शुक्रवार, 25 मई 2018

👉 गुरुगीता (भाग 119)

👉 कामधेनु, कल्पतरू, चिन्तामणि है गुरूगीता का पाठ

🔶 इस प्रकरण को आगे बढ़ाते हुए भगवान् सदाशिव माता जगदम्बा से कहते हैं-

जपेत् शाक्तश्च सौरश्च गाणपत्यश्च वैष्णवः। शैवश्च सिद्धिदं देवि सत्यं सत्यं न संशयः॥१५१॥
अथ काम्यं जपे स्थाने कथयामि वरानने। सागरे वा सरित्तीरेऽथवा हरिहरालये॥ १५२॥
शक्तिदेवालये गोष्ठे सर्वदेवालये शुभे। वटे च धात्रिमूले वा मठे वृंदावने तथा॥ १५३॥
पवित्रे निर्मले स्थाने नित्यानुष्ठानतोऽपि वा। निवेदनेन मौनेन जपमेतं समाचरेत् ॥ १५४॥
श्मशाने भयभूमौ तु वटमूलान्तिके तथा। सिध्यन्ति धत्तूरे मूले चूतवृक्षस्य सन्निधौ॥ १५५॥

🔷 गुरूगीता का जप- पाठ अनुष्ठान शक्ति, सूर्य, गणपति, विष्णु ,शिव के उपासकों को भी सिद्धि देने वाला है। यह सत्य है, सत्य है इसमें कोई संशय नहीं है॥ १५१॥ भगवान् शिव माँ से कहते हैं- हे सुमुखि! अब मैं तुमसे गुरूगीता के अनुष्ठान के लिए योग्य स्थानों का वर्णन करता हूँ। इसके लिए उपयुक्त स्थान सागर, नदी का किनारा अथवा शिव या विष्णु का मंदिर है॥ १५२॥ भगवती का मंदिर, गौशाला, अथवा कोई देवमंदिर, वट, आँवला वृक्ष, मठ अथवा तुलसी वन इसके लिए शुभ माने गये हैं॥ १५३॥ पवित्र, निर्मल स्थान में मौन भाव से इसका जप- अनुष्ठान करना चाहिए॥ १५४॥ इस अनुष्ठान के लिए श्मशान, भयानक स्थान ,बरगद, धूतर या आम्रव़ृक्ष के नीचे का सुपास भी श्रेष्ठ कहा गया है॥१५५॥

🔶 भगवान् शिव के इन वचनों में गुरूगीता अनुष्ठान के विविध रहस्य हैं। इन रहस्यों में प्रमुखता है- साधना भूमि का अपना वातावरण होता है। अच्छा हो कि यह वातावरण साधना के लक्ष्य के अनुरूप हो। सात्विक लक्ष्य के लिए नदी, सागर उपयुक्त है, तो वैराग्य के उन्मेष के लिए ठीक है। इनमें से किसी स्थान का चयन साधक को अपनी मनोभूमि और अपने लक्ष्य के अनुसार करना चाहिए। स्थान उपयुक्त हो, लक्ष्य स्पष्ट हो, तो गुरूगीता की साधना साधक के सभी मनोरथों को पूरा करने वाली है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 179

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