शुक्रवार, 18 मई 2018

👉 बुद्ध और उनकी प्रव्रज्या

🔶 बुद्ध को आत्मबोध हुआ। कठोर तपश्चर्या के बाद प्राप्त इस उपलब्धि से वे निर्वाण- मोक्ष की ओर भी बढ़ सकते थे। पर उनका लक्ष्य था-  अनाचार, कुरीति से भरे समाज का परिशोधन तथा विवेक रूपी अस्त्र द्वारा जन- मानस का परिष्कार। आत्मबोधजन्य ईश्वरीय सन्देश को व्यापक बनाने वे निकल पड़े और जन- जन तक पहुँचकर विचार- क्रांति कर सकने में सफल हुए।

🔷 परिव्रज्या बौद्ध धर्म का प्रधान अंग मानी जाती थी। भिक्षुक गण सतत चलते रहते थे व बुद्ध के साथ 'संघं, धर्म शरणम् गच्छामि' का नारा लगते। फलत: भारतवर्ष ही नहीं, सारे विश्व भर में उनका सन्देश पहुँचाने का लक्ष्य पूरा कर सके। सिद्धार्थ के अन्दर विश्व कल्याण की कामना रूप में जो बीज पला वह गौतम बुद्ध के रूप में विकसित, पल्लवित होकर सारी मानवता को धन्य कर गया।

📖 प्रज्ञा पुराण से

👉 नौरोज का मेला

🔶 अकबर की महानता का गुणगान तो कई इतिहासकारों ने किया है लेकिन अकबर की औछी हरकतों का वर्णन बहुत कम इतिहासकारों ने किया है........!

🔷 अकबर अपने गंदे इरादों से प्रतिवर्ष दिल्ली में नौरोज का मेला आयोजित करवाता था जिसमें पुरुषों का प्रवेश निषेध था अकबर इस मेले में महिला की वेष-भूषा में जाता था और जो महिला उसे मंत्र मुग्ध कर देती उसे दासियाँ छल कपट से अकबर के सम्मुख ले जाती थी .........!

🔶 एक दिन नौरोज के मेले में महाराणा प्रताप सिंह की भतीजी, छोटे भाई महाराज शक्तिसिंह की पुत्री, मेले की सजावट देखने के लिए आई जिनका नाम बाईसा किरण देवी था जिनका विवाह बीकानेर के पृथ्वीराज जी से हुआ। बाईसा किरण देवी की सुंदरता को देखकर अकबर अपने आप पर काबू नही रख पाया और उसने बिना सोचे समझे दासियों के माध्यम से धोखे से जनाना महल में बुला लिया.......!

🔷 जैसे ही अकबर ने बाईसा किरण देवी को स्पर्श करने की कोशिश की किरणदेवी ने कमर से कटार निकाली और अकबर को ऩीचे पटकर छाती पर पैर रखकर कटार गर्दन पर लगा दी और कहा नींच....नराधम तुझे पता नहीं मैं उन महाराणा प्रताप की भतीजी हुं........ जिनके नाम से तुझे नींद नहीं आती है...... बोल तेरी आखिरी इच्छा क्या है.............?

🔶 अकबर का खुन सुख गया कभी सोचा नहीं होगा कि सम्राट अकबर आज एक राजपूत बाईसा के चरणों में होगा .........!

🔷 अकबर बोला मुझे पहचानने में भूल हो गई मुझे माफ कर दो देवी.......!

🔶 तो किरण देवी ने कहा कि आज के बाद दिल्ली में नौरोज का मेला नहीं लगेगा और किसी भी नारी को परेशान नहीं करेगा अकबर ने हाथ जोड़कर कहा आज के बाद कभी मेला नहीं लगेगा उस दिन के बाद कभी मेला नहीं लगा.........!

🔷 इस घटना का वर्णन गिरधर आसिया द्वारा रचित सगत रासो मे 632 पृष्ठ संख्या पर दिया गया है।

🔶 बीकानेर संग्रहालय में लगी एक पेटिंग मे भी इस घटना को एक दोहे के माध्यम से बताया गया है।

किरण सिंहणी सी चढी... उर पर खींच कटार..!
भीख मांगता प्राण की....अकबर हाथ पसार...!!

🔷 अकबर की छाती पर पैर रखकर खड़ी वीर बाला किरन का चित्र आज भी जयपुर के संग्रहालय मे सुरक्षित है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन 19 May 2018


👉 कष्टों का निवारण (अन्तिम भाग)

🔶 बीमारी से ग्रसित हो जाने या किसी अन्य संकट में फंस जाने पर उससे मुक्त होने के लिए भी अपना आन्तरिक बल चाहिए। सदाशा और शुभ भविष्य का दृढ़ विश्वास कठिनाई से निकाल सकते हैं। आत्म विश्वास की जितनी मदद, बीस मित्र मिलकर भी नहीं कर सकते। आत्म निर्भरता वह संजीवनी बूटी है जिसे पीकर मुर्दे जी पड़ते हैं और बुड्ढे जवान हो जाते हैं इसके मुकाबले का और कोई ‘टानिक’ विश्व भर में अविष्कृत नहीं हो सका है।

🔷 तात्पर्य यह है कि बाहर की जो कुछ भी भली बुरी परिस्थितियाँ तुम्हें घेरे हुए हैं वह तो फूल पत्तियाँ हैं इनकी जड़ आन्तरिक जीवन में है। उन्हें बदलना चाहते हो, अपने जीवन में परिवर्तन करना चाहते हो, कष्टों से छुटकारा पाना चाहते हो, आगे का जीवन सुखी बनाना चाहते हो तो केवल बाहरी दौड़ धूप करके संतुष्ट मत हो जाओ, इससे तुम्हें स्थायी शाँति नहीं मिल सकेगी। आत्यंतिक निवृत्ति तो तभी होगी जब उसके मूल स्त्रोत का उपचार किया जाएगा।

🔶 यदि तुम अपने वर्तमान जीवन से असंतुष्ट हो, उन्नति और विकास की आकाँक्षा करते हो तो अपना आन्तरिक जीवन टटोल डालो। उसमें से बुरी आदतों, नीच वासनाओं, दुष्ट वृत्तियों को निकाल डालो। इससे तुम्हारा मार्ग साफ हो जाएगा और उसकी सारी कठिनाईयाँ दूर हो जायेंगी। आत्म बल, दृढ़ता और तीव्र इच्छा शक्ति को बढ़ाओं अपने अंदर शुभ वृत्तियों और सद्गुण को आने दो इन्हीं के आधार पर उन्नति के पथ पर सरपट दौड़ते चले जाओ

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1940 जुलाई पृष्ठ 3

👉 Awakening Divinity in Man (Part 5)

🔶 When one is attracted by the soothing wave of ideals and is immersed in it, then his magnetism, his charm, his voice, his overall personality and his authenticity are so empowered that everyone is impressed by him, attracted towards him and wants to cooperate with him. Vivekanand got abundant honour and support from all parts of the world. Who showered them? The Goddess Kali. If gurus like Ramkrishna are alive somewhere or are reborn, they will always grant blessings that will develop virtuous personality of their disciples.

🔷 If your personality is refined and evolved in the righteous direction, then help and harmonius association will be showered upon you from all directions according to your wishes. You won’t have to ask for them. You will receive them effortlessly. When divinity is expressed in your personality, benevolence and respect begin to fall upon you. So many examples are available before you. Look at revered Baba Amte! He donated everything and engaged his whole life for the service of the socially discarded leprosy patients.

🔶 This is a principle of greatness, an ideal of humanity, a boon of divinity. Blessings (of deities) cannot be expected in sacrifices of any lesser magnitude (than that of people like Baba Amte). And there is nothing greater to be blessed by… Begging has never brought anything useful to anyone and will never be able to bring anything better in future either.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 भगवान कैसे दिखाई देंगे? (भाग 2)

🔶 स्वार्थान्धता को दूर करो। इच्छाओं का दमन करो। वहम या शंकाओं को हटाओ, हृदय को पवित्र करो। अपने विचारों पर मनन करो। अपने सिद्धान्तों पर विचार करो। जो गन्दगी या कूड़ा-करकट हो, उसे साफ करो और इस प्रकार भगवान् को प्राप्त करो। यही हर युग के सन्त-महात्माओं के उपदेशों का सार है। बुद्ध, ईसा, मुहम्मद शिन्टो, चैतन्यदेव, शंकर आदि के उपदेश को पढ़ो। तुम्हें साधना का यही सार मालूम होगा। यही भगवत्प्राप्ति का मार्ग है। भगवत्प्राप्ति ही तुम्हारा मुख्य-कर्त्तव्य है।

🔷 जिस प्रकार एक गाड़ी को कुशल हाँकने वाला अपनी गाड़ी में जुते चंचल घोड़ों की रास या लगाम के द्वारा रोक-थाम करता है, उसी तरह तुम भी अपनी चंचल-इन्द्रिय-रूपी घोड़ों को विवेक और वैराग्य की लगामों के द्वारा रोक-थाम करो। तभी तुम्हारी उस परब्रह्म भगवान या सुमधुर आत्मा तक पहुँचने की यात्रा सकुशल पूरी होगी और तुम्हें वास्तविक सुख-शान्ति प्राप्त होगी।

🔶 सदैव सत्य बोलो सत्य के पथ से कभी विचलित मन हो वो। यह ध्यान रक्खो कि सत्य का अभ्यास करने और पवित्र-जीवन बिताने के लिये ही तुम पैदा हुए हो। नेकी में ही सत्य का निवास है। सीधे खड़े हो, सुदृढ़ बनो, निर्भाव हो वो, सत्यवादी बनो और सत्य का अभ्यास करो। हर जगह सत्य का ही प्रचार करो।

✍🏻 श्री स्वामी शिवानन्दजी सरस्वती
📖 अखण्ड-ज्योति 1946 नवम्बर पृष्ठ 5

👉 गुरुगीता (भाग 113)

👉 गुरू भक्ति की सिद्धि सर्वोपरि, सबसे बड़ी

🔶 इस प्रकरण को आगे बढ़ाते हुए भगवान् शिव माँ भगवती से कहते हैं-

🔷 मोहनं सर्वभूतानां बंधमोक्षकरं भवेत्। देवराजप्रियकरं सर्वलोकवशं भवेत्॥ १४२॥
सर्वेषां स्तम्भनकरं गुणानां च विवर्धनम्। दुष्कर्मनाशनं चैव सुकर्मसिद्धिदं भवेत्॥१४३॥
असिद्धं साधयेत्कार्यं नवग्रहभयावहम्। दुःस्वप्रनाशनं चैव सुस्वन्पफलदायकम्॥ १४४॥
सर्वशान्तिकरं नित्यं तथा वंध्यासुपुत्रदम्। अवैधव्यकरं स्त्रीणां सौभाग्यदायकं सदा॥१४५॥

🔶 गुरूगीता की साधना सभी प्राणियों का सम्मोहन करने वाली है। इससे सभी बन्धनों से छुटकारा मिलता है इससे देवराज की प्रीति मिलती है और सभी लोकों के प्राणी वश में होते हैं॥१४२॥ इससे सभी शत्रुओं एवं दुर्गुणों का स्तम्भन होता है। गुणों की अभिवृद्धि होती है। गुरूगीता की यह साधना दुष्कर्मों का नाश करके सत्कर्मों की सिद्धि देती है॥ १४३॥ इस साधना से असाध्यकार्य साध्य होते हैं एवं नवग्रहों की पीड़ा दूर होती है। दुःस्वन्पों का फल नष्ट होता है, सुस्वप्नों का सुफल मिलता है॥ १४४॥ इस साधना से नित्य सभी प्रकार की शान्ति होती है, वन्ध्या स्त्री इस साधना के द्वारा पुत्रवती बनती है। स्त्री इस साधना द्वारा अपने वैधव्य का निवारण करके सौभाग्य को चिरस्थायी बनाती है॥ १४५॥

🔷 भगवान् शिव के ये वचन संसार के असह्य कष्टों से संतप्त जनों के लिए गुरू उपदेश के समान है। इनके अनुसरण से मनुष्य न केवल स्वयं विपत्तियों से छूट सकता है, बल्कि औरों की भी सार्थक सहायता कर सकता है। बस गुरूगीता की सुखद् छाँव में आश्रय लेने भर की बात है। 

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 170

👉 छात्र जीवन निर्माण करें

🔶 सबसे पहले मानव जीवन प्राप्त करने वाला प्राणी अपने पूर्व जन्म के कर्मानुसार अपनी माँ के गर्भ से संसार में आता है। प्रारम्भ से प्राप्त माँ बाप के सहयोग से बाल्यावस्था का प्रथम चरण व्यतीत करके द्वितीय चरण में शिक्षकों के सहयोग में भेजा जाता है और वहीं से उसका जीवन निर्माण शुरू होता है। शिक्षा के साथ साथ वह वहाँ शासन में रहना तथा शासन करना भी सीखता है और शिक्षकों के अनुकूल आचरणों का समावेश भी उसमें पूर्ण रूप से हो जाता है। यही कारण है कि आज का भारत उत्थान की तरफ न जाकर पतनोन्मुख हो रहा है। क्योंकि प्रायः आज का शिक्षकवर्ग भारतीय संस्कृति के विपरीत है। कुम्भकार अवा में पकाने से पहले घड़े जैसी मीनाकारी करता है वही अन्त तक रहती है। इसी तरह बाल्यावस्था में जैसी शिक्षा दीक्षा में बालक रहता है वैसा ही जीवन का निर्माण होता है।

🔷 इसलिये बालकों के अभिभावकों को विशेष तौर से सोचना चाहिये कि आधुनिक शिक्षकों के ऊपर ही सारा भार बालकों को सौंपकर निश्चिन्त न हो जावें—अपितु उनके अलावा रहन सहन सदाचार आदि के विषय में—पूर्ण रूप से सतर्क रहें क्योंकि महापुरुषों की यथार्थ उक्ति है कि जिसका प्रातः नष्ट हो गया, उसका सम्पूर्ण दिन खत्म हो गया और जिसकी बाल्यावस्था बिगड़ गई उसका जीवन समाप्त हो गया। जिसका आचरण चला गया उसका सर्वस्व नष्ट हो गया। यह प्रायः देखा गया है कि जिन लोगों के पूर्व संस्कार कमजोर हैं, उन्हीं पर सहवास और संगति का प्रबल प्रभाव पड़ता है। हमारे प्रातः स्मरणीय स्वामी विवेकानन्द और स्वामी रामतीर्थ ने पाश्चात्य संस्कृति से संतप्त शिक्षणालयों में शिक्षा प्राप्त करके भी अपने वास्तविक अध्यात्म प्रकाश से सारे जगत को प्रकाशित किया।

🔶 इस प्रकार अच्छे अभिभावक तथा शिक्षकों के सहवास में रहकर संसार संग्राम में विजयी होने के अनुकूल गुणों को ग्रहण करके गृहस्थ जीवन में प्रविष्ट होने अथवा नैष्ठिक ब्रह्मचारी रहकर सन्त विनोबा की भाँति लोक सेवा में संलग्न हो जावें। समय की प्रति मिनट को अमूल्य समझकर स्वास्थ्य के नियमों का पूर्ण रूप से पालन करते हुए और ईश्वर की उपासना के बल पर विघ्नों को पराजित कर वर्तमान को सुधारते हुए भूत−भविष्यत् का पूरा ध्यान रखते हुए—सच्ची जनसेवा में जुट जावें, अपने संकट कालीन तथा सफल जनक अनुभव संसार को बताते हुए आगे बढ़ें और शास्त्र की मर्यादानुकूल गृहस्थ जीवन में प्रविष्ट होने वाले लोग तो सबसे पहले सात्विक गुरु की खोज करें।

🔷 इस समय में वास्तविक सन्तों का अभाव सा है किन्तु सच्ची लगन वालों को अवश्य निधि मिलती है। प्रयत्न करने पर भी यदि सफलता न मिले तो सच्छात्रों के वचनानुसार अपने जीवन को बनावें। ब्रह्मचर्य का पालन करता हुआ लोकोपकार के लिये जीवन निर्मित करे। फैशनपरस्ती की मूर्खता से दूर रहकर वास्तविक सौंदर्य की कुञ्जी ब्रह्मचर्य तथा सदाचार का पालन करे। अपने जीवन से लोगों को शिक्षा देता हुआ, समय के सच्चे रहस्य को समझकर चलना शुरू करे। नवयुवक विद्यार्थी अपना निर्माण इस तरह करके लोगों को सत्प्रेरणा देना शुरू करें तो थोड़े ही समय में भारत का भाग्य चमकने लगे।

📖 अखण्ड ज्योति, फरवरी 1955 पृष्ठ 24

👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग १)

महत्त्व निर्माण का ही है। उपलब्धियाँ मात्र उसी पर निर्भर हैं। इतना होते हुए भी पहले से ही जड़ जमाकर बैठी हुई अवांछनीयता निरस्त करने पर सृ...