पारलौकिक जीवन की तैयारी में निर्मोह, निर्लिप्तता अथवा अनासक्ति की साधना भी परमावश्यक है। इस असार संसार के माया मोह लेकर जाने वाले उस पार के अपार जीवन में बड़ी सघन यातना के भागीदार बनते है को माया मोह के कारण रो-रोकर प्राण छोड़ते और तड़प तड़प कर संसार से विदा होते है, वे वहाँ भी अपनी अस अन्तिम स्थिति के अनुसार वैसे ही रो रो और तड़प तड़प कर जीवन बितायेगा। मनुष्य की अतिमानसिक स्थिति इस बात का स्पष्ट विज्ञापन है कि उसे उस पारलौकिक जीवन में किस भोग का भागी बनना होगा। यदि वह निर्लिप्तावस्था में हँसता खेलता हुआ गया, तब तो समझना चाहिये कि वहाँ भी हँसता खेलता ही रहेगा और यदि रोता सिसकता हुआ, विदा हुआ तो वहाँ भी रोता सिसकता ही रहेगा। इसमें दो सम्भावनायें नहीं हो सकती।
इह जीवन के दुःख अन्त का सबसे बड़ा और अगाध कारण आसक्ति ही है, आसक्ति के कारण ही सम्बन्धियों के बिछुड़ने का घेरा पड़ता है। आसक्ति के कारण ही थोड़ी सी असफलता निराशा की घटाये घेर लेती है। आसक्ति के कारण ही जरा सी उपेक्षा प्रतिहिंसा की आग जला देती है और आसक्ति के कारण ही धन वैभव के लिए पाप कर्मों में संलग्न हो जाते है। अस्तु आसक्ति ही को सारे दुःखों का मूल कारण मानना और उससे छूटने का उपाय करना चाहिये।
आसक्ति बड़ा भयंकर रोग है, फिर चाहे वह पुत्र-पत्नी के प्रति हो, धन-दौलत के प्रति हो, सुहृद सहचरों के प्रति हो देह अथवा अभिरुचियों के प्रति हो। इस रोग से बच कर ही मनुष्य एक निरामय एवं निर्भय जिन्दगी जी सकता है और निश्शंक अनत अपना सकता है।
जिस भय के कारण लोग कायर-कुचाल और कापुरुष बन जाते है, उसकी जननी आसक्ति ही है देहासक्ति के कारण ही लोग इस भय से उसके रंजन, भंजन में लगे रहते है कि कहीं यह बूढ़ी न हो जाये, कहीं इसकी शक्ति न चली जाये, कहीं भोग वासना के अयोग्य न हो जाये। इसी भय के कारण ही उसे विधि और पट-परिधानों की पूजा पगार चढ़ाते रहते है। वे पता नहीं, यह क्यों नहीं सोच पाते कि यह नश्वर मिट्टी एक दिन मिट ही जानी है। इस पर कितना ही चन्दन बदन क्यों न चढ़ाया जाये, कितनी ही मनौती और भिन्न क्यों न की जाये समय पाकर यह बूढ़ी तथा कुरूप हो ही जायेगी। आवश्यकता से अधिक शरीर को मान्यता देने का कारण यह देहासक्ति ही है। इस निःसार देहासक्ति के कारण मनुष्य न तो दृढ़ता पूर्वक साधन कर पाता है और न नियम, संयम का निर्वाह। अधिक साधने अथवा बाल खींचने से कहीं यह निर्बल न हो जाये-अधिक संयम, नियमों से इसको कष्ट होगा। परमार्थ पथ पर डाल देने से इसके भोग विलास के अधिकार छिन जायेंगे आदि आदि न जाने कितनी कल्पनायें मनुष्य को देहारोधक बना देती है।
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1969
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