शुक्रवार, 25 मई 2018

👉 आज ही क्यों नहीं

🔷 एक बार की बात है कि एक शिष्य अपने गुरु का बहुत आदर-सम्मान किया करता था। गुरु भी अपने इस शिष्य से बहुत स्नेह करते थे लेकिन वह शिष्य अपने अध्ययन के प्रति आलसी और स्वभाव से दीर्घसूत्री था। सदा स्वाध्याय से दूर भागने की कोशिश करता तथा आज के काम को कल के लिए छोड़ दिया करता था। अब गुरूजी कुछ चिंतित रहने लगे कि कहीं उनका यह शिष्य ज़िंदगी के सफर में असफल ना हो जाये। आलस्य में व्यक्ति को अकर्मण्य बनाने की पूरी सामर्थ्य होती है। ऐसा व्यक्ति बिना परिश्रम के ही फलोपभोग की कामना करता है। वह शीघ्र निर्णय नहीं ले सकता और यदि ले भी लेता है,तो उसे कार्यान्वित नहीं कर पाता। यहाँ तक कि अपने पर्यावरण के प्रति भी सजग नहीं रहता है और ना ही भाग्य द्वारा दिए गए सुअवसरों का लाभ उठाने की कला में ही कुशल हो पाता है।

🔶 उन्होंने मन ही मन अपने शिष्य के कल्याण के लिए एक योजना बना ली। एक दिन एक काले पत्थर का एक टुकड़ा उसके हाथ में देते हुए गुरु जी ने कहा –‘मैं तुम्हें यह जादुई पत्थर का टुकड़ा, दो दिन के लिए दे कर, कहीं दूसरे गाँव जा रहा हूँ| जिस भी लोहे की वस्तु को तुम इससे स्पर्श करोगे, वह सोने में बदल जायेगी। पर याद रहे कि दूसरे दिन सूर्यास्त के पश्चात मैं इसे तुमसे वापस ले लूँगा।’

🔷 शिष्य इस अवसर को पाकर बड़ा प्रसन्न हुआ लेकिन आलसी होने के कारण उसने अपना पहला दिन यह कल्पना करते-करते बिता दिया कि जब उसके पास बहुत सारा सोना होगा तब वह कितना प्रसन्न, सुखी,समृद्ध और संतुष्ट रहेगा, इतने नौकर-चाकर होंगे कि उसे पानी पीने के लिए भी उठना नहीं पड़ेगा। फिर दूसरे दिन जब वह प्रातःकाल जागा,उसे अच्छी तरह से स्मरण था कि आज स्वर्ण पाने का दूसरा और अंतिम दिन है। उसने निश्चय किया कि वो बाज़ार से लोहे के बड़े-बड़े सामान खरीद कर लायेगा और उन्हें सोने में बदल देगा। दिन बीतता गया, पर आलसी होने के कारण वह इसी सोच में बैठा रहा कि अभी तो बहुत समय है, कभी भी बाज़ार जाकर सामान ले आएगा। उसने सोचा कि अब तो दोपहर का भोजन करने के पश्चात ही सामान लेने निकलूंगा पर भोजन करने के बाद उसे विश्राम करने की आदत थी , और उसने बजाये उठ के मेहनत करने के थोड़ी देर आराम करना उचित समझा। पर आलस्य से भरा हुआ उसका शरीर नींद की गहराइयों में खो गया, और जब वो उठा तो सूर्यास्त होने को था।

🔶 अब वह जल्दी-जल्दी बाज़ार की तरफ भागने लगा, पर रास्ते में ही उसे गुरूजी मिल गए उनको देखते ही वह उनके चरणों पर गिरकर, उस जादुई पत्थर को एक दिन और अपने पास रखने के लिए याचना करने लगा लेकिन गुरूजी नहीं माने और उस शिष्य का धनी होने का सपना चूर-चूर हो गया। पर इस घटना की वजह से शिष्य को एक बहुत बड़ी सीख मिल गयी। उसे अपने आलस्य पर पछतावा होने लगा, वह समझ गया कि आलस्य उसके जीवन के लिए एक अभिशाप है और उसने प्रण किया कि अब वो कभी भी काम से जी नहीं चुराएगा और एक कर्मठ, सजग और सक्रिय व्यक्ति बन कर दिखायेगा।

🔷 दोस्तों, जीवन में हर किसी को एक से बढ़कर एक मौके मिलते हैं पर हम इन्हे पहचान नहीं पाते और अपने आलस्य के कारण इन मौकों को हाथ से निकाल देते हैं और बाद में पछताते हैं।

🔶 अगर आप ज़िंदगी में सफल होना चाहते हैं तो अपने मौकों को पकड़ कर रखिये उन्हें हाथ से ना जाने दें क्योंकि अगर एक बार ये मौके हाथ से निकाल गए तो फिर सिवाय पछताने के कुछ नहीं बचेगा।

🔷 इसलिए अपने मौकों को सफलता में बदलने के लिए आज से ही लग जाइए | किसी भी काम को कल पर मत टालिए।

🔶 क्योंकि जिस काम को हम कल कर सकते हैं तो उसे आज ही क्यों नहीं?

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 May 2018




👉 आज का सद्चिंतन 26 May 2018


👉 मित्रता क्यों की जाती है?

🔷 क्या कोई मनुष्य किसी दूसरे मनुष्य से इस कारण मित्रता करता हैं कि वह पारस्परिक प्रत्युपकारों से वह लाभ प्राप्त करे जो अकेला रह कर नहीं कर सकता? या मित्रता का बन्धन किसी प्राकृतिक ऐसे उदार नियम से संबंधित हैं जिसके द्वारा एक मनुष्य हृदय दूसरे के हृदय के साथ अधिकाँश में उदारता और निस्वार्थता की भावना के साथ जा जुड़ता हैं?

🔶 उपरोक्त प्रश्नों की मीमाँसा करते हुए हमें यह जानना चाहिए कि मित्रता के बन्धन का प्रधान और वास्तविक हेतु प्रेम हैं। कभी कभी यह प्रेम वास्तविक हेतु प्रेम हैं। कभी कभी यह प्रेम वास्तविक न होकर कृत्रिम भी हुआ करता हैं परन्तु इससे यह नहीं कहा जा सकता कि मित्रता का भवन केवल स्वार्थ की ही आधार शिला पर स्थिर हैं।
सच्ची मित्रता में एक प्रकार की ऐसी स्वाभाविक सत्यता हैं जो कृत्रिम और बनावटी स्नेह में कदापि नहीं पाई जा सकती। मेरा तो इसी लिए ऐसा विश्वास हैं कि मित्रता की उत्पत्ति मनुष्य की दरिद्रता पर न होकर किसी हार्दिक और विशेष प्रकार के स्वाभाविक विचार पर निर्भर हैं जिसके द्वारा एक समान मन वाले दो व्यक्ति परस्पर स्वयमेव संबंधित हो जाते हैं।

🔷 यह पुनीत आध्यात्मिक स्नेह भावना पशुओं में भी देखी जाती हैं। मातायें क्या अपने बच्चों से किसी प्रकार का बदला चाहने की आशा से प्रेम करती हैं? बेचारे पशु जिनको न तो अपनी दीनता का ज्ञान हैं, न उन्नति की आकाँक्षा हैं और न किसी सुनहरे भविष्य का प्रलोभन हैं भला वे अपने बच्चों से किस प्रत्युपकार की आशा करते होंगे? सच तो यह हैं कि प्रेम करना जीव का एक आत्मिक गुण हैं। यह गुण मनुष्य में अधिक मात्रा में प्रकट होता हैं इसलिए वह मित्रता की ओर आकर्षित होता है।

🔶 जिसके आचरण और स्वभाव हमारे समान ही हों अथवा किसी ऐसे मनुष्य को जिसका अन्तःकरण ईमानदारी और नेकी से परिपूर्ण हो, किसी ऐसे मनुष्य को देखते ही हमारा मन उसकी ओर आकर्षित हो जाता हैं। सच तो यह हैं कि मनुष्य के अन्तःकरण पर प्रभाव डालने वाला नेकी के समान और कोई दूसरा पदार्थ नहीं हैं। धर्म का प्रभाव यहाँ तक प्रत्यक्ष हैं कि जिन व्यक्तियों का नाम हमको केवल इतिहासों से ही ज्ञात हैं और उनको गुजरे चिर काल व्यतीत हो गया उनके धार्मिक गुणों से भी हम ऐसे मुग्ध हो जाते हैं कि उनके सुख में सुखी और दुख में दुखी होने लगते हैं।

🔷 मित्रता जैसे उदार बन्धन के लिए ऐसा विचार करना कि उसकी उत्पत्ति केवल दीनता पर ही हैं अर्थात् एक मनुष्य दूसरे से मित्रता केवल इसीलिए करता हैं कि वह उससे कुछ लाभ उठाने और अपनी अपूर्णता को उसकी सहायता से पूर्ण करें, मित्रता को अत्यन्त ही तुच्छ और घृणित समझना हैं। यदि यह बात सत्य होती तो वे ही लोग मित्रता जोड़ने में अग्रसर होते जिनमें अधिक अवगुण और अभाव हों परन्तु ऐसे उदाहरण कहीं दिखाई नहीं पड़ते। इनके विपरीत यह देखा गया हैं कि जो व्यक्ति आत्मनिर्भर हैं, सुयोग्य हैं, गुणवान हैं, वे ही दूसरों के साथ प्रेम व्यवहार करने को अधिक प्रवृत्त होते हैं। वे ही अधिकतर उत्तम मित्र सिद्ध होते हैं।

🔶 सच तो यह हैं कि परोपकार अपने उत्तम कार्यों का व्यापार करने से घृणा करता हैं और उदार चरित्र व्यक्ति अपनी स्वाभाविक उदारता का आचरण करने दूसरों को सुख पहुँचाने में आनन्द मानते हैं वे बदला पाने के लिए अच्छा व्यवहार नहीं करते। मेरा निश्चित विश्वास हैं कि सच्ची मित्रता लाभ प्राप्त करने की व्यापार बुद्धि से नहीं जुड़ती, वरन् इसलिए जुड़ती हैं कि मित्रभाव के निस्वार्थ बर्ताव से एक प्रकार का जो आध्यात्मिक सुख मिलता हैं वह प्राप्त हो।

✍🏻 दार्शनिक सिसरो
📖 अखण्ड-ज्योति मई 1944 पृष्ठ 10

👉 यह अच्छी आदतें डालिए (भाग 4)

विरोध तथा प्रतिकूलता में धैर्य:-

🔷 विपत्ति, दुख या वेदनामय जीवन एक बड़ा शिक्षक है। यह वह स्थिति है जिसमें चारों ओर से कष्ट आते हैं, आर्थिक स्थिति बिगड़ जाती है, मन दुखी रहता है और कहीं से कोई सहारा नहीं दीखता। विपत्ति ऐसी घटनाओं का क्रम है, जो सफलता का शत्रु है और आनन्द को नष्ट करने वाला है। यह दुःख की मनः स्थिति है।

🔶 विपत्ति दूसरे रूप में एक वरदान सिद्ध होती है। जो व्यक्ति धैर्य बनाये रखता है, वह अन्ततः विजयी होता है। विपत्ति से हमारी इच्छा शक्ति में वृद्धि होती है और सहिष्णुता प्राप्त होती है। इससे हमारा मन ईश्वर की ओर प्रवृत्त होता है। अन्ततः इससे वैराग्य की प्राप्ति होती है। सत्य की पहली सीढ़ी है। विपत्ति वह गुरु है जो मनुष्य को उद्योगी और परिश्रमशील बनाता है। इससे मनुष्य की सोई हुई शक्तियाँ जाग्रत हो जाती हैं, साधारण कार्य करती हुई शक्ति तीव्र हो जाती हैं और जागरुकता प्राप्त होती है। समृद्धि के प्रकाश में आनन्द मनाना साधारण सी बात है, किन्तु प्रतिकूलता और विपत्ति में स्थिर बुद्धि रखना।

🔷 आप विपत्ति में चिंतित न रहें, धैर्य धारण करें, प्रसन्न मुद्रा बनाएँ, हँसते रहें आत्मा से शक्ति खींच कर अपनी समस्याओं को नवीन रूप में विचार करें। आपकी आत्मा में विपत्ति से जूझने की अनन्त शक्ति है। इसे अनुभव करें।

🔶 सोच कर देखिए, प्रशान्त सागर में रह कर क्या कोई सफल नाविक बन सकता है? सागर की उत्ताल लहरों से जूझ कर आँधी तूफान को झेल कर ही बड़े कप्तान बनते हैं विपत्ति के समुद्र में ही आप जीवन के कप्तान बनते हैं। आपके धैर्य, साहस, लगन, शक्ति , अध्यवसाय की परीक्षा विपत्तियों के भयंकर तूफानों में ही होती है। विपत्ति में चारों ओर से घिर कर हम नई नई बातें खोजते हैं, नई खोजें करते हैं, खूब सोचते विचारते और अपने व्यक्ति त्व का विकास करते हैं। विपत्ति हमारे मित्रों को परखने की सच्ची कसौटी है। विपत्ति एक ऐसा साँचा है, जो हमें नए सिरे से ढालता है और विषम परिस्थितियों से युद्ध करना सिखाता है।

🔷 विपत्ति संसार के बड़े बड़े महात्माओं, राजनीतिज्ञों, विद्वानों पर आई है। वे उसमें तपे, पिसे, कुटे और मजबूत बने हैं। फिर आप क्यों निराश होते हैं? काले बादलों की तरह वह हवा में उड़ जाने वाली क्षणिक वस्तु है। यह तो आपकी इच्छाशक्ति और दृढ़ता की परीक्षा लेने के लिए आती है।

📖 अखण्ड ज्योति, अप्रैल 1955 पृष्ठ 20
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1955/April/v1.20

👉 Truthfulness (Part 1)

🔷 Many instances can be cited when a newly married bride was led to confide in her spouse about her past mistakes and then, instead of promised love and forgiveness, a highly vindictive attitude was adopted thereby making her life a veritable hell. The right thing to do is to keep completely mum about incidents of the past whose revelation is likely to create problems and misery.

🔶 Truthfulness is considered a sign of nobility. A match between word and deed is indeed a virtue, and such qualities should be routinely practiced in daily activities. However it is not falsehood to keep quiet about matters of the past whose uncovering is likely to raise a storm. Very often silence amounts to truthfulness in such circumstances.

🔷 The story goes that a cow escaped from the clutches of a butcher and was grazing by the side of the river behind an ‘ashram’. The butcher, in her pursuit came in front of the ashram and inquired from the sage about the cow’s whereabouts. The sage replied philosophically, “That which has seen speaks not, that which speaks has seen not.” He was, of course, referring to the difference between the faculties of sight (eyes) and the speech (tongue). The butcher could not follow this symbolic language and returned disappointed. The cow was thus saved by this enigmatic truth thus prevented a big tragedy.

📖 Akhand Jyoti- Feb 2001

👉 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिये (भाग 2)

🔷 किसी धर्म में दीक्षित होने और उसकी संस्कृति अपना लेने में कुछ अन्तर तो है पर नाम मात्र का ही है। भारत में ईसाई संस्कृति फैल रही है। स्कूल और कालेजों के छात्र छात्राएं क्या पढ़ते हैं क्या नहीं, यह दूसरी बात है, पर वे वहां के वातावरण में अंग्रेजी भाषा सीखने के अतिरिक्त अंग्रेजी संस्कृति भी सीखते हैं। अध्यापक और अध्यापिकायें अपने व्यावहारिक जीवन में, अपने आचार विचार में, भाषा भेष भाव से, बच्चों पर यही संस्कार डालते हैं कि उन्हें न केवल अंग्रेजी पढ़नी चाहिए वरन् अंग्रेजी मूल संस्कृति का भी अनुकरण करना चाहिए।

🔶 गीली मिट्टी के समान हमारे कोमल बच्चे उस सांचे में ढलते हैं और धीरे-धीरे वे आधे ईसाई बन कर वहां से, निकलते हैं। सिरों पर ढूंढ़ने पर भी किसी के चोटी न मिलेगी। जनेऊ तलाश कराये जायें तो किसी बिरले के कन्धे पर ही उसके दर्शन होंगे। खड़े होकर पेशाब करने से लेकर चाय, डबल रोटी और अण्डे के आहार तक सभ्यता के चिह्न माने जाते हैं। इन सभ्य लोगों के होटलों में होने वाले प्रीतिभोजों में मांस मदिरा आवश्यक हैं अपनी मातृभाषा को हेय समझकर उसमें बातचीत करने को बेइज्जती समझते हैं और अंग्रेजी में पत्र लिखना बड़प्पन एवं गौरव का चिह्न मानते हैं।

🔷 भारत की गर्म जलवायु की दृष्टि से ठण्डे देश के उपयुक्त अंग्रेजी पोशाक सर्वथा अनुपयुक्त है। फिर भी लोग इसलिए उसे पहनते हैं कि अंग्रेजियत कोई बहुत बड़ी बात है। नेक-टाई ईसाई धर्म का एक धर्म चिह्न है, पर हम खुशी-खुशी उसे बांधते हैं। जरा से वजन का चार पैसे मूल्य का जनेऊ हमें बेकार लगता है और आधी छटांक भारी डेढ़ रुपया मूल्य की नेक टाई जिससे गला बांध देने पर आराम से हवा आने का मार्ग भी रुक जाय हमें यह अच्छी लगती है। यह सब उस संस्कृति के आगे आत्म समर्पण कर देने की ही महिमा है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 7

👉 गुरुगीता (भाग 120)

👉 कामधेनु, कल्पतरू, चिन्तामणि है गुरूगीता का पाठ

🔷 इस प्रसंग में बड़ी भक्ति पूर्ण कथा है। यह कथा दक्षिण भारत के प्रभु भक्त वेंकटरमण की है। भक्त वेंकटरमण तुंगभद्रा तट पर बसे रंगपुरम के रहने वाले थे। बचपन से ही उन्हें भगवत् चरणों में अनुराग था। यज्ञोपवीत संस्कार के समय उन्हें गायत्री मंत्र मिला। यह मंत्र उन्हें उनके कुलगुरू ने दिया था। हालाँकि उन्हें तलाश थी उन आध्यात्मिक गुरू की, जो उन्हें ईश्वर साक्षात्कार करा सके। मन की यह लगन उन्होंने बड़ी विनम्रता पूर्वक अपने कुलगुरू को कह सुनायी। बालक वेंकटरमण की बात सुनकर कुलगुरू कुछ समय तो शान्त रहे, फिर बोले -वत्स यह कार्य तो क केवल सद्गुरू प्रदान कर सकते हैं। तुम्हें उनकी प्राप्ति के लिए गुरूगीता का अनुष्ठान करना होगा। वेंकटरमण ने कुलगुरू की इन बातों पर बड़ी आस्था से कहा- आचार्य! यदि हम पवनपुत्र हनुमान को अपना गुरू बनाना चाहें तो क्या यह सम्भव है। अवश्य वत्स! कुलगुरू ने बालक की श्रद्धा की सम्बल दिया।

🔶 बस, उस दिन से बालक वेंकटरमण हनुमान जी की मूर्ति के सामने गायत्री जप एवं गुरूगीता के पाठ में तल्लीन हो गया। नित्य प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में उठना, स्नान, संध्या, तर्पण से निश्चित होकर हनुमान् जी की मूर्ति के सामने गायत्री मंत्र का जप एवं गुरूगीता का पाठ करना। वेंकटरमण का सह क्रम नित्यप्रति छः घण्टे चलता रहता। कभी- कभी वेंकटरमण चाँदनी रात में तुंगभद्रा के तट पर एकान्त में बैठकर गुरूगीता के श्लोकों का पाठ करने लगते, तब ऐसा मालूम होता कि उनके रोम- रोम से ही गुरूगीता मंत्रों की किरणें निकल रही हैं। इस प्रकार इस कठिन साधना में उनके ग्यारह वर्ष बीत गये।

🔷 बारहवें वर्ष के चैत्र शुक्ल पूर्णिमा की आधी रात तुंगभद्रा के बालुकामय तट पर बासन्ती बयार के झोंके के बीच में, वन्य पुष्पों के पराग की मधुरता के बीच वेंकटरमण रामभक्त हनुमान् का ध्यान करते हुए गुरूगीता का पाठ करने लगे। पाठ करते- करते उन्हें समाधि लग गयी। समाधि में उन्होंने देखा कि असंख्य वानरों की सेना के साथ हनुमान् जी आ रहे हैं। धीरे- धीरे वे सभी वानर पता नहीं कहाँ अदृश्य हो गये, बस रह गये केवल हनुमान् जी। उन्होंने बड़ी स्नेह भरी दृष्टि से वेंकटरमण को देखा और उसके चरणों में गिर गये और तभी उन्हें लगा श्री हनुमान् जी उनके हृदयपट पर अपनी तर्जनी अंगुली से स्वर्णाक्षरों में गायत्री मंत्र लिख रहे हैं और कह रहे हैं- उठो वत्स! मैं ही तुम्हारा गुरू हूँ। सचमुच गुरूगीता में क्या कुछ सम्भव नहीं। असम्भव को सम्भव करने वाली है इसकी महिमा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 180

👉 भाग्य से नहीं कर्म से निकला जाता है मुसीबतों से

🔶 एक समय की बात है| एक नदी के किनारे उसी नदी से जुडा एक तालाब था। उस तालाब में नदी से आई हुई बहुत सी मछलियाँ रहती थीं। वह तालाब लम्बी घास व झाडियों से घिरा होने के कारण आसानी से नजर नहीं आता था।

🔷 उसी मे ईना, चिनी तथा मिनी नाम की तीन मछलियों का समूह भी रहता था। वे आपस में मित्र थीं। उनके स्वभाव भिन्न थे। ईना संकट आने के लक्षण मिलते ही संकट टालने का उपाय करने में विश्वास रखती थी। चिनी कहती थी कि संकट आने पर ही उससे बचने की कोशिश करो। तथा मिनी का सोचना था कि संकट को टालने या उससे बचने की बात बेकार हैं करने कराने से कुछ नहीं होता, जो भाग्य में लिखा है, वही होता है।

🔶 एक दिन शाम को कुछ मछुआरे नदी में मछलियाँ पकडकर घर जा रहे थे। उस दिन उनके जालों में बहुत कम मछलियाँ फँसी थी। इसलिए उनके चेहरे उदास थे। तभी उन्हें झाड़ियों के ऊपर मछलीखोर पक्षियों का झुंड उड़ता हुआ दिखाई दिया। सबकी चोंच में मछलियाँ दबी थी। वे चौंके।

🔷 एक ने अनुमान लगाया “दोस्तो! लगता हैं झाड़ियों के पीछे नदी से जुडा तालाब है, जहां इतनी सारी मछलियाँ पल रही हैं।”

🔶 मछुआरे खुश होकर झाडियों में से होकर तालाब के तट पर आ निकले और ललचाई नजर से मछलियों को देखने लगे।🔴 एक मछुआरा बोला “अहा! इस तालाब में तो मछलियाँ भरी पडी हैं। आज तक हमें इसका पता ही नहीं लगा। हमें यहाँ ढेर सारी मछलियां मिलेंगी।

🔷 दूसरे ने कहा “आज तो शाम होने वाली हैं। कल सुबह ही आकर यहाँ जाल डालेंगे।” इस प्रकार मछुआरे दूसरे दिन का कार्यक्रम तय करके चले गए। तीनों मछलियों ने मछुआरों की बात सुन ली थी।

🔶 ईना ने कहा “साथियो! तुमने मछुआरे की बात सुन ली। अब हमारा यहाँ रहना खतरे से खाली नहीं हैं। खतरे की सूचना हमें मिल गई है। समय रहते अपनी जान बचाने का उपाय करना चाहिए। मैं तो अभी ही इस तालाब को छोडकर नदी में जा रही हूँ।

🔷 चिनी बोली “तुम्हें जाना हैं तो जाओ, मैं तो नहीं आ रही। अभी खतरा आया कहाँ हैं, जो इतना घबराने की जरुरत हैं | हो सकता है मछुआरे आयें ही नहीं । उन मछुआरों का यहाँ आने का कार्यक्रम रद्द हो सकता है। हो सकता हैं रात को उनके जाल चूहे कुतर जाएं, हो सकता है उनकी बस्ती में आग लग जाए।  इसलिए उनका आना निश्चित नहीं हैं। जब वह आएंगे, तब की तब सोचेंगे। हो सकता हैं मैं उनके जाल में फॅंसू ही नहीं।”

🔶 मिनी ने अपनी भाग्यवादी बात कही “भागने से कुछ नहीं होने वाला। मछुआरों को आना है तो वह आएंगे ही। हमें जाल में फँसना है  तो हम फँसेंगे ही। किस्मत में मरना ही लिखा हैं तो क्या किया जा सकता हैं?”

🔷 इस तरह ईना तो उसी समय वहाँ से चली गई। जबकि चिनी और मिनी मछली तालाब में ही रही।

🔶 सुबह हुई तो मछुआरे अपने जाल लेकर आ गए और उन्होंने तालाब में अपने जाल डाल दिए। चिनी ने संकट देखा तो जान बचाने के उपाय सोचने लगी । उसका दिमाग तेजी से काम करने लगा। आस-पास छिपने के लिए कोई खोखली जगह भी नहीं थी। तभी उसे याद आया कि उस तालाब में काफी दिनों से एक मरे हुए ऊदबिलाव की लाश तैरती रही हैं। वह उसके बचाव के काम आ सकती हैं।जल्दी ही उसे वह लाश मिल गई। लाश सडने लगी थी। प्रत्यु लाश के पेट में घुस गई और सडती लाश की सडांध अपने ऊपर लपेटकर बाहर निकली। कुछ ही देर में चिनी एक मछुआरे के जाल में फँस गई। मछुआरे ने अपना जाल खींचा और मछलियों को किनारे पर जाल से उलट दिया। बाकी मछलियाँ तो तडपने लगीं, लेकिन चिनी दम साधकर मरी हुई मछली की तरह पडी रही। मछुआरे को सडांध का भभका लगा तो मछलियों को देखने लगा। उसने निश्चल पडी चिनी को उठाया और सूंघा “आक! यह तो कई दिनों की मरी मछली हैं। सड चुकी हैं।” ऐसे बडबडाकर बुरा-सा मुंह बनाकर उस मछुआरे ने चिनी को तालाब में फेंक दिया।

🔷 चिनी अपनी बुद्धि का प्रयोग कर संकट से बच निकलने में सफल हो गई थी। पानी में गिरते ही उसने नदी की और दौड़ लगा दी ।

🔶 मिनी ने भाग्य के भरोसे रहकर अपनी जान बचाने का कोई प्रयास नहीं किया। वह भी दूसरे मछुआरे के जाल में फँस गई थी और एक टोकरी में डाल दी गई थी। भाग्य के भरोसे बैठी रहने वाली मिनी अब अपनी सोच पर पछता रही थीं कि अगर वो भी समय रहते नदी में चली गयी होती तो आज उसकी जान बच जाती। वह उसी टोकरी में अन्य मछलियों की तरह तडप-तडपकर मर गयी।

🔷 इन मछलियों कि तरह ही कुछ कुछ हमारा भी हाल है। हम भी कभी कभी जान बूझकर मुसीबतो को अपने आप बुला लेते हैं या पहले से पता होते हुए भी मुसीबतो से निकलने का प्रयास नहीं करते। और जब हम मुश्किलों से घिर जाते हैं तब पछताते हैं कि अगर हमने पहले से ये काम ना किया होता तो आज मुसीबतों में ना फंसते या अगर हम पहले से मुश्किलों से निकलने का उपाय कर लेते तो आज इतनी मुसीबतों में ना फंसते।

🔶 दोस्तों, इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें भाग्य के भरोसे न बैठकर समय रहते अपनी मुसीबतों , संकटों से बाहर निकलने का प्रयास करना चाहिए।

👉 आज का सद्चिंतन 25 May 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 May 2018


👉 देश सेवा का मार्ग

🔶 प्लेटो ने एक स्थान पर लिखा है कि -’किसी देश का इससे अधिक सौभाग्य क्या हो सकता है कि उसमें श्रेष्ठ आचरण वाले स्त्री पुरुषों का बाहुल्य हो।’ कवि बाल्ट व्हाइट मैन का कथन है कि-’किसी देश की महत्ता उसके ऊँचे भवनों, शिक्षालयों, सम्पत्ति कोषों से नहीं हो सकती। बलवान् और चरित्रवान् व्यक्ति ही अपने देश को महान बना सकते हैं। वह बड़ा ही भाग्यशाली राष्ट्र है, जिसके निवासी उच्च आचरण को अपना आदर्श मानते हों। जर्मनी के भाग्य विधाता हिटलर ने एक स्थान पर लिखा है-हमारे देश को निर्बल स्वास्थ्य वाले धुरन्धर विद्वानों की अपेक्षा ऐसे व्यक्तियों की अत्यधिक आवश्यकता है, जो भले ही कम पढ़े लिखे हों परन्तु वे स्वस्थ हों, सदाचारी हों, आत्म विश्वासी हों और दृढ़ इच्छा शक्ति वाले हों।’

🔷 देश की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि हम उच्च आचरण वाले, निर्भीक, साहसी सदाचारी और स्वस्थ मनुष्यों की संख्या बढ़ावें। सुख, स्वराज्य, सुशासन तब तक किसी देश में स्थिर नहीं रह सकता, जब तक कि वहाँ के निवासी मानवोचित गुणों वाले न हों, वे मानवता का उत्तरदायित्व अनुभव न करते हों। निर्बलता, कायरता, भीरुता, छल, पाखंड और प्रवंचना का जब तक जोर रहेगा, तब तक दासता और दुर्भाग्य हमारा पल्ला नहीं छोड़ सकते। महात्मा गाँधी का कथन है कि “शारीरिक और मानसिक स्वस्थता की आवश्यकता जो लोग अनुभव करते हों और जो अपने को सब दृष्टियों से बलवान बनाने के लिये निरंतर प्रयत्नशील रहें, ऐसे ही देश सेवकों की भारत माता को आवश्यकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड-ज्योति मई 1944 पृष्ठ 1

👉 यह अच्छी आदतें डालिए (भाग 3)

परिस्थितियों के अनुकूल ढल जाना :-

🔶 अपने आपको नई नई विषम तथा विरोधी परिस्थितियों के अनुसार ढाल लेना, इच्छाओं, आवश्यकताओं और रहन सहन को नवीन परिस्थितियों के अनुसार घटा बढ़ा लेना एक बड़ा गुण है। मनुष्य को चाहिए कि वह दूसरे व्यक्तियों, चाहे वे कैसे ही गुण स्वभाव के क्यों न हों, के अनुसार अपने को ढालना सीखे। नई परिस्थितियाँ चाहे जिस रूप में आयें, उसके वश में आ जायं। अच्छी और बुरी आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार अपने को घटा बढ़ा लिया करें।

🔷 अधिकाँश व्यक्ति दूसरे के अनुसार अपने को ढाल नहीं पाते, इसलिए वे दूसरों का हृदय जीत नहीं पाते, न झुक सकने के कारण वे सफल नहीं हो पाते। पत्नी पति के अनुसार, पति पत्नी के अनुसार, विक्रेता ग्राहक के अनुसार, मातहत अफसर के अनुसार, विद्यार्थी गुरु के अनुसार, पुत्र पिता के अनुसार न ढल सकने के कारण दुःखी रहते हैं।

🔶 आप बेंत की तरह लचकदार बनें जिससे अपने को हर प्रकार के समाज के अनुसार ढाल लिया करें। इसके लिए आप दूसरे की रुचि, स्वभाव, आदतों और मानसिक स्तर का ध्यान रखें। शक्कर से मीठे वचन बोलें, प्रेम प्रदर्शित करें, दूसरों की आज्ञाओं का पालन करें। आपसे बड़े व्यक्ति यह चाहते हैं कि आप उनकी आज्ञा का पालन करें। सभ्यता पूर्वक दूसरे से व्यवहार करें। ढलने की प्रवृत्ति से मित्रताएं स्थिर बनती हैं, व्यापार चलाते हैं, बड़े बड़े काम निकलते हैं। इस गुण से इच्छा शक्ति बढ़ती है और मनुष्य अपने ऊपर अनुशासन करना सीखता है। इससे आत्मबलिदान की भावना का विकास होता है, स्वार्थ नष्ट होता है।

📖 अखण्ड ज्योति, अप्रैल 1955 पृष्ठ 19
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1955/April/v1.19

👉 Awakening Divinity in Man (Last Part)

🔶 Friends, turn away from the mirage of cravings, passions, greed and discontentment, and let your prayers and worship reach the stage where your personality would be illumined by God’s light, by the glow of divinity. This is true devotion. If you have cultivated virtuous tendencies and conduct, I assure you that you will get support and cooperation from people around you. Boons of enlightened progress will be showered upon you from all directions.

🔷 This is what has been, and will continue to be, the source of God’s blessings, the blessings of divine mother Gayatri. This has been the great tradition of devotion and of devotees and will be so in the future too. If you understand this secret and learn the true meaning of worship and devotion, your Gayatri anusthana here will be accomplished in the truest sense.

🔶 The self disciplining practices of this anusthana sadhana are meant to refine your personality so that virtuous tendencies flourish in you.  If this tapascarya of yours is sincere and one-pointed then at the end of this anusthana you will feel inwardly endowed with godly attributes of an authentically virtuous and noble person. When a person imbibes an attitude of loving service, he sees his own good in the welfare of others and experiences happiness in it. If you find them elevated in this state of nobility, I would say you have attained true devotion and grace of the god.

🔷 You would be blessed by God, just as the great devotees of the past have been. I have tried followed this path and have been blessed with sublime gifts in my life. I want all of you, who have come for this sadhana course of a condensed anusthana, to get inspired and be blessed by divine grace. If this inspires you and you begin to practice it, I assure you that the result will be so fulfilling, so majestic that you, your country, your life, your God, this sadhana course and I myself will be glorified. May God bless you with his grace.

|| OM SHANTI ||
 
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिये (भाग 1)

🔶 यों मनुष्य भी अन्य प्राणियों की तरह एक पशु है। थोड़ी बुद्धि अधिक रहने से वह अपेक्षाकृत कुछ अधिक सुख-साधन प्राप्त कर सकता है इतना ही सामान्यतः उसे बुद्धि विशेषता का लाभ है। पर यदि उसकी अन्तःप्रेरणा उच्च भावनाओं, आदर्शों एवं आकांक्षाओं से अनुप्राणित हुई तो वह असामान्य प्रकार का, उच्चकोटि का, सत्पुरुषों जैसा जीवन-यापन करता हुआ न केवल स्वयं सच्ची सुख शांति की अधिकारी बनता है वरन् दूसरे अनेकों को भी आनन्द और सन्तोष की परिस्थितियों तक ले पहुंचने में सहायक होता है। यदि वह अंतः प्रेरणाएं निकृष्ट कोटि की हुईं तो न केवल स्वयं रोग, शोक, अज्ञान, दारिद्र, चिन्ता, भय, द्वेष, दुर्भाव, अपकीर्ति एवं नाना प्रकार के दुःखों का भागी बनता है वरन् अपने से सम्बद्ध लोगों को भी दुर्मति एवं दुर्गति का शिकार बना देता है। जीवन में जो कुछ श्रेष्ठता या निकृष्टता दिखाई देती है उसका मूल आधार उसकी अन्तःप्रेरणा ही है। इसी को संस्कृति के नाम से पुकारते हैं।

🔷 जिस प्रकार कोई पौधा अपने आप उगे और बिना किसी के संरक्षण के बढ़े तो वह जंगली किस्म का कुरूप हो जाता है। पर यदि वही पौधा किसी चतुर माली की देख-रेख में अच्छे खाद्य पानी एवं संरक्षण के साथ बढ़ाया जाय, समय-समय पर काटा-छांटा या सुधारा जाय तो बहुत ही सुन्दर एवं सुविकसित हो सकता है। मानव जीवन की स्थिति भी इसी प्रकार की है उसे उचित दिशा में उचित रीति से विकसित करने की जो वैज्ञानिक पद्धति है उसे ‘संस्कृति’ कहा जाता है।

🔶 भारतीय संस्कृति—मानव संस्कृति है। उसमें मानवता के सभी सद्गुणों को भली प्रकार विकसित करने वाले सभी तत्व पर्याप्त मात्रा में मौजूद हैं। जिस प्रकार काश्मीर में पैदा होने वाली केशर, ‘कश्मीरी केशर’ के नाम से अपनी जन्मभूमि के नाम पर प्रसिद्ध है। इस नाम के अर्थ यह नहीं हैं कि उसका उपयोग केवल काश्मीर निवासियों तक ही सीमित है। भारतीय संस्कृति नाम भी इसीलिए पड़ा कि वह भारत में पैदा हुई है वस्तुतः वह विश्व-संस्कृत है। मानव संस्कृति है। सारे विश्व के मानवों की अन्तःप्रेरणा को श्रेष्ठ दिशा में प्रेरित करने की क्षमता उसमें कूट-कूटकर भरी हुई है। इस संस्कृति को साम्प्रदायिकता या संकीर्णता कहना—वस्तुस्थिति से सर्वथा अपरिचित होना ही है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 6

👉 गुरुगीता (भाग 119)

👉 कामधेनु, कल्पतरू, चिन्तामणि है गुरूगीता का पाठ

🔶 इस प्रकरण को आगे बढ़ाते हुए भगवान् सदाशिव माता जगदम्बा से कहते हैं-

जपेत् शाक्तश्च सौरश्च गाणपत्यश्च वैष्णवः। शैवश्च सिद्धिदं देवि सत्यं सत्यं न संशयः॥१५१॥
अथ काम्यं जपे स्थाने कथयामि वरानने। सागरे वा सरित्तीरेऽथवा हरिहरालये॥ १५२॥
शक्तिदेवालये गोष्ठे सर्वदेवालये शुभे। वटे च धात्रिमूले वा मठे वृंदावने तथा॥ १५३॥
पवित्रे निर्मले स्थाने नित्यानुष्ठानतोऽपि वा। निवेदनेन मौनेन जपमेतं समाचरेत् ॥ १५४॥
श्मशाने भयभूमौ तु वटमूलान्तिके तथा। सिध्यन्ति धत्तूरे मूले चूतवृक्षस्य सन्निधौ॥ १५५॥

🔷 गुरूगीता का जप- पाठ अनुष्ठान शक्ति, सूर्य, गणपति, विष्णु ,शिव के उपासकों को भी सिद्धि देने वाला है। यह सत्य है, सत्य है इसमें कोई संशय नहीं है॥ १५१॥ भगवान् शिव माँ से कहते हैं- हे सुमुखि! अब मैं तुमसे गुरूगीता के अनुष्ठान के लिए योग्य स्थानों का वर्णन करता हूँ। इसके लिए उपयुक्त स्थान सागर, नदी का किनारा अथवा शिव या विष्णु का मंदिर है॥ १५२॥ भगवती का मंदिर, गौशाला, अथवा कोई देवमंदिर, वट, आँवला वृक्ष, मठ अथवा तुलसी वन इसके लिए शुभ माने गये हैं॥ १५३॥ पवित्र, निर्मल स्थान में मौन भाव से इसका जप- अनुष्ठान करना चाहिए॥ १५४॥ इस अनुष्ठान के लिए श्मशान, भयानक स्थान ,बरगद, धूतर या आम्रव़ृक्ष के नीचे का सुपास भी श्रेष्ठ कहा गया है॥१५५॥

🔶 भगवान् शिव के इन वचनों में गुरूगीता अनुष्ठान के विविध रहस्य हैं। इन रहस्यों में प्रमुखता है- साधना भूमि का अपना वातावरण होता है। अच्छा हो कि यह वातावरण साधना के लक्ष्य के अनुरूप हो। सात्विक लक्ष्य के लिए नदी, सागर उपयुक्त है, तो वैराग्य के उन्मेष के लिए ठीक है। इनमें से किसी स्थान का चयन साधक को अपनी मनोभूमि और अपने लक्ष्य के अनुसार करना चाहिए। स्थान उपयुक्त हो, लक्ष्य स्पष्ट हो, तो गुरूगीता की साधना साधक के सभी मनोरथों को पूरा करने वाली है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 179