मंगलवार, 25 फ़रवरी 2020

I Will Use You, I Will Not Let You Sit Idle | Pt Shriram Sharma Acharya



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👉 बुद्धिमत्ता और मूर्खता की कसौटी

बुद्धिमत्ता की निशानी यह मानी जाती रही है कि उपार्जन बढ़ाया जाय—अपव्यय रोक जाय और संग्रहित बचत के वैभव से अपने वर्चस्व और आनन्द को बढ़ाया जाय। संसार के हर क्षेत्र में इसी कसौटी पर किसी को बुद्धिमान ठहराया जाता है।

मानव-जीवन की सफलता का लेखा-जोखा लेते हुए भी इसी कसौटी को अपनाया जाना चाहिए। जीवन-व्यवसाय में सद्भावनाओं की—सत्प्रवृत्तियों की पूँजी कितनी मात्रा में संचित की गई? सद्विचारों का, सद्गुणों का, सत्कर्मों का वैभव कितना कमाया गया? इस दृष्टि से अपनी उपलब्धियों को परखा, नापा जाना चाहिए। लगता हो कि व्यक्तित्व को समृद्ध बनाने वाली इन विभूतियों की संपन्नता बढ़ी है तो निश्चय ही बुद्धिमत्ता की एक परीक्षा में अपने को उत्तीर्ण हुआ समझा जाना चाहिए।

समय, श्रम, धन, वर्चस्व, चिन्तन मानव-जीवन की बहुमूल्य सम्पदाऐं हैं। इन्हें साहस और पुरुषार्थ पूर्वक सत्प्रयोजन में लगाने की तत्परता बुद्धिमत्ता की दूसरी कसौटी है। जिनने इन ईश्वर-प्रदत्त बहुमूल्य अनुदानों को पेट-प्रजनन में-विलास और अहंकार में खर्च कर डाला, समझना चाहिए वे बहुमूल्य रत्नों के बदले काँच-पत्थर खरीदने वाले उपहासास्पद मनःस्थिति के बाल-बुद्धि लोग हैं।

वस्तु का सही मूल्यांकन न कर सकने वाले और उपलब्धियों के सदुपयोग में प्रमाद बरतने वाले मूर्ख ही कहे जायेंगे। जीवन-क्षेत्र में हमारी सफलता-असफलता का लेखा-जोखा प्रस्तुत करते समय यह देखना चाहिए कि कहीं दूरदर्शिता के अभाव से हम सौभाग्य को दुर्भाग्य में तो नहीं बदल रहे हैं? जीवन बहुमूल्य सम्पदा है। यह अनुपम और अद्भुत सौभाग्य है। इस सुअवसर का समुचित लाभ उठाने के सम्बन्ध में हम दूरदर्शिता का परिचय दे, इसी में हमारी सच्ची बुद्धिमत्ता मानी जा सकती हैं।

अखण्ड ज्योति फरवरी 1974 पृष्ठ 1

👉 आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग (अन्तिम भाग)

अधिकाँश साधक कुछ सेवा के बाद ही शीघ्र ही ईश्वर प्राप्ति के लिये अधीर हो जाते हैं यह निष्काम सेवा या कर्मयोग का लक्षण नहीं, कर्मयोगी वे हैं जो नम्रता तथा आत्मभाव से मनुष्यों की सेवा करते हैं। वही वास्तव में अखिल विश्व के नायक बन जाते हैं। सब लोग उनकी बड़ाई तथा आदर करते हैं। जितना ही आत्मभाव से सेवा करने जायें आप उतनी ही विशेष शक्ति, पौरुष, तथा योग्यता प्राप्त करेंगे। आप इसका अभ्यास करके ही स्वयं अनुभव प्राप्त करें।

जब दूसरों की भलाई करने का भाग मनुष्य का एक अंग ही बन जाता है, तब रेचक मात्र ही किसी प्रकार की कामना नहीं रह जाया करती है। उनको दूसरों की सेवा तथा भलाई करने से ही अत्यन्त आनन्द का अनुभव हुआ करता है। दृढ़ निष्काम सेवा करने से एक विचित्र प्रकार की प्रसन्नता तथा आनन्द हुआ करता है। उनको निष्काम तथा निस्वार्थ कर्म करने से आन्तरिक आध्यात्मिक शक्ति और बल होता है।

आप दूसरों की सेवा करते समय बीज या निराशा, विरक्ति तथा उदासी के भावों को कभी मन में भी न लाया करें। सेवा में ही आनन्दित होकर सेवा किया करें। दूसरों के सेवा करने के लिए सदा प्रस्तुत रहा करें। सेवा करने के अवसर को ढूँढ़ा करें। एक भी अवसर न चूके। सेवा करने का अवसर स्वयं बना दिया करें।

कर्मयोग के अभ्यास में किया गया परिश्रम कभी निष्फल नहीं होता। यह असाध्य भी नहीं है इसमें अपराध तो होता ही नहीं उल्टे इसका थोड़ा भी अभ्यास करते रहने से जन्म-मरण रूप दुःख तथा उसकी सहयोगिनी बुराइयों के ही निवृत्ति होती है। निदान “आत्मज्ञान” की प्राप्ति कर्मयोग से होती है। यहाँ अनिश्चित कुछ भी नहीं है। कर्मयोग का यह आध्यात्म अंत में आत्मानन्द को परमगति तक पहुँचा देता है।

.... समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1950 पृष्ठ 8

👉 MISCELLANEOUS Quotation & Answer (Part 8)

Q.8. How is Gayatri relevant for humankind in the present times ?

Ans.  Each individual is born with certain characteristic traits and IQ., all of which can not be explained as genetic inheritance. For instance, genetics has no explanation for the rare birth of a saint, genius or an idiot in several generations of a family. It is also a fact that many of these exclusive personal traits change in course of growth of  the person from childhood to adulthood. Modern scientists generally ascribe these changes to social environment and education. The science of today is, however, unable to throw light on the reasons for presence or absence in an individual of characteristics like empathy, compassion, large-heartedness, tolerance, courage, equanimity and creativity. Nor has modern science succeeded in devising gadgets or courses for inculcating these virtues.

The spiritual masters in the East on the other hand, maintain that the Absolute Repository of all virtues, which we call as GOD, is that source from which it is possible to acquire positive traits by personal endeavour through specific Yogic exercises under the guidance of a Guru. This is the objective of all spiritual pursuits in the East.

Ever since the dawn of civilization in India, it has been emphasised that no amount of material progress in science and technology can bring about lasting happiness, peace and prosperity for humankind, unless the individual - the unit of family, society, nation and global population, is transformed by infusion of positive thinking. The so-called progress in the West is also responsible for two world wars, nuclear-proliferation, environmental pollution, disparity in living standards, conflicts, poverty and disease all-over the world.

Gayatri is a panacea for all problems - Personal, Family, Social, National or Global : The Gayatri Sadhana is a product of thousands of years of research. Following Gayatri Yoga any individual, irrespective of caste, class, colour, nationality, social status and religious  affiliation can acquire strength from the Indwelling Divinity for solving all problems of life.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 89

👉 समय का सदुपयोग

हम देखते हैं, बहुत से लोग, जिनके पास काम नहीं होता या कम होता है, वे लोग फालतू के काम करते रहते हैं। कोई ताश के पत्ते खेलता है, कोई गार्डन में व्यर्थ ही इधर उधर बैठा रहता है, कोई जुआ खेलता है, कोई सिगरेट बीड़ी पीता है, कोई शराब पीता है। बस यूँ ही अनुपयोगी/व्यर्थ के कार्य करता रहता है।

जब उससे पूछा जाता है कि आप क्या कर रहे हैं? तो वह उत्तर देता है, कुछ नहीं, बस यूं ही समय काट रहे हैं. तो संसार में बहुत सारे लोग ऐसे हैं जिनके पास करने के लिए कोई काम नहीं है। उनके पास समय तो है, पर काम नहीं है। अब उस समय को काटने के लिए वे इधर-उधर कुछ भी करते रहते हैं।

ऐसा करने से उनका समय तो कट जाता है, परंतु समय भी बहुत खतरनाक हथियार है, बहुत तेज धार वाला है। जब मनुष्य समय को काटता है तो समय भी मनुष्य का बहुत कुछ काटता है. उसकी संपत्ति नष्ट करता है, उसका स्वास्थ्य नष्ट करता है, उसकी आयु को नष्ट करता है, और भी बहुत सारी हानियां करने के बाद ही समय कटता है।

इसलिए समय का सदुपयोग करें। खाली न बैठें। कुछ काम ढूंढें। कुछ अपने लिए करें, कुछ परिवार के लिए करें, कुछ समाज के लिए करें, कुछ राष्ट्र के लिए करें, कुछ प्राणियों की रक्षा के लिए काम करें, रोगियों विकलांगों की सहायता करें, इत्यादि। यदि आप इस प्रकार का कोई उपयोगी काम ढूंढेंगे, तो बहुत से काम मिल जाएंगे। उन कामों को करके समय का सदुपयोग करें, व्यर्थ समय को ना काटें। अन्यथा काफी सारा समय काटने के बाद आपको पता चलेगा, कि आपने समय को नहीं काटा, बल्कि समय ही आपको काट गया।

👉 संकट के क्षण

संकट के क्षण बेशकीमती हैं। जीवन में इनका महत्त्व व मोल बहुत अधिक है। इतना अधिक कि इन्हें अतिमहत्त्वपूर्ण और अनमोल कहा जा सके। जब सब कुछ व्यवस्थित होता है और कहीं कोई संकट नहीं होता, तो जीवन चेतना सुप्त व मृतप्राय हो जाती है। जब कुछ बदल नहीं रहा होता है और पुराने की पकड़ मजबूत होती है तो लगभग असम्भव हो जाता है स्वयं को बदलना। लेकिन जब हर चीज अस्त-व्यस्त होती है, जीवन में कुछ भी स्थायी, निश्चित एवं सुरक्षित नहीं होता, कोई नहीं जानता कि अगले क्षण क्या होगा? ऐसे संकट के क्षणों में जीवन स्वतन्त्र होता है परिवर्तन के लिए, रूपान्तरण के लिए।
  
संकट के बिना जीवन लगभग जेल जैसा है। जिसमें बस परम्पराओं, रीतियों, युगों पुरानी सड़-गल चुकी व्यवस्थाओं को विवशताओं के साथ निभाया जाता है। इस जेल से भाग निकलना तकरीबन असम्भव होता है। लेकिन जैसे ही संकट आया कि सब बँधी-बँधायी व्यवस्थाएँ टूट जाती हैं, विवशताओं से मुक्ति मिलती है। तनिक महसूस करें भूचाल आया हो, हर व्यवस्था बिखर चुकी हो, किसी को पता ही न हो कि पहरेदार कहाँ हैं, जेलर कहाँ है? सारे नियम टूट चुके हों, ऐसे क्षणों में कैदी अगर जरा भी सजग हो तो ये संकट के क्षण उसके लिए मोक्ष के क्षण हो सकते हैं।
  
यही वजह है कि जीवन की कारा से, प्रकृति की अर्गलाओं से, माया के बन्धनों से मोक्ष पाने की चाहत रखने वालों के जीवन में संकटों की भरमार होती है। वे भगवान् से पल प्रतिपल, प्रत्येक क्षण, घड़ी, पक्ष, मास, अयन और वर्ष संकटों का वरदान माँगते हैं। भगवान् भी अपने इन प्यारे भक्तों को उदारतापूर्वक संकटों का अनुदान देते हैं। इसी कारण तपस्वी, योगी, ज्ञानी, भक्त आदि भगवान् के जितने भी प्रियजन हैं उनके जीवन में संकट कभी भी कम नहीं पड़ते। लेकिन वे अपने तप, योग, ज्ञान एवं भक्ति से संकट के प्रत्येक क्षण को मोक्ष के क्षण में बदलते हैं। प्रत्येक संकट उनके लिए ईश्वरीय प्रकाश का द्वार होता है। भगवान् के प्रति अविचल श्रद्धा हो, जीवन के प्रति सकारात्मक भाव हो तो संकट के इन क्षणों से अधिक सुखद आध्यात्मिक साधना का सुअवसर अन्य कुछ भी नहीं।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १९६