गुरुवार, 2 अगस्त 2018

👉 ऐश्वर्य का अभिमान निरर्थक

🔷 एक धनिक ने एक संन्यासी को निमन्त्रण दिया। संन्यासी आये तो धनिक ज्ञान चर्चा करना तो भूल गया, उन्हें बैठा कर अपने वैभव की बात कहने लगा-मेरे इतने मकान हैं, बम्बई में मैंने एक विशाल भवन और धर्मशाला बनवाई हैं, शीघ्र ही तुम्हारे जैसे भूखों के लिए अन्न क्षेत्र खोलने वाला हूँ, अब भी आधे सेर खिचड़ी तो हर भिखारी को मेरे घर से मिल जाती है। मेरे लड़के विलायत घूमने जा रहे है।’ संन्यासी उसकी सभी बात चुपचाप सुनते रहे। जब वह चुप हो गया तो दीवार पर टँगे एक नक्शे को देखकर बोले- यह कहाँ का नक्शा हैं?’ धनिक ने कहा-दुनिया का?’ संन्यासी बोले- इसमें हिन्दुस्तान कहाँ हैं?’ धनिक ने उँगली रख कर बताया तो उन्होंने फिर पूछा- और बम्बई?’ धनिक ने उँगली रखकर बम्बई भी बता दी। संन्यासी बोले- इसमें तेरा भवन और धर्मशाला कहाँ हैं?” धनिक बोला-संसार के नक्शे में यह सब चीजें कहाँ से आतीं?’ संन्यासी ने कहा- जब संसार के नक्शे में तुम्हारे वैभव का नाम निशान भी नहीं तो उसका अभिमान ही क्या करना? धनिक ने सिर झुका लिया और अभिमान की बातें सदा को त्याग दीं।

👉 कर्म से ही भाग्य बनता है


🔶 एक चित्रकार था। जो अद्भुत चित्र बनाता था। लोग उसकी चित्रकारी की बहुत तारीफ़ किया करते थे। एक दिन श्रीकृष्ण मन्दिर के भक्तों ने उनसे भगवान श्रीकृष्ण और कंस का एक चित्र बनाने की इच्छा प्रगट की  चित्रकार इसके लिए तैयार हो गया। आखिर भगवान का काम था। पर, उसने एक शर्त रखी।

🔷 उसने कहा - "मुझे योग्य पात्र चाहियें। अगर वे मिल जायें तो ही मैं चित्र बना पाऊँगा। श्रीकृष्ण के चित्र के लिए एक योग्य नटखट बालक और कंस के लिए एक क्रूर भाव वाला व्यक्ति लाकर दें। तब ही मैं चित्र बनाकर दूँगा।"

🔶 श्रीकृष्ण मन्दिर के भक्त एक बालक को ले आए। बालक सुन्दर था। चित्रकार ने उसे पसन्द किया और उस बालक को सामने बिठाकर बाल श्रीकृष्ण का एक सुन्दर चित्र बनाया।

🔷 अब बारी कंस की थी। पर, क्रूर भाव वाले व्यक्ति को ढूंढना थोड़ा मुस्किल था। जो व्यक्ति श्रीकृष्ण मन्दिर वालों को पसन्द आता, वो चित्रकार को पसन्द नहीं आता। उसे वो भाव नहीं मिल रहे थे, जो उसे चाहियें थे।

🔶 वक्त गुजरता गया। आखिरकार थक हारकर सालों बाद वो अब किसी जेल में चित्रकार को ले गए। जहाँ उम्रकेद काट रहे अपराधी थे। उन अपराधियों में से एक को चित्रकार ने पसन्द किया और उसे सामने बिठाकर उसने कंस का एक चित्र बनाया। श्रीकृष्ण और कंस की वो तस्वीरें आज सालों बाद पूर्ण हुईं।

🔷 श्रीकृष्ण मन्दिर के भक्त उन तस्वीरों को देखकर मन्त्रमुग्ध हो गए। उस अपराधी ने भी वे तस्वीरें देखने की इच्छा व्यक्त की। उस अपराधी ने जब वो तस्वीरें देखीं तो वह फूट-फूटकर रोने लगा। यह सब देखकर सभी अचम्भित हो गए। चित्रकार ने बड़े प्रेम से उससे उसके रोने का कारण पूछा।

🔶 तब वह अपराधी बोला - "शायद आपने मुझे पहचाना नहीं ? मैं वो ही बच्चा हूँ, जिसे सालों पहले आपने बाल श्रीकृष्ण के चित्र के लिए पसन्द किया था। मेरे कुकर्मों की वजह से आज मैं कंस बन गया। इन तस्वीरों में मैं ही कृष्ण हूँ और मैं ही कंस हूँ। हमारे कर्म ही हमें अच्छा और बुरा इन्सान बनाते हैं।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 Aug 2018


👉 आज का सद्चिंतन 2 Aug 2018


👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 18)

👉 युगसृजन के निमित्त प्रतिभाओं को चुनौती
   
🔶 प्रस्तुत समय, जिससे हम गुजर रहे हैं-संधिकाल है। यह युगसंधि का समय, अवसर न चूकने जैसा है। आपत्तिकाल में लोग निजी व्यवसाय छोड़कर दुर्घटना से निपटने के लिए दौड़ पड़ते हैं। अग्निकांड, भूकंप, दुर्भिक्ष महामारी, दुर्घटना जैसे अवसरों पर उदार सेवाभावना की परीक्षा होती है। भावनाशील इस अवसर पर चूकते नहीं। उपेक्षा करने वाले तिरष्कृत जैसे होते और सेवा साधना में जुट पड़ने वाले सदा-सर्वदा के लिए लोगों के मन पर अपनी प्रामाणिक महानता की गहरी छाप छोड़ते हैं, जो कालांतर में उन्हें अनेक माध्यमों से महत्त्वपूर्ण वरिष्ठता प्रदान कराती है।
  
🔷 इतिहास साक्षी है कि आपत्तिकाल में राजपूत घरानों से एक-एक सदस्य सेना में भरती होता था। सिख धर्म जिन दिनों चला था, तब भी उस विपन्न बेला में, उस प्रभाव क्षेत्र में आए हर परिवार ने अपने परिवार में से एक को ‘सिख’ सेना का सदस्य बनने के लिए प्रोत्साहित किया था। आज की वेला, तब की अपेक्षा कम विपन्न नहीं है। नवसृजन में संलग्न होने के लिए हर घर से एक प्रतिभा को आगे आना चाहिए और भारतभूमि की सतयुगी गरिमा को जीवन्त रखने का श्रेय लेना चाहिए। इक्कीसवीं सदी में सतयुग की वापसी वाली संभावनाएँ सुस्पष्ट हैं। कुछेक चिह्न पहले से ही प्रकट हो रहे हैं। ऐसे व्यक्तित्व उभर रहे हैं, जो लोक निर्वाह में कटौती करके अपनी भाव-संवेदनाएँ आकांक्षाएँ एवं गतिविधियों को सृजन प्रयोजनों में समर्पित कर सकें, जिससे उनका समर्पण, अंधकार में जलती मशाल की भूमिका निभाते हुए सबकी आँखों में चमक पैदा कर सके।
  
🔶 स्वर्ग-मुक्ति दिव्य-दर्शन आदि के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है और निराश भी रहना पड़ सकता है? पर सत्प्रयोजनों के लिए प्रस्तुत किया गया आदर्शवादी साहस व्यक्तित्व को ऐसा प्रामाणिक, प्रखर एवं प्रतिभावान बनाता है, जिसके उपार्जन को दैवी संपदा के रूप में आँका जा सकें, जिस पर आज की भौतिक संपदाओं, सुविधाओं को निछावर किया जा सके। धनाढ्य और विद्वान कुछ लोगों पर ही अपनी धाक जमा पाते हैं, पर महामानव स्तर की प्रतिभाएँ इतिहास को, समस्त मानव जाति को कृतकृत्य करती हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 23

👉 A Perfect Deal

🔶 Man is a mortal being and all his belongings are also perishable. Only one of his ‘possessions’ that lasts for Ages after he is gone is his glory. One who earns this preeminence is indeed most successful in the ‘business’ of life even if he has sacrificed or lost on the materialistic front. His trade is like, for example, that of getting a new stout building in return of selling off an unused heap of hay. Great ones are those who refine and excel their lives up to glorious heights, worth the dignity of human life. Dormant lives of others mushroom and end like that of any other creature who survives just to till the tummy and quench the sensual thirst.

🔷 Those stuck in the peripheries of selfish possession and attachments are shortsighted, and remain careless of the future. Their lives, their activities, despite the physical dynamism and alacrity are no better than ‘movable corpse.’ A dormant life is no life… Fools gather more and more of wealth and resources so that their beloved ones would enjoy it all generations after generations… They spent all their time, talents and efforts in insane and at times unfair possession and its safety. Wouldn’t it be wiser of them if they had employed their resources prudently in the activities of progress and welfare? This would have brightened their own future as well along with supporting more and more people around and contributing in constructive reformation and development. Draining or throwing away the useful things and collecting the rubbish or hazardous ones – is a clear sign of insanity. Aren’t they mindless who invite enmity all the time, by using absurd, abusive, acrimonious tongue? Anybody, howsoever learned, skillful and smart he might be, is unwise if, instead of augmenting the virtuous qualities, he opts for vices and weaknesses.

📖 Akhand Jyoti, Oct. 1942

👉 आत्म निर्माण-जीवन का प्रथम सोपान (भाग 3)

🔶 दूसरों का आदर करना, सद्व्यवहार का अभ्यस्त होना, सज्जनोचित शिष्टाचार बरतना, मधुर वचन बोलना यह व्यक्तित्व की गरिमा बढ़ाने वाली साधना है। मनुष्य सामाजिक प्राणी है। उसे दूसरों के साथ मिल-जुल कर रहना पड़ता है। स्नेह सौहार्द का वातावरण तभी बना रह सकता है जब दूसरों के साथ शालीनता का व्यवहार किया जाय। अहंकारी व्यक्ति दूसरों को तुच्छ समझते है और कटु वचन एवं दुर्व्यवहार पर उतारू रहते हैं। उद्धत आतंकवादी उच्छृंखल आचरण करके कोई अपने अहंकार की पूर्ति होने की बात सोच सकता है, पर वस्तुतः वह हर किसी की दृष्टि में अपना सम्मान खोता है। स्तर गिराता है और घृणास्पद बनता है। उद्धत आचरण से सम्भव है सामने वाला चुप ही रहे, परन्तु उसका स्नेह सहयोग तो चला ही जाता है। इस प्रकार क्रोधी, अशिष्ट, उच्छृंखल व्यक्ति अपना नाम बढ़ाने की बात सोचता है, पर वस्तुतः उसे निरन्तर खोता चला जाता है। कुसमय में अपने को एकाकी अनुभव करता है। स्नेह सहयोग से वंचित होकर वह भूत बेताल की अशान्त अतृप्त मनःस्थिति में जा फँसता है।

🔷 ईर्ष्या, द्वेष, झूठ, छल, प्रपंच, दुरभिसन्धि, षड्यन्त्र, शोषण, अपहरण, आक्रमणों की आसुरी मनोवृत्ति अपना कर मनुष्य अपराधी आचरण ही करता हैं उसकी गतिविधियाँ ऐसी हो जाती हैं, जिससे मनुष्य सबकी आँखों में गिरता है यहाँ तक कि अपनी आँखों में भी। धन या पद पाने की अपेक्षा लोकश्रद्धा प्राप्त करना अधिक मूल्यवान है। दुष्ट-दुराचारी बनकर कोई यदि साधन सम्पन्न बन जाय तो यही कहा जाना चाहिए कि उसने खोया बहुत पाया कम। व्यसनी, व्यभिचारी, आलसी और प्रमादी, आतंकवादी, अत्याचारी, उस सुखद उपलब्धि से वंचित ही रहते है जिसे पाने के लिए यह कुमार्ग अपनाया। दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों का आश्रय लेकर मनुष्य दूसरों की जितनी हानि करता है उसकी तुलना में अपनी असंख्य गुनी हानि कर लेता है।

🔶 समय को नियमितता के बन्धनों में बाँधा जाना चाहिए। चौबीसों घण्टे की निर्धारित दिनचर्या बनानी चाहिए और उस पर तत्परतापूर्वक चलते जाना चाहिए। समय ही सबसे बड़ी सम्पदा है, उसका एक क्षण भी बर्बाद नहीं होना चाहिये। शरीर की क्षमता के अनुरूप श्रम किया जाय, काम का स्तर और सिलसिला बदलते ही रहा जाय ताकि थकान नहीं चढ़ेगी। हर काम में दिलचस्पी पैदा की जाय, उसे खेल समझते हुए पूरे मनोयोग के साथ करना चाहिए। यह आदत पड़ जाय तो दुर्बल शरीर वाला व्यक्ति भी बिना थके बहुत काम करता रह सकता है। आहार-विहार विवेकपूर्ण और क्रमबद्ध होने चाहिए। समयानुसार काम बदलने से विश्राम और विनोद का उद्देश्य पूरा हो सकता है। सामने प्रस्तुत कामों को दिलचस्पी और मनोयोग के साथ करने का अभ्यास करना मनोनिग्रह का सर्वोत्तम योगाभ्यास है। उस साधना में निष्णात व्यक्ति हाथों हाथ क्रिया कुशलता के अभिवर्धन और सफलताओं के वरण का उत्साहवर्द्धक लाभ प्राप्त करता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 वास्तविक सफलता

🔶 जीवन की वास्तविक सफलता और समृद्घि आत्मभाव में जागृत रहने में है। जब मनुष्य, अपने को आत्मा अनुभव करने लगता है तो उसकी इच्छा, आकांक्षा और अभिरूचि उन्हीं कामों की ओर मुड़ जाती है, जिनसे आध्यात्मिक सुख मिलता है। मनुष्य परोपकार, परमार्थ, सेवा, सहायता, दान, उदारता, त्याग, तप से भरे हुए पुण्य कर्म करता है। तो हृदय के भीतरी कोने में बड़ा ही सन्तोष, हलकापन, आनन्द एवं उल्लास उठता है। इसका अर्थ है कि यह पुण्य कर्म आत्मा के स्वार्थ के अनुकूल है। वह ऐसे ही कार्यों को पसन्द करता है । आत्मा की आवाज सुनने वाले और उसी की आवाज पर चलने वाले सदा पुण्य कर्मों होते हैं।

🔷 आत्मा को तात्कालीन सुख सत्कर्मों में आता है। शरीर की मृत्यु होने के उपरान्त जीव की सद्ïगति मिलने में भी हेतु सत्कर्म ही हैं। लोक और परलोक में आत्मिक सुख शान्ति सत्कर्मो के ऊपर ही निर्भर है। इसलिए आत्मा का स्वार्थ पुण्य प्रयोजन में है। शरीर का स्वार्थ इसके विपरीत है। इन्द्रियाँ और मन संसार के भोगों को अधिकाधिक मात्रा में चाहते हैं। इस कार्य प्रणाली को अपनाने से मनुष्य नाशवान शरीर की इच्छाएँ पूर्ण करने में जीवन को खर्च करता है और पापों का भार इकठ्ठा करता रहता है। इससे शरीर और मन का अभिरंजन तो होता है, पर आत्मा को इस लोक और परलोक में कष्ट उठाना पड़ता है। आत्मा के स्वार्थ के सत्कर्मों में शरीर को भी कठिनाइयाँ उठानी पड़ती हैं।

🔶 तप, त्याग, संयम, ब्रह्मïचर्य, सेवा, दान आदि के कार्यों में शरीर को कसा जाता है। तब ये सत्कर्म सधते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि शरीर के स्वार्थ और आत्मा के स्वार्थ आपस में मेल नहीं खाते, एक के सुख में दूसरे का दु:ख होता है। दोनों के स्वार्थ आपस में एक-दूसरे के विरोधी हैं। इन दो विरोधी तत्वों में से हमें एक को चुनना होता है। जो व्यक्ति अपने आपको शरीर समझते हैं, वे आत्मा के सुख की परवाह नहीं करते और शरीर सुख के लिए भौतिक सम्पदायें, भोग सामग्रियाँ एकत्रित करने में ही सारा जीवन व्यतीत करते हैं । ऐसे लोगों का जीवन पशुवत् पाप रूप, निकृष्ट प्रकार का हो जाता है। धर्म, ईश्वर, सदाचार, परलोक, पुण्य, परमार्थ की चर्चा वे भले ही करें, पर यथार्थ में उनका पुण्य परलोक स्वार्थ साधन की ही चारदीवारी के अन्दर होता है।

🔷 यश के लिए, अपने अहंकार को तृप्त करने के लिए, दूसरों पर अपना सिक्का जमाने के लिए वे धर्म का कभी-कभी आश्रय ले लेते हैं। वैसे उनकी मन:स्थिति सदैव शरीर से सम्बन्ध रखने वाले स्वार्थ साधनों में ही निमग्न रहती है। परन्तु जब मनुष्य आत्मा के स्वार्थ को स्वीकार कर लेता है, तो उसकी अवस्था विलक्षण एवं विपरीत हो जाती है। भोग और ऐश्वर्य के प्रयत्न उसे बालकों की खिलवाड़ जैसे प्रतीत होते हैं। शरीर जो वास्तव में आत्मा का एक वस्त्र या औजार मात्र है, इतना महत्वपूर्ण उसे दृष्टिगोचर नहीं होता है कि उसी के ऐश-आराम में जीवन जैसे बहुमूल्य तत्व को बर्बाद कर दिया जाय। आत्म भाव में जगा हुआ मनुष्य अपने आपको आत्मा मानता है और आत्मकल्याण के, आत्म सुख के कार्यों में ही अभिरुचि रखता और प्रयत्नशील रहता है। उसे धर्म संचय के कार्यों में अपने समय की एक-एक घड़ी लगाने की लगन लगी रहती है। इस प्रकार शरीर भावी व्यक्ति अपना जीवन पाप की ओर, पशुत्व की ओर चलता है और आत्मभावी व्यक्ति का प्रवाह पुण्य की ओर, देवत्व की ओर प्रवाहित होता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य