बुधवार, 20 मार्च 2019

👉 अभिमान

एक घर के मुखिया को यह अभिमान हो गया कि उसके बिना उसके परिवार का काम नहीं चल सकता। उसकी छोटी सी दुकान थी। उससे जो आय होती थी, उसी से उसके परिवार का गुजारा चलता था। चूंकि कमाने वाला वह अकेला ही था इसलिए उसे लगता था कि उसके बगैर कुछ नहीं हो सकता। वह लोगों के सामने डींग हांका करता था।

एक दिन वह एक संत के सत्संग में पहुंचा। संत कह रहे थे, “दुनिया में किसी के बिना किसी का काम नहीं रुकता। यह अभिमान व्यर्थ है कि मेरे बिना परिवार या समाज ठहर जाएगा। सभी को अपने भाग्य के अनुसार प्राप्त होता है।” सत्संग समाप्त होने के बाद मुखिया ने संत से कहा, “मैं दिन भर कमाकर जो पैसे लाता हूं उसी से मेरे घर का खर्च चलता है। मेरे बिना तो मेरे परिवार के लोग भूखे मर जाएंगे।” संत बोले, “यह तुम्हारा भ्रम है। हर कोई अपने भाग्य का खाता है।” इस पर मुखिया ने कहा, “आप इसे प्रमाणित करके दिखाइए।” संत ने कहा, “ठीक है। तुम बिना किसी को बताए घर से एक महीने के लिए गायब हो जाओ।” उसने ऐसा ही किया। संत ने यह बात फैला दी कि उसे बाघ ने अपना भोजन बना लिया है।

मुखिया के परिवार वाले कई दिनों तक शोक संतप्त रहे। गांव वाले आखिरकार उनकी मदद के लिए सामने आए। एक सेठ ने उसके बड़े लड़के को अपने यहां नौकरी दे दी। गांव वालों ने मिलकर लड़की की शादी कर दी। एक व्यक्ति छोटे बेटे की पढ़ाई का खर्च देने को तैयार हो गया।

एक महीने बाद मुखिया छिपता-छिपाता रात के वक्त अपने घर आया। घर वालों ने भूत समझकर दरवाजा नहीं खोला। जब वह बहुत गिड़गिड़ाया और उसने सारी बातें बताईं तो उसकी पत्नी ने दरवाजे के भीतर से ही उत्तर दिया, ‘हमें तुम्हारी जरूरत नहीं है। अब हम पहले से ज्यादा सुखी हैं।’ उस व्यक्ति का सारा अभिमान चूर-चूर हो गया।

संसार किसी के लिए भी नही रुकता!! यहाँ सभी के बिना काम चल सकता है संसार सदा से चला आ रहा है और चलता रहेगा।   जगत को चलाने की हाम भरने वाले बडे बडे सम्राट, मिट्टी हो गए, जगत उनके बिना भी चला है। इसलिए अपने बल का, अपने धन का, अपने कार्यों का, अपने ज्ञान का गर्व व्यर्थ है।

👉 आज का सद्चिंतन 20 March 2019

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 20 March 2019


मंगलवार, 19 मार्च 2019

👉 घर

"रेनू की शादी हुये, पाँच साल हो गयें थें, उसके पति थोड़ा कम बोलतें थे पर बड़े सुशील और संस्कारी थें, माता_पिता जैसे सास, ससुर और एक छोटी सी नंनद, और एक नन्ही सी परी, भरा पूरा परिवार था, दिन खुशी से बित रहा था।

आज रेनू बीते दिनों को लेकर बैठी थी, कैसे उसके पिताजी ने बिना माँगे 30 लाख रूपयें अपने दामाद के नाम कर दियें, जिससे उसकी बेटी खुश रहे, कैसे उसके माता_पिता ने बड़ी धूमधाम से उसकी शादी की, बहुत ही आनंदमय तरीके से रेनू का विवाह हुआ था।

खैर बात ये नही थी, बात तो ये थी, रेनू  के बड़े भाई ने, अपने माता-पिता को घर से निकाल दिया था, क्यूकि पैसे तो उनके पास बचे नही थें, जितने थे उन्होने रेनू की शादी में लगा दियें थे, फिर भला बच्चे माँ_बाप को क्यू रखने लगे, रेनू के माता पिता एक मंदिर मे रूके थे, रेनू आज उनसे मिल के आयी थी, और बड़ी उदास रहने लगी थी, आखिर लड़की थी, अपने माता_पिता के लिए कैसे दुख नही होता, कितने नाजों से पाला था, उसके पिताजी ने बिल्कुल अपनी गुडिया बनाकर रखा था, आज वही माता_पिता मंदिर के किसी कोने में भूखे प्यासे पड़ें थे।

रेनू अपने पति से बात करना चाहती थी, वो अपने माता_पिता को घर ले आए, पर वहाँ हिम्मत नही कर पा रही थी, क्यूकि उनके पति कम बोलते थे, अधिकतर चुप रहते थे, जैसे तैसे रात हुई रेनू के पति और पूरा परिवार खाने के टेबल पर बैठा था, रेनू की ऑखे सहमी थी, उसने डरते हुये अपने पति से कहा, सुनिये जी, भाईया भाभी ने मम्मी-पापा को घर से निकाल दिया हैं, वो मंदिर में पड़े है, आप कहें तो उनको घर ले आऊ, रेनू के पति ने कुछ नही कहा, और खाना खत्म कर के अपने कमरे में चला गया, सब लोग अभी तक खाना खा रहे थे, पर रेनू के मुख से एक निवाला भी नही उतरा था, उसे बस यही चिंता सता रही थी अब क्या होगा, इन्होने भी कुछ नही कहा, रेनू रूहासी सी ऑख लिए सबको खाना परोस रही थी।

थोड़ी देर बाद रेनू के पति कमरे से बाहर आए, और रेनू के हाथ में नोटो का बंडल देते हुये कहा, इससे मम्मी, डैडी के लिए एक घर खरीद दो, और उनसे कहना, वो किसी बात की फ्रिक ना करें मैं हूं, रेनू ने बात काटते हुये कहा, आपके पास इतने पैसे कहा से आए जी?

रेनू के पति ने कहा, ये तुम्हारे पापा के दिये गये ही पैसे है, मेरे नही थे, इसलिए मैंने हाथ तक नही लगाए, वैसे भी उन्होने ये पैसे मुझे जबरदस्ती दिये थे, शायद उनको पता था एक दिन ऐसा आयेगा, रेनू के सास_ससुर अपने बेटे को गर्व भरी नजरो से देखने लगें, और उनके बेटे ने भी उनसे कहा, अम्मा जी बाबूजी सब ठीक है ना?

उसके अम्मा बाबूजी ने कहा बड़ा नेक ख्याल है बेटा, हम तुम्हें बचपन से जानते हैं, तुझे पता है, अगर बहू अपने माता_पिता को घर ले आयी, तो उनके माता पिता शर्म से सर नही उठा पायेंगे, की बेटी के घर में रह रहे, और जी नही पाएगें, इसलिए तुमने अलग घर दिलाने का फैसला किया हैं, और रही बात इस दहेज के पैसे की, तो हमें कभी इसकी जरूरत नही पड़ी, क्यूकि तुमने कभी हमें किसी चीज की कमी होने नही दी, खुश रहो बेटा कहकर रेनू और उसके पति को छोड़ सब सोने चले गयें।

रेनू के पति ने फिर कहा, अगर और तुम्हें पैसों की जरूरत हो तो मुझे बताना, और अपने माता_पिता को बिल्कुल मत बताना घर खरीदने को पैसे कहा से आए, कुछ भी बहाना कर देना, वरना वो अपने को दिल ही दिल में कोसते रहेंगें, चलो अच्छा अब मैं सोने जा रहा, मुझे सुबह दफ्तर जाना हैं, रेनू का पति कमरे में चला गया, और रेनू खुद को कोसने लगी, मन ही मन ना जाने उसने क्या क्या सोच लिया था, मेरे पति ने दहेज के पैसे लिए है, क्या वो मदद नही करेंगे करना ही पड़ेगा, वरना मैं भी उनके माँ-बाप की सेवा नही करूगी, रेनू सब समझ चुकी थी, की उसके पति कम बोलते हैं, पर उससे ज्यादा कही समझतें हैं।

रेनू उठी और अपने पति के पास गयी, माफी मांगने, उसने अपने पति से सब बता दिया, उसके पति ने कहा कोई बात नही होता हैं, तुम्हारे जगह मैं भी होता तो यही सोचता, रेनू की खुशी का कोई ठिकाना नही था, एक तरफ उसके माँ_बाप की परेशानी दूर दूसरी तरफ, उसके पति ने माफ कर दिया।

रेनू ने खुश और शरमाते हुये अपने पति से कहा, मैं आपको गले लगा लूं, उसके पति ने हट्टहास करते हुये कहा, मुझे अपने कपड़े गंदे नही करने, दोनो हंसने लगें।
और शायद रेनू को अपने कम बोलने वालें पति का ज्यादा प्यार समझ आ गया,,,,,,,,,

👉 आज का सद्चिंतन 19 March 2019

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 March 2019


👉 Amrit Chintan

Don’t be over ambitious. Otherwise you will loose your normal mental peace. Learn to work hard for progress and be kind and helpful to others. If you will love others you will get the same in return.

📖 A. J. Sept, 1989

Our call is not for some worship of Gayatri Anusthan of Novratri is but we have a distant vision of life. That vision is that in the new coming era. We have great opportunities for our life. We need your help and that is you also become a instrument to develop our Nation.

📖 Vangmay No. 36, p 4.20

Prayers, worship and other rituals become important tools when we attach our commitments for the wisher of the Almighty. Then the prayers show all results described in the books of mythology.

~ Lokmanya Tilak

My scholars!
There is no other way then to face and pushing back the terrorist of this time. Wild animals do not understand the civic language. Bad people also do not listen to any good advice. Even the incarnated soul on this earth had to fight with people like Ravan and Kans in the time of Lord Rama and Krishna. The fight of Lanka and Mahabharat could not be avoided. To save the self and the humanity even God had to fight to establish peace and harmony in life.

📖 Pragyopanishad p. 2.27

The most important component humanity is his character. His ideality, courage makes him a successful man. It is that foundation on which grows the personality of a rishi divinity and no less than a God.

👉 दीपक का आश्वासन

सूरज विदा होने को था- अंधकार की तमिस्रा सन्निकट थी। इतने में एक टिमटिमाता दीपक आगे आया और सूरज से बोल उठा-'भगवन्! आप सहर्ष पधारें। मैं निरन्तर जलते रहने का व्रत नहीं तोडूँगा जैसे आपने चलने का व्रत नहीं तोड़ा है। आपके अभाव में थोड़ा ही सही, पर प्रकाश देकर अंधकार को मिटाने का मैं पूरा-पूरा प्रयास करूँगा। ' छोटे से दीपक का आश्वासन सुनकर सूर्य भगवान ने उसके साहस की सराहना की व सहर्ष विदा हुए।

प्रयत्न भले ही छोटे हों पर प्रभु के कार्यों में ऐसे ही भावनाशीलों का थोड़ा-थोड़ा अंश मिलकर युगान्तरकारी कार्य कर दिखाता है।

आदर्शवादी दुस्साहस की ही प्रशंसा होती है। वह सत्साहस के रूप में उत्पन्न होता है और असंख्यों को अनुप्राणित करता है। श्रेय किस व्यक्ति को मिला यह बात नितान्त गौण है। यह तो झण्डा लेकर आगे चलने वाले की फोटो के समान है। जबकि उस सैन्यदल में अनेकों का शौर्य, पुरुषार्थ झण्डाधारी की तुलना में कम नहीं, अधिक होता है।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग १

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1) श्लोक 48 से 51

उवाच भगवांस्तात! दिग्भ्रान्तान् दर्शयाग्रत: ।
यथार्थताया आलोकं सन्मार्गे गन्तुमेव च॥४८॥
तर्कतथ्ययुतं मार्गं त्वं प्रदर्शय साम्प्रतम् ।
उपायं च द्वितीयं सं तदाधारसमुद्भवम्॥ ४९॥
उत्साहं सरले कार्ये योजयाभ्यस्ततां यत: ।
परिचितिं युगधर्में च गच्छेयुर्मानवा: समे॥५०॥
चरणौ द्वाविमौ पूर्णावाधारं प्रगतेर्मम ।
अवतारक्रियाकर्त्ता चेतना सा युगान्तरा॥५१॥

टीका- भगवान् बोले- हे तात्? सर्वप्रथम दिग्भ्रान्तों को यथार्थता का आलोक दिखाना और सन्मार्ग अपनाने के लिए तर्क और तथ्यों सहित मार्गदर्शन करना है, दूसरा उपाय इस आधार पर उभरे हुए उत्साह को किसी सरल कार्यक्रम में जुटा देना है ताकि युग धर्म से वे परिचित और अभ्यस्त हो सकें? इन दो चरणों के उठ जाने पर आगे की प्रगति का आधार मेरी अवतरण प्रक्रिया-युगान्तरीय चेतना स्वयमेव सम्पन्न कर लेगी॥४८-५१॥

व्याख्या- युग परिवर्तन का कार्य योजनाबद्ध ढंग से ही किया जा सकता है। सबसे पहले तो सुधारकों, अग्रगामियों को अपने सहायक ढूँढ़ने के लिए निकलना होता है, उन्हें उँगली पकड़कर चलना सिखाना पड़ता है। जब वे अपनी दिशा समझ लेते हैं, उच्चस्तरीय पथ पर चलने के लिए वे सहमत हो जाते हैं, तब उन्हें सुनियोजित कार्य पद्धति समझाकर उनके उत्साह को क्रियारूप देना होता है। यही नीति हर अवतार की रही है। इतना बन पड़ने पर शेष कार्य वह चेतन-सत्ता स्वयं कर लेती है।

समस्या तब उठ खड़ी होती है, जब व्यक्ति ईश्वरीय सत्ता की इच्छा-आकांशा जानते हुए भी व्यामोह में फँसे दिशा भूले की तरह जीवन बिताते हैं अथवा उद्देश्य को जानते हुए भी अपने उत्साह को सही नियोजित नहीं कर पाते।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 22

शनिवार, 16 मार्च 2019

👉 स्वर्ग का देवता

लक्ष्मी नारायण बहुत भोला लड़का था। वह प्रतिदिन रात में सोने से पहले अपनी दादी से कहानी सुनाने को कहता था। दादी उसे नागलोक, पाताल, गन्धर्व लोक, चन्द्रलोक, सूर्यलोक आदि की कहानियाँ सुनाया करती थी।

एक दिन दादी ने उसे स्वर्ग का वर्णन सुनाया। स्वर्ग का वर्णन इतना सुन्दर था कि उसे सुनकर लक्ष्मी नारायण स्वर्ग देखने के लिये हठ करने लगा। दादी ने उसे बहुत समझाया कि मनुष्य स्वर्ग नहीं देख सकता, किन्तु लक्ष्मीनारायण रोने लगा। रोते- रोते ही वह सो गया।

उसे स्वप्न में दिखायी पड़ा कि एक चम- चम चमकते देवता उसके पास खड़े होकर कह रहे हैं- बच्चे ! स्वर्ग देखने के लिये मूल्य देना पड़ता है। तुम सरकस देखने जाते हो तो टिकट देते हो न? स्वर्ग देखने के लिये भी तुम्हें उसी प्रकार रुपये देने पड़ेंगे।

स्वप्न में लक्ष्मीनारायण सोचने लगा कि मैं दादी से रुपये माँगूँगा। लेकिन देवता ने कहा- स्वर्ग में तुम्हारे रुपये नहीं चलते। यहाँ तो भलाई और पुण्य कर्मों का रुपया चलता है।
अच्छा, काम करोगे तो एक रुपया इसमें आ जायगा और जब कोई बुरा काम करोगे तो एक रुपया इसमें से उड़ जायगा। जब यह डिबिया भर जायगी, तब तुम स्वर्ग देख सकोगे।

जब लक्ष्मीनारायण की नींद टूटी तो उसने अपने सिरहाने सचमुच एक डिबिया देखी। डिबिया लेकर वह बड़ा प्रसन्न हुआ। उस दिन उसकी दादी ने उसे एक पैसा दिया। पैसा लेकर वह घर से निकला।

एक रोगी भिखारी उससे पैसा माँगने लगा। लक्ष्मीनारायण भिखारी को बिना पैसा दिये भाग जाना चाहता था, इतने में उसने अपने अध्यापक को सामने से आते देखा। उसके अध्यापक उदार लड़कों की बहुत प्रशंसा किया करते थे। उन्हें देखकर लक्ष्मीनारायण ने भिखारी को पैसा दे दिया। अध्यापक ने उसकी पीठ ठोंकी और प्रशंसा की।

घर लौटकर लक्ष्मीनारायण ने वह डिबिया खोली, किन्तु वह खाली पड़ी थी। इस बात से लक्ष्मी नारायण को बहुत दुःख हुआ। वह रोते- रोते सो गया। सपने में उसे वही देवता फिर दिखायी पड़े और बोले- तुमने अध्यापक से प्रशंसा पाने के लिये पैसा दिया था, सो प्रशंसा मिल गयी।

अब रोते क्यों हो ? किसी लाभ की आशा से जो अच्छा काम किया जाता है, वह तो व्यापार है, वह पुण्य थोड़े ही है। दूसरे दिन लक्ष्मीनारायण को उसकी दादी ने दो आने पैसे दिये। पैसे लेकर उसने बाजार जाकर दो संतरे खरीदे।

उसका साथी मोतीलाल बीमार था। बाजार से लौटते समय वह अपने मित्र को देखने उसके घर चला गया। मोतीलाल को देखने उसके घर वैद्य आये थे। वैद्य जी ने दवा देकर मोती लाल की माता से कहा- इसे आज संतरे का रस देना।

मोतीलाल की माता बहुत गरीब थी। वह रोने लगी और बोली- ‘मैं मजदूरी करके पेट भरती हूँ। इस समय बेटे की बीमारी में कई दिन से काम करने नहीं जा सकी। मेरे पास संतरे खरीदने के लिये एक भी पैसा नहीं है।’

लक्ष्मीनारायण ने अपने दोनों संतरे मोतीलाल की माँ को दिये। वह लक्ष्मीनारायण को आशीर्वाद देने लगी। घर आकर जब लक्ष्मीनारायण ने अपनी डिबिया खोली तो उसमें दो रुपये चमक रहे थे।

एक दिन लक्ष्मीनारायण खेल में लगा था। उसकी छोटी बहिन वहाँ आयी और उसके खिलौनों को उठाने लगी। लक्ष्मीनारायण ने उसे रोका। जब वह न मानी तो उसने उसे पीट दिया।

बेचारी लड़की रोने लगी। इस बार जब उसने डिबिया खोली तो देखा कि उसके पहले के इकट्ठे कई रुपये उड़ गये हैं। अब उसे बड़ा पश्चाताप हुआ। उसने आगे कोई बुरा काम न करने का पक्का निश्चय कर लिया।

मनुष्य जैसे काम करता है, वैसा उसका स्वभाव हो जाता है। जो बुरे काम करता है, उसका स्वभाव बुरा हो जाता है। उसे फिर बुरा काम करने में ही आनन्द आता है। जो अच्छा काम करता है, उसका स्वभाव अच्छा हो जाता है। उसे बुरा काम करने की बात भी बुरी लगती है।

लक्ष्मीनारायण पहले रुपये के लोभ से अच्छा काम करता था। धीरे- धीरे उसका स्वभाव ही अच्छा काम करने का हो गया। अच्छा काम करते- करते उसकी डिबिया रुपयों से भर गयी। स्वर्ग देखने की आशा से प्रसन्न होता, उस डिबिया को लेकर वह अपने बगीचे में पहुँचा।

लक्ष्मीनारायण ने देखा कि बगीचे में पेड़ के नीचे बैठा हुआ एक बूढ़ा साधु रो रहा है। वह दौड़ता हुआ साधु के पास गया और बोला- बाबा ! आप क्यों रो रहे है? साधु बोला- बेटा जैसी डिबिया तुम्हारे हाथ में है, वैसी ही एक डिबिया मेरे पास थी। बहुत दिन परिश्रम करके मैंने उसे रुपयों से भरा था।

बड़ी आशा थी कि उसके रुपयों से स्वर्ग देखूँगा, किन्तु आज गंगा जी में स्नान करते समय वह डिबिया पानी में गिर गयी। लक्ष्मी नारायण ने कहा- बाबा ! आप रोओ मत। मेरी डिबिया भी भरी हुई है। आप इसे ले लो।

साधु बोला- तुमने इसे बड़े परिश्रम से भरा है, इसे देने से तुम्हें दुःख होगा। लक्ष्मी नारायण ने कहा- मुझे दुःख नहीं होगा बाबा ! मैं तो लड़का हूँ। मुझे तो अभी बहुत दिन जीना है। मैं तो ऐसी कई डिबिया रुपये इकट्ठे कर सकता हुँ। आप बूढ़े हो गये हैं। आप मेरी डिबिया ले लीजिये।

साधु ने डिबिया लेकर लक्ष्मीनारायण के नेत्रों पर हाथ फेर दिया। लक्ष्मीनारायण के नेत्र बंद हो गये। उसे स्वर्ग दिखायी पड़ने लगा। ऐसा सुन्दर स्वर्ग कि दादी ने जो स्वर्ग का वर्णन किया था, वह वर्णन तो स्वर्ग के एक कोने का भी ठीक वर्णन नहीं था।

जब लक्ष्मीनारायण ने नेत्र खोले तो साधु के बदले स्वप्न में दिखायी पड़ने वाला वही देवता उसके सामने प्रत्यक्ष खड़ा था। देवता ने कहा- बेटा ! जो लोग अच्छे काम करते हैं, उनका घर स्वर्ग बन जाता है। तुम इसी प्रकार जीवन में भलाई करते रहोगे तो अन्त में स्वर्ग में पहुँच जाओगे।’ देवता इतना कहकर वहीं अदृश्य हो गये।

👉 पराधीन सपनेहु सुख नाहीं

पराश्रित होने पर मनुष्य को अपना सम्मान खोना पड़ता है। वह दूसरों की दया पर निर्भर रहता है। अत: इससे उसकी मानसिक परतन्त्रता प्रारंभ हो जाती है। यह सबसे बुरी गुलामी होती है। दूसरों की दया कृपा पक्ष पाने के लिए उसे अपनी आत्मा के विरुद्ध जाना पड़ता है। अपनी आत्मा को दबाना पड़ता है। अत: दान लेना हमारे लिए शरम की बात होनी चाहिये।

जो दूसरों से भिक्षा प्राप्त करके जीवन में सुख और सफलता चाहते हैं उन्हें सिवाय कष्ट निराशा पश्चाताप ओेर निरादर के अलावा कुछ नहीं मिलता। अत: अपने पैरों पर खड़े हो। दूसरों का मुह न ताकें। तुम मनुष्य हो कुत्ते नहीं कि किसी ने दया करके एक टुकड़ा फेक दिया और तुम दुम हिलाने लगे।

तुम ईश्वर के महान पुत्र हो। तुम सर्व समर्थ हो। तुम क्षमता वान हो। तुम केवल अपने असीम बल को भूले हुए हो। अपने ऊपर भरोसा रखो। अपनी महानता को सोचो। अपने अज्ञान का परित्याग करो। शेर के पुत्र होकर तुम बकरियों की तरह मिमियाते हो? याद रखे भगवान ने तुम्हें हाथ पैर बुद्धि सब कुछ दिया है। यदि परिस्थितियां अनुकूल नहीं है और तुम्हें किसी दूसरे का आश्रय ग्रहण करने को बाध्य होना पड़े तो उससे जल्दी से जल्दी भागने का प्रयत्न करो। आत्म निर्भर बनो।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1960

👉 आज का सद्चिंतन 16 March 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 March 2019


👉 जागते को दसों सिद्धियाँ

एक सन्त दस शिष्यों समेत सघन बन में रहते थे। एक रात्रि को उनने एक विशेष साधना कराई। शिष्यों पंक्तिबद्ध होकर ध्यान करने के लिए बिठा दिया। रात्रि के तीसरे प्रहर गुरु ने धीमे में आवाज दी-'राम!' राम उठा, गुरु ने उसे चुपके से दुर्लभ सिद्धि प्रदान की। अब दूसरें की बारी आई। पुकार श्याम। पर श्याम तो सो रहा था। इस बार भी राम ही आया और दूसरी सिद्धि भी लेकर चला गया।

शेष सभी शिष्य सो रहे थे। गुरु को उस दिन दस सिद्धियाँ देनी थीं। सोते को जगाने का निषेध था। दसों बार राम ही आया और एक-एक करके दसों सिद्धियाँ प्राप्त करके कृत-कृत्य हो गया। सोने वाले दूसरे दिन जागे और अपनी भूल पर पूछताने लगे।

निराकार सत्ता की प्रेरणा इसी प्रकार हम सबको टटोलती है। जो जागृत होते हैं, वे ही उस प्रेरणा को समझ पाते हैं, शक्ति पाकर सामर्थ्यवान् बनते तथा सारे वातावरण को बदल कर रख देते हैं।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग १

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1) श्लोक 46 से 47

प्राह नारद इच्छाया: स्वकीयाया भवान् मम।
जिज्ञासायाश्च प्रस्तौति यं समन्वयमद्भुतम॥४६॥

आत्मा मे पुलकितस्तेन स्पष्टं निर्दिश भूतले।
प्रतिगत्य च किं कार्यं येन सिद्धयेत्प्रयोजनम्॥४७॥

टीका- नारद ने कहा-है देव! अपनी इच्छा और मेरी जिज्ञासा का आप जो अद्भुत समन्वय प्रस्तुत कर रहे हैं उससे मेरी अन्तरात्मा पुलकित हो रही है । कृपया स्पष्ट निर्देश कीजिए किं पुन: मृत्युलोक में वापस जाकर मुझे क्या करना चाहिए, ताकि आपका प्रयोजन पूर्ण हो॥४६-४७॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 22

गुरुवार, 14 मार्च 2019

👉 Charity परोपकार Paropkar:-

एक अमीर आदमी विभिन्न मंदिरों में जन कल्याणकारी कार्यो के लिए धन देता था। विभिन्न उत्सवों व त्योहारों पर भी वह दिल खोलकर खर्च करता। शहर के लगभग सभी मंदिर उसके दिए दान से उपकृत थे। इसीलिए लोग उसे काफी इज्जत देते थे।

उस संपन्न व्यक्ति ने एक नियम बना रखा था कि वह प्रतिदिन मंदिर में शुद्ध घी का दीपक जलाता था। दूसरी ओर एक निर्धन व्यक्ति था नित्य तेल का दीपक जलाकर एक अंधेरी गली में रख देता था। जिससे लोगों को आने-जाने में असुविधा न हो। संयोग से दोनों की मृत्यु एक ही दिन हुई। दोनों यमराज के पास साथ-साथ पहुंचे। यमराज ने दोनों से उनके द्वारा किए गए कार्यो का लेखा-जोखा पूछा। सारी बात सुनकर यमराज ने धनिक को निम्न श्रेणी और निर्धन को उच्च श्रेणी की सुख-सुविधाएं दीं।

धनिक ने क्रोधित होकर पूछा- “यह भेदभाव क्यों? जबकि मैंने आजीवन भगवान के मंदिर में शुद्ध घी का दीपक जलाया और इसने तेल का दीपक रखा। वह भी अंधेरी गली में, न कि भगवान के समक्ष?”

तब यमराज ने समझाया- “पुण्य की महत्ता मूल्य के आधार पर नहीं, कर्म की उपयोगिता के आधार पर होती है। मंदिर तो पहले से ही प्रकाशयुक्त था। जबकि इस निर्धन ने ऐसे स्थान पर दीपक जलाकर रखा, जिसका लाभ अंधेरे में जाने वाले लोगों को मिला। उपयोगिता इसके दीपक की अधिक रही। तुमने तो अपना परलोक सुधारने के स्वार्थ से दीपक जलाया था।“

सार यह है कि ईश्वर के प्रति स्वहितार्थ प्रदर्शित भक्ति की अपेक्षा परहितार्थ कार्य करना अधिक पुण्यदायी होता है और ऐसा करने वाला ही सही मायनों में पुण्यात्मा होता है क्योंकि ‘स्व’ से ‘पर’ सदा वंदनीय होता है।

इसके अतिरिक्त कुछ लोग सिर्फ मंदिर को ही भगवान का घर और विषेश आवरण धारीयों को ही ईश्वर के निकटवर्ती मान लेते हैं। जबकी इतनी बडी दुनिया बनाने वाले का सिर्फ मंदिर में समेट देना उचित नहीं।

मंदिर पूजा गृह हैं जहाँ हम अपने अंतःवासी भगवान से मिलते हैं, अतः मंदिर में दिया स्वयं को दिया हो जाता है... पर भगवान कण-कण वासी हैं उनकी सेवा के लिये मंदिर के बाहर आना होगा, और जीव मात्र, चर-अचर जगत की सेवा और सत्कार का भाव तन-मन में जगाना होगा।

👉 जटायु व गिलहरी चुप नहीं बैठे

पंख कटे जटायु को गोद में लेकर भगवान् राम ने उसका अभिषेक आँसुओं से किया। स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए भगवान् राम ने कहा-तात्। तुम जानते थे रावण दुर्द्धर्ष और महाबलवान है, फिर उससे तुमने युद्ध क्यों किया?

अपनी आँखों से मोती ढुलकाते हुए जटायु ने गर्वोन्नत वाणी में कहा- प्रभो! मुझे मृत्यु का भय नहीं है, भय तो तब था जब अन्याय के प्रतिकार की शक्ति नहीं जागती?

भगवान् राम ने कहा-तात्! तुम धन्य हो! तुम्हारी जैसी संस्कारवान् आत्माओं से संसार को कल्याण का मार्गदर्शन मिलेगा।

गिलहरी पूँछ में धूल लाती और समुद्र में डाल आती। वानरों ने पूछा-देवि! तुम्हारी पूँछ की मिट्टी से समुद्र का क्या बिगडे़गा। तभी वहाँ पहुँचे भगवान् राम ने उसे अपनी गोद में उठाकर कहा 'एक-एक कण धूल एक-एक बूँद पानी सुखा देने के मर्म को समझो वानरो। यह गिलहरी चिरकाल तक सत्कर्म में सहयोग के प्रतीक रूप में सुपूजित रहेगी।

जो सोये रहते हैं वे तो प्रत्यक्ष सौभाग्य सामने आने पर भी उसका लाभ नहीं उठा पाते। जागृतात्माओं की तुलना में उनका जीवन जीवित-मृतकों के समान ही होता है।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग १

👉 मन दर्पण


मन तो बस दर्पण है। यदि वह स्वच्छ है शुद्ध है तो इसमें असीम प्रतिद्वंद्वित हो सकता है। वह प्रतिबिंब असीम न होगा पर झलक जरूर होगी उसकी लेकिन यही झलक बाद में द्वार बन जाती है। प्रतिबिंब पीछे छूट जाता है ओेर अनन्त में प्रवेश मिल जाता है। बाहरी तौर पर यह बात थोड़ी अटपटी लग सकती है। भला कैसे इतने छोटे से मन से कोई सम्पर्क बन सकता है शाश्वत के साथ अनन्त के साथ। इस सच्चाई को कुछ यो समझा जा सकता है जेेसे कि खिड़की की छोटी सी चोेखट से असीम आकाश का दिखना। भले ही खिड़की से सारा आकाश नहीं दिखाई पड़ता लेकिन जो दिखाई देता है वह अकाश ही है।

कुछ इसी तरह स्वच्छ मन शुद्ध मन से परमात्मा की झलक मिलती है। दरअसल अपना मन भी गहरे में परमात्मा का ही हिस्सा है। मेरा तेरा के जटिल भाव ने इसे छोटा बना दिया है। परमात्मा के असीम व अनन्त स्वरूप के बारे मे उपनिषदों में बहुत कुछ विरोधाभासि बातें कही गई है। इनमें से एक बात है कि अन्श हमेशा पूर्ण के बराबर होता है क्योंकि अनन्त को बांटा नहीं जा सकता। ठीक वैसे ही जैसे कि आकाश का विभाजन सम्भव नहीं है। कहने वाले भले ही कहते हैं कि मेरे घर के ऊपर का आकाश मेरा तुम्हारे घर के ऊपर का आकाश तुम्हारा।

इस प्रकार के कथनों के बावजूद आकाश अविभाजित अनन्त विस्तार है। इसका न कोई आरम्भ है और न कोई अन्त। न यह मेरा है न तेरा न तो भारतीय है न ही चीनी या पाकिस्तानी। बस कुछ ऐसी ही बात मन के साथ है। मन के साथ जुड़ी मेरी तुम्हारी मनोदशा भ्रान्ति है। इस भ्रान्ति के कारण ही मन सीमित हो गया है। सीमित होने की धारणा एक भ्रम है इसे ही तो मिटाना है।

अध्यात्म की समूची साधना इस लिए है। इसके पहले चरण में मन को स्वच्छ शुद्ध करना है। दूसरे चरण में मनोदशा के ढाचे को गिरा देना है। इसके गिरते ही बस परमात्मा की पूर्णता बचती है। तर्क भले ही कहता रहे कोई अन्श पूर्ण के बराबर केेसे हो सकता है। लेकिन ईशावस्य उपनिषद के रिशि का अनुभव कहता है कि पूर्ण से पूर्ण निकालने के बाद भी पूर्ण ही बचता है और पूर्ण में पूर्ण डालने पर भी पूर्ण बनता है। स्वच्छ व शुद्ध मन से जो अनुभव किया जाता है वह परमात्मा की पूर्णता का अनुभव ही है।

अखन्ड ज्योति जुलाई २०१४ पृष्ठ ३ 

👉 आज का सद्चिंतन 14 March 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 March 2019


👉 Donation of time - the supreme charity

There is no dearth of monetary donations. Money, while it can enable the construction of roads and rivers, it cannot elevate the level of human consciousness. That daunting task calls for noble souls donating their time with emotional commitment.

The creation of the new era needs time, faith, devotion, and enthusiasm, and not just money. For this daunting task, all those wads of money are of no real use. The true and supreme charity is one of time donation. It is possible to donate money to a cause with stinginess and reluctance, especially if it is for reasons of ego, prestige, and social pressure, even when we don't fully believe in the cause.

Donation of our precious time, however, often comes from a place of devotion and faith in the cause. Rich and poor alike may participate in this charity of conviction. The new era needs this supreme charity, let us hope that our community will not hold anything back and donate their time in abundance!

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojna - philosophy, format and program -66 (3.7)

👉 समय दान का महत्ता

धन का दान करने वाले बहुत हैं। धन के बल पर नहर, सडक़ बन सकती है। परन्तु लोकमानस को उत्कृष्ट नहीं बनाया जा सकता। यह कार्य सत्पुरुषों के भावनापूर्ण समय दान से ही सम्भव होगा।

युग-निर्माण के लिए धन की नहीं, समय की, श्रद्धा की, भावना की, उत्साह की आवश्यकता पड़ेगी। नोटों के बण्डल यहॉं कूड़े-करकट के समान सिद्ध होंगे। समय का दान ही सबसे बड़ा दान है, सच्चा दान है। धनवान लोग अश्रद्धा एवं अनिच्छा रहते हुए भी मान, प्रतिफल, दबाव या अन्य किसी कारण से उपेक्षापूर्वक भी कुछ पैसे दान खाते में फेंक सकते हैं, पर समय-दान केवल वही कर सकेगा जिसकी उस कार्य में श्रद्धा होगी।

इस श्रद्धायुक्त समय-दान में गरीब और अमीर समान रूप से भाग ले सकते हैं। युग-निर्माण के लिए इसी दान की आवश्यकता पड़ेगी और आशा की जाएगी कि अपने परिवार के लोगों में से कोई इस दिशा में कंजूसी न दिखायेगा।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (३.७)

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1) श्लोक 40 से 45

गायत्री ब्रह्म विद्या है। उसी को कामधेनु कहते हैं। स्वर्ग के देवता इसी का पयपान करके सोमपान का आनन्द लेते और सदा निरोग, परिपुष्ट एवं युवा बने रहते हैं। गायत्री को कल्पवृक्ष कहा गया है। इसका आश्रय लेने वाला अभावग्रस्त नहीं रहता। गायत्री ही पारस है। जिसका आश्रय, सान्निध्य लेने वाला लोहे जैसी कठोरता, कालिमा खोकर स्वर्ण जैसी आभा और गरिमा उपलब्ध करता है। गायत्री ही अमृत है। इसे अन्तराल में उतारने वाला अजर-अमर बनता है। स्वर्ग और मुक्ति को जीवन का परम लक्ष्य माना गया है। यह दोनों ही गायत्री द्वारा साधक को अजस्र- अनुदान के रूप में अनायास ही मिलते हैं। मान्यता है कि गायत्री माता का सच्चे मन से आंचल पकड़ने वाला कभी कोई निराश नहीं रहता। संकट की घड़ी में वह तरण-तारिणी बनती है। उत्थान के प्रयोजनों में उसका समुचित वरदान मिलता है। अज्ञान के अन्धकार में भटकाव दूर करके और सन्मार्ग का सही रास्ता प्राप्त करके चरम प्रगति के लक्ष्य तक जा पहुँचना गायत्री माता का आश्रय लेने पर सहज सम्भव होता है।

प्रज्ञा व्यक्तिगत जीवन को अनुप्राणित करती है, इसे 'ऋतम्भरा' अर्थात् श्रेष्ठ में ही रमण करने वाली कहते हैं। महाप्रज्ञा इस ब्रह्माण्ड में संव्याप्त है। उसे दूरदर्शिता, विवेकशीलता, न्यायनिष्ठा, सद्भावना, उदारता के रूप में प्राणियों पर अनुकम्पा बरसाते और पदार्थो को गतिशील, सुव्यवस्थित एवं सौन्दर्य युक्त बनाते देखा जा सकता है। परब्रह्म की वह धारा जो मात्र मनुष्य के काम आती एवं आगे बढ़ाने, ऊँचा उठाने की भूमिका निभाती है- 'महाप्रज्ञा' है। ईश्वरीय अगणित विशेषताओं एवं क्षमताओं से प्राणि-जगत एवं पदार्थ-जगत उपकृत होते हैं, किन्तु मनुष्य को जिस आधार पर ऊर्ध्वगामी बनने-परमलक्ष्य तक पहुँचने का अवसर मिलता है, उसे महाप्रज्ञा ही समझा जाना चाहिए। इसका जितना अंश जिसे, जिस प्रकार भी उपलब्ध हो जाता है वह उतने ही अंश में कृत-कृत्य बनता है।

मनुष्य में देवत्व का, दिव्य क्षमताओं का उदय-उद्भव मात्र एक ही बात पर अवलम्बित है कि महाप्रज्ञा की अवधारणा उसके लिए कितनी मात्रा में संभव हो सकी। महाप्रज्ञा का ब्रह्म विद्या पक्ष अन्त:करण को उच्चस्तरीय आस्थाओं से आनन्दविभोर करने के काम आता है। दूसरा पक्ष साधना है, जिसे विज्ञान या पराक्रम कह सकते हैं, इसके अन्तर्गत आस्था को उछाला और परिपुष्ट किया जाता है। मात्र ज्ञान ही पर्याप्त नहीं होता। कर्म के आधार पर उसे संस्कार, स्वभाव, अभ्यास के स्तर तक पहुँचाना होता है। साधना का प्रयोजन श्रद्धा को निष्ठा में-निर्धारण की-अभ्यास की-स्थिति में पहुँचाना है। इसलिए अग्रदूतों, तत्वज्ञानियों, जीवनमुक्तों एवं जागृत आत्माओं को भी साधना का अभ्यास क्रम नियमित रूप से चलाना होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 20

बुधवार, 13 मार्च 2019

Surrender Yourself | आत्म समर्पण करो | हारिये न हिम्मत | दिन 6



Title

👉 आत्मनिरीक्षण व आत्मसुधार

पुजारी नियत समय पूजा करने आता और आरती करते-करते वह भाव विहल हो जाता, पर घर जाते ही वह अपने पत्नी-बच्चों के प्रति कर्कश व्यवहार करने लगता।

एक दिन उसका नन्हा बच्चा भी साथ लगा चला आया। पुजारी स्तुति कर रहा था- हे प्रभु? तुम सबसे प्यार करने वाले, सब पर करूणा लुटाने वाले हो।

अभी वह इतना ही कह पाया था कि बच्चा बोल उठा- पिताजी? जिस भगवान के पास इतने दिन रहने पर भी आप करूणा और प्यार करना न सीख सके, उस भगवान के पास रहने से क्या लाभ? पुजारी को अपनी भूल मालूम पड़ गई, वह उस दिन से आत्मनिरीक्षण व आत्मसुधार में लग गया।

भगवान के गुणों का कीर्तन ही नहीं, उन्हों जीवन में उतारने का प्रयास भी करना चाहिए।

👉 आज का सद्चिंतन 13 March 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 March 2019


👉 भगवान् का आमन्त्रण

यह एक प्रमाणित तथ्य हैं कि जिन्होंने भगवान का आमन्त्रण सुना है वह कभी घाटे में नहीं रहे। बुद्ध ने 'धर्मम् बुद्धम् संघम् शरणम् गच्छामि' का नारा लगाया और संव्याप्त अनीति-अनाचार से जूझने हेतु आमन्त्रण दिया तो असंख्यों व्यक्ति युग की पुकार पर सब कुछ छोड़कर उनके साथ हो लिए। उन्होंने तत्कालीन व्यवस्था को बदलने के लिए उन भिक्षुओं के माध्यम से जो बौद्धिक क्रान्ति सम्पन्न की, उसी का परिणाम था कि कुरीतियुक्त समाज का नव निर्माण सम्भव हो सका।

इसी तरह का चमत्कार गाँधी युग में भी उत्पन्न हुआ। अंग्रेजों की सामर्थ्य और शक्ति पहाड़ जितनी ऊँची थी। उन दिनों यह कहावत आम प्रचलित थी कि अंग्रेजों के राज्य में सूर्य अस्त नहीं होता था। बुद्धि, कौशल में भी उनका कोई सानी नहीं था। फिर निहत्थे मुट्ठी भर सत्याग्रही उनका क्या बिगाड़ सकते थे। हजार वर्ष से गुलाम रही जनता में भी ऐसा साहस नहीं था कि इतने शक्तिशाली साम्राज्य से लोहा ले सके और त्याग-बलिदान कर सके। ऐसी निराशापूर्ण परिस्थितियों में भी फिर एक अप्रत्याशित उभार उमड़ा और स्वतन्त्रता संग्राम छिड़ा, यही नहीं अन्तत वह विजयी होकर रहा।

उस संग्राम में सर्वसाधारण ने जिस पराक्रम का परिचय दिया वह देखते ही बनता था। असमर्थो की समर्थता, साधनहीनों को साधनों की उपलब्धता तथा असहायों को सहायता के लिए न जाने कहाँ से अनुकूलताएँ उपस्थित हुई और असम्भव लगने वाला लक्ष्य पूरा होकर रहा।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग १

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1) श्लोक 40 से 45

सत्यात्रतां गतास्ते चु तत्वज्ञानेन बोधिता: ।
कार्या: संक्षिप्तसारेण यदमृतमिति स्मृतम्॥४०॥
तुलना कल्पवृक्षेण मणिना पारदेन च ।
यस्य जाता सदा तत्त्वज्ञानं तत्ते वदाम्यहम्॥४१॥
तत्त्वचिन्तुनत: प्रज्ञा जागर्त्यात्मविनिर्मितौ ।
प्राज्ञ: प्रसज्जते चात्मविनिर्माणे च सम्भवे॥४२॥
तस्यातिसरला विश्वनिर्माणस्यास्ति भूमिका ।
कठिना दृश्यमानापि ज्ञानं कर्म भवेत्तत:॥४३॥
प्रयोजनानि सिद्धयन्ति कर्मणा नात्र संशय: ।
सद्ज्ञान देव्यास्तस्यास्तु महाप्रज्ञेति या स्मृता॥ ४४॥
आराधनोपासना संसाधनाया उपक्रम: ।
व्यापकस्तु प्रकर्तव्यो विश्वव्यापी यथा भवेत्॥४५॥

टीका- ऐसे लोगों को सत्पात्र माना जाय और उन्हें उस तत्व ज्ञान को सार संक्षेप में हृदयंगम कराया जाय जिसे अमृत कहा गया है? जिसकी तुलना सदा पारसमणि और कल्पवृक्ष से होती रही है? वही तत्वज्ञान तुम्हें बताता हूँ। तत्व-चिन्तन से 'प्रज्ञा' जगती है। प्रज्ञावान आत्मनिर्माण में जुटता है। जिसके लिए आत्मनिर्माण कर पाना सम्भव हो सका है उसके लिए विश्व निर्माण की भूमिका निभा सकना अति सरल है भले ही वह बाहर से कठिन दीखती हो। ज्ञान ही कर्म बनता है। कर्म से प्रयोजन पूरे होते हैं इसमें सन्देह नहीं। उस सद्ज्ञान की देवी 'महाप्रज्ञा' है! जिनकी इन दिनों उपासना-साधना और आराधना का व्यापक उपक्रम बनना चाहिए ॥४०-४५॥

व्याख्या- सत्पात्रों को गायत्री महाविद्या का अमृत, पारस, कल्पवृक्ष रूपी तत्व ज्ञान दिया जाना इस कारण भगवान ने अनिवार्य समझा ताकि वे अपने प्रसुप्ति को जगा-प्रकाशवान हों-ऐसे अनेक के हृदय को प्रकाश से भर सकें। अमृत अर्थात् ब्रह्मज्ञान-वेदमाता के माध्यम से, पारस अर्थात् भावना-प्रेम-विश्वमाता के माध्यम से एवं कल्पवृक्ष अर्थात् तपोबल-देवत्व की प्राप्ति-देवमाता के माध्यम से। ये तीनों ही धाराएँ एक ही महाप्रज्ञा के तीन दिव्य प्रवाह हैं। अज्ञान, अभाव एवं अशक्ति का निवारण प्रत्यक्ष कामधेनु गायत्री के अवलम्बन से ही सम्भव है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 20

मंगलवार, 12 मार्च 2019

Keep Smiling, Keep Laughing | हँसते रहो, मुस्कुराते रहो | हारिये न हिम्म...



Title

👉 अंतर ज्योति:-

किसी नगर में एक सेठ रहता था। उसके पास अपार धन-संपत्ति थी, विशाल हवेली थी, नौकर-चाकर थे, सब तरह का आराम था, फिर भी उसका मन अशांत रहता था। हर घड़ी उसे कोई-न-कोई चिंता घेरे रहती थी। सेठ उदास रहता।

जब उसकी हालत बहुत खराब होने लगी तो एक दिन उसके एक मित्र ने उसे शहर से कुछ दूर आश्रम में रहने वाले साधु के पास जाने की सलाह दी। कहा- "वह पहुंचा हुआ साधु है। कैसा भी दुख लेकर जाओ, दूर कर देता है।"

सेठ साधु के पास गया। अपनी सारी मुसीबत सुनाकर बोला- "स्वामीजी, मैं जिंदगी से बेजार हो गया हूँ। मुझे बचाइए।"

साधु ने कहा - "घबराओ नहीं। तुम्हारी सारी अशांति दूर हो जाएगी। प्रभु के चरणों में लौ लगाओ।"

उसने तब ध्यान करने की सलाह दी और उसकी विधि भी समझा दी, लेकिन सेठ का मन उसमें नहीं रमा। वह ज्योंही जप का ध्यान करने बैठता, उसका मन कुरंग-चौकड़ी भरने लगता। इस तरह कई दिन बीत गए। उसने साधु को अपनी परेशानी बताई, पर साधु ने कुछ नहीं कहा। चुप रह गए।

एक दिन सेठ साधु के साथ आश्रम में घूम रहा था कि उसके पैर में एक कांटा चुभ गया। सेठ वहीं बैठ गया और पैर पकड़कर चिल्लाने लगा - "स्वामीजी, मैं क्या करूं? बड़ा दर्द हो रहा है।"

साधु ने कहा - "चिल्लाते क्यों हो? कांटे को निकाल दो।"

सेठ ने जी कड़ा करके कांटे को निकाल दिया। उसे चैन पड़ गया।

साधु ने तब गंभीर होकर कहा - "सेठ तुम्हारे पैर में जरा-सा कांटा चुभा कि तुम बेहाल हो गए, लेकिन यह तो सोचो कि तुम्हारे भीतर कितने बड़े-बड़े कांटे चुभे हुए हैं। लोभ के, मोह के, क्रोध के, ईर्ष्या के, देश के और न जाने किस-किस के। जब तक तुम उन्हें नहीं उखाड़ोगे, तुम्हें शांति कैसे मिलेगी?"

साधु के इन शब्दों ने सेठ के अंतर में ज्योति जला दी। उसके अज्ञान का अंधकार दूर हो गया। ज्ञान का प्रकाश फैल गया। उसे शांति का रास्ता मिल गया।

👉 बन्दा बैरागी की साधना

बन्दा वैरागी भी इसी प्रकार समय की पुकार की अवहेलना कर, संघर्ष में न लगकर एकान्त साधना कर रहे थे । उन्हीं दिनों गुरुगोविन्दसिंह की बैरागी से मुलाकात हुई । उन्होंने एकान्त सेवन को आपत्तिकाल में हानिकारक बताते हुए कहा-"बन्धु! जब देश, धर्म, संस्कृति की मर्यादाएँ नष्ट हो रही है और हम गुलामी का जीवन बिता रहे है, आताताइयों के अत्याचार हम पर हो रहे है उस समय यह भजन, पूजन, ध्यान, समाधि आदि किस काम के हैं?"

गुरुगोविन्दसिंह की युक्तियुक्त वाणी सुनकर बन्दा वैरागी उनके अनुयायी हो गए और गुरु की तरह उसने भी आजीवन देश को स्वतन्त्र कराने, अधर्मियों को नष्ट करने और संस्कृति की रक्षा करने की प्रतिज्ञा की । इसी उद्देश्य के लिए बन्दा वैरागी आजीवन प्रयत्नशील रहे । मुसलमानों द्वारा वैरागी पकड़े गये, उन्हें एक पिंजरें में बन्द किया गया । मौत या धर्म परिवर्तन की शर्त रखी गई, लेकिन वे तिल मात्र भी विचलित नहीं हुए । अन्तत: आतताइयों ने उनके टुकड़े-टुकडे कर दिये । बन्दा अन्त तक मुस्कराते ही रहे । भले ही बन्दा मर गये परन्तु अक्षय यश और कीर्ति के अधिकारी बने ।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग १

👉 कुछ बिन्दु जिन्दगी के लिये

1. प्रतिदिन 10 से 30 मिनट टहलने की आदत बनायें. चाहे समय ना हो तो घर मे ही टहले , टहलते समय चेहरे पर मुस्कराहट रखें.

2. प्रतिदिन कम से कम 10 मिनट चुप रहकर बैठें.

3. पिछले साल की तुलना में इस साल ज्यादा पुस्तकें पढ़ें.

4. 70 साल की उम्र से अधिक आयु के बुजुर्गों और 6 साल से कम आयु के बच्चों के साथ भी कुछ समय व्यतीत करें.

5. प्रतिदिन खूब पानी पियें.

6. प्रतिदिन कम से कम तीन बार  ये सोचे की मैने आज कुछ गलत तो नही किया.

7. गपशप पर अपनी कीमती ऊर्जा बर्बाद न करें.

8. अतीत के मुद्दों को भूल जायें, अतीत की गलतियों को अपने जीवनसाथी को याद न दिलायें.

9. एहसास कीजिये कि जीवन एक स्कूल है और आप यहां सीखने के लिये आये हैं. जो समस्याएं आप यहाँ देखते हैं, वे पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं.

10. एक राजा की तरह नाश्ता, एक राजकुमार की तरह दोपहर का भोजन और एक भिखारी की तरह रात का खाना खायें.

11. दूसरों से नफरत करने में अपना समय व ऊर्जा बर्बाद न करें. नफरत के लिए ये जीवन बहुत छोटा है.

12. आपको हर बहस में जीतने की जरूरत नहीं है, असहमति पर भी अपनी सहमति दें.

13. अपने जीवन की तुलना दूसरों से न करें.

14. गलती के लिये गलती करने वाले को माफ करना सीखें.

15. ये सोचना आपका काम नहीं कि दूसरे लोग आपके बारे में क्या सोचते हैं.

16. समय ! सब घाव भर देता है.

17. ईर्ष्या करना समय की बर्बादी है. जरूरत का सब कुछ आपके पास है.

18. प्रतिदिन दूसरों का कुछ भला करें.

19. जब आप सुबह जगें तो अपने माता-पिता को धन्यवाद दें, क्योंकि माता-पिता की कुशल परवरिश के कारण आप इस दुनियां में हैं.

20. हर उस व्यक्ति को ये संदेश शेयर करें जिसकी आप परवाह करते हैं..l

👉 आज का सद्चिंतन 12 March 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 March 2019


👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1) श्लोक 34 से 36

सोत्सुकं नारदोSपृच्छद्देवात्र किमपेक्ष्यते ।
कथं ज्ञेया वरिष्ठास्ते किं शिक्ष्या:कारयामि किम् ॥३७॥
यैन युगसन्धिकाले ते मूर्धन्या यान्तु धन्यताम् ।
समयश्चापि धन्य: स्यात्तात तत्सृज युगविधिम् ॥३८॥
पूर्वसंचितसंस्कारा श्रुत्वा युगनिमन्त्रणम्।
मौना: स्थातुंन शख्यन्ति चौत्सुक्यात् संगतास्तत॥३९॥

टीका- तब नारद ने उत्सुकतापूर्वक पूछा-हे देव । इसके लिए क्या करने की आवश्यकता है? वरिष्ठों कों कैसे ढूँढा जाय? उन्हें क्या सिखाया जाय और क्या कराया जाय? जिससे युग-सन्धि की बेला में अपनी भूमिका से मूर्धन्य आत्माएँ स्वयं धन्य बन सकें और समय को धन्य बना सकें। भगवान् बोले- हे तात्! युग सृजन का अभियान आरम्भ करना चाहिए? जिनमें पूर्व संचित संस्कार होंगे वे युग निमन्त्रण सुनकर मौन बैठे न रह सकेंगे, उत्सुकता प्रकट करेंगे, समीप आवेंगे और परस्पर सम्बद्ध होंगे ॥३७-३९॥

व्याख्या- जागृत आत्माएँ कभी भी चुप बैठी नहीं रह सकती। उनके अर्जित संस्कार व सत्साहस युग की पुकार सुनकर उन्हें आगे बढ़ने व अवतार के प्रयोजनों हेतु क्रियाशील होने को बाध्य कर देते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 18

रविवार, 10 मार्च 2019

👉 संयम

परमात्मा के मार्ग पर चलने के लिए जो उत्सुक होते हैं वे प्रायः आत्मपीड़न को साधना समझ लेते हैं। उनकी यही भूल उनके जीवन को विषाक्त कर देती है। प्रभु प्राप्ति सन्सार के निषेध का रूप ले लेती है। इस निषेध के कारण आत्मा की साधना शरीर को नष्ट करने का सरन्जाम जुटाने लगती है। इस नकारात्मक​ दृष्टि से उनका जीवन नष्ट होने लगता है और उन्हें होश भी नहीं आ पाता कि जीवन का विरोध परमात्मा के साक्षात्कार का पर्यायवाची नहीं है।

सच्चाई तो यह है कि देह के उत्पीड़क भी देहवादी ही होते हैं। उन्हें आत्म चिन्तन सूझता ही नहीं है। सन्सार के विरोधी कहीं न कहीं सुक्ष्मरुप से सन्सार से ही बंधे होते हैं। अनुभव यही कहता है कि सन्सार के प्रति भोग दृष्टि​ जितना सन्सार से बांधती है, सन्सार से विरोध दृष्टि भी उससे कुछ कम नहीं बल्कि उससे ज्यादा बांधती​ है।

साधना संसार व शरीर का विरोध नहीं बल्कि इनका अतिक्रमण एवं उत्क्रान्ति है। यह दिशा न तो भोग की है और न दमन की है। यह तो इन दोनों दिशाओं से भिन्न एक तीसरी ही दिशा है। यह दिशा आत्म संयम की है। दोनों बिन्दुओं के बीच मध्य बिंदु खोज लेना संयम है। पूरी​ तरह से जो मध्य में है वही अतिक्रमण या उपरामता है। इन दोनों के पार चले जाना है।

भोग का दमन की अति असंयम है, मध्य संयम है। अति विनाश है, मध्य जीवन है। जो अति को पकड़ता है वह नष्ट हो जाता है। भोग हो या दमन दोनों ही जीवन को नष्ट कर देते हैं। अति ही अज्ञान है, यही अन्धकार है, यही विनाश है। जो इस सच को जान जाता है वह भोग औेर दमन दोनों को ही छोड़ देता है। ऐसा करते ही उसके सब तनाव स्वाभाविक ही विलीन हो जाते हैं। उसे अनायास ही मिल जाता है --- स्वाभाविक, सहज एवं स्वस्थ जीवन। संयम को उपलब्ध होते ही जीवन शान्त व निर्भार हो जाता है। उसकी मुस्कुराहट कभी मुरझाती नहीं। जिसने स्वयं में संयम की समझ पैदा कर ली वह खुशियों की खिलखिलाहट से भर उठता है।

📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 2010 पृष्ठ-3

👉 अभिमान

एक घर के मुखिया को यह अभिमान हो गया कि उसके बिना उसके परिवार का काम नहीं चल सकता। उसकी छोटी सी दुकान थी। उससे जो आय होती थी, उसी से उसके...