रविवार, 9 अगस्त 2020

👉 स्वार्थ छोडिये

एक छोटे बच्चे के रूप में, मैं बहुत स्वार्थी था, हमेशा अपने लिए सर्वश्रेष्ठ चुनता था। धीरे-धीरे, सभी दोस्तों ने मुझे छोड़ दिया और अब मेरे कोई दोस्त नहीं थे। मैंने नहीं सोचा था कि यह मेरी गलती थी और मैं दूसरों की आलोचना करता रहता था लेकिन मेरे पिता ने मुझे जीवन में मदद करने के लिए 3 दिन 3 संदेश दिए।

एक दिन, मेरे पिता ने हलवे के 2 कटोरे बनाये और उन्हें मेज़ पर रख दिया ।

एक के ऊपर 2 बादाम थे जबकि दूसरे कटोरे में हलवे के ऊपर कुछ नहीं था फिर उन्होंने मुझे हलवे का कोई एक कटोरा चुनने के लिए कहा क्योंकि उन दिनों तक हम गरीबों के घर बादाम आना मुश्किल था .... मैंने 2 बादाम वाले कटोरा को चुना!

मैं अपने बुद्धिमान विकल्प / निर्णय पर खुद को बधाई दे रहा था और जल्दी जल्दी मुझे मिले 2 बादाम हलवा खा रहा था परंतु मेरे आश्चर्य का ठिकाना नही था जब मैंने देखा कि की मेरे पिता वाले कटोरे के नीचे 8 बादाम छिपे थे!

बहुत पछतावे के साथ, मैंने अपने निर्णय में जल्दबाजी करने के लिए खुद को डांटा।

मेरे पिता मुस्कुराए और मुझे यह याद रखना सिखाया कि
आपकी आँखें जो देखती हैं वह हरदम सच नहीं हो सकता उन्होंने कहा कि यदि आप स्वार्थ की आदत की अपनी आदत बना लेते हैं तो आप जीत कर भी हार जाएंगे।

अगले दिन, मेरे पिता ने फिर से हलवे के 2 कटोरे पकाए और टेबल पर रक्खे एक कटोरा के शीर्ष पर 2 बादाम और दूसरा कटोरा जिसके ऊपर कोई बादाम नहीं था।

फिर से उन्होंने मुझे अपने लिए कटोरा चुनने को कहा। इस बार मुझे कल का संदेश याद था इसलिए मैंने शीर्ष पर बिना किसी बादाम कटोरी को चुना परंतु मेरे आश्चर्य करने के लिए इस बार इस कटोरे के नीचे एक भी बादाम नहीं छिपा था! फिर से, मेरे पिता ने मुस्कुराते हुए मुझसे कहा, "मेरे बच्चे, आपको हमेशा अनुभवों पर भरोसा नहीं करना चाहिए क्योंकि कभी-कभी, जीवन आपको धोखा दे सकता है या आप पर चालें खेल सकता है स्थितियों से कभी भी ज्यादा परेशान या दुखी न हों, बस अनुभव को एक सबक अनुभव के रूप में समझें, जो किसी भी पाठ्यपुस्तकों से प्राप्त नहीं किया जा सकता है।

तीसरे दिन, मेरे पिता ने फिर से हलवे के 2 कटोरे पकाए, एक कटोरा ऊपर से 2 बादाम और दूसरा शीर्ष पर कोई बादाम नहीं। मुझे उस कटोरे को चुनने के लिए कहा जो मुझे चाहिए था।

लेकिन इस बार, मैंने अपने पिता से कहा, पिताजी, आप पहले चुनें, आप परिवार के मुखिया हैं और आप परिवार में सबसे ज्यादा योगदान देते हैं। आप मेरे लिए जो अच्छा होगा वही चुनेंगे।

मेरे पिता मेरे लिए खुश थे।
उन्होंने शीर्ष पर 2 बादाम के साथ कटोरा चुना, लेकिन जैसा कि मैंने अपने  कटोरे का हलवा खाया! कटोरे के हलवे के एकदम नीचे 2 बादाम और थे।

मेरे पिता मुस्कुराए और मेरी आँखों में प्यार से देखते हुए, उन्होंने कहा मेरे बच्चे, तुम्हें याद रखना होगा कि जब तुम भगवान पर छोड़ देते हो, तो वे हमेशा तुम्हारे लिए सर्वोत्तम का चयन करेंगे जब तुम दूसरों की भलाई के लिए सोचते हो, अच्छी चीजें स्वाभाविक तौर पर आपके साथ भी हमेशा होती रहेंगी।

👉 खरे खोटे की कसौटी

जिनकी दृष्टि से विराट् ब्रह्म की उपासना का वास्तविक स्वरूप विश्व-मानव की सेवा के रूप में आ गया हों वे हमारी कसौटी पर खरे उतरेंगे। जिनके मन में अपनी शक्ति सामर्थ्य का एक अंश पीड़ित मानवता को ऊँचा उठाने के लिये लगाने की भावना उठने लगी हो उन्हीं के बारे में ऐसा सोचा जा सकता है कि मानवीय श्रेष्ठता की एक किरण उनके भीतर जगमगाई है। ऐसे ही प्रकाश पुँज व्यक्ति संसार के देवताओं में गिने जाने योग्य होते हैं। उन्हीं के व्यक्तित्व का प्रकाश मानव-जाति के लिये मार्ग-दर्शक बनता हैं। उन्हीं का नाम इतिहास के पृष्ठों पर अजर अमर बना हुआ हैं। प्रतिनिधियों के चुनाव में हम अपने परिवार में से इन्हीं विशेषताओं से युक्त आत्माओं की खोज कर रहे हैं। हमारे गुरुदेव ने हमें इसी कसौटी पर कसा और जब यह विश्वास कर लिया कि प्राप्त हुई आध्यात्मिक उपलब्धियों का उपयोग यह व्यक्ति लोक कल्याण में ही करेगा तब उन्होंने अपनी अजस्र ममता हमारे ऊपर उड़ेली और अपनी गाढ़ी कमाई का एक अंश प्रदान किया। वैसा ही पात्रत्व का अंश उन लोगों में होना चाहिए जो हमारे उत्तराधिकारी का भार ग्रहण करें।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, जनवरी १९६५

👉 प्रवेश से पहले जानें अथ का अर्थ (भाग २)

जीवन यदि भ्रान्तियों से उबर सका, यदि साधक आशा रहित हो सका, यदि देह के स्थान पर आत्मा की प्यास जग सकी, यदि वह हो सका, जिसे पश्चिम के मेधा सम्पन्न दार्शनिक कीर्केगार्द ने तीव्र व्यथा कहा है। यदि सारे सपने विलीन हो चुके हैं, नींद भली प्रकार टूट चुकी है, और यदि ऐसा क्षण आ गया है, तो पतंजलि कहते हैं- अब योग का अनुशासन। केवल अब तुम योग के विज्ञान को, योग के अनुशासन को समझ सकते हो।
  
यदि ऐसा क्षण नहीं आया, तो किए चले जाओ योगशास्त्रों का अध्ययन, बन जाओ महाविद्यालय, विश्वविद्यालय में प्रोफेसर, लच्छेदार प्रवचन देकर उठाते रहो सुनने वालों की तालियों का आनन्द, लेकिन योगी नहीं बन सकते। योगशास्त्र पर पी-एच.डी. कर सकते हो, करा सकते हो, लेकिन कभी योगी न बनोगे। अथ का पुण्य क्षण अभी तुम्हारे लिए नहीं आया है। क्योंकि यह रुचि बौद्धिक है, साधक के प्राणों से पनपी अभीप्सा के उजाले से कोसों दूर। ध्यान रहे, योग कुछ नहीं है, अगर यह अनुशासन नहीं है। योग कोई शास्त्र नहीं है, योग अनुशासन है। यह कुछ ऐसा है, जिसे तुम्हें करना है। यह कोई जिज्ञासा नहीं है, यह दार्शनिक चिन्तन भी नहीं है। यह इन सबसे कहीं गहरा है। यह तो सवाल है—जीवन और मरण का।
  
‘अथ’ का पुण्य क्षण उनके जीवन में भी नहीं आ सकता, जो योग को सत्य नहीं, सिद्धि समझते हैं। जो सोचते हैं कि लौकिक न पा सके, तो अलौकिक पा लो। या फिर लौकिक वैभव तो बटोरा ही, अब अलौकिक भी बटोर लो। ध्यान रहे चमत्कारों की चाहत रखने वाले, चमत्कारी बनने की महत्त्वाकांक्षाओं को सँजोने वाले बाजीगर तो बन सकते हैं, परन्तु अथ का पुण्य पल तो तभी आता है, जब यह अच्छी तरह से महसूस होने लगता है कि सारी दिशाएँ अस्त-व्यस्त हो गयी हैं, सारी राहें खो गयी हैं, भविष्य की कल्पनाएँ, जल्पनाएँ अब नहीं बचीं। इच्छाओं, आशाओं और सपनों की सारी गतियाँ समाप्त हो चुकी हैं- अब योग का अनुशासन। और यदि ‘अब’ नहीं आया, तो योग के कितने भी रहस्य लिखे जाएँ, लेकिन वे पढ़कर भी समझे न जा सकेंगे। ‘अथ’ का एक ही मतलब है- सच्चा शिष्यत्व, खरी पात्रता।
  
साधक के जीवन में यदि वह ‘अथ’ आ चुका है, तो उसे योग का अनुशासन बताने वाला सद्गुरु भी मिलेगा। अध्यात्म जगत् का यह वैज्ञानिक सत्य है, सौ फीसदी खरा और परखा हुआ सच है कि जिसमें शिष्यत्व ने जन्म ले लिया है, उसे सद्गुरु मिले बिना नहीं रहेंगे। और शिष्यत्व को अर्जित किए बिना यदि सद्गुरु मिल भी गए, तो भी कोई लाभ होने वाला नहीं है। बंजर भूमि पर डाले गए बीज बेकार चले जाते हैं, कोई समझदार बीजों को बंजर भूमि पर डालता भी नहीं है। साधक की अन्तर्भूमि उर्वर है, अन्तर्चेतना ग्रहणशील एवं उपजाऊ बन चुकी है, तो उसमें योग के बीज बोने वाले सद्गुरु अपने आप ही आ जाते हैं। वह आते हैं, शिष्य को योग का अनुशासन देने के लिए।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ११
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

शुक्रवार, 7 अगस्त 2020

👉 "कर्मो का लेखा जोखा".....

एक महिला बहुत ही धार्मिक थी ओर उसने ने नाम दान भी लिया हुआ था और बहुत ज्यादा भजन सिमरन और सेवा भी करती थी किसी को कभी गलत न बोलना, सब से प्रेम से मिलकर रहना उस की आदत बन चुकी थी. वो सिर्फ एक चीज़ से दुखी थी के उस का आदमी उस को रोज़ किसी न किसी बात पर लड़ाई झगड़ा करता। उस आदमी ने उसे कई बार इतना मारा की उस की हडी भी टूट गई थी। लेकिन उस आदमी का रोज़ का काम था। झगडा करना। उस महिला ने अपने गुरु महाराज जी से अरज की हे गुरुदेव मेरे से कोन भूल हो गई है। मै सत्संग भी जाती हूँ सेवा भी करती हूँ। भजन सिमरन भी आप के हुक्म के अनुसार करती हूँ। लेकिन मेरा आदमी मुझे रोज़ मारता है। मै क्या करूँ।

गुरु महाराज जी ने कहा क्या वो तुझे रोटी देता है महिला ने कहा हाँ जी देता है। गुरु महाराज जी ने कहा फिर ठीक है। कोई बात नहीं। उस महिला ने सोचा अब शायद गुरु की कोई दया मेहर हो जाए और वो उस को मारना पीटना छोड़ दे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। उस की तो आदत बन गई ही रोज़ अपनी घरवाली की पिटाई करना। कुछ साल और निकल गए उस ने फिर महाराज जी से कहा की मेरा आदमी मुजे रोज़ पीटता है। मेरा कसूर क्या है। गुरु महाराज जी ने फिर कहा क्या वो तुम्हे रोटी देता है। उस महिला ने कहा हांजी देता है। तो महाराज जी ने कहा फिर ठीक है। तुम अपने घर जाओ। महिला बहुत निराश हुई के महाराज जी ने कहा ठीक है।

वो घर आ गई लेकिन उस के पति के स्वभाव वैसे का वैसा रहा रोज़ उस ने लड़ाई झगडा करना। वो महिला बहुत तंग आ गई। कुछ एक साल गुज़रे फिर गुरु महाराज जी के पास गई के वो मुझे अभी भी मारता है। मेरी हाथ की हड्डी भी टूट गई है। मेरा कसूर क्या है। मै सेवा भी करती हूँ। सिमरन भी करती हूँ फिर भी मुझे जिंदगी में सुख क्यों नहीं मिल रहा। गुरु महाराज जी ने फिर कहा वो तुजे रोटी देता है। उस ने कहा हांजी देता है। महाराज जी ने कहा फिर ठीक है। परन्तु इस बार वो महिला जोर जोर से रोने लगी और बोली की महाराज जी मुझे मेरा कसूर तो बता दो मैंने कभी किसी के साथ बुरा नहीं किया फिर मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है।

महाराज कुछ देर शांत हुए और फिर बोले बेटी तेरा पति पिछले जन्म में तेरा बेटा था। तू उस की सोतेली माँ थी। तू रोज़ उस को सुबह शाम मारती रहती थी। और उस को कई कई दिन तक भूखा रखती थी। शुक्र मना के इस जन्म में वो तुझे रोटी तो दे रहा है। ये बात सुन कर महिला एक दम चुप हो गई। गुरु महाराज जी ने कहा बेटा जो कर्म तुमने किए है उस का भुगतान तो तुम्हें अवश्य करना ही पड़ेगा फिर उस महिला ने कभी महाराज से शिकायत नहीं की क्यों की वो सच को जान गई थी।

इसलिए हमे भी कभी किसी का बुरा नहीं करना चाहिए सब से प्रेम प्यार के साथ रहना चाहिए। हमारी जिन्दगी में जो कुछ भी हो रहा है सब हमारे कर्मो का लेखा जोखा है। जिस का हिसाब किताब तो हमे देना ही पड़ेगा।

👉 उपहासास्पद ओछे दृष्टिकोण-

यों ऐसे भी लोग हमारे संपर्क में आते हैं जो ऋद्धि-सिद्धि प्राप्त करने के लिए कुण्डलिनी जागरण, चक्र जागरण और न जाने क्या-क्या आध्यात्मिक लाभ चुटकी मारते प्राप्त करने के लिए अपनी अधीरता व्यक्त करते हैं। ऐसे लोग भी कम नहीं जो ईश्वर दर्शन से कम तो कुछ चाहते ही नहीं और वह भी चन्द घण्टों या मिनटों में। भौतिक दृष्टि से अगणित प्रकार के लाभ प्राप्त करने के लिए लालायित, अपनी दरिद्रता और विपन्न स्थिति से छुटकारा पाने की कामना से इधर¬-उधर भटकते लोग भी कभी-कभी मन्त्र-तन्त्र की तलाश में इधर आ निकलते हैं। इन दीन दुखियों की जो सहायता बन पड़ती है वह होती भी है। इस कटौती पर इस प्रकार के लोग खोटे सिक्के ही माने जा सकते है। अध्यात्म की चर्चा वे करते हैं पर पृष्ठभूमि तो उसकी होती नहीं। ऐसी स्थिति में कोई काम की वस्तु उनके हाथ लग भी नहीं पाती, पवित्रता रहित लालची व्यक्ति जैसे अनेक मनोरथों का पोट सिर पर बाँधे यहाँ वहाँ भटकते रहते हैं, ठीक वही स्थिति उनकी भी होती है। मोती वाली सीप में ही स्वाति बूँद का पड़ना मोती उत्पन्न करता है। अन्य सीपें स्वाति बूँदों का कोई लाभ नहीं उठा पातीं। उदात्त आत्माएँ ही अध्यात्म का लाभ लेती हैं। उन्हें ही ईश्वर का अनुग्रह उपलब्ध होता हैं। और उस उदात्त अधिकारी मनो-भूमि की एकमात्र परख है मनुष्यत्त्व में करुणा विगलित एवं परमार्थी होना। जिसके अंतःकरण में यह तत्व नहीं जगा, उसे कोल्हू के बैल तरह साधना पथ का पथिक तो कहा जा सकता है पर उसे मिलने वाली उपलब्धियों के बारे में निराशा ही व्यक्त की जा सकती है।

अखण्ड-ज्योति परिवार में पचास सौ ऐसे व्यक्ति भी आ फँसते है जो पत्रिका को कोई जादू, मनोरंजन आदि समझते हैं, कोई आचार्यजी को प्रसन्न करने के लिए दान स्वरूप खर्च करके उसे मँगा लेते हैं। विचारों की श्रेष्ठता और शक्ति की महत्ता से अपरिचित होने के कारण वे उसे पढ़ते भी नहीं। ऐसे ही लोग आर्थिक तंगी, पढ़ने की फुरसत न मिलने आदि का बहाना बना कर उसे मँगाना बन्द करते रहते है। यह वर्ग बहुत ही छोटा होता हैं, इसलिए उसे एक कौतूहल की वस्तु मात्र ही समझ लिया जाता है। अधिकाँश पाठक ऐसे है जो विचारों की शक्ति को समझते हैं और एक दो दिन भी पत्रिका लेट पहुँचे तो विचलित हो उठते हैं। न पहुँचने की शिकायत तार से देते हैं। ऐसे लोगों को ही हम अपना सच्चा परिजन समझते हैं। जिनने विचारों का मूल समझ लिया केवल वे ही लोग इस कठिन पथ पर बढ़ चलने में समर्थ हो सकेंगे। जिन्हें विचार व्यर्थ मालूम पड़ते हैं और एक-दो माला फेर कर आकाश के तारे तोड़ना चाहते हैं उनकी बाल-बुद्धि पर खेद ही अनुभव किया जा सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, जनवरी १९६५

👉 Existence of Sorrows is Imaginary

Vairagya (renouncement adopted by saints) means renouncing all ‘rags’. The word ‘rags’ refers to untoward attachments, excessive affection, jealousy, anger, worries, fear, cravings, ambitious-thirst, depression etc. These are the cause of all misery and restlessness in human life.

According to sagacious philosopher Socrates, over three-fourth of the sorrows experienced in the world are imaginary, one creates them for oneself because of his own illusory thinking and imaginations. If you enlighten your attitude and refine your imaginations, most of your worries and anguishes will disappear in no time. This is what leads to the principle of spirituality that - vairagya liberates from all sorrows and sufferings.

No one can ever fulfill all desires. The thirst for worldly pleasures, powers, resources, recognition, etc increases with more and more possession of what you wanted; the thralldom of selfish attachments tightens further with your inclination towards what is nearer and dearer to you… The only way to get rid of these unceasing bonds is to restrain the passions, the ambitions at their very inception by inner will and enlightened thoughts and sentiments. Vairagya generated thereby is perfect solution to elimination of all worries and sufferings.

📖  Akhand Jyoti, Nov. 1946

👉 बर्बादी की दुष्प्रवृत्ति

समय की बर्बादी को यदि लोग धन की हानि से बढ़कर मानने लगें, तो क्या हमारा जो बहुमूल्य समय यों ही आलस में बीतता रहता है क्या कुछ उत्पादन करने या सीखने में न लगे? विदेशों में आजीविका कमाने के बाद बचे हुए समय में से कुछ घंटे हर कोई व्यक्ति अध्ययन के लिए लगाता है और इसी क्रम के आधार पर जीवन के अन्त तक वह साधारण नागरिक भी उतना ज्ञान संचय कर लेता है जितना कि हम में से उद्भट विद्वान समझे जाने वाले लोगों को भी नहीं होता। जापान में बचे हुए समय को लोग गृह−उद्योगों में लगाते हैं और फालतू समय में अपनी कमाई बढ़ाने के अतिरिक्त विदेशों में भेजने के लिए बहुत सस्ता माल तैयार कर देते हैं जिससे उनकी राष्ट्रीय भी बढ़ती है। एक ओर हम हैं जो स्कूल छोड़ने के बाद अध्ययन को तिलाञ्जलि ही दे देते हैं और नियत व्यवसाय के अतिरिक्त कोई दूसरी सहायक आजीविका की बात भी नहीं सोचते। क्या स्त्री क्या पुरुष सभी इस बात में अपना गौरव समझते हैं कि उन्हें शारीरिक श्रम न करना पड़े।

समय की बर्बादी शारीरिक नहीं मानसिक दुर्गुण है। मन में जब तक इसके लिए रुचि, आकाँक्षा एवं उत्साह पैदा न होगा, जब तक इस हानि को मन हानि ही नहीं मानेगा तब तक सुधार का प्रश्न ही कहाँ पैदा होगा? टाइम टेबल बनाकर—कार्यक्रम निर्धारित कर, कितने लोग अपनी दिनचर्या चलाते हैं? फुरसत न मिलने की बहानेबाजी हर कोई करता है पर ध्यानपूर्वक देखा जाय तो उसका बहुत सा समय, आलस, प्रमाद, लापरवाही और मंदगति से काम करने में नष्ट होता है। समय के अपव्यय को रोककर और उसे नियमित दिनचर्या की सुदृढ़ श्रृंखला में आबद्ध कर हम अपने आज के सामान्य जीवन को असामान्य जीवन में बदल सकते हैं। पर यह होगा तभी न जब मन का अवसाद टूटे? जब लक्षहीनता, अनुत्साह एवं अव्यवस्था से पीछा छूटे?

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

👉 प्रवेश से पहले जानें अथ का अर्थ (भाग १)

योग साधकों के लिए सबसे पहले साधना के  प्रवेश द्वार की पहचान जरूरी है। क्योंकि यही वह महत्त्वपूर्ण स्थल है, जहाँ से योग साधना की अन्तर्यात्रा शुरू होती है। महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र में इसी के बारे में गूढ़ संकेत दिए हैं। इस प्रथम सूत्र में उन्होंने योग साधना की पूर्व तैयारियों, साधना में प्रवेश के लिए आवश्यक आवश्यकताओं एवं अनिवार्यताओं का ब्योरा सूत्रबद्ध किया है। समाधिपाद, साधनपाद, विभूतिपाद एवं कैवल्यपाद तथा १९५ सूत्रों वाले योगदर्शन की आधारशिला यही पहला सूत्र है -
अथ योगानुशासनम्॥ १/१॥
यानि कि अब योग का अनुशासन।
  
योग सूत्रकार महर्षि के एक-एक शब्द को ठीक से समझना जरूरी है। क्योंकि महावैज्ञानिक पतंजलि एक भी शब्द का निरर्थक प्रयोग नहीं करते। इस सूत्र में पहला शब्द है- अथ। योग सूत्र की ही भाँति अथ शब्द ब्रह्मसूत्र में भी आया है। ‘अथातो ब्रह्मजिज्ञासा’ यही पहला सूत्र है महर्षि बादरायण व्यास का। इसमें से अथ शब्द की व्याख्या में आचार्य शंकर एवं आचार्य रामानुज ने सुदीर्घ व्याख्याएँ की हैं। अपनी भारी मतभिन्नता के बावजूद दोनों आचार्य अथ के महत्त्व के बारे में एकमत हैं। जिन्हें सचमुच ही साधना में प्रवेश करना है, उन्हें अच्छी तरह से जान लेना चाहिए कि अथ को समझकर साधक का जीवन अर्थवान बनता है। बिना अथ को समझे वह पूरी तरह से अर्थहीन रह जाता है।
  
‘अथ’- यानि कि ‘अब’। अब साधक के जीवन में वह पुण्य क्षण है, जब उसके हृदय में उठने वाली योग साधना के लिए सच्ची चाहत अपने चरम को छूने लगी। उसकी अभीप्सा की ज्वालाओं का तेज तीव्रतम हो गया। उसकी पात्रता की परिपक्वता हर कसौटी पर खरी साबित हो चुकी। उसका शिष्यत्व पूरी तरह से जाग उठा। उसकी  पुकार में वह तीव्रता और त्वरा आ गयी कि सद्गुरु उससे मिलने के लिए विकल-बेचैन हो उठे।
  
परम पूज्य गुरुदेव के जीवन में ‘अथ’ का पुण्य क्षण १५ वर्ष की आयु में ही आ गया। वह पात्रता और पवित्रता की हर कसौटी पर पिछले जन्मों से ही खरे थे। श्री रामकृष्ण परमहंस, समर्थ स्वामी रामदास, संत कबीर के रूप में उन्होंने योग साधना के सत्य को पूरी तरह जिया था। अपने जीवन को इसकी अनुभूतियों के रस में डूबोया था। फिर भी उन्हें इस बार भी अपनी पात्रता को सिद्ध करना पड़ा, जो उन्हीं की भाषा में ‘पिसे को पीसा जाना था।’ उनकी जाग्रत् चेतना की पुकार इतनी तीव्र हो उठी कि उनके सद्गुरु हिमालय के गुह्यक्षेत्र से भागे चले आए।
  
उन्होंने इस सत्य को बताते हुए अपनी आत्मकथा ‘हमारी वसीयत और विरासत’ में लिखा ‘हमें गुरु के लिए भाग दौड़ नहीं करनी पड़ी। हमारे गुरुदेव तो स्वयं ही हम तक दौड़े चले आए।’ यह है महर्षि पतंजलि के योग सूत्र के प्रथम सूत्र के प्रथम शब्द को समझ लेने का चमत्कार। ‘अथ’ के रहस्य को जान लेने की अनुभूति। इसके प्रयोग को सिद्ध कर लेने का सच। गुरुदेव ने जगह-जगह पर अपने साहित्य में लिखा है,  स्थान-स्थान पर अपने प्रवचनों में कहा है कि हमारी मंशा अपने गुरु की जेब काटने की नहीं थी। हम तो उन्हें अपना शिष्यत्व समर्पित करना चाहते थे। हमारे अन्दर तो एक ही ख्वाहिश, एक ही अरमान था, सच्चा शिष्य बनने का। बस, हम तो अपने गुरु के हो जाना चाहते थे। अपनी तो बस एक ही चाहत थी, बस एक ही नाता रहे, एक ही रिश्ता बचे—गुरु और शिष्य का।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ९
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

रविवार, 2 अगस्त 2020

👉 आगे के लिये बचाओ

एक धनवान मनुष्य था। उसे सब प्रकार के सुख, ऐश्वर्य प्राप्त थे। मखमली वस्त्र और सोने के जेवरों से उसकी देह सजी रहती थी। सारे दिन शौक मौज करने के अतिरिक्त उसके पास और कोई काम न था।

इलियाजर नामक एक कंगाल उसी धनवान का पड़ौसी था। वृद्धावस्था और बीमारी के कारण बेचारा कुछ कर नहीं सकता था इसलिये अपने धनवान पड़ौसी के द्वार पर जाता और उसकी मेज के नीचे भोजन के जो किनके गिर पड़ते बीन बीन कर पेट में डाल लेता। धनी के पास किसी बात की कमी न थी पर उसने कंगाल की हालत पर न तो कभी तरस खाया और न उसकी कुछ मदद की।

इलियाजर धर्मात्मा था। गरीबी और अशक्त होने के कारण वह किसी की कुछ सेवा नहीं कर सकता था इससे उसे बड़ा दुख होता। उसके पाँवों में घाव हो गये थे। जब कभी वह कुत्तों को देख पाता तो उन्हें प्यार से बुलाता और अपने घाव उनके चाटने के लिये खोल देता। अपना थोड़ा सा रक्त माँस कुत्तों को दान करके वह अपने दुख को हल्का कर लेता और अपने कष्टों के लिये प्रभु को धन्यवाद देता, जिनके कारण वह ईश्वर को हर घड़ी याद करता रहता है।

समय आने पर इलियाजर मरा। थोड़े ही दिन बाद उस धनी को भी मरना पड़ा। प्रेत लोक में दोनों ही पहुँचे। धनी को घोर पीड़ाओं से भरे नरक में रखा गया वहाँ वह असहनीय पीड़ायें सहने लगा। ममन्तिक कष्टों से वह तड़प रहा था कि उसकी निगाह दूसरी ओर गई। उसने देखा कि स्वर्ग के देवता की गोद में इलियाजर बैठा हुआ है और विपुल ऐश्वर्यों का उपभोग कर रहा है।

धनी का गला भर आया। उसने चीखकर इब्राहीम से कहा-हे पिता! दया कर इलियाजर को मेरे पास भेजिये ताकि वह मेरे जलते हुये गले में कुछ पानी की बूंदें डाल दे मैं प्यास के मारे मरा जा रहा हूँ।

इब्राहीम ने कहा- पुत्र! प्रभु का न्याय बड़ा कठोर है उसमें पक्षपात को स्थान नहीं है। तू जीते जी अपनी सम्पत्ति पा चुका। अब अधिक तुझे कैसे मिल सकता है? काश, तूने उस समय बचाकर कुछ इस समय के लिये संचित किया होता तो आज इस तरह यहाँ न तड़पता।

📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर १९४०

👉 अध्यात्म की प्रधान कसौटी

महामानवों में एक अतिरिक्त गुण होता है और वह है परमार्थ। दूसरों को दुखी या अधःपतित देखकर जिसकी करुणा विचलित हो उठती है, जिसे औरों की पीड़ा अपनी पीड़ा की तरह कष्टकर लगती है, जिसे दूसरों के सुख में अपने सुख की आनन्दमयी अनुभूति होती है, वस्तुतः वही महामानव, देवता, ऋषि, सन्त, ब्राह्मण, अथवा ईश्वर-भक्त है। निष्ठुर व्यक्ति, जिसे अपनी खुदगर्जी के अतिरिक्त दूसरी बात सूझती ही नहीं, जो अपनी सुख सुविधा से आगे की बात सोच ही नहीं सकता ऐसा अभागा व्यक्ति निष्कृष्ट कोटि के जीव जन्तुओं की मनोभूमि का होने के कारण तात्विक दृष्टि से ‘नर-पशु’ ही गिना जायगा। ऐसे नर-पशु कितना भजन करते हैं, कितना ब्रह्मचर्य रहते है, इसका कोई विशेष महत्व नहीं रह जाता। भावनाओं का दरिद्र व्यक्ति ईश्वर के दरबार में एक कोढ़ी कंगले का रूप बनाकर ही पहुँचेगा। उसे वहाँ क्या कोई मान मिलेगा ? भक्ति का भूखा, भावना का लोभी भगवान् केवल भक्त की उदात्त भावनाओं को परखता है और उन्हीं से रीझता है। माला और चन्दन, दर्शन और स्नान उसकी भक्ति के चिह्न नहीं, हृदय की विशालता और अन्तःकरण की करुणा ही किसी व्यक्ति के भावनाशील होने का प्रमाण है और ऐसे ही व्यक्ति को, केवल ऐसे ही व्यक्ति को ईश्वर के राज्य में प्रवेश पाने का अधिकार मिलता है।

हमें अपने परिवार में से अब ऐसे ही व्यक्ति ढूंढ़ने हैं जिन्होंने अध्यात्म का वास्तविक स्वरूप समझ लिया हो और जीवन की सार्थकता के लिए चुकाए जाने वाले मूल्य के बारे में जिन्होंने अपने भीतर आवश्यक साहस एकत्रित करना आरम्भ कर दिया हो। हम अपना उत्तराधिकार उन्हें ही सौंपेंगे। बेशक, धन-दौलत की दृष्टि को कुछ भी मिलने वाला नहीं है, हमारे अन्तःकरण में जलने वाली आग की एक चिंगारी ही उनके हिस्से में आवेगी पर वह इतनी अधिक मूल्यवान है कि उसे पाकर कोई भी व्यक्ति धन्य हो सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, जनवरी १९६५, पृष्ठ ५०

👉 Being Good is Being Wise

Tyrants or wicked people do not hesitate in committing mindless flaws and sinful activities. Wise are those who restrain themselves from such follies. Evil generates more evil; this is why one should keep away from it and protect himself against it, as one would from the hazards of fire. The vicious consequences and God’s penalty for sins follows the sinner like his own shadow and continue the chase with greater intensity life after life till he is ruined completely. Therefore, be vigilant and keep away from all vices.

You accumulate the curse of your own soul whenever you do something that is unethical or wrong. There is nothing more painful and adverse than burning in this fire. Despite knowing this, people are driven towards misconduct, blemishing acts and sins because of their cravings, ego and selfish attachments.

Satisfying these passions for some time appears to give some momentary pleasure but traps one’s mind into its grip forever. This is like eating sugarcoated poison.

Truly intelligent and wise in this world is the one who precludes himself from evil thoughts and mean, cruel, sinful actions, and on the contrary, adopts truthful righteous path. This wisdom proves to be farsighted and opens up the path of glorious achievements…

📖  Akhand Jyoti, Nov. 1946

👉 लौकिक सफलताओं का आधार

नीति और अनीति के आधार पर प्रतिष्ठा−अप्रतिष्ठा, प्रेम, द्वेष, शान्ति−अशान्ति, दंड पुरस्कार, स्वर्ग−नरक मिलते हैं, पर लौकिक सफलताओं का आधार जागरुकता, पुरुषार्थ, लगन, साहस आदि गुण ही हैं। यह सभी गुण शरीर के नहीं, मन के हैं। मन को उपयोगी, अनुकूल, उचित आदतों का, विचार पद्धति का अभ्यस्त बना लेने से ही नाना प्रकार के उन गुणों का आविर्भाव होता है जो लौकिक एवं पारलौकिक सफलताओं के मूल आधार हैं।

शरीर को आलस, असंयम, उपेक्षा एवं दुर्व्यसनों में पड़ा रहने दिया जाय तो उसकी सारी विशेषताएँ नष्ट हो जायेंगी। इसी प्रकार मन को अव्यवस्थित पड़ा रहने दिया जाय, उसे कुसंस्कार−ग्रस्त होने से संभाला न जाय तो निश्चय ही वह हीन स्थिति को पकड़ लेगा। पानी का स्वभाव नीचे की तरफ बहना है, ऊपर उठाने के लिए बहुत प्रयत्न करते हैं तब सफलता मिलती है। मन का भी यही हाल है यदि उसे रोका, संभाला, समझाया, बाँधा और उठाया न जाय तो उसका कुसंस्कारी दुर्गुणी, पतनोन्मुखी, आलसी एवं दीन−दरिद्र प्रकृति का बन जाना ही निश्चित है। आज इसी प्रकार का मानसिक अवसाद चारों ओर फैल रहा है। शरीर की दुर्बलता और बीमारी जिस प्रकार व्यापक रूप से फैली दिखाई देती है वैसी ही हमारी मानसिक दुर्बलता एवं रुग्णता भी कम शोचनीय नहीं है। कलह प्रिय, क्रोधी, तुनक-मिज़ाज, असहिष्णु, ईर्ष्यालु, छिद्रान्वेषी, अहंकारी, उद्दण्ड, प्रकृति के लोगों से हमारा समाज भरा पड़ा है। इन दुर्गुणों के कारण पारस्परिक प्रेम−भावना, आत्मीयता एवं घनिष्ठता दिन−दिन नष्ट होती जाती है और एक आदमी दूसरे से दिन−दिन दूर पड़ता जाता है। प्रेम, सहयोग, प्रसन्नता, मुस्कान, नम्रता, उदारता, सहिष्णुता, शिष्टता, कृतज्ञता के गुणों से यदि मनोभूमि परिष्कृत हो तो परस्पर का प्रेम−भाव कितना बढ़े, कितना सुदृढ़ रहे और फलस्वरूप कितनी प्रगति एवं प्रसन्नता का वातावरण बन जाय?

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

शनिवार, 1 अगस्त 2020

👉 भोगे बिना छुटकारा नहीं

वह दोनों सगे भाई थे। गुरु और माता पिता के द्वारा शिक्षा पाई थी, पूजनीय आचार्यों से प्रोत्साहन पाया था, मित्रों द्वारा सलाह पाई थी। उन्होंने वर्षों के अध्ययन, चिन्तन और अन्वेषण के पश्चात जाना था कि दुनिया में सबसे बड़ा काम जो मनुष्य के करने का है वह यह है कि अपनी आत्मा का उद्धार करे। मूर्ख इसे नहीं जानते। वे पत्ते-पत्ते को सींचते फिरते हैं फिर भी पेड़ मुरझाता ही चला जाता है। संसार की राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक शारीरिक सभी प्रकार की समस्यायें इसी एक बात पर निर्भर हैं कि आदमी ईमानदार बने, सदाचारी हो, आत्म कल्याण करे।

वे दोनों भाई शंख और लिखित इस तत्व को भली प्रकार जान लेने के बाद तपस्या करने लगे। पास पास ही दोनों के कुटीर थे। मधुर फलों के वृक्षों से वह स्थान और भी सुन्दर एवं सुविधाजनक बन गए। ये दोनों भाई अपनी-अपनी तपोभूमि में तप करते और यथा अवसर आपस में मिलते-जुलते थी।

एक दिन लिखित भूखे थे। वे भाई के आश्रम में गये और वहाँ से कुछ फल तोड़ लाये। उन्हें खा रहे थे कि शंख भी वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने पूछा यह फल तुम कहाँ से लाये ? लिखित ने उन्हें हंसकर उत्तर दिया-तुम्हारे आश्रम से।

शंख यह सुनकर बड़े दुखी हुए। फल स्वयं कोई बहुत मूल्यवान वस्तु न थे। दोनों भाई आपस में फल लेते देते भी रहते थे किन्तु चोरी से बिना पूछे नहीं उन्होंने कहा-भाई ! यह तुमने बुरा किया। किसी की वस्तु बिना पूछे लेने से तुम्हें चोरी का पाप लग गया। लिखित को अब पता चला कि वास्तव में उन्होंने पाप किया है और पाप के फल का बिना भोगे छुटकारा नहीं हो सकता।

दोनों भाई इस समस्या में उलझ गये कि अब क्या करना चाहिए। पाप का फल तुरंत ही मिल जाय तो ठीक अन्यथा प्रारब्ध में जाकर वह बढ़ता ही रहता है। और आगे चलकर ब्याज समेत चुकाना पड़ता है। निश्चय हुआ कि इस पाप का फल शीघ्र ही भोग लिया जाय। चूँकि दंड देने का अधिकार राजा को होता है इसलिए लिखित अपने कार्य का दंड पाने के लिए राजा सुद्युम्न के पास पहुँचे।

इस तेज मूर्ति तपस्वी को देखकर राजा सिंहासन से उठ खड़े हुए और बड़े आदर के साथ उन्हें उच्च सिंहासन पर बिठाया। तदुपरान्त राजा ने हाथ जोड़कर तपस्वी से पूछा-महाराज कहिये मेरे योग्य क्या आज्ञा है ? लिखित ने कहा-राजन्! मैंने अपने भाई के पेड़ से चोरी करके फल खाये हैं सो मुझे दंड दीजिए इसीलिए आपके पास आया हूँ।
राजा बड़े असमंजस में पड़ा। इस छोटे से अपराध पर इतने बड़े तपस्वी को वह क्या दंड दे। और वह भी ऐसे समय जबकि वह स्वयं अपना अपराध स्वीकार करते हुए दंड पाने के लिए आया है। राजा कुछ भी उत्तर न दे सका।

तपस्वी ने उसके मन की बात जान ली। और उन्होंने न्यायाधिपति से स्वयं ही पूछा कि बताइये शास्त्र के अनुसार चोरों को क्या दंड दिया जाता है? न्यायाधीश अपनी ओर से बिना कुछ कहे शास्त्र का चोर प्रकरण निकाल लाये। उसमें विधान था कि चोर के हाथ काट लिये जायें।

‘यही दंड मुझे मिलना चाहिए।’ तपस्वी ने कहा - न्याय दंड किसी के साथ पक्षपात नहीं करता। व्यक्तियों का ख्याल किये बिना निष्पक्ष भाव से जो व्यवहार किया जाता है वही सच्चा न्याय है। राजन् तुमने मुझसे आते समय यह पूछा था मेरे योग्य क्या आज्ञा है? मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ कि शीघ्र ही मेरे दोनों हाथ कटवा डालो।’ राजा विवश था, उसे तपस्वी की आज्ञा पालन करनी पड़ी।

अपने अपराध का दंड पाकर तपस्वी लिखित प्रसन्नतापूर्वक आश्रम को लौट आये। अपने भाई की कर्त्तव्य परायणता और कष्ट सहनशीलता को देखकर शंख का गला भर आया और वे उनके गले से लिपट गये। शंख ने कहा-अपराधी हाथों को लेकर जीने की अपेक्षा बिना हाथों के जीना अधिक श्रेष्ठ है। लिखित ! पाप का फल पाकर अब तुम विशुद्ध हो गये।

शंख की आज्ञानुसार लिखित ने पास की नदी में जाकर स्नान किया। स्नान करते ही उनके दोनों हाथ फिर वैसे ही उग आये। वे दौड़े हुए भाई के पास गए और उन नये हाथों को आश्चर्य पूर्वक दिखाया।

शंख ने कहा-भैया, इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। हम लोगों की तपस्या के कारण ही यह क्षतिपूर्ति हुई है। तब लिखित ने और अधिक अचंभित होकर पूछा-यदि हम लोगों की इतनी तपस्या है तो क्या उसके बल से उस छोटे से पाप को दूर नहीं किया जा सकता था?

शंख ने कहा- ‘न’ पाप का परिणाम भोगना ही पड़ता है। उसे बिना भोगे छुटकारा नहीं मिल सकता।
(महाभारत)

👉 चाहिए साहसी, जिम्मेदार:-

युग निर्माण योजना, शतसूत्री कार्यक्रमों में बँटी हुई है। वे यथास्थान, यथास्थिति, यथासंभव कार्यान्वित भी किए जा रहे हैं, पर एक कार्यक्रम अनिवार्य है और वह यह कि इस विचारधारा को जन-मानस में अधिकाधिक गहराई तक प्रविष्ट कराने, उसे अधिकाधिक व्यापक बनाने का कार्यक्रम पूरी तत्परता के साथ जारी रखा जाए। हम थोड़े व्यक्ति युग को बदल डालने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। धीरे-धीरे समस्त मानव समाज को सद्भावना सम्पन्न एवं सन्मार्ग मार्गी बनाना होगा और यह तभी संभव है जब यह विचारधारा गइराई तक जन-मानस में प्रविष्ट कराई जा सके। इसलिए अपने आस-पास के क्षेत्र में इस प्रकाश को व्यापक बनाए रखने का कार्य तो परिवार के प्रत्येक प्रबुद्ध व्यक्ति को करते ही रहना होगा।
  
अन्य कोई कार्यक्रम कहीं चले या न चले, पर यह कार्य तो अनिवार्य है कि इस विचारधारा से अधिकाधिक लोगों को प्रभावित करने के लिए निरंतर समय, श्रम, तन एवं मन लगाया जाता रहे। जो ऐसा कर सकते हैं, जिनमें ऐसा करने की प्रवृत्ति उत्पन्न हो गई है, उन्हें हम अपना उत्तराधिकारी कह सकते हैं। धन नहीं, लक्ष्य हमारे हाथ में है, उसे पूरा करने का उत्तरदायित्व भी हमारे उत्तराधिकार में किसी को मिल सकता है। उसे लेने वाले भी कोई बिरले ही होंगे। इसलिए उनकी खोज तलाश आरंभ करनी पड़ रही है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, दिसम्बर १९६४, पृष्ठ ४९, ५०

👉 Freedom of Karma

Among all the life-forms, only human form is the one in which the being is given freedom of actions (karma). The marvelous faculties of conscious and unconscious mind, intellect, and the sense of self-identity are gifted to a human mainly so that he could make best use of these in his actions – intellect is given for reasoning; mind for thinking and pondering over the reasoned thoughts and testing every action whether it is good or bad, weather it is worth one’s dignity as a human. If one does not make sane use of this unique privilege, he shall not only be the loser but also a culprit of defying the preeminent duty assigned by the Supreme Creator.

Freedom of karma is a birth right of every human being. But, no one has the freedom to escape the karmas. The system of Nature is such that every creature has to do its essential karmas for survival. Nature does not allow any other creature to do anything against its nature. Humans, because of the liberty of karmas, can attempt diversified actions. But not doing any karma is impossible for everyone. Nature will automatically pull one towards some karma as per one’s intrinsic tendencies. This is what Lord Krishna reminds Arjuna in the holy Gita.

The Omnipresent Consciousness of God is present in every soul. Those who escape from their karmas and those who try going against the Law of Karma are further entrapped in the illusion of HIS maya.

📖  Akhand Jyoti, Oct. 1946

👉 स्वप्न सत्य

• “एक किसान को बुढ़ापे में एक लड़का हुआ था। लड़के को वह बहुत यत्न से पालता था। धीरे धीरे लड़का बडा़ हुआ। एक दिन जब किसान खेत में काम कर रहा था, किसी ने आकर उसे खबर दी कि तुम्हारा लड़का बहुत बीमार है अब तब हो रहा है। उसने घर में आकर देखा, लड़का मर गया है। स्त्री खूब रो रही है; पर किसान की आँखों में आँसू तक नहीं। उसकी स्त्री अपनी पडो़सिनों के पास इसलिए और भी शोक करने लगी कि ऐसा लड़का चला गया, पर इनकी आँखों में आँसू का नाम नहीं! बडी़ देर बाद किसान ने अपनी स्त्री को पुकारकर कहा, 'मैं क्यों नहीं रोता, जानती हो? मैंने कल स्वप्न में देखा कि राजा हो गया हूँ और सात लड़कों का बाप बना हूँ। स्वप्न में ही देखा कि वे लड़के रूप और गुण में अच्छे हैं। क्रमशः वे बडे़ हुए और विद्या तथा धर्म उपार्जन करने लगे। इतने में ही नींद खुल गयी। अब सोच रहा हूँ कि तुम्हारे इस एक लड़के के लिए रोऊँ या अपने उन सात लड़कों के लिए?' ज्ञानियों के मत से स्वप्न की अवस्था जैसी सत्य है, जाग्रत अवस्था भी वैसी ही सत्य है। “ईश्वर ही कर्ता हैं, उन्हीं की इच्छा से सब कुछ हो रहा है।"

📖 रामकृष्ण वचनामृत से

बुधवार, 29 जुलाई 2020

👉 ये मिट्टी किसी को नही छोडेगी:-

एक राजा बहुत ही महत्त्वाकांक्षी था और उसे महल बनाने की बड़ी महत्त्वाकांक्षा रहती थी उसने अनेक महलों का निर्माण करवाया!

रानी उनकी इस इच्छा से बड़ी व्यथित रहती थी की पता नही क्या करेंगे इतने महल बनवाकर!

एक दिन राजा नदी के उस पार एक महात्मा जी के आश्रम के वहाँ से गुजर रहे थे तो वहाँ एक संत की समाधी थी और सैनिकों से राजा को सूचना मिली की संत के पास कोई अनमोल खजाना था और उसकी सूचना उन्होंने किसी को न दी पर अंतिम समय मे उसकी जानकारी एक पत्थर पर खुदवाकर अपने साथ ज़मीन मे गढ़वा दिया और कहा की जिसे भी वो खजाना चाहिये उसे अपने स्वयं के हाथों से अकेले ही इस समाधी से चोरासी हाथ नीचे सूचना पड़ी है निकाल ले और अनमोल सूचना प्राप्त कर लेंवे और ध्यान रखे उसे बिना कुछ खाये पिये खोदना है और बिना किसी की सहायता के खोदना है अन्यथा सारी मेहनत व्यर्थ चली जायेगी !

राजा अगले दिन अकेले ही आया और अपने हाथों से खोदने लगा और बड़ी मेहनत के बाद उसे वो शिलालेख मिला और उन शब्दों को जब राजा ने पढ़ा तो उसके होश उड़ गये और सारी अकल ठिकाने आ गई!

उस पर लिखा था हॆ राहगीर संसार के सबसे भूखे प्राणी शायद तुम ही हो और आज मुझे तुम्हारी इस दशा पर बड़ी हँसी आ रही है तुम कितने भी महल बना लो पर तुम्हारा अंतिम महल यही है एक दिन तुम्हे इसी मिट्टी मे मिलना है!

सावधान राहगीर, जब तक तुम मिट्टी के ऊपर हो तब तक आगे की यात्रा के लिये तुम कुछ जतन कर लेना क्योंकि जब मिट्टी तुम्हारे ऊपर आयेगी तो फिर तुम कुछ भी न कर पाओगे यदि तुमने आगे की यात्रा के लिये कुछ जतन न किया तो अच्छी तरह से ध्यान रखना की जैसै ये चोरासी हाथ का कुआं तुमने अकेले खोदा है बस वैसे ही आगे की चोरासी लाख योनियों मे तुम्हे अकेले ही भटकना है और हॆ राहगीर ये कभी न भूलना की "मुझे भी एक दिन इसी मिट्टी मे मिलना है बस तरीका अलग अलग है"

फिर राजा जैसै तैसे कर के उस कुएँ से बाहर आया और अपने राजमहल गया पर उस शिलालेख के उन शब्दों ने उसे झकझोर के रख दिया और सारे महल जनता को दे दिये और "अंतिम घर" की तैयारियों मे जुट गया!

हमें एक बात हमेशा याद रखना की इस मिट्टी ने जब रावण जैसै सत्ताधारियों को नही बक्सा तो फिर साधारण मानव क्या चीज है इसलिये ये हमेशा याद रखना की मुझे भी एक दिन इसी मिट्टी मे मिलना है क्योंकि ये मिट्टी किसी को नही छोड़ने वाली है!

👉 सोऽहम् साधना द्वारा प्राणतत्व का परिपोषण

सोऽहम्-साधना भावोत्कर्ष एवं शक्ति-अवतरण की प्रक्रिया है। इसे अजपा गायत्री जाप भी कहते हैं। प्राण निरन्तर उसका बीज रूप में जप करता रहता है। श्वास लेते समय ‘सो’ ध्वनि का और छोड़ते समय ‘हम’ ध्वनि का अन्तःभूमिका में अनुभव करना होता है।

वायु जब छोटे छिद्र से होकर वेगपूर्वक निकलती है तो घर्षण के कारण ध्वनि प्रवाह उत्पन्न होता है। बाँसुरी से स्वर लहरियाँ इसी तरह निकलती हैं। जंगलों में घने बाँसों के बीच से अक्सर बाँसुरी जैसी ध्वनियाँ निकलती सुनाई देती हैं। इसका कारण बाँसों में कीड़ों द्वारा किए गये छेदों में वायु की वेगपूर्वक टकराहट से उत्पन्न स्वर प्रवाह ही है। वृक्षों को झकझोर कर बहने वाली हवा से भी इसीलिए कभी-कभी सनसनाहट सुनाई पड़ती है। नासिका छिद्र भी बाँसुरी के छेदों जैसे ही है। साधारण श्वास-प्रश्वास के समय भी इनमें वायु गुजरते समय ध्वनि उत्पन्न होती है, पर वह धीमी बहुत होती है। प्राणयोग की साधना में गहरे श्वास-प्रश्वास के कारण यह ध्वनि प्रवाह तीव्रतर हो जाता है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि खुले कानों से भी ये ध्वनि-प्रवाह सुने जा सकते हैं। उन्हें तो कर्णेन्द्रियों की सूक्ष्म चेतना में ही अनुभव किया जाता है।

श्वास क्रिया पर चित्त को एकाग्र कर ‘सो’ के साथ परमात्म चेतना के अन्तःप्रवेश की अनुभूति तथा ‘हम’ के साथ जीव-भाव की काय-कलेश्वर से विसर्जन की अनुभूति करनी चाहिए। इसमें प्रत्येक श्वास-प्रश्वास में परमात्मा सत्ता का अपने शरीर और मन पर अधिकाधिक आधिपत्य होते चलने की धारणा बलवती होती जाती है। यह भाव-चेतना जागृत होने पर शरीर और मन से लोभ-मोह, वासना-तृष्णा के आधिपत्य की समाप्ति तथा उत्कृष्ट चिन्तन एवं आदर्श कर्तृत्व की, ब्रह्म-सत्ता की प्रतिष्ठापना की अनुभूति गहरी होती जाती है। अनुभूति की गहनता ही परिणामकारी होगी। अन्यथा यह सब उथली कल्पनाओं की मनोरंजक क्रीड़ा ही सिद्ध होगी। सार्थकता उन्हीं विचारों-संकल्पों की है, जो क्रिया रूप में परिणत हैं। अन्यथा सब मनमोदक मात्र है। शेखचिल्लीपन से कोई उपलब्धि सम्भव नहीं है।

शरीर-मन से अवाँछनीय इन्द्रिय लिप्साओं का निष्कासन और दिव्य चेतना के शासन की प्रक्रिया ही सोऽहम् साधना को सार्थक बनाती है। चिन्तन जीवन-प्रवाह बन जाए, तभी वह चिन्तन है। अन्यथा मानसिक रति-विनोद ही कहा जाएगा।

यों सोऽहम् साधना का चमत्कारी परिणाम भी अतुल है। यह प्राणयोग की विशिष्ट साधना है। दस प्रधान और चौवन गौण, कुल चौंसठ प्राणायामों का विधि-विधान साधना विज्ञान के अन्तर्गत है। इनके विविध लाभ हैं। इन सभी प्राणायामों में सोऽहम् साधना रूपी प्राणयोग सर्वोपरि है। यह अजपा गायत्री जप प्राणयोग के अनेक साधना-विधानों में सर्वोच्च है। इस एक के ही द्वारा सभी प्राणायामों का लाभ प्राप्त हो सकता है।

षट्चक्र वेधन में प्राणतत्व का ही उपयोग होता है। नासिका द्वारा प्राण-तत्व खींचे जाने पर आज्ञाचक्र तक तो एक ही ढंग से कार्य चलता है, पर पीछे उसके भावपरक तथा शक्तिपरक ये दो भाग हो जाते हैं। भावपरक हिस्से में फेफड़े में पहुँचा हुआ प्राण शरीर के समस्त अंग-प्रत्यंगों में समाविष्ट होकर सत् का संस्थापन और असत का विस्थापन करता है। शक्तिपरक प्राणधारा आज्ञाचक्र से पिछले मस्तिष्क को स्पर्श करती है। मेरुदण्ड से निकल जाती है, जहाँ ब्रह्मनाड़ी का महानद है। इसी ब्रह्म-नद में इड़ा-पिंगला दो विद्युतधाराएँ प्रवाहित हैं, जो मूलाधार चक्र तक जाकर सुषुम्ना-सम्मिलन के बाद लौट आती हैं। मेरुदण्ड स्थित ब्रह्मनाड़ी के इस महानद में ही षट्चक्र भँवर की तरह स्थित है। इन्हीं षटचक्रों में लोक-लोकान्तरों से सम्बन्ध जोड़ने वाली रहस्यमय कुंजियाँ सुरक्षित रखी हुई हैं। जो जितने रत्न-भण्डारों से सम्बन्ध स्थापित कर ले, वह उतना ही महान।
कुण्डलिनी शक्ति भौतिक एवं आत्मिक शक्तियों की आधारपीठ है। उसका जागरण षट्चक्र बेधन द्वारा ही सम्भव है। चक्रवेधन प्राणतत्व पर आधिपत्य के बिना सम्भव नहीं। प्राणतत्व के नियन्त्रण में सहायक प्राणायामों में सोऽहम् का प्राण योग सर्वश्रेष्ठ व सहज है।

सोऽहम् साधना द्वारा एक अन्य लाभ है। दिव्य गन्धों की अनुभूति । गन्ध वायु तत्व की तन्मात्रा है। इन तन्मात्रा द्वारा देवतत्वों की अनुभूति का माध्यम है। नासिका सोऽहम् साधना, गन्ध तन्मात्रा को विकसित करती है, परिणामस्वरूप दिकगन्धों की अनायास अनुभूति समय-समय पर होती रहती है। इन गन्धों को कुतूहल या मनोविनोद की दृष्टि से नहीं लेना चाहिए। अपितु इनमें सन्निहित विभूतियों का उपयोग कर दिव्य शक्तियों की प्राप्ति का प्रयास किया जाना चाहिए। उपासना स्थल में धूपबत्ती जलाकर, गुलदस्ता सजाकर, चन्दन, कपूर आदि के लेपन या इत्र -गुलाबजल के छिड़काव द्वारा सुगन्ध पैदा की जाती है और उपासना अवधि में उसी की अनुभूति को सहज बनाया जाता है। यह अनुभूति गहरी होती चले, तो साधना स्थल से बाहर निकलने पर, बिना किसी गन्ध-उपकरण के भी दिकगन्ध आती रहेगी। ऐसी दिकगन्ध, एकाग्रता की अभिरुचि का चिन्ह है। विभिन्न पशु-पक्षियों, कीड़े-मकोड़ों में घ्राण-शक्ति का महत्व सर्वविदित है। उसी के सहारे वे रास्ता ढूँढ़ते शत्रु को भाँपते और सुरक्षा का प्रबन्ध करते, प्रणय-सहचर को आमंत्रित करते, भोजन की खोज करते तथा मौसम की जानकारी प्राप्त करते हैं। इसी घ्राण-शक्ति के आधार पर प्रशिक्षित कुत्ते अपराधियों को ढूँढ़ निकालते हैं। मनुष्य अपनी घ्राण-शक्ति को विकसित कर अतीन्द्रिय संकेतों तथा अविज्ञात गतिविधियों को समझ सकते हैं। दिव्य-शक्तियों से सम्बन्ध का भी गन्धानुभूति एक महत्वपूर्ण माध्यम है। सोऽहम् साधना इसी शक्ति को विकसित करती है।

सोऽहम् साधना का एक अन्य विशिष्ट पक्ष स्वर साधना का है। शरीर और मन की स्थिति में ऋण एवं धन विद्युत आवेशों की घट-बढ़, इड़ा तथा पिंगला, नाड़ी के माध्यम से चलने वाले चन्द्र-सूर्य स्वर के प्रभाव अनुसार होती रहती है। स्वर स्थिति का सही ज्ञान अपनी अन्तः-क्षमता की दशा को जानने में सहायक होता है और तब किस समय कौन सा काम हाथ में लेना अधिक उचित होगा, यह निर्णय लेना भी सरल हो जाता है। सामान्यतः अविज्ञात जानकारियाँ भी स्वरयोग के द्वारा अधिक अच्छी तरह समझी जा सकती हैं।
स्वरयोग अपने आप में एक स्वतन्त्र शास्त्र है। उसकी साधना के अनेक अभ्यास हैं, पर सोऽहम् साधना उनमें सर्वाधिक सरल व सफल है। इस प्राणयोग द्वारा षट्चक्र वेधन सरल होता है। पंचकोशों के अनावरण हेतु अपेक्षित प्रखर प्राण-शक्ति भी इसी प्राणयोग के द्वारा सहज प्राप्त होती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर १९७६

👉 Live with Dignity

What could be more abominable and disdainful than a human life spend like that of bees or dogs buzzing and sticking around the rubbish of sinful tendencies or running madly in greed to lick the dirt of sensual lust. That ascent or ‘success’ of human life is useless and scornful which grows like a tree of dates, offering no shadow or shelter to anyone. What to say of the prosperous life, which is spent like a snake in guarding the possessions, which is all the time occupied in fulfilling selfish ambitions? They are really pitiable who are ignorant and wasters the precious opportunities of being born as humans – which even gods aspire to attain… Their acts are like selling invaluable pearls for mere pieces of colored glass and shining stones. The will have nothing but the sufferings of the sins and flaws and repenting in the end…

So, awaken ‘O’ human being, and recognize the greatness of your life. Live a life worth its dignity; do something that leaves out glorious marks behind you, which others could follow with grace. Do something, which could provide some light to the future generations. Truthfulness, honesty, loving and kind attitude, benevolence, tolerance, firmness, fairness, self-retrain, are the virtues of humanity which every human being could adopt irrespective of his or her intellectual level or social circumstances etc. These are the real treasure, real beauty and real honors of human life.

📖  Akhand Jyoti, Aug. 1946

👉 विचारों का प्रतिफल कर्म

कर्म जो आँखों से दिखाई देता है वह अदृश्य−विचारों का ही दृश्य रूप है। मनुष्य जैसा सोचता है वैसा करता है। चोरी, बेईमानी, दगाबाजी, शैतानी, बदमाशी कोई आदमी यकायक कभी नहीं कर सकता, उसके मन में उस प्रकार के विचार बहुत दिनों से घूमते रहते हैं। अवसर न मिलने से वे दबे हुए थे, समय पाते ही वे कार्य रूप में परिणत हो गये। बाहर के लोगों को किसी के द्वारा यकायक कोई दुष्कर्म होने की बात सुनकर इसलिए आश्चर्य होता है कि वे उसकी भीतरी स्थिति को नहीं जानते थे। इसी प्रकार कोई अधिक उच्चकोटि का सत्कर्म करने का भी आकस्मिक समाचार भले ही सुनने को मिले पर वस्तुतः उसकी तैयारी वह मनुष्य भीतर ही भीतर बहुत दिनों से कर रहा होता है। इसी प्रकार जो व्यक्ति आज उन्नतिशील एवं सफलता सम्पन्न दिखाई पड़ते हैं वे अचानक ही वैसे नहीं बन गये होते वरन् चिरकाल से उनका प्रयत्न उसके लिए चल रहा होता है। भीतरी पुरुषार्थ को उनने बहुत पहले जगा लिया होता है। उनने अपने मनःक्षेत्र में भीतर ही भीतर वह अच्छाइयाँ जमा कर ली होती हैं जिनके द्वारा बाह्य जगत में दूसरों का सहयोग एवं उन्नति का आधार निर्भर रहता है। बाह्य−जीवन हमारे भीतरी जीवन का प्रतिबिम्ब मात्र है। पर्दे के पीछे दीपक जल रहा है तो उसका कुछ प्रकाश बाहर भी परिलक्षित होता है। इसी प्रकार भीतरी पर्दे में जिनमें कुछ अच्छाइयाँ हैं वे ही उनकी कीमत पर बाह्य−जगत में सुख साधनों को खरीद लेते हैं।

अनैतिक प्रकृति के लोग बहुधा अपनी चालाकी से धन कमा लेते या कोई उन्नति कर लेते देखे जाते हैं। इससे उस कमाई का सारा श्रेय अनैतिकता को नहीं दिया जा सकता। माना कि लोगों की कमजोरी और भोलेपन का लाभ कई शैतान उठा लेते हैं पर इस शैतानी के पीछे भी उनकी चतुरता, तीव्र−बुद्धि, तत्परता, सावधानी, लगन, हिम्मत, कष्ट सहिष्णुता आदि अनेक गुण छिपे रहते हैं। डाकुओं में भी पुरुषार्थ, हिम्मत, बहादुरी, कष्ट−सहिष्णुता, चतुरता, सावधानी अपने साथियों के प्रति वफादारी आदि अनेक मानसिक गुण भी होते हैं। यदि यह गुण किसी में न हों और वह केवल बेईमानी से ही कुछ लाभ उठाना चाहे तो उसका प्रयास एक कदम भी सफल नहीं हो सकता। अनैतिक लोगों की सफलता से चकित होकर कई लोग अनैतिकता को लाभ और सफलता का हेतु मानने लगते हैं यह भूल है। अनैतिकता के फलस्वरूप तो उन्हें सर्वत्र अविश्वास, घृणा, तिरस्कार, असहयोग एवं यथा अवसर राजकीय एवं ईश्वरीय दंड ही मिलता है। लाभ का श्रेय तो उस मनोभूमि को है जो प्रयत्नपूर्वक इतनी जल्दी बनाई गई कि अनैतिकता के दंड एवं लोगों की पकड़ से बचते हुए एक प्रकार की सफलता प्राप्त कर ली गई। बेवकूफ एवं आलसी, लापरवाह एवं अड़ियल प्रकृति के लोग अनैतिकता को अपनाकर भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकते। यदि पाप से ही कमाई होती हुई होती तो हर दुरात्मा को सफलता मिली होती। फिर जो लाखों अनैतिक मनोभूमि वाले भीख−टूक पर गुजारा करते दिखाई देते हैं वे सब के सब मालदार ही हो गये होते।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

👉 विरोध न करना पाप का परोक्ष समर्थन (अंतिम भाग)

“चोर-चोर मौसेरे भाई” की उक्ति हर क्षेत्र में लागू होते देखते हैं। एक का पर्दाफाश होते ही-दूसरे अन्य मठकटे उसकी सहायता के लिए आ धमकते हैं। सोचते हैं संयुक्त मोर्चा बनाकर ही जन आक्रोश से बचा जा सकता है अन्यथा पाप के प्रति उभरा हुआ रोष आज एक साथी को दबोच रहा है तो कल दूसरे पर आ चढ़ेगा। इसलिए संयुक्त रूप से बचाव के उपाय करने चाहिए।

देखा गया है कि एक जेबकट पकड़ा जाय तो वह दो-चार चांटे पड़ते ही दहाड़ मारकर रोने-चिल्लाने लगता है मानो किसी ने उसकी गरदन काट ली हो। गिड़गिड़ाते, रोते-काँपते माफी माँगता है और दीनता की दुहाई देता है। इतने में अन्य साथी भले आदमियों के रूप में बीच-बिचाव करने आ पहुँचते हैं। वे तरह-तरह के ऐसे तर्क उपस्थित करते हैं मानो सज्जनता और साधुता के साक्षात् अवतार हैं। दस-बीस और भोले आदमी इकट्ठे होते हैं तो सज्जनतावादी तर्क उन्हें भी प्रभावित करते हैं और जेबकट को छुड़ा देते हैं। वह चाण्डाल चौकड़ी अपनी उस्ताद पर खूब प्रसन्न होती है और आपस में कहते हैं यह हथकण्डा कितना सस्ता और बढ़िया है कि पकड़े जाने पर बिना दण्ड भोगे इस तरकीब के सहारे सहज ही जान छुड़ाई जा सकती है। दुष्ट लोग आवश्यकतानुसार पकड़े जाने पर फिर इसी फार्मूले का उपयोग करते हैं और देखते हैं कि सज्जनता की आड़ में दुष्टता को पोषण देने का कैसा विचित्र और सरल हथकण्डा है।

करुणा और दया अच्छे गुण हैं, किन्तु उनका उपयोग हर जगह कल्याणकारी रूप में नहीं किया जा सकता। सीता छद्मवेशी रावण पर दया करके ही स्वयं विपत्ति में फंसी थी। बिना विवेक कुपात्र को भी दया-करुणा का लाभ पहुँचाना उन सत्प्रवृत्तियों को अपमानित करना है। ऐसा करना देवताओं के हथियार दुष्टों को सौंप देने जैसा मूर्खता और अनीति भरा कार्य है। यदि ‘पात्र-कुपात्र’ उचित-अनुचित का विवेक न किया गया तो दयालुता और उदारता का जो लाभ सत्प्रवृत्तियों को मिलना चाहिए वह न मिल सकेगा और दुष्ट प्रवृत्तियाँ अनायास ही उनका शोषण करने में सफल हो जावेंगी। अस्तु अनीति करने वाले के प्रति इस प्रकार की सम्वेदनाओं का प्रयोग नहीं किया जाना उचित है।

कहने का मतलब है, धर्म के प्रति जिसे जितना प्रेम हो वह अधर्म के प्रति उतना ही द्वेष रखे। जिसे ईश्वर भक्ति और आस्तिकता पर विश्वास हो वह ईश्वर विरोधी नास्तिकता के एकमात्र आधार अनाचार से बचे और बचावे। इसके बिना ईश्वर और शैतान को पाप और पुण्य को एक ही समझने की भूल होती रहेगी और भीतर तथा बाहर पनपता हुआ असुरत्व आत्मिक प्रगति की दिशा में एक कदम भी आगे न बढ़ने देगा।

अनीति को देखते हुए भी चुप बैठे रहना, उपेक्षा करना, आँखों पर पर्दा डाल लेना जीवित-मृतक का चिन्ह है। जो उसका समर्थन करते हैं, वे प्रकारान्तर से स्वयं ही दुष्कर्मकर्ता हैं। स्वयं न करना किन्तु दूसरों के दुष्ट कर्मों में सहायता, समर्थन, प्रोत्साहन, पथ-प्रदर्शन करना एक प्रकार से पाप करना है। इन दोनों ही तरीकों से दुष्टता का अभिवर्धन होता है।

मानवी साहसिकता और धर्मनिष्ठा का तकाजा है कि जहाँ भी अनीति पनपती देखें वहाँ उसके उन्मूलन का प्रयत्न करें। यह न सोचें कि जब अपने ऊपर सीधी विपत्ति आवेगी तब देखा जायेगा। आग अपने छप्पर में लगे तभी उसे बुझाया जाय, इसकी अपेक्षा यह अधिक उत्तम है कि जहाँ भी आग लगी है वहाँ बुझाने को आत्मरक्षा का अग्रिम मोर्चा मानकर तुरन्त विनाश से लड़ पड़ा जाय। यदि सीधे टकराने की सामर्थ्य अथवा स्थिति न हो तो कम से कम असहयोग एवं विरोध की दृष्टि से जितना कुछ बने पड़े उतना तो करना ही चाहिए। असुरता को निरस्त करने और देवत्व को बलिष्ठ बनाने के लिए हमें अपना अनीति विरोधी रुख तो अपनाये ही रखना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति १९७६ नवम्बर ६४

मंगलवार, 28 जुलाई 2020

👉 साक्षी की साधना

बुद्ध के पास एक राजकुमार दीक्षित हो गया, दीक्षा के दूसरे ही दिन किसी श्राविका के घर उसे भिक्षा लेने बुद्ध ने भेज दिया। वह वहां गया। रास्ते में दोत्तीन घटनाएं घटीं लौटते आते में, उनसे बहुत परेशान हो गया। रास्ते में उसके मन में खयाल आया कि मुझे जो भोजन प्रिय हैं, वे तो अब नहीं मिलेंगे। लेकिन श्राविका के घर जाकर पाया कि वही भोजन थाली हैं जो उसे बहुत प्रीतिकर हैं। वह बहुत हैरान हुआ। फिर सोचा संयोग होगा, जो मुझे पसंद है वही आज बना होगा। वह भोजन करता है तभी उसे खयाल आया कि रोज तो भोजन के बाद में विश्राम करता था दो घड़ी, आज तो फिर धूप में वापस लौटना है। लेकिन तभी उस श्राविका ने कहा कि भिक्षु बड़ी अनुकंपा होगी अगर भोजन के बाद दो घड़ी विश्राम करो। बहुत हैरान हुआ। जब वह सोचता था यह तभी उसने यह कहा था, फिर भी सोचा संयोग कि ही बात होगी कि मेरे मन भी बात आई और उसके मन में भी सहज बात आई कि भोजन के बाद भिक्षु विश्राम कर ले।

चटाई बिछा दी गई, वह लेट गया, लेटते ही उसे खयाल आया कि आज न तो अपना कोई साया है, न कोई छप्पर है अपना, न अपना कोई बिछौना है, अब तो आकाश छप्पर है, जमीन बिछौना है। यह सोचता था, वह श्राविका लौटती थी, उसने पीछे से कहा:  भंते! ऐसा क्यों सोचते हैं? न तो किसी की शय्या है, न किसी का साया है। अब संयोग मानना कठिन था, अब तो बात स्पष्ट थी। वह उठ कर बैठ गया और उसने कहा कि मैं बड़ी हैरानी में हूं, क्या मेरे विचार तुम तक पहुंच जाते हैं? क्या मेरा अंतःकरण तुम पढ़ लेती हो? उस श्राविका ने कहा:  निश्चित ही। पहले तो, सबसे पहले स्वयं के विचारों का निरीक्षण शुरू किया था, अब तो हालत उलटी हो गई, स्वयं के विचार तो निरीक्षण करते-करते क्षीण हो गए और विलीन हो गए, मन हो गया निर्विचार, अब तो जो निकट होता है उसके विचार भी निरीक्षण में आ जाते हैं। वह भिक्षु घबड़ा कर खड़ा हो गया और उसने कहा कि मुझे आज्ञा दें, मैं जाऊं, उसके हाथ-पैर कंपने लगे। उस श्राविका ने कहा:  इतने घबड़ाते क्यों हैं? इसमें घबड़ाने की क्या बात है? लेकिन भिक्षु फिर रुका नहीं। वह वापस लौटा, उसने बुद्ध से कहा:  क्षमा करें, उस द्वार पर दुबारा भिक्षा मांगने मैं न जा सकूंगा।

बुद्ध ने कहा:  कुछ गलती हुई? वहां कोई भूल हुई?

उस भिक्षु ने कहा:  न तो भूल हुई, न कोई गलती, बहुत आदर-सम्मान और जो भोजन मुझे प्रिय था वह मिला, लेकिन वह श्राविका, वह युवती दूसरे के मन के विचारों को पढ़ लेती है, यह तो बड़ी खतरनाक बात है। क्योंकि उस सुंदर युवती को देख कर मेरे मन में तो कामवासना भी उठी, विकार भी उठा था, वह भी पढ़ लिया गया होगा? अब मैं कैसे वहां जाऊं? कैसे उसके सामने खड़ा होऊंगा? मैं नहीं जा सकूंगा, मुझे क्षमा करें!

बुद्ध ने कहा:  वहीं जाना पड़ेगा। अगर ऐसी क्षमा मांगनी थी तो भिक्षु नहीं होना था। जान कर वहां भेजा है। और जब तक मैं न रोकूंगा, तब तक वहीं जाना पड़ेगा, महीने दो महीने, वर्ष दो वर्ष, निरंतर यही तुम्हारी साधना होगी। लेकिन होशपूर्वक जाना, भीतर जागे हुए जाना और देखते हुए जाना कि कौनसे विचार उठते हैं, कौन सी वासनाएं उठती हैं, और कुछ भी मत करना, लड़ना मत जागे हुए जाना, देखते हुए जाना भीतर कि क्या उठता है, क्या नहीं उठता।

वह दूसरे दिन भी वहीं गया।  वह भिक्षु अपने मन को देख रहा है, जागा हुआ है, आज पहली दफा जिंदगी में वह जागा हुआ चल रहा है सड़क पर, जैसे-जैसे उस श्राविका का घर करीब आने लगा, उसका होश बढ़ने लगा, भीतर जैसे एक दीया जलने लगा और चीजें साफ दिखाई पड़ने लगीं और विचार घूमते हुए मालूम होने लगे। जैसे उसकी सीढ़ियां चढ़ा, एक सन्नाटा छा गया भीतर, होश परिपूर्ण जग गया। अपना पैर भी उठाता है तो उसे मालूम पड़ रहा है, श्वास भी आती-जाती है तो उसके बोध में है। जरा सा भी कंपन विचार का भीतर होता है, लहर उठती है कोई वासना की, वह उसको दिखाई पड़ रही है। वह घर के भीतर प्रविष्ट हुआ, मन में और भी गहरा शांत हो गया, वह बिलकुल जागा हुआ है। जैसे किसी घर में दीया जल रहा हो और एक-एक चीज, कोना-कोना प्रकाशित हो रहा हो।

वह भोजन को बैठा, उसने भोजन किया, वह उठा, वह वापस लौटा, वह उस दिन नाचता हुआ वापस लौटा। बुद्ध के चरणों में गिर पड़ा और उसने कहा:  अदभुत हुई बात। जैसे-जैसे मैं उसके निकट पहुंचा और जैसे-जैसे मैं जागा हुआ हो गया, वैसे-वैसे मैंने पाया कि विचार तो विलीन हो गए, कामनाएं तो क्षीण हो गईं, और मैं जब उसके घर में गया तो मेरे भीतर पूर्ण सन्नाटा था, वहां कोई विचार नहीं था, कोई वासना नहीं थी, वहां कुछ भी नहीं था, मन बिलकुल शांत और निर्मल दर्पण की भांति था।

बुद्ध ने कहा:  इसी बात के लिए वहां भेजा था, कल से वहां जाने की जरूरत नहीं। अब जीवन में इसी भांति जीओ, जैसे तुम्हारे विचार सारे लोग पढ़ रहे हों। अब जीवन में इसी भांति चलो, जैसे जो भी तुम्हारे सामने है, वह जानता है, तुम्हारे भीतर देख रहा है। इस भांति भीतर चलो और भीतर जागे रहो। जैसे-जैसे जागरण बढ़ेगा, वैसे-वैसे विचार, वासनाएं क्षीण होती चली जाएंगी। जिस दिन जागरण पूर्ण होगा उस दिन तुम्हारे जीवन में कोई कालिमा, कोई कलुष रह जाने वाला नहीं है। उस दिन एक आत्म-क्रांति हो जाती है। इस स्थिति के जागने को, इस चैतन्य के जागने को मैं कह रहा हूं।

👉 मनुष्य जाति को बचाना है

इन दिनों जन-मानस पर छाई हुई दुर्बुद्धि जीवन के हर क्षेत्र को बुरी तरह संकटापन्न बना रही है। स्वास्थ्य, सन्तुलन, परिवार, अर्थ-उपयोग, पारस्परिक सद्भाव, समाज, राष्ट्र, धर्म, अध्यात्म जैसे किसी भी क्षेत्र को उसने विकृतिग्रस्त बनाने से अछूता छोड़ा नहीं है। फलतः बाहर ठाठ-बाट बढ़ जाने पर भी सर्वत्र खोखलापन और अधःपतन ही दृष्टिगोचर हो रहा है। विश्व की विभिन्न समस्याओं की जड़ में यह विकृत बुद्धि ही काम कर रही है। हमें अपने युग के इसी असुर से लोहा लेना है। यह अदृश्य दानव भूतकाल के रावण, कंस, हिरण्यकश्यप, वृत्रासुर, महिषासुर आदि सभी से बढ़ा-चढ़ा है। उनने थोड़े से क्षेत्र को ही प्रभावित किया था, इसने मनुष्य जाति के अधिकाँश सदस्यों को जकड़ लिया है। बात भलमनसाहत की भी खूब चलती है, पर भीतर ही भीतर जो पकता है उसकी दुर्गन्ध से नाक सड़ने लगती है।

यदि मनुष्य जाति के भविष्य को बचाना है तो अवाँछनीयता, अनैतिकता, मूढ़ता और दुष्टता से पग-पग पर लोहा लेना पड़ेगा। ज्ञान-यज्ञ का, विचार क्रान्ति अभियान का, युग-निर्माण योजना का, युगान्तर चेतना का अवतरण इसी प्रयोजन के लिए हुआ है। मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण प्रत्यक्ष देखने के लिए हमारे प्रयास चल रहें हैं। यह सार्वभौम और सर्वजनीन प्रयास है। उथली राजनीति वर्गगत, फलगत, क्षुद्र प्रयोजनों से हमारा दूर का भी नाता नहीं है। हमें दूरगामी और मानवी चेतना को परिष्कृत करने वाली सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों को बोना, उगाना और परिपुष्ट करना है। इसके लिए अनेकों प्रचारात्मक, रचनात्मक एवं सुधारात्मक कार्य करने के लिए पड़े हैं। जो हो रहा है उससे अनेकों गुनी सामर्थ्य, साहस और साधन समेट कर आगे बढ़ चलने की आवश्यकता है और यह प्रयास हमीं अग्रदूतों को आगे बढ़कर अपने कन्धों पर उठाना चाहिए।

यह कार्य तभी सम्भव है जब हममें से प्रत्येक अपनी अन्यमनस्कता एवं उपेक्षा पर लज्जित हो और अनुकरणीय आदर्श उपस्थित करने का साहस समेटे। समय दिये बिना-आर्थिक अंशदान के लिए उत्साह सँजोये बिना यह कार्य और किसी तरह हो ही नहीं सकता। धर्म-मंच से लोक-शिक्षण प्रक्रिया के अन्तर्गत बीस सूत्री कार्यक्रम बताये जाते रहे हैं। अन्य सामयिक कार्यक्रमों के लिए पाक्षिक युग-निर्माण योजना में निर्देश एवं समाचार छपते रहते हैं। स्थानीय आवश्यकता एवं अपनी परिस्थिति को देखकर इनमें से कितने ही कार्य हाथ में लिये जा सकते हैं। यह पूछना व्यर्थ है कि आदेश दिया जाय कि हम क्या करें?

अपने घर से आरम्भ करके सार सम्पर्क क्षेत्रों में ज्ञान-घटों की स्थापना और उनका सुसंचालन, झोला पुस्तकालय, चल पुस्तकालय, जन्म-दिन, पर्व संस्कारों के आयोजन, तीर्थयात्रा, शाखा का वार्षिकोत्सव, महिला शाखा की स्थापना जैसे कितने ही कार्य ऐसे हैं जिन्हें आलस्य छोड़ने और थोड़ा उत्साह जुटा लेने से ही तत्काल आरम्भ किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त प्रौढ़ पाठशालाएँ, व्यायामशालाएँ, वृक्षारोपण, पुस्तकालय स्थापना जैसे अनेकों रचनात्मक और दहेज, मृत्युभोज, नशा, जाति और लिंग भेद के नाम पर चलने वाली असमानता, भिक्षा व्यवसाय, आर्थिक भ्रष्टाचार, अनाचार, प्रतिरोध जैसे अनेकों सुधारात्मक काम करने के लिए पड़े हैं। जिन्हें कभी भी कोई भी आरम्भ कर सकता है और अपने साथी जुटा कर इन्हें सफल अभियान का रूप दे सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर १९७६

👉 The Perennial Law of Mental Evolution

The quality of our mental inscriptions and hence the nature of our mind depends upon what kinds of thoughts dominate our thinking most often. An empty mind is said to be a devil’s house whereas a mind engaged in creative works and righteous, constructive, deeper thinking is sure to sharpen, brighten and expand its capabilities.

You must ponder over this fact that your mental evolution is in your hands. Short-temperedness enhances the tendencies of anger, harmful excitations. Worries, tensions, gloom, despair and similar kinds of negative instincts weaken your mind further. So step plunging into the untoward memories of the past and do not let your mind roam in vulgar, erotic, revengeful, depressing or arbitrary imaginations.

Positive, optimistic and reasoned thinking educes new joy and energy in your mind and motivates it for constructive actions; this is also the key to sharpening the intellect. In short, our thoughts are the hidden rulers of our life. Concentration of mind upon a focused objective and associated thoughts augment its corresponding skills and potentials. This is how one becomes an expert in specific talent or field of knowledge…

📖  Akhand Jyoti, July 1946

👉 विरोध न करना पाप का परोक्ष समर्थन (भाग ४)

यज्ञ सन्दर्भ में एक श्रुति वचन प्रयोग होता है- ‘‘मन्यु रसि मन्यु मे दहि’’ हे भगवान् आप ‘मन्यु’ हैं हमें ‘मन्यु’ प्रदान करें। मन्यु का अर्थ है वह क्रोध जो अनाचार के विरोध में उमंगता है। निन्दित क्रोध वह है जो व्यक्तिगत कारणों से अहंकार की चोट लगने पर उभरता है और असंतुलन उत्पन्न करता है। किन्तु जिसमें लोक-हित विरोधी अनाचार को निरस्त करने का विवेकपूर्ण संकल्प जुड़ा होता है वह ‘मन्यु’ है। मन्यु में तेजस्विता, मनस्विता और ओजस्विता के तीनों तत्व मिले हुए हैं। अस्तु वह क्रोध के समतुल्य दीखने पर भी ईश्वरीय वरदान के तुल्य माना गया है और उसकी गणना उच्च आध्यात्मिक उपलब्धियों से की गई है।

राजा द्रुपद के अनाचारों से क्षुब्ध उनके सहपाठी, द्रौणाचार्य राज सभा में इसलिए गये कि अपनी बात मित्रता का परिचय देते हुए उसके शुभ-चिंतन की बात कहेंगे और कुमार्ग से पीछे हटाने का प्रयत्न करेंगे। पर हुआ ठीक उलटा। मदान्ध द्रुपद उनके उपदेश सुनने तक के लिए तैयार नहीं हुए और अपमानित करके उन्हें सभा भवन में से निकलवा दिया।
 
द्रौणाचार्य ने विवेक नहीं खोया। द्रुपद समझाने की सज्जनोचित रीति से नहीं मानते तो उन्हें दण्ड की दुर्जनों पर प्रयुक्त होने वाली प्रक्रिया का सहारा लेंगे। हर हालत में उन्हें सीधे रास्ते पर लाने का प्रयत्न जारी रखेंगे। इस निश्चय से साथ वे पाण्डवों को पढ़ाने लग गये। जब छात्र बड़े हुए और गुरु दक्षिणा देने की बात कही तो उनने एक ही उत्तर दिया कि- ‘‘द्रुपद के अहंकार को नीचे गिराना और उसे सुधारना है, इसलिए उसे पकड़ कर मुख बांधकर मेरे सामने ले आओ।’’ शिष्यों ने वही किया। द्रुपद पर आक्रमण हुआ। उन्हें हराया गया और रस्सों से जकड़ कर गुरु के सामने प्रस्तुत किया गया। द्रौणाचार्य ने कहा- ‘राजन् अहंकार और अनीति अभी भी छोड़ी जानी है या नहीं?’ द्रुपद रो पड़े उनने दोनों दुष्टताएं छोड़ दीं। साथ ही स्वयं भी बन्धन मुक्त हो गये। महाभारत की इस कथा में यह प्रेरणा है कि दुष्टता से उभरने पर मौन नहीं बैठे रहना चाहिए। मीठे उपाय सफल न हों तो कडुए भी अपनाये जा सकते हैं। हर हालत में अनाचार का तो अंत होना ही चाहिए।

वैयक्तिक पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक आदि विभिन्न क्षेत्रों में छद्मवेशों से छिपे हुए भ्रष्टाचार का अंत तब तक नहीं हो सकता, जब तक उनके प्रति जन-आक्रोश न जगाया जाय। आज तो स्थिति यह हो गई है कि उचित-अनुचित का भेद तक करना, लोग भूलते जाते हैं और किसके साथ सहयोग करना, किसके साथ न करना इस विवेक को खो जाते हैं। जिसके साथ जिसकी मित्रता है, वह उसके पाप अनाचार का भी चित्र-विचित्र तर्कों से समर्थन करता है। नैतिक दृष्टि से यह अत्यन्त ही दुर्भाग्य पूर्ण स्थिति है। मित्रता के प्रमुख लक्षणों में रामायण कार ने ‘‘कुपथ निवार सुपंथ चलावा’’ का सूत्र दिया है। सच्चा मित्र वह है जो मीठे, कडुए उपायों से उसकी अनैतिक प्रवृत्तियों को सुधारें, गलत मार्ग पर चलने से रोकें और सन्मार्ग की दिशा में प्रवृत्त करें, जो उसकी उपेक्षा बरतता है अथवा समर्थन, सहयोग करता है, वह प्रकारान्तर से अपने मित्र को अधिक भ्रष्ट करने में- अधिक पतित, निन्दित एवं दुःखों के गर्त में डुबाने के लिए प्रवृत्त है। ऐसा व्यक्ति मित्र होने का दावा करते हुए भी असल में उसका पक्का दुश्मन है। सुधार प्रक्रिया में यह समर्थन ही सबसे बड़ी बाधा है। ऐसे मित्र नामधारी, व्यक्ति अपने मित्र के साथ ही अपना भी लोक-परलोक बिगाड़ते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर १९७६

👉 स्वार्थ छोडिये

एक छोटे बच्चे के रूप में, मैं बहुत स्वार्थी था, हमेशा अपने लिए सर्वश्रेष्ठ चुनता था। धीरे-धीरे, सभी दोस्तों ने मुझे छोड़ दिया और अब मेरे...