रविवार, 7 मई 2017

👉 ऐसी सीख न दीजिए

🔵 सुप्रसिद्ध दार्शनिक कन्फ्यूशियस के बुद्धिमान् शिष्य चाँग-होचाँग एक बार देश भ्रमण के लिए निकले। प्रजा की भलाई के लिए सामाजिक अध्ययन और उपयुक्त वातावरण का शोध इस भ्रमण का मुख्य उद्देश्य था।

🔴 घूमते-घूमते चाँग ताईवान पहुँचे। एक युवक माली कुँए से जल निकाल रहा था, बाल्टी पानी निकालने और फिर ढोकर हेर पौधे तक पहुँचाने में उसे बहुत अधिक परिश्रम करना पड रहा था तो भी काफी काम बाकी पड़ा था। चाँग को उस पर बडी दया आई। काफी देर सोचते रहे कोई ऐसा उपाय नहीं है क्या, जिससे माली का परिश्रम हलका किया जा सके।

🔵 विचार करे तो सैकडो़ वर्षों की सडी़-गली परंपराएँ रीति-रिवाज भी सगे-संबंधी की तरह चिपके कष्ट देते रहते हैं, पर विचार की एक छोटी-सी चिनगारी भी उन्नतियों के राजमहल खड़ी कर सकती है। चाँग ने सोचा यदि लकडी़ की एक घिर्री बनाकर उसमें रस्सी लपेटकर खड़े-खड़े ही खींचने का प्रबध हो जाए और यहीं से प्रत्येक वृक्ष तक के लिए नाली खोद ली जाए, तो माली का यथेष्ट श्रम बच सकता है। इतने ही परिश्रम में वह पहले से अधिक काम कर सकता है।

🔴 माली ने इस योजना के लाभ समझे और उसे मान लिया। ढेंकलीनुमा व्यवस्था हो गई। माली वहीं खडा-खड़ा पानी निकाल कर पौधे सींचने लगा।

🔵 समय तो बचा, पर माली ने देखा उसके चलने-फिरने-झुकने-लचकने के कई व्यायाम अब नहीं रहे इसलिए शरीर के कुछ अंग शिथिल रहने लगे हैं, तो भी उसे इस बात का संतोष था कि तब से कुछ काम अधिक हो जाने से शरीर का हर अवयव का कुछ-न-कुछ तो क्रियाशील हो ही जाता है इसलिए स्वास्थ्य में गिरावट की कोइ विशेष चिंता नहीं हुई।

🔴 चाँग आगे बढ़ गए। बहुत दूर तक घूम चुकने के बाद वे फिर से उसी रास्ते वापस लौटे तो उनके मस्तिष्क में एक और बात याद आई कि यदि कुएँ में भाप से चलने वाली गशीन डाल दी जाए तो परिश्रम भी बिलकुल कम हो जाए और वृक्षों को जल भी खूब मिलने लगे। माली ने वह प्रस्ताव भी स्वीकार कर लिया। भाप का इंजन लग गया, माली को चैन हो गया।

🔵 काफी दिन बीतने के बाद एक दिन चाँग की इच्छा उस बाग को देखने की हुई, उसने सोचा था बगीचा अब लहलहा रहा होगा, पर वहाँ जाकर देखा तो स्तब्ध रह गया। पूछने पर पता चला, माली बीमार रहता है, इसलिये समय बे समय ही पानी मिल पाता है, इसी से पेड-पौधे मुरझा रहे हैं।

🔴 चाँग माली को देखने उसके घर गए। सचमुच माली बीमार था। उसके हाथ सूख गए थे, टाँगे कमजोर हो गई थीं, पेट दो रोटी से ज्यादा नहीं पचा सकता था, माली का मुँह पीला पड गया था।

🔵 चाँग ने हँसकर पूछा- कहो भाई, अभी भी अधिक परिश्रम करना पड़ता है क्या तो कोई और तरकीब सोचें। पास खडी मालिन ने कहा-श्रीमान् जी, और तरकीब लडाने की अपेक्षा तो आप इन्हें ऐसी सीख दीजिए कि पहले की तरह फिर से अपने हाथ से ही काम करने लगें। ढेंकली का आराम ही इनकी बीमारी का कारण है। चाँग अपने एकांगी चिंतन पर बहुत पछताए, उन्होंने सोचा मनुष्य यांत्रिक और बिना परिश्रम के जीवन के आकर्षण में न पडता तो वह क्यों अस्वस्थ होता, क्यों रोगी ? उसने माली से अपनी स्त्री की ही राय मान लेने की सीख दी और वही से वापस चला आया। माली अपनी पूर्व जीवन पद्धति में आकर पुन: स्वस्थ हो गया पर उसकी छूत आज की पीढ़ी को लग गई, जो मशीनों से काम लेकर स्वयं आराम से बैठा केवल कलम घिसना चाहता है। माली की तरह वह न तो उत्पादन बढा पाता है न बीमारी हटा पाता है। केवल मशीनें बढ़ रही है और मनुष्य उसमें निरंतर दबता पिसता चला जा रहा है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 157, 158

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