सोमवार, 19 दिसंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 20 Dec 2016



👉 आज का सद्चिंतन 20 Dec 2016


👉 आत्मचिंतन के क्षण 20 Dec 2016

 🔴 युग निर्माण परिवार के सदस्यों की दृष्टि अनौचित्य के प्रति अत्यन्त कड़ी रहनी चाहिए। जहाँ भी वह पनपे, सिर उठाये वहीं उसके असहयोग एवं विरोध प्रदर्शन से लेकर दबाव देने तक की प्रतिक्रिया उठ खड़ी होनी चाहिए। अनौचित्य के प्रति हममें से प्रत्येक में प्रचण्ड रोष एवं आक्रोश भरा रहना चाहिए। इतनी जागरूकता के बिना दुष्प्रवृत्तियाँ रूक नहीं सकेंगी। छिपाने, समझौता कर लेने से सामयिक निन्दा से तो बचा जा सकता है, पर इससे सड़न का विष भीतर ही भीतर पनपता रहेगा और पूरे अंग को गलाकर नष्ट कर देगा।

🔵 हमारा युग निर्माण परिवार बढ़ेगा। उसमें अवांछनीय घटनाएँ भी होती रहेंगी, इतने बड़े समुदाय में एक भी अपूर्ण, अपवित्र व्यक्ति न तो पैदा होगा और न प्रवेश कर सकेगा इसकी अपेक्षा नहीं की जा सकती, पर वह दृष्टि जीवन्त रहनी चाहिए कि श्रद्धा के साथ विवेक कायम रखा जाय। औचित्य का समर्थन करते हुए अनौचित्य की संभावना को नजरअंदाज न किया जाय। अति श्रद्धा और अति विश्वास भी इस जमाने में जोखिम भरा है। इसलिए नीति समर्थक और अनीति निरोधक दृष्टि सदा पैनी रखी जाय और सड़न पनपने से पहले  उसकी रोकथाम कर दी जाय।

🔴 सैनिकों द्वारा लड़े जाने वाले गोला-बारूद वाले युद्ध को हम रोकना चाहते हैं, पर इस प्रकार के विश्वव्यापी युद्ध के पक्ष में हैं, जो जन-जन द्वारा पग-पग पर अज्ञान और अनाचार के-कुत्साओं और कुंठाओं के विरुद्ध अतीव शौर्य और साहस के साथ लड़ा जाये। हमारा विश्वास है कि यही संसार का अंतिम युद्ध होगा। तब जिओ और जीने दो और सादा जीवन-उच्च विचार जैसे उच्च आदर्शों के अनुरूप नई दुनिया का नवनिर्माण संभव हो सकेगा।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 परमात्मा का निराकार स्वरूप

🔵 शिवा का प्रश्न- ‘परमात्मा की सबसे उपासना कौन सी है, मुझे बहुत प्यारा लगा। यह बात सबके जानने की है। जो दूसरों की भलाई में निरत रहता है, वह भगवान को ही भक्ति करता है। परोपकार से बढ़कर और कोई उपासना नहीं वह सरल भी है,उत्तम भी है और सुखदायक भी। परोपकार करने में आत्मा की प्रसन्नता इतनी बढ़ जाती है कि रोमांच हो आता तो फिर उनका फल तो और भी स्वर्गीय सुखों से भरा हुआ होगा। भलाई साक्षात परमात्मा का निराकार स्वरूप है।

🔴 लोग यह मानते कि शिवाजी मेरी भक्ति करता है, इसलिये वह मुझे बहुत प्रिय है। मुझे सचमुच शिवाजी अच्छा लगता है, किन्तु शरीर से नहीं काम से। उसके गुण और उसका चरित्र बहुत ऊँचे दर्जे के है। उसने लोगों की भलाई के लिये अपने जीवन को सौंपा था, मैंने उसे एक रास्ता बता दिया। अब वह निष्काम भावना से सब काम करता है, उस काम को नहीं करता, जिससे मानवता का गर्हित होता हो, इसलिये वह भगवान का सच्चा भक्त है। मैं चाहता हूँ कि भारतवर्ष के सब बच्चे मेरे प्रिय शिष्य शिवा की तरह बन जाये। भलाई के रास्ते में प्रिय-अप्रिय जो कुछ भी आये, वीरतापूर्ण सहन करने वाले बन जाये। उससे भगवान की यह दुनिया बहुत अच्छी बनेगी। भगवान का प्यार और आशीर्वाद भी मिलेगा।

🔵 कोई कल्प-वृक्ष है तो उसका बीज परोपकार। परोपकारी सबका हृदय जीत लेता है। सभी का सहयोग उसे मिलता है। शिवा ने थोड़ी ताकत से ज्यादा विजय पाई है, क्योंकि उसे भगवान का आशीर्वाद मिला है और मनुष्यों का प्यार व सहयोग। यदि संसार के सारे मनुष्य परोपकार में तत्पर हो जायें, तो संसार कितना सुन्दर और सुखपूर्वक बन जाये।

🌹 ~समर्थ गुरु रामदास
🌹 अखण्ड ज्योति 1969 जनवरी पृष्ठ 1

👉 सतयुग की वापसी (भाग 15) 20 Dec

🌹 संवेदना का सरोवर सूखने न दें  

🔴 करुणा उभरे बिना दूसरों की स्थिति और आवश्यकता का भान ही नहीं होता। इस अभाव की स्थिति में लकड़ी चीरना और किसी निरपराध की बोटी-बोटी नोंच लेना प्राय: एक जैसा ही लगता है। किसी के साथ अन्याय बरतने में, सताने-शोषण करने में कुछ भी अनुचित प्रतीत नहीं होता। भावना के अभाव में मनुष्य का अन्तराल चट्टान की तरह नीरस-निष्ठुर हो जाता है। संवेदना शून्यों को नर-पशु भी तो नहीं कहा जा सकता, क्योंकि पशुओं की भी अपनी मर्यादाएँ होती हैं, जो प्राकृतिक अनुशासन के विपरीत एक कदम भी नहीं उठाते, भले ही मनुष्य की तुलना में उन्हें असमर्थ-अविकसित माना जाता रहे।   

🔵 लगता है भाव-श्रद्धाविहीनों के लिए नर-पिशाच ब्रह्म राक्षस, मृत्युदूत, दुर्दांत दैत्य जैसे नामों में से ही किसी का चयन करना पड़ेगा, क्योंकि उन्हीं की आपा-धापी उस स्तर तक पहुँचती है, जिनमें दूसरों के विकास-विनाश से, उत्पीड़न एवं अभिवर्धन से कोई वास्ता नहीं रहता। उनके लिए ‘स्व’ ही सब कुछ बनकर रह जाता है। बस चले तो वे हिरण्याक्ष दैत्य की तरह दुनिया की समूची सम्पदा समेटकर ले उड़ें, भले ही उसे समुद्र में छिपाकर निरर्थक बनाना पड़े। जिनके लिए सभी विराने हैं, वे किसी का कुछ भी अनर्थ कर सकते हैं। 

🔴 ऐसा ही पिछले दिनों होता भी रहा है। स्वार्थान्धों से इतना भी सोचते न बन पड़ा कि इस सृष्टि में दूसरे भी रहते हैं और उन्हें भी जीवित रहने दिया जाना चाहिए। सब कुछ अपने लिए समेट लेने, हड़प जाने को ही विशिष्टता का फलितार्थ नहीं मान बैठना चाहिए।   

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 जरा सोचिये !!!

एक बार किसी रेलवे प्लैटफॉर्म पर जब गाड़ी रुकी तो एक लड़का पानी बेचता हुआ निकला। ट्रेन में बैठे एक सेठ ने उसे आवाज दी,ऐ लड़के इधर आ!!लड़क...