मंगलवार, 18 जून 2019

The Cause of Failure | असफलताओं का कारण | Hariye Na Himmat Day 14



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वह शक्ति हमें दो दयानिधे | Vah Shakti Hame Do Dayanidhe



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Forget Painful Memories | दुःखद स्मृतियों को भूलो | Hariye Na Himmat D...



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👉 विष को अमृत बना लीजिए।

शायद तुम्हारा मन अपने दुस्स्वभावों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं होता। काम क्रोध लोभ मोह के चंगुल में तुम जकड़े हुए हो और जकड़े ही रहना चाहते हो। अच्छा तो एक काम करो। इन चारों का ठीक ठीक स्वरूप समझ लो। इनको ठीक तरह प्रयोग में लाना सीख लो। तो तुम्हारा काम चल जायेगा।

कामना करना कोई बुरी बात नहीं है। अब तक तुम गुड़ की कामना करते थे अब मिठाई की इच्छा करो। स्त्री, पुत्र, धन, यश आदि के लाभ छोटे, थोड़े नश्वर और अस्थिर हैं, तुम्हें एक कदम आगे बढ़कर ऐसे लाभ की कामना करनी होगी जो सदा स्थिर रहे और बहुत सुखकर सिद्ध हो। धन ऐश्वर्य को तलाश करने के लिए तुम्हें बाहर ढूँढ़ खोज करनी पड़ती है पर अनन्त सुख का स्थान तो बिल्कुल पास अपने अन्तःकरण में ही है। आओ, हृदय को साफ कर डालो, कूड़े कचरे को हटाकर दूर फेंक दो और फिर देखो कि तुम्हारे अपने खजाने में ही कितना ऐश्वर्य दबा पड़ा है।

अपने विरोधियों पर तुम्हें क्रोध आ जाता है सो ठीक ही है। देखो, तुम्हारे सबसे बड़े शत्रु कुविचार हैं, ये तेजाब की तरह तुम्हें गलाये डाल रहे हैं और घुन की तरह पीला कर रहे हैं। उठो, इन पर क्रोध करो। इन्हें जी भरकर गालियाँ दो और जहाँ देख पाओ वहीं उनपर बसर पड़ो। खबरदार कर दो कि कोई कुविचार मेरे घर न आवें, अपना काला मुँह मुझे न दिखावें वरना उसके हक में अच्छा न होगा।

लोभ- अरे लोभ में क्या दोष? यह तो बहुत अच्छी बात है। अपने लिए जमा करना ही चाहिए इसमें हर्ज क्या है? तुम्हें सुकर्मों की बड़ी सी पूँजी संग्रह करना उचित है, जिसके मधुर फल बहुत काल तक चखते रहो। दूसरे लोग जिन्होंने अपना बीज कुटक लिया और फसल के वक्त हाथ हिलाते फिरेंगे, तब उनसे कहना कि ऐ उड़ाने वालो, तुम हो जो टुकड़े टुकड़े को तरसते हो और मैं हूँ जो लोभ के कारण इकट्ठी की हुई अपनी पूँजी का आनन्द ले रहा हूँ।

मोह अपनी आत्मा से करो। अब भूख लगती है तो घर में रखी हुई सामग्री खर्च करके भूख बुझाते हैं। सर्दी गर्मी से बचने के लिए कपड़ों को पहनते हैं और उनके फटने की परवाह नहीं करते। शरीर को सुखी बनाने के लिए दूसरी चीजों की परवाह कौन करता है? फिर तुम्हें चाहिए कि आत्मा की रक्षा के लिए सारी संपदा और शरीर की भी परवाह न करो। जब मोह ही करना है तो कल नष्ट हो जाने वाली चीजों से क्यों करना? अपनी वस्तु आत्मा है। उससे मोह करो, उसको प्रसन्न बनाने के लिए उद्योग करो।

📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1943 पृष्ठ 32

सोमवार, 17 जून 2019

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 June 2019


👉 आज का सद्चिंतन 17 June 2019


👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 16)

👉 नैतिकता की नीति, स्वास्थ्य की उत्तम डगर

कभी- कभी तो ये रोग इतने विचित्र होते हैं कि इन्हें महावैद्य भी समझने में विफल रहते हैं। घटना महाभिषक आर्य जीवक के जीवन की है। आर्य जीवक तक्षशिला के स्नातक थे। आयुर्विज्ञान में उन्होंने विशेषज्ञता हासिल की थी। गरीब- भिक्षुक से लेकर धनपति श्रेष्ठी एवं नरपति सम्राट सभी उनसे स्वास्थ्य का आशीष पाते थे। मरणासन्न रोगी को अपनी चमत्कारी औषधियों से निरोग कर देने में समर्थ थे आर्य जीवक। उनकी औषधियों एवं चिकित्सा के बारे में अनेकों कथाएँ- किंवदन्तियों प्रचलित थी। युवराज अभयकुमार एवं सम्राट बिम्बसार भी उनकी प्रशंसा करते नहीं थकते थे।

ऐसे समर्थ चिकित्सक जीवक अपने एक रोगी को लेकर चिन्तित थे। इस रोगी का रोग भी बड़ा विचित्र था। यूं तो वह सभी तरह से स्वस्थ था, बस उसे तकलीफ इतनी थी कि उसकी दायीं आँख नहीं खुलती थी। इस परेशानी को लेकर जीवक अपनी सभी तरह की चिकित्सकीय पड़ताल कर चुके थे। कहीं कोई कमी नजर नहीं आ रही थी। शरीर के सभी अंगों के साथ आँख के सभी अवयव सामान्य थे। आर्य जीवक को समझ में नहीं आ रहा था- क्या करें? हार- थक कर उन्होंने अपनी परेशानी महास्थविर रेवत को कह सुनायी। महास्थविर रेवत भगवान् तथागत के समर्थ शिष्य थे। मानवीय चेतना के सभी रहस्यों को वह भली- भाँति जानते थे।

जीवक की बातों को सुनकर पहले तो उन्होंने एकपल को अपने नेत्र बन्द किए, फिर हल्के से हँस दिए। जीवक उनके मुख से कुछ सुनने के लिए बेचैन थे। उनकी बेचैनी को भांपते हुए महाभिक्षु रेवत ने कहा- महाभिषक जीवक, तुम्हारे रोगी की समस्या शारीरिक नहीं मानसिक है। उसने अपने जीवन में नैतिकता की नीति की अवहेलना की है। इसी वजह से वह मानसिक ग्रन्थि का शिकार हो गया है। उसकी मानसिक परेशानी ही इस तरह शारीरिक विसंगति के रूप में प्रत्यक्ष है। इसका समाधान क्या है आर्य? जीवक बोले। इसे लेकर तुम भगवान् बुद्ध के पास जाओ। प्रभु के प्रेम की ऊष्मा से इसे अपनी मनोग्रन्थि से मुक्ति मिलेगी। और यह ठीक हो जाएगा।

जीवक उसे लेकर भगवान् के पास गए। भगवान् के पास पहुँचते ही उस रोगी युवक ने अपने मन की व्यथा प्रभु को कह सुनायी। अपने अनैतिक कार्यों को प्रभु के सामने प्रकट करते हुए उसने क्षमा की प्रार्थना की। भक्तवत्सल भगवान् ने उसे क्षमादान करते हुए कहा- वत्स नैतिक मर्यादाएँ हमेशा पालन करनी चाहिए। आयु, वर्ग, योग्यता, देश एवं काल के क्रम में प्रत्येक युग में नैतिकता की नीति बनायी जाती है। इसका आस्थापूर्वक पालन करना चाहिए। नैतिकता की नीति का पालन करने वाला आत्मगौरव से भरा रहता है। जबकि इसकी अवहेलना करने वालों को आत्मग्लानि घेर लेती है।

प्रभु के वचनों ने उस युवक को अपार शान्ति दी। उसे अनायास ही अपनी मनोग्रन्थि से छुटकारा मिल गया। जीवक को तब भारी अचरज हुआ, जब उन्होंने उसकी दायीं आँख को सामान्यतया खुलते हुए देखा। अचरज में पड़े जीवक को सम्बोधित करते हुए भगवान् तथागत ने कहा- आश्चर्य न करो वत्स जीवक, नैतिकता की नीति स्वास्थ्य की उत्तम डगर है। इस पर चलने वाला कभी अस्वस्थ नहीं होता। वह स्वाभाविक रूप से शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ होता है। जो इसे जानते हैं, वे कर्मसु कौशलम् के रहस्य को जानते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1967 पृष्ठ 23-24

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 26)

THE RELATIVITY OF VIRTUES AND SINS

Taken together, virtues in this world are far in excess of vices. No doubt, immorality is also there, but morality is much more prevalent. There is more enlightenment than ignorance in this world. There are bad people everywhere in the world, but they have more virtues than vices in them. We should keep in sight only the goodness of the world, enjoy the beauty of the virtuous
and work for enhancement of these virtues.

Nature has made a provision of day and night to teach us how to behave in the world. During the day we keep awake, take advantage of the sunlight for working and prefer to live in an illuminated place, than in darkness. Light gives us the advantage of acquiring knowledge through sight. When darkness of night descends, we go to sleep or, if required to work, use artificial light. Because of the natural structure of eyes, man intrinsically prefers to live in an illuminated environment. Light makes our perspective illuminated. In the light we clearly see objects as they are and dispel our ignorance about them. It shows that we should ignore the dark side of the world and become more enlightened by preferring to look only at the brighter aspects of human personalities i.e. virtues.

We should make an endeavour to enjoy, imbibe and encourage only the virtuous traits in a person. It does not mean that we close our eyes to the blemishes. Be aware of the vices but do not get involved in them. There is that well known story of Rishi Dattatreya. As long as he continued to compare the bright and dark aspects of life he remained troubled and unhappy. When he concentrated only on the positive aspects of creation, he found that in this world all living creatures were sacred and adorable. He realized that he could learn something from each of them. It is said that he acquired his spiritual insights from twenty-four beings (teachers). Amongst these were insignificant creatures like dog, cat, jackal, spider, fly, vulture, crow etc. He felt that no animate being was despicable, that each one had within it, the soul, which is a spark of that Super-Being, that each was a link in the spiraling chain of evolution. When we make ourselves receptive to virtues, the field of vision changes. Shortcomings are overlapped by excellence, wickedness by goodness and prevalence of unhappiness by abundance of things of joy. The world that we earlier thought to be full of wicked people now appears rich with decent, well-mannered, altruistic and aspiring persons.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 46

रविवार, 16 जून 2019

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 15)

👉 नैतिकता की नीति, स्वास्थ्य की उत्तम डगर

नैतिकता की नीति पर चलते हुए स्वास्थ्य के अनूठे वरदान पाए जा सकते हैं। इसकी अवहेलना जिन्दगी में सदैव रोग- शोक, पीड़ा- पतन के अनेकों उपद्रव खड़े करती है। अनैतिक आचरण से बेतहाशा प्राण ऊर्जा की बर्बादी होती है। साथ ही वैचारिक एवं भावनात्मक स्तर पर अनगिनत ग्रन्थियाँ जन्म लेती हैं। इसके चलते शारीरिक स्वास्थ्य के साथ चिन्तन, चरित्र एवं व्यवहार का सारा ताना- बाना गड़बड़ा जाता है। आधुनिकता, स्वच्छन्दता एवं उन्मुक्तता के नाम पर इन दिनों नैतिक वर्जनाओं व मर्यादाओं पर ढेरों सवालिया निशान लगाए जा रहे हैं। इसे पुरातन ढोंग कहकर अस्वीकारा जा रहा है। नयी पीढ़ी इसे रूढ़िवाद कहकर दरकिनार करती चली जा रही है। ऐसा होने और किए जाने के दूषित दुष्परिणाम आज किसी से छुपे नहीं हैं।

हालाँकि नयी पीढ़ी के सवाल नैतिकता क्यों? की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। इसका उपयुक्त जवाब देते हुए उन्हें इसके वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक प्रभावों का बोध कराया जाना चाहिए। प्रश्र कभी भी गलत नहीं होते, गलत होती है प्रश्रों की अवहेलना व उपेक्षा। इनके उत्तर न ढूँढ पाने के किसी भी कारण को वाजिब नहीं ठहराया जा सकता। ध्यान रहे प्रत्येक युग अपने सवालों के हल मांगता है। नयी पीढ़ी अपने नए प्रश्रों के ताजगी भरे समाधान चाहती है। नैतिकता क्यों? यह युग प्रश्र है। इस प्रश्र के माध्यम से नयी पीढ़ी ने नए समाधान की मांग की है। इसे परम्परा की दुहाई देकर टाला नहीं जा सकता। ऐसा करने से नैतिकता की नीति उपेक्षित होगी। और इससे होने वाली हानियाँ बढ़ती जाएँगी। 

नैतिकता क्यों? इस प्रश्र का सही उत्तर है- ऊर्जा के संरक्षण एवं ऊर्ध्वगमन हेतु। इस प्रक्रिया में शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के सभी रहस्य समाए हैं। अनैतिक आचरण से प्राण ऊर्जा के अपव्यय की बात सर्वविदित है। हो भी क्यों नहीं- अनैतिकता से एक ही बात ध्वनित होती है- इन्द्रिय विषयों का अमर्यादित भोग। स्वार्थलिप्सा, अहंता एवं तृष्णा की अबाधित तुष्टि। फिर इसके लिए कुछ भी क्यों न करना पड़े। प्राण की सम्पदा जब तक है- तब तक यह सारा खेल चलता रहता है। लेकिन इसके चुकते ही जीवन ज्योति बुझने के आसार नजर आने लगते हैं।

इतना ही नहीं, ऐसा करने से जो वर्जनाएँ टूटती हैं, मर्यादाएँ ध्वस्त होती हैं, उससे अपराध बोध की ग्रन्थि पनपे बिना नहीं रहती। वैचारिक एवं भावनात्मक तल पर पनपी हुई ग्रन्थियों से अन्तर्चेतना में अनगिन दरारें पड़ जाती हैं। समूचा व्यक्तित्व विशृंखलित- विखण्डित होने लगता है। दूसरों को इसका पता तब चलता है, जब बाहरी व्यवहार असामान्य हो जाता है। यह सब होता है अनैतिक आचारण की वजह से। अभी हाल में पश्चिमी दुनिया के एक विख्यात मनोवैज्ञानिक रूडोल्फ विल्किन्सन ने इस सम्बन्ध में एक शोध प्रयोग किया है। उन्होंने अपने निष्कर्षों को ‘साइकोलॉजिकल डिसऑडर्स ः कॉज़ एण्ड इफेक्ट’ नाम से प्रकाशित किया है। इस निष्कर्ष में उन्होंने इस सच्चाई को स्वीकारा है कि नैतिकता की नीति पर आस्था रखने वाले लोग प्रायः मनोरोगों के शिकार नहीं होते। इसके विपरीत अनैतिक जीवन यापन करने वालों को प्रायः अनेक तरह के मनोरोगों के शिकार होते देखा गया है।

समाज मनोविज्ञानी एरिक फ्रॉम ने अपने ग्रन्थ ‘मैन फॉर- हिमसेल्फ’ में भी यही सच्चाई बयान की है। उनका कहना है कि अनैतिकता मनोरोगों का बीज है। विचारों एवं भावनाओं में इसके अंकुरित होते ही मानसिक संकटों की फसल उगे बिना नहीं रहती। योगिवर भतृहरि ने वैराग्य शतक में इसकी चर्चा में कहा है- ‘भोगे रोग भयं’ यानि कि भोगों में रोग का भय है। इसे यूं भी कह सकते हैं कि भोग होंगे तो रोग पनपेंगे ही। नैतिक वर्जनाओं की अवहेलना करने वाला निरंकुश भोगवादी रोगों की चपेट में आए बिना नहीं रहता। इनकी चिकित्सा नैतिकता की नीति के सिवा और कुछ भी नहीं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1967 पृष्ठ 22-23

शनिवार, 15 जून 2019

प्रेम एक महान शक्ति | Love, a Great Power | Hariye Na Himmat Day 13



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👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 14)

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा का मूल है आस्तिकता

तमिलनाडु के तिरूवन्नामल्लाई स्थान पर साधना करने वाले योगिवर रमण। पवित्र पर्वत अरूणाचलम् में तप कर रहे सन्त रमण महर्षि। इस नाम ने उनके हृदय के तारों में एक मधुर झंकार पैदा कर दी। उन्हें ऐसा लगा जैसे कि महर्षि अपने अदृश्य स्वरों से उन्हें आमंत्रित कर रहे हों। स्वर अनजाने थे, पर पुकार आत्मीय थी। वह चल पड़े। कुछ एक दिनों में अपनी इस यात्रा को पूरा कर वह पवित्र पर्वत अरूणाचलम् के पदभ्रान्त में पहुँच गए। यहाँ पहुँचकर उन्हें पता चला कि महर्षि अभी अपनी गुफा में हैं। हो सकता है कि वे साँझ को नीचे उतरें। पॉल ब्रॉन्टन के लिए यह साँझ की प्रतीक्षा बड़ी कष्टकारी थी। फिर भी उन्होंने धैर्यपूर्वक यह समय गुजारा।

प्रतीक्षा के क्षण बीतने पर महर्षि से उनकी मुलाकात हुई। इस मिलन के प्रथम क्षण में ही उन्होंने अपनी जिज्ञासा उड़ेल दी, आस्तिकता क्या है? ईश्वर है भी या नहीं? उनके इस सवालों पर महर्षि हँस पड़े और बोले- पहले यह बताओ कि तुम हो या नहीं और यदि तुम हो तो तुम कौन हो? उनके सहज प्रश्रों के उत्तर में महर्षि के अटपटे प्रश्र। पॉल ब्रॉन्टन कुछ कह सके, पर महर्षि के व्यक्तित्व की पारदर्शी सच्चाई ने उन्हें गहरे तक छू लिया। महर्षि की बातों में उन्हें सत्य का दर्शन हुआ। और वे मैं कौन हूँ? इस प्रश्र का समाधान पाने में जुट गए।

पॉल ब्रान्टन की जिज्ञासा तीव्र थी। उनकी भावनाएँ सच्ची थी, फिर उनमें लगन की भी कोई कमी न थी। महर्षि का प्रश्र ही उनका ध्यान बन गया। वह अपने अस्तित्व की परत- दर भेदते हुए गहनता में उतरते चले गए। ज्यों- ज्यों वह अपनी गहराई में उतरते- उनका अचरज बढ़ता जाता। परिधि में सीमाएँ थीं, परन्तु केन्द्र में असीमता की अनुभूति थी। मैं की सच्ची पहचान में उन्हें ईश्वर की पहचान भी मिल गयी। आस्तिकता के अस्तित्व का बोध भी हो गया। जब वह वापस महर्षि के पास पहुँचे तो उनके होठों पर बड़ी करुणापूर्ण मुस्कान थी। पॉल ब्रॉन्टन को देखकर वह बोले, पुत्र आस्तिकता आध्यात्मिक चिकित्सा की एक विधि है। जीवन का सारा दुःख इसके अधूरेपन की अनुभूति में है। जब कोई इसे सम्पूर्णता में अनुभव करता है तो उसके सारे सन्ताप शमित हो जाते हैं। अपनी अन्तरात्मा में ही उसे परमात्मा की झाँकी मिलती है। स्वयं के जीवन में ही जगत् के विस्तार का बोध होता है। हालाँकि इस अनुभूति के लिए नैतिकता की नीति का अनुसरण करना जरूरी है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 20

👉 आज का सद्चिंतन 15 June 2019


👉 प्रेरणादायक गुरुदेव का सन्देश


👉 अध्यात्म से मानव-जीवन का चरमोत्कर्ष (अंतिम भाग)

पूर्वकालीन ऋषि मुनियों ने भी उच्च स्तरीय अध्यात्म में सहसा छलाँग नहीं लगाई। उन्होंने भी अभ्यास द्वारा पहले अपने बाह्य जीवन को ही परिष्कृत किया और तब क्रम क्रम से उस आत्मिक जीवन में उच्च साधना के लिये पहुँचे थे। इस नियम का-कि पहले बाह्य जीवन में व्यावहारिक अध्यात्म का समावेश करके उसे सुख शान्तिमय बनाया जाय। इस प्रसंग में जो भी पुण्य परमार्थ अथवा पूजा उपासना अपेक्षित हो उसे करते रहा जाये। लौकिक जीवन को सुविकसित एवं सुसंस्कृत बना लेने के बाद ही आत्मिक अथवा अलौकिक जीवन में प्रवेश किया जाय-उल्लंघन करने वाले कभी सफलता के अधिकारी नहीं बन सकते। लौकिक जीवन की निकृष्टता आत्मिक जीवन के मार्ग में पर्वत के समान अवरोध सिद्ध होती है।

अध्यात्म मानव जीवन के चरमोत्कर्ष की आधार शिला है, मानवता का मेरुदण्ड है। इसके अभाव में असुखकर अशान्ति एवं असन्तोष की ज्वालाएँ मनुष्य को घेरे रहती है। मनुष्य जाति की अगणित समस्याओं को हल करने और सफल जीवन जीने के लिये अध्यात्म से बढ़कर कोई उपाय नहीं है। पूर्वकाल में, जीवन में सुख समृद्धियों के बहुतायत के कारण जिस युग को सतयुग के नाम से याद किया जाता है, उसमें और कोई विशेषता नहीं थी-यदि विशेषता थी तो यह कि उस युग के मनुष्यों का जीवन अध्यात्म की प्रेरणा से ही अनुशासित रहता था। आज उस तत्व की उपेक्षा होने से जीवन में चारों ओर अभाव, अशान्ति और असन्तोष व्याप्त हो गया है और इन्हीं अभिशापों के कारण ही आज का युग कलियुग के कलंकित नाम से पुकारा जाता है।

अपने युग का यह कलंक आध्यात्मिक जीवन पद्धति अपनाकर जब मिटाया जा सकता है तो क्यों न मिटाया जाना चाहिये? मिटाया जाना चाहिये और अवश्य मिटाया जाना चाहिये। अपने युग को लाँछित अथवा यशस्वी बनाना उस युग के मनुष्यों पर ही निर्भर है, तब क्यों न हम सब जीवन में आध्यात्मिक पद्धति का समावेश कर अपने युग को भी उतना ही सम्मानित एवं स्मरणीय बना दें, जितना कि सतयुग के मनुष्यों ने अपने आचरण द्वारा अपने युग को बनाया था?

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1969 पृष्ठ 10

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1969/January/v1.10

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 25)

THE RELATIVITY OF VIRTUES AND SINS

The qualitative assessment of good and evil is always relative. On the scale of virtue you will find persons, who belong to a grade lower than yours, those who are in the same grade as your own; and others who have a much higher grade than yours. Suppose you are studying in a college. You may consider the persons with the highest character (Satoguni) studying in a class senior to your own, your classmates as students of the intermediate class (Rajoguni) and the juniors, being educated in the lower class (Tamoguni). However, as mentioned earlier, this relationship of moral status is relative. For instance, in comparison to a bandit, a thief is more virtuous (has more Satogun), because the latter is more humane.

Compared to both the thief and the dacoit, a labourer has more Satogun. A social reformer would have more Satogun than a common man, and a spiritual teacher more than that of the social worker. Thus, on the scale of Satogun, a spiritual teacher stands at a much higher level than a bandit, but he is graded lower than enlightened, liberated soul whose Silent Presence is the greatest of sermons. It does not mean that the dacoit is the most degraded soul. He is better than animal.

The superiority of spiritual status of a person is measured by the number of people being ethically benefited by his altruistic deeds. On the lowest level, a self-centered person acts only for the welfare of his own family. A dacoit does not rob members of his family. A thief does not commit theft in the house of a friend. For a social worker, welfare activities are confined to a particular class or community. The spiritual teacher works for enlightenment of all human beings.

The enlightened souls see all living beings, as manifestations of God, be it man or beast, plant or animal. In a nutshell, in the process of progressive evolution, before attaining self-realization, all living beings are at different stages of conscious awakening. Everyone lives with lack of one virtue or the other. When all impurities are removed, nothing can stop a person from reaching the ultimate state of liberation from cycles of birth and death. This is the ultimate goal of human existence.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 44

👉 भगवान् की कृपा Bhagwan Ki Kripa

किसी स्थान पर संतों की एक सभा चल रही थी, किसी ने एक घड़े में गंगाजल भरकर वहां रखवा दिया ताकि संतजन को जब प्यास लगे तो गंगाजल पी सकें।

संतों की उस सभा के बाहर एक व्यक्ति खड़ा था, उसने गंगाजल से भरे घड़े को देखा तो उसे तरह-तरह के विचार आने लगे। वह सोचने लगा:- "अहा, यह घड़ा कितना भाग्यशाली है, एक तो इसमें किसी तालाब पोखर का नहीं बल्कि गंगाजल भरा गया और दूसरे यह अब सन्तों के काम आयेगा। संतों का स्पर्श मिलेगा, उनकी सेवा का अवसर मिलेगा, ऐसी किस्मत किसी-किसी की ही होती है।

घड़े ने उसके मन के भाव पढ़ लिए और घड़ा बोल पड़ा:- बंधु मैं तो मिट्टी के रूप में शून्य पड़ा था, किसी काम का नहीं था, कभी नहीं लगता था कि भगवान् ने हमारे साथ न्याय किया है। फिर एक दिन एक कुम्हार आया, उसने फावड़ा मार-मारकर हमको खोदा और गधे पर लादकर अपने घर ले गया। वहां ले जाकर हमको उसने रौंदा, फिर पानी डालकर गूंथा, चाक पर चढ़ाकर तेजी से घुमाया, फिर गला काटा, फिर थापी मार-मारकर बराबर किया।

बात यहीं नहीं रूकी, उसके बाद आंवे के अंदर आग में झोंक दिया जलने को। इतने कष्ट सहकर बाहर निकला तो गधे पर लादकर उसने मुझे बाजार में भेज दिया, वहां भी लोग ठोक-ठोककर देख रहे थे कि ठीक है कि नहीं?

ठोकने-पीटने के बाद मेरी कीमत लगायी भी तो क्या- बस 20 से 30 रुपये, मैं तो पल-पल यही सोचता रहा कि:- "हे ईश्वर सारे अन्याय मेरे ही साथ करना था, रोज एक नया कष्ट एक नई पीड़ा देते हो, मेरे साथ बस अन्याय ही अन्याय होना लिखा है।"

भगवान ने कृपा करने की भी योजना बनाई है यह बात थोड़े ही मालूम पड़ती थी। किसी सज्जन ने मुझे खरीद लिया और जब मुझमें गंगाजल भरकर सन्तों की सभा में भेज दिया तब मुझे आभास हुआ कि कुम्हार का वह फावड़ा चलाना भी भगवान् की कृपा थी। उसका वह गूंथना भी भगवान् की कृपा थी, आग में जलाना भी भगवान् की कृपा थी और बाजार में लोगों के द्वारा ठोके जाना भी भगवान् की कृपा ही थी।

अब मालूम पड़ा कि सब भगवान् की कृपा ही कृपा थी। परिस्थितियां हमें तोड़ देती हैं, विचलित कर देती हैं- इतनी विचलित की भगवान के अस्तित्व पर भी प्रश्न उठाने लगते हैं। क्यों हम सबमें इतनी शक्ति नहीं होती ईश्वर की लीला समझने की, भविष्य में क्या होने वाला है उसे देखने की? इसी नादानी में हम ईश्वर द्वारा कृपा करने से पूर्व की जा रही तैयारी को समझ नहीं पाते।

बस कोसना शुरू कर देते हैं कि सारे पूजा-पाठ, सारे जतन कर रहे हैं फिर भी ईश्वर हैं कि प्रसन्न होने और अपनी कृपा बरसाने का नाम ही नहीं ले रहे। पर हृदय से और शांत मन से सोचने का प्रयास कीजिए, क्या सचमुच ऐसा है या फिर हम ईश्वर के विधान को समझ ही नहीं पा रहे? आप अपनी गाड़ी किसी ऐसे व्यक्ति को चलाने को नहीं देते जिसे अच्छे से ड्राइविंग न आती हो तो फिर ईश्वर अपनी कृपा उस व्यक्ति को कैसे सौंप सकते हैं जो अभी मन से पूरा पक्का न हुआ हो।

कोई साधारण प्रसाद थोड़े ही है ये, मन से संतत्व का भाव लाना होगा। ईश्वर द्वारा ली जा रही परीक्षा की घड़ी में भी हम सत्य और न्याय के पथ से विचलित नहीं होते तो ईश्वर की अनुकंपा होती जरूर है, किसी के साथ देर तो किसी के साथ सवेर।

यह सब पूर्वजन्मों के कर्मों से भी तय होता है कि ईश्वर की कृपादृष्टि में समय कितना लगना है। घड़े की तरह परीक्षा की अवधि में जो सत्यपथ पर टिका रहता है वह अपना जीवन सफल कर लेता है।

शुक्रवार, 14 जून 2019

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 13)

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा का मूल है आस्तिकता

वैज्ञानिक समुदाय को हार मानकर यह बात स्वीकारनी पड़ी कि जीवन के सभी तन्तु एक दूसरे से गहराई से गुँथे हैं। जीवन और जगत् अपनी गहराइयों में परस्पर जुड़े हैं। इन्हें अलग समझना भारी भूल है। ये वैज्ञानिक निष्कर्ष ही प्रकारान्तर से इकॉलॉजी, इकोसिस्टम, डीप इकॉलॉजी एवं इन्वायरन्मेटल साइकोलॉजी जैसी शब्दावली के रूप में प्रकाशित हुए। इन तथ्यों को यदि अहंकारी हठवादिता को त्यागते हुए स्वीकारें तो इसे आस्तिकता के अस्तित्व की स्वीकारोक्ति ही कहेंगे। इस वैज्ञानिक निष्कर्ष के बारे में युगों पूर्व श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया था- ‘सूत्रे मणिगणाइव’। यानि कि जीवन के सभी रूप एक परम दिव्य चेतना के सूत्र में मणियों की भाँति गुँथे हैं। उपनिषदों ने इसी सच्चाई को ‘अयमात्मा ब्रह्म’ कहकर प्रतिपादित किया। इसका मतलब यह है कि यह मेरी अन्तरात्मा ही ब्राह्मी चेतना का विस्तार है। इसे यूँ भी कहा जा सकता है कि अपने जीवन का भाव भरा विस्तार ही यह जगत् है। अपने विस्तार में ही समष्टि है।

उपनिषद् युग की इन अनुभूतियों को कई मनीषी इस वैज्ञानिक युग में भी उपलब्ध कर रहे हैं। और यही वजह है कि उन्होंने आस्तिकता को आध्यात्मिक चिकित्सा के सर्वमान्य सिद्धान्त के रूप में मान्यता दी है। इन्हीं में एक टी.एल. मिशेल का कहना है कि आस्तिकता से इन्कार जीवन चेतना को विखण्डित कर इसे अपंग- अपाहिज बना देता है। इस इन्कार से जीवन में अनेकों नकारात्मक भाव पैदा होते हैं, जिनके बद्धमूल होने से कई तरह के रोगों के होने की सम्भावना पनपती है। उनका यह भी मत है कि यदि आस्तिकता को सही अर्थों में समझा एवं आत्मसात कर लिया जाय तो निजी जिन्दगी में पनपती हुई कई तरह की मनोग्रन्थियों से छुटकारा पाया जा सकता है।

इस सम्बन्ध में अंग्रेज पत्रकार एवं लेखक पॉल ब्रॉन्टन की अनुभूति बहुत ही मधुर है। कई देशों की यात्रा करने के बाद पॉल ब्रॉन्टन भारत वर्ष आए। अपनी खोजी प्रकृति के कारण यहाँ वे कई महान् विभूतियों से मिले। इनमें से कई सिद्ध और चमत्कारी महापुरुष भी थे। लेकिन ये सभी चमत्कार, अचरज से भरे करतब उनकी जिज्ञासाओं का समाधान न दे पाए। इन सारी भेंट मुलाकातों के बावजूद उनके सवाल अनुत्तरित रहे। मन जस का तस अशान्त रहा। वे अपने आप में आध्यात्मिक चिकित्सा की गहरी आवश्यकता महसूस कर रहे थे। पर यह सम्भव कैसे हो? अपने सोच- विचार एवं चिन्तन के इन्हीं क्षणों में उन्हें महर्षि रमण का पता चला।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 19