मंगलवार, 12 मई 2020

👉 Icchapurti Vriksh इच्छापूर्ति वॄक्ष

एक घने जंगल में एक इच्छा पूर्ति वृक्ष था, उसके नीचे बैठ कर कोई भी इच्छा करने से वह तुरंत पूरी हो जाती थी। यह बात बहुत कम लोग जानते थे क्योंकि उस घने जंगल में जाने की कोई हिम्मत ही नहीं करता था।

एक बार संयोग से एक थका हुआ व्यापारी उस वृक्ष के नीचे आराम करने के लिए बैठ गया उसे पता ही नहीं चला कि कब उसकी नींद लग गयी। जागते ही उसे बहुत भूख लगी, उसने आस पास देखकर सोचा- 'काश कुछ खाने को मिल जाए!' तत्काल स्वादिष्ट पकवानों से भरी थाली हवा में तैरती हुई उसके सामने आ गई। व्यापारी ने भरपेट खाना खाया और भूख शांत होने के बाद सोचने लगा.. काश कुछ पीने को मिल जाए.. तत्काल उसके सामने हवा में तैरते हुए अनेक शरबत आ गए।
 
शरबत पीने के बाद वह आराम से बैठ कर सोचने लगा-  कहीं मैं सपना तो नहीं देख रहा हूँ। हवा में से खाना पानी प्रकट होते पहले कभी नहीं देखा न ही सुना..जरूर इस पेड़ पर कोई भूत रहता है जो मुझे खिला पिला कर बाद में मुझे खा लेगा ऐसा सोचते ही तत्काल उसके सामने एक भूत आया और उसे खा गया।

इस प्रसंग से आप यह सीख सकते है कि हमारा मस्तिष्क ही इच्छापूर्ति वृक्ष है आप जिस चीज की प्रबल कामना करेंगे  वह आपको अवश्य मिलेगी।

अधिकांश लोगों को जीवन में बुरी चीजें इसलिए मिलती हैं.....

क्योंकि वे बुरी चीजों की ही कामना करते हैं।

इंसान ज्यादातर समय सोचता है- कहीं बारिश में भीगने से मै बीमार न हों जाँऊ.. और वह बीमार हो जाता हैं..!
                    
इंसान सोचता है - मेरी किस्मत ही खराब है .. और उसकी किस्मत सचमुच खराब हो जाती हैं ..!
        
इस तरह आप देखेंगे कि आपका अवचेतन मन इच्छापूर्ति वृक्ष की तरह आपकी इच्छाओं को ईमानदारी से पूर्ण करता है..! इसलिए आपको अपने मस्तिष्क में विचारों को सावधानी से प्रवेश करने की अनुमति देनी चाहिए।

यदि गलत विचार अंदर आ जाएगे तो गलत परिणाम मिलेंगे। विचारों पर काबू रखना ही अपने जीवन पर काबू करने का रहस्य है..!

आपके विचारों से ही आपका जीवन या तो स्वर्ग बनता है या नरक उनकी बदौलत ही आपका जीवन सुखमय या दुख:मय बनता है।

विचार जादूगर की तरह होते है, जिन्हें बदलकर आप अपना जीवन बदल सकते है..!
        
इसलिये सदा सकारात्मक सोच रखें।

हम बदलेंगे, युग बदलेगा

👉 Sankhya Nahi Samrthta संख्या नहीं समर्थता चाहिए

जिनकी आस्था दुर्बल है, उनके लिए तिल भर बोझ भी पर्वत जैसा भारी पड़ेगा। ऐसे लोगों से किस प्रकार आशा करें कि वे हमारे प्रयोजन में दो-चार कदम चलने का साथ देंगे जो हमारे जीवन का एकमात्र लक्ष्य है। व्यक्ति और समाज की उत्कृष्टता—साँस्कृतिक एवं भौतिक पुनरुत्थान-भावनात्मक नव निर्माण आज के युग की महानतम माँग है। प्रबुद्ध व्यक्तियों के लिए इन उत्तरदायित्वों से विमुख होना या इनकार कर सकना अशक्य है। हमें स्वयं इसी दिशा में जिस सत्ता ने बलपूर्वक लगाया है, वह अन्यान्य भावनाशील लोगों के अन्तःकरण में भी वैसी ही प्रेरणा कर रही है और वे सच्चे आध्यात्मिक व्यक्तियों की तरह इसके लिए कटिबद्ध हो रहे हैं। पर जिन्हें यह सब कुछ व्यर्थ दीखता है, जिन्हें इतने महत्वपूर्ण कार्य में कोई आकर्षण, कोई उत्साह, कोई साहस उत्पन्न नहीं हो रहा है, उनके सम्बन्ध में हमें निराशा हो सकती है।

अपनी तपश्चरण और ईमानदारी में कहीं कोई कमी ही होगी जिसके कारण जिन व्यक्तियों के साथ पिछले ढेरों वर्षों से सम्बन्ध बनाया, उनमें कोई आध्यात्मिक साहस उत्पन्न न हो सका। वह भजन किस काम का, जिसके फलस्वरूप आत्मनिर्माण एवं परमार्थ के लिए उत्साह उत्पन्न न हो । किन्हीं को हमने भजन में लगा भी दिया है पर उनमें भजन का प्रभाव बताने वाले उपरोक्त दो लक्षण उत्पन्न न हुए हों तो हम कैसे माने कि उन्हें सार्थक भजन करने की प्रक्रिया समझाई जा सकी? हमारा परिवार संगठन तभी सफल कहा जा सकता था जब उसमें ये सम्मिलित व्यक्ति उत्कृष्टता और आदर्शवादिता की कसौटी पर खरे सिद्ध होते चलते। अन्यथा संख्या वृद्धि की विडम्बना से झूँठा मन बहलाव करने से क्या कुछ बनेगा?

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, अक्टूबर 1966 पृष्ठ 47

👉 Nischayatmak Swabhav निश्चयात्मक स्वभाव बनायें

बिजली के बारे में जानकार व्यक्ति जानते हैं कि ऋण (निगेटिव) और  धन (पॉजीटिव) दो प्रकार की धाराएँ मिलकर स्फुरण उत्पन्न करती हैं। मनुष्य शरीर में यह दोनों प्रकार की धाराएँ विद्यमान् हैं और उन्हीं के आधार पर जीवन के सारे कायों का संचालन होता है।
  
किसी मनुष्य को देखकर, उसके गुणों को जानकर हम आसानी से मालूम कर सकते हैं कि उसमें किस धारा का बाहुल्य है। निगेटिव को अनिश्चयात्मक और पॉजिटिव को निश्चयात्मक कहा जाता है। बाह्य प्रभावों से तुरन्त प्रभावित हो जाना और हर प्रकार की हवा के प्रवाह में बहने लगना यह अनिश्चयात्मक स्वभाव हुआ और अपने निश्चय को दृढ़ रखना, बिना विचारे किसी वाचाल की बातों में न फँसना, विपत्ति बाधाओं के होते हुए भी अपने पथ पर दृढ़ बने रहना, यह निश्चयात्मक स्वभाव कहा जाता है।
  
मनुष्यों के शरीरों की बनावट एक सी दिखाई देने पर भी उनमें छोटे बड़े का जो असाधारण अन्तर देखा जाता है, उसका कारण और कुछ नहीं, केवल इन धाराओं की भिन्नता और उनकी मात्रा की न्यूनाधिकता है। जिस व्यक्ति का निश्चयात्मक स्वभाव है, जिसके अन्दर धन विद्युत् का बाहुल्य है, वह हर प्रकार की कठिनाइयों का मुकाबिला करता हुआ, सुख-दुःख को बराबर समझता हुआ, कर्त्तव्य पथ पर आरूढ़ रहेगा और मनको गिरने न देगा, किन्तु जो ऋण विद्युत् वाला है, उस अनिश्चित स्वभाव के मनुष्य को अपना  छोटा सा कद पहाड़ के समान दिखाई देगा, और जरा सी विपत्ति आने पर किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो जायगा। आज एक इरादा किया है, कल उसे बदल देगा और तीसरे दिन नया प्रोग्राम बना लेगा।
  
हर प्रकार की उन्नति और सफलता एवं पतन और विफलता के बीज इन्हीं ऋण-धन स्वभावों में निहित हैं। क्या व्यापार, क्या नौकरी, क्या स्वकीय धर्म सभी कामों में उत्साही पुुरुष संतोषजनक फल प्राप्त करेगा। किन्तु निराशा और निर्बलता के चंगुल में फँसा हुआ व्यक्ति प्राप्त की हुई सफलताओं को भी गँवा देगा। इसीलिए जो मनुष्य अपने जीवन को तेजस्वी और प्रतिभाशाली बनाना चाहते हैं, उनके लिए आवश्यक है कि अपने अन्दर धन विद्युत् की मात्रा में वृद्धि करें, इच्छा शक्ति को बढ़ायें।
  
बीमारी से बचने और उसे जल्द अच्छा कर लेने में भी यही नियम काम करता है। जिन्हें आत्म-विश्वास है और इच्छा शक्ति को बलवान् बनाये हुए हैं वे अपनी मानसिक दृढ़ता के  द्वारा ही छोटे मोटे रोगों को मार भगायेंगे और बीमारी से बचे रहेंगे। कदाचित् बीमार भी पड़े, तो बहुत जल्द अच्छे हो जायेंगे, जबकि निराशावादी मामूली बीमारी को अपने आप इतनी बढ़ा लेते हैं कि वही प्राण घातक तक बन जाती है।
  
स्वभाव की निर्बलता को दूर करने का सबसे उत्तम उपाय है- ईश्वर प्रार्थना करना। प्रार्थना हृदय के अन्तस्थल से होनी चाहिए, क्योंकि अदृश्य जगत् में से उपयोगी तत्त्वों को खींचने की चुम्बक शक्ति उसी स्थान में है। सच्चे हृदय से, पूर्ण मनोयोग के साथ की गयी प्रार्थना कभी निष्फल नहीं जा सकती, उसका फल अवश्य ही मिलेगा। प्रार्थना की वैज्ञानिक विवेचना यह है कि जिस वस्तु की हमें आवश्यकता है उसे अदृश्य भण्डार से प्राप्त करना। प्रभु का अक्षय भण्डार अपने पुत्रों के लिए सदैव खुला हुआ है, उसमें से हर कोई अपनी इच्छित वस्तु मनमानी मात्रा में ले सकता है, बशर्ते कि वह लेना चाहे और लेने के लिए प्रयत्न करे। इस चाहने और प्रयत्न करने का नाम ही प्रार्थना है।
  
तुम्हें ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि- ‘प्रभो! हमें ऐसी शक्ति दीजिए, जिसके द्वारा सत्य का पालन और पाप का संहार कर सकें। आप सच्चिदानन्द हैं, हमें भी अपने समान बनाइये, जिससे अपना और दूसरों का कल्याण कर सकें।’ हमें अपनी त्रुटियों को हटाने और सर्वतोमुखी उन्नति प्राप्त करने के लिए प्रार्थना को अपनाना चाहिए।     जिन्हें निश्चयात्मक स्वभाव प्राप्त करने की इच्छा है, उन्हें चाहिए कि निष्ठापूर्वक ईश्वर की प्रार्थना करते रहें। विशुद्ध भाव से की हुई प्रार्थना इच्छित फल देने की परिपूर्ण योग्यता रखती है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Embrace Forgiveness

Fire burns everything that comes into its contact. But the heat of anger of a person burns only himself. It you hit the earth by your hand; it’s only your hand that will suffer the pains. Your annoyance or irritation upon someone might disturb or hurt him, but it will certainly and firstly do more harm to you. Even if you feel justified in taking revenge against someone’s misdeeds and even if you are mightier and capable of retaliating, you should better forgive. Because, your anger and arrogance would be worse (for you also) than whatever wrong one might have done (to you). As you might have experienced on several occasions, if one controls the wrath and maintains mental stability, most disputes or problems could be resolved peacefully and give you the content of mind, which you are dying for.

So what if you take revenge against someone’s wrong against you? Every animal has this beastly instinct. Even a tiny ant can do that. Greater is the one who can forgive his enemies. Why don’t you learn, something form the earth? You dig it, plough it, but in return, it blesses you with crops, water, minerals and what not! Look at the piece of sugarcane! You cut it, press it, chew it, but it reacts by filling your mouth with sweet juice.

Those who have harmed you or committed crime against you are coward, weak, ignorant, because only those having a dormant conscience can do so. Why should you belittle yourself by responding back at their level? It does not suit an intrepid warrior to use weapons against the blinds or the slept ones. Your act of revenge might sometimes, give temporary ‘satisfaction’ to your ego,
but the joy induced by your act of forgiving would last for long…

📖 Akhand Jyoti, Jan. 1943