शनिवार, 27 अगस्त 2016

👉 समाधि के सोपान (भाग 25) (In The Hours Of Meditation)



🔴 जब आत्मा अन्तरतम की शांति मे उठी तब उस वाणी ने कहा, अच्छाई, पाप तथा दोष से अधिक गहरी है। विश्व का ताना बाना, उसका सारतत्व उच्छाई ही है। असीम अतुलनीय अच्छाई। जहाँ ईश्वर है वहाँ अशुभ मिट जाता है। अशुभ आभास मात्र है, सत्यं नहीं। आत्मसमुद्र की गहराइयों में ज्ञान और सत्य की अटल चट्टानें हैं। इन चट्टानों के सामने सभी भूल, सभी अंधकार तथा सभी दोष निश्चय नष्ट हो जाते हैं। यह ठीक है कि सतह पर इच्छाओं की आँधी के तुमुल शब्द हो सकते हैं उत्तेजित वासनाओं के तूफान हो सकते है, दोष तथा अंधकार की घड़ियाँ हो सकती हैं, किन्तु अनुभूति!

🔵 अनुभूति का एक क्षण! सर्व शक्तिमान है। वह सभी प्रकार के दोषों को दूर कर देता है। वह सूर्य के प्रकाश के समान है। वह सभी अंधकार को छिन्न भिन्न कर देता है। अत: अंधकार के क्षणों में भी इस ज्योति का स्मरण करो। यहाँ तक कि दोष होने पर भी प्रभु का नाम स्मरण करो! प्रभु तुम्हारी प्रार्थना सुनेंगे । वे तुम्हारी सहायता के लिए दूत भेजेंगे। आत्मा की शक्ति से बड़ी और कोई शक्ति नहीं है। हमारे अन्तरतम में एकीभूत दिव्यता का अनंत प्रवाह है। उस दिव्यता की एक झलक से ही यह विविधताबोध जो दोषों तथा अज्ञान का निवास स्थान है तिरोहित हो जायेगा। मौलिक रूप में तुम मुक्त हो, शुद्ध हो, दिव्य हो। विश्व की सभी शक्तियाँ तुम्हारे अधीन हैं।

🔴 जब तुम मुक्त ही तो भी क्या तुम मुक्ति के लिए संघर्ष करोगे ? तुम्हारा लक्ष्य आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करना होना चाहिये। उस सौंदर्य शिखा की एक किरण मात्र का दर्शन दोष की सूक्ष्मतम रेखा को भी नष्ट कर देता है, मिटा देता है। जान लो कि शक्ति तथा शाश्वत ज्योति के ही बने हुए हो। तुम्हारा जीवन न इहलोक में है न परलोक में, वह तो अनंत में अवस्थित है। गहरे अर्थ में यह पाप की धारणा अज्ञान ही तो है। यह एक स्वप्न है। पाप का स्वभाव दुर्बलता है। तुम शक्तिशाली बनो। वह, जो तुम हो, उसकी एक झलक और तुम वही ज्योति: स्वरूप सर्वशक्तिमान हो।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 आत्मचिंतन के क्षण 28 AUG 2016


🔴 इस तथ्य को हमें हजार बार समझना चाहिए कि मनुष्य हाड़-मांस का पुतला नहीं है। वह एक चेतना है। भूख चेतना की भी होती है। विषाक्त आहार से शरीर मर जाता है और भ्रष्ट चिंतन से आत्मा की दुर्गति होती है। प्रकाश न होगा तो अंधकार का साम्राज्य ही होना है। सद्ज्ञान का आलोक बुझ जाएगा तो अनाचार की व्यापकता बढ़ेगी ही। भ्रष्ट चिंतन और दुष्ट कर्तृत्व का परिणाम व्यक्ति और समाज की भयानक दुर्दशा के रूप में सामने आ सकता है।

🔵 जो व्यक्ति कठिनाइयों या प्रतिकूलताओं से घबड़ाकर हिम्मत हार बैठा, वह हार गया और जिसने उनसे समझौता कर लिया, वह सफलता की मंजिल पर पहुँच गया। इस प्रकार हार बैठने, असफल होने या विजयश्री और सफलता का वरण करने के लिए और कोई नहीं, मनुष्य स्वयं ही उत्तरदायी है। चुनाव उसी के हाथ में है कि वह सफलता को चुने या विफलता को। वह चाहे तो कठिनाइयों को वरदान बना सकता है और चाहे तो अभिशाप भी।

🔴 विनोद वृत्ति जहाँ स्वस्थ चित्त की द्योतक है, वहीं बात-बात पर व्यंग्य करने की प्रवृत्ति हीन भावना एवं रुग्ण मनःस्थिति का परिणाम है। हास-परिहास स्वस्थ होता है, किन्तु दूसरों का उपहास सदा कलहकारी एवं हानिकर होता है। खिल्ली उड़ाना तथा विनोद करना दो सर्वथा भिन्न प्रवृत्तियाँ हैं। खिल्ली उड़ाने वाली प्रवृत्ति प्रारंभ में भले ही रोचक  प्रतीत हो, किन्तु उसका अंत सदा आपसी दरार, तनाव और कटुता में होता है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

आज का सद्चिंतन 28 Aug 2016




👉 समाधि के सोपान (भाग 24) (In The Hours Of Meditation)


🔴 उस वाणी ने और भी कहा-

🔵 आत्मा में जीवात्मा से भिन्न बोध नहीं है। वह असीम शाश्वत तथा पूर्ण मुक्त है। वह विविधता रहित ऐक्य है। आत्मा के राज्य में मैं, तुम, वह आदि भेद के लिए कोई स्थान नहीं है। वह तत् मात्र है। ओम् तत् सत्। अतुलनीय, अनिर्वचनीय। उस आत्मा को कौन जानता है! वास्तव में वही तुम्हें जानता है। असीम में समाहित हो जाने की आकांक्षा, मुक्ति की इच्छा ही वास्तविक प्रेम है। उस महत् शांति की इच्छा ही सच्चा प्रेम है।

🔴 यह विचलित नहीं होगा। यह शांति पूर्कक किन्तु समग्ररूप में बढ़ता है। यह अजेय है। यह लक्ष्य पर पहुँच कर ही रहता है। जिसमें सभी देवी देवता विलीन हो जाते हैं जहाँ ध्वनि समाप्त हो जाती है, जिसमें सभी रूप समा जाते हैं जहाँ विचार अविचा रहो जाते हैं जहाँ जन्म और मृत्यु का अस्तित्व नहीं रहता उसे ही आत्मा जानो। जहाँ सघर्ष समाप्त हो जाते हैं जहाँ अनुभूति है, जहाँ सभी सापेक्ष विचार मिट जाते हैं जहाँ सौंदर्य, पवित्रता, पाप, आतंक, शुभ, अशुभ सभी का भेद समाप्त हो जाता है, जहाँ ध्यान में मन सर्वज्ञ हो जाता है, उसे ही आत्मा जानो।

🔵 वत्स ! सभी ऊँचाइयों के परे एक ऊँचाई है, महान देवताओं के परे भी एक दिव्यता है। अविनाशी ही सब का आधार है। सभी तिरोहित हो जाते हैं। सभी मिट जाते हैं, केवल आत्मा ही सर्वदा रहता है।

🔴 और जब वह वाणी शांत हुई तब मुझे ऐसा अनुभव हुआ कि मेरी आत्मा विशालता में उठ गई। तब मैं नहीं था वहाँ केवल ज्योति थी! ज्योति!!

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 आत्मचिंतन के क्षण 27 AUG 2016


🔴 जो मितव्ययी हैं, उन्हें संसार की निरर्थक लिप्साएँ लोलुप बनाकर व्यग्र नहीं कर पातीं।  वे अपनी आर्थिक परिधि में पाँव पसारे निश्चिन्त सोया करते हैं। उन्हें केवल उतना ही चाहिए जितना उनके पास होता है। संसार की बाकी चीजों से न उन्हें कोई लगाव होता है और न वास्ता। ऐसे निश्चिन्त एवं निर्लिप्त मितव्ययी के सिवाय आज की अर्थप्रधान दुनिया में दूसरा सुखी नहीं रह सकता।

🔵 आज अनेकों ऐसी पुरानी परम्पराएँ  एवं विचारधाराएँ हैं, जिनको त्याग देने से अतुलनीय हानि हो सकती है। साथ हीे अनेकों ऐसी नवीनताएँ हैं, जिनको अपनाए बिना मनुष्य का एक कदम भी बढ़ सकना असंभव हो जायेगा। नवीनता एवं प्राचीनता के संग्रह एवं त्याग में कोई दुराग्रह नहीं करना चाहिए, बल्कि किसी बात को विवेक एवं अनुभव के आधार पर अपनाना अथवा छोड़ना चाहिए।

🔴 अपनी वर्तमान परिस्थितियों से आगे बढ़ना, आज से बढ़कर कल पर अधिकार करना, अच्छाई को सिर पर और बुराई को पैरों तले दबाकर चलने का नाम जीवन है। कुकर्म करने तथा बुराई को प्रश्रय देने वाला मनुष्य जीवित दीखता हुआ भी मृत ही है, क्योंकि कुकर्म और कुविचार मृत्यु के प्रतिनिधि हैं। इनको आश्रय देने वाला मृतक के सिवाय और कौन हो सकता है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आस्था

यात्रियों से खचाखच भरी एक बस अपने गंतव्य की ओर जा रही थी। अचानक मौसम बहुत खराब हो गया।तेज आंधी और बारिश से चारों ओर अँधेरा सा छा गया। ड्...