शनिवार, 6 मई 2017

👉 आज का सद्चिंतन 7 May 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 May 2017


👉 सीमित से असीम जीवन की ओर

🔵 शंकराचार्य जी अपनी माता की इकलौती संतान थे। माता ने सतान प्राप्ति के लिये शिव की घोर तपस्या की। तपस्या के फलस्वरूप जो संतान मिली-उसका नाम शंकर रखा।

🔴 साधारण स्त्रियों की तरह वे भी यही स्वप्न देखा करतीं थी कि कुछ ही दिनों में जब हमारा शंकर और बड़ा हो जायेगा तो उसका ब्याह करुँगी। बहू घर में आयेगी। हमारा घर भी कुछ ही दिनों में नाती पोतों से भरा-पूरा हो जायेगा। बहू की सेवाओं से हमें भी तृप्ति मिलेगी। जीवन की अंतिम घडियाँ सुख-शांति और वैभवपूर्ण ढ़ंग से समाप्त होंगी। ज्यो-ज्यों शकर बडे होते जाते, माता का वह स्वप्न और भी तीव्र होता जाता।

🔵 जन्म-जात प्रतिभा-संपन्न शंकर का ध्यान जप, तप, पूजा-पाठ और दूसरे की सेवा, सहायता में ही अधिक लगता था। ज्ञानार्जन करना और इस प्रसाद को दूसरों तक वितरित करने की एक आकांक्षा हृदय के एक कोने से धीरे-धीरे प्रदीप्त हो रही थी। समाज की दयनीय दशा देखकर, उन्हे तरस आ रहा था। समाज को एक प्रखर, सच्चे और एकनिष्ठ सेवक की उन्हें आवश्यकता प्रतीत हो रही थी। ऐसे विषम समय में वे अपनी प्रतिभा को सांसारिक माया-जाल मे फँसाकर नष्ट नहीं करना चाहते थे।

🔴 उधर माता बच्चे की ऐसी प्रवृति को देखकर खिन्न हो रही थी। वे अपने किशोर शंकर को यही समझाया करती थीं कि वह घर गृहस्थी सँभाले, आजीविका कमाए और विवाह कर ले।

🔵 किशोर शंकर को माता के प्रति अगाध निष्ठा थी। वे उनका पूरा सम्मान करते थे और सेवा-सुश्रूषा में रंच मात्र भी न्यूनता नहीं आने देते थे। फिर भी अंतरात्मा यह स्वीकार न कर रही थी कि मोहग्रस्त व्यक्ति यदि अविवेकपूर्ण किसी बात का आग्रह कर रहा हो तो भी उसे स्वीकार ही कर लिया जाए। माता की ममता का मूल्य बहुत है, पर विश्व-माता मानवता की सेवा करने का मूल्य उससे भी अधिक है। विवेक ने- "बडे के लिए छोटे का त्याग" उचित बतलाया है। अंतरात्मा ने ईश्वर की अतरंग प्रेरणा का अनुभव किया और उसी को ईश्वर का निर्देश मानकर शंकर ने विश्व-सेवा करने का निश्चय किया।

🔴 माता को कष्ट न हो, स्वीवृति भी मिल जाए। ऐसा कौन-सा उपाय हो सकता है-यही उनके मस्तिष्क में गूँजने लगा। सोचते-सोचते एक विचित्र उपाय सूझा। एक दिन माता पुत्र दोनों नदी मे स्नान करने साथ-साथ गए। माता तो किनारे पर ही खडी रही, पर बेटा उछलते-कूदते गहरे पानी तक चला गया। वहाँ उसने अपने उपाय का प्रयोग किया। अचानक चिल्लाया-बचाओ। कोई बचाओ 'मुझे मगर पकड़े लिए जा रहा है। बेटे की चीत्कार सुनकर माता घबडा गई। किकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में उन्हें कोई उपाय ही न सूझ रहा था। बेटे ने माता से कहा- 'माता मेरे बचने का एक ही उपाय अब शेष है। तुम मुझे भगवान् शंकर को अर्पित कर दो। वही मेरी प्राण रक्षा कर सकते है'' मर जाने से जीवित रहने का मूल्य अधिक है। भले ही लड़का संन्यासी बनकर रहेगा-यह निर्णय करते माता को देर न लगी। उन्होंने भगवान् शंकर की प्रार्थना की कि- मेरा बेटा मगर के मुख से निकल जाए तो उसे आपको समर्पित कर दूँगी। इतना कहते ही बेटे की आंतरिक प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। वह धीरे-धीरे किनारे पर आ गया।

🔵 इस प्रकार विश्व-सेवा के प्रेम और मानवता की सेवा की सच्ची निष्ठा ने ममता और मोह पर विजय पाई। यह युवक शंकर-संन्यासी शंकराचार्य के रूप में धर्म एवं संस्कृति की महान् सेवा में प्रवृत हुए।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 154, 155

👉 युग परिवर्तन का वासन्ती प्रवाह

🔵 वसन्त में परिवर्तन के प्रवाह की मर्मर ध्वनि सुनायी देती है। एक गहन-गम्भीर अन्तर्नाद गूँजता है। इसकी छुअन भर से समूची प्रकृति अपने सड़े-गले, जीर्ण-शीर्ण वस्त्रों को उतारकर,वासन्ती परिधान पहनकर सजने-सँवरने लगती है। परिवर्तन का यह वासन्ती प्रवाह पतझड़ को रंग-विरंगी कोपलों एवं सुरभित-सुगन्धित फलों में बदल देता है। कँपकपा देने वाली बर्फीली-सर्दीली हवाएँ वसन्ती ब्यार का रूप ले लेती हैं। अब तो प्राकृतिक परिवर्तन के इसी पर्व को दैवीचेतना ने युगपरिवर्तन के महापर्व का गौरव दिया है।

🔴 युगपरिवर्तन के वासन्ती प्रवाह का रहस्यमय उद्गम तब हुआ, जब परमपूज्य गुरुदेव को उनके महान् गुरु ने भगीरथी तपश्चर्या का उद्बोधन, आह्वान प्रस्तुत किया और उस निर्देश को शिरोधार्य करने के लिए गुरुदेव तत्क्षण उद्यत हो गए। वे एकनिष्ठ भाव से समग्र श्रद्धा नियोजित करके युग परिवर्तन के प्रवाह को जगती पर लाने के लिए उसी प्रकार तत्पर रहे, जिस प्रकार गंगाप्रवाह के अवतरण का लक्ष्य लेकर भगीरथ ने कठोर तप-साधना की अग्नि परीक्षा में प्रवेश किया था। निश्चित रूप से यह प्रयास सोने को अग्नि में तपाकर निर्मल एवं तेजस्वी बनाने जैसा था। जिसके आधार पर उन्हें महत्त्वपूर्ण क्षमताएँ, प्रतिभाएँ, विभूतियाँ और सिद्धियाँ प्राप्त हो सकीं। अपनी इसी तप-साधना के बल पर उन्होंने युगपरिवर्तन की प्रचण्ड धाराओं को दु्रतगति से प्रवाहित कर सकने में अलौकिक सफलता प्राप्त की।
  
🔵 युगपरिवर्तन का यह वासन्ती प्रवाह न केवल प्रकृति एवं पर्यावरण, बल्कि मानवीय जीवन के हर पहलू को आमूल-चूल बदल डालने के लिए उतारू है। यही कारण है कि इन्सानी जिन्दगी के हर छोर पर दरकन और दरारें पड़ चुकी हैं। सब तरफ पुरानेपन के ध्वंस और महानाश की चीत्कारों और हाहाकार की आर्त गूँज है। पर इसी के साथ नवसृजन की कोमल किलकारियाँ हैं एवं नवचेतना के अंकुरण का मधुर संगीत भी है, ये स्वर अभी कितने ही मन्द क्यों न हों, किन्तु जिनके पास तनिक-सा भी अन्तर्ज्ञान है, वे इन्हें सहज ही सुन-समझ सकते हैं।

🔴 राजनैतिक एवं आर्थिक क्षेत्रों की संकटग्रस्त स्थिति की चर्चा सर्वत्र है, पर प्राकृतिक, सामाजिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक विपदाएँ ही कहाँ कम हैं? सच तो यह है कि हर तरफ पुरानापन टूटकर नवसृजन हो रहा है। अकेला व्यक्ति या कोई एक परिवार अथवा फिर कोई एक देश या समाज नहीं, बल्कि पूरे का पूरा युग परिवर्तित हो रहा है। इस युगपरिवर्तन के अनेक पहलू हैं, अगणित आयाम हैं और साथ ही हैं, इसके विविध मोर्चों पर जुझारू संघर्ष के लिए समर्थ युगसैनिकों के लिए वीरोचित आह्वान। यह संदेश। आमंत्रण!! आह्वान!!! शब्दों की सतह पर नहीं, भावों की गहराइयों में ही सुना और समझा जा सकता है।

🔵 इसे धारण करने के लिए हम सावधान हो जाएँ। युग परिवर्तन का वासन्ती प्रवाह हम तक पहुँचे यह कामना करते हुए बैठे न रहें। वह तो सदा से समर्थ है और अपना काम करेगा ही। हम तो कामना करें इस प्रवाह की वासन्ती ज्वाला की, वासन्ती शौर्य के शोलों की, जिसके तेज से अनीति एवं अवांछनीयताएँ जलकर भस्म हो जाएँ। युग परिवर्तन की प्रक्रिया पूरी हो और नवयुग मुस्करा उठे।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 58

👉 आत्मचिंतन के क्षण 7 May

🔴 बूँद-बूँद जोड़ने से घड़ा भर जाता है। पतले धागे मिलकर मोटा, मजबूत रस्सा बनाते हैं। हम सबका सम्मिलित प्रयत्न युग निर्माण के रूप में परिणत हो सकता है। युग बदल सकता है, बशर्ते कि हम स्वयं बदलें। बहुत कुछ हो सकता है, बशर्ते कि हम स्वयं भी कुछ करने को तैयार हों। अपने बदलने, सुधरने और करने की अब आवश्यकता है। इस परिवर्तन के साथ ही हमारा समाज, राष्ट्र और संसार बदलेगा। प्रलोभनों और आकर्शणों में अपने आपको घुलाते रहने की अपेक्षा अब हमें आदर्शवाद की प्रतिस्थापना करने के लिए कष्ट उठाने की भावनाएँ अपने अन्दर उत्पन्न करनी है। यही उत्पादन विश्व  शांति की सुरम्य हरियाली के रूप में दृश्टिगोचर हो सकेगा।                

🔵 नींव पर रखे हुए पत्थरों को कोई नहीं जानता, किन्तु शिखर के कँगूरे सबको दीखते हैं। पर श्रेय इन कँगूरों को नहीं; नींव के पत्थरों को ही रहता है। कँगूरे टूटते-फूटते और हटते-बदलते रहते हैं, पर नींव के पत्थर अडिग है। जब तक भवन रहता है, तब तक ही नहीं, वरन् उसके नष्ट हो जाने के बाद भी वे जहाँ के तहाँ बने रहते हैं। इसी प्रवृत्ति के बने हुए लौह स्तम्भों को ‘युग पुरुष’ कहते हैं। उन्हीं के द्वारा युगों का निर्माण एवं परिवर्तन व्यवस्था सम्पन्न होते हैं।                                                  

🔴 अखण्ड ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को हम उसी दृष्टि से देखते हैं जैसे कि कोई वयोवृद्ध व्यक्ति अपने निज के कुटुम्ब परिवार को देखता है। जिस प्रकार हममें से हर एक को अपन-अपना परिवार सुविकसित करना है, उसी प्रकार हम भी अखण्ड ज्योति परिवार के सदस्यों को अपना निजी कुटुम्ब मानकर उसे ऐसा सुविकसित एवं सुसंस्कृत बनाना चाहते हैं; जिसे देखकर दूसरों को भी उसी ढाँचे में ढलने की प्रेरणा मिले। पर हमारे यह प्रयत्न सफल तभी हो सकते हैं, जब प्रत्येक परिजन हमें भी वैसी ही आत्मीयता की दृष्टि से देखें और जो कहा या लिखा जा रहा है उसे भावनापूर्वक सुने-समझें। उपेक्षित बूढ़े लोग जिस प्रकार अपनी बेकार बकझक करते रहते हैं और घर के लोग उनकी बातों पर ध्यान नहीं देते, यदि वही स्थिति अपनी भी रही, तो हमारा स्वप्न साकार न हो सकेगा।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 23)

🌹 समय-संयम सफलता की कुञ्जी है
🔴 अनेक लोग ऐसे होते हैं जो वक्त का महत्व तो स्वीकार कर लेते हैं किन्तु उसके पालन पर ध्यान नहीं देते। समय खराब न करने पर भी वे कोई कम निर्धारित वक्त पर करना आवश्यक नहीं समझते। इस वक्त इस काम पर जुटे हुए हैं तो उस वक्त उस कम पर। दूसरे दिन उनका यह क्रम टूट जाता है और वे इस वक्त उस काम को और उस वक्त इस काम को करने लग जाते हैं।

🔵 इस प्रकार की अनियमितता बहुधा विद्यार्थी, अध्ययनशील तथा लिखा-पढ़ी का काम करने वाले भी किया करते हैं। अशिक्षित, अज्ञानी जीवन में अव्यवस्था हो तो एक बात भी है पर शिक्षा के प्रकाश में आगे बढ़ने वाले को अव्यवस्थित होना वस्तुतः खेदजनक है। अनियमित विद्यार्थी कभी प्रभात में गणित करते हैं तो कभी अंग्रेजी पढ़ते हैं। इसी प्रकार अंग्रेजी व हिन्दी विषय कभी प्रातः व सायं के वक्त घेर कर गणित को दोपहर के लिये रख देते हैं। कभी भूगोल के समय में इतिहास और इतिहास के समय में नागरिक शास्त्र लेकर बैठ जाते हैं। इसके अतिरिक्त उनके लेखन एवं पठन का समय तो परस्पर बदलता ही रहता है पढ़ने तथा खेलने व मनोरंजन के समय भी बदलते रहते हैं। इस प्रकार वे पढ़ने-लिखने, खेलने-कूदने में समय तो देते हैं किन्तु उनके समय में न तो कोई क्रम होता है और न नियमितता।

🔴 कभी-कभी उनका यह समय घटता-बढ़ता भी रहता है। जिस दिन गणित में अधिक मन लग गया तो अंग्रेजी का समय भी उसे दे दिया। कभी रुचि की अधिकता से इंग्लिश गणित का समय ले जाती है। इस प्रकार वे अपना अध्ययन कार्य तो करते रहते हैं किन्तु किसी निश्चित समय-सारिणी के अनुसार विषयों में गति, योग्यता एवं आवश्यकता के अनुसार ही समय देकर बनाई गई समय-सारिणी का पालन करने वाले विद्यार्थी अनियमित विद्यार्थियों से कहीं अधिक श्रम एवं समय के सदुपयोग का लाभ उठाते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आध्यात्मिक साधना के त्रिदोष (भाग 1)

🔵 प्रत्येक प्राणी उन्नति की ओर अग्रसर होना चाहता है, पर जहाँ तक बाधक कारणों का सम्यक् परिज्ञान न हो एवं उनको दूर न किया जाये, उन्नति असंभव है। आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी उसके बाधक कारणों को जानना परमावश्यक होता है। लेख में वैसे तीन दोषों पर संक्षेप में प्रकाश डाला जा रहा है। 1.ममत्व, 2.कपट और 3.अवगुणग्राही दृष्टि। जहाँ तक ये दोष रहेंगे, वहाँ तक साधना अग्रसर एवं फलवती नहीं होगी।

🔴 1.ममत्व- जहाँ तक साँसारिक पदार्थों में आत्मा की आशक्ति रहेगी, आत्मा का लक्ष्य बहिर्मुखी रहने के कारण आत्मानुभव का मार्ग बन्द ही रहेगा। इसलिए सारे भौतिक पदार्थों भाषों से अपनी आत्मा को अलग, भिन्न, समस्त कर उनके आकर्षण को रोकना बहुत ही आवश्यक है पर पदार्थों की आसक्ति हटते ही आत्मा के स्वरूप का दर्शन एवं अनुभव होगा, आत्मोन्नति का प्रथम सोपान है। जिन-जिन वस्तुओं को आत्मा मेरी अपनी समझता है उनकी प्राप्ति अभिवृद्धि में हर्ष एवं विनाश-क्षीणता में होता है। जहाँ ममत्व भाव नहीं वहाँ हर्ष शोक का प्रादुर्भाव नहीं होता है होता है तो अत्यल्प एवं क्षणिक।

🔵 आत्मा द्रव्य वास्तव में इन पाँच द्रव्यों से सर्वथा भिन्न है दृश्यमान सभी पदार्थ पौद्गलिक (भौतिक) है, क्योंकि पुद्गल के सिवाय सभी पदार्थ अरूपी हैं अरूपी पदार्थों पर आसक्ति नहीं होती । जिसे हम देखते हैं, सुनते हैं, खाते हैं, सूँघते हैं और स्पर्श करते हैं अर्थात् पाँचों इन्द्रियों द्वारा जिनके साथ हम अपना किसी प्रकार का सम्बन्ध करते हैं उन्हीं का मन विचार करता है अच्छे या बुरे मेरे या तेरे की कल्पना करता है उस कल्पना के द्वारा ही आत्मा अपने स्वरूप (विचार) से च्युत होकर उनके प्रति आकर्षित होती है। इसीलिए “मैं और मेरा” इसी को मोह का मूलमन्त्र माना गया है और मोह ही आत्मा का परम शत्रु सबसे प्रबल बाधक कारण माना गया है।

🔴 पर पदार्थों के संयोग से आत्मा विभाव दशा को प्राप्त होती है। इसीलिए सर्व संग परित्याग-अपरिग्रहता-निर्ग्रन्धता को जैन धर्म में प्रमुख स्थान दिया गया है। जैन तीर्थंकर स्वयं इनका आदर्श उपस्थित करते हैं अर्थात् साधना का आरम्भ सर्वसंग परिसंग परित्याग से ही करते हैं। आसक्ति का परिहार पदार्थों-द्रव्यों के स्वरूप को ज्ञान एवं परिणामों के द्वारा होता है। इनका मूलमन्त्र है “एगोहूँ नत्थि में कोह नाह मनस्स कस्सवि”-मैं किसी का नहीं-मेरी आत्मा अकेली है।” मनुष्य जरा सा विचार करे तो इस अकेलेपन का सहज अनुभव हो जाता है। जन्म-ग्रहण के समय आत्मा अकेली ही उत्पन्न होती है सत्य के समय भी सारे पदार्थों को छोड़कर वह अकेली ही परलोक जाती है। रोगादि दुख भी आत्मा को अकेले ही भोगने पड़ते है अतः आत्मा अकेली ही है बाह्य संयोग धन, दौलत, कुटुम्ब परिवार यावत् देह भी अपना नहीं हैं। तब उन पर समत्व रखना मूर्खता व अज्ञानता नहीं तो क्या है। योगी पुरुषों ने सबसे बड़ी भूल इसी को बतलाया है कि जो पदार्थ अपने नहीं उन्हें अपना मान लेना और अपने स्वरूप को भूल जाना

🔵 बहिर्मुखी वृति के कारण आत्मा की सारी शक्ति बाह्य पदार्थों की ओर लगी है और वह उनके लाभ हानि में ही सुख-दुख मान बैठा है, अन्यथा सुख व आनन्द कहीं बाहर से आने वाली चीज नहीं। सच्चे स्वरूप के अज्ञान के कारण ही वह इधर दौड़ धूप कर रहा है। यदि मैं अकेला हूँ, कोई भी चीज मेरी नहीं है तब उन पर आसक्ति कैसी? आनन्द यदि मेरे पास है तो उसकी प्राप्ति के लिए दौड़ धूप क्यों? इसी पर विचार करिये। पोद्गलिक-सभी पदार्थ रूप वाले विनाशी हैं, आत्मा अरूपी एवं अविनाशी है दृश्यमान सभी चीजें पुद्गल की बनी हुई हैं अतः ममत्व को हटाकर आत्मा का अन्तर्मुखी होना आध्यात्मिक साधना के लिए परमावश्यक कार्य है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1950 पृष्ठ 14

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 95)

🌹 तीसरी हिमालय यात्रा-ऋषि परम्परा का बीजारोपण

🔴 इसके अतिरिक्त चल प्रज्ञापीठों की योजना बनी। एक कार्यकर्ता एक संस्था चला सकता है। यह चल गाड़ियाँ हैं। इन्हें कार्यकर्ता अपने नगर तथा समीपवर्ती क्षेत्रों में धकेलकर ले जाते हैं। पुस्तकों के अतिरिक्त आवश्यक सामान भी उसकी कोठी में भरा रहता है। यह चल पुस्तकालय अपेक्षाकृत अधिक सुविधाजनक रहे इसलिए वे दो वर्ष में बारह हजार की संख्या में बन गए। स्थिर प्रज्ञा पीठों और चल पज्ञा संस्थानों के माध्यम से हर दिन प्रायः एक लाख व्यक्ति इनसे प्रेरणा प्राप्त करते हैं।

🔵 इसके अतिरिक्त उपरोक्त हर संस्था का वार्षिकोत्सव करने का निश्चय किया गया, जिसमें उस क्षेत्र के न्यूनतम एक हजार कार्यकर्ता एकत्रित हों। चार दिन सम्मेलन चले। नए वर्ष का संदेश सुनाने के लिए हरिद्वार से प्रचारक मंडलियाँ कन्याओं की टोलियों के समान ही भेजने का प्रबंध किया गया, जिनमें ४ गायक और १ वक्ता भेजे गए। पाँच प्रचारकों की टोली के लिए जीवन गाड़ियों का प्रबंध करना पड़ा ताकि कार्यकर्त्ताओं के बिस्तर, कपड़े, संगीत, उपकरण, लाउडस्पीकर आदि सभी सामान भली प्रकार जा सके। ड्राइवर भी अपना ही कार्यकर्ता होता है, ताकि वह भी छठे प्रकार का काम देख सके। अब हर प्रचारक को जीप व कार ड्राइविंग सिखाने की व्यवस्था की गई है, ताकि इस प्रयोजन के लिए बाहर के आदमी न तलाशने पड़ें। 

🔴 मथुरा रहकर महत्त्वपूर्ण साहित्य लिखा जा चुका था। हरिद्वार आकर प्रज्ञा पुराण का मूल उपनिषद् पक्ष संस्कृत व कथा टीका सहित हिन्दी में १८ खण्डों में लिखने का निश्चय किया गया। पाँच खण्ड प्रकाशित भी हो चुके। इसके अतिरिक्त एक फोल्डर आठ पेज का नित्य लिखने का निश्चय किया गया। जिनके माध्यम से सभी ऋषियों की कार्य पद्धति से सभी प्रज्ञापुत्रों को अवगत कराया जा सके और उन्हें करने में संलग्न होने की प्रेरणा मिल सके। अब तक इस प्रकार ४०० फोल्डर लिखे जा चुके हैं। उनको भारत की अन्य भाषाओं में अनुवाद कराने का प्रबंध चल पड़ा व देश के कोने-कोने में यह साहित्य पहुँचा है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/3.4

👉 आसुरी प्रगति

🔴 संसार में ऐसा कोई नहीं है जिसमें कोई दोष न हो अथवा जिससे कभी गलती न हुई हो। अतएव किसी की गलती देखकर बौखलाओ मत और न उसका बुरा चाहो।

🔵 दूसरों को सीख देना मत सीखो। अपनी सीख मान कर उसके अनुसार बन जाना सीखो। जो सिखाते हैं, खुद नहीं सीखते, सीख के अनुसार नहीं चलते, वे अपने आप को और जगत को भी धोखा देते हैं।

🔴 सच्ची कमाई है, उत्तम से उत्तम सद्गुणों का संग्रह। संसार का प्रत्येक प्राणी किसी न किसी सद्गुण से संपन्न है, परन्तु आत्मगौरव का गुण मनुष्यों के लिए प्रभु की सबसे बड़ी देन है। इस गुण से विभूषित प्रत्येक प्राणी को, संसार के समस्त जीवों को अपनी आत्मा की भाँति ही देखना चाहिए। सदैव उसकी ऐसी धारणा रहे कि उसके मन, वचन एवं कर्म किसी से भी जगत के किसी जीव को क्लेश न हो। ऐसी प्रकृति वाला अंत में परब्रह्म को पाता है।

🔵 यह विचार छोड़ दो कि धमकाए बिना अथवा बिना छल-कपट के तुम्हारे मित्र, साथी, स्त्री-बच्चे या नौकर-चाकर बिगड़ जाएँगे। सच्ची बात तो इससे बिलकुल उलटी है। प्रेम, सहानुभूति, सम्मान, मधुर वचन, त्याग और निश्छल सत्य के व्यवहार से ही तुम किसी को अपना बना सकते हो।

🔴 प्रेम, सहानुभूति, सम्मान, मधुर वचन, सक्रिय हित, त्याग और निश्छल सत्य के व्यवहार से ही तुम किसी को अपना बना सकते हो। तुम्हारा ऐसा व्यवहार होगा तो लोगों के हृदय में बड़ा मधुर और प्रिय स्थान तुम्हारे लिये सुरक्षित हो जायगा। तुम भी सुखी होओगे और तुम्हारे संपर्क में जो आ जावेंगे, उनको भी सुख शाँति मिलेगी।

🌹 ~अखण्ड ज्योति-जुलाई 1947 पृष्ठ 4
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1947/July/v1.4

👉 अनजानी बीमारी से बचाई गयी बालिका

🔵 मेरी बेटी वंदना को अचानक बेहोशी का दौरा पड़ने लगा। इस बीमारी की शुरुआत तब हुई, जब वह ननिहाल में थी। वहीं पर इलाज शुरू हुआ। एक एक कर कई डॉक्टरों की दवाएँ चलीं, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ।

🔴 दो- तीन महीने बीतते- बीतते बीमारी बहुत बढ़ गई। अब बेहोशी के बाद पैरों में असहनीय दर्द की शिकायत भी रहने लगी और धीरे- धीरे चलना- फिरना भी कठिन हो गया। ऐसी हालत में वंदना को औरंगाबाद लाकर डॉ. गुंजन सिन्हा को दिखाया गया, लेकिन उनका इलाज भी कोई काम नहीं आया।

🔵 उन्हीं दिनों घर पर आए एक रिश्तेदार ने राँची के प्रसिद्ध डॉक्टर के.के. सिंह को दिखाने की सलाह दी। इन्हें एशिया के अन्य देशों से भी कन्सल्टेन्ट के रूप में बुलाया जाता है। डॉ. सिंह ने भी कई तरह की जाँच करवाई, लेकिन किसी भी जाँच की रिपोर्ट से बीमारी पकड़ में नहीं आई।

🔴 बेहोशी के दौरे अब और भी जल्दी- जल्दी आने लगे। इस लम्बी चिकित्सा प्रक्रिया से थककर मेरी बच्ची जीवन के प्रति कुछ निराश- सी हो चली थी। दिन भर गुम- सुम सी बैठी रहती थी। अकेले में ‘गायत्री माता- गायत्री माता’ बुदबुदाया करती थी। एक ही रट लगाए रहती- मुझे गायत्री मन्दिर ले चलो।

🔵 गायत्री मन्दिर के पास हमारी थोड़ी- सी जमीन थी। उसमें घर बनाने की तैयारी चल रही थी। हमने उसे दिलासा दे रखी थी कि भूमि पूजन के दिन गायत्री मन्दिर ले चलेंगे। निर्धारित तिथि को हम सब भूमि पूजन के लिए घर से चले। वंदना भी हमारे साथ थी। गायत्री मन्दिर जाने के नाम पर वह बहुत खुश थी। साइट पर पहुँचते ही उसने कहा- अब चलो गायत्री मंदिर। हमने कहा- पूजा हो जाने दो, हम सब साथ- साथ चलेंगे। लेकिन वह जिद करने लगी कि अभी चलो। भूमि पूजन में व्यवधान होते देखकर मैंने उसे जोर से डाँट दिया। वह रो- रोकर बेहोश हो गई।

🔴 हम सभी घबरा उठे। भूमिपूजन को बीच में ही रोककर उसे गायत्री मंदिर ले जाकर माँ गायत्री की मूर्ति के आगे लिटा दिया गया। कुछ मिनटों बाद ही उसे होश आ गया। वह आँखें मलते हुए उठ बैठी। स्वयं को मन्दिर में पाकर उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वह एक ही झटके में गायत्री माता की मूर्ति के पास पहुँची और हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगी। थोड़ी देर बाद हम लोग भूमि पूजन के लिए वापस चल पड़े। वंदना तो उछलती- कूदती इस प्रकार आगे भागी जा रही थी मानो उसे पंख लग गए हों।

🔵 उसी दिन से उसका दौरा पड़ना हमेशा के लिए बन्द हो गया। माँ गायत्री की असीम अनुकम्पा से आज वह पूरी तरह से स्वस्थ है।
  
🌹 आशा देवी औरंगाबाद (बिहार)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/asa

👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...