रविवार, 7 मई 2017

👉 शरणागति से मिला आरोग्य

🔵 एक बार विचित्र तरीके से मेरे गले में कुछ समस्या उत्पन्न हुई। ऐसा लगता था मानो गले में काँटे जैसा कुछ चुभ रहा है। डॉक्टर को दिखाया। कुछ समझ में नहीं आया तो डॉक्टर ने गरम पानी से गरारा करने की सलाह दी। एहतीयात के तौर पर कुछ दवा भी दी। इन सब से कोई लाभ न होते देख मैंने बड़े डॉक्टर से दिखाने की सोची। एक डॉक्टर का पता चला कि वे पूरे एशिया में छठे स्थान पर माने जाते हैं।

🔴 उनके पास गया। उन्होंने पूरी गम्भीरता के साथ मेरी तकलीफें सुनीं। खून, थूक- खखार की जाँच करवाई। मशीन से गले की जाँच की। इतनी जाँच- पड़ताल के बाद उन्होंने बताया कोई बीमारी नहीं है। संदेह की कोई गुँजाइश नहीं रह गई थी। लेकिन मेरी तकलीफ का क्या करूँ ,, जो सोते- जागते हर क्षण याद दिला रही थी कि कुछ तो अवश्य ही है। धीरे- धीरे तकलीफ इतनी बढ़ गई कि खाना खाने और पानी पीने में भी तकलीफ होने लगी। आखिरकार हार कर दूसरे डॉक्टरों के पास गई। जिनके पास भी जाती, जाँच के बाद सब यही बताते कि कोई बीमारी नहीं है। टी.एम.एच, डॉ.भटनागर, फिर परसूडीह के चिकित्सक अनिल कुमार ठाकुर सबने देखा- जाँचा, गले की चुभन दूर करने के लिए सभी ने कोई- न कोई नुस्खे दिए, पर मुश्किल दूर न हो सकी।

🔵 कहड़गोड़ा में दिखाया। वहाँ बताया गया, कटक में एक बहुत बड़े डॉक्टर हैं डॉ. सनातन रथ- वहाँ दिखाइए। उनके क्लीनिक और डायग्रोस्टिक सेन्टर में गया। वहाँ डॉक्टर ने कुरेद- कुरेद कर काफी सवाल पूछे। इसी दौरान मुझे याद आया कि मुझे दोनों स्तनों में अक्सर दर्द रहता है, जिस पर पहले बहुत अधिक ध्यान नहीं दिया, लेकिन डॉक्टर के पूछने पर मैंने बताया। उन्होंने संभावना जताई कि संभव है इसी के प्रभाव से गले की समस्या आ रही हो। उन्होंने कहा- कैन्सर की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता। कई तरह की जाँच करवाई गई, लेकिन रोग का निदान नहीं हो सका। इस बीच मेरी हालत और खराब होती गई। कमजोरी के कारण गले की चुभन इतनी अधिक बढ़ गई कि खाना पीना भी बन्द होने की नौबत आ गई।

🔴 जीवन का अन्त बहुत नजदीक दिखाई देने लगा। इन्हीं दिनों आध्यात्मिकता की ओर मेरा कुछ रुझान होने लगा। पड़ोस में एक भाई गायत्री परिवार के थे। कभी- कभार उनसे कुछ पुस्तकें मिल जाया करती थीं। पढ़कर आकर्षण अनुभव करती थी। अचानक तबीयत के बिगड़ जाने से ऐसा आभास होने लगा कि जिन्दगी के इतने दिन काट लिए, लेकिन परलोक के बारे में कुछ सोचा ही नहीं। कहते हैं, दीक्षा से सद्गुरु का मार्गदर्शन मिलता है, जिससे मृत्यु के बाद सद्गति मिलती है, आत्मा को भटकना नहीं पड़ता। कुछ इन्हीं विचारों से प्रेरित होकर मैंने गुरुदीक्षा ले ली। पड़ोस के वे सज्जन गुरु भाई के नाते कभी- कभार हाल- चाल पूछ लिया करते थे। एक दिन शक्तिपीठ से लौटते समय मेरे पति से भेंट हुई तो उन्होंने साधारण तौर पर कुशल समाचार पूछे। पति ने मेरी हालत बताई तो उन्होंने कहा- ऐसी समस्याओं में एलोपैथी की तुलना में आयुर्वेदिक दवाएँ अधिक कारगर होती हैं। उन्होंने मुसालनी में डॉ.एम.एन.पाण्डेय (आयुर्वेदिक चिकित्सक) के यहाँ दिखाने की सलाह दी। वैसे भी इसके अलावा हमारे पास और कोई चारा नहीं था। इतने दिनों से इस अजीब रोग के इलाज के पीछे इतने पैसे बहा चुके थे कि अब अधिक सामर्थ्य भी नहीं रह गई थी। कैन्सर की सम्भावना जानने के बाद से ही मैं सोच रही थी कि वैलूर में चेकअप करवा लूँ। वहाँ की काफी प्रसिद्धि सुन रखी थी। लेकिन पैसे के अभाव में वैसा सम्भव नहीं था। डॉ. पाण्डेय से ही दिखाना तय हुआ।

🔵 डॉ. पाण्डेय ने केस हिस्ट्री पढ़कर और यह सुनकर कि मैं पैसे के अभाव में वैलूर न जा सकी, वहाँ जाने के लिए खर्च स्वयं देने की पेशकश की और तात्कालिक तौर पर कुछ दवाएँ दीं। बोले जब तक अच्छी तरह चेकअप नहीं हो जाता तब तक इन्हें लेते रहिए। उन्होंने दवा की कीमत भी नहीं ली। अभी इलाज शुरू ही हुआ था कि अचानक एक दिन घर में आग लग गई। इलाज भी बन्द हो गया। अब डॉक्टर के यहाँ जाती भी कैसे! एक बार दवा मुफ्त में दे दी तो दुबारा कैसे माँगी जाय- इस पशोपेश में कई दिन गुजर गए। वैलूर जाने की बात भी अधर में रह गई। दीक्षा के बाद से मैं नियमित साधना करने लगी थी। एक दिन साधना के बाद यों ही अनमनी- सी बैठकर मैं अपनी समस्याओं के बारे में सोच रही थी। अचानक ध्यान आया कि आजकल पहले जैसा दर्द और गले की चुभन अनुभव नहीं हो रही। पता नहीं वह बीमारी अपने आप कैसे छूट गई और आज तक में ठीक हूँ। ऐसा मात्र गुरुकृपा से सम्भव हुआ है।
  
🌹  विभा देवी परसूडीह, टाटानगर (झारखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/sharna

👉 अपनी दुनिया अपनी दृष्टि में

🔴 अपने आप में, अपने अंत:करण में एक जबरदस्त लोक मौजूद है। उस लोक की स्थिति इतनी महत्त्वपूर्ण है कि उसके सामने भूगोल और भुव: लोक तुच्छ हैं। नि:संदेह बाहर की परिस्थितियाँ मनुष्य को आंदोलित, तरंगित तथा विचलित करती हैं, परंतु संसार के समस्त पदार्थों द्वारा जितना भला या बुरा प्रभाव होता है, उससे अनेक गुना प्रभाव अपने निजि के विचारों तथा विश्वासों द्वारा होता है।

🔵 गीता में कहा गया है कि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र और स्वयं ही अपना शत्रु है। कोई मित्र इतनी सहायता नहीं कर सकता, जितनी कि मनुष्य स्वयं अपनी सहायता कर सकता है। इसी प्रकार कोई दूसरा उतनी शत्रुता नहीं कर सकता, जितनी कि मनुष्य खुद अपने आप अपने से शत्रुता करता है। अपनी कल्पना शक्ति, विचार और विश्वास के आधार पर मनुष्य अपनी एक दुनिया निर्माण करता है। वही दुनिया उसे वास्तविक सुख-दु:ख दिलाया करती है।

🔴 मनुष्य के मन में प्रचंड शक्ति भरी हुई है। वह इस शक्ति द्वारा अपने लिए अत्यंत अनिष्टकर अथवा अत्यंत उपयोगी तथ्य निर्मित कर सकता है। हर मनुष्य की अपनी एक अलग दुनिया होती है। भीतरी मन की दुनिया जैसी होती है, बाहर की दुनिया भी उसी के अनुरूप दिखाई देने लगती है। अंदर की दुनिया सुन्दर बनाओ।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 ~अखण्ड ज्योति-सितं. 1947 पृष्ठ 5
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1947/September/v1.5

👉 आज का सद्चिंतन 8 May 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 8 May 2017


👉 ऐसी सीख न दीजिए

🔵 सुप्रसिद्ध दार्शनिक कन्फ्यूशियस के बुद्धिमान् शिष्य चाँग-होचाँग एक बार देश भ्रमण के लिए निकले। प्रजा की भलाई के लिए सामाजिक अध्ययन और उपयुक्त वातावरण का शोध इस भ्रमण का मुख्य उद्देश्य था।

🔴 घूमते-घूमते चाँग ताईवान पहुँचे। एक युवक माली कुँए से जल निकाल रहा था, बाल्टी पानी निकालने और फिर ढोकर हेर पौधे तक पहुँचाने में उसे बहुत अधिक परिश्रम करना पड रहा था तो भी काफी काम बाकी पड़ा था। चाँग को उस पर बडी दया आई। काफी देर सोचते रहे कोई ऐसा उपाय नहीं है क्या, जिससे माली का परिश्रम हलका किया जा सके।

🔵 विचार करे तो सैकडो़ वर्षों की सडी़-गली परंपराएँ रीति-रिवाज भी सगे-संबंधी की तरह चिपके कष्ट देते रहते हैं, पर विचार की एक छोटी-सी चिनगारी भी उन्नतियों के राजमहल खड़ी कर सकती है। चाँग ने सोचा यदि लकडी़ की एक घिर्री बनाकर उसमें रस्सी लपेटकर खड़े-खड़े ही खींचने का प्रबध हो जाए और यहीं से प्रत्येक वृक्ष तक के लिए नाली खोद ली जाए, तो माली का यथेष्ट श्रम बच सकता है। इतने ही परिश्रम में वह पहले से अधिक काम कर सकता है।

🔴 माली ने इस योजना के लाभ समझे और उसे मान लिया। ढेंकलीनुमा व्यवस्था हो गई। माली वहीं खडा-खड़ा पानी निकाल कर पौधे सींचने लगा।

🔵 समय तो बचा, पर माली ने देखा उसके चलने-फिरने-झुकने-लचकने के कई व्यायाम अब नहीं रहे इसलिए शरीर के कुछ अंग शिथिल रहने लगे हैं, तो भी उसे इस बात का संतोष था कि तब से कुछ काम अधिक हो जाने से शरीर का हर अवयव का कुछ-न-कुछ तो क्रियाशील हो ही जाता है इसलिए स्वास्थ्य में गिरावट की कोइ विशेष चिंता नहीं हुई।

🔴 चाँग आगे बढ़ गए। बहुत दूर तक घूम चुकने के बाद वे फिर से उसी रास्ते वापस लौटे तो उनके मस्तिष्क में एक और बात याद आई कि यदि कुएँ में भाप से चलने वाली गशीन डाल दी जाए तो परिश्रम भी बिलकुल कम हो जाए और वृक्षों को जल भी खूब मिलने लगे। माली ने वह प्रस्ताव भी स्वीकार कर लिया। भाप का इंजन लग गया, माली को चैन हो गया।

🔵 काफी दिन बीतने के बाद एक दिन चाँग की इच्छा उस बाग को देखने की हुई, उसने सोचा था बगीचा अब लहलहा रहा होगा, पर वहाँ जाकर देखा तो स्तब्ध रह गया। पूछने पर पता चला, माली बीमार रहता है, इसलिये समय बे समय ही पानी मिल पाता है, इसी से पेड-पौधे मुरझा रहे हैं।

🔴 चाँग माली को देखने उसके घर गए। सचमुच माली बीमार था। उसके हाथ सूख गए थे, टाँगे कमजोर हो गई थीं, पेट दो रोटी से ज्यादा नहीं पचा सकता था, माली का मुँह पीला पड गया था।

🔵 चाँग ने हँसकर पूछा- कहो भाई, अभी भी अधिक परिश्रम करना पड़ता है क्या तो कोई और तरकीब सोचें। पास खडी मालिन ने कहा-श्रीमान् जी, और तरकीब लडाने की अपेक्षा तो आप इन्हें ऐसी सीख दीजिए कि पहले की तरह फिर से अपने हाथ से ही काम करने लगें। ढेंकली का आराम ही इनकी बीमारी का कारण है। चाँग अपने एकांगी चिंतन पर बहुत पछताए, उन्होंने सोचा मनुष्य यांत्रिक और बिना परिश्रम के जीवन के आकर्षण में न पडता तो वह क्यों अस्वस्थ होता, क्यों रोगी ? उसने माली से अपनी स्त्री की ही राय मान लेने की सीख दी और वही से वापस चला आया। माली अपनी पूर्व जीवन पद्धति में आकर पुन: स्वस्थ हो गया पर उसकी छूत आज की पीढ़ी को लग गई, जो मशीनों से काम लेकर स्वयं आराम से बैठा केवल कलम घिसना चाहता है। माली की तरह वह न तो उत्पादन बढा पाता है न बीमारी हटा पाता है। केवल मशीनें बढ़ रही है और मनुष्य उसमें निरंतर दबता पिसता चला जा रहा है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 157, 158

👉 वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः

🔵 राष्ट्रजागरण की बात बहुत लोगों द्वारा, बहुत अवसरों पर, बहुत बार दुहराई जाती है; आकर्षक नारे दिए जाते हैं, समस्याओं का समाधान करने के लुभावने वादे किए जाते हैं-फिर भी राष्ट्र जाग्रत् नहीं है। दरअसल सक्रियता-जाग्रति की पर्याय नहीं। सक्रिय मनुष्य में मनुष्यता का अभाव बेहतर खटकता है। इसी तरह राष्ट्र की विविध गतिविधियों के बीच राष्ट्रीय भावना का अभाव बराबर अनुभव हो रहा है और उसके निवारण के उपाय सफलीभूत न होने से हर राष्ट्रप्रेमी का अन्तःकरण चीत्कार कर रहा है। राष्ट्रीय-चरित्र, राष्ट्रीय-गौरव, राष्ट्रीय-मर्यादा, राष्ट्रीय-आत्मीयता, राष्ट्रीय-समृद्धि आदि की वृद्धि और उत्कर्ष की बात क्या की जाए-उसका कोई न्यूनतम स्वरूप भी निर्धारित न हो सकना चिन्तनीय बात है।

🔴 ऐसा लगता है कि राष्ट्र सचमुच सोया पड़ा है, सामान्य निद्रा में नहीं-मूर्च्छा जैसी गहन स्थिति में। उसे चैतन्य, जाग्रत्, सतेज बनाने के लिए विशेष प्रयास किया जाना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है। पर प्रयास करे कौन? राष्ट्रीय-चेतना को कौन उभारे? उसे कैसे विकसित करें? घूम-फिरकर हमारी आदत कुछ दलों और उनकी सरकार की ओर देखने की पड़ गयी है। पर यह बड़ी भारी भ्रान्ति है। जब सरकार विदेशी थी तो उसने सोए राष्ट्र का उपयोग अपने स्वार्थ में करने के लिए उसे उसी स्थिति में रखना पसन्द किया और आज जब वह आन्तरिक है, तो वह भी उसी सुप्त समाज का एक अंग है। सोया हुआ अंग सोये हुए को कैसे जगा सकता है? जिनकी दृष्टि स्वयं में सीमित है, उनसे विस्तृत दृष्टिकोण की कामना कैसे करें?
  
🔵 राष्ट्रजागरण का महान् कार्य तो जाग्रत् अन्तःकरण वाले व्यक्तियों का है। प्रचलित मान्यताओं के परे जिनका मस्तिष्क सोच सकता है, ऐसे व्यक्ति ही राष्ट्रीय चेतना जाग्रत् कर सकते हैं। जिनके जीवन की गतिविधियाँ किन्हीं अंशों में स्वार्थ की सीमा के बाहर सक्रिय हैं, व्यक्तिगत स्वार्थों की अपेक्षा सामूहिक हितचिन्तन जिनके स्वभाव में है तथा उसके अनुरूप जीवनप्रक्रिया चलाने के जो थोड़े-बहुत अभ्यस्त हैं, वे ही इस कार्य में आगे आ सकते हैं। तात्कालिक लाभ की मृग-मरीचिका में भटकते नागरिकों को जो दूरगामी परिणामों का स्मरण दिलाकर अपेक्षाकृत अधिक स्थायी लाभप्राप्ति के लिए पुरुषार्थ की प्रेरणा दें सकें, ऐसे विकसित दृष्टिकोण तथा समर्थ व्यक्तित्त्वों का यह कार्य है।

🔴 ऐसे व्यक्तियों को प्राचीनकाल में ‘पुरोहित’ कहते थे। पुरोहित शब्द से से भी यही भाव निकलता है कि जो सामने का लाभ नहीं-आगे का-दूरगामी हित समझकर उसकी प्राप्ति की व्यवस्था बना सकें। हीन स्वार्थों के स्थान पर महत् स्वार्थों की सीढ़ियों पर चलते हुए ‘परमार्थ’ तक लोगों को गति दे सकें-वही पुरोहित में ‘चिन्तक और साधक’ दोनों गुण आवश्यक हैं। जो चिन्तन-विश्लेषण द्वारा सही परामर्श दे सके तथा आदर्श जीवन-पद्धति से मूर्तिमान प्रेरणा रूप बनकर रहे, वही पुरोहित है। अपने जीवन में आदर्श का अभ्यास करने के साथ-साथ व्यक्तिगत हित के साथ-साथ समाजहित की जो कल्पना कर सके, ऐसे व्यक्ति इस वर्ग में आ सकते हैं। राष्ट्रजागरण का कार्य प्रमुख रूप से ऐसे ही प्रकाशवान् व्यक्तित्वों का है। ये संगठित होकर स्वयं को इस महान् प्रयोजन के लिए समर्पित कर सकें तो यह महान् राष्ट्र विश्वमंच पर पुनः सिंहनाद कर सकता है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 60

👉 आत्मचिंतन के क्षण 8 May

🔴 युग निर्माण के लिए धन की नहीं, समय की-श्रद्धा की-भावना की एवं उत्साह की आवश्यकता पड़ेगी। नोटों के बण्डल वहाँ कूड़े-करकट के समान सिद्ध होंगे। समय का दान ही सबसे बड़ा दान है। धनवान लोग अश्रद्धा और अनिच्छा रहते हुए भी मान, प्रतिफल, दबाव या अन्य किसी कारण से उपेक्षापूर्वक भी कुछ पैसा दान खाते में फेंक सकते हैं, पर समयदान केवल वही कर सकेगा जिसकी उस कार्य में श्रद्धा होगी। इस श्रद्धायुक्त समयदान में गरीब और अमीर समान रूप से भाग ले सकते हैं। युग निर्माण के लिए इसी दान की आवश्यकता पड़ेगी और आशा की जाएगी कि अपने परिवार के लोगों में से कोई इस दिशा में कंजूसी न दिखावेगा।                           

🔵 जिन्होंने समय-समय पर ममता भरा प्यार हमें दिया है, हमारी तुच्छता को भुलाकर जो आदर, सम्मान, श्रद्धा, सद्भाव, स्नेह एवं अपनत्व प्रदान किया है, उनके लिए क्या कुछ किया जाए समझ में नहीं आता? इच्छा प्रबल है कि अपना हृदय कोई बादल जैसा बना दे और उसमें प्यार का इतना जल भर दे कि जहाँ से एक बूँद स्नेह की मिली हो वहाँ एक पहर की वर्षा कर सकने का सुअवसर मिल जाए। मालूम नहीं, ऐसा संभव होगा कि नहीं। यदि संभव न हो सके तो हमारी अभिव्यंजना उन सभी तक पहुँचे जिनकी सद्भावना किसी रूप में हमें प्राप्त हुई हो। वे उदार सज्ज्न अनुभव करें कि उनके प्यार को भुलाया  नहीं गया।                                                            

🔴 सत्य रूपी प्रहलाद की रक्षा भगवान् नृसिंह स्वयं करते हैं। नृसिंह मनुष्यों में जो सिंह स्वरूप वीर पुरुष है, वे धर्मवृक्ष को गिरने न देने के लिए अपना पूरा सहयोग देते हैं। गायत्री परिवार के कार्यक्रमों के पीछे, महान् यज्ञानुष्ठान के पीछे सत्य की दैवी शक्ति मौजूद है। इसलिए हममें से किसी को भी विचलित होने की रत्ती भर भी जरूरत नहीं है। फिर भी प्रहलाद की तरह कठिन परीक्षा देने को तैयार रहना ही होगा।     

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 24)

🌹  समय-संयम सफलता की कुञ्जी है

🔴 इसी प्रकार बहुत से अध्ययनशील व्यक्ति अपना समय तो खराब नहीं करते किन्तु उनका अध्ययन क्रम निश्चित एवं निर्धारित नहीं होता। वे कभी किसी एक विषय के ग्रन्थ को पढ़ते और पूरा किये बिना ही दूसरा शुरू कर देते हैं। कभी-कभी एक ग्रन्थ को कल के लिये अधूरा छोड़कर उसके लिये निश्चित समय पर दूसरा ग्रन्थ प्रारम्भ कर देते हैं। बहुधा यह भी देखने में आता है कि अनियमित अध्ययनशील पुस्तकों के समय में समाचार-पत्र और समाचार-पत्रों के समय में साहित्यिक पत्रिकायें पढ़ रहे हैं। इसमें सन्देह नहीं कि वे अपना समय बिन पढ़े व्यय नहीं करते किन्तु उस कार्य में क्रम को स्थान नहीं देते। इस कमी के कारण अध्ययन से जितना लाभ होना चाहिये उतना नहीं हो पाता।

🔵 कार्यालयों में लिखा-पढ़ी का काम करने वाले अनेक परिश्रमी बाबू लोग अपनी इसी असामयिकता के कारण अच्छे कर्मचारियों की सूची में नहीं आ पाते वे पूरे समय काम में जुटे रहते हैं और कभी-कभी निर्धारित समय से अधिक समय तक भी। तब भी वे अपने उच्च अधिकारी की प्रियपात्रों की सूची में नहीं आ पाते। क्रम के साथ काम तथा फाइलों को उपयुक्त समय में न देने से उनका आवश्यक काम कभी-कभी पड़ा रहता है और गौण काम पूरा हो जाता है। इसी अव्यवस्था के कारण वे बहुत से तात्कालिक कामों को भूल जाते हैं इसलिये उनकी कार्य कुशलता के अंग कम हो जाते हैं। पत्र लिखने के समय फाइलों का अध्ययन और फाइल पढ़ने के समय टाइप पर बैठ जाने से न तो उनका कोई काम समय पर हो पाता है और कुशलतापूर्वक इस प्रकार असमय पूरा हुआ उनका काम अधूरे की श्रेणी में ही गिना जाता है। क्रम एवं सामयिकता से करने पर काम भी कुशलतापूर्वक होता है और आवश्यकता से अधिक समय भी नहीं लगता।

🔴 इस प्रकार के अव्यवस्थित कार्यकर्त्ता समय की पाबन्दी को एक बन्धन मानते हैं। उनकी अक्रमिक बुद्धि का तर्क होता है कि समय के साथ अपने को अथवा अपने काम को बांध देने से मनुष्य उसका इतना अभ्यस्त हो जाता है कि यदि कभी संयोग, विवशता अथवा परिस्थितिवश उसे व्यवधान स्वीकार करना पड़ता है तो उसे बड़ी परेशानी उठानी पड़ती है। प्रातःकाल पढ़ने अथवा व्यायाम करने वाले को यदि दो-चार दिन के लिए बाहर यात्रा पर जाना पड़ जाये तो निर्धारित कार्यक्रम में व्यवधान पड़ जाने से उसकी अभ्यस्त वृत्तियां विद्रोह करेंगी, जिससे यात्रा अथवा प्रवास के समय पर उसे बड़ी भ्रान्ति, क्लान्ति एवं व्यग्रता रहेगी।

🔵 समय पर भोजन के अभ्यस्त ब्याह-शादियों, मंगलोत्सवों अथवा शोक सम्भोगों के अवसरों पर या तो भूखों रहते हैं अथवा खाने से बीमार हो जाते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आध्यात्मिक साधना के त्रिदोष (भाग 2)

🔵 2. कपट- वस्तु के स्वरूप को अन्य प्रकार से दिखलाने का प्रयत्न कपट है मेरे हृदय में कुछ और ही। यह आत्मोन्नति का परम बाधक कारण है इस प्रपंच जाल से आत्मा बड़ी मलिन हो जाती है। भूमिका की शुद्धि के बिना सुभग चित्रों का आलेखन संभव नहीं। इसी प्रकार आत्मा का सरल-निष्कपट होना उसकी भूमिका शुद्धि है। जहाँ तक बकता है भ्रम फैलाने की वृति काम कर रही है, वहां तक सद्वृत्तियाँ पनप नहीं सकती। चित्त बहिर्मुखी बना रहता है। कैसे अपने दोषों को छिपाया जाये दूसरे को ठगा जाये, इसी में चित्त फंसा रहता है। वहाँ सुविचारों को अवकाश कहाँ? जो पापी है और अपने आपको छिपाने का प्रयत्न कर लोगों के समक्ष अपने को धर्मी दिखलाने की कोशिश करता है, उसका सुधार बहुत ही कठिन है।

🔴 3. अवगुणग्राही दृष्टि- यह भी एक बड़ा भारी अवगुण है इसके कारण मनुष्य अवगुणों की ओर अग्रसर होता है। ऐसी आत्मा हजार गुणों को नहीं देखती बल्कि छिद्रान्वेषी होकर अवगुण की ओर ही झुकती है। यह नहीं सोचती कि दोष हम सब में है किसी में कम और किसी में अधिक और पराये दोषों को देखने से लाभ ही क्या? एक सन्त ने इस सम्बन्ध में बहुत ही सुन्दर कहा है, “हे आत्मा दूर जलती हुई अग्नि को क्या देखता है। तेरे स्वयं पैरों में द्वेषों की अग्नि सुलग रही है उसे देखो, पराये मैल में कपड़े धोने से वे उज्ज्वल कैसे होंगे। थोड़े बहुत अवगुण सभी में होते हैं तुम्हारे में भी हैं तो अपने दोषों को क्यों नहीं देखते पराई निन्दा में क्यों लगे हो। निन्दा करने की यदि तुम्हारी आदत ही पड़ गई है तो अपने दोषों की निन्दा करो। अतः अपने दोषों की ओर दृष्टि डालों और दूसरे की निन्दा को छोड़ो।

🔵 “मनुष्य जैसे विचारों में रहता है वैसा ही बन जाता है” अवगुणों को ढूँढ़ने की दृष्टि रखने से स्वयं अवगुण का भाजन हो सकता है। इसीलिए इस दृष्टि दोष को निवारण कर हमें अपनी दृष्टि को गुण ग्राहक बनाना आवश्यक है। अवगुण देखने हो तो अपने देखो, जिससे उन्हें छोड़ने की भावना जगे तथा आत्मा दोष रहित बने। औरों के तो गुण ही देखो जिससे गुणी बने और गुणों के प्रति तुम्हारा आकर्षण बढ़े।

🔴 इन तीनों विवेचना का सार यही है कि इनके द्वारा आत्मा को बढ़ने का अवकाश भी नहीं होता। अतएव बहिर्मुखी वृत्तियों की ओर से हटकर अन्तर्मुखी होने का लक्ष्य रखा जाय। महत्व, कपट और अवगुण ग्राही दृष्टि से बचा जाय तभी आत्मोन्नति होगी।

🌹 समाप्त
🌹 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1950 पृष्ठ 14

👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...