बुधवार, 18 मई 2016

खुद मुश्किल में रहते हुए 'लावारिस वॉर्ड' के मरीजों को खाना खिलाकर नई ज़िंदगी देते हैं गुरमीत सिंह

कहते है पैदा करने से बड़ा पालने वाला होता है। पालने वाला तब और बड़ा हो जाता है जब वो इस बात की चिंता नहीं करता कि सामने कौन है और हर किसी के लिए एक ही भाव से, उसी लगन से और तत्परता से दिन-रात लगा रहता हो। इसी की जीती जागती तस्वीर का नाम है सरदार गुरमीत सिंह।मूल रूप से पाकिस्तानीे परिवार की तीसरी पीढ़ी सरदार गुरमीत सिंह पटना शहर के भीड़भाड़ वाले इलाके चिरैयाटांड इलाके में कपडे की दुकान चलाते है। पिछले 25 साल से गुरमीत सिंह निरंतर बिना नागा शहर के विभिन्न इलाको में बेसहारा छोड़ दिए गए लोगो को खाना खिलाते और उनकी निस्वार्थ भाव सेवा करते चले आ रहे हैं।

सरदार गुरमीत सिंह की पहुंच हर उस शख्स तक है जो अपनों के सताये, बीमार, लाचार और आसक्त, खाने के लिए दाने दाने को मोहताज है। और तो और गुरमीत सिंह पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल के उस कुख्यात 'लावारिस वार्ड' में मरने को छोड़ दिए गए इंसान के लिए रोटी के निवाले के साथ मौजूद दिखाई देते हैं जहां आम आदमी एक मिनट ठहर नहीं सकता। गुरमीत सिंह इस वार्ड में न सिर्फ मरीजों को रोटी खिलाते हैं बल्कि उन्हें इंसान होने का अहसास भी दिलाते हैं।


असल में हमारी ज़िंदगी में भी एक अनजान मददगार ने महती भूमिका निभाई है। अनजान फ़रिश्ते ने हमारे परिजनों की उस वक्त मदद की जब गंभीर रूप से बीमार अपनी बहन के इलाज ख़ातिर मैं दर दर की ठोकरें खा रहा था। आर्थिक तंगी ने उस दौरान परिवार को जकड रखा था। मुझे लगता था पैसा न हो तो इंसान कितना लाचार और मजबूर हो जाता है। ऐसे में उस अनजान फ़रिश्ते ने न केवल मदद की बल्कि यू कहें कि हमारी बहन को जीवनदान दिया। और फिर दुनिया की इस भीड़ में सदा के लिए गुम हो गए।

वो दिन है और आज का दिन सरदार जी ने अपने जीवन को मानव सेवा को समर्पित कर दिया। आँधी आये या तूफ़ान, आग बरसे या पानी तमाम विपरीत स्थितियों में गुरमीत सिंह पीएमसीएच के लावारिस वार्ड के मरीजों को तो खाना खिलाने जरूर जाते हैं, उनकी सेवा करते हैं। मानवता की सेवा में लगे सरदार जी बिना किसी से आर्थिक योगदान लिए अपनी कमाई से अब तक 25 सालो में 100 लोगों को पूर्ण रूप से सकुशल कर उन्हें उनके परिजनों से मिला चुके है। 100 लोग तो महज़ एक संख्या मात्र है ज़ज़्बा तो असंख्य नंबरों से कहीं ऊपर है।



शुरूआती दौर में जब सरदार गुरजीत सिंह ने अपनी सीमित कमाई से अनाथों और लावारिस लोगों को खाना खिलाना शुरू किया तो आर्थिक तंगी की वजह से कई बार इस काम में मुश्किलें आईं। उस दौरान परिजनों ने भी विरोध किया पर लगन और अपनी धुन के पक्के इस व्यक्ति ने सारी मजबूरियों और विरोध को धता बताते हुए इस काम को अपनी दिनचर्या में शामिल रखा। कभी ऐसे भी हालात आये की घर में खाने को कुछ भी नहीं था फिर भी पैसों का यहाँ वहा से इंतज़ाम कर साग सब्जी खरीद कर लाये। घर में ही खाना बनवाया और लेकर अस्पताल के वार्ड में पहुंच कर सब को खाना खिलाया। इस वार्ड में अकसर ऐसे ही मरीज आते है जो खुद से खाना भी नहीं खा सकते। खाना खिलाने के बाद सरदार गुरमीत सिंह मरीजों के बिस्तर और कपडे भी साफ़ करते है। घंटो उनके साथ वक्त बिताते हैं। पर्व त्यौहार भी इन्हीं के साथ मनाते है। हालांकि गुरमीत सिंह का भरा पूरा परिवार है। परिवार में पांच बेटे हैं। जिस दिन बड़े लड़के की शादी थी। आनंद काज में सभी नाते रिश्तेदार दोस्त साथी खुशियाँ मना रहे थे। सरदारजी अस्पताल में अपने रोज के नित्य के फ़र्ज़ को अंजाम देने पहुंच गए। वार्ड में मौजूद मरीजों को खाना खिलाया, सब के साथ अपनी खुशिया बांटी, सब को मिठाई खिलाई। फिर शादी में शामिल होने के लिए घर वापस लौटे।

गुरमीत सिंह बताते हैं,

अगर कभी मैं व्यस्त होता हूं और अस्पताल जाने की स्थिति में नहीं रहता हूं तो मेरे बड़े बेटे हरदीप सिंह इस फ़र्ज़ को निभाते हैं। मेरी पूर्ण आस्था गुरु नानकदेन जी के उपदेशों में है। महाराज जी की सही शिक्षा भी मानव सेवा को बढ़ावा देती है। मेरे लिए तो परेशान मरीज को खाना खिलाना ही आस्था है। वही मेरा कर्म है।

आम आदमी के गुमनाम मसीहा किसी लावारिस की जानकारी मिलने पर वहां पहुंच जाते हैं और उसका इलाज करवाते हैं, उसकी सेवा करते हैं और स्वस्थ होने पर उसके घर तक पहुंचाते हैं।

सरदार गुरमीत सिंह उन तमाम लोगों के लिए प्रेरणास्रोत हैं जो समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं। समाज सेवा के लिए सबसे ज़रूरी है दृढ इच्छा और नि:स्वार्थ भाव। परेशान हाल लोगों के चेहरे पर खुशी देखकर जो संतुष्टि गुरमीत सिंह को होती है वो वाकई जीवन की सबसे बड़ी खुशी है।

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 52) :-- 👉 समग्र जीवन का सम्मान करना सीखें

🔵 शिष्य संजीवनी के सूत्रों में शिष्य जीवन के अनगिन रहस्य पिरोये हैं। इसका प्रत्येक सूत्र शिष्य जीवन के एक नये रहस्य को उजागर करता है, उसकी समग्र व्याख्या प्रस्तुत करता है। जो इस व्याख्या को समझकर उसे अपने जीवन में अवतरित करने, आत्मसात् करने के लिए तत्पर है, वही शिष्यत्व के सुपात्र- सत्पात्र है। जो ऐसा नहीं कर सकते, वे हमेशा के लिए इसके स्वाद से वंचित रहते हैं। समझ की बात इसमें यह है कि इसके लिए बौद्धिक समझ भर पर्याप्त नहीं है। इसके लिए साधना का बल चाहिए। जीवन साधना का पुरुषार्थ जिनमें है, वही इस कठिन डगर पर चलने के लायक हैं। जो इस डगर पर चल रहे हैं, वे जानते हैं कि इस पर चलते हुए कितनी बार उनके पाँवों में छाले पड़े हैं। कितनी बार ये छाले गहरे घावों में बदले हैं और कितनी बार उन्हें इन घावों की रिसन से मर्मान्तक वेदना झेलनी पड़ी है।
   
🔴 लेकिन इसके बावजूद यह रोमाँचक यात्रा अतीव सुखप्रद है, क्योंकि इसकी अनुभूतियों का प्रत्येक पृष्ठ मानवीय चेतना के एक नये और अनजाने आयाम को उद्घाटित करता है। इसके नये अन्तर- प्रत्यन्तर खुलते हैं। परत- दर बोध की नूतन दृष्टि मिलती है। और इसमें सबसे बड़ी बात यह पता चलता है कि जीवन के प्रत्येक कण में सार है। इसके प्रत्येक क्षण में अर्थ है। फिर ये कण या क्षण मुश्किलों से भरे हुए ही क्यों न हों। भले ही इनके साथ जीने में विष बुझे बाणों की चुभन का अहसास हो रहा हो। जो इसमें सार- सत्य को ढूँढ लेते हैं, वही जीवन के मर्म को जान पाते हैं।
  
🔵 शिष्य संजीवनी के इस नये सूत्र का संदेश भी है। जो शिष्यत्व की डगर पर चले हैं, जिन्होंने इस साधना में अपने सम्पूर्ण जीवन की आहुति दी है, उन सबका कहना यही है- ‘समग्र जीवन का सम्मान करो, जो तुम्हें चारों ओर से घेरे हुए है। अपने आसपास के अनवरत बदलने वाले प्रवाहमान जीवन को गहराई से देखो, क्योंकि यह मानवीय संवेदनाओं का ही सघन रूप है और ज्यों- ज्यों तुम इसकी बुनावट को परखोगे- बनावट पर ध्यान दोगे, त्यों- त्यों तुम क्रमिक रूप से जीवन के विशालतम शब्द एवं व्यापकतम अर्थ को पढ़ और समझ सकने लायक होगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/time

👉 क्षुद्र हम, क्षुद्रतम हमारी इच्छाएँ (भाग 6)

 
👉 पहाड़ पर प्रभु। वहाँ भी पहुँचा मानव
🔴 भगवान् जी को गुस्सा आया, तो उन्होंने विचार किया कि ऐसी जगह चलना चाहिए जहाँ कोई पहुँच न सके। सो वे पहाड़ के ऊपर चले गये। वे कैलाश पर्वत पर रहने लगे। लोगों ने कहा कि भगवान् जी को तलाश करना चाहिए और वहाँ चलना चाहिये और अपनी दिक्कतें बतानी चाहिए और वहीं से आशीर्वाद लाना चाहिए। भगवान् जी कैलाश पर्वत पर मानसरोवर के पास बैठे हुए थे। बस, लोगों ने रास्ता ढूँढ़ा। कौन सा रास्ता है? नैनीताल के पास से जाता है, अल्मोड़ा के पास से जाता है। तिब्बत तक का रास्ता ढूँढ़ते हुए पहाड़ों पर होते हुए कैलाश पर्वत तक वे जा पहुँचे। भगवान् ने कहा कि धक्के खाकर के मनुष्य मेरे पास आ गया, चलो अच्छा हुआ।

🔵 भगवान् ने कहा- ‘‘बच्चों! तुम्हारे पास सारी शक्तियाँ हैं और सारी सुविधाएँ है, जो मैंने तुम्हारे भीतर दबाकर रख दी हैं। तुमको उन्हें अपने भीतर तलाश करना चाहिए और तुमको अपना जीवन अच्छा बनाना चाहिए। जैसे ही तुम अपना जीवन अच्छा बनाओगे, सारी ऋद्धियाँ और सिद्धियाँ, सारे सुख और सारी सुविधाएँ अनायास ही आती हुई चली आयेंगी।’’ लोगों ने कहा कि महाराज जी! यह तो बड़े झगड़े का काम है और बहुत झंझट का काम है। हम अपने आपको कैसे सिद्ध करेंगे और कैसे मन को नियंत्रित करेंगे? और कैसे इन्द्रियों का निग्रह करेंगे? सेवा के लिए हम मन कहाँ से लायेंगे और ऐसे कैसे करेंगे? यह हमसे नहीं हो सकता और हम नहीं करेंगे। भगवान् ने कहा- ‘फिर क्या करोगे?’ हम तो महाराज जी! बस आपका आशीर्वाद माँगेंगे और अपना फायदा करायेंगे आपसे।

👉 क्षुद्र और क्षुद्रतम हम
🔴 भगवान् जी को फिर गुस्सा आया। उन्होंने कहा कि हम इसीलिए तो भाग करके यहाँ आये थे। हमने तुमको सारी विद्याएँ दे दीं, मजबूत कलाइयाँ दे दीं, अक्ल दे दी, सब काम कर दिया और इस लायक बना दिया कि अपने इस शरीर की जरूरतों को स्वयं पूरा कर लिया करो। और तुम हो कि शरीर की जरूरतों को भी पूरा कराने के लिए हमारे पास चले आते हो। यह बड़ी खराब बात है। हम तो तुम्हारी आत्मा को बढ़ायेंगे। लोगों ने कहा कि आत्मा को बढ़ाने की जरूरत नहीं है। हम तो आपसे अपने शरीर की चीजों को माँगेंगे। भगवान् जी को फिर नाराजगी हुई और वे फिर वहाँ से भाग खड़े हुए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/guru3/shudrahumshurdtamhum.2

👉 आत्मचिंतन के क्षण 18 May 2016


🔵 परस्पर प्रोत्साहन न देना हमारे व्यक्तिगत सामाजिक जीवन की एक बहुत बड़ी कमजोरी है। किसी को प्रोत्साहन भरे दो शब्द कहने के बजाय लोग उसे खरी-खोटी असफलता की बातें कर निरुत्साहित करते हैं, हिम्मत तोड़ते हैं, जिससे दूसरों को निराशा, असंभावनाओं का निर्देश मिलता है और हमारे सामाजिक विकास में गतिरोध पैदा हो जाता है।

🔴 असंख्यों बार यह परीक्षण हो चुके हैं कि दुष्टता किसी के लिए भी लाभदायक सिद्ध नहीं हुई। जिसने भी उसे अपनाया वह घाटे में रहा और वातावरण दूषित बना। अब यह परीक्षण आगे भी चलते रहने से कोई लाभ नहीं। हम अपना जीवन इसी पिसे को पीसने में-परखे को परखने में न गँवायें तो ही ठीक है। अनीति को अपनाकर सुख की आकाँक्षा पूर्ण करना किसी के लिए भी संभव नहीं हो सकता तो हमारे लिए ही अनहोनी बात संभव कैसे होगी?

🔵 इस संसार में अच्छाइयों की कमी नहीं। श्रेष्ठ और सज्जन व्यक्ति भी सर्वत्र भरे पड़े हैं, फिर हर व्यक्ति में कुछ अच्छाई तो होती ही है। यदि छिन्द्रान्वेषण छोड़कर हम गुण अन्वेषण करने का अपना स्वभा बना लें, तो घृणा और द्वेष के स्थान हमें प्रसन्नता प्राप्त करने लायक भी बहुत कुछ इस संसार में मिल जायेगा।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गायत्री उपासना सम्बन्धी शंकाएँ एवं उनका समाधान (भाग 1)


🔵 गायत्री मन्त्र के सम्बन्ध में एक शंका अक्सर उठाई जाती है कि उसके कई रूप हैं। कई लोग भिन्न-भिन्न ढंग से उसका उच्चारण करते या लिखते हैं। वस्तुतः शुद्ध रूप क्या है? इस सम्बन्ध में सारे ग्रन्थों का अध्ययन करने पर निष्कर्ष यही निकलता है कि गायत्री में आठ-आठ अक्षर के तीन चरण एवं चौबीस अक्षर हैं। भूः, भुवः, स्वः के तीन बीज मन्त्र- ओजस् तेजस् और वर्चस् को उभारने के लिए अतिरिक्त रूप से जुड़े हुए हैं। प्रत्येक वेद मन्त्र के आरम्भ में एक ॐ लगाया जाता है। जैसे किसी व्यक्ति के नाम से पूर्व सम्मान सूचक ‘श्री’ मिस्टर, पण्डित, महामना आदि सम्बोधन जोड़े जाते हैं, उसी प्रकार ॐकार- तीन व्याहृति और तीन पाद समेत पूरा और सही गायत्री मन्त्र इस प्रकार लिखा जा सकता है- “ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।” कई व्यक्ति इसी घटाने-बढ़ाने में अपनी-अपनी तिकड़म भिड़ाते देखे जाते हैं।

🔴 कोई तीन ॐ- कोई पाँच ॐ लगाने की बात कहते हैं। कोई-कोई हर चरण के साथ एक ॐ जोड़ते हैं। कोई ब्राह्मणों की- क्षत्रियों की- वैश्यों की अलग-अलग गायत्री बताते हैं। यह अपनी-अपनी मनगढ़न्त है। वस्तुतः गायत्री का शुद्ध स्वरूप उतना ही है जितना कि ऊपर बताया गया। आर्ष ग्रन्थों में कहीं-कहीं तीन या सात व्याहृतियों के प्रयोग की, बीज मन्त्रों को भी साथ जोड़ने की चर्चा है। यह अपने-अपने विशेष प्रयोग उपचार हैं। शुद्ध गायत्री मात्र उतनी ही है जिसका उल्लेख किया गया।

🔵 वेदों में अनेकों मन्त्र हैं, फिर गायत्री को ही प्रमुखता क्यों दी गयी? इस पर विचार करने पर मत यही बनता है कि इस मन्त्र की अपनी विशेष गरिमा है। इसका उल्लेख वेदों में स्थान-स्थान पर हुआ है तथा अन्यान्य धर्मग्रन्थों में भी माहात्म्य सहित प्रमुखता दी गयी है। देव संस्कृति के दो प्रतीकों- शिखा और सूत्र (यज्ञोपवीत) को भी गायत्री का ही बहिरंग पर आरोपित स्वरूप माना जा सकता है। एक को सिर पर धर्म ध्वजा के रूप में तथा दूसरे को कन्धे पर उत्तरदायित्व अनुशासन के रूप में धारण किया जाता है। यह गौरव किसी भी अन्य मन्त्र को प्राप्त नहीं है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति जून पृष्ठ 46
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1983/June.46

👉 आत्मचिंतन के क्षण 16 Dec 2018

ऐसा कोई नियम नहीं है कि आप सफलता की आशा रखे बिना, अभिलाषा किये बिना, उसके लिए दृढ़ प्रयत्न किये बिना ही सफलता प्राप्त कर सको। प्रत्ये...