शनिवार, 25 अगस्त 2018

👉 सभी जीवों में शिव की सेवा करो

🔷 जो शिव की सेवा करना चाहता है, उसे पहले उनकी सन्तानों - विश्व के प्राणियों की सेवा करनी होगी। शास्त्रों में कहा है कि जो भगवान के दासों की सेवा करता है वही भगवान का सर्वश्रेष्ठ दास है। यह बात सदा ध्यान में रखनी होगी। निःस्वार्थपरता ही धर्म की कसौटी है। जिसमें जितनी अधिक निःस्वार्थपरता है, वह उतना ही अध्यात्मिक और उतना ही शिव के समीप है। चाहे वह विद्वान हो गया मूर्ख, शिव का सामीप्य दूसरों की अपेक्षा उसे ही प्राप्त है, चाहे उसे इसका ज्ञान हो या न हो। और इसके विपरीत यदि कोई स्वार्थी है, तो चाहे अपनी शक्ल चीते जैसी क्यों न बना ली हो, शिव से वह बहुत दूर है।

~ रामकृष्ण परमहंस

👉 चाबी बन जाओ

🔷 किसी गाँव में एक ताले वाले की दुकान थी,ताले वाला रोजाना अनेकों चाबियाँ बनाया करता था। ताले वाले की दुकान में एक हथौड़ा भी था, वो हथौड़ा रोज देखा करता कि ये चाभी इतने मजबूत ताले को भी कितनी आसानी से खोल देती है।

🔶 एक दिन हथौड़े ने चाभी से पूछा कि मैं तुमसे ज्यादा शक्तिशाली हूँ, मेरे अंदर लोहा भी तुमसे ज्यादा है और आकार में भी तुमसे बड़ा हूँ लेकिन फिर भी मुझे ताला तोड़ने में बहुत समय लगता है और तुम इतनी छोटी हो फिर भी इतनी आसानी से मजबूत ताला कैसे खोल देती हो।

🔷 चाभी ने मुस्कुरा के ताले से कहा कि तुम ताले पर ऊपर से प्रहार करते हो और उसे तोड़ने की कोशिश करते हो लेकिन मैं ताले के अंदर तक जाती हूँ, उसके अंतर्मन को छूती हूँ और घूमकर ताले से निवेदन करती हूँ और ताला खुल जाया करता है।

🔶 वाह! कितनी गूढ़ बात कही है चाभी ने कि मैं ताले के अंतर्मन को छूती हूँ,और वो खुल जाया करता है।

🔷 इसीलिये हम और आप कितने भी शक्तिशाली हो या कितनी भी हम और आपके पास ताकत हो, लेकिन जब तक हम और आप लोगों के दिल में नहीं उतरेंगे, उनके अंतर्मन को नहीं छुएंगे तब तक कोई आपकी इज्जत नहीं करेगा।

🔶 हथौड़े के प्रहार से ताला खुलता नहीं बल्कि टूट जाता है, ठीक वैसे ही अगर हम और आप शक्ति के बल पर कुछ काम करना चाहते हैं, तो आप सामान्यत: नाकामयाब रहेंगे क्योंकि शक्ति के द्वारा आप किसी के दिल को छू नही सकते है।

तो
"चाबी बन जाओ, सबके दिल की चाबी"

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 August 2018


👉 आज का सद्चिंतन 26 Aug 2018


👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 38)

👉 बड़े कामों के लिए वरिष्ठ प्रतिभाएँ

🔷 निजी जीवन में प्रतिभा परिष्कार का शुभारंभ आलस्य और प्रमाद से निपटने को वरीयता देेकर करना चाहिए। छोटे काम सहायकों से कराते हुए बड़े-कठिन और वजनदार कार्यों का दायित्व अपने कंधों पर ओढ़ना चाहिए। हलके काम तलाश करने और किसी प्रकार मौज-मजे में समय काटने की आदत मनुष्य को आजीवन अनगढ़ ही बनाए रहती है। जो अपने हिस्से के काम के साथ-साथ समूचे संबद्ध क्षेत्र के हर पक्ष के उतार-चढ़ावों का ध्यान रखते हैं और संबद्ध व्यक्तियों को उसमें सुधार के आवश्यक परामर्श प्रस्ताव के रूप में नम्रतापूर्वक देते रहते हैं, वस्तुत: उन्हीं को सूत्र संचालक समझा जाता है। ऐसे लोग अहंकारी और आग्रही नहीं होते। आदेश भी नहीं देते। अपने प्रस्ताव इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं, जिसमें अपने अहंकार की, विशेषज्ञ होने की गंध न आती हो और दूसरों पर आक्षेप या दोषारोपण भी न लदता हो। सत्परामर्श की ही नहीं, तिरस्कारपूर्ण आदेश की भी अवहेलना होती है, कारण कि इसमें दूसरों के स्वाभिमान को चोट जो लगती है।
  
🔶 कोल्हू का बैल भी अपने नियत काम में लगा रहता है। विशेषता उसकी है, जो संबद्ध परिकर के हर पक्ष पर ध्यान रखता है। संभावनाओं की कल्पना करता है और शतरंज की गोटियों की तरह सतर्कतापूर्वक बाजी जीतने वाली चाल चलता रहता है। व्यवस्थापक ऐसे ही लोग बन पाते हैं और वे न केवल अपने काम की, वरन् समूचे संबद्ध का  सुनियोजन कर सकने की क्षमता सिद्ध करते हुए, अगले दिनों अधिक ऊँची श्रेणी का दायित्व सौंपे जाने का श्रेय उपलब्ध करते हैं। व्यावहारिक क्षेत्र का धर्मात्मा ऐसे ही लोगों को कहना चाहिए। अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य आदि दार्शनिक-नैतिक सद्गुण तो प्रथम कक्षा में उत्तीर्ण होने के उपरांत ही सफलतापूर्वक संचित किए जा सकते हैं। आरंभ तो निजी जीवन में उत्साह भरी व्यस्तता अपनाने से होता है।

🔷 परिवार क्षेत्र में प्रतिभाशालियों द्वारा, व्यवस्था संबंधी प्रयोग करना सरल पड़ता है। परिवार के सदस्यों से निरंतर संपर्क रहता है, उनके साथ आत्मीयता भरा बंधन भी रहता है, इसलिए अनुशासन पालने के लिए उन्हें अनुरोध एवं आग्रह के आधार पर अधिक अच्छी तरह सुनियोजित किया जा सकता है। इसी अभ्यास को जब व्यवसाय या समाज क्षेत्र में प्रयुक्त किया जाता है, तो उन्हें बड़े क्षेत्र की बड़ी सफलता का श्रेय भी अधिक मिलता है और व्यक्तित्व में प्रतिभा परिवर्धन का लाभ भी अनवरत रूप से मिलता चला जाता है।
  
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 48

👉 Scientific Basis of Gayatri Mantra Japa (Part 5)

🔷 The same is true about the impact of japa too; the effects of the mantra-vibrations cannot be felt without rhythmic repetition. The "dhi" element of the Gayatri Mantra refers to prayer for the awakening of intellect. Just uttering it once or twice cannot have the desired effect. Our mind is like a barren, uneven, hard landscape, which frustrates all attempts at its calming and refinement. In order to make the seed of sadhana germinate and sprout, the field of mind needs to be cleared, ploughed and irrigated with the help of japa; one has to peep inside and identify, mercilessly uproot and throw out the debris of accumulated evil tendencies. Sowing the seeds of virtues is not possible without this cleaning of deep rooted negativities. Japa can also be likened to cleaning, sharpening and glazing. Its repeated friction and subtle pressure calms down and cleanses the mind so that it could clearly reflect glow of the spirit.

🔶 Every devotee of Gayatri should therefore perform japa everyday for a fixed number of times at a fixed place, during fixed intervals of time. The arbitrary mode of excessive watering on some days and keeping the land dry on the others does not serve the purpose of proper irrigation of field. The same is true of the training of mind by japa. Regularity, sincerity, patience and consistency should be observed in this practice, as far as possible. This should also be continued over a long duration depending upon the sadhaka's inherent tendencies and mentality- till the dawn of the rays of success in the sadhana.

📖 Akhand Jyoti, Mar Apr 2003

👉 बड़प्पन की सही कसौटी

🔷 वैभव के आधार पर बड़प्पन आँकने की प्रथा इस संसार में है। जिनके पास जितनी संपदा, शिक्षा एवं चतुरता है, उसी अनुपात से उसके बड़प्पन का मूल्य आँका जाता है। बलिष्ठता और प्रतिभा भी उसी वर्ग में आती है, जो दूसरों पर अपनी छाप छोड़ती है तथा धाक जमाती है। लोग उग्रता, आतंकवाद, दुष्टता और हानि पहुंचाने की शाक्ति को देखते हुए भी डरते हैं, मान देते हैं।

🔶 बड़प्पन के मूल्यांकन की यह सभी कसौटियाँ ओछी तथा खोटी हैं। इनके सहारे हम किसी व्यक्ति का सही मूल्यांकन नहीं कर सकते। कसौटी ही खोटी हो, तो सोने और पीतल का अन्तर कैसे जाना जाय?

🔷 व्यक्तित्व की वास्तविक ऊँचाई उसकी सुसंस्कारिता के आधार पर आँकी जानी चाहिए। देखा जाना चाहिए कि किसने अपने आप में गुण, कर्म, स्वभाव के क्षेत्र में कितनी उत्कृष्टता अपनाई है और निजी चरित्र तथा दूसरों के साथ सद्व्यवहार में किस सीमा तक अपनी विशिष्टता अपनाई है।

🔶 जो अपने को जितना संयत, सज्जन और अनुशासित बना सका, वह उतना ही महान् है। धर्म- चिह्नो या प्रचलनों से कोई धर्मात्मा नहीं बनता। जिसने आदर्शांे के प्रति अपनी निष्ठा जिस सीमा तक परिपक्व की है, वस्तुतः उसी का बड़प्पन सफल और सराहनीय है।

✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 परिजनों से गुरुदेव की आशा और अपेक्षा (अन्तिम भाग)

🔷 जहाँ थोड़े भी परिवार हैं वहाँ उन्हें संगठित हो जाना चाहिए। युग निर्माण परिवार बना लेना चाहिए और यदि न्यूनतम संख्या ही है तो भी उन्हें टोली बनाकर जन संपर्क के लिये निकलना चाहिये और नये युग की विचारणा एवं प्रक्रिया से सर्व साधारण को परिचित कराने के लिये निकलना चाहिये।

🔶 शाखा संगठन के उद्देश्य, स्वरूप और कार्यक्रमों की अगले पृष्ठों पर चर्चा है। प्रयत्न हर जगह यह होना चाहिये कि सामूहिकता का विकास हो, और संगठित परिजन उन क्रिया कलापों को आगे बढ़ाने में पूरा उत्साह और सहयोग दिखायें। संघ शक्ति के बिना युग परिवर्तन जैसे महान अभियान में प्रगति नहीं हो सकती इसलिए एकाकी कुछ टुन मुन करते रहने की अपेक्षा हमें सुसंगठित ही होना चाहिए और अपने आपको सृजन सेना का सदस्य मानकर नव निर्माण की दिशा में कुछ चिन्तन और कुछ प्रयत्न निरन्तर करते रहना चाहिए।

🔷 एक से दस का कर्त्तव्य ध्यान में रखा जाना चाहिए। पत्रिकायें जहाँ भी पहुँचती हैं- जिनके पास भी पहुँचती हैं वहाँ यह कर्त्तव्य समझा जाना चाहिये कि इन्हें पढ़ने या सुनने का लाभ कम से कम दस व्यक्ति तो उठा ही लिया करें। इसके लिये थोड़ी दौड़ धूप और चेष्टा हर किसी को करनी चाहिये।

🔶 यह प्राथमिक कसौटी है जिस पर कस कर किसी परिजन की अध्यात्म निष्ठा को परखा जा सकेगा और यह समझा जा सकेगा कि उस अभियान के संचालक के साथ उनका मोह ही नहीं प्रेम भी है। मोह दर्शन लाभ करने मात्र से तृप्त हो जाता है पर प्रेम तो कुछ अनुदान माँगता है जो कुछ न दे सके, उचित अनुरोध आग्रह पर भी ध्यान न दे सके उसे कुछ भले ही कहा जाय ‘प्रेमी’ तो नहीं ही कहा जायगा। गुरु देव अपने मार्ग दर्शक के प्रति अपने श्रद्धा भरे प्रेम का परिचय आजीवन देते चले आये हैं वे चाहते हैं कि उनके साथ बँधे हुए लोग भी अपनी भावनात्मक गहराई का एक ही प्रमाण परिचय प्रस्तुत करें। सघन अनुदान-सक्रिय मार्ग दर्शन और शक्ति प्रत्यावर्तन के लिये भी अधिकारी पात्रों को कब से तलाश कर रहे हैं। अब तो वह तलाश व्याकुलता में परिणत हो गई है। पर परिजनों में पात्रता का अभाव उन्हें इतना कष्टकारक होता है कि वे कभी-कभी रो पड़ते हैं।

🔷 परिजनों को आत्मिक प्रगति की दिशा में कहने लायक प्रगति करने के लिये उपरोक्त कसौटियों पर अपनी पात्रता सिद्ध करनी चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 माता भगवती देवी शर्मा
📖 अखण्ड ज्योति, मई 1972 पृष्ठ 44


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1972/May/v1.44

👉 युवक के गुण

🔶 युवा होने का एक ही अर्थ है, जिसकी आत्मा विद्रोही हो, जो झुकना नहीं टूटना जानती हो। जो परिवर्तन चाहता है। जो जीवन को नई दिशाओं में नए आयामों में ले जाने को हमेशा तत्पर हो। क्रान्ति की उद्याम लालसा ही युवा होने का लक्षण है।

🔷 बूढा़ होने का क्या अर्थ है। जो जीवन को स्वीकार न करे, जो हमेशा जीवन के अन्धकारपूर्ण पक्ष की बातें करे, जो घोर निराशावदि हो, जिसे दो रातों के बीच का दिन छोटा प्रतीत होता हो। जो गुलाब की सुन्दरता और सुगन्ध की अवहेलना करे और काँटों को गिने, उनकी बुराई करे। ऐसे लोग जीवन की ओर नहीं, मृत्यु की और उन्मुख होते हैं। युवा होने का अर्थ है जीवन का सामना करना। जो जीवन के साथ दो-दो हाथ करने को तैयार हो, वही युवक है।

🔶 युवक मैं उसे कहूँगा जो खतरों से खेलने को, जूझने को तैयार हो। लीक से हटकर चलने को तैयार हो। पर ऐसे लोगों की संख्या कम है, क्योंकि खतरा मोल लेने में, लीक से हटकर चलने में, भटक जाने का, बिखर जाने की सम्भावना है। यदि नदी समुद्र में जाने से डरे, तो क्या होगा? जो भटकने से डर गया, वह पंगु हो जाता है, डरपोक हो जाता है।

✍🏻 स्वामी विवेकानन्द

👉 अहंकार का त्याग

🔶 मृत्यु के बाद एक साधु और एक डाकू साथ-साथ यमराज के दरबार में पहुंचे।

🔷 यमराज ने अपने बहीखातों में देखा और दोनों से कहा-यदि तुम दोनों अपने बारे में कुछ कहना चाहते हो तो कह सकते हो। डाकू अत्यंत विनम्र शब्दों में बोला- महाराज! मैंने जीवनभर पाप कर्म किए हैं। मैं बहुत बड़ा अपराधी हूं। अत: आप जो दंड मेरे लिए तय करेंगे, मुझे स्वीकार होगा।

🔶 डाकू के चुप होते ही साधु बोला- महाराज! मैंने आजीवन तपस्या और भक्ति की है। मैं कभी असत्य के मार्ग पर नहीं चला। मैंने सदैव सत्कर्म ही किए हैं इसलिए आप कृपा कर मेरे लिए स्वर्ग के सुख-साधनों का प्रबंध करें।

🔷 यमराज ने दोनों की इच्छा सुनी और डाकू से कहा- तुम्हें दंड दिया जाता है कि तुम आज से इस साधु की सेवा करो। डाकू ने सिर झुकाकर आज्ञा स्वीकार कर ली।

🔶 यमराज की यह आज्ञा सुनकर साधु ने आपत्ति करते हुए कहा- महाराज! इस पापी के स्पर्श से मैं अपवित्र हो जाऊंगा। मेरी तपस्या तथा भक्ति का पुण्य निर्थक हो जाएगा। यह सुनकर यमराज क्रोधित होते हुए बोले- निरपराध और भोले व्यक्तियों को लूटने और हत्या करने वाला तो इतना विनम्र हो गया कि तुम्हारी सेवा करने को तैयार है और एक तुम हो कि वर्षो की तपस्या के बाद भी अहंकारग्रस्त ही रहे और यह न जान सके कि सबमें एक ही आत्मतत्व समाया हुआ है। तुम्हारी तपस्या अधूरी है। अत: आज से तुम इस डाकू की सेवा करो।

🔷 कथा का संदेश यह है कि वही तपस्या प्रतिफलित होती है, जो निरहंकार होकर की जाए। वस्तुत: अहंकार का त्याग ही तपस्या का मूलमंत्र है और यही भविष्य में ईश उपलब्धि का आधार बनता है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 August 2018


👉 आज का सद्चिंतन 25 Aug 2018


👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 37)

👉 बड़े कामों के लिए वरिष्ठ प्रतिभाएँ

🔶 अपने दायित्व की क्रमबद्ध व्यवस्था बना लेना इस बात का प्रमाण है कि व्यक्ति की दूरदर्शिता विवेकशीलता और कार्यकुशलता उच्चस्तर की है। कारखानों-दफ्तरों में, मैनेजरों की योग्यता पर उनका संचालन और विकास निर्भर रहता है। शासन में, प्राँतों के संरक्षक गवर्नर माने जाते है। अँग्रेजी शासन के जमाने में भारत के प्रधान व्यवस्थापक को गवर्नर, जनरल कहते थे। वह पद सबसे ऊँचा माना जाता था। सुपरिंटेंडेंट शब्द भी प्राय: इसी अर्थ का बोधक है।
  
🔷 महत्त्वपूर्ण सफलताएँ जब भी, जहाँ भी, जिन्हें भी मिली हैं, उनमें व्यवस्था तंत्र की प्रमुख भूमिका रही है। सेनापतियों का कौशल उनकी रणनीति के आधार पर आँका जाता है। योजनाबद्ध उपक्रम बनाकर ही विशालकाय निर्माण कार्य बन पड़ते हैं। श्रम को, श्रमिकों को, साधनों को पर्याप्त मात्रा में जुटा लेने पर भी इस बात की गारंटी नहीं होती कि जिस स्तर की जितनी सफलता अभीष्ट थी, वह मिल ही जाएगी। यह संभावना इस बात पर टिकी रहती है कि आज के उपलब्ध साधनों का किस प्रकार श्रेष्ठतम उपयोग करते बन पड़ा। यह इस बात पर निर्भर रहता है कि हाथ के नीचे जो काम हैं, उसके अनुकूल और प्रतिकूल पक्ष की, हर हलचल और समस्या को कितनी गंभीरता और यथार्थता के साथ आँका गया? समय रहते उनसे निपटने का किस प्रकार जुगाड़ बिठाया गया?

🔶 सफलता ऐसे ही तेजस्वियों का वरण करती है। श्रेयाधिकारी वे ही बनते हैं। जो मात्र अपने जिम्मे के काम को बेगार की तरह भुगत लेते हैं, उन्हें श्रमिक भर कहा जा सकता है। व्यवस्थापक का श्रेय तो उन्हें मिल ही नहीं पाता। परिपूर्ण दिलचस्पी, एकाग्र मनोयोग, समुचित उत्साह और आगे बढ़ने का अदम्य साहस मिलकर ही ऐसी स्थिति विनिर्मित करते हैं, जिसमें बड़े काम सध सकें, भले ही प्रश्नकर्ता साधारण साधनों, साधारण योग्यताओं वाला ही क्यों न हो? ऐसे लोग परिस्थितियों की प्रतिकूलता से भयभीत नहीं होते। उन्हें अनुकूल बनाने में अपनी समग्र क्षमता को दाँव पर लगाते हैं। ऐसे ही लोग नेतृत्व कर सकने के अधिकारी होते हैं। यों ऊँची कुरसी पर बैठने और पदवी पाने के लिए तो नर-वानर भी लालायित रहते हैं।
  
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 47

👉 Scientific Basis of Gayatri Mantra Japa (Part 4)

🔶 In terms of spiritual elevation these correspond to
(i) Self-Analysis;
(ii) Self-Refinement;
(iii) Self-Development;
(iv) Self-Realization.

🔷 These are gradual steps of the realization through japa- sadhana. Although we don't find the multiple activities and exercises like yoga practices in it, the sadhana process of japa is so effective that just with the sincere performance of this single practice, starting with self-analysis, we can reach the supreme goal of self-realization. The great significance of japa is not due to chance, or without any firm basis. Had it been so, such a large number of devotees and yogis of the Gayatri Sadhana would not have been advised to waste time in practicing more and more japa for longer and longer durations.

🔶 The aforesaid principles of psychology and spirituality work towards success of japa. These can elevate the devotee’s personality out of the darkness of ignorance into the light of divine wisdom. The four principles mentioned above work in the subliminal domains of the consciousness to remove the layers of ignorance from the subconscious and thus help in the emergence of light of spirit within the individual soul.

🔷 Training is an integral part of education. It is indeed the first samskara to be cultivated for personality development. We may never find an educated person who has not undergone training in one form or the other. From nursery rhymes and tables to revision and continuous practice of problem solving in higher classes the process of training by cramming and repetition is very common; this is also necessary for the inculcation of any desired tendency.

📖 Akhand Jyoti, Mar Apr 2003

👉 परिजनों से गुरुदेव की आशा और अपेक्षा भाग 2

🔶 जहाँ एक पत्रिका अखण्ड-ज्योति ही मँगाई जाती है वहाँ प्रयत्न करके युग निर्माण योजना मँगाना भी आरम्भ कर दिया जाना चाहिए। क्योंकि युग परिवर्तन के महान अभियान का मार्ग दर्शन एवं स्वरूप उसी के प्रकाश में जाना जा सकता है। जो मँगाते नहीं हैं उन्हें भी यह प्रयत्न करना चाहिए कि कहीं से माँग कर पढ़ लें। अब उस की उपयोगिता भी अखण्ड-ज्योति जितनी हो गई है।

🔷 जो पचास वर्ष के हो गये। जिनके बड़े बच्चे अपने छोटे भाई बहिनों का उत्तरदायित्व संभालने में समर्थ हो गये अथवा जिनके पास गुजारे के लिए दूसरे साधन मौजूद हैं उन्हें अधिक कमाने और बेटे पोतों के लिये अधिक संग्रह करने की ललक छोड़ देनी चाहिए। यह लिप्सा अब बहुत पीछे युग की बात रह गई। समाजवाद का युग बिलकुल निकट आ गया। संग्रहीत पूँजी का लाभ कोई न उठा सकेगा। हर किसी को रोज कुँआ खोदना और रोज पानी पीना पड़ेगा। अमीरी अब गये गुजरे जमाने की बात हो चली। राजाओं के राज गये-जमींदारों की जमींदारी-महन्तों की महन्ती भर रही है। समानता की लहरें आकाश-चूम रही हैं। धनी और हरामखोर व्यक्ति अगले दिनों सम्मान नहीं तिरस्कार प्राप्त करेंगे। घृणित समझे जायेंगे और बुरी तरह मरेंगे। इसीलिए समय रहते उस विपत्ति भरी कुरुचि को समय से पूर्व ही छोड़ देना चाहिए और जो समय लोभ एवं मोह की पूर्ति में लगाया जा रहा है, उसे लोक मंगल के लिये नियोजित करने की बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता दिखानी चाहिए। समर्थ व्यक्तियों को ऐसी ही हिम्मत दिखाने की आवश्यकता है।

🔶 जहाँ कला, प्रतिभा, बुद्धि, कुशलता, सम्पदा जैसी ईश्वर प्रदत्त अतिरिक्त विभूतियाँ हैं उनकी जिम्मेदारी और भी अधिक है। इस ईश्वरीय अमानत को वे गुलछर्रे उड़ाने के लिए नहीं विश्व मानव को सुविकसित समुन्नत बनाने के लिये पवित्र धरोहर समझें और उसका उसी रूप में प्रयोग करें। न करेंगे तो सामान्य व्यक्तियों की अपेक्षा ऐसे विभूतिवान व्यक्ति ईश्वर के दरबार में अधिक बड़े अपराधी ठहराये जायेंगे और अधिक दण्ड के भागी बनेंगे। भावी पीढ़ियाँ भी उन्हें घृणास्पद ही मानेंगी।

🔷 समाज को ईश्वर की प्रत्यक्ष प्रतिमा मानना चाहिए और अपने पुण्य परमार्थ की सत्प्रवृत्ति को भावनात्मक नव निर्माण की श्रेष्ठतम युग साधना में नियोजित करना चाहिये। न्यूनतम समय एक घण्टा और न्यूनतम राशि - ही इस कार्य के लिए अनिवार्य मानी गई है। प्रयत्न यह करना चाहिए कि 8 घण्टे सोने 8 घण्टे आजीविका उपार्जन और 4 घण्टा फुटकर कामों में खर्च करने के उपरान्त 4 घण्टा प्रतिदिन लोक मंगल के लिए लगाये जायें और महीने में एक एक दिन की आमदनी नव निर्माण के लिए लगाने के उदारता दिखाई जाय।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 माता भगवती देवी शर्मा
📖 अखण्ड ज्योति, मई 1972 पृष्ठ 43

👉 सम्पदा को रोकें नहीं

🔶 परमात्मा के अनन्त वैभव से विश्व में कमी किसी बात की नहीं। भगवान् आपके हैं और उसके राजकुमार के नाते सृष्टि की हर वस्तु पर आपका समग्र अधिकार है। उसमें से जब जिस चीज की जितनी आवश्यकता हो, उतनी लें और आवश्यकता निबटते ही अगली बात सोचें। संसार में सुखी और सम्पन्न रहने का यही तरीका है।

🔷 बादल अपने, नदी अपनी, पहाड़ अपने और वन खाद्यान्न अपने। इनमें से जब जिसके साथ रहना हो, रहें। जिसका जितना उपयोग करना हो करें। कोई रोक- टोक नहीं है। नदी को रोक कर यदि अपना बनाना चाहेंगे और किसी दूसरे को पास न आने देंगे, उपयोग न करने देंगे, तो समस्या उत्पन्न होगी। एक जगह जमा किया हुआ पानी अमर्यादित होकर बाढ़ के रूप में उफनने लगेगा और आपके निजी खेत- खलिहानों को ही डुबो देगा। बहती हुई हवा कितनी ही सुरभित क्यों न हो, उसे आप अपने ही पेट में  भरना चाहेंगे, तो पेट फूलेगा, फटेगा, औचित्य इसी में है कि जितनी जगह फेफड़ों में हो उतनी ही श्वास में और बाकी हवा दूसरों के लिये छोड़ दें। मिल- बांटकर खाने की यह नीति ही सुखकर है।

✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य