बुधवार, 18 जुलाई 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 July 2018


👉 आज का सद्चिंतन 18 July 2018


👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 5)

👉 प्राणवान् प्रतिभाओं की खोज

🔷 बड़े कामों को बड़े शक्ति केंद्र ही संपन्न कर सकते हैं। दलदल में फँसे हाथी को बलवान हाथी ही खींचकर पार करते हैं। पटरी से उतरे इंजन को समर्थ क्रेन ही उठाकर यथा स्थान रखती हैं। उफनते समुद्र में से नाव खे लाना, साहसी नाविकों से ही बन पड़ता है। समाज और संसार की बड़ी समस्याओं को हल करने के लिए, ऐसे ही वरिष्ठ प्रतिभावानों की आवश्यकता पड़ती है। पुल, बाँध, महल, किले जैसे निर्माणों में मूर्द्धन्य इंजीनियरों की आवश्यकता पड़ती है। पेचीदा गुत्थियों को सुलझाना किन्हीं मेधावियों से ही बन पड़ता है। प्रतिभाएँ वस्तुतः ऐसी संपदाएँ हैं, जिनसे न केवल प्रतिभाशाली स्वयं भरपूर श्रेय अर्जित करते हैं, वरन् अपने क्षेत्र समुदाय और देश की अति विकट दीखने वाली उलझनों को भी सुलझाने में सफल होते हैं। इसी कारण भावनावश ऐसे लोगों को देवदूत तक कहते हैं।
  
🔶 आड़े समय में इन उच्चस्तरीय प्रतिभाओं की ही आवश्यकता होती है। उन्हीं को खोजा, उभारा और खरादा जाता है। विश्व के इतिहास में ऐसे ही महामानवों की यशगाथा स्वर्णिम अक्षरों में लिखी मिलती है। संसार के अनेक सौभाग्यों और सुंदरताओं में अधिक मूर्द्धन्य महाप्राणों के व्यक्तित्व ही सबसे अधिक चमकते हैं। वे अपनी यशगाथा से असंख्यों का, अनंतकाल तक मार्गदर्शन करते रहते हैं। स्वर्ग, मुक्ति, सिद्धि के नाम से आध्यात्मिक भाषा में जिन महान उपलब्धियों का अलंकारिक रूप से वर्णन किया जाता है, उनका सारतत्त्व वस्तुतः ऐसे ही महामनीषियों को करतलगत होता है। दूसरे लोग पूजा-पाठ के सहारे कुछ मिलने की आशा करते हैं, पर मनस्वी, तेजस्वी और ओजस्वी ऐसे कर्मयोग की साधना में ही निरत रहते हैं, जो उनके व्यक्तित्व को प्रामाणिक और कर्तृत्त्व को ऊर्जा का उद्गम स्रोत सिद्ध कर सके।
  
🔷 वर्तमान समय विश्व इतिहास में अद्भुत एवं अभूतपूर्व स्तर का है। इसमें एक ओर महाविनाश का प्रलयंकर तूफान अपनी प्रचंडता का परिचय दे रहा है, तो दूसरी ओर सतयुगी नवनिर्माण की उमंगें भी उछल रही हैं। विनाश और विकास एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं, तो भी उनका एक ही समय में अपनी-अपनी दिशा में चल सकना संभव है। इन दिनों आकाश में सघन तमिस्रा का साम्राज्य है, तो दूसरी ओर ब्रह्ममुहूर्त का आभास भी प्राची में उदीयमान होता दीख पड़ता है। इन दोनों के समन्वय को देखते हुए ही अपना समय युगसंधि का समय माना गया है। ऐसे अवसरों पर किन्हीं प्रखर-प्राणवानों को ही अपनी सही भूमिका निभानी पड़ती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 6

👉 Who is Religious?

🔷 Love, compassion, generosity, kindness, devotion, zeal, honesty, truthfulness, unflinching faith in divine values, etc – are the natural virtues of the soul. Their presence in a person is the sign of his/her spirituality. These alone are the source of spiritual elevation. These are also the perennial means of inner strength. Your endeavors for cultivating these qualities in your character must continue with greater intensity till your personality is fully imbibed with them. One who achieves this, he/she alone is truly spiritual and religious; he/she alone is worthy of meeting God – being beatified by thy grace.

🔶 Devotion of God is not confined to a specific religious cult or rituals. It lies in the deepest core of the inner emotions. Those who chant God’s name need not be religious; truly religious are those who follow the divine disciplines, adopt divine values in their conduct. Guiding the path to unification of the soul with God – inculcation of divinity in the human-self, is the foundational purpose of religion. Blessed are those who grasp this noble truth of religion and devotion.

🔷 Those who have reached this state of devotion would deserve attaining the eternal light of ultimate knowledge. They can realize God in their pure hearts and experience the absolute bliss forever…

📖 Akhand Jyoti, Jan. 1941

👉 स्वार्थी जीवन मृत्यु से बुरा है।

🔶 यूनान के संत सुकरात कहा कहते थे कि “यह पेड़ और आरण्य मुझे कुछ नहीं सिखा सकते, असली शिक्षा तो मुझे सड़कों पर मिलती है।” उनका तात्पर्य यह था कि दुनिया से अलग होकर एकान्त जीवन बिताने से न तो परमात्मा को प्राप्त किया जा सकता है और न आत्मोन्नति हो सकती है। अपनी और दूसरों की भलाई के लिए संत पुरुषों को समाज में भरे बुरे लोगों के बीच में अपना कार्य जारी रखना चाहिये।

🔷 संत सुकरात जीवन भर ऐसी ही तपस्या करते रहे। वे गलियों में, चौराहों पर, हाट बाजारों में, दुकानों और उत्सवों में बिना बुलाये पहुँच जाते और बिना पूछे भीड़ को संबोधित करके अपना व्याख्यान शुरू कर देते। उनका प्रचार तत्कालीन सामाजिक कुरीतियों और अनीतिपूर्ण शासन के विरुद्ध होता, उनके अन्तःकरण में सत्य था। सत्य में बड़ी प्रभावशाली शक्ति होती है। उससे अनायास ही लोग प्रभावित होते हैं।

🔶 उस देश के नवयुवकों पर सुकरात का असाधारण असर पड़ा, जिससे प्राचीन पंथियों और अनीतिपोषक शासकों के दिल हिलने लगे, क्योंकि उनके चलते हुए व्यापार में बाधा आने की संभावना थी। सुकरात को पकड़ लिया गया, उन पर मुकदमा चला जिसमें दो इल्जाम लगाये गए। 1. प्राचीन प्रथाओं का खंडन करना, 2. नवयुवकों को बरगलाना। इन दोनों अपराधों में विचार करने के लिये न्याय सभा बैठी, सभासदों में से 220 की राय छोड़ देने की थी और 281 की राय मृत्यु दंड देने की हुई। इस प्रकार बहुमत से मृत्यु का फैसला हुआ। साथ ही यह भी कहा गया कि यदि वह देश छोड़ कर बाहर चले जायँ या व्याख्यान देना, विरोध करना बन्द कर दे तो मृत्यु की आज्ञा रद्द कर दी जायेगी।

🔷 सुकरात ने मुकदमे की सफाई देते हुए कहा-”कानून मुझे दोषी ठहराता है। तो भी मैं अपने अन्तरात्मा के सामने निर्दोष हूँ। दोनों अपराध जो मेरे ऊपर लगाये गये हैं, मैं स्वीकार करता हूँ कि वे दोनों ही मैंने किये हैं और आगे भी करूंगा। एकान्त सेवन करके मुर्दे जैसा बन जाने का निन्दित कार्य कोई भी सच्चा संत नहीं कर सकता। यदि मैं घोर स्वार्थी या अकर्मण्य बन कर अपने को समाज से पृथक कर लूँ और संसार की भलाई की तीव्र भावनाएँ जो मेरे हृदय में उठ रही हैं, उन्हें कुचल डालूँ तो मैं ब्रह्म हत्यारा कहा जाऊंगा और नरक में भी मुझे स्थान न मिलेगा। मैं एकान्तवासी, अकर्मण्य और लोक सेवा से विमुख अनुदार जीवन को बिताना मृत्यु से भी अधिक कष्टदायक समझूंगा। मैं लोक सेवा का कार्य बन्द नहीं कर सकता, न्याय सभा के सामने मैं मृत्यु को अपनाने के लिये निर्भयतापूर्वक खड़ा हुआ हूँ।”

🔶 संसार का उज्ज्वल रत्न, महान दार्शनिक संत सुकरात को विष का प्याला पीना पड़ा। उसने खुशी से विष को होठों से लगाया और कहा-”स्वार्थी एवं अनुपयोगी जीवन बिताने की अपेक्षा यह प्याला मेरे लिये कम दुखदायी है।” आज उस महात्मा का शरीर इस लोक में नहीं है, पर लोक सेवा वर्ग का महान् उपदेश उसकी आत्मा सर्वत्र गुँजित कर रही है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1942

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1942/September/v1.8

👉 बोझ को हल्का कर लो।

🔶 यदि एक टन या अधिक चारा हाथी की पीठ पर लादा जाए तो उस बोझ को वह पशु जरूर उठा लेता है पर कठिनता से और बड़ा जोर लगाकर वह उस बोझे को ढोता है। यह बोझा हाथी के लिये मुसीबत और परेशानी का सामान हो जाता है। किन्तु वही घास चारा जब हाथी खाता है और उसे पचाकर आत्मसात करके अपनी देह में ले चलता है, तब वही बोझा उसके लिये बल और शक्ति का स्त्रोत बन जाता है।

🔷 इसलिए वेदाँत आपसे कहता है कि दुनिया के सब बोझे अपने कंधों पर मत ले चलिये। यदि तुम उनको अपने सिर पर ले चलोगे तो उस बोझ से तुम्हारी गर्दन टूट जायेगी। यदि तुम उन्हें पचा लोगे, उन्हें अपना बना लोगे, उन्हें अपना ही स्वरूप अनुसरण कर लोगे, तो तुम जल्दी-जल्दी बढ़ोगे, तुम्हारी गति मंद पड़ने के बदले अग्रसर होती जायेगी।

🔶 जब आप वेदाँत को अनुभव करते हैं, तब ईश्वर को आप महान और सर्वव्यापी देखेंगे। ईश्वर ही आप खाते हैं, ईश्वर ही आप पीते हैं, ईश्वर आप में वास करता है। जब आप ईश्वर का चारों ओर अनुभव करेंगे तब आपको वह दिखाई देगा। आपका भोजन ईश्वर के रूप में बदल जायेगा। वेदाँती के नेत्र संसार की हरेक वस्तु को परमेश्वरमय देखते हैं। हरेक वस्तु उसे प्यारी होती है। क्योंकि परमेश्वर है जब यह भावनाएं मन में घर करती हैं तो संसार की वस्तुएं तथा घटनाएं अप्रिय नहीं लगतीं, भारी या बोझल प्रतीत नहीं होतीं, वरन् हाथी के चारे की तरह पचकर सब प्रकार सुखदायक हो जाती हैं।

✍🏻 स्वामी रामतीर्थ
📖 अखण्ड ज्योति दिसंबर 1943
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/December/v1.13

👉 अनन्त संभावनाओं से युक्त मानवी सत्ता

🔶 बीज में वृक्ष की समस्त सम्भावनाएँ छिपी पड़ी हैं। सामान्य स्थिति में वे दिखाई नहीं पड़ती, पर जैसे ही बीज के उगने की परिस्थितियाँ प्राप्त होती हैं वैसे ही यह तथ्य अधिकाधिक प्रकट हो जाता है। पौधा उगता है—बढ़ता और वृक्ष बनता है। उससे छाया, लकड़ी, पत्र, पुष्प फल आदि के ऐसे अनेक अनुदान मिलने लगते है, जो अविकसित बीज से नहीं मिल सकते थे।

🔷 मनुष्य की सत्ता एक बीज है, जिससे विकास की वे सभी सम्भावनाएँ विद्यमान हैं जो अब तक उत्पन्न हुए मनुष्यों में से किसी को भी प्राप्त हो चुकी है। प्रत्येक व्यक्ति की मूल सत्ता समान स्तर है अन्तर केवल प्रयास एवं परिस्थितियों का है, यदि अवसर मिले तो प्रत्येक व्यक्ति उतना ही ऊँचा उठ सकता है जितना कि, इस संसार का कोई व्यक्ति कभी आगे बढ़ सका। भूतकाल में जो हो चुका है वह शक्य सिद्ध हो चुका।

🔶 सुनिश्चित सिद्धि तक उपयुक्त साधना पर पहुँचने में कोई सन्देह नहीं किया जा सकता। बात आगे की सोची जा सकती हैं। जो भूतकाल में नहीं हो सका वह भी भविष्य में हो सकता है। मनुष्य की सम्भावनाएँ अनन्त है। भूत से भी अधिक शानदार भविष्य हो सकता है, इसकी आशा की जा सकती है—की जानी चाहिए।

🔷 मनुष्य की अपनी सत्ता में अनन्त सामर्थ्य और महान सम्भावनाएँ छिपी पड़ी हैं। उन्हें समझने और विकसित करने के लिए सही रीति से—सही दिशा में अथक एवं अनवरत प्रयास करना—समस्त सिद्धियों का राज मार्ग है ऐसी सिद्धियों का जो उसकी प्रत्येक अपूर्णता को पूर्णता में परिणत कर सकती हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1974 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1974/December/v1/

मंगलवार, 17 जुलाई 2018

👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 4)

👉 प्राणवान् प्रतिभाओं की खोज

🔷 तीसरा वर्ग प्रतिभाशालियों का है। वे भौतिक क्षेत्र में कार्यरत रहते हैं, तो अनेक व्यवस्थाएँ बनाते हैं। अनुशासन में रहते और अनुबंधों से बँधे रहते हैं। अपनी नाव अपने बलबूते खेते हैं और उसमें बिठाकर अन्य कितनों को ही पार करते हैं। बड़ी योजनाएँ बनाते और चलाते हैं। कारखानों के व्यवस्थापक और शासनाध्यक्ष प्राय: इन्हीं विशेषताओं से संपन्न होते हैं। जिन्होंने महत्त्वपूर्ण सफलताएँ पाईं, उपलब्धियाँ हस्तगत की, प्रतिस्पर्धाएँ जीतीं, उनमें ऐसी ही मौलिक सूझ-बूझ होती है। बोल-चाल की भाषा में उन्हें ही प्रतिभावान कहते हैं। अपने वर्ग का नेतृत्व भी वही करते हैं। गुत्थियाँ सुलझाते और सफलताओं का पथ प्रशस्त करते हैं।

🔶 मित्र और शत्रु सभी उनका लोहा मानते हैं। मरुस्थल में उद्यान खड़े करने जैसे चमत्कार भी उन्हीं से बन पड़ते हैं। भौतिक प्रगति का विशेष श्रेय यदि उन्हें ही दिया जाए तो अत्युक्ति न होगी। सूझ-बूझ के धनी, एक साथ अनेक पक्षों पर दृष्टि रख सकने की क्षमता भी तो उन्हीं में होती है। समय सबके पास सीमित है। कुछ लोग उसे ऐसे ही दैनिक ढर्रों के कार्यों में गुजार देते हैं, पर कुछ ऐसे भी होते हैं जो एक ही समय में, एक ही शरीर-मस्तिष्क से, अनेकों ताने-बाने बुनते और अनेकों जाल-जंजाल सुलझाते हैं। सफलता और प्रशंसा उनके आगे-पीछे फिरती है। अपने क्षेत्र समुदाय या देश की प्रगति ऐसे सुव्यवस्थित प्रतिभावानों पर ही निर्भर रहती है।
  
🔷 सबसे ऊँची श्रेणी देव-मानवों की है, जिन्हें महापुरुष भी कहते हैं। प्रतिभा तो उनमें भरपूर होती है, पर वे उसका उपयोग आत्म परिष्कार से लेकर लोकमंगल तक के उच्चस्तरीय प्रयोजनों में ही किया करते हैं। निजी आवश्यकताओं और महत्त्वाकांक्षाओं को घटाते हैं, ताकि बचे हुए शक्ति भंडार को परमार्थ में नियोजित कर सकें। समाज के उत्थान और सामयिक समस्याओं के समाधान का श्रेय उन्हें ही जाता है। किसी देश की सच्ची संपदा वे ही समझे जाते हैं। अपने कार्यक्षेत्र को नंदनवन जैसा सुवासित करते हैं। वे जहाँ भी बादलों की तरह बरसते हैं, वहीं मखमली हरीतिमा का फर्श बिछा देते हैं। वे वसंत की तरह अवतरित होते हैं। अपने प्रभाव से वृक्ष-पादपों को सुगंधित, सुरभित पुष्पों से लाद देते हैं। वातावरण में ऐसी उमंगें भरते हैं, जिससे कोयलें कूकने, भौंरे गूँजने और मोर नाचने लगें।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 5

👉 Who is Religious?

🔷 Love, compassion, generosity, kindness, devotion, zeal, honesty, truthfulness, unflinching faith in divine values, etc – are the natural virtues of the soul. Their presence in a person is the sign of his/her spirituality. These alone are the source of spiritual elevation. These are also the perennial means of inner strength. Your endeavors for cultivating these qualities in your character must continue with greater intensity till your personality is fully imbibed with them. One who achieves this, he/she alone is truly spiritual and religious; he/she alone is worthy of meeting God – being beatified by thy grace.

🔶 Devotion of God is not confined to a specific religious cult or rituals. It lies in the deepest core of the inner emotions. Those who chant God’s name need not be religious; truly religious are those who follow the divine disciplines, adopt divine values in their conduct. Guiding the path to unification of the soul with God – inculcation of divinity in the human-self, is the foundational purpose of religion. Blessed are those who grasp this noble truth of religion and devotion.

🔷 Those who have reached this state of devotion would deserve attaining the eternal light of ultimate knowledge. They can realize God in their pure hearts and experience the absolute bliss forever…

📖 Akhand Jyoti, Jan. 1941

👉 ढोंग के घातक कुसंस्कार

🔷 मैं आप लोगों को घोर नास्तिक देखना पसंद करूंगा। लेकिन कुसंस्कारों से भरे मूर्ख देखना न चाहूँगा। क्योंकि नास्तिकों में कुछ न कुछ तो जीवन होता है। उनके सुधार की तो आशा है क्योंकि वे मुर्दे नहीं होते। लेकिन अगर मस्तिष्क में कुसंस्कार घुस जाता है तो वह बिल्कुल बेकार हो जाता है, दिमाग बिल्कुल फिर जाता है।

🔶 मृत्यु के कीड़े उसके शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। तुम्हें इनका परित्याग करना होगा। मैं निर्भीक साहसी लोगों को चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि लोगों में ताजा खून हो, स्नायुओं में तेजी हो, पेशियाँ लोहे की तरह सख्त हों। मस्तिष्क को बेकार और कमजोर बनाने वाले भावों की आवश्यकता नहीं है। इन्हें छोड़ दो। सब तरह के गुप्त भावों की ओर दृष्टि डालना छोड़ दो। धर्म में कोई गुप्त भाव नहीं। ऋद्धि-सिद्धियों की अलौकिकता के पीछे पड़ना कुसंस्कार और दुर्बलता के चिन्ह हैं। वे अवनति और मृत्यु के चिन्ह हैं। इसलिए उनसे सदा सावधान रहो।

🔷 तेजस्वी बनो और खुद अपने पैरों पर खड़े हो। मैं संन्यासी हूँ और गत चौदह वर्षों से पैदल ही चारों तरफ घूमता फिरता हूँ। मैं आपसे सच-सच कहता हूँ कि इस तरह के गुप्त चमत्कार कहीं पर भी नहीं हैं। इन सब बुरे संस्कारों के पीछे कभी न दौड़ो। तुम्हारे और तुम्हारी संपूर्ण जाति के लिए इससे तो नास्तिक होना अच्छा है किंतु इस तरह कुसंस्कार पूर्ण होना अवनति और मृत्यु का कारण है।

✍🏻 स्वामी विवेकानंद
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1943 पृष्ठ 11
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/November/v1.11

👉 विद्या से विनय- Vidhya Se Vinay

🔷 महर्षि आरुणि के पुत्र श्वेतकेतु ने गुरुकुल में रहकर लगन के साथ विद्याध्ययन किया। साथ ही गुरु-सेवा से उनके कृपा पात्र भी बन गये। यद्यपि गुरु को अपने सभी शिष्य प्रिय थे तथापि अपने सेवा बल से श्वेतकेतु ने विशेषता प्राप्त करली थी। गुरु सेवा की कृपा से जहाँ उन्होंने शीघ्र ही चारों वेदों का अखण्ड ज्ञान प्राप्त कर लिया था। वहाँ गुरु की प्रशंसा और प्रियता के कारण उनमें कुछ अहंकार भी आ गया था। अपने पाण्डित्य के अभिमान में गुरु के सिवाय अन्य किसी का आदर करना ही भूल गये।

🔶 निदान श्वेतकेतु जब गुरु का आशीर्वाद और चारों वेदों का सम्पूर्ण ज्ञान लेकर घर आये तो अहंकारवश पिता को भी प्रणाम नहीं किया। उनके पिता महर्षि आरुणि को इसका बड़ा दुःख हुआ। दुःख इसलिये नहीं कि वे पुत्र के प्रणाम के भूखे थे और श्वेतुकेतु ने उन्हें प्रणाम नहीं किया। वरन् दुःख इसलिये हुआ कि पुत्र एक लम्बी अवधि के बाद जहाँ ज्ञानी वहाँ अभिमानी भी होकर आया है।

🔷 महर्षि आरुणि पुत्र की इस वृत्ति से चिन्तित हो उठे। क्योंकि वे जानते थे कि जिस विद्या के साथ विनय नहीं रहती वह न तो फलीभूत होती है और न आगे विकसित! उन्होंने पुत्र के हित में उसका यह विकार दूर करने के मन्तव्य से व्यंगपूर्वक कहा— “ऋषिवर ! आपने ऐसी कौन ज्ञान की गूढ़ पुस्तक पढ़ ली है जो गुरुजनों का आदर तक करना भूल गये। मानता हूँ आप बहुत बड़े विद्वान हो गये। चारों वेदों का ज्ञान आपने प्राप्त कर लिया है। किन्तु इसके साथ यह भी जानते होंगे कि विद्या का सच्चा स्वरूप विनय है। जब आप वही न सीख पाये विद्वान कैसे?

🔶 पिता की बात सुन कर श्वेतकेतु ने अपनी भूल अनुभव की और लज्जित होकर पिता के चरणों में गिर गये। महर्षि आरुणि ने श्वेतकेतु को उठाकर छाती से लगा लिया और कहा—”अभिमान तुम्हें नहीं, अपने पुत्र की विद्वता पर अभिमान तो मुझे होना चाहिये था।”

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 July 2018


👉 आज का सद्चिंतन 17 July 2018

सोमवार, 16 जुलाई 2018

👉 Awakening the Inner Strength

🔶 Human life is a turning point in the evolution of consciousness. One who loses this opportunity and does not attempt awakening his inner self, knowing his soul, is the biggest loser. He cannot attain peace – neither in this life, nor in the life beyond. Thus, if we are truly desirous of ascent, beatifying bliss and peace, we must begin to look inwards. Joy is not there in the outer world, not in any achievement or possession of power and enormous resources. It is the soul,  which is the origin and ultimate goal of this intrinsic quest.

🔷 Just think! Happiness is a virtue of consciousness, how could then the inanimate things of this world give us joy? It is after all the “individual self”, which aspires for unalloyed joy and enjoys it. Then how could it be so dependent upon others for this natural spirit of the Consciousness Force? How could the world, which is ever changing and perishable, be the source of fulfilling our eternal  quest? the contrary, the sensual pleasures, the worldly joys, which delude us all the time, mostly consume our strength and weaken the life force of our sense organs and our mind.

🔶 This fact should be remembered again and again that the quest, the feeling of blissfulness are there because of the soul and it is only the awakened force of the soul, the inner strength that can lead the evolution of the individual self to the highest realms of eternal beatitudeous bliss.

📖 Akhand Jyoti, Oct. 1940

👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 3)

👉 प्राणवान् प्रतिभाओं की खोज

🔶 मनुष्यों की आकृति-प्रकृति तो एक जैसी होती है, पर उनके स्तरों में भारी भिन्नता पाई जाती है। हीन स्तर के लोग परावलंबी होते हैं। वे आँखें बंद करके दूसरों के पीछे चलते हैं। औचित्य कहाँ है, इसकी विवेचना बुद्धि इनमें नहीं के बराबर होती है। वे साधनों के लिए, मार्गदर्शन के लिए दूसरों पर निर्भर रहते हैं, यहाँ तक कि जीवनोपयोगी साधन तक अपनी स्वतंत्र चेतना के बलबूते जुटा नहीं पाते। उनके उत्थान-पतन का निमित्त कारण दूसरे ही बने रहते हैं। यह परजीवी वर्ग ही मनुष्यों में बहुलता के साथ पाया जाता है। अनुकरण और आश्रय ही उनके स्वभाव के अंग बनकर रहते है। निजी निर्धारण कदाचित् ही कभी कर पाते हैं। यह हीन वर्ग है, संपदा रहते हुए भी इन्हें दीन ही कहा जा सकता है।
  
🔷 दूसरा वर्ग वह है जो समझदार होते हुए भी संकीर्ण स्वार्थपरता से घिरा रहता है। योग्यता और तत्परता जैसी विशेषताएँ होते हुए भी वे उन्हें मात्र लोभ, मोह, अहंकार की पूर्ति के लिए ही नियोजित किए रहते हैं। उनकी नीति अपने मतलब से मतलब रखने की होती है। आदर्श उन्हें प्रभावित नहीं करते। कृपणता और कायरता के दबाव से वे पुण्य परमार्थ की बात तो सोच ही नहीं पाते, अवसर मिलने पर अनुचित कर बैठने से भी नहीं चूकते, महत्त्व न मिलने पर वे अनर्थ कर बैठते हैं।

🔶 गूलर के भुनगे जैसे स्वकेंद्रित जिंदगी ही जी पाते हैं। बुद्धिमान और धनवान् होते हुए भी इन लोगों को निर्वाह भर में समर्थ ‘प्रजाजन’ ही कहा जाता है। वे जिस तिस प्रकार जी तो लेते हैं, पर श्रेय सम्मान जैसी किसी मानवोचित उपलब्धि के साथ उनका कोई संबंध ही नहीं जुड़ता है। उन्हें जनसंख्या का एक घटक भर माना जाता है। फिर भी वे दीन-हीनों की तरह परावलंबी या भारभूत नहीं होते। उनकी गणना व्यक्तित्व की दृष्टि से अपंग, अविकसित और असहायों में नहीं होती। कम-से-कम अपना बोझ अपने पैरों पर तो उठा लेते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 4

👉 ईश्वर प्रदत्त उपहार और प्यार अनुदान

🔶 ‘मनुष्य−जन्म’ भगवान् का सर्वोपरि उपहार है। उससे बढ़कर और कोई सम्पदा उसके पास ऐसी नहीं है, जो किसी प्राणी को दी जा सके। इस उपहार के बाद एक और अनुदान उसके पास बच रहता है, जिसे केवल वे ही प्राप्त कर सकते हैं—जिन्होंने अंधकार से मुख मोड़कर प्रकाश की ओर चलने का निश्चय कर लिया है। “इस प्रयाण के मार्ग में आने वाली कठिनाइयों का धैर्य और साहस के साथ स्वागत करने की—जिनमें क्षमता है, वह अनुदान उन्हीं के लिए सुरक्षित है।”

🔷 ‘मनुष्य−जन्म’ ईश्वर का विशिष्ट उपहार है और मनुष्योचित संकल्प भगवान् का महानतम अनुदान। मानव−जीवन की सार्थकता इस आदर्श−परायण संकल्प−निष्ठा के साथ जुड़ने से ही होती है। यह सही है कि मनुष्य−कलेवर संसार के समस्त प्राणियों से सुख−सुविधा की दृष्टि से सर्वोत्तम है, पर उसकी गौरव−गरिमा इस बात पर टिकी हुई है “कि मनुष्य−जन्म के साथ मनुष्य−संकल्प और मनुष्य−कर्म भी जुड़े हुए हों।”

🔶 “हमें ‘मनुष्य−जन्म’ मिला—यह ईश्वर के अनुग्रह का प्रतीक है। उसका ‘प्यार’ मिला, या नहीं—इसकी परख इस कसौटी पर की जानी चाहिए कि मानवी−दृष्टिकोण और संकल्प अपना कर उस मार्ग पर चलने का साहस मिला, या नहीं—जो जीवन−लक्ष्य की पूर्ति करता है। वस्तुतः ‘मनुष्य−जन्म’ धारण करना उसी का धन्य है, जिसने आदर्शों के लिए अपनी आयु तथा विभूतियों को समर्पित करने के लिए साहस संचय कर लिया। ऐसे मनुष्यों को ईश्वर का उपहार ही नहीं, वरन् प्यार एवं अनुदान मिला समझा जाना चाहिए।”

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1974 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1974/January/v1.3

👉 आज का सद्चिंतन 16 July 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 July 2018

रविवार, 15 जुलाई 2018

👉 तीन मूर्तियाँ

🔷 एक राजा था। एक दिन वह अपने दरबार में मंत्रियों के साथ कुछ सलाह–मश्वरा कर रहा था। तभी एक चोबदार ने आकर कहा कि.. पडोसी राज्य से एक मूर्तिकार आया है और महाराज से मिलने की आज्ञा चाहता है। राजा ने आज्ञा दे दी।

🔶 थोडी देर में मूर्तिकार दरबार में हाजिर किया गया। वह अपने साथ तीन मूर्तियाँ लाया था, जिन्हें उसने दरबार में रख दिया। उन मूर्तियों की विशेषता थी कि तीनो अत्यंत सुंदर और कलात्मक तो थीं ही, पर एक जैसी दिखती थीं और बनी भी एक ही धातु से थीं। मामूली सवाल-जवाब के बाद राजा ने उससे दरबार में प्रस्तुत होने का कारण पूछा।

🔷 जवाब में मूर्तिकार बोला.. “राजन! मै आपके दरबार में इन मूर्तियों के रूप में एक प्रश्न लेकर उपस्थित हुआ हूँ, और उत्तर चाहता हूँ। मैने आपके मंत्रियों की बुद्धिमत्ता की बहुत प्रसंशा सुनी है। अगर ये सच है तो मुझे उत्तर अवश्य मिलेगा।“

🔶 राजा ने प्रश्न पूछने की आज्ञा दे दी। तो मूर्तिकार ने कहा.. “राजन! आप और आपके मंत्रीगण मूर्तियों को गौर से देखकर ये तो जान ही गये होंगे कि ये एक सी और एक ही धातु से बनी हैं। परंतु इसके बावजूद इनका मुल्य अलग-अलग है। मै जानना चाहता हूँ कि कौन सी मूर्ति का मूल्य सबसे अधिक है, कौन सी मूर्ति सबसे सस्ती है, और क्यों?”

🔷 मूर्तिकार के सवाल से एकबारगी तो दरबार में सन्नाटा छा गया। फिर राजा के इशारे पर दरबारी उठ-उठ कर पास से मूर्तियों को देखने लगे। काफी देर तक किसी को कुछ समझ न आया। फिर एक मंत्री जो औरों से चतुर था, और काफी देर से मूर्तियों को गौर से देख रहा था, उसने एक सिपाही को पास बुलाया और कुछ तिनके लाने को कह कर भेज दिया। थोडी ही देर में सिपाही कुछ बडे और मजबूत तिनके लेकर वापस आया और तिनके मंत्री के हाथ में दे दिये। सभी हैरत से मंत्री की कार्यवाही देख रहे थे।

🔶 तिनके लेकर मंत्री पहली मूर्ति के पास गये और एक तिनके को मूर्ति के कान में दिखते एक छेद में डाल दिया। तिनका एक कान से अंदर गया और दूसरे कान से बाहर आ गया, फिर मंत्री दूसरी मूर्ति के पास गये और पिछली बार की तरह एक तिनका लिया और उसे मूर्ति के कान में दिखते छेद में डालना शुरू किया.. इस बार तिनका एक कान से घुसा तो दूसरे कान की बजाय मूर्ति के मुँह के छेद से बाहर आया, फिर मंत्री ने यही क्रिया तीसरी मूर्ति के साथ भी आजमाई इस बार तिनका कान के छेद से मूर्ति के अंदर तो चला गया पर किसी भी तरह बाहर नहीं आया। अब मंत्री ने राजा और अन्य दरबारियों पर नजर डाली तो देखा राजा समेत सब बडी उत्सुकता से उसी ओर देख रहे थे।

🔷 फिर मंत्री ने राजा को सम्बोधित कर के कहना शुरू किया और बोले... “महाराज! मैने मूर्ति का उचित मुल्य पता कर लिया है।“ राजा ने कहा... “तो फिर बताओ। जिससे सभी जान सकें।“

🔶 मंत्री ने कहा... “महाराज! पहली मूर्ति जिसके एक कान से गया तिनका दूसरे कान से निकल आया उस मूर्ति का मुल्य औसत है। दूसरी मूर्ति जिसके एक कान से गया तिनका मुँह के रास्ते बाहर आया वह सबसे सस्ती है। और जिस मूर्ति के कान से गया तिनका उसके पेट में समा गया और किसी भी तरह बाहर नहीं आया वह मूर्ति सर्वाधिक मुल्यवान बल्कि बेशकीमती है।“

🔷 राजा नें कहा… “ किंतु तुमने कैसे और किस आधार पर मूर्तियों का मुल्य तय किया है यह भी बताओ।“

🔶 मंत्री बोले... “महाराज! वास्तव में ये मूर्तियाँ तीन तरह के मानवी स्वभाव की प्रतीक है। जिसके आधार पर मानव का मुल्याँकन किया जाता है। पहली मूर्ति के कान से गया तिनका दूसरे कान से बाहर आया; ये उन लोगों की तरफ इशारा करता है जिनसे कोई बात कही जाय तो एक कान से सुन कर दूसरे कान से निकाल देते हैं, ये किसी काम के नही होते, किंतु यद्यपि ये किसी बात को गंभीरता से नहीं लेते पर इनमें इधर की बात उधर करने का अवगुण भी नहीं होता सो इनका मूल्य औसत है।

🔷 दूसरी मूर्ति जिसके कान से डाला गया तिनका मुँह के रास्ते बाहर आया; वह उन लोगों का प्रतीक है जो कोई बात पचा या छिपा नहीं सकते, चुगलखोरी, दूसरों की गुप्त बातों को इधर-उधर कहते रहने के कारण ये सर्वथा त्याज्य होते हैं, ऐसे लोगों को निकृष्ट और सबसे सस्ता कह सकते हैं। अतः दूसरी मूर्ति सबसे सस्ती है।

🔶 अब रही तीसरी मूर्ति जिसके कान में डाला गया तिनका पेट में जाकर गायब हो गया ये उन लोगों का प्रतीक है, जो दूसरों की कही बात पर ध्यान तो देते ही हैं साथ ही दूसरों के राज को राज बनाये रखते हैं। ऐसे लोग समाज में दुर्लभ और बेशकीमती होते हैं। सो तीसरी मूर्ति सबसे मुल्यवान है।“

🔷 राजा नें मूर्तिकार की ओर देखा। मूर्तिकार बोला... “महाराज! मै मंत्री महोदय के उत्तर से संतुष्ट हूँ.. और स्वीकार करता हूँ कि आपके मंत्री सचमुच बुद्धिमान हैं। उनका उत्तर सत्य और उचित है। ये मूर्तियाँ मेरी ओर से आपको भेंट हैं। इन्हें स्वीकार करें। और अब मुझे अपने राज्य जाने की आज्ञा दें।“

🔶 राजा ने मूर्तिकार को सम्मान सहित अपने राज्य जाने की आज्ञा दे दी और अपने मंत्री को भी इनाम देकर सम्मानित किया।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 15 July 2018


👉 आज का सद्चिंतन 15 July 2018


👉 सेवा और प्रार्थना

🔷 तुम मुझे प्रभु कहते हो, गुरु कहते हो, उत्तम कहते हो, मेरी सेवा करना चाहते हो और मेरे लिए सब कुछ बलिदान कर देने को तैयार रहते हो। किन्तु मैं तुम से फिर कहता हूँ, तुम मेरे लिये न तो कुछ करते हो और न करना चाहते हो।

🔶 तुम जो कुछ करना चाहते हो मेरे लिये करना चाहते हो जबकि मैं चाहता हूँ तुम औरों के लिये ही सब कुछ करो। औरों के लिये कुछ न करने पर तुम मेरे लिये कुछ न कर सकोगे। मैं तुमसे सच कहता हूँ कि यदि तुमने इन छोटों के लिये कुछ न किया तो मेरे लिये भी कुछ न किया।

🔷 मैं फिर कहता हूँ कि मुझे प्रसन्न करने का प्रयत्न मत करो, मेरी प्रसन्नता तो इन छोटे और गरीब आदमियों की प्रसन्नता है। मुझे प्रसन्न करने के स्थान पर इनको प्रसन्न करो, मेरी सेवा की जगह इनकी सेवा और सहायता करो।

🔶 तुम सब प्रार्थना करते हो। लेकिन मैं सच कहता हूँ, तुम प्रार्थना नहीं करते। अगर तुम प्रार्थना करते हो तो मुझे ठीक-ठीक बतलाओ, क्या तुम लोग प्रार्थना में खड़े हुए संसार को भूल जाते हो। तुम्हारे मन को सारा द्वन्द्व नष्ट हो जाता है और तुम्हें ऐसा लगता है कि तुम्हारा कोई शत्रु नहीं है और न तुम ही किसी के शत्रु हो।

🔷 यदि ऐसा नहीं होता तो तुम प्रार्थना नहीं करते। तुम्हारी प्रार्थना में खड़ा होना ठीक वैसा ही है जैसे ग्वाले के डंडे से घिरी हुई भेड़े बाड़े में खड़ी हो जाती हैं।

🔶 मैं तुमसे सच कहता हूँ यदि पिता में विश्वास रखकर प्रार्थना की जाये तो मनुष्य को संसार की बुराइयों का स्मरण ही न आवे। यदि तुझमें राई के दाने भर भी सच्चा विश्वास हो तो तुम इस पहाड़ से अधिकारपूर्वक एक स्थान से दूसरे स्थान पर सरक जाने के लिये कह सकते हो और वह सरक कर चला भी जाये।

✍🏻 रामकृष्ण परमहंस
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1969 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1969/February/v1.3

👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 2)

👉 प्राणवान् प्रतिभाओं की खोज

🔷 समय की माँग के अनुरूप, दो दबाव इन दिनों निरंतर बढ़ते जा रहे हैं। एक व्यापक अवांछनीयताओं से जूझना और उन्हें परास्त करना। दूसरा है नवयुग की सृजन व्यवस्था को कार्यान्वित करने की समर्थता। निजी और छोटे क्षेत्र में भी यह दोनों कार्य अति कठिन पड़ते हैं, फिर जहाँ देश, समाज या विश्व का प्रश्न है, वहाँ तो कठिनाई का अनुपात असाधारण होगा ही।
  
🔶 प्रगति पथ पर अग्रसर होने के लिए तदनुरूप योग्यता एवं कर्मनिष्ठा उत्पन्न करनी पड़ती है। साधन जुटाने पड़ते हैं। इनके बिना सामान्य स्थिति में रहते हुए किसी प्रकार दिन काटते ही बन पड़ता है। इसी प्रकार कठिनाइयों से जूझने, अड़चनों के निरस्त करने और मार्ग रोककर बैठे हुए अवरोधों को किसी प्रकार हटाने के लिए समुचित साहस, शौर्य और सूझ-बूझ का परिचय देना पड़ता है। अनेकों समस्याएँ और कठिनाइयाँ, आए दिन त्रास और संकट भरी परिस्थितियाँ, बनी ही रहती हैं। जो कठिनाइयों से जूझ सकता है और प्रगति की दिशा में बढ़ चलने के साधन जुटा सकता है, उसी को प्रतिभावान् कहते हैं।
  
🔷 प्रतिभा की निजी जीवन के विकास में निरंतर आवश्यकता पड़ती है और अवरोधों को निरस्त करने में भी। जो आगे बढ़े-ऊँचे उठे हैं, उन्हें यह दोनों ही सरंजाम जुटाने पड़े। उत्कर्ष की सूझ-बूझ और कठिनाइयों से लड़ सकने की हिम्मत, इन दोनों के बिना उन्नतिशील जीवन जी सकना संभव ही नहीं होता। फिर सामुदायिक सार्वजनिक क्षेत्र में सुव्यवस्था बनाने के लिए और भी अधिक प्रखरता चाहिए। यह विशाल क्षेत्र, आवश्यकताओं और गुत्थियों की दृष्टि से तो और भी बढ़ा-चढ़ा होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 3

👉 व्याधियों का उद्भव स्थान

🔷 अन्तस्तल के गहन स्तरों के नीचे हमारी रहस्य मयि अन्तश्चेतना (Sub-conscious) में हमारे नित्यप्रति के विद्वेष, व्यंगपूर्ण कटुता, ईर्ष्या, द्रोह तथा असंतोष की जड़ें मिल सकती हैं। मानव के नित्य प्रति के जीवन में जो परस्पर विरोधिता और असामंजस्य कल्पनातीत रूप से वर्तमान है उसका मर्म हमारी अज्ञात चेतना के भीतर निहित है।

🔶 मन की यह अन्तश्चेतना ही व्याधियों का उद्भव स्थान है। प्रत्येक रोग बीज रूप से यहीं से प्रारम्भ होता है। शरीर में उत्पन्न होने से पूर्व प्रत्येक रोग अज्ञात चेतना में अंकुरित पल्लवित एवं फलित होकर क्रमशः शरीर में प्रकट होता है। हमारी जाग्रत चेतना (Consciousness) उसे आकस्मिक और नूतन समझती है और इन अन्तर्स्थित कटुताओं, वैषम्य, असंतोष को भुलाकर अपने आपको (और स्वभावतः दूसरों को) ठगने के लिए बिना विलम्ब कोई छोटा-मोटा कल्पित कारण उपस्थित कर देने की तत्परता में कमाल कर दिखाती है।

🔷 आइये, व्याधियों के कारण शरीर में न ढूंढ़ कर हम मन में ढूंढ़े, अज्ञात पहलुओं पर प्रकाश डालें मन के गहन स्तर से अपने रोगों की चिकित्सा प्रारम्भ करें। जितना ही हम रोग के अज्ञात कारणों को, जो अन्तश्चेतना में गढ़े हुए हैं, मालूम करने की चेष्टा करेंगे और उन्हें चेतन मन के समक्ष प्रस्तुत करने में सफल होंगे, उतनी ही लाभ की आशा करनी चाहिए।

🔶 आधुनिक काल का मानवजीवन अत्यन्त संघर्ष पूर्ण है, वैज्ञानिक जड़वाद तीव्र गति से समाज में विस्तीर्ण हो रहा है, मानव तृष्णा, ईर्ष्या, अहंकार इतने बढ़ गए हैं कि इन समस्त शुभ अशुभ इच्छाओं की परितृप्ति असंभव है। अतृप्त अशुभ संस्कार अत्यन्त मार्मिक रूप में फूटे पड़ रहे हैं। आन्तरिक अन्तर ज्वाला, कशमकश, आघात-प्रतिघात, वैषम्य, भय, भ्राँति और चिन्ता के विचार, अनिष्ट इच्छा के विकृत विचार दीमक की भाँति शरीर को जर्जरित करते तथा बलात्कार हमें रोग व्याधि ग्रस्त रखते हैं। मनुष्य के जीवन की दुर्दशा करने वाला और रोगों से परेशान करने वाला वास्तव में हमारा मन ही है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1946 पृष्ठ 5

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1946/February/v1.5

👉 Renunciation of Karma is Self-Deception

🔷 Often people misinterpret the preaching of the holy Gita and Vedanta and regard the state of inaction as that of detachment and soul-realization. But this is mere delusion, idleness and escapism. Making the body inactive or renouncing the family and duties does not serve any purpose of spiritual ascent. What is important is the liberation of the mind from all ego, expectations and selfish
attachments. You should perform all your duties, do all your work at your level best but be detached from the end-results.

🔶 Don’t expect the results of your actions to be as per your will or imagination. But don’t leave your actions (karmas) thinking that every thing will happen as per your destiny. You can’t live even for a single moment without any karma – be that physical or mental. You are born do transact your duties. This is what is implied in the following hymn:

🔷 “NaKaschitksanamapi Jatu Tisthtyakarma-Krat । Karyate Hyavasah Karma Sarvah Prakratijairgunaih ।।”

🔶 The system of Nature is such that it triggers every being, every particle, to act as per its natural tendencies. We might prevent the actions of our body or the sense organs for sometime; but what about the flow of thoughts and the impulses of unconscious mind? Those who attempt such superficial renouncement and try to evade from duties, actions suffer more agility and turbulence of desires and intrinsic tendencies in the mind… They are fake and self-cheaters.

📖 Akhand Jyoti, Aug 1940

शनिवार, 14 जुलाई 2018

👉 अपने खानदान का परिचय

🔶 एक गाँव मे एक संत आये हुये थे श्री रामदास कुछ दिनो तक वो वही पर सत्संग का प्रवचन करने के लिये ठहरे हुये थे वो बहुत ही शालीन स्वभाव के थे और स्वयं के हाथों से सात्विक आहार बनाकर ग्रहण करते थे!

🔷 एक बार एक युवक आया और उसने रामदास जी से अपने घर भोजन ग्रहण करने के लिये कहा तो महात्मा जी ने कहा वत्स मैं अन्यत्र कही भोजन नही करता हूँ ये मेरा नियम है पर वो युवक बड़ी जिद्दी करने लगा और बार बार समझाने पर भी जब वो न समझा तो रामदास जी ने उसका दिल रखने के लिये अपनी स्वीकृति दे दी!

🔶 अगले दिन महात्मा जी उसके घर भोजन करने को गये तो उस युवक ने भोजन का थाल लगाया नाना प्रकार के व्यंजन बनाये और उस थाल मे परोसकर महात्माजी के आगे रखे और फिर महात्माजी ने हाथ जोड़कर भगवान को प्रणाम किया और जैसे ही महात्माजी ने आँखे खोली तो उस युवक ने महात्मा जी से कहा रे ढोंगी तु तो कही भोजन नही करता फिर यहाँ क्यों आया और उसने उन्हे काफी अपशब्द कहे फिर महात्मा जी वहाँ से मुस्कुराकर चले गये और बारम्बार भगवान श्री राम का शुक्रिया अदा कर रहे थे!

🔷 श्री रामदास जी की वो मुस्कुराहट और उनके द्वारा भगवान श्री राम जी को शुक्रिया अदा करना उस युवक के समझ मे न आया और बारबार श्री रामदास जी की वो मुस्कुराहट एक तीर की तरह उसके सीने मे उतर गई और फिर जिस दिन कथा की पूर्णाहुति थी वो युवक श्री रामदास जी के पास गया और क्षमा प्रार्थना करने लगा तो महात्माजी ने उन्हे तत्काल क्षमा कर दिया!

🔶 युवक ने कहा देव उसदिन जब मैंने आपको इतने असभ्य शब्द बोले तो आपने वापिस प्रति उत्तर क्यों न दिया ? और रामजी का शुक्रिया अदा क्यों कर रहे थे?

🔷 हॆ वत्स दो कारण थे एक तो मेरे गुरुदेव ने मुझसे कहा था की बेटा रामदास जब भी कोई तुझे असभ्य शब्द बोले तो अपने नाम को उल्टा कर के समझ लेना अर्थात सदा मरा हुआ समझ लेना वो जो कहे उसे सुनना ही मत! और यदि तु सुन भी ले तो तु यही समझना की ये अपने असभ्य खानदान का परिचय दे रहा है और जब कोई सामने वाला अपना परिचय दे तो तु भी अपना परिचय देना और हर परिस्तिथि मे मुस्कुराहट और सभ्यता के साथ पेश आना और चुकी तुम्हे संत बनना है तो संयम ही संत का और उसके खानदान का परिचय है तो तु संयम से अपना परिचय देना कही तु अपना आपा मत खो देना कही तु भी उसकी तरह असंयमितता का परिचय मत दे देना!

🔶 और मैं श्री राम जी का इसलिये शुक्रिया अदा कर रहा था की हॆ मेरे राम तुने नियम भी बचा लिया और गूरू आदेश भी! और आज मैं संतुष्ट होकर तुम्हारे गाँव से जा रहा हूँ और एक बार फिर से रामजी का आभार प्रकट करता हूँ!

🔷 युवक ने कहा पर आप अब क्यों आभार प्रकट कर रहे है?

🔶 रामदास जी ने कहा बेटा तेरा ह्रदय परिवर्तन हो गया और तेरे गाँव मे आना मेरा सार्थक हो गया और वो युवक संत श्री के चरणों मे गिर गया!

http://awgpskj.blogspot.com/2016/06/blog-post_23.html

👉 आज का सद्चिंतन 14 July 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 July 2018

👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 1)


👉 सार-संक्षेप

🔶 भगवत्सत्ता का निकटतम और सुनिश्चित स्थान एक ही है, अंतराल में विद्यमान प्राणाग्नि। उसी को जानने-उभारने से वह सब कुछ मिल सकता है, जिसे धारण करने की क्षमता मनुष्य के पास है। प्राणवान् प्रतिभा संपन्नों में उस प्राणाग्नि का अनुपात सामान्यों से अधिक होता है। उसी को आत्मबल-संकल्पबल भी कहा गया है।

🔷 पारस को छूकर लोहा सोना बनता भी है या नहीं? इसमें किसी को संदेह हो सकता है, पर यह सुनिश्चित है कि महाप्रतापी-आत्मबल संपन्न व्यक्ति असंख्यों को अपना अनुयायी-सहयोगी बना लेते हैं। इन्हीं प्रतिभावानों ने सदा से जमाने को बदला है-परिवर्तन की पृष्ठभूमि बनाई है। प्रतिभा किसी पर आसमान से नहीं बरसती, वह तो अंदर से जागती है। सवर्णों को छोड़कर वह कबीर और रैदास को भी वरण कर सकती है।

🔶 बलवानों, सुंदरों को छोड़कर गाँधी जैसे कमजोर शरीर वाले व चाणक्य जैसे कुरूपों का वरण करती है। जिस किसी में वह जाग जाती है, साहसिकता और सुव्यवस्था के दो गुणों में जिस किसी को भी अभ्यस्त-अनुशासित कर लिया जाता है, सर्वतोमुखी प्रगति का द्वार खुल जाता है। प्रतिभा-परिष्कार -तेजस्विता का निखार आज की अपरिहार्य आवश्यकता है एवं इसी आधार पर नवयुग की आधारशिला रखी जाएगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 2

👉 On The Karma-Yoga of Gita

🔶 Every human being, each one of us, is born in human form to play a specific role, transact some specific duty. This duty and one’s ability to fulfill it depends upon one’s intrinsic character since birth. Honest efforts to do the karmas towards these duties are what could be termed as the gist of Karma Yoga. It was essentially this duty that Arjun was reminded by Lord Krishna in the holy   Bhagvad Gita. Lord Krishna made him aware of the majestic purpose for which Arjun was born on the earth. God has given us the freedom of karma and hence of creating our own future destiny; but we can’t escape transacting the destined duties.

🔷 God lives within every living being and triggers the direction of one’s life as per the accumulated effects of one’s past karmas. The molecular or cellular components or the RBCs in our blood are bound to be at the assigned positions and be engaged in specific functions as per their biological nature. They are the parts of our body and hence should be governed by us. But we can’t change their natural properties in any case. Thus, they are independent too… This is how we are also independent in God’s creation.

🔶 We have the freedom in choosing our (new) karma despite having to live as per certain destined circumstances, but the results of these would be according to our intentions, aim and nature of our karma as per the absolute law of the Supreme Creator. That is why God says – “Karmanyeva Adhikarste, Ma Phalesu Kadachan”. Those who understand and follow it are karma-yogis. Those who do not, and always expect desired outputs in return of their actions, are, on the contrary, often found complaining their destiny or the world and remain desperate and dismayed most of the time…

📖 Akhand Jyoti, July 1940

👉 हम दो ही बात आपसे कहना चाहते हैं

🔶 ईसाई मिशन की महिलाएँ भी घर-घर जाती हैं और यह कहती हैं कि हमारी एक पैसा की किताब जरूर खरीदिये। अगर अच्छी न लगे तो कल मैं वापस ले लूँगी। अरे यह किताब बेचना नहीं है बाबा, मेरे विचार को घर-घर पहुँचाना है। आप लोगों के जिम्मे हमारा एक सूत्रीय कार्यक्रम है। आप जाइये, अपने को निचोड़िये। आपका घर का खर्च यदि 1000 रुपये है तो निचोड़िये इसको और उसमें से बचत को ज्ञानयज्ञ के लिए खर्च कीजिये। हमारी आग को बिखेर दीजिये, वातावरण को गरम कर दीजिये, उससे अज्ञानता को जला दीजिये। आप लोग जाइये और अपने आपको निचोड़िये। ज्ञानघट का पैसा खर्च कीजिये तो क्या हम अपनी बीबी को बेच दें? बच्चे को बेच दें? चुप कंजूस कहीं के ऊपर से कहते  हैं हम गरीब हैं। आप गरीब नहीं कंजूस हैं।

🔷 हर आदमी के ऊपर हमारा आक्रोश है। हमें आग लग रही है और आप निचोड़ते नहीं हैं। इनसान का ईमान, व्यक्तित्व समाप्त हो रहा है। आज शक्तिपीठें, प्रज्ञापीठें जितनी बढ़ती जा रही हैं, उतना ही आदमी का अहंकार बढ़ता जा रहा है। आपस में लड़ाई-झगड़े बढ़ते जा रहे हैं। सब हविश के मालिक बनते जा रहे हैं। हम चाहते हैं कि अब पन्द्रह-बीस हजार में फूस के शक्तिपीठ, प्रज्ञापीठ बन जाते तो कम से कम लोगों का राग-द्वेष, अहंकार तो नहीं बढ़ता। आज आप लोगों से एक ही निवेदन कि आप हमारी आग स्वयं बिखेरिये, नौकरी से नहीं, सेवा से।

🔶 आप जाइये एवं हमारा साहित्य पढ़िये तथा लोगों को पढ़ाइये और हम क्या कहना चाहते थे। हम दो ही बात आपसे कहना चाहते हैं- पहली हमारी आग को घर-घर पहुँचाइये, दूसरी ब्राह्मण एवं सन्त को जिन्दा कीजिये ताकि हमारा प्याऊ एवं अस्पताल चल सके, ताकि लोगों को-अपने बच्चों को खिला सकें तथा उन्हें जिन्दा रख सकें तथा मरी हुई संस्कृति को जिन्दा कर सकें। आप 11 माला जप करते हैं-आपको बहुत-बहुत धन्यवाद। यह जादूगरी नहीं है। किसी माला में कोई जादू नहीं है। मैं तो यहाँ तक कहता हूँ कि मनोकामना की मालाएँ, जादूगरी की माला में आग लगा दीजिये, आप मनोकामना की माला, जादूगरी की माला, आज्ञाचक्र जाग्रत करने की माला को पानी में बहा दीजिये।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 वाङमय-नं-68-पेज-1.12

👉 मन का मैल-वहम

🔶 हमारी अनेक बातें केवल वहम की प्रतिक्रियाएँ हैं। वहम मन का मैल है। यह अज्ञान अविश्वास एवं मूढ़ता का प्रतीक है। अमुक तिथि को गृह से प्रस्थान न होना चाहिए। छींकने पर कोई भयंकर घटना घटित होने वाली है। छिपकली शरीर पर गिर गई, अतः मृत्यु अवश्यंभावी है, जन्मपत्री नहीं मिलती अतः दाम्पत्य जीवन में रोग शोक कटुता होनी ही चाहिए-हमारी ऐसी ही अनेक वहमी धारणाएँ मानसिक निर्बलता की द्योतक हैं। भारतवासी अभी इतने ज्ञान सम्पन्न नहीं हो पाये हैं कि अपनी पुरानी विचार धाराओं को तिलाँजलि दे दें। वस्तुतः वे रोग और व्याधि को किसी अदृष्ट शक्ति का व्यापार मान लेते हैं।

🔷 अनेक व्यक्ति चिंता, क्रोध, भय इत्यादि मनोवेगों द्वारा अपने मनोबल को इतना निर्बल बना लेते हैं कि इनके द्वारा उनकी मानसिक स्थिति अत्यन्त विक्षुब्ध हो उठती हैं। ऐसे व्यक्तियों का मन सर्वदा किसी अज्ञात भय से उत्तेजित, गिरा हुआ और प्रकम्पित रहता है, चित्त में निरंतर अस्थिरता वर्तमान रहती है, विचार क्षिप्र गति से परिवर्तित होते रहते हैं, स्मरण शक्ति का ह्रास होता है, जरा-जरा सी बातों में उद्विग्नता, कटुता, कर्कशता उत्पन्न होती है, मन कुत्सित कल्पनाओं का अड्डा बन जाता है, और अन्त में अनेक मनो जनित रोग उन्हें धर दबाते हैं। कभी-कभी यह मानसिक दुर्बलता पागलपन में प्रकट होकर अनेक उपद्रव करती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति-फर. 1946 पृष्ठ 4

शुक्रवार, 13 जुलाई 2018

👉 छोटी सी ग़लतफहमी

🔷 दो सगे भाई राजा और विजय साथ साथ खेती करते थे। मशीनों की भागीदारी और चीजों का व्यवसाय किया करते थे।

🔶 चालीस साल के साथ के बाद एक छोटी सी ग़लतफहमी की वजह से उनमें पहली बार झगडा हो गया था झगडा दुश्मनी में बदल गया था। अब राजा और विजय एक दुसरे की शक्ल भी देखना पसंद नहीं करते थे।

🔷 एक सुबह एक बढई बड़े भाई से काम मांगने आया. बड़े भाई ने कहा “हाँ, मेरे पास तुम्हारे लिए काम हैं।

🔶 उस तरफ देखो, वो मेरा पडोसी है, यूँ तो वो मेरा भाई है, पिछले हफ्ते तक हमारे खेतों के बीच घास का मैदान हुआ करता था पर मेरा भाई बुलडोजर ले आया और अब हमारे खेतों के बीच ये खाई खोद दी, जरुर उसने मुझे परेशान करने के लिए ये सब किया है अब मुझे उसे मजा चखाना है, तुम खेत के चारों तरफ बाड़ बना दो ताकि मुझे उसकी शक्ल भी ना देखनी पड़े."

🔷 “ठीक हैं”, बढई ने कहा।

🔶 बड़े भाई ने बढई को सारा सामान लाकर दे दिया और खुद शहर चला गया, शाम को लौटा तो बढई का काम देखकर भौंचक्का रह गया, बाड़ की जगह वहा एक पुल था जो खाई को एक तरफ से दूसरी तरफ जोड़ता था. इससे पहले की बढई कुछ कहता, उसका छोटा भाई आ गया।

🔷 छोटा भाई बोला “तुम कितने दरियादिल हो, मेरे इतने भला बुरा कहने के बाद भी तुमने हमारे बीच ये पुल बनाया, कहते कहते उसकी आँखे भर आईं और दोनों एक दूसरे के गले लग कर रोने लगे. जब दोनों भाई सम्भले तो देखा कि बढई जा रहा है।

🔶 रुको, रुको, रुको! ! !

🔷 मेरे पास तुम्हारे लिए और भी कई काम हैं, बड़ा भाई बोला।

🔶 मुझे रुकना अच्छा लगता, पर मुझे ऐसे कई पुल और बनाने हैं, बढई मुस्कुराकर बोला और अपनी राह को चल दिया।

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🔷 मित्रों, दिल से मुस्कुराने के लिए जीवन में पुल की जरुरत होती हैं खाई की नहीं। छोटी छोटी बातों पर अपनों से न रूठें।

👉 आज का सद्चिंतन 13 July 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 July 2018


👉 Do good to one and all

🔷 Foundation is the base on which something can be established or something can stay put. We see plenty of skyscrapers around. These gigantic buildings are built on the strength of their strong foundations.

🔶 Even Sanatana Dharma, the eternal dharma that has no beginning and no end, couldn't have endured without a foundation. It has been managed to survive unharmed, amidst lots of storms for thousands of years, because of its rock solid foundation.

🔷 What could be its rock solid foundation? Its foundation lies in its core belief of sarvabhuta hitaretah, i.e. do good to one and all, without exception. In other words, this means to visualise our soul in each and every living or non-living entities in the world, to regard everyone just like our own selves, to have an infinite all-inclusive outlook.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Dharma tattwa ka darana aura marma Vangmay 53 Page 1.13

सर्वभूत हितरेता:

🔷 आधार उसे कहते हैं, जिसके सहारे कुछ स्थिर रह सके, कुछ टिक सके। हम चारों ओर जो गगनचुम्बी इमारत देखते हैं, उनके आधार पर नींव के पत्थर होते हैं।

🔶 बिना आधार के सनातन धर्म भी नहीं है। सनातन धर्म का अपना एक मजबूत आधार है, जिसके ऊपर उसकी भित्ति हजारों वर्षों से मजबूती से खड़ी हुई है

🔷 वह आधार क्या है ? वह आधार है - 'सर्वभूत हितरेता: इसे दूसरे शब्दों में ऎसा भी कह सकते हैं कि सृष्टि के सम्पूर्ण जड़ - चेतन में अपनी आत्मा का दर्शन करना। अपने समान ही सबको मानना।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 धर्म तत्त्व का धर्षण और मर्म वांग्मय 53 पृष्ठ 1.13

👉 The Roots of Fulfillment

🔷 Most thinkers, philosophers of the world opine that self-evolution is a natural desire, and tendency of every living being. In fact this is what lies behind one’s quest for progress and joy… All efforts, all competitions and struggles for worldly possessions, sensual pleasures, ego-satisfaction emanate from this rootcause in the deepest depth, though we don’t realize it because of our extrovert
attitude and illusions of letting the worldly substances and circumstances as the keys to a treasure of joy.

🔶 One earns money with hard work and keeps saving it to get more and more. Why? Because, he ‘feels’ it like a source of joy. But the same fellow might spend his savings in gorgeous arrangements of his child’s marriage? Why? Because that might give him a ‘feeling’ of greater pleasure of making his child happy or gaining prestige in the society or what not…! A dacoit risks his life in bringing huge wealth in loot, but what does he do of it? He might just throw it in drinking liquor; because for him that might appear to be a greater source of pleasure than saving the money or using it some other ways.

🔷 If the savings are consumed in religious alms or treatment of a disease, one does not feel as bad as one would, if the same amount was lost due to burglary. So what we see common in all these examples and perhaps in every action of our life is that one opts for what he or she feels or thinks as more satisfying, although this satisfaction or joy might be just circumstantial, illusory and short-lived. Deeper thinking would indicate that the root of this quest for joy or fulfillment lies beneath the sublime core of eternal quest of the self for ascent, for betterment, for unbounded evolution… Then we would then attempt for the absolute unalloyed bliss, ultimate fulfillment.

📖 Akhand Jyoti, June 1940

👉 जाग्रत् आत्माओं से याचना

🔷 ज्ञानयज्ञ के लिए समयदान, यही है प्रज्ञावतार की जाग्रत् आत्माओं से याचना, उसे अनसुनी न किया जाए। प्रस्तुत क्रिया-कलाप पर नए सिरे से विचार किया जाए, उस पर तीखी दृष्टि डाली जाए और लिप्सा में निरत जीवन क्रम में साहसिक कटौती करके उस बचत को युग देवता के चरणों पर अर्पित किया जाए। सोने के लिए सात घंटे, कमाने के लिए आठ घंटे, अन्य कृत्यों के लिए पाँच घंटे लगा देना सांसारिक प्रयोजनों के लिए पर्याप्त होना चाहिए। इनमें २० घंटे लगा देने के उपरांत चार घंटे की ऐसी विशुद्ध बचत हो सकती है जिसे व्यस्त और अभावग्रस्त व्यक्ति भी युग धर्म के निर्वाह के लिए प्रस्तुत कर सकता है।

🔶 जो पारिवारिक उत्तरदायित्वों से निवृत्त हो चुके हैं, जिन पर कुटुंबियों की जिम्मेदारियाँ सहज ही हलकी हैं, जिनके पास संचित पूँजी के सहारे निर्वाह क्रम चलाते रहने के साधन हैं, उन्हें तो इस सौभाग्य के सहारे परिपूर्ण समयदान करने की ही बात सोचनी चाहिए। वानप्रस्थों की, परिब्राजकों की, पुण्य परंपरा की अवधारणा है ही ऐसे सौभाग्यशालियों के लिए। जो जिस भी परिस्थिति में हो समयदान की बात सोचे और उस अनुदान को नवजागरण के पुण्य प्रयोजन में अर्पित करे।

🔷 प्रतिभा, कुशलता, विशिष्टता से संपन्न कई विभूतिवान व्यक्ति इस स्थिति में होते हैं कि अनिवार्य प्रयोजनों में संलग्न रहने के साथ-साथ ही इतना कुछ कर या करा सकते हैं कि उतने से भी बहुत कुछ बन पड़ना संभव हो सके। उच्च पदासीन, यशस्वी, धनी-मानी अपने प्रभाव का उपयोग करके भी समय की माँग पूरी करने में अपनी विशिष्ट भूमिका निभा सकते हैं। विभूतिवानों का सहयोग भी अनेक बार कर्मवीर समयदानियों जितना ही प्रभावोत्पादक सिद्ध हो सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य               
📖 अखण्ड ज्योति, अगस्त 1979, पृष्ठ 56

👉 मन की विभिन्न भूमिकाएँ

🔷 संसार अपने आप में न निकृष्ट है, न उत्तम। सूक्ष्म दृष्टि से अवलोकन के पश्चात् हमें प्रतीत होता है कि यह वैसा ही है जैसी प्रतिकृति हमारे अंतर्जगत में विद्यमान है। हमारी दुनिया वैसी ही है, जैसा हमारा अन्तःकरण का स्वरूप। भलाई, बुराई, उत्तमता, निकृष्टता, भव्यता, कुरूपता, मन की ऊँची-नीची भूमिकाएँ मात्र हैं।

🔶 हमारे अपने हाथ में है कि चाहे ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ की भट्टी में भस्म होते रहें और अपना जीवन शूल मय बनावें अथवा सद्गुणों का समावेश कर अपने अन्तःकरण में शान्ति स्थापित करें।

🔷 यदि तुम क्रोध, माया, लोभ, ईर्ष्या, द्वेष अथवा अन्य नाशकारी विकार से उत्तेजित रहते हो और फिर इस बात की आशा रखते हो कि तुम्हारा स्वास्थ्य उत्तम रहे, तो तुम निश्चय ही असम्भव बात की आशा बाँधे बैठे हो। ऐसा कदापि संभव नहीं क्यों कि तुम तो निरन्तर अपने मन में व्याधि के बीज बो रहे हो। ऐसी अप्रिय मानसिक अवस्थाएं गन्दे नाले और कूड़े करकट के उस ढेर की तरह है जिसमें अनेक रोगों के कीटाणु फैल रहे हों। मनो जनित कुत्सित कल्पनाओं, क्रिया-प्रतिक्रिया, आघात प्रतिघात से भूतप्रेत के अन्ध विश्वास आज भी हमारे आन्तरिक जगत में द्वन्द्व उत्पन्न करते हैं। विवेक बुद्धि परास्त हो जाती है। अतः अव्यक्त (nconscious mind) की उद्भूत अनिष्ट कल्पनाएँ भ्रम या प्रमाद के रूप में व्यक्त होती हैं और भिन्न-भिन्न व्यथाओं का कारण बनती हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति-फर. 1946 पृष्ठ 4
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1946/February/v1.4

गुरुवार, 12 जुलाई 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 July 2018


👉 आज का सद्चिंतन 12 July 2018


👉 Who Do You Worship – The Divine or the Devil?

🔶 Man misidentifies himself as the physical body. Although he has herd something like ‘he has a soul that is different from the body’ but does not quite believe it or is not even able to imagine it. If most of us were not living under this illusion about unity of the self with the living body, this land (India) of great rishis would not have become home to vast spread corruption and confusion. It was this sacred land where Lord Krishna had preached Bhagvad Gita to Arjuna and reminded him that he is not the body. As we have totally forgotten this fact and never bother to know about our own “self”, how could we know the Omnipresent Self, the God?

🔷 We are living in a state of utter ignorance and darkness. Whatever suits our deluded convictions or convinces our selfish intellect, that has become the definition of God for us. It is like considering a rope to be a snake because of lack of light. Indeed the rope resembles the shape of a snake and both would look alike if kept at a dark place. But, as we all know they are not the same. It is only our illusion because of which we might confuse one with the other. It is a pity that this is what we the ‘intelligent beings’ have done today by regarding the devil as the divine.

🔶 Its time we awaken and ponder over our reality. We should attempt to realize that – the soul is sublime; it is not perceivable by the body or the materialistic means.

📖 Akhand Jyoti, May 1940

👉 Swadhyaya is an Essential Daily Ritual

🔶 Swadhyaya – the study of self in the light of the thoughts of elevated souls – is a principal means of ascent in human life. It augments knowledge, enlightens the mind and helps purifying the character and wakening the inner self. It is a kind of sadhana (devout endeavor) that ensures siddhi (supreme success). Swadhaya is necessary for preeminent progress and happiness in life. Adoption of this as an integral part of daily routine gradually sharpens the intellect, nurtures discerning thoughts and wisdom and illuminates the inner self. Therefore we must cultivate the habit of reading inspiring thoughts and works of great personalities and edifying scriptures and contemplate over what is read and also try disseminating it among others.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 स्वाध्याय एक अनिवार्य दैनिक कृत्य

🔶 मानव जीवन में सुख की वृद्धि करने के उपायों में स्वाध्याय एक प्रमुख उपाय है। स्वाध्याय से ज्ञान की वृद्धि होती है। मन में महानता, आचरण में पवित्रता और आत्मा में प्रकाश आता है। स्वाध्याय एक प्रकार की साधना है, जो अपने साधक को सिद्धि के द्वार तक पहुँचाती है। जीवन को सफल, उत्कृष्ट एवं पवित्र बनाने के लिए स्वाध्याय की बड़ी आवश्यकता है। प्रतिदिन नियम पूर्वक सद्ग्रंथों का अध्ययन करते रहने से बुद्धि तीव्र होती है, विवेक बढ़ता है और अंत:करण की शुद्धि होती है, अत: प्रतिदिन चिंतन-मनन के साथ स्वयं पढ़ें एवं दूसरों को पढ़ाने का प्रयास करें।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 कबीर दास जी के एक-एक दोहे हजार धर्मशास्त्रों पर भारी

🔶 बनारस की गलियों में घूमते नन्हें कबीर बचपन से ही एक तीखी दृष्टि रखते थे। वस्तुओं को देखने के उनके अपने नजरिए थे। उन्हें बचपन में ही आचार्य स्वामी के यहां शिक्षित होने का अवसर प्राप्त हुआ था। परंतु दिक्कत यह कि वे अन्य बच्चों की तरह नहीं थे। वे हर बात पर ना सिर्फ शंका किया करते थे, बल्कि बात-बात पर सवाल भी बहुत पूछा करते थे।

🔷 एक दिन ऐसा हुआ कि उनके गुरु के पिता का श्राद्ध था। श्राद्ध का अर्थ एक ऐसी परंपरा है जिसके तहत पंडितों को बुलाकर भरपेट भोजन कराया जाता है, ताकि जिस मृत रिश्तेदार का श्राद्ध मनाया जा रहा हो उस तक इन पंडितों को खिलाया जाने वाला भोजन पहुंच जाए। सो अपने मृत पिता तक भोजन पहुंचाने हेतु गुरु ने काफी पंडितों को भोजन पर बुलवाया। और इधर अपने शिष्यों को सुबह से ही तैयारियों में भी भिड़ा दिया। कबीर के जिम्मे दूध ले आने का कार्य आया।

🔶 गुरु की आज्ञा थी, कबीर एक बाल्टी लेकर दूध लाने निकल पड़े। पर जाने क्या हुआ कि सुबह के निकले कबीर दोपहर चढ़ते-चढ़ते भी वापस नहीं आए। इधर गुरु को बिना दूध के ही पंडितों का भोजन निपटाना पड़ा। यह तो ठीक पर कार्यक्रम निपटने के बाद गुरु को चिंता पकड़ी। वे अपने दो-चार शिष्यों के साथ बनारस की तंग गलियों में कबीर को खोजने निकल पड़े। जल्द ही उन्हें एक मरी हुई गाय के पास बाल्टी हाथ में लिए व सर पे हाथ रखकर बैठे नन्हें कबीर दिख गए। गुरु के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उन्होंने तत्क्षण जिज्ञासावश पूछा- यह यहां क्या कर रहे हो?

🔷 कबीर बड़ी मासूमियत से बोले- गाय के दूध देने का इंतजार कर रहा हूँ। इस पर गुरु बड़े लाड़ से कबीर का गाल सहलाते हुए बोले- अरे मेरे भोले, मरी गाय भी कहीं दूध देती है?

🔶 यह सुन कबीर बड़े नटखट अंदाज में बोले- जब आपके मृत पिता तक भोजन पहुंच सकता है तो मरी गाय भी दूध दे ही सकती है।

🔷 आचार्य स्वामी का तो पूरा नशा ही उतर गया। उन्होंने कबीर को गले लगा लिया। और तुरंत बोले- आज तुमने मेरी आंखें खोल दी। तू तो अभी से ही परमज्ञान की ओर एक बड़ा कदम बढ़ा चुका है।

🔶 खैर, कबीर ने तो कदम बढ़ा लिया पर हम और आप कब बढ़ाएंगे? यदि आप वाकई ज्ञान की ओर कदम बढ़ाना चाहते हैं तो बातों का अंधा अनुसरण करना बंद करें, और हर बात को अपनी भीतरी विवेक के तराजू पर तौलें। क्योंकि ज्ञानी होना व ज्ञान पाना आपका जन्मसिद्ध अधिकार है।

👉 इसी सन्दर्भ में परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी द्वारा लिखित साहित्य पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

🔷 मृतक भोज की क्या आवश्यकता?

http://literature.awgp.org/book/mritak_bhoj_kee_kya_aavashyakata/v1

🔶 मूढ़ मान्यताओं की भूलभुलैयों में भटकें नहीं

http://literature.awgp.org/book/moodha_manyataon_kee_bhoolabhulaiyon_men_bhataken_naheen/v1.37

👉 मन तथा शरीर का सम्बन्ध

🔶 मन का शरीर पर अटूट अविच्छिन्न एवं अकाट्य प्रभाव है और यह सब काल, सब स्थितियों तथा समस्त अवस्थाओं में समान रूप से रहता है। मानसिक जर्जरता, मानसिक अशान्ति, उद्वेग, आवेश, विकार, मन में उद्भूत अनिष्ट कल्पना, चिंतन की अकल्याणकारी मूर्ति, ईर्ष्या, द्वेष इत्यादि मन की विभिन्न भूमिकाओं का शरीर पर भयंकर प्रभाव पड़ता है। मनोविकार निरन्तर हमें नाच नचाया करते हैं, काम, क्रोध, इत्यादि मनुष्य के षट्रिपु हमें समूल नष्ट करने को प्रस्तुत रहते हैं। अनेक व्यक्ति सर्वत्र इनके मिथ्या प्रलोभनों में ग्रसित होकर अनेक स्नायु रोगों के शिकार बनते हैं।

🔷 शरीर में प्रत्येक प्रकार की अनुकूल अथवा प्रतिकूल अवस्था का निर्माण करने की सामर्थ्य मनुष्य के मन में अंतर्निहित है। मन के गर्भ भाग में जो कुटिल अथवा भव्य मनः संस्कार अंकित होते हैं, वही सिद्धान्त एवं निश्चय रूप धारण करके प्रतिमा रूप बन कर बाह्य जगत में प्रकट होते हैं और तद्रूप जीवन निर्माण करते हैं।

🔶 जो मनः स्थिति हमारे अन्तःकरण में वर्तमान है, उसी ने हमारी रूप रेखा का निर्माण किया है। यदि मनुष्य की आन्तरिक स्थिति तुच्छ एवं घृणित है, तो उसके पीछे दुःख तथा क्लेश इस प्रकार लगे हैं जैसे जीव के पीछे उसकी परछाहीं। मनुष्य अपने विचारों का फल है। बाह्य स्वरूप मन द्वारा विनिर्मित शरीर वह ढांचा (Mould) है, जिसमें वह निरन्तर अविच्छिन्न गति से निज शक्तियाँ संचारित किया करता है। आन्तरिक भावनाओं की प्रतिकृति मुख, अंग प्रत्यंगों, क्रियाओं, वार्तालाप, मूक चेष्टाओं, रहन-सहन, व्यवहार में क्षण-क्षण में परिलक्षित होती हैं। जिस प्रकार जिह्वा द्वारा उदर की गतिविधि जानी जाती है, उसी प्रकार मुखमण्डल आन्तरिक भावनाओं का प्रतिबिम्ब है।

🔷 मन की शरीर पर क्रिया एवं शरीर की मन पर प्रतिक्रिया निरन्तर होती रहती है। जैसी आपका मन, वैसा ही आपका शरीर, जैसा शरीर वैसा ही मन का स्वरूप। यदि शरीर में किसी प्रकार की पीड़ा है, तो मन भी क्लान्त, अस्वस्थ, एवं पीड़ित हो जाता है। वेदान्त में यह स्पष्ट किया गया है कि समस्त संसार की गतिविधि का निर्माण मन द्वारा ही हुआ है। जैसी हमारी भावनाएं, इच्छाएँ, वासनाएँ अथवा कल्पनाएँ हैं, तदनुसार ही हमें शरीर, अंग-प्रत्यंग, बनावट प्राप्त हुई है। मनुष्य के माता-पिता, परिस्थितियाँ, जन्म स्थान, आयु, स्वास्थ्य, विशेष प्रकार के छिन्न-भिन्न शरीर प्राप्त करना, स्वयं हमारे व्यक्तिगत (Personal) मानसिक संस्कारों पर निर्भर है। हमारा बाह्य जगत हमारे प्रसुप्त संस्कारों की प्रतिच्छाया मात्र है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति-फर. 1946 पृष्ठ 3
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1946/February/v1.3

बुधवार, 11 जुलाई 2018

👉 विचारो का प्रभाव

🔷 एक राजा हाथी पर बैठकर अपने राज्य का भ्रमण कर रहा था।अचानक वह एक दुकान के सामने रुका और अपने मंत्री से कहा- "मुझे नहीं पता क्यों, पर मैं इस दुकान के स्वामी को फाँसी देना चाहता हूँ।"

🔶 यह सुनकर मंत्री को बहुत दु:ख हुआ। लेकिन जब तक वह राजा से कोई कारण पूछता, तब तक राजा आगे बढ़ गया।

🔷 अगले दिन, मंत्री उस दुकानदार से मिलने के लिए एक साधारण नागरिक के वेष में उसकी दुकान पर पहुँचा। उसने दुकानदार से ऐसे ही पूछ लिया कि उसका व्यापार कैसा चल रहा है? दुकानदार चंदन की लकड़ी बेचता था। उसने बहुत दुखी होकर बताया कि मुश्किल से ही उसे कोई ग्राहक मिलता है। लोग उसकी दुकान पर आते हैं, चंदन को सूँघते हैं और चले जाते हैं। वे चंदन कि गुणवत्ता की प्रशंसा भी करते हैं, पर ख़रीदते कुछ नहीं। अब उसकी आशा केवल इस बात पर टिकी है कि राजा जल्दी ही मर जाएगा। उसकी अन्त्येष्टि के लिए बड़ी मात्रा में चंदन की लकड़ी खरीदी जाएगी। वह आसपास अकेला चंदन की लकड़ी का दुकानदार था, इसलिए उसे पक्का विश्वास था कि राजा के मरने पर उसके दिन बदलेंगे।

🔶 अब मंत्री की समझ में आ गया कि राजा उसकी दुकान के सामने क्यों रुका था और क्यों दुकानदार को मार डालने की इच्छा व्यक्त की थी। शायद दुकानदार के नकारात्मक विचारों की तरंगों ने राजा पर वैसा प्रभाव डाला था, जिसने उसके बदले में दुकानदार के प्रति अपने अन्दर उसी तरह के नकारात्मक विचारों का अनुभव किया था।

🔷 बुद्धिमान मंत्री ने इस विषय पर कुछ क्षण तक विचार किया। फिर उसने अपनी पहचान और पिछले दिन की घटना बताये बिना कुछ चन्दन की लकड़ी ख़रीदने की इच्छा व्यक्त की। दुकानदार बहुत खुश हुआ। उसने चंदन को अच्छी तरह कागज में लपेटकर मंत्री को दे दिया।

🔶 जब मंत्री महल में लौटा तो वह सीधा दरबार में गया जहाँ राजा बैठा हुआ था और सूचना दी कि चंदन की लकड़ी के दुकानदार ने उसे एक भेंट भेजी है। राजा को आश्चर्य हुआ। जब उसने बंडल को खोला तो उसमें सुनहरे रंग के श्रेष्ठ चंदन की लकड़ी और उसकी सुगंध को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। प्रसन्न होकर उसने चंदन के व्यापारी के लिए कुछ सोने के सिक्के भिजवा दिये। राजा को यह सोचकर अपने हृदय में बहुत खेद हुआ कि उसे दुकानदार को मारने का अवांछित विचार आया था।

🔷 जब दुकानदार को राजा से सोने के सिक्के प्राप्त हुए, तो वह भी आश्चर्यचकित हो गया। वह राजा के गुण गाने लगा जिसने सोने के सिक्के भेजकर उसे ग़रीबी के अभिशाप से बचा लिया था। कुछ समय बाद उसे अपने उन कलुषित विचारों की याद आयी जो वह राजा के प्रति सोचा करता था। उसे अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए ऐसे नकारात्मक विचार करने पर बहुत पश्चात्ताप हुआ।

🔶 यदि हम दूसरे व्यक्तियों के प्रति अच्छे और दयालु विचार रखेंगे, तो वे सकारात्मक विचार हमारे पास अनुकूल रूप में ही लौटेंगे। लेकिन यदि हम बुरे विचारों को पालेंगे, तो वे विचार हमारे पास उसी रूप में लौटेंगे।

🔷 "कर्म क्या है?"

🔶 "हमारे शब्द, हमारे कार्य, हमारी भावनायें, हमारी गतिविधियाँ.।"

🔷 " हमारे विचार ही हमारे कर्म हैं।"

👉 आज का सद्चिंतन 11 July 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 July 2018