शुक्रवार, 1 मई 2020

👉 उदात्त अनुदानों के लिये युग चेतना का आह्वान (भाग ३)

नव सृजन के लिए साधनों की भी आवश्यकता रहेगी ही। भौतिक प्रयोजनों में तो अर्थ साधन ही प्रधान होते है किन्तु प्रवाह बदलने जैसे अध्यात्म अभियान के लिए भी अन्ततः साधन तो चाहिए ही। यों श्रम, समय मनोयोग, भाव सम्वेदन जैसे तथ्यों की ही युग परिवर्तन में प्रमुखता मानी जायेगी। फिर भी अर्थ साधनों के बिना उन्हें भी कार्य रूप में परिणित कर सकना सम्भव नहीं हो सकेगा। वस्तुएँ तो इस निमित्त भी चाहिए ही। सामान्य निर्माण कार्यों के लिए साधन जुटाने पड़ते हैं फिर इस महानतम कार्य के लिए साधनों के बिना ही काम चलता रहे ऐसा सम्भव नहीं।

यह आवश्यक भी जागृत आत्माओं को ही पूरी करनी होगी। वैयक्तिक कार्यों में कटौती करके ही युग धर्म के लिए समयदान की व्यवस्था बन सकती है। इसी प्रकार निजी खर्चों में कटौती करके ही युग की पुकार के निमित्त अर्थ साधन प्रस्तुत कर सकना सम्भव हो सकता है। उत्तराधिकारियों के लिए जो अनावश्यक धन सम्पदा छोड़ी जाती है, उस मोह ग्रस्तता पर अंकुश लगाने का तो हर दृष्टि से औचित्य है। निजी परिवार को ही सब कुछ मानते रहना और विश्व परिवार के लिए कुछ भी न करना, ऐसा व्यामोह है जो युग शिल्पियों के लिए अशोभनीय ही ठहरता है।

युग निर्माण परिवार के हर सदस्य को आरम्भ से ही एक घण्टा समय और दस पैसा नित्य ज्ञान यज्ञ के लिए देते रहने की प्रेरणा दी गई है। वह दिशा निर्धारण युग शिल्पियों के लिए आरम्भिक एवं अनिवार्य कर्तव्य बोध की तरह था। अब उसमें उदात्त अभिवृद्धि का समय आगया। समय और धन दोनों ही अनुदानों का स्तर तथा परिमाण बढ़ना चाहिए। जिसे अपने अन्तरंग में जितनी युग चेतन, हलचल मचाती दिखाई पड़े उन्हें उतने से ही भाव-भरे अनुदान प्रस्तुत करने की तैयारी करनी चाहिए।

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✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त १९७९, पृष्ठ ५७

👉 A Perfect Deal

Man is a mortal being and all his belongings are also perishable. Only one of his ‘possessions’ that lasts for Ages after he is gone is his glory. One who earns this preeminence is indeed most successful in the ‘business’ of life even if he has sacrificed or lost on the materialistic front. His trade is like, for example, that of getting a new stout building in return of selling off an unused heap of hay. Great ones are those who refine and excel their lives up to glorious heights, worth the dignity of human life. Dormant lives of others mushroom and end like that of any other creature who survives just to till the tummy and quench the sensual thirst.

Those stuck in the peripheries of selfish possession and attachments are shortsighted, and remain careless of the future. Their lives, their activities, despite the physical dynamism and alacrity are no better than ‘movable corpse.’ A dormant life is no life… Fools gather more and more of wealth and resources so that their beloved ones would enjoy it all generations after generations… They
spent all their time, talents and efforts in insane and at times unfair possession and its safety. Wouldn’t it be wiser of them if they had employed their resources prudently in the activities of progress and welfare? This would have brightened their own future as well along with supporting more and more people around and contributing in constructive reformation and development.

Draining or throwing away the useful things and collecting the rubbish or hazardous ones – is a clear sign of insanity. Aren’t they mindless who invite enmity all the time, by using absurd, abusive, acrimonious tongue? Anybody, howsoever learned, skillful and smart he might be, is unwise if, instead of augmenting the virtuous qualities, he opts for vices and weaknesses.

📖 Akhand Jyoti, Oct 1942

👉 चिंतन के क्षण 1 May 2020

भविष्य की कल्पना करते समय शुभ और अशुभ दोनों ही विकल्प सामने हैं। यह अपनी ही इच्छा पर निर्भर है कि शुभ सोचा जाय अथवा अशुभ। शुभ को छोड़कर कोई व्यक्ति अशुभ कल्पनाएँ करता है, तो इसमें किसी और का दोष नहीं है। दोषी है तो वह स्वयं ही, इसलिए कि उसने शुभ चिंतन का विकल्प सामने रहते हुए भी अशुभ चिंतन को ही अपनाया।

जैसे को तैसा-यह नीति अपना लेने पर तो बड़ा भी छोटा हो जाता है। गाली का जवाब गाली से और घूँसे का जवाब घूँसे से देने में कोई बड़ी बात नहीं है। ऐसा तो पशु भी आपस में लड़कर द्वंद्व युद्ध कर लेते हैं। क्षमा और सहनशीलता हर किसी का काम नहीं है। उसे बड़े आदमियों में ही देखा जा सकता है। वे नेकी कर कुएँ में डाल की नीति अपनाते हैं।

अपनी महत्त्वाकाँक्षाओं के बारे में हमें विवेकपूर्ण बुद्धि से सोचना चाहिए कि वे कितनी यथार्थ और कितनी उपयोगी है? कहीं उन्होंने हमें भुलावे में तो नहीं डाल रखा है? वे हमें जीवन के सही रास्ते पर ले जाती हैं या हमें पथ भ्रष्ट कर रही हैं। किन्हीं प्रलोभनों के पीछे तो हम नहीं दौड़ रहे हैं? हमारी आकाँक्षाओं के पीछे कोई स्वार्थ बुद्धि तो काम नहीं कर रही? महत्त्वाकाँक्षाएँ यदि निकृष्ट स्तर की हों तो उन्हें त्याग देना चाहिए।

उतावले और जल्दबाज, असंतुष्ट और उद्विग्न व्यक्ति एक प्रकार के अधपगले कहे जा सकते हैं। वे जो कुछ चाहते हैं उसके तुरन्त ही प्राप्त हो जाने की कल्पना किया करते हैं। यदि जरा भी देर लगती है तो अपना मानसिक संतुलन खो बैठते हैं और प्रगति के लिए अत्यन्त आवश्यक गुण मानसिक स्थिरता को खोकर असंतोष रूपी उस भारी विपत्ति को कंधे पर ओढ़ लेते हैं, जिसका भार लेकर उन्नति की दिशा में कोई आदमी देर तक नहीं चल सकता।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मानसिक स्वच्छता का महत्त्व

मन की चाल दोमुँही है। जिस प्रकार दोमुँही साँप कभी आगे, कभी पीछे चलता है, उसी प्रकार मन में दो परस्पर विरोधी वृत्तियाँ काम करती रहती हैं। उनमें से किसे प्रोत्साहन दिया जाय और किसे रोका जाय, यह कार्य विवेक बुद्धि का है। हमें बारीकी के साथ यह देखना होगा कि इस समय हमारे मन की गति किस दिशा में है? यदि सही दिशा में प्रगति हो रही हैं, तो उसे प्रोत्साहन दिया जाय और यदि दिशा गलत है, तो उसे पूरी शक्ति के साथ रोका जाय, इसी में बुद्धिमत्ता है। क्योंकि सही दिशा में चलता हुआ मन जहाँ हमारे लिए श्रेयस्कर परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकता है, वहाँ कुमार्ग पर चलते रहने से एक दिन दुःखदायी दुर्दिन का सामना भी करना पड़ सकता है। इसलिए समय रहते चेत जाना ही उचित है।
  
उचित दिशा में चलता हुआ मन आशावादी, दूरदर्शी, पुरुषार्थी और सुधारवादी होता है। इसके विपरीत पतनोन्मुख मन सदा निराश रहने वाला, तुरन्त की बात सोचने वाला, भाग्यवादी, कठिनाइयों की बात सोच-सोचकर खिन्न रहने वाला होता है। वह परिस्थितियों के निर्माण में अपने उत्तरदायित्व को स्वीकार नहीं करता। मन पत्थर या काँच का बना नहीं होता जो बदला न जा सके। प्रयत्न करने पर मन को सुधारा और बदला जा सकता है। यह सुधार ही जीवन का वास्तविक सुधार है। समाज निर्माण का प्रमुख सुधार यह मानसिक परिवर्तन ही है। हमारा मन यदि अग्रगामी पथ पर बढ़ने की दिशा पकड़ ले, तो जीवन के सुख-शान्ति और भविष्य के उज्ज्वल बनने में कोई सन्देह नहीं रह जाता।
  
जिनने आशा और उत्साह का स्वभाव बना लिया है, वे उज्ज्वल भविष्य के उदीयमान सूर्य पर विश्वास करते हैं। ठीक है, कभी-कभी कोई बदली भी आ जाती है और धूप कुछ देर के लिए रुक भी जाती है। पर बादलों के कारण  सूर्य सदा के लिए अस्त नहीं हो सकता है। असफलताएँ और बाधाएँ आते रहना स्वाभाविक है। उनका जीवन में आते रहना वैसा ही है जैसा आकाश में धूप-छाँह की आँख मिचौनी होते रहना। कठिनाइयाँ मनुष्य के पुरुषार्थ को जगाने और आगे बढ़ने की चेतावनी देने आती हैं। आज यदि सफलता मिली है, प्रतिकूलता उपस्थित है, संकट का सामना करना पड़ रहा है, तो कल उस स्थिति में परिवर्तन होना स्वाभाविक है। आशावादी व्यक्ति छोटी-छोटी असफलताओं की परवाह नहीं करते। वे रास्ता खोजते हैं और धैर्य, साहस, विवेक एवं पुरुषार्थ को मजबूती के साथ पकड़े रहते हैं, क्योंकि आपत्ति के समय में यही चार सच्चे मित्र बताये गये हैं।
  
निराशा एक प्रकार की कायरता है। बुजदिल आदमी ही हिम्मत हारते हैं, जिसमें वीरता और शूरता का, पुरुषार्थ और पराक्रम का एक कण भी शेष होगा, वह यही अनुभव करेगा कि मनुष्य महान है, उसकी शक्तियाँ महान हैं, वह दृढ़ निश्चय और सतत परिश्रम के द्वारा असम्भव को सम्भव बना सकता है। यह जरूरी नहीं कि पहला प्रयत्न ही सफल होना चाहिए। असफलताओं का मन पर जो प्रभाव नहीं पड़ने देते और आगामी कल के लिए आशान्वित रहते हैं, वस्तुतः वे ही शूरवीर हैं। वीरता शरीर में नहीं मन में निवास करती है। जो मरते दम तक आशा को नहीं छोड़ते और जीवन संग्राम को एक खेल समझते हुए हँसते, खेलते, लड़ते रहते हैं उन्हीं वीर पुरुषार्थी महामानवों के गले में अनन्त विजय वैजयन्ती पहनाई जाती है। बार-बार अग्नि परीक्षा में से गुजरने के बाद ही सोना कुन्दन कहलाता है। कठिनाइयों और असफलताओं से हताश न होना, वीरता का यह एक ही चिह्न है। जिन्होंने अपने को इस कसौटी पर खरा सिद्ध किया है, उनकी जीवन साधना सफल हुई है।

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गुरु पूर्णिमा-’युग निर्माण योजना’ का अवतरण पर्व (भाग ३)

राजनैतिक स्वाधीनता के लिए आत्माहुति देने वाले पिछली पीढ़ी के शहीद अपनी जलाई हुई मशाल हमारे हाथों में थमा कर गये हैं। जिनने अपने प्राण, प...