बुधवार, 26 अप्रैल 2017

👉 ध्यानयोग का आधार और स्वरूप (भाग 4)

🔴 विचारक, मनीषी, बुद्धिजीवी, साहित्यकार, कलाकार वैज्ञानिक आदि अपनी कल्पना शक्ति को एक सीमित क्षेत्र में ही जुटाये रहने के कारण तद्विषयक असाधारण सूझबूझ का परिचय देते हैं और ऐसी कृतियाँ-उपलब्धियाँ प्रस्तुत कर पाते हैं, जिन पर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। यह एकाग्रता का चमत्कार है। बुद्धि की तीव्रता जन्मजात नहीं होती। वह चिन्तन को विषय विशेष में तन्मय करने के फलस्वरूप हस्तगत होती है। चाकू, उस्तरा जैसे औजारों को पत्थर पर घिस देने से वे चमकने लगते हैं और पैनी धार के बन जाते हैं। बुद्धि के संबंध में भी यही बात है। उसे तन्मयता की खराद पर खराद कर हीरे जैसा चमकीला बनाना पड़ता है। जिनका मन एक काम पर न लगेगा, जो शारीरिक, मानसिक दृष्टि से उचकते मचकते रहेंगे, वे अपना समय, श्रम बर्बाद करने के अतिरिक्त उपहासास्पद भी बनकर रहेंगे।

🔵 प्रवीणता और प्रतिभा निखारने के लिए- प्रगति का मार्ग प्रशस्त करने के लिए- एकाग्रता का सम्पादन आवश्यक है। शरीरगत संयम बरतने से मनुष्य स्वस्थ रहता और दीर्घ जीवी बनता है, उसी प्रकार मनोगत संयम-एकाग्रभाव सम्पादित करने से वह बुद्धिमान, विचारकों की गणना में गिना जाने लगता है।

🔴 कछुए और खरगोश की कहानी बहुतों ने सुनी होगी, जिसमें अनवरत चलते रहने वाला उस खरगोश से आगे निकल गया था, जो अहंकार में इतराता हुआ अस्त-व्यस्त चलता था। वरदराज और कालिदास जैसे मूढ़मति समझे जाने वाले जब दत्तचित्त होकर पढ़ने में प्रवृत्त हुए तो मूर्धन्य विद्वान बन गये। यह तत्परता और तन्मयता के संयुक्त होने का चमत्कार है। बिजली के दोनों तार जब संयुक्त होते हैं तो करेण्ट बहने लगता है। गंगा और यमुना के मिलने पर पाताल से सरस्वती की तीसरी धारा उमड़ती है। ज्ञान और कर्म का प्रतिफल भी ऐसे ही चमत्कार उत्पन्न करता है। मन और चित्त के समन्वय से उत्पन्न होने वाली एकाग्रता के भी ऐसे ही असाधारण प्रतिफल उत्पन्न होते देखे गये हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹~अखण्ड ज्योति 1986 नवम्बर पृष्ठ 4


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1986/November/v1.4

👉 प्रभु! तुम्हारा विश्वास शक्ति बने, याचना नहीं

🔵 हे प्रभु! मेरी केवल यही कामना है कि मैं संकटों से घबराकर भागूँ नहीं, उनका सामना करूँ। इसलिए मेरी यह प्रार्थना नहीं है कि संकट के समय तुम मेरी रक्षा करो, बल्कि मैं तो इतना ही चाहता हूँ कि तुम उनसे जूझने का बल दो। मैं यह भी नहीं चाहता कि जब दुःख-सन्ताप से मेरा चित्त व्यथित हो जाय, तब तुम मुझे सांत्वना दो। मैं अपनी अञ्जली के भाव-सुमन तुम्हारे चरणों में अर्पित करते हुए इतना ही माँगता हूँ कि तुम मुझे अपने दुःखों पर विजय प्राप्त करने की शक्ति दो।

🔴 जब किसी कष्टदायक संकट की घड़ी में मुझे कहीं से कोई सहायता न मिले तो मैं हिम्मत न हारूँ। किसी और स्रोत से सहायता की याचना न करूँ, न उन घड़ियों में मेरा मनोबल क्षीण होने पाए। हे अन्तर्यामिन्! मुझे ऐसी दृढ़ता और शक्ति देना जिससे कि मैं कठिन से कठिन घड़ियों में भी-संकटों और समस्याओं के सामने भी दृढ़ रह सकूँ और तुम्हें हर पल अपने साथ देखते हुए मुसीबतों, परेशानियों को हँसी-खेल समझकर अपने चित्त को हलका रख सकूँ। मैं बस यही चाहता हूँ।
  
🔵 मेरे आराध्य! तुम्हारा विश्वास हर-हमेशा मेरे हृदय-मन्दिर में दीप-शिखा की तरह अखण्ड, अविराम प्रच्वलित रहे। मेरे प्रारब्ध के प्रबल झंझावात, परिस्थितियों की भयावह प्रतिकूलताएँ स्वयं मेरी अपनी मनोग्रन्थियाँ इस ज्योति को बुझा तो क्या, कँपा भी न सकें। विश्वास की यह च्योति हर पल मेरे अस्तित्व में आत्मबल की ऊर्जा एवं तात्कालिक सूझ का प्रकाश उड़ेलती रहे। यह विश्वास मेरे लिए शक्ति बने-याचना नहीं, सम्बल बने-क्षीणता नहीं। कहीं ऐसा न हो कि स्वयं के तमोगुण से घिरकर, तुम्हारे  विश्वास का झूठा आडम्बर रखकर कर्म से विमुख हो जाऊँ, कर्त्तव्य से मुख मोड़ लूँ। चाहे जैसी भी प्रतिकूलाएँ हों, व्यवहार में मुझे कितनी ही हानि क्यों न उठानी पड़े, इसकी मुझे जरा भी परवाह नहीं है, लेकिन प्रभु मुझे इतना कमजोर मत होने देना कि मैं आसन्न संकटों को देखकर हिम्मत हार बैठूँ और यह रोने बैठ जाऊँ कि अब क्या करूँ, मेरा सर्वस्व छिन गया।

🔴 मैं न अहंकारी बनूँ और न ही अकर्मण्य। स्वयं को तुम्हारे चरणों में समर्पित करते हुए मेरी इतनी ही चाहत है कि जीवन संग्राम में रणबाँकुरे योद्धा की तरह जुझारू बनूँ। तुम्हारे विश्वास की शक्ति से भयावह संकटों के चक्रव्यूहों का बेधन करूँ, उन्हें छिन्न-भिन्न करूँ।

🔵 प्रभु तुम्हारा और केवल तुम्हारा विश्वास ग्रहण कर लोगों ने अकिंचन अवस्था में रहते हुए भी इतिहास-पुरुष बनने का गौरव हासिल किया है। जीव और संसार की श्रेष्ठतम उपलब्धियाँ अर्जित की हैं। मेरी बस यही कामना है कि तुम्हारा विश्वास मेरे लिए वीरता का पर्याय बने, आलस्य नहीं। वीरता का सम्बल बने, आतुरता का आकुलाहट नहीं। बस इतनी ही कृपा करना।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 42

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 April 2017


👉 आज का सद्चिंतन 26 April 2017


👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...