सोमवार, 24 अक्तूबर 2016

👉 मैं क्या हूँ ? What Am I ? (भाग 9)

🌞 पहला अध्याय

🔵 जीवन को शुद्ध, सरल, स्वाभाविक एवं पुण्य-प्रतिष्ठा से भरा-पूरा बनाने का राजमार्ग यह है कि हम अपने आपको शरीर भाव से ऊँचा उठावें और आत्मभाव में जागृत हों। इससे सच्चे सुख-शांति और जीवन लक्ष्य की प्राप्ति होती है। आध्यात्म विद्या के आचार्यों ने इस तथ्य को भली प्रकार अनुभव किया है और अपनी साधनाओं में सर्व प्रथम स्थान आत्मज्ञान को दिया है।

🔴 मैं क्या हूँ? इस प्रश्न पर विचार करने पर यही निष्कर्ष निकलता है कि मैं आत्मा हूँ। यह भाव जितना ही सुदृढ़ होता जाता है उतने ही उसके विचार और कार्य आध्यात्मिक एवं पुण्य रूप होते जाते हैं। इस पुस्तक में ऐसी ही साधनाएँ निहित हैं जिनके द्वारा हम अपने आत्म स्वरूप को पहिचानें और हृदयंगम करें। आत्मज्ञान हो जाने पर वह सच्चा मार्ग मिलता है जिस पर चलकर हम जीवन लक्ष्य को, परमपद को आसानी से प्राप्त कर सकते हैं।

🔵 आत्म स्वरूप को पहिचानने से मनुष्य समझ जाता है कि मैं स्थूल शरीर व सूक्ष्म शरीर नहीं हूँ। यह मेरे कपड़े हैं। मानसिक चेतनाएँ भी मेरे उपकरण मात्र हैं। इनसे मैं बँधा हुआ नहीं हूँ। ठीक बात को समझते ही सारा भ्रम दूर हो जाता है और बन्दर मुट्ठी का अनाज छोड़ देता है। आपने यह किस्सा सुना होगा कि एक छोटे मुँह के बर्तन में अनाज जमा था। बन्दर ने उसे लेने के लिए हाथ डाला और मुट्ठी में भरकर अनाज निकालना चाहा। छोटा मुँह होने के कारण वह हाथ निकल न सका, बेचारा पड़ा-पड़ा चीखता रहा कि अनाज ने मेरा हाथ पकड़ लिया है, पर ज्योंही उसे असलियत का बोध हुआ कि मैंने मुट्ठी बाँध रखी है, इसे छोड़ूँ तो सही। जैसे ही उसने उसे छोड़ा कि अनाज ने बन्दर को छोड़ दिया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/mai_kya_hun/part1.3

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 25 Oct 2016

🔵 प्यार आध्यात्मिक गुण है। उसकी सार्थकता तभी है, जब उसके साथ उत्कृष्टतावादी आदर्शों में समन्वय रह सके। ऐसा प्यार ही प्रयोक्ता और उपभोक्ता के लिए समान रूप से श्रेयस्कर होता है। सच्चे प्यार में एक आँख दुलार की और एक आँख सुधार की रहती है। इसके बिना अनीति पोषक मैत्री तो अमैत्री से भी अधिक अहितकर सिद्ध होती है।
🔴 अहिंसा एक आदर्श एवं दृष्टिकोण है, जिसमें दूसरों के सम्मान तथा अधिकार को अक्षुण्ण रहने देने की दृढ़ता, आत्मीयता, सहनशीलता, करुणा एवं उदारता का समावेश है। अपने कष्ट की ही तरह यदि दूसरों के कष्ट को भी माना जाय, अपनी क्षति की तरह ही यदि दूसरों की क्षति भी आँकी जाय तो सहज ही उस तरह की नीति अपनानी पड़ेगी जैसी कि हम दूसरों द्वारा अपने प्रति अपनाये जाने की अपेक्षा करते हैं।

🔵 पैसे से भी अधिक महत्त्वपूर्ण संपत्ति है-समय। खोया हुआ पैसा फिर पाया जा सकता है, पर खोया हुआ समय फिर कभी लौटकर नहीं आता। जो क्षण एक बार गये वे सदा के लिए गए। धन मनुष्कृत और समय ईश्वर प्रदत्त सम्पत्ति है। समय को यदि बर्बाद न किया जाय, उसे योजनाबद्ध दिनचर्या के साथ पूरी तत्परता और सजगता के साथ खर्च किया जाय तो सामान्य मनुष्यों की अपेक्षा कई गुना अधिक और कई गुना ऊँचे स्तर का काम किया जा सकता है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 बेहूदा मजाक

🔴 द्वापर के अन्त की बात है। युधिष्ठिर को राज सिंहासन मिलने वाला था। चारों ओर खूब सजावट हो रही थी, राजमहल तो अद्भुत कला कौशल के साथ सजाया गया था। कलाकारों ने बहुमूल्य काँच और मणियों से इस प्रकार के नक्षत्र बनाये थे जहाँ जल से भरे हुए स्थान थल, और थल दिखाई पड़ने वाले स्थान जलाशय प्रतीत होते। बड़े-बड़ों की बुद्धि वहाँ चकरा जाती थी। दुर्योधन को यह सब पता न था, जब वे उधर से निकले थे, सूखी जमीन के धोखे जलाशय में चले गये। कपड़े भीगकर तर हो गये, दर्शकों की दन्तावली उपहास करती हुई खुल पड़ी। उतावली द्रौपदी से न रहा गया उसने कह ही तो दिया- “अन्धे के अन्धे ही होते हैं।”

🔵 मजाक करना उच्चकोटि की कला है। किसी को चिढ़ाना मजाक नहीं मूर्खता है और खासतौर से जब कोई व्यक्ति किसी कष्ट में पड़ गया हो तब उसे चिढ़ाना तो परले सिरे का बेहूदापन है। दुर्योधन के कलेजे में द्रौपदी के शब्द तीर की तरह पार निकल गये। एक स्त्री द्वारा अपने पिता तक का अपमान होते सुनकर दुर्योधन का कलेजा जल-भुनकर खाक हो गया। मुँह से उस समय वह कुछ न बोला पर विषधर सर्प की तरह प्रतिहिंसा की आग स्थायी रूप से उसकी छाती में सुलग गई।

🔴 हर आदमी जानता है कि महाभारत में कैसी रोमाँचकारी रक्त की नदियाँ बहीं और अनेक दृष्टियों के कैसे-कैसे दुष्परिणाम निकले। इस सब की मूल में एक बहुत ही छोटी वस्तु थी, और वह थी- ‘बेहूदा मजाक।’ हममें से बहुत आदमी द्रौपदी की गलती को अक्सर दुहराया करते हैं और अकारण मित्रों को शत्रु बनाया करते हैं।

🌹 अखण्ड ज्योति से

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 25 Oct 2016



👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 25 Oct 2016


👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 60)

🔵 मानसिक तथा नैतिक अनुभवों के महत् सातत्य पर विचार करो। तब तुम्हारे सामने यह स्पष्ट हो जायेगा कि जब तक प्रगति पूर्णता में पर्यवसित नहीं होती तब तक मनुष्य का पुन: पुन: जन्म होता ही रहता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने विचारों, इच्छाओं तथा कर्मों द्वारा एक एक संसार का निर्माण कर रहा है जिसका कि वह स्वयं शासक होगा। वस्तुगत अनुभवों के समुद्र की तलहटी का स्पर्श कर तथा उससे परे व्यक्तिगत चेतना के शुद्ध आत्मा की अनुभूति के प्रयत्न में जीव को एक नहीं असंख्य शरीर धारण करने पड़ते है।

🔴 सिद्धियों तथा कोरी विद्या की इच्छा का दमन करो। मिथ्याज्ञान का बढ़ना तथा सिद्धियाँ प्राप्त करना अपने आप में विनाशकारी हैं क्योंकि वे अहंकार को बढ़ाते हैं तथा व्यक्ति को अधिक स्वार्थी बना देते हैं। चेतना का विभिन्न प्रकार से विस्तार आध्यात्मिक प्रक्रिया की एक मानी हुई घटना है। किन्तु यह पूर्णता: आनुसंगिक है। परन्तु जब इसे ही आत्मसाक्षात्कार के लक्ष्य श्रेष्ठ मान लिया जाता है तब यह साधना के मार्ग में हजारों गुण अधिक बाधा उत्पन्न कर देता है।

🔵 जैसे कि तुम एक पागल कुत्ते से सावधान रहते हो उसी प्रकार अहंकार से सावधान रहो। जिस प्रकार कि तुम विष का स्पर्श नहीं करोगे या विषधर साँप से नहीं खेलोगे, उसी प्रकार सिद्धियों, तथाकथित सिद्धियों से दूर रहो। अपने मन तथा बुद्धि की सभी शक्तियों को ईश्वर की ओर मोड़ दो। आध्यात्मिक जीवन का और क्या लक्ष्य होगा ?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ५२)

👉 व्यक्तित्व की समग्र साधना हेतु चान्द्रायण तप ब्रह्मर्षि परम पूज्य गुरूदेव ने अपना समूचा जीवन तप के इन उच्चस्तरीय प्रयोगों में बिताया।...