन से अमेरिका की लड़ाई हो जाएगी, आदि-आदि बहुत-सी भविष्यवाणियाँ हैं।
      
🔵 उन बहुत-सी भविष्यवाणियों में से आपके काम की एक ही है कि हिन्दुस्तान सारी दुनिया का नेतृत्व करेगा, जैसा कि आजकल अमेरिका कर रहा है। चाहे वह बम बनाए, चैलेंजर बनाए, स्टारवार की योजना बनाए, किन्तु बाद का नेतृत्व भारत करेगा। हिन्दुस्तान को सारी दुनिया का नेतृत्व करने के लिए बड़े कर्मठ व्यक्ति चाहिए, बड़े शक्तिशाली और क्षमता सम्पन्न व्यक्ति चाहिए, बड़े लड़ाकू योद्धा चाहिए, बड़े इंजीनियर चाहिए, बड़े-बड़े समर्थ आदमी चाहिए और वही मैं तलाश कर रहा हूँ। बेटे, तुममें योग्यता नहीं है तो तुम्हें योग्यता हम देंगे। तुम्हारी खेती-बाड़ी को ही नहीं सँभालूँगा, वरन् योग्यता भी दूँगा, ताकि तुम संसार का नेतृत्व कर सको।

🔴 नालन्दा विश्वविद्यालय के तरीके से हमने यहाँ नेता बनाने का एक विद्यालय बनाया है। नालन्दा विश्वविद्यालय में चाणक्य जहाँ पढ़ाता था, उसमें दस हजार विद्यार्थी पढ़ते थे एक साथ। हमारी भी इच्छा है कि हम दस हजार विद्यार्थी एक साथ पढ़ाएँ, पर यहाँ इतने विद्यार्थियों के लिए जगह नहीं है। अभी यहाँ कल तक साढ़े अट्ठाइस सौ आदमी थे, आज चार हजार से अधिक व्यक्ति नहीं आ सकते, जबकि हमारा मन है कि जिस तरीके से चाणक्य दस हजार आदमियों को पढ़ाता था और पढ़ाकर के हिन्दुस्तान से लेकर सारे विश्व में अपने आदमी भेजता था। चन्द्रगुप्त को उसने चक्रवर्ती राजा बनाया था। हमारी भी इच्छा है कि ऐसे-ऐसे नेता बनाएँ, पर बना नहीं सकते, क्योंकि जगह हमारे पास कम है। ऐसे में पढ़ा नहीं सकते, तो फिर क्या योजना है?
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 आस्तिक बनो (भाग 2)

🔴 बुरा काम करने वाला पहले यह भली प्रकार देखता है कि मुझे देखने वाला या पकड़ने वाला तो कोई यहाँ नहीं है। जब वह भली-भाँति विश्वास कर लेता है कि उसका पाप कर्म किसी भी दृष्टि या पकड़ में नहीं आ रहा है तभी वह अपने काम में हाथ डालता है। इसी प्रकार जो व्यक्ति अपने का परमात्मा की दृष्टि या पकड़ से बाहर मानते हैं वे ही दुष्कर्म करने को उद्यत हो सकते हैं। पाप कर्म करने का स्पष्ट अर्थ यह है कि यह व्यक्ति ईश्वर का मानने का दंभ भले ही करता हो पर वास्तव में वह परमात्मा के आस्तित्व से इनकार करता है। उसके मन को इस बात पर भरोसा नहीं है कि परमात्मा यहाँ मौजूद है।

🔵 यदि विश्वास होता तो इतने बड़े हाकिम के सामने किस प्रकार उसके कानूनों का तोड़ने का साहस करता है। जो व्यक्ति एक पुलिस के चपरासी को देखकर भय से थर-थर कापा करते हैं वे लोग इतने दुस्साहसी नहीं हो सकते कि परमात्मा जैसे सृष्टि के सर्वोच्च अफसर की आँखों के आगे, न करने योग्य काम करें, उसके कानून को तोड़े, उसको क्रुद्ध बनावें, उसका अपमान करें। ऐसा दुस्साहस तो सिर्फ वही कर सकता है जो यह समझता हो कि ‘परमात्मा’ कहने, सुनने भर की चीज है। वह पोथी पत्रों में मन्दिर मठों में नदी, तालाबों में या कहीं स्वर्ग नरक में भले ही रहना चाहेगा, पर हर जगह वह नहीं है। मैं उसकी दृष्टि और अकड़ से बाहर हूँ।

🔴 जो लोग परमात्मा की सर्व व्यापकता पर विश्वास नहीं करते, वे ही नास्तिक है। जो प्रकट या अप्रकट रूप से दुष्कर्म करने का साहस कर सकते हैं वे ही नास्तिक हैं। इन नास्तिकों में कुछ तो भजन पूजा बिल्कुल नहीं करते, कुछ करते हैं। जो ही करते ही वे सोचते हैं व्यर्थ का झंझट मोल लेकर उसमें समय गंवाने से क्या फायदा? जो पूजन भजन करते हैं वे भीतर से तो न करने वालों के समान ही होते हैं पर व्यापार बुद्धि से रोजगार के रूप में ईश्वर की खाल ओढ़ लेते हैं। कितने ही लोग ईश्वर के नाम के बहाने ही अपने जीविका चलाते हैं हमारे देश में करीब 56 लाख आदमी ऐसे हैं जिनकी कमाई पेशा, रोजगार ईश्वर के नाम पर है।

🔵 यदि वे यह प्रकट करें कि हम ईश्वर को नहीं मानते तो उसी दिन उनकी ऐश आराम देने वाली बिना परिश्रम की कमाई हाथ से चली जायेगी। इसलिए इन्हें ईश्वर को उसी प्रकार ओढ़े रहना पड़ता है। जैसे जाड़े से बचने के लिए गर्मी देने वाले कम्बल को ओढ़े रहते हैं जैसे ही वह जरूरत पूरी हुई वैसे ही कम्बल को एक कोने में पटक देते हैं। यह तिजारती लोग जनता के समझ अपनी ईश्वर भक्ति का बड़ा भारी घटाटोप बाँधते हैं क्योंकि जितना बड़ा घटाटोप बाँध सकेंगे उतनी ही अधिक कमाई होगी। तिजारती उद्देश्य पूरा होते ही वे अपने असली रूप में आ जाते हैं। पापों से खुलकर खेलते हुए एकान्त में उन्हें जरा भी झिझक नहीं होती।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- दिसम्बर 1945 पृष्ठ 3

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1945/December/v1.3

👉 आज का सद्चिंतन 17 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 Oct 2017


मंगलवार, 17 अक्तूबर 2017

👉 रास्ते की बाधा....

🔴 बहुत पुराने समय की बात है एक राज्य के राजा ने अपने राज्य के मुख्य दरवार पर एक बड़ा सा पत्थर रखवा दिया इस पत्थर के रखवाने का मुख्य कारण था  राजा अपने राज्य के लोगों की परीक्षा लेना चाहता था राजा अपने राज्य के लोगों की सोच को परखना चाहता था। राजा उस पत्थर से कुछ दूरी पर छुपकर यह देखने लगा के आखिर इस पत्थर को कोई रास्ते से हटाएगा जा नहीं। बहुत सारे लोग वहां से गुजरे वो सभी उस पत्थर को हटाने की वजाय वो रास्ते में पत्थर रखने वाले को कोसते रहते और वहां से चले जाते। अब तक किसी ने भी उस पत्थर को हटाने का प्रयास तक नहीं किया था।

🔵 काफ़ी दिनों तक वो पत्थर वही पड़ा रहा अचानक एक दिन वहां से एक लकड़हारा गुजर रहा था उसके कंधे पर लकड़ियों की गठरी लदी हुई थी। रास्ते में पड़े पत्थर को देखते ही उसने लकड़ियों की गठरी को नीचे रख दिया उसने पत्थर को हटाने की कोशिश की परन्तु पत्थर तो काफ़ी भारा था उसने अपने पूरे ज़ोर से पत्थर को हटाने की कोशिश की परन्तु फिर भी उससे पत्थर हट नहीं रहा था। वो कुछ देर के लिए रुक गया परन्तु कुछ देर बाद उसने अपने पूरे जोश और ताकत के साथ उस पत्थर को एक किनारे पर खिसका दिया। जिस किनारे उसने पत्थर को खिसकाया था वहां पर एक छोटे से पत्थर के नीचे एक थैली रखी हुई थी जब उस लकड़हारे ने उस थैली को खोलकर देखा तो उसमें सोने के सिक्के थे और उसमें राजा का लिखा हुआ एक पत्र था उस पत्र में लिखा था “यह सभी सोने के सिक्के इस पत्थर को हटाने वाले को इनाम के रूप में हैं।

🔴 सोने के सिक्के पाकर वो लकडहारा बहुत ख़ुश था और वो ख़ुशी -ख़ुशी वहां से चला गया।

🔵 मित्रो इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है के हम में से ज्यादातर लोग जिन्दगी में आने वाली छोटी -छोटी बाधायों से घबरा जाते हैं और उन्हें दूर करने का प्रयास तक नहीं करते और उस परेशानी का दोष हम दूसरों पर निकालने लगते हैं जैसा के इस कहानी में हुआ दोस्तों मुश्किल कितनी भी बढ़ी क्यों ना हो हमें कभी हार नहीं माननी चाहिए देखना फिर यह बाधाएं कैसे दूर हो जाती हैं और हमारे मार्ग में आने वाली हर मुश्किल या बाधा हमें आगे बढ़ने का अवसर देती हैं।

👉 देवत्व विकसित करें, कालनेमि न बनें (भाग 5)

🔴 दूसरा वह जिसमें हम आपको संसार का नेता बनाना चाहते हैं। हमको भगवान ने नेता बनाकर भेजा है। चाणक्य को नेता बनाकर भेजा था। वह नालन्दा विश्वविद्यालय के डीन थे। अब्राहम लिंकन को, जार्ज वाशिंगटन को, गारफील्ड को नेता बनाकर भेजा था। विनोबा को नेता बनाकर भेजा था। हम भी आपमें से हर एक आदमी को नेता बनाना चाहते हैं, नेता बनाने की हमारी इच्छा है। आपकी इच्छाएँ क्या हैं, यह हमको मालूम हो या न हो तो आप लिखकर दे जाना। हमारा एक क्रम है। जब हम बैठते हैं तब देख लेते हैं। रात में हमारा क्रम पूजा-उपासना का रहता है। सबेरे से लेकर दोपहर तक हम अपना लेख लिखते हैं ताकि अखण्ड ज्योति बीस साल तक बराबर निकलती रहे। बीस साल के लिए लेख और जो पुस्तकें लिखनी हैं, वह हम सब लिखकर रख जाएँगे।
     
🔵 जब यह युगसन्धि समाप्त होगी और सन् २००० आएगा, उस वक्त तक आप यह अनुभव करेंगे कि गुरुजी जो लिखकर गए थे, उनकी लेखनी में कोई फर्क नहीं आया, उनके अक्षरों में कोई फर्क नहीं आया। उनकी पुस्तकों में, पत्रिकाओं में कोई फर्क नहीं आया। मिशन में कोई फर्क नहीं आया है और न ही आएगा। दोपहर बाद तो अब हमने मिलना भी शुरू कर दिया है। पाँच-पच्चीस आदमी को ऊपर बुला भी लेते हैं। यह हमारा दोपहर से शाम तक का क्रम है। इस तरीके से कभी आएँगे तो जब किसी को बहुत जरूरी काम हो तो मिल लेना। सांसारिक कठिनाइयाँ हों तो माताजी से कहिएगा। कोई आध्यात्मिक बात हो या कुछ ऊँचा उठना हो तो हमारे पास आवें। हम आपके बड़े कदम उठाने में मदद करेंगे। हमने इस दुनिया में बड़े कदम उठाए हैं और बड़े कदम उठाने के लिए आपसे भी कहते हैं। दो बातें हो गई है आप ध्यान रखना।

🔴 एक और बात मैं अपने सबूत में आपके बताता हूँ जो विश्व के एक बहुत बड़े भविष्यवक्ता ने सैकड़ों वर्ष पूर्व कही थी। संसार में ऐसे भविष्यवक्ता तो बहुत-से हैं जो हाथ देखकर यह बताते हैं कि तेरा विवाह कब हो आएगा, पैसा कब आएगा, कब क्या हो जाएगा? इसी तरह जन्मपत्री बनाने वाले बहुत-से लोग हैं, किन्तु दुनिया में एक ऐसा व्यक्ति भी हुआ है, जिसने सारे संसार की राजनीति के बारे में लिखा है। जिसमें से आठ सौ भविष्यवाणियाँ सही हो चुकी हैं। एक हजार वर्ष पहले हुआ था, वह था—नोस्ट्राडेमस। उसने ऐसी भविष्यवाणियाँ की थीं, जो एको-एक सौ फीसदी सही हो जाती थीं। ब्रिटेन का तब नामोनिशान नहीं था, जब नोस्ट्राडेमस पैदा हुआ था। स्काटलैण्ड था, आयरलैण्ड था, इंग्लैण्ड था, पर ब्रिटेन नहीं था, लेकिन उसमें लिखा था कि ब्रिटेन बनेगा, इतने दिनों तक राज्य करेगा और सन् १८४२ में इसका सिराजा बिखर जाएगा और अब जितना भी उसका राज्यमण्डल है सब खत्म हो जाएगा। वह सब एक-एक अक्षर सही हुआ।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 आस्तिक बनो (भाग 1)

🔴 परमात्मा सर्वत्र व्यापक है, इस सत्य को जानते तो अनेक लोग हैं पर उसे मानते नहीं। व्यवहार में नहीं लाते। जो परमात्मा को सर्वव्यापी, घट-घट वासी मानेगा, उसका जीवन उसी क्षण पूर्ण पवित्र, निष्पाप और कषाय-कल्मषों से रहित हो जायेगा। गीता में भगवान ने कहा है कि जो मेरी शरण में आता है, जो मुझे अनन्य भाव से भजता है वह तुरन्त ही पापों से छूट जाता है निःसंदेह बात ऐसी ही है। भगवान की शरण में जाने वाला, उस पर सच्चा विश्वास करने वाला, उस पर पूर्ण आस्था रखने वाला, एक प्रकार से जीवन मुक्त ही हो जाता है।

🔵 ईश्वर का विश्वास और सच्चा जीवन एक ही वस्तु के दो नाम हैं। जो भगवान का भक्त है, जिसने तब छोड़ कर प्रभु के चरणों में आत्म समर्पण कर गया है। जो परमात्मा की उपासना करता है उसे जगत-पिता की सर्व व्यापकता पर आस्था जरूर होनी चाहिए। यदि वह विश्वास दृढ़ हो जाय कि भगवान जर्रे-जर्रे में समाया हुआ है, हर जगह मौजूद है तो पाप कर्म करने का साहस ही नहीं हो सकता। ऐसा कौन सा चोर है जो सावधान खड़ी हुई सशस्त्र पुलिस के सामने चोरी करने का साहस करे, चोरी, व्यभिचार, ठगी, धूर्तता, दंभ, असत्य, हिंसा आदि के लिए आड़ की, पर्दे की, दुराव की जरूरत पड़ती है।

🔴 जहाँ मौका होता है इन बुरे कामों को पकड़ने वाला नहीं होता, वहीं इनका किया जाना संभव है। जहाँ धूर्तता की भली प्रकार समझने वालों देखने वाले और पकड़ने वाले लोगों की मजबूत ताकत सामने खड़ी होती है। वहाँ पाप कर्मों का हो सकना संभव नहीं। इसी प्रकार जो इस बात पर सच्चे मन से विश्वास करता है कि परमात्मा सब जगह मौजूद है वह किसी भी दुष्कर्म के करने का साहस नहीं कर सकता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- दिसम्बर 1945 पृष्ठ 3
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1945/December/v1.3

👉 आज का सद्चिंतन 16 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 Oct 2017


👉 जो जाग्रत है, वह नियम के बाहर है

🔴 बुद्ध के जीवन की बड़ी मीठी कथा है। जब उनका जन्म हुआ, तो ज्योतिषियों ने कहा कि यह व्यक्ति या तो सम्राट होगा या संन्यासी होगा। सब लक्षण सम्राट के थे। फिर बुद्ध तो भिक्षु हो गए, संन्यासी हो गए। और सम्राट साधारण नहीं, चक्रवर्ती सम्राट होगा, सारी पृथ्वी का सम्राट होगा।

🔵 बुद्ध एक नदी के पास से गुजर रहे हैं, निरंजना नदी के पास से गुजर रहे हैं। रेत पर उनके चिह्न बन गए, गीली रेत है, तट पर उनके पैर के चिह्न बन गए। एक ज्योतिषी काशी से लौट रहा था। अभी-अभी ज्योतिष पढ़ा है। यह सुंदर पैर रेत पर देख कर उसने गौर से नजर डाली। पैर से जो चिह्न बन गया है नीचे, वह खबर देता है कि चक्रवर्ती सम्राट का पैर है। ज्योतिषी बहुत चिंतित हो गया। चक्रवर्ती सम्राट का अगर यह पैर हो, तो यह साधारण सी नदी के रेत पर चक्रवर्ती चलने क्यों आया? और वह भी नंगे पैर चलेगा कि उसके पैर का चिह्न रेत पर बन जाए! बड़ी मुश्किल में पड़ गया। सारा ज्योतिष पहले ही कदम पर व्यर्थ होता मालूम पड़ा। अभी-अभी लौटा था निष्णात होकर ज्योतिष में। अपनी पोथी, अपना शास्त्र साथ लिए हुए था। सोचा, इसको नदी में डुबा कर अपने घर लौट जाऊं, क्योंकि अगर इस पैर का आदमी इस रेत पर भरी दुपहरी में चल रहा है नंगे पैर–और इतने स्पष्ट लक्षण तो कभी युगों में किसी आदमी के पैर में होते हैं कि वह चक्रवर्ती सम्राट हो–तो सब हो गया व्यर्थ। अब किसी को ज्योतिष के आधार पर कुछ कहना उचित नहीं है।

🔴 लेकिन इसके पहले कि वह अपने शास्त्र फेंके, उसने सोचा, जरा देख भी तो लूं, चल कर इन पैरों के सहारे, वह आदमी कहां है। उसकी शक्ल भी तो देख लूं। यह चक्रवर्ती है कौन, जो पैदल चल रहा है! तो उन पैरों के सहारे वह गया। एक वृक्ष की छाया में बुद्ध विश्राम कर रहे थे। और भी मुश्किल में पड़ गया, क्योंकि चेहरा भी चक्रवर्ती का था, माथे पर निशान भी चक्रवर्ती के थे। बुद्ध की आंखें बंद थीं, उनके दोनों हाथ उनकी पालथी में रखे थे; हाथ पर नजर डाली, हाथ भी चक्रवर्ती का था। यह देह, यह सब ढंग चक्रवर्तियों का, और आदमी भिखारी था, भिक्षा का पात्र रखे, वृक्ष के नीचे बैठा था, भरी दुपहरी में अकेला था।

🔵 हिला कर बुद्ध को उसने कहा कि महानुभाव, मेरी वर्षों की मेहनत व्यर्थ किए दे रहे हैं, सब शास्त्र नदी में फेंक दूं, या क्या करूं? मैं काशी से वर्षों से मेहनत करके, ज्योतिष को सीख करके लौट रहा हूं। और तुममें जैसे पूरे लक्षण प्रगट हुए हैं, ऐसे सिर्फ उदाहरण मिलते हैं ज्योतिष के शास्त्रों में। आदमी तो कभी-कभी हजारों-लाखों साल में ऐसा मिलता है। और पहले ही कदम पर तुमने मुझे मुश्किल में डाल दिया। तुम्हें होना चाहिए चक्रवर्ती सम्राट और तुम यह भिक्षापात्र रखे इस वृक्ष के नीचे क्या कर रहे हो?

🔴 तो बुद्ध ने कहा कि शास्त्रों को फेंकने की जरूरत नहीं है, तुझे ऐसा आदमी दुबारा जीवन में नहीं मिलेगा। जल्दी मत कर, तुझे जो लोग मिलेंगे, उन पर तेरा ज्योतिष काम करेगा। तू संयोग से, दुर्घटनावश ऐसे आदमी से मिल गया है, जो भाग्य की सीमा के बाहर हो गया है। लक्षण बिलकुल ठीक कहते हैं। जब मैं पैदा हुआ था, तब यही होने की संभावना थी। अगर मैं बंधा हुआ चलता प्रकृति के नियम से तो यही हो जाता। तू चिंता में मत पड़, तुझे बहुत बुद्ध-पुरुष नहीं मिलेंगे जो तेरे नियमों को तोड़ दें। और जो अबुद्ध है, वह नियम के भीतर है। और जो अजाग्रत है, वह प्रकृति के बने हुए नियम के भीतर है। जो जाग्रत है, वह नियम के बाहर है।

सोमवार, 16 अक्तूबर 2017

👉 देवत्व विकसित करें, कालनेमि न बनें (भाग 4)

🔴 श्रीकृष्ण ने अर्जुन का रथ चलाया था, आपका रथ हम चलाएँगे। काहे का रथ? आपके कारोबार का रथ, आपके व्यापार का रथ? आपके धन्धे का रथ, आपके शरीर का रथ, आपकी गृहस्थी का रथ-यह सब हम चलायेंगे, इसका हम वायदा करते हैं, लेकिन साथ-साथ आपसे यह निवेदन भी करते हैं कि आप हमारे रास्ते पर आइए, साथ-साथ चलिए। हमारे कन्धे से कन्धा मिलाइए। इसमें आपको कोई नुकसान नहीं होगा। आप यह यकीन रखिए हमने उन विरोधियों को मारकर रखा है और विजय की माला आपके लिए गूँथकर रखी है। पाँचों पाण्डवों के लिए विजय की मालाएँ बनी हुई रखी थीं। आपको पहनना है, आपको श्रेय भर लेना है।
    
🔵 यह जो नवयुग का क्रम चल रहा है, उसमें जब आप भागीदार होंगे तो श्रेय आपको ही मिलेगा। आप पूछें-गुरुजी हमारे बीबी-बच्चों का क्या होगा? बेटे, उनकी जिम्मेदारी हमारी है। यदि वे बीमार रहते हैं तो हम उनकी बीमारियाँ दूर कर देंगे। व्यापार में नुकसान होता है तो तेरे उस नुकसान को पूरा करना हमारी जिम्मेदारी है। तेरे व्यापार में जो घाटा पड़ जाए तो तू हमसे वसूल ले जाना। लेकिन जब बच्चा बड़ा हो जाता है, तब कुछ बड़ी चीज दी जाती है जो छोटे बच्चे को नहीं दी जा सकती। अब आप जवान हो गए हैं। अब हम सबको काम-धन्धे से लगाएँगे और जो हमारे पास बाकी बचा है वह भी आप सबको बाँट देंगे। नहीं गुरुजी, जब आप जाएँगे तब अपनी कमाई भी अपने संग ले जाएँगे? बेटे, हम ऐसा नहीं करेंगे। हम आपको देकर जाएँगे। चाहे वह पुण्य की कमाई हो, चाहे वह सांसारिक कमाई हो, चाहे आध्यात्मिक कमाई हो। उस कमाई में तुम्हारा हिस्सा है।

🔴 साथियो ! हमने जीवन भर दिया है। बाप-दादों की दो हजार बीघे जमीन थी, वह हम दे आए और स्त्री के पास जेवर था, वह भी हम दान में दे आए। बच्चों की गुल्लक में पैसे थे वह भी हम दे आए। अब आपके पास कुछ और धन है? नहीं बेटे, धन के नाम पर एक कानी कौड़ी का लाखवाँ हिस्सा भी हमारे पास नहीं है। आपको तलाशी लेना हो या मरने के बाद पता लगाना हो कि गुरुजी के पास क्या मिला, तो मालूम पड़ेगा कि शान्तिकुञ्ज में एक ऋषि रहा करता था और यहाँ की रोटी खाया करता था। बेटे, धन के नाम पर हमारे पास कुछ भी नहीं है, लेकिन हाँ एक पूँजी है हमारे पास, यदि वह न होती तो हम इतनी बड़ी बात क्यों कहते? हमारे पास वह पूँजी है तप की, जिसको हम सामान्य क्लास का कहते हैं। जिससे हम आपकी मुसीबतों में, कठिनाइयों में सहायता कर सकते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 सौभाग्य भरे क्षणों को तिरस्कृत न करें

🔴 ईश्वर ने मनुष्य को एक साथ इकट्ठा जीवन न देकर उसे अलग−अलग क्षणों में टुकड़े−टुकड़े करके दिया है। नया क्षण देने से पूर्व वह पुराना वापिस ले लेता है और देखता है कि उसका किस प्रकार उपयोग किया गया। इस कसौटी पर हमारी पात्रता कसने के बाद ही वह हमें अधिक मूल्यवान क्षणों का उपहार प्रदान करता है।।

🔵 समय ही जीवन है। उसका प्रत्येक क्षण बहुमूल्य है। वे हमारे सामने ऐसे ही खाली हाथ नहीं आते वरन् अपनी पीठ कीमती उपहार लादे होते हैं। यदि उनकी उपेक्षा की जाय तो निराश होकर वापिस लौट जाते है किन्तु यदि उनका स्वागत किया जाय तो उन मूल्यवान संपदाओं को देकर ही जाते है किन्तु यदि ईश्वर ने अपने परम प्रिय राजकुमार के लिए भेजी है।

🔴 जीवन का हर प्रभात सच्चे मित्र की तरह नित नये अनुदान लेकर आता है। वह चाहता है उस दिन का शृंगार करने में इस अनुदान के किये गये सदुपयोग को देख कर प्रसन्नता व्यक्त करें।

🔵 उपेक्षा और तिरस्कार पूर्वक लौटा दिये गये जीवन के क्षण−घटक दुखी होकर वापिस लौटते हैं। आलस्य और प्रमाद में पड़ा हुआ मनुष्य यह देख ही नहीं पाता कि उसके सौभाग्य का सूर्य दरवाजे पर दिन आता है और कपाट बन्द देख कर निराश वापिस लौट जाता है।

🌹 रवीन्द्रनाथ टैगोर
🌹 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 1974 पृष्ठ 1

👉 आज का सद्चिंतन 16 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 Oct 2017


👉 क्रोध से बचिये:-

🔴 विश्वामित्र का महर्षि वशिष्ठ से झगड़ा था। विश्वामित्र बहुत विद्वान थे। बहुत तप उन्होंने किया। पहले महाराजा थे, फिर साधु हो गये। वशिष्ठ सदा उनको राजर्षि कहते थे।

🔵 विश्वामित्र कहते थे, "मैंने ब्राह्मणों जैसे सभी कर्म किये हैं, मुझे ब्रह्मर्षि कहो।"

🔴 वसिष्ठ मानते नहीं थे; कहते थे, "तुम्हारे अंदर क्रोध बहुत है, तुम राजर्षि हो।"

🔵 यह क्रोध बहुत बुरी बला है। सवा करोड़ नहीं, सवा अरब गायत्री का जाप कर लें, एक बार का क्रोध इसके सारे फल को नष्ट कर देता है।

🔴 विश्वामित्र वास्तव में बहुत क्रोधी थे। क्रोध में उन्होंने सोचा,'मैं इस वसिष्ठ को मार डालूँगा, फिर मुझे महर्षि की जगह राजर्षि कहने वाला कोई रहेगा नहीं।'

🔵 ऐसा सोचकर एक छुरा लेकर, वे उस वृक्ष पर जा बैठे जिसके नीचे बैठकर महर्षि वसिष्ठ अपने शिष्यों को पढ़ाते थे। शिष्य आये; वृक्ष के नीचे बैठ गये। वसिष्ठ आये; अपने आसन पर विराजमान हो गये। शाम हो गई। पूर्व के आकाश में पूर्णमासी का चाँद निकल आया।

🔴 विश्वामित्र सोच रहे थे,'अभी सब विद्यार्थी चले जाएँगे, अभी वसिष्ठ अकेले रह जायेंगे, अभी मैं नीचे कूदूँगा, एक ही वार में अपने शत्रु का अन्त कर दूँगा।'

🔵 तभी एक विद्यार्थी ने नये निकले हुए चाँद की और देखकर कहा,"कितना मधुर चाँद है वह ! कितनी सुन्दरता है !"

🔴 वसिष्ठ ने चाँद की और देखा ; बोले, "यदि तुम ऋषि विश्वामित्र को देखो तो इस चांद को भूल जाओ। यह चाँद सुन्दर अवश्य है परन्तु ऋषि विश्वामित्र इससे भी अधिक सुन्दर हैं। यदि उनके अंदर क्रोध का कलंक न हो तो वे सूर्य की भाँति चमक उठें।

🔵 "विद्यार्थी ने कहा,"महाराज ! वे तो आपके शत्रु हैं। स्थान-स्थान पर आपकी निन्दा करते हैं।"

🔴 वसिष्ठ बोले, "मैं जानता हूँ,मैं यह भी जानता हूँ कि वे मुझसे अधिक विद्वान् हैं, मुझसे अधिक तप उन्होंने किया है, मुझसे अधिक महान हैं वे, मेरा माथा उनके चरणों में झुकता है।"

🔵 वृक्ष पर बैठे विश्वामित्र इस बात को सुनकर चौंक पड़े। वे बैठे थे इसलिए कि वसिष्ठ को मार डालें और वसिष्ठ थे कि उनकी प्रशंसा करते नहीं थकते थे। एकदम वे नीचे कूद पड़े, छुरे को एक ओर फेंक दिया, वसिष्ठ के चरणों में गिरकर बोले, "मुझे क्षमा करो !"

🔴 वसिष्ठ प्यार से उन्हें उठाकर बोले, "उठो ब्रह्मर्षि !"

🔵 विश्मामित्र ने आश्चर्य से कहा, "ब्रह्मर्षि? आपने मुझे ब्रह्मर्षि कहा? परन्तु आप तो ये मानते नहीं हैं?"

🔴 वसिष्ठ बोले,"आज से तुम ब्रह्मर्षि हुए। महापुरुष! तुम्हारे अन्दर जो चाण्डाल (क्रोध) था, वह निकल गया।"

रविवार, 15 अक्तूबर 2017

👉 देवत्व विकसित करें, कालनेमि न बनें (भाग 3)

🔴 साथियो ! आज गुरुपूर्णिमा का दिन है, आप में से हर एक आदमी की, देवता की जिम्मेदारी हम उठाते हैं। देवता जब रीछ-बन्दर बनकर चले आए थे तो पीछे उनके घर बीवी-बच्चे रह गए थे, कुटुम्ब रह गया था, उन सबको भगवान ने सँभाला था। आपके घर को सँभालने की, व्यापार को सँभालने की, खेती-बाड़ी को सँभालने की, हारी-बीमारी को सँभालने की जिम्मेदारी हमारी है और यह सब जिम्मेदारियाँ हम उठाते हैं। आप हमारा काम कीजिए हम आपका काम करेंगे। हम आपको यकीन दिलाते हैं, आप हमारा विश्वास कीजिए हम आपका काम जरूर करेंगे। पिता ने बच्चे का हर काम किया है। पिता से बच्चे ने जब जो माँगा है, दिया है।
   
🔵 जब टॉफी माँगी टॉफी दी है, झुनझुना माँगा तो झुनझुना दिया है। तुम तो छोटे बच्चे हो, इसलिए यही माँगते रहते हो। अब आगे से जो भी कहना हो बेटे लिखकर दे जाना। लिखना और कहना बराबर है और फिर हमारा जवाब सुनते जाना और नोट करके ले जाना कि गुरुजी ने यह वायदा किया है कि चौबीस पुरश्चरणों का जो पुण्य पहले कमाया था उसका और अब हमको तीन साल हो गए हैं, एकान्त मौन रहकर साधना की है, उसकी पुण्य-सम्पदा जो हमारे पास जमा है, उसमें आपका हिस्सा बराबर है। माँ के पेट में जब बच्चा आता है, तब कानूनन उसका हक बाप की जायदाद पर हो जाता है।

🔴 इसी तरह हमारी कमाई पर आपका हक है। प्रार्थना मत कीजिए, निवेदन मत कीजिए, मनुहार मत कीजिए, वरदान मत माँगिए। आप अपना हक माँगिए, हम आपका काम करते हैं और आपको हक चुकाना पड़ेगा। आप बीमार रहते हैं तो हम आपकी बीमारी को अच्छा करेंगे। आप पैसे की तंगी में आ गए हैं तो हम उस तंगी को भी दूर करेंगे। आप लड़ाई-झगड़े में फँस गए हैं तो हम उसमें भी आपकी मदद करेंगे। आप पर मुसीबत आ गई है तो आपकी ढाल बनकर उस मुसीबत को रोकेंगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 दाम्पत्य जीवन की सफलता का मार्ग (अंतिम भाग)

🔴 संसार में रहने का यही तरीका है कि एक दूसरे के सामने थोड़ा-थोड़ा झुका जाय और समझौते की नीति से काम लिया जाय। महात्मा गाँधी, उच्चकोटि के आदर्शवादी संत थे, पर उनके ऐसे भी अनेकों सच्चे मित्र थे जो उनके विचार और कार्यों से मतभेद ही नहीं विरोध भी रखते थे। यह मतभेद उनकी मित्रता में बाधक न होते थे। ऐसी ही उदार समझौतावादी नीति के आधार पर आपसी सहयोग संबंधों को कायम रखा जा सकता है।

🔵 इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि साथी में दोष, दुर्गुण, हो उनकी उपेक्षा की जाय और उन बुराइयों को अबाध रीति से बढ़ने दिया जाय। ऐसा करना तो एक भारी अनर्थ होगा। जो पक्ष अधिक बुद्धिमान, विचारशील एवं अनुभवी है उसे अपने साथी को सुसंस्कृत, उमुन्नत, सद्गुणी बनाने के लिए भरसक प्रयत्न करना चाहिए। साथ ही अपने आपको भी ऐसा मधुरभाषी, उदार, सहनशील एवं निर्दोष बनाने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए कि साथी पर अपना समुचित प्रभाव पड़ सके।

🔴 जो स्वयं अनेक बुराइयों में फंसा हुआ है वह अपने साथी को सुधारने में सफल कैसे हो सकता है? सती सीता परम साध्वी उच्चकोटि की पतिव्रता थीं, पर उनके पतिव्रता होने का एक कारण यह भी था कि वे एक पत्नी व्रतधारी अनेक सद्गुणों से सम्पन्न राम की धर्मपत्नी थीं। रावण स्वयं दुराचारी एवं उसकी पत्नी मंदोदरी सर्वगुण सम्पन्न एवं बुद्धिमान होते हुए भी पतिव्रता न रह सकी। रावण के मरते ही उसने विभीषण से पुनर्विवाह कर लिया।

🔵 जीवन की सफलता, शाँति, सुव्यवस्था इस बात पर निर्भर है कि हमारा दाम्पत्य जीवन और संतुष्ट हो। इसके लिए आरंभ में ही सावधानी बरती जानी चाहिए और गुण स्वभाव की समानता के आधार पर लड़के-लड़कियों के जोड़े चुने चाहिए। अच्छा चुनाव होने पर भी पूर्ण समता तो हो नहीं सकती, इसे हर एक स्त्री-पुरुष के लिए इस नीति को अपनाना आवश्यक है कि अपनी बुराइयों को कम कर साथी के साथ मधुरता उदारता और सहनशीलता का आत्मीयतामय व्यवहार करें। साथ ही उसकी बुराइयों को कम करने के लिए धैर्य, दृढ़ता और चतुरता के साथ प्रयत्नशील रहे। इस मार्ग पर चलने से असंतुष्ट दाम्पत्य जीवनों में संतोष की मात्रा बढ़ेगी और संतुष्ट संपत्ति स्वर्गीय जीवन का आनन्द उपलब्ध करेंगे।

🌹 समाप्त
🌹 अखण्ड ज्योति- मार्च 1950 पृष्ठ 28
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/March/v1.28

👉 आज का सद्चिंतन 15 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 15 Oct 2017


शनिवार, 14 अक्तूबर 2017

👉 अनीति से हानि

🔴 गौरा ग्राम में एक देवतादीन नामक ब्राह्मण रहते थे। वे बचपन में तो बहुत ही दरिद्र घर में उत्पन्न हुए थे। पर जब बड़े हुए तो लेन-देन के व्यापार में रुपये वाले हो गये। जिस गरीब भाई को एक रुपया भी कर्ज में दे आते, तो उसका बीसों वर्ष तक पीछा नहीं छोड़ते। उस रुपये का सूद बढ़ा कर उसको गड़बड़ी में डाल देते और बदले में बेगार करवाते, हल जोतवाते, उनके बच्चों से पशु चरवाते इसी प्रकार आस पास के गाँवों में प्रायः करके दीन-दरिद्र लोगों को ही अपना ऋणी बनाते, जिससे कि उनके साथ वंचकता करने में कुछ भी कठिनाई नहीं पड़ती थी। इस व्यवसाय के द्वारा बहुतों का तो घर छीन लिया, अनेकों की डिगरी करा कर माल व बगिया ले लिये, बहुतों के खेतपात लेकर निहत्था कर दिया। इसी प्रकार कुछ वैभव बढ़ जाने पर गाँव के मुखिया बन बैठे। अब इनके यहाँ पुलिस और रियासत के हाकिमों की सगे रिश्तेदारों की सी सेवा-सुश्रूषा होने लगा। इससे इनका शासन दीन-दुखियों पर और भी अधिक बढ़ गया। जिसको चाहते उस को निरपराध ही पकड़वा कर मनमाना अत्याचार करते।

🔵 परमात्मा अनीति को अधिक नहीं बढ़ने देता। पूर्व सुकर्मों का फल समाप्त होते ही करनी आगे आने लगी। तीन साल तक लगातार प्रति वर्ष अग्नि-काण्ड होते रहे, जिससे बहुत सम्पत्ति स्वाहा हुई। अठारह वर्ष का विवाहित लड़का चिरस्थायी राजरोग का शिकार बना, जिस पर बहुत धन व्यय हुआ। दूसरा लड़का 12 वर्ष का था, उसकी झूला पर से गिरने के कारण जीभ कट गई। देवतादीन को आम वात ने घेरा, एक वर्ष तक चारपाई सेवन करके काल के गाल में चले गये। कुछ ही दिन बाद बड़ा लड़का जो राजरोग से पीड़ित था, मर गया। तत्पश्चात् छोटा लड़का भी संप्रहणी रोग से पीड़ित होकर पंचत्वगामी हो गया।

🔴 सम्प्रति उनके घर की यह हालत है कि जिन चौपालों में बैठ कर वे मित्रों के साथ माँ बाप मदिरा का पान करते थे वेश्याएं नचाते थे उन की दीवारें गिरी हुई पड़ी हैं। जिस द्वार पर नौबत बजती थी, वहाँ पर अब कुत्तों के चबाने से बचे हुए हाड़ दृष्टिगोचर हो रहे हैं। घर की औरतें फटे पुराने कपड़े पहन कर मजदूरी का काम करने जाती है।

🔵 ऐसी घटनायें ढूँढ़ने पर हर जगह मिल सकती हैं, पर वैभव के मद में अंधे हुए मनुष्य उस ओर से आंखें बन्द कर के अन्याय का मार्ग ही पकड़े रहते हैं और अपने स्वार्थ के लिए दूसरों के गले पर छुरी चलाते रहते हैं। यदि यह लोग अनीति से होने वाले हानिकर परिणामों पर सोचें, तो निस्सन्देह उन्हें अपना हाथ रोकना पड़ेगा।

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 145)

🌹  इन दिनों हम यह करने में जुट रहे है

🔵 प्रतिभाहीनों की बात जाने दीजिए, वे तो अपनी क्षमता और बुद्धिमत्ता को चोरी, डकैती, ठगी जैसे नीच कर्मों में लगा सकते हैं, पर जिनमें भावना भरी हो, वे अपने साधारण पराक्रम से समय को उलटकर कहीं से कहीं ले जा सकते हैं। स्वामी दयानंद, श्रद्धानन्द रामतीर्थ जैसों के कितने ही उदाहरण सामने हैं जिनकी दिशाधारा बदली तो वे असंख्यों को बदलने में समर्थ हो गए।

🔴 इन दिनों प्रतिभाएँ विलासिता में, संग्रह में, अहंकार की पूर्ति में निरत हैं। इसी निमित्त वे अपनी क्षमता और सम्पन्नता को नष्ट करती रहती हैं। यदि इनमें से थोड़ी सी भी ढर्रा बदल दें, तो वे गीता प्रेस वाले जय दयाल गोयंदका की तरह ऐसे साधन खड़े कर सकती हैं, जिन्हें अद्भुत और अनुपम कहा जा सके।

🔵 कौन प्रतिभा किस प्रकार बदली जानी है और उससे क्या काम लिया जाना है, यही निर्धारण उच्च भूमिका से होता रहेगा। अभी जो लोग विश्व युद्ध छेड़ने और संसार को तहस-नहस कर देने की बात सोचते हैं, उनके दिमाग बदलेंगे तो विनाश प्रयोजनों मे लगने वाली बुद्धि, शक्ति और सम्पदा को विकास प्रयोजनों की दिशा में मोड़ देंगे। इतने भर से परिस्थितियाँ बदलकर कहीं से कहीं चली जाएँगी। प्रवृत्तियाँ एवं दिशाएँ बदल जाने से मनुष्य के कर्तृत्व कुछ से कुछ हो जाते हैं और जो श्रेय मार्ग पर कदम बढ़ाते हैं, उनके पीछे भगवान् की शक्ति सहायता के लिए निश्चित रूप से विद्यमान रहती है। बाबा साहब आम्टे की तरह वे अपंगों का विश्व विद्यालय, कुष्ठ औषधालय बना सकते हैं। हीरालाल शास्त्री की तरह वनस्थली बालिका विद्यालय खड़े कर सकते हैं। लक्ष्मीबाई की तरह कन्या गुरुकुल खड़े कर सकते हैं।

🔴 मानवी बुद्धि की भ्रष्टता ने उसकी गतिविधियों को भ्रष्ट, पापी, अपराधी स्तर का बना दिया है। जो कमाते हैं, वह हाथों-हाथ अवांछनीय कार्यों में नष्ट हो जाता है। सिर पर बदनामी और पाप का टोकरा ही फूटता है। इस समुदाय के विचारों को कोई पलट सके, रीति-नीति और दिशाधारा को बदल सके, तो यही लोग इतने महान् बन सकते हैं, ऐसे महान् कार्य कर सकते हैं कि उनका अनुकरण करते हुए लाखों धन्य हो सकें और जमाना बदलता हुआ देख सकें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.164

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.21

👉 देवत्व विकसित करें, कालनेमि न बनें (भाग 2)

🔴 एक बात तो मुझे आपसे यही कहनी थी। दूसरी बात यह कहनी थी कि जब महाभारत हुआ था, तब अर्जुन यह कह रहा था कि हम तो पाँच पाण्डव हैं और कौरव सौ है और उनके पास विशाल सेना भी है, जबकि हमारे पास सेना भी नहीं है, थोड़े-से पाँच-पचास आदमी हैं। ऐसे में भला युद्ध कैसे हो सकता है? हम मारे जाएँगे। इसलिए वह इसलिए वह बार-बार मना कर रहा था और कह रहा था कि महाराज हमें लड़ाइए मत, इसमें हमको सफलता नहीं मिल सकती। आप हिसाब लगाइए कि इनसे लड़कर हम फतह कैसे पा सकेंगे? जीत कैसे सकेंगे?
   
🔵 तब भगवान ने उससे कहा था कि देखो अर्जुन, इन सबको तो मैंने पहले से ही मारकर रखा है। और तुम्हारे लिए सिंहासन सजाकर रखा है। तुम पाँचों को सिंहासन पर बैठना पड़ेगा, राज्य करना पड़ेगा, ये तो सब मरे-मराए रखें हैं, तुम तो खाली तो खाली तीर-कमान चलाओगे। इसी तरह जो काम मेरा था सो मैंने करके रखा है। इस युग को बदलने के सम्बन्ध में जो महत्त्वपूर्ण कार्य करने हैं, उनके सम्बन्ध में आपको श्रेय तो भर लेना है। जीतना किससे है और हरना किससे है? न किसी से हारना है, न किसी से जीतना है। न किसी को मारना है और न कोई पुरुषार्थ करना है।

🔴 आपको तो जो विजयी होने का श्रेय मिलना चाहिए और वही श्रेय आपको प्राप्त करना है। अर्जुन ने भी प्राप्त किया था। इससे पहले जब वह ज्यादा बहस करने लगा था कि मेरे बाल-बच्चे हैं, मेरा काम हर्ज हो जाएगा, फलाना हो जाएगा, मुझे टाइम नहीं है, तब कृष्ण भगवान झल्ला पड़े थे और उन्होंने एक हुक्म दिया-‘तस्मात् युद्धाय युजस्व’ लड़, दुनिया भर के बहाने मत बना, लड़ाई कर। भगवान् हमारा क्या होगा? यह पूछने पर श्रीकृष्ण ने कहा था कि तेरी जिम्मेदारी हम उठाते हैं, तू युद्ध कर।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 The key to success and self-fulfillment

🔴 Thus the key to a person’s success and fulfillment in life is the intensity and focus of his will and faith in his ability to manifest his indwelling divine potentialities. He works with the available resources and gets results according to the circumstances created by his deeds. One may call it destiny, fortune or the result of karma, but by and large it is the outcome of one’s own will and faith.

🔵 That is why it has been said that a man is the maker of his own destiny. Whosoever has achieved success and fulfillment in this world has worked whole-heartedly to achieve his set goal. Such people have been ever active, with unwavering will, to achieve their aims. This strong will enabled them to overcome all the obstacles, keep hope and faith alive in the hour of failure and make fresh attempts, leading to ultimate success. Therefore, in one word, a strong will alone may be called the real basis of success.

👉 आत्मचिंतन के क्षण 14 Oct 2017

🔵 सदा किसी को अनुकूल ही अनुकूल अवसर मिलते रहें, प्रिय व्यक्ति, प्रिय आदर्श और प्रिय परिस्थितियाँ ही सदैव बनी रहें, यह आशा करना भी दुराशा मात्र ही है। जब हम सदा शुभ ही शुभ विचार और कार्य नहीं करते, जब हमारे मन से दुर्भाव और शरीर से दुष्कर्म होते रहते ही हैं तो उनके फलस्वरूप कष्ट, हानि, विछोह, शोक एवं विपत्ति भोगनी ही पड़ेगी। शुभ और अशुभ कर्मों का फल भोगना निश्चित है। जो हमने किया है उसका भोग मिलना ही ठहरा। जब शुभ कर्मों के सुखद फल हम भोगते हैं तो अशुभ कर्मों के दुखद दुष्परिणामों को भोगने के लिये भी हमें ही तैयार रहना होगा।

🔴 संसार में सज्जनता की तथा आनंददायक परिस्थितियों की कमी नहीं है पर यह भी मान लेना चाहिए कि दुष्टता और विपत्ति भी साथ ही पर्याप्त मात्रा में मौजूद हैं। हमें दोनों से ही निपटना होगा। केवल श्रेष्ठता, सुन्दरता, भलाई और आनन्द की ही हम इस दुनिया में आशा करें और नीचता, कुरूपता, बुराई और दुःख से सर्वथा बचे रहना चाहें तो यह इच्छा कदापि, पूर्ण न हो सकेगी। हमें अपनी मनोभूमि को दुःखों के सहने और बुराइयों से निपटने के लिये भी उसी तरह सुनिश्चित करना पड़ेगा, सधाना पड़ेगा, जिस प्रकार वह सुखों के लिए सज्जनता से सान्निध्य के लिये खुशी-खुशी तैयार रहती है। धूप और छाँह की भाँति, रात और दिन की शाँति प्रिय ओर अप्रिय दोनों ही प्रकार के संयोग हमारे जीवन में आते रहने वाले हैं।

🔵 दुनिया में जो काँटे-कंकड़ फैले हुए हैं उन्हें बीन कर अपने सभी यात्रा के मार्गों को हम निरापद बनाने का प्रयत्न करें तो इसमें सफलता मिल सकना कठिन है क्योंकि काँटे, कंकड़ों की संख्या अधिक है। विभिन्न रास्ते जिन पर हमें समय-समय पर चलना पड़ता है उनकी लम्बाई भी हजारों मील बैठती है। काँटे बीनने के लिए हम खड़े भी हों तो जीवन की अवधि भी इतनी लम्बी नहीं है कि जब तक सब काँटे बीने जा सकते हों तब तक जीवित रहें, फिर यदि जीवित भी रहें तो इसका भी कोई निश्चय नहीं कि जब तक यह बीने जाने की प्रक्रिया पूर्ण होगी, तब तक फिर और नये काँटे उस मार्ग पर न बिखर जाएंगे। इन परिस्थितियों में यही उचित प्रतीत होता है कि काँटे बीनने की प्रक्रिया को सीमित करके हम अपने पैरों में जूते पहनने का उपाय पसंद करें। यह अपेक्षाकृत सरल और सीधा उपाय है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 दाम्पत्य जीवन की सफलता का मार्ग (भाग 2)

🔴 अनुदार स्वभाव के स्त्री-पुरुष कट्टर, एवं संकीर्ण मनोवृत्ति के होने के कारण यह चाहते हैं कि हमारा साथी हमारी किसी भी बात में तनिक भी मतभेद न रखे। पति अपनी स्त्री को पतिव्रत पाठ पढ़ाता है और उपदेश करता है कि तुम्हें पूर्ण पवित्रता, इतनी उग्र पतिव्रता होना चाहिए कि पति की किसी भी भली-बुरी विचारधारा, आदत, कार्यप्रणाली में हस्तक्षेप न हो। इसके विपरीत स्त्री अपने पति से आशा करती है कि पति के लिए भी यह उचित है कि स्त्री को अपना जीवनसंगी, आधा अंग समझ कर उसके सहयोग एवं अधिकार की उपेक्षा न करे। यह भावनाएं जब संकीर्णता और अनुदारता से संमिश्रित होती हैं तो एक पक्ष सोचता है कि मेरे अधिकार का दूसरा पक्ष पूर्ण नहीं करता। बस यहीं से झगड़े की जड़ आरम्भ हो जाती है।
 
🔵 इस झगड़े का एकमात्र हल यह है कि स्त्री पुरुष को, और पुरुष स्त्री को, अपने मन का अधिकाधिक उदार भावना से बरते। जैसे किसी व्यक्ति का एक हाथ या एक पैर कुछ कमजोर, रोगी, या दोषपूर्ण हो तो वह उसे न तो काट कर फेंक देता है न कूट डालता है और न उससे घृणा, असंतोष, विद्वेष आदि करता है अपितु उस विकृत अंग को अपेक्षाकृत अधिक सुविधा देने और उसके सुधारने के लिए, स्वस्थ भाग की भी थोड़ी उपेक्षा कर देता है। यह नीति अपने कमजोर साथी के बारे में बरती जाय तो झगड़े का एक भारी कारण दूर हो जाता है।

🔴 झगड़ा करने से पहले आपसी विचार विनिमय के सब प्रयोगों को अनेक बार कर लेना चाहिए। कोई वज्रमूर्ख और घोर दुष्ट प्रकृति के मनुष्य तो ऐसे हो सकते हैं जो दंड के अतिरिक्त और किसी वस्तु से नहीं समझते। पर अधिकाँश मनुष्य ऐसे होते हैं जो प्रेम भावना के साथ, एकान्त स्थान में सब ऊँच नीच समझने से बहुत कुछ समझ और सुधर जाते हैं। जो थोड़ा बहुत मतभेद रह जाय उसकी उपेक्षा करके उन बातों को ही विचार क्षेत्र में आगे देना चाहिए जिनमें मतैक्य है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति- मार्च 1950 पृष्ठ 27
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/March/v1.27

👉 आज का सद्चिंतन 14 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 Oct 2017


शुक्रवार, 13 अक्तूबर 2017

👉 कोयल और कौआ

🔴 संस्कृत साहित्य की यह चर्चित कथा है। एक बार वसंत ऋतु में एक कोयल वृक्ष पर बैठी कूक रही थी। आते-जाते लोग उसकी कूक को सुनते और उसकी सुरीली आवाज का आनंद लेते हुए उसकी तारीफ के पुल बांधते। कुछ देर बाद कोयल के सामने एक कौआ तेज गति से आया। कोयल ने उससे पूछा, ‘इतनी तेज गति से कहां जा रहे हो? कुछ देर बैठो, बातें करते हैं।’ कौए ने उत्तर दिया कि वह जरा जल्दी में है और देश को छोड़कर परदेस जा रहा है।

🔵 कोयल ने इसका कारण पूछा तो कौआ बोला, ‘यहां के लोग बहुत खराब हैं। सब तुम्हें ही चाहते हैं। सभी लोग सिर्फ तुम्हारा आदर करते हैं। वह यही चाहते हैं कि तुम हमेशा की तरह इसी प्रकार से उनके क्षेत्र में गाती रहो। वहीं जहां तक मेरी बात है तो मुझे कोई देखना तक नहीं चाहता। यहां तक कि मैं किसी की मुंडेर पर बैठता हूं तो मुझे कंकड़ मारकर वहां से भगा दिया जाता है। मेरी आवाज भी कोई नहीं सुनना चाहता। जहां मेरा अपमान हो, मैं ऐसे स्थान पर एक क्षण भी नहीं रहना चाहता। ज्ञानियों ने भी हमें यही शिक्षा दी है कि अपमान की जगह पर नहीं रहना चाहिए।’

🔴 यह सुनकर कोयल बोली, ‘परदेस जाना चाहते हो तो बड़े शौक से जाओ। यह पूरी तरह से तुम्हारी इच्छा पर निर्भर है। लेकिन एक बात का सदैव ध्यान रखना कि वहां जाने से पहले अपनी आवाज को बदल लेना। अपनी वाणी को मधुर बना लेना। यदि तुम्हारी वाणी ठीक वैसी ही कठोर रही, जैसी यहां पर है तो परदेस में भी लोग तुम्हारे साथ वही व्यवहार करेंगे जो अभी हो रहा है। संसार जो है, जैसा भी है, उसे बदला नहीं जा सकता। लेकिन हम अपनी दृष्टि और वाणी को बदल सकते हैं। इन दोनों के बदलने से जीवन की दिशा और दशा, दोनों बदल जाती है और यहीं से संसार में आनंद और सुख की प्राप्ति शुरू होती है।’

👉 अध्यात्म का उपदेश

🔴 प्रसन्नता, अप्रसन्नता, आत्मरक्षा, संघर्ष, जिज्ञासा, प्रेम, सामूहिकता, संग्रह, शरीर पोषण, क्रीड़ा, महत्व प्रदर्शन, भोगेच्छा यह मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्तियाँ है। शरीर और मन परिस्थितियों के अनुसार इन परिस्थितियों के क्षेत्र में विचरण करते रहते है। उसकी एक अध्यात्मिक विशेषता भी है जिसे महानता, धार्मिकता, आस्तिकता, दैवी सम्पदा आदि नामों से पुकारते है। उसके द्वारा मनुष्य दूसरों को सुखी बनाने के लिए अपने आपको कष्ट में डाल कर भी प्रसन्नता अनुभव करता है। दूसरों के सुख में अपना सुख और दूसरों के दुःख में अपना दुःख मानता है। जिस प्रकार अपने सुख को बढ़ाकर और दुःख को घटाकर प्रसन्नता का अनुभव होता है इसी प्रकार दूसरों में आत्मीयता का आरोपण करके उनके हित साधन में भी संतोष और सुख का अनुभव होता है।

🔵 यह उदारता एवं सेवा की वृत्ति तभी प्रस्फुटित होती है जब मनुष्य अपने आपको संयमित करता है। अपने लिए सीमित लाभ में संतोष करने से ही दूसरों के प्रति कुछ उदारता प्रदर्शित करना संभव होता है। इसलिए इस सर्वतोमुखी संयम को नैतिकता या धर्म के नाम से पुकारा जाता है। इसी का अभ्यास करने के लिए नाना प्रकार के जप, तप, व्रत अनुष्ठान किये जाते है। शास्त्र श्रवण, स्वाध्याय और सत्संग का उद्देश्य भी इन्हीं प्रवृत्तियों को विकसित करना है। चरित्र निर्माण और नैतिकता भी इसी प्रक्रिया का नाम है। पुण्य, परमार्थ भी इसी को कहते है और स्वर्ग तथा मुक्ति इसके फल माने गये है। ईश्वर उपासना के महात्म्य से यह आत्म-निर्माण का कार्य अधिक सरलता से पूर्ण होता है।

🌹 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 144)

🌹  इन दिनों हम यह करने में जुट रहे है
🔵 ऐसे उदाहरणों से इतिहास भरा पड़ा है, जिसमें कितनी ही प्रतिभाओं को किन्हीं मनस्वी आत्म वेत्ताओं ने बदलकर कुछ से कुछ बना दिया। उनकी अनुकम्पा न हुई होती तो वे जीवन भर अपने उसी पुराने ढर्रे पर लुढ़कते रहते जिस पर कि उनका परिवार चल रहा था।

🔴 हमारी अपनी बात भी ठीक ऐसी ही है। यदि गुरुदेव ने उलट न दिया होता तो हम अपने पारिवारिक जनों की तरह पौरोहित्य का धंधा कर रहे होते या किसी और काम में लगे होते। उस स्थान पर पहुँच ही न पाते, जिस पर कि हम अब पहुँच गए हैं।

🔵 इन दिनों युग परिवर्तन के लिए कई प्रकार की प्रतिभाएँ चाहिए। विद्वानों की आवश्यकता है, जो लोगों को अपने तर्क प्रमाणों की नई पद्धति प्रदान कर सकें। कलाकारों की आवश्यकता है, जो चैतन्य महाप्रभु, मीरा, सूर, कबीर की भावनाओं को इस प्रकार लहरा सकें, जैसे सँपेरा साँप को लहराता रहता है। धनवानों की जरूरत है, जो अपने पैसे को विलास में खर्च करने की अपेक्षा सम्राट अशोक की तरह अपना सर्वस्व समय की आवश्यकता पूरी करने के लिए लुटा सकें। राजनीतिज्ञों की जरूरत है जो गाँधी, रूसो और कार्लमार्क्स, लेनिन की तरह अपने सम्पर्क से प्रजाजनों को ऐसे मार्ग पर चला सकें, जिसकी पहले कभी भी आशा नहीं की गई थी।

🔴 भावनाशील का क्या कहना? संत सज्जनों ने न जाने कितनों को अपने सम्पर्क से लोहे जैसे लोगों को पारस की भूमिका निभाते हुए कुछ से कुछ बना दिया। हमारे वीरभद्र अब यही करेंगे। हमने भी यही किया है। लाखों लोगों की विचारणा और क्रिया पद्धति में आमूल-चूल परिवर्तन किया है और उन्हें गाँधी के सत्याग्रहियों की तरह, विनोबा के भूदानियों की तरह, बुद्ध के परिव्राजकों की तरह अपना सर्वस्व लुटा देने के लिए तैयार कर दिया। प्रज्ञा पुत्रों की इतनी बड़ी सेना हनुमान के अनुयायी वानरों की भूमिका निभाती है। इस छोटे से जीवन में अपनी प्रत्यक्ष क्रियाओं के द्वारा जहाँ भी रहे वहीं चमत्कार खड़े कर दिए तो कोई कारण नहीं कि हमारी ही आत्मा के टुकड़े जिसके पीछे लगें, उसे भूत−पलीत की तरह तोड़-मरोड़ कर न रख दें।

🔵 अगले दिनों अनेक दुष्प्रवृत्तियों के उन्मूलन की आवश्यकता पड़ेगी। उसके लिए ऐसे गाण्डीव धारियों की, जो अर्जुन की तरह कौरवों की अक्षौहिणी सेनाओं को धराशायी कर दें, आवश्यकता पड़ेगी। ऐसे हनुमानों की जरूरत होगी, जो एक लाख पूत-सवा लाख नाती वाली लंका को पूँछ से जलाकर खाक कर दें। ऐसे परिवर्तन अंतराल बदलने भर से हो सकते हैं। अमेरिका के अब्राहम लिंकन और जार्ज वाशिंगटन बहुत गई गुजरी हैसियत के परिवारों में जन्मे थे, पर वे अपने जीवन प्रवाह को पलट कर अमेरिका के राष्ट्रपति बन गए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.163

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.21

👉 देवत्व विकसित करें, कालनेमि न बनें (भाग 1)

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

🔴 देवियो! भाइयो!! बहुत पुराने समय की बात है, जब रावण सीताजी को चुराकर ले गया था और सबके सामने यह समस्या थी कि मुकाबला कैसे किया जाए? रावण से युद्ध कैसे किया जाए? बहुत सारे लोग थे, राजा-महाराजा भी थे, पर किसी की हिम्मत नहीं पड़ी कि रावण से लड़ने के लिए जाए, कौन अपनी जान गँवाए, कौन मुसीबत में फँसे? इसलिए कोई भी तैयार नहीं हुआ। रामचन्द्रजी कहने लगे कि क्या कोई भी लड़ने हमारे साथ नहीं जाएगा? तो फिर क्या हुआ? देवताओं ने विचार किया और कहा कि भगवान के काम में हमको सहायता करनी चाहिए और सुग्रीव की सेना में, हनुमान की सेना में सम्मिलित होकर रावण से लड़ने के लिए चलना चाहिए।
   
🔵 देवताओं ने बन्दर रूप बनाया, रीछ का रूप बनाया। कहाँ रावण और कहाँ बेचारे बन्दर, दोनों का कोई मुकाबला नहीं था, फिर भी वे लड़ने के लिए चल पड़े, क्यों? क्योंकि वे देवता थे। देवता न होते, अगर रीछ-बन्दर रहे होते तो पेड़ों पर फुदक रहे होते, फिर वे सीताजी को छुड़ाने के लिए रामराज्य की स्थापना के लिए, लंका को तहस-नहस करने के लिए भला इस तरह के कार्य कैसे कर सकते थे? लेकिन उन्होंने किया। आप लोगों को मैं रीछ और बन्दर के रूप में देवता मानता हूँ। आज फिर उसी ऐतिहासिक घटना की पुनरावृत्ति होने जा रही है। आप लोग पहले जन्म में देवता हैं।

🔴 अकेले में जब कभी आपको शान्ति का समय मिले, एकान्त का समय मिले, तब आप अपने अन्दर झाँककर देखना कि आप रीछ-बन्दर हैं या देवता हैं। वास्तव में आप देवता हैं। देवताओं के सिवाय आड़े वक्त में कोई और काम नहीं आ सकता, देवता ही काम आते हैं। आप लोगों में से हर एक को मुझे यही कहना है कि आपको जब कभी अपने आप में मौका मिले तो कहना कि गुरुपूर्णिमा के दिन गुरुजी ने कहा था कि हमारे भीतर देवता बैठा हुआ है, देवता विराजमान है। देवता जो काम किया करते हैं, वे जिस काम के लिए अपना जीवन लगाया करते हैं, जिसके लिए पुरुषार्थ किया करते हैं, वही पुरुषार्थ हमारे सुपुर्द किया गया है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 Sowing and Reaping (Investment & its Returns) (Part 1)

🔵 Brothers! Almost 60 years have now passed. 60 years ago, came my GURUDEV to tell me so many things. I too was in fear initially but it all just evaporated when he showed me last three births in which he was with me and thereafter began our talks. He said, ‘‘you must execute 24 PURASHCHARAN of 2.4 million each in next 24 years in order to induce eligibility within you with condition that daily only one chapatti made of barely and buttermilk will be your means of survival all along.’’
 
🔴 He added to it one more new thing- ‘‘SOWING & REAPING’’. He told me just to sow in the field of BHAGWAN whatever I had in order to receive back 100 times of what I had sown. This is how RIDDHI-SIDDHI is gained in life. There is nothing free from any quarter in this world. No such law exists in this world that someone is there to distribute RIDDHI, SIDDHI in free to all simply because he has gained it already from some quarter.
 
🔵 After all how a farmer can think of reaping when he had sown nothing. He reaps what he sows, is the simplest rule he follows to gain. You will have to start in same fashion and style to sow and reap your RIDDHIs-SIDDHIs. He said, ‘‘which things do you have?’’ I replied I do not know. He then said, ‘‘look, you have at least, if nothing else, the time and the capacity to work. It is enough. You just begin to sow these two elements of life in the field of BHAGWAN.’’ Which BHAGWAN when I asked he replied that the very society present around you is the form of VIRAT-BHAGWAN.

🌹 to be continue...
🌹 Pt Shriram Sharma Aachrya

👉 Couldn’t touch Paras to iron

🔴 A man got paras stone (which supposedly converts iron to gold on contact) for 7 days as blessing from a mahatma but then he started searching for cheap iron from city to city. He went to different places in search of it and lost all the time like this. At the end of 7 days he couldn’t make even small amount of gold from it and the Mahatma took the stone back from him.

🔵 This life is also like a paras stone. Those who want to convert it into spiritual wealth don’t miss the opportunity by wasting time in attractions. The wealth acquired by depending and believing on one’s soul is much more satisfying and rewarding than the all the material opulence of the world.

🌹 From Pragya Puran

👉 आत्मचिंतन के क्षण 13 Oct 2017

🔵 अपने से अधिक सुखी, अधिक साधन-सम्पन्न, अधिक ऊंची परिस्थिति के लोगों के साथ यदि अपनी तुलना की जाए तो प्रतीत होगा कि सारा अभाव और दारिद्र हमारे ही हिस्से में आया है। परन्तु यदि इन असंख्यों दीन-हीन, पीड़ित, परेशान लोगों के साथ अपनी तुलना करें तो अपने सौभाग्य की सराहना करने को जी चाहेगा। ऐसी दशा में यह स्पष्ट है कि अभाव या दारिद्र की कोई मुख्य समस्या अपने सामने नहीं है। समस्या केवल इतनी ही है कि हम अपने से गिरे लोगों से अपनी तुलना करते हैं या बढ़े हुए लोगों से। इस तुलना में हेर-फेर करने से हमारा असंतोष, संतोष में और संतोष, असंतोष में परिणित हो सकता है।

🔴 जिन स्वजन संबंधियों से, उनके छोटे-छोटे दुर्गुणों के कारण हमें झुँझलाहट आती है, जो हमें भार रूप और व्यर्थ मालूम पड़ते हैं, उनके द्वारा अपने ऊपर अब तक किये हुए अहसानों एवं उपकारों का स्मरण किया जाए तो लगेगा कि वह बड़े ही त्यागी, सेवा-भावी और उदार हैं। यदि उनकी अब तक की समस्त सेवा सहायताओं का स्मरण किया जाए तो लगेगा कि वे साक्षात उपकारों के देवता हैं। उनका कृतज्ञ होना चाहिए और भाग्य को सराहना चाहिये कि ऐसे उपकारी स्नेह मित्र स्वजन सम्बंधी हमें उपलब्ध हुए।

🔵 तृष्णा का कोई अंत नहीं। एक से एक अच्छी और एक से एक सुन्दर चीजें इस दुनिया में मौजूद हैं। उस क्रम का अन्त नहीं आज जो कुछ हम चाहते हैं उसे मिलने पर कल और बढ़िया का मोह बढ़ेगा। बढ़ियापन का कहीं अन्त नहीं। इस कुचक्र में उलझने से सदा घोर असन्तोष ही बना रहेगा। इस लिए यदि चित्त का समाधान करना हो तो कहीं न कहीं पहुँच कर सन्तोष करना पड़ेगा। यदि उस सन्तोष को आज ही वर्तमान स्थिति में ही, कर लिया जाए तो तृप्ति, पूर्णता और संतोष के रसास्वादन का आनन्द आज ही उपलब्ध हो सकता है। इसके लिये एक क्षण की प्रतिक्षा न करनी पड़ेगी।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 दाम्पत्य जीवन की सफलता का मार्ग (भाग 1)

🔴 अनेक परिवारों में स्त्री-पुरुषों के मध्य वैसे मधुर संबंध नहीं देखें जाते जैसे कि होने चाहिएं। अनेकों घरों में आये दिन संघर्ष, मनोमालिन्य और अविश्वास के चिन्ह परिलक्षित होते रहते हैं। कारण यह है कि पति-पत्नी में से एक या दोनों ही केवल अपनी-अपनी इच्छा, आवश्यकता और रुचि को प्रधानता देते हैं। दूसरे पक्ष की भावना और परिस्थितियों को न समझना ही प्रायः कलह का कारण होता है।

🔵 जब एक पक्ष दूसरे पक्ष की इच्छानुसार आचरण नहीं करता तो उसे यह बात अपना अपमान, उपेक्षा या तिरस्कार प्रतीत होती है, जिससे चिढ़कर दूसरे पक्ष पर कटु वाक्यों का प्रहार या दुर्भावनाओं का आरोपण करता है। उत्तर-प्रत्युत्तर, आक्रमण-प्रत्याक्रमण, आक्षेप-प्रत्याक्षेप का सिलसिला चल पड़ता है तो उससे कलह बढ़ता ही जाता है। दोनों में से कोई अपनी गलती नहीं मानता, वरन् दूसरे को अधिक दोषी, प्रधान दोषी, प्रथम दोषी सिद्ध करने के लिए अपनी जिद को बढ़ाते रहते हैं। इस रीति से कभी भी झगड़े का अन्त नहीं हो सकता। अग्नि में ईंधन डालते जाने से तो और भी अधिक प्रज्वलित होती है।

🔴 जो पति-पत्नि अपने संबंधों को मधु रखना चाहते हैं उन्हें चाहिए कि दूसरे पक्ष की, योग्यता, मनोभूमि, भावना, इच्छा, संस्कार, परिस्थिति एवं आवश्यकता को समझने का प्रयत्न करें और उस स्थिति में मनुष्य के लिए जो उपयुक्त हो सके ऐसा उदार व्यवहार करने की चेष्टा करें तो झगड़े के अनेकों अवसर उत्पन्न होने से पहले ही दूर हो जावेंगे। हमें भली प्रकार समझ रखना चाहिए कि सब मनुष्य एक समान नहीं हैं, सबकी रुचि एक समान नहीं है, सबकी बुद्धि, भावना और इच्छा एक जैसी नहीं होती। भिन्न वातावरण भिन्न परिस्थिति और भिन्न कारणों से लोगों की मनोभूमि में भिन्नता हो जाती है। यह भिन्नता पूर्णतया मिट कर दूसरे पक्ष के बिलकुल समान हो जावें यह हो नहीं सकता। कोई स्त्री-पुरुष आपस में कितने ही सच्चे क्यों न हों, उनके विचार और कार्यों में कुछ न कुछ भिन्नता रह ही जायेगी।

🌹 अखण्ड ज्योति- मार्च 1950 पृष्ठ 27
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/March/v1.27

👉 आज का सद्चिंतन 13 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 Oct 2017


👉 चरित्र : सर्व गुण आधार

🔴 किसी भी व्यक्ति में शरीर का बल तो आवश्यक है; पर उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण उसमें चरित्रबल अर्थात शील है। यदि यह न हो, तो अन्य सभी शक्तियाँ भी बेकार हो जाती हैं। प्राचीन भारतीय साहित्य में प्रह्लाद की कथा आती है, जो शील के महत्त्व बखुबी स्थापित करती है।

🔵 राक्षसराज प्रह्लाद ने अपनी तपस्या एवं अच्छे कार्यों के बल पर देवताओं के राजा इन्द्र को गद्दी से हटा दिया और स्वयं राजा बन बैठा। इन्द्र परेशान होकर देवताओं के गुरु आचार्य वृहस्पति के पास गये और उन्हें अपनी समस्या बतायी। वृहस्पति ने कहा कि प्रह्लाद को ताकत के बल पर तो हराया नहीं जा सकता। इसके लिए कोई और उपाय करना पड़ेगा। वह यह है कि प्रह्लाद प्रतिदिन प्रात:काल दान देते हैं। उस समय वह किसी याचक को खाली हाथ नहीं लौटाते। उनके इस गुण का उपयोग कर ही उन्हें पराजित किया जा सकता है। इन्द्र द्वारा जिज्ञासा करने पर आचार्य वृहस्पति ने आगे बताया कि प्रात:काल दान-पुण्य के  समय में तुम एक भिक्षुक का रूप लेकर जाओ। जब तुम्हारा माँगने का क्रम आये, तो तुम उनसे उनका चरित्र माँग लेना। बस तुम्हारा काम हो जाएगा।

🔴 इन्द्र ने ऐसा ही किया। जब उन्होंने प्रह्लाद से उनका शील माँगा, तो प्रह्लाद चौंक गये। उन्होंने पूछा – क्या मेरे शील से तुम्हारा काम बन जाएगा? इन्द्र ने हाँ में सिर हिला दिया। प्रह्लाद ने अपने शील अर्थात् चरित्र को अपने शरीर से जाने को कह दिया। ऐसा कहते ही एक तेजस्वी आकृति प्रह्लाद के शरीर से निकली और भिक्षुक के शरीर में समा गयी। पूछने पर उसने कहा – मैं आपका चरित्र हूँ। आपके कहने पर ही आपको छोड़कर जा रहा हूँ। कुछ समय बाद प्रह्लाद के शरीर से पहले से भी अधिक तेजस्वी एक आकृति और निकली। प्रह्लाद के पूछने पर उसने बताया कि मैं आपका शौर्य हूँ। मैं सदा से शील वाले व्यक्ति के साथ ही रहता हूँ, चूँकि आपने शील को छोड़ दिया है, इसलिए अब मेरा भी यहाँ रहना संभव नहीं है। प्रह्लाद कुछ सोच ही रहे थे कि इतने में एक आकृति और उनके शरीर को छोड़कर जाने लगी। पूछने पर उसने स्वयं को वैभव बताया और कहा कि शील के बिना मेरा रहना संभव नहीं है। इसलिए मैं भी जा रहा हूँ। इसी प्रकार एक-एक कर प्रह्लाद के शरीर से अनेक ज्योतिपुंज निकलकर भिक्षुक के शरीर में समा गये।

🔵 प्रह्लाद निढाल होकर धरती पर गिर गये। सबसे अंत में एक बहुत ही प्रकाशमान पुंज निकला। प्रह्लाद ने चौंककर उसकी ओर देखा, तो वह बोला – मैं आपकी राज्यश्री हूँ। चँकि अब आपके पास न शील है न शौर्य; न वैभव है न तप; न प्रतिष्ठा है न सम्पदा। इसलिए अब मेरे यहां रहने का भी कोई लाभ नहीं है। अत: मैं भी आपको छोड़ रही हूँ। इस प्रकार इन्द्र ने केवल शील लेकर ही प्रह्लाद का सब कुछ ले लिया।

🔴 नि:संदेह चरित्रबल मनुष्य की सबसे बड़ी पूँजी है। चरित्र हो तो हम सब प्राप्त कर सकते हैं, जबकि चरित्र न होने पर हम प्राप्त वस्तुओं से भी हाथ धो बैठते हैं।

🌹 (श्रीमद्भागवत से)

👉 देवत्व विकसित करें, कालनेमि न बनें (भाग 7)

🔴 कुछ नई स्कीम है, जो आज गुरुपूर्णिमा के दिन कहना है और वह यह है कि प्रज्ञा विद्यालय तो चलेगा यहीं, क्योंकि केन्द्र तो यही है, लेकिन जग...